जब सर्कस शेर को 13 साल बाद मिली आजादी | WeForNewsHindi | Latest, News Update, -Top Story
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जब सर्कस शेर को 13 साल बाद मिली आजादी

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Photo Credit IANS

नई दिल्ली: किसी की गुलामी और कैद में जिंदगी जीने से बुरा कुछ नहीं होता। चाहे वह मनुष्य हो या पशु हो, स्वतंत्रता सभी के लिए मायने रखती है।

सोशल मीडिया पर भी एक ऐसा ही वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें 13 साल की कैद के बाद पहली बार मिली आजादी का जश्न मना रहे शेर को देखा जा सकता है कि किस तरह वह मैदान में हरी घास और मिट्टी को महसूस कर रहा है। यह देख कई यूजर्स भावुक हो गए।

इस 27 सेकेंड के वीडियो को एक आईएफएस अधिकारी सुशांत नंदा ने ट्विटर पर साझा किया है। वीडियो के कैप्शन में उन्होंने लिखा है, “सर्कस से छुड़ाए जाने के 13 साल बाद पहली बार मिट्टी को महससू करते शेर की भावना।”

वीडियो में देखा जा सकता है कि शेर अपने पंजे को मिट्टी में रगड़ रहा है और उसे यह अहसास होता है कि आखिरकार वह आजाद हो चुका है और वह अपनी आजादी का आनंद ले रहा है।

अपनी जिंदगी का ज्यादातर हिस्सा पिंजड़े में बिताने वाले सर्कस के शेर का यह वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो गया है।

यूजर्स इस वीडियो पर प्रतिक्रिया देने से नहीं चुक रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, “विकास क्यों खराब चीज है, मनुष्य इसके उदाहरण हैं।”

वहीं अन्य ने लिखा, “बस उसके आनंद को देखो”

वहीं एक ने लिखा, “हृदय विदारक। सर्कस और जू। दिल तोड़ने वाला। मनुष्य कितना स्वार्थी हो गया है।”

–आईएएनएस

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इंदौर में सोशल डिस्टेंसिंग से बेरुखी महंगी पड़ी

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Coronavirus india lockdown

इंदौर, 2 अप्रैल | स्वच्छता का परचम लहराने वाला मध्य प्रदेश का इंदौर इन दिनों देश और दुनिया में फैली कोरोना वायरस की महामारी से जूझ रहा है। स्वच्छता के बावजूद आखिर क्या वजह रही कि इंदौर में कोरोना के मरीज बढ़ते गए। इनमें एक जो प्रमुख वजह रही वह है सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न किया जाना। इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जुड़े और आधुनिक सुविधाओं वाले शहर में शुरुआती केस आने के बाद भी समय पर प्रबंध नहीं किए गए, जिनकी जरूरत थी। शहर में जांच की सुविधा नहीं होना भी अहम वजह रही।

इंदौर की स्थिति पर गौर करें तो एक बात साफ है कि राज्य का सबसे विकसित और आधुनिक सुविधाओं वाला शहर है। यहां अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है और कई देशों की उड़ानें भी आती रही है, इतना ही नहीं रेल और बस सुविधा के मामले में अव्वल है। कई राज्यों से सीधा संपर्क है। औद्योगिक दृष्टि से भी यहां कई बड़े उद्योग हैं, जिससे देशी-विदेशी लोगों की आवाजाही कुछ ज्यादा ही रहती है। इसके अलावा यहां दूसरे स्थानों के हजारों छात्र अध्ययन करने और शिक्षित व्यक्ति रोजगार की तलाश में आते है। वहीं इंदौर के हजारों बच्चे दूसरे शहर और विदेशों में पढ़ते हैं, जो हाल ही में लौटे भी है।

लंबे अरसे से इंदौर और मालवा निमाड़ के क्षेत्र में सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर काम करने वाले जन स्वास्थ्य अभियान के राष्ट्रीय सह संयोजक अमूल्य निधि का कहना है, “इंदौर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़ा हुआ महानगर है यहां कई देशों से फ्लाइट आती हैं और पड़ोसी राज्य गुजरात और महाराष्ट्र से भी बड़ी संख्या में लोग आते हैं। कोरोना महामारी की जब बात सामने आई तब इंदौर में वह प्रबंध नहीं किए गए, जिनकी जरूरत थी। एक तो जांच की सुविधा नहीं थी, दूसरा सोशल डिस्टेंसिंग को ध्यान में नहीं रखा गया। यही कारण रहा कि इक्का-दुक्का मरीज कभी आए होंगे, जिनमें यह संक्रमण रहा होगा और वह लगातार समाज के संपर्क में रहे जिससे यह तेजी से फैल गया।”

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए अमूल्य निधि कहते हैं, “मरीजों की संख्या बढ़ने का दूसरा कारण भी है। पहले कम सैंपल लिए जा रहे थे और जांच रिपोर्ट उन सैंपलों की ही आ रही थी। अब ज्यादा नमूने लिए जा रहे है और रिपोर्ट भी ज्यादा आ रही है। इसे नकारात्मक रूप में नहीं लेना चाहिए बल्कि ज्यादा मरीज पाए जा रहे हैं तो यह सुरक्षा ज्यादा बढ़ाने की ओर हमें तैयार रहने का संदेश भी दे रहा है।”

इंदौर फार्मासिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष विनय बाकलीवाल भी मानते हैं, “इंदौर में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं किया गया और बीमारी फैलने की सबसे बड़ी वजह यही रही। जब लॉकडाउन हुआ है तो अब प्रयास हो रहे हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्दी ही मरीजों की पहचान हो जाएगी और यह शहर सुरक्षित रहेगा।

इंदौर में मरीजों की संख्या बढ़ने के सवाल पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. प्रवीण जरिया ने आईएएनएस से कहा, “यह बात सही है कि इंदौर में संक्रमित मरीजों की संख्या और स्थानों की तुलना में कहीं ज्यादा है। मगर राहत की बात यह है कि गिनती के परिवारों के लोग ज्यादा संक्रमित हैं और उन्हीं के संपर्क में आए लोग संक्रमित पाए जा रहे हैं। प्रशासन ने इसीलिए लोगों को क्वारंटाइन में रखा है और आइसोलेट किया जा रहा है ताकि यह बीमारी आगे न फैल सके।”

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी इस बात को मान चुके है कि इंदौर के कुछ खास इलाकों में ही इस वायरस का संक्रमण फैला है। साथ ही उन्होंने लोगों से लॉकडाउन का पालन करने और सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखने पर जोर दिया। ऐसा इसलिए क्योंकि घरों में रहकर ही इस बीमारी की चेन को तोड़ा जा सकता है।

यह बात भी सामने आ रही है कि इंदौर के रानीपुरा, नयापुरा, दौलतगंज, हाथीपाला आदि स्थानों पर ही सबसे ज्यादा संक्रमित मरीज पाए जा रहे है। यहां बड़ी संख्या में लोगों को क्वारंटाइन और आइसोलेशन की प्रक्रिया में रखा गया है। होटल और निजी चिकित्सा महाविद्यालयों में इन मरीजों के लिए खास इंतजाम किए जा रहे हैं।

राज्य में कोरोना वायरस का सबसे ज्यादा असर इंदौर में नजर आ रहा है। यहां मरीजों की संख्या बढ़कर 75 हो गई है, वहीं राज्य में पीड़ितों की संख्या 98 है। अब तक छह लोगों की मौत हो चुकी है। इंदौर के अलावा भोपाल में चार, जबलपुर में आठ, ग्वालियर व शिवपुरी में दो-दो, खरगोन एक और उज्जैन में छह मरीज हैं। इस तरह राज्य में अब कोरोना के पाजिटिव मरीजों की संख्या बढ़कर 98 हो गई है।

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एलएनआईपीई फिर ‘नंबर-वन’, नैक की सूची में तीसरे पायदान पर जेएनयू

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ग्वालियर: राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यापयन परिषद (नैक) द्वारा हाल ही में जारी सूची में देश के मशहूर खेल प्रशिक्षण संस्थान और डीम्ड यूनिवर्सिटी लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा संस्थान (एलएनआईपीई) को पहले पायदान पर रखा गया है।

नैक यूजीसी की स्वायत्त संस्था है। सूची में दूसरे और तीसरे पायदान पर क्रमश: मुंबई के इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी व दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय रहे हैं।

नैक से हासिल उस अविस्मरणीय उपलब्धि का श्रेय, एलएनआईपीई के कुलपति प्रो. दिलीप कुमार डुरेहा ने विवि के हर शिक्षक-कर्मचारी और विद्यार्थी को दिया है। इस अवसर पर विवि में अपनो को संबोधित करते हुए विवि के कुलपति प्रो. दिलीप कुमार डुरेहा ने कहा, “अगर आप सब दिन-रात कठोर परिश्रम न करते, तो शायद ‘नैक’ जैसी सम्मानित स्वायत्त संस्था से इतना बड़ा सम्मान मिलना दूर की कौड़ी भी हो सकता है। मुझे विश्वास है कि आने वाले वक्त में भी स्टाफ-विद्यार्थियों की कड़ी मेहनत नैक की सूची में इसी तरह पहले पायदान पर निरंतर दर्ज होती रहेगी।”

एलएनआईपीई के प्रवक्ता अभिषेक त्रिपाठी ने आईएएनएस से बात करते हुए कहा, “नैक की सूची में लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा संस्थान, ग्वालियर को ‘ए-डबल-प्लस’ रेटिंग के साथ 3.79 सीजीपीए प्राप्त हुए हैं। जबकि दूसरे व तीसरे नंबर पर रहे संस्थानों को 3.77 सीजीपीए दिया गया है।”

उल्लेखनीय है कि, ‘नैक’ हिंदुस्तान की इकलौती वो स्वायत्त संस्था है जो, देश के शिक्षण संस्थानों का मूल्यांकन वहां की शिक्षण प्रणाली, सुविधाओं, वातावरण इत्यादि के आधार पर करती है। किसी भी शिक्षण संस्थान को इस सूची में प्रथम, द्वितीय व तीसरे पायदान पर आने के लिए एक कठिन प्रक्रिया कहिये या फिर परीक्षा, से गुजरना पड़ता है।

इस उपलब्धि पर बात करते हुए एलएनआईपीई के कुलपति प्रो. दिलीप कुमार डुरेहा ने आगे बताया, “यूनिवर्सिटी में चल रहे कामकाज और सुविधाओं के मद्देनजर मुझे उम्मीद थी कि, नैक की सूची में हम पहले की ही तरह पहले पायदान पर अपना कब्जा बरकरार रख पाने में कामयाब होंगे। हालांकि, सूची जारी नहीं होने तक चिंता जरूर थी। अब जब नैक की सूची में हम पहले पायदान पर फिर खड़े हो चुके हैं, तो कल तक की हमारी अपनी चिंता ही, आज हमारे विश्वास में बदल चुकी है।”

कुलपति प्रो. दिलीप कुमार डुरेहा ने अपने संबोधन में कहा, “नैक की सूची में फिर से प्रथम पायदान पर तो आ गए हैं, लेकिन आइंदा भी इस सम्मान को बरकरार रखने के लिए हमें निरंतर कड़ी मेहनत-तपस्या करनी होगी। यह सब एलएनआईपीई के एक एक कर्मचारी और विद्यार्थी के कठोर तप से ही संभव होगा।”

–आईएएनएस

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बच्चे ने चुकाया स्कूल के लंच का कर्ज, ट्विटर ने की तारीफ

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नई दिल्ली: इंटरनेट पर वाशिंगटन में रहने वाले आठ साल के एक बच्चे की प्रेरणादायक कहानी वायरल हो रही है, जिसने अपने स्कूल के दोपहर के भोजन का 2.87 लाख रुपये कर्ज चाबी की रिंग बेचकर चुकाया है। वह बच्चा सीएटल सीहॉक्स के कॉर्नरबैक रिचर्ड शेर्मन से प्रेरित है।

डेलीमेल की रिपोर्ट के अनुसार, बच्चे को अपनी योजना के लिए प्रेरणा रिचर्ड शेर्मन के बारे में सुनकर मिली, जिन्होंने वाशिंगटन के टकोमा के एक स्कूल का कर्ज चुकाया था और कैलिफोर्निया में क्योनी चिंग (8) ने भी निर्णय लिया कि वह वैंकूवर स्थित अपने स्कूल फ्रैंकलीन एलेमेंटरी में चाबी की चेन (रिंग) 5 डॉलर में बेचकर ‘काइंडनेस वीक’ मनाएंगे।

जब यह खबर सार्वजनिक हुई, तब सोशल मीडिया पर लोगों ने अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त की।

एक यूजर ने लिखा, “हमारे महान राष्ट्रपति से अधिक दिमाग और करुणा इस बच्चे के अंदर है।”

अन्य ने लिखा, “यह एक अच्छे बच्चे की अच्छा करने की अच्छी कहानी है, जो कहानी नहीं बनती, अगर हम भूखे बच्चों का कर्ज चुकाते।”

–आईएएनएस

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