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ओपिनियन

‘यदि सवाल पूछना राष्ट्रद्रोह है तो मैं राष्ट्रद्रोही हूँ’

नोटबन्दी से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई सवाल ऐसे हैं, जिन्हें मोदी सरकार से पूछना बेहद ज़रूरी है

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kapil sibal

भक्तों को लगता है कि सिर्फ़ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही भारत के उस भविष्य का प्रतिनिधित्व करते हैं जो दमदार, बेबाक़ और सख़्त है। भक्तों को लगता है कि जो मोदी की वाहवाही नहीं करता वो राष्ट्रद्रोही है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भक्तों ने नोटबन्दी का ऐसे गुणगान किया मानो वो काले धन के ख़िलाफ़ राम-बाण साबित हुआ है। ऐसा दिखाया गया कि नोटबन्दी से रईसों पर गाज़ गिरी जबकि ग़रीब उससे बेहद ख़ुश थे। कहा गया कि नोटबन्दी से दीर्घकाल में बहुत फ़ायदा होगा। भक्तों ने फ़ैलाया कि सीमा पर ऐसा धावा बोला गया, जैसा पहले कभी नहीं हुआ। इसे सर्ज़िकल हमले का नाम दिया गया। रणनीति बनी कि समाज के मौजूदा चुनौतियों के लिए भारत के अतीत, उसके नायकों और उनकी नीतियों को कोसते रहो।

देश के भीतर हिन्दुत्व और इसकी मानसिकता होनी ही चाहिए। किसी भी क़ीमत पर गौ-माता का संरक्षण होना ही चाहिए। जो लोग पशुओं के व्यापार से जुड़े हैं उन्हें शक़ की नज़रों से देखा ही जाना चाहिए। मौक़ा पाते ही किसी सबूत के बग़ैर उनके साथ मार-पीट की जाएगी या उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाएगा। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तो ये है कि पीड़ित को अपराध का आरोपी तथा हमलावर को प्रताड़ित बनाकर पेश किया जाएगा। गौरक्षकों के उन्मादी हमलों के वक़्त यदि पुलिस मौजूद भी रहेगी तो उसे हालात से नज़रें फेरना पड़ेगा।

देश के बाहर से जुड़े मोर्चों पर फ़ैलाया जाएगा कि पुरानी विदेश नीति पाषाणकालीन थी। चीन को उसकी औक़ात दिखाने की बातें होंगी। मोदी की पाकिस्तान नीति की स्तुति की जाएगी। मोदी के गले मिलने की सराहना होगी। यदि वो बातचीत से इनकार करें तो इसकी प्रशंसा होगी। हर तरह से मोदी को सटीक ठहराया जाएगा। पठानकोट, गुरुदासपुर और उरी के लिए पाकिस्तान की बदमाशियों को ज़िम्मेदार बताया जाएगा। लेकिन यदि आप इसे लेकर कोई सवाल खड़े करें तो आपको पाकिस्तान-समर्थक बताया जाएगा। सोशल मीडिया पर आपका चरित्र-हनन किया जाएगा। यही मेरा भारत है। इसमें मुझ पर दूसरे ग्रह के प्राणी यानी एलियन होने का ठप्पा लगाया जाएगा, वो भी सिर्फ़ इसलिए कि मैं भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थकों की नीतियों से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता।

नोटबन्दी का हादसा

कदाचित, नोटबन्दी तो आज़ाद हिन्दुस्तान का सबसे शर्मनाक घोटाला बन गया। इस जन-विरोधी क़दम को बग़ैर पर्याप्त तैयारियों के लागू किया गया। नोटबन्दी के वक़्त अमीरों को कोई थाम नहीं सका, जबकि ग़रीब क़तारों में खड़े रहे। रातों-रात 86 फ़ीसदी रुपये बेकार होने से अर्थतंत्र ठप पड़ गया। लोगों को रोज़मर्रा की ज़रूरतों से लिए रुपये नहीं मिले। क़रीब सौ लोग बेमौत मारे गये। ज़्यादातर एटीएम महीनों तक अपडेट नहीं हो सके। इसमें कोई शक़ नहीं कि नोटबन्दी जैसा फ़ैसला बग़ैर अपेक्षित तैयारियों के लिया गया। भारतीय रिज़र्व बैंक को भी रोज़ाना बदले जा रहे नियमों की ख़बर नहीं थी। खेतीबाड़ी, रोज़गार, व्यापार और कारोबार के लिए सभी का दम निकलने लगा। नकदी की किल्लत की वजह से करोड़ों लोगों को रोज़गार से हाथ धोना पड़ा।

नोटबन्दी उन तीनों मोर्चों पर बुरी तरह विफल साबित हुई, जिसका ज़िक्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया था। आतंकवाद का पतन नहीं हुआ। जाली नोट प्रचलन में आ गये। यहाँ तक कि धीमी रफ़्तार से ही सही, काला धन फिर से अपने पैर पसार रहा है। लेकिन इन तमाम तथ्यों को लेकर जो नोटबन्दी की आलोचना करे, उसे राष्ट्रद्रोही बताया जाता है। मैं इसका आलोचक हूँ। यदि ये राष्ट्रद्रोह है तो हुआ करे!

सैनिक कार्रवाई आक्रामक होती है। यदि ये सफल है तो इससे रोग का उपचार होना ही चाहिए। लेकिन यदि बीमारी बरकरार रहती है तो फिर कोई वजह नहीं हो सकती कि उसके लिए अपनी वाहवाही की जाए। सैनिक कार्रवाई की तारीफ़ तो होनी ही चाहिए, लेकिन इस बात की समीक्षा भी होनी चाहिए कि उससे हासिल क्या हुआ? सैन्य कार्रवाई के महानिदेशक लेफ़्टिनेंट जनरल रणबीर सिंह के मुताबिक़, नियंत्रण रेखा के उस पार बड़ी संख्या में आतंकवादी मौजूद हैं। वो जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ के लिए तैयार हैं। इससे साबित होता है कि सितम्बर 2016 में हुए सर्ज़िकल हमले से क्या हासिल हुआ?

नवम्बर में 16 कोर के नगरोटा स्थित मुख्यालय पर भारी हथियारों से लैस आतंकवादियों के हमले में एक मेज़र समेत सात सैनिकों का शहीद होना, ये बताने के लिए काफ़ी था कि आतंकवाद का ख़तरा किस शिद्दत से क़ायम है! सर्ज़िकल हमले के बाद के घटनाक्रम में नियंत्रण रेखा पर तनाव इतना ज़्यादा बढ़ता चला गया कि हमारे सैनिकों और नागरिकों को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया गया। काफ़ी सैनिक और नागरिकों की मौत भी हुई। इससे साफ़ है कि सर्ज़िकल हमले ने घुसपैठियों के लिए कोई ख़ौफ़ नहीं पैदा किया। लेकिन यदि कोई इनकी कामयाबी पर सवाल खड़े करे तो भगवा भक्त-मंडली उस पर पाकिस्तान का समर्थक और राष्ट्रद्रोही होने के ठप्पा लगा देते हैं। इसीलिए यदि ये राष्ट्रद्रोह है तो हुआ करे!

दलितों और मुसलमानों की हत्या

कथित गोरक्षा के नाम पर दलितों और मुसलमानों को पीट-पीटकर मार डालने की घटनाएँ पूरे देश के लिए शर्मनाक हैं। ये गोरक्षक ऐसे स्वयंसेवक हैं जो हिन्दू अधिकारों के स्व-नियुक्त राजदूत बन गये हैं। इन्हें सरकार और प्रशासन का मौन समर्थन हासिल है। पिछले साल अगस्त में प्रधानमंत्री मोदी ने इन्हें धिक्कारा था। उससे भी कुछ नहीं बदला। इन गौरक्षकों के ख़िलाफ़ जब प्रदर्शन होने लगे तो प्रधानमंथी मोदी फिर से जुबान खोलने के लिए मज़बूर हुए। हालाँकि, उनके शब्द खोखले ही साबित हुए। ये मोदी ही थे जिन्होंने अपनी चुनावी रैलियों में गोरक्षा और ‘पिंक रिवोल्युशन’ यानी माँस आधारित अर्थव्यवस्था पर ख़ूब भाषणबाज़ी की थी। लेकिन उनके धिक्कारने के बावजूद झारखंड के रामगढ़ में अलीमुद्दीन अंसारी का इसलिए पीट-पीटकर मार डाला गया कि उसके वाहन में कथित तौर पर गौमाँस था। वाहन को भी आग लगा दी गयी। मोदी को अच्छी तरह से मालूम है कि नफ़रत की ऐसी सियासत की बदौलत ही उन्होंने उत्तर प्रदेश का चुनाव जीता है। उन्मादी गौरक्षकों की जड़ों में भी यही नफ़रत है। इसे रोकने के लिए सिर्फ़ कथनी से बात नहीं बनेगी, ज़रूरत करनी की है। लेकिन यदि कोई इसे लेकर सरकार की आलोचना करता है तो उसे गौहत्या का समर्थक, हिन्दू-विरोधी और राष्ट्रद्रोही बनाकर पेश किया जाता है। अब यदि यही सही है, तो हुआ करे!

दिशाहीन विदेश नीति

मोदी की पाकिस्तान नीति में कोई निरन्तरता नहीं है। कभी बहुत गर्मजोशी से हाथ मिलाया जाता है। कभी अचानक लाहौर में क़दम ठिठक पड़ते हैं, तो कभी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की शक़्ल भी नहीं देखते। इसीलिए विदेश नीति से जुड़े हमारे अधिकारियों को ऐसी दोहरी सोच वाली सरकार के इरादों को लेकर संघर्ष करना पड़ता है। पाकिस्तान को लेकर भारत में गहरी नफ़रत है। ऐसी धारणा सैनिक तैयारियों के लिहाज़ से तो ज़रूरी हो सकती है, लेकिन मोदी की पाकिस्तान नीति की आलोचना भक्तों को कतई गवारा नहीं। यही आलम तब भी रहता है जब कोई सीमापार से हो रहे घुसपैठ, पठानकोट और उरी में हुई शहादत और सुरक्षा में सेंध का सवाल उठाता है। गुरुदासपुर में क्या हुआ था, उससे अभी तक पर्दा क्यों नहीं उठा? अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर मौजूद पठानकोट वायु सेना स्टेशन को उड़ा देने की कोशिश कैसे सफ़ल हो गयी?

पठानकोट हमले को लेकर संसदीय समिति ने कहा है कि “…आतंकवादियों को तस्करों के गिरोह से मिली मदद की आशंकाओं का ख़ारिज़ नहीं जा सकता।” राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने अदालत में आरोप-पत्र अवश्य दाख़िल किया है, लेकिन अब भी कई सवालों के जवाब अपेक्षित हैं। हमारी आतंकवाद विरोधी संस्थाएँ क्यों सोती हुई पायी गयीं? क्यों हमारे सुरक्षा बलों को अपने वायुसैनिक अड्डे को सुरक्षित बनाने में तीन दिन लग गये? पाकिस्तान की ओर से जवाबी कार्रवाई को सुनिश्चित किये बग़ैर पाकिस्तानी अफ़सरों को पठानकोट वायुसेना स्टेशन का दौरा क्यों करने दिया गया? क्यों संयुक्त जाँच दल की आड़ में पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी, इंटर सर्विसेज़ इंटेलिजेंस (आईएसएस) के अफ़सर को भी पठानकोट आने दिया गया? उरी में भी लश्कर-ए-तोएबा के आतंकियों ने 19 सैनिकों की हत्या कर दी थी।

तो क्या जनता को पठानकोट और उरी में सुरक्षा तंत्र की ख़ामियों के बारे में सवाल करने का हक़ नहीं होना चाहिए? क्या ऐसा करना राष्ट्रद्रोह है, जिसके लिए भक्तों की ओर से पाकिस्तान समर्थक होने का ठप्पा लगाया जाए? भारत का नागरिक होने के नाते मैं तो अपनी सरकार से उसकी नीतियों और उसके क्रियान्वयन को लेकर सवाल पूछता रहूँगा। अब यदि कोई इसके लिए मुझ पर राष्ट्रद्रोही होने का आरोप लगाये, तो लगाता रहे!

 

(The writer, a senior Congress leader, is former Union Law Minister and a lawyer)

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(अख़बार ‘द हिन्दू’ से साभार।)

ओपिनियन

बढ़ती बेरोज़गारी, गर्त में जाती अर्थव्यवस्था के बीच सरकारों का निजीकरण पर जोर

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narendra modi Black

केन्द्र सरकार इस बात को लेकर बहुत सन्तुष्ट नज़र आती है कि ताज़ा कृषि क़ानूनों का अभी मुख्य रूप से सिर्फ़ दो राज्यों- पंजाब और हरियाणा में ही भारी विरोध हो रहा है। बाक़ी देश के किसान ख़ुश और गदगद हैं कि ‘मोदी जी ने एक और चमत्कार कर दिखाया है।’

बेशक़, सबको अपनी धारणाएँ बनाने की आज़ादी है। लेकिन कृषि क़ानूनों को लेकर जिस ढंग से सियासत गरमायी उससे साफ़ दिख रहा है कि अब पंजाब और हरियाणा के ‘बड़ी जोत वाले किसानों’ पर देशद्रोहियों का ठप्पा लग गया है। वो देश भर के किसानों के हितों के ख़िलाफ़ जाकर विपक्षियों की कठपुतली बन गये हैं क्योंकि उन्हें बरगलाया और ग़ुमराह किया गया।

तो क्या हम ये मान लें कि पंजाब और हरियाणा के किसान बुद्धू हैं, मूर्ख हैं, नासमझ हैं, दिग्भ्रमित हैं? या फिर हम ये समझें कि वे बेहद समझदार और दूरदर्शी हैं। उन्होंने नोटबन्दी, कैशलेस लेन-देन, जियो क्रान्ति, स्टार्ट अप इंडिया, मेक इन इंडिया, इंक्रेडिबल इंडिया, आरोग्य सेतु, ताली-थाली, दीया-पटाखा, पुष्प वर्षा, कोरोना पैकेज़ और आत्मनिर्भर भारत के चमत्कारी जुमलों के अंज़ाम को क़रीब से देखा है।

निजीकरण की आशंका से डर

क्या उन्हें दिख रहा है कि सरकार अब किसानों और खेती-किसानी को भी अपने चहेतों के हाथों बेचने पर आमादा है? कहीं इन अल्पसंख्यक किसानों को ऐसा तो नहीं लग रहा कि मोदी युग में जिस मुस्तैदी से सरकारी सम्पदा को बेचने-ख़रीदने और औने-पौने दाम पर निजीकरण की जो बयार बह रही है, उसमें उनका भी बह जाना तय है?

बोलिविया का सटीक उदाहरण

कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी ने पंजाब और हरियाणा जैसे छोटे राज्यों के मुट्ठी भर किसानों को लैटिन अमेरिकी देश बोलिविया का 20 साल पुराना किस्सा सुना दिया। वैसे ये किस्सा एनसीईआरटी की कक्षा-9 के पाठ्यक्रम में भी है। हुआ यूँ था कि दशकों के फ़ौजी शासन के बाद 1982 में बोलिविया में राजनीतिक सत्ता बहाल हुई। फिर अर्थव्यवस्था इतनी चरमराई कि अगले 15 साल में महँगाई 25 हज़ार गुना तक बढ़ गयी। तब रेलवे, संचार, पेट्रोलियम, उड्डयन जैसे बुनियादी क्षेत्रों का निजीकरण शुरू हुआ। 1999 में देश के चौथे बड़े शहर कोचाबांबा की जलापूर्ति व्यवस्था के निजीकरण का फ़ैसला लिया गया।

निजी कम्पनी को जलापूर्ति सुधारने के लिए एक बाँध बनाना था। इसके लिए धन जुटाने के नाम पर पानी का दाम चार गुना बढ़ा दिया गया। इससे ऐसा हाहाकार मचा कि पाँच हज़ार रुपये महीना औसत कमाई वाले परिवारों को एक हज़ार रुपये का पानी का बिल मिलने लगा। ख़र्च घटाने के लिए जब लोग नदी और नहरों से पानी लाने लगे तो वहाँ पहरा बिठा दिया गया।

सरकार को पीछे हटना पड़ा

कुछ लोगों ने बारिश का पानी जमा करके काम चलाना चाहा तो आदेश आया कि बारिश का पानी इकठ्ठा करने पर चोरी का केस दर्ज़ होगा, क्योंकि वो पानी भी निजी कम्पनी का है। इससे ऐसा जनाक्रोश फूटा कि पुलिस और सेना को भी सड़कों पर उतारने के बावजूद बात नहीं बनी। आख़िरकार, छह महीने के उग्र विद्रोह के बाद सरकार को फ़ैसला वापस लेना पड़ा।

निजीकरण से पहले कोचाबांबा शहर की 80 प्रतिशत आबादी को स्थानीय संस्था से बिजली और अन्य ख़र्च को जोड़कर पर्याप्त पानी मिल जाता था। लेकिन निजीकरण की ख़ातिर इस संस्था को भ्रष्ट और लुटेरा करार दिया गया।

दरअसल, बोलिविया की तरह भारत में भी पूँजीवाद और बाज़ारवाद ने दशकों की मेहनत से ये ‘नैरेटिव’ यानी धारणा बनायी है कि सरकारी तंत्र, सरकारी कम्पनियाँ और सरकारी ताना-बाना निहायत घटिया और भ्रष्ट है। इसे निजीकरण के बग़ैर नहीं सुधारा जा सकता।

भारत में इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि देश के ज़्यादातर नेता और अफ़सर देखते-देखते सम्पन्न लोगों की ऐसी जमात का हिस्सा बन चुके हैं जो पब्लिक या जनता और ख़ासकर ग़रीबों, मज़दूरों और सर्वहारा वर्ग को चोर और भिखमंगा समझते हैं। इन्हें इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि सामाजिक व्यवस्थाएँ निजी हाथों में हैं या सरकारों के।

इससे भी रोचक तथ्य ये है कि ऐसे लोगों को ये मुग़ालता होता है कि वो शिक्षित, देशभक्त और क्रान्तिकारी हैं, जबकि वास्तव में इन्हीं पर समाज के सबसे भ्रष्ट तबके में शामिल होने का आरोप होता है। तमाम सरकारी लूट की बन्दरबाट भी यही समुदाय करता है। ये तबका अपने घरों के ड्रॉइंग रूम में अपने ही जैसे लोगों के बीच परिचर्चाएँ करता है और निजी शिक्षण संस्थाओं, अस्पतालों, म्यूनिस्पैलिटी, पुलिस, कोर्ट, चुनाव प्रक्रिया और आरक्षण को कोसते हुए उस निजीकरण की पैरोकारी करता है जिससे देश लगातार और तबाह हो रहा है।

अर्थशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो निजी क्षेत्र के विस्तार में कोई बुराई नहीं है। देश में ऑटोमोबाइल सेक्टर की तरक्की निजी क्षेत्र या बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की बदौलत ही हुई है। लेकिन ऐसा अन्य सेक्टरों में नहीं हुआ। दरअसल, मोटे तौर पर दो तरह की व्यवस्थाएँ होती हैं- सरकारी या सहकारी और प्राइवेट। आदर्श स्थिति में दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। लेकिन यदि एक की कामयाबी के लिए दूसरे का मरना ज़रूरी होगा, तो निजीकरण दैत्य और राक्षस बन जाएगा।

बड़ी पूँजी, छोटी पूँजी को खा जाएगी क्योंकि प्राइवेट की बुनियाद ही मुनाफ़ाख़ोरी है, जबकि सरकारी तंत्र को सियासत के प्रति संवेदनशील रहते हुए व्यावयासिक हितों को साधना पड़ता है। यही इसकी ख़ामी भी है और ख़ूबी भी।

प्राइवेट सेक्टर को बढ़ाने की कोशिश

भारत में सरकारी शिक्षा, स्वास्थ्य, दूरसंचार और उड्डयन क्षेत्र के डूबने का भरपूर उदाहरण हमारे सामने है। सरकारी क्षेत्र में कमियाँ होती हैं, लेकिन प्राइवेट के आने से पहले और बाद में इन्हें और बढ़ाया जाता है। क्योंकि सरकारी व्यवस्था ठीक रहेगी तो प्राइवेट में कौन जाएगा? मुनाफ़ाख़ोरी कैसे होगी? इसीलिए सरकारी तंत्र की जड़ों में मट्ठा डाला जाता है। सरकारी कम्पनियों को बीमार बनाया जाता है। ताकि प्राइवेट पूँजी लहलहा सके।

शुरुआती पीढ़ी वाले काँग्रेसियों ने सैकड़ों सरकारी कम्पनियाँ स्थापित कीं। कई तरह के राष्ट्रीयकरण किये। लेकिन इनकी ही अगली पीढ़ियों ने तमाम किस्म की लूट-खसोट करके सरकारी तंत्र को खोखला करने की प्रथा भी स्थापित की।

अरुण शौरी पर मुक़दमा

बीजेपी में काँग्रेस वाली अच्छाईयाँ भले ही न हों, लेकिन काँग्रेस वाली ख़ामियों के लिहाज़ से वह उससे हज़ार दर्ज़ा आगे निकल चुकी है। सरकारी कम्पनियों को बेचने या निजीकरण के मोर्चों पर तो ये ख़ूब हुआ। इनका नया रचने में कोई ख़ास यक़ीन नहीं है। लेकिन बेचने में इनके जैसी तेज़ी और किसी में नहीं।

वाजपेयी ने विनिवेश मंत्रालय बनाकर अरुण शौरी को सरकारी सम्पदा बेचने का ज़िम्मा सौंपा। इन्होंने भी अरबों का माल करोड़ों में बेचने का काम बहुत बहादुरी से किया। अब मुक़दमे की गाज़ गिरी है। शायद, इसलिए क्योंकि अब वो मोदी राज के आलोचक हैं। फिर भी कहना मुश्किल है कि इसका अंज़ाम क्या निकलेगा?

टेलीकॉम सेक्टर में रिलायंस का आना

धीरुभाई ने जब टेलीकॉम सेक्टर का रुख़ किया तो वाजपेयी ने वीएसएनएल, एमटीएनएल और बीएसएनएल जैसी तीन सरकारी कम्पनियों के हितों की अनदेखी करके रिलायंस कम्युनिकेशन को लॉन्च किया। समारोह में तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री प्रमोद महाजन ने मंच संचालन किया। आज सभी देख रहे हैं कि जियो लहलहा रहा है और सरकारी कम्पनियाँ बिकने को तैयार हैं।

उड्डयन सेक्टर में भी निजी कम्पनियों को मुनाफ़ा कमाने वाले रूट थमाये गये। ताकि वो निहाल हो सकें और सरकारी कम्पनी डूबती रहे। रेलवे भी इसी राह पर चल पड़ा है। कई साल से इसका घाटा लगातार बढ़ाया जा रहा है। ताकि ये दलील तैयार हो सके कि रेलवे को बेचने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

निजी ट्रेनों को चलाने की तैयारी

रेलवे की ज़मीन बेची जा रही है ताकि चहेतों को और मालामाल बनाया जा सके। बुलेट ट्रेन तो चलने से रही, लिहाज़ा निजी ट्रेनों को ही चलाने की तैयारी हो रही है। जनता के पैसों से बनी पटरियों पर निजी ट्रेनें दौड़ेंगी। ठेके पर कर्मचारी तैनात होंगे। जनता दुबली होती जाएगी और नेता और अफ़सर मोटे होते जाएँगे।

ट्रेड यूनियनों का सौदा हो चुका है। नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कान्त पर आरोप है कि वे लगातार अपने आका के लिए नये झाँसे तैयार करते रहते हैं। इन्हीं का शिग़ूफ़ा है कि निजीकरण से रेलवे में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। किराया कम होगा और जनता को लाभ होगा। भले ही सभी दिहाड़ी मज़दूर बन जाएँ।

अभी युवा बेरोज़गारी से तड़प रहा है। मज़दूर भूख से सिसक रहा है। किसान गिड़गिड़ा रहा है कि बस, इतनी घोषणा कर दीजिए कि मंडी से बाहर भी कोई सौदा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे नहीं होगा। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही।

इन्हीं अमिताभ कान्त ने दिसम्बर, 2015 में प्रकाशित नीति आयोग के एक दस्तावेज़ में किसानों की आमदनी को दोगुना करने वाला जुमला पकाया था। इसमें कहा गया था कि ‘एमएसपी से किसानों का भला नहीं हो सकता क्योंकि सरकार सारी उपज नहीं ख़रीद सकती और ना ही उसे ख़रीदनी चाहिए।’

2016 में नोटबन्दी के बाद अमिताभ कान्त ने कहा था कि दो-तीन साल में अर्थव्यवस्था कैशलेस हो जाएगी। हम देख चुके हैं कि कोरोना की दस्तक से पहले लगातार 16 तिमाहियों तक भारतीय अर्थव्यवस्था गर्त में जाती रही। कोरोना के आंकड़े रोज़ाना आरोग्य सेतु की पोल खोल रहे हैं। यही हाल पीएम केयर्स का है। 5 ट्रिलियन डॉलर भी इनके ही दिमाग़ की ख़ुराफ़ात थी तो ‘स्टार्ट अप इंडिया’ के भी बुनियादी चिन्तक और विचारक यही हैं। 2014 में शुरू हुआ ‘मेक इन इंडिया’ भी इन्हीं के दिमाग़ का कीड़ा था।

स्टार्ट अप योजना फेल?

2019 में एक सर्वे में 33 हज़ार स्टार्ट अप वालों से पूछा गया कि आख़िर यह योजना फेल क्यों हुई? जवाब में 80 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें स्टार्ट अप इंडिया से कोई फ़ायदा नहीं मिला। 50 प्रतिशत ने बताया कि अधिकारी ही उन्हें लूट लेते हैं। वर्ष 2016-19 के दौरान सिर्फ़ 88 स्टार्टअप ही टैक्स लाभ लेने के लायक बन सके।

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की बदहाली और बेरोज़गारों की बढ़ती तादाद सरकार के सारे दावों की पोल खोल देते हैं। कोई नहीं जानता कि देश की पहली स्मार्ट सिटी कहाँ है?

‘इंक्रेडिबल इंडिया’ का क्या हुआ?

‘इंक्रेडिबल इंडिया’ तो ऐसी मनहूस योजना साबित हुई कि इसके विज्ञापनों पर जितना ख़र्च बढ़ता गया, उतनी ही विदेशी सैलानियों की संख्या घटती गयी। कुल मिलाकर, मोदी युग की सबसे बड़ी पहचान यही हो गयी है कि यहाँ ‘मन की बात’ की तो भरमार है लेकिन ‘काम की बात’ को ढूँढना मुहाल है। इसीलिए, बोलिविया के अनुभवों से सीखना ज़रूरी है। देश बेचने वालों से निपटना ज़रूरी है।

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ओपिनियन

‘टाइम’ में अमरत्व वाली मनमाफ़िक छवि अर्जित करने से श्रेष्ठ और कुछ नहीं!

मोदी युग की सबसे बड़ी पहचान यही हो गयी है कि यहाँ ‘मन की बात’ की तो भरमार है लेकिन ‘काम की बात’ को ढूँढ़ना मुहाल है। इसीलिए ‘टाइम’ और बोलिविया के अनुभवों से सीखना ज़रूरी है। देश बेचने वालों से निपटना ज़रूरी है।

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Narendra Damodar Das Modi

भगवा कुलभूषण अब बहुत ख़ुश हैं, पुलकित हैं, आह्लादित हैं, भाव-विभोर हैं क्योंकि टाइम मैगज़ीन ने चौथी बार उन्हें विश्व के सौ प्रभावशाली लोगों में शामिल किया है। उनके लिए इससे भी ज़्यादा सन्तोष की बात तो ये है कि ‘टाइम’ ने उनकी जैसी-जैसी विशेषताएँ बतायी हैं, बिल्कुल वैसी ही छवि बनाने के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्र और मानवता को समर्पित कर दिया, इसकी आहुति दे दी। सार्वजनिक जीवन में ऐसे लोग बहुत कम होते हैं जिनकी वैसी ही छवि बनी हो, जैसा कि वो ख़ुद चाहते हैं। जीते-जी ऐसी मनमाफ़िक छवि का सृजन ही अपने आप में अद्भुत उपलब्धि है! हरेक उपलब्धि से ऊपर है। यही उपलब्धि उन्हें इतिहास में अमरत्व प्रदान करेगी!

दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली हस्तियों में शुमार करते वक़्त ‘टाइम’ ने लिखा, “पिछले सात दशकों से भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के तौर पर मशहूर है। इस दौरान भारत में सभी धर्मों के लोग मिल-जुलकर रहते आए हैं, जिसे दलाई लामा ने सद्भाव और शान्ति की मिसाल बताया है। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने इन सभी बातों को सन्देह के घेरे में ला दिया है। हालाँकि भारत के लगभग सभी प्रधानमंत्री देश की 80 फ़ीसदी हिन्दू आबादी से ही आते रहे हैं, लेकिन मोदी इस तरह राज कर रहे हैं, मानो किसी और की उनके लिए कोई अहमियत ही नहीं है….उनकी हिन्दू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी ने बहुलतावाद को ख़ारिज़ कर दिया है और भारत के मुसलमान तो ख़ासतौर पर उसके निशाने पर हैं। महामारी के हालात ने विरोध को कुचलने का बहाना दे दिया है। जिससे दुनिया का सबसे जीवन्त लोकतंत्र और भी गहरे अन्धकार में चला गया है।”

‘टाइम’ के इस नज़रिये से सावरकर और गोडसे की रूहों या भटकती आत्माओं को अब ज़रूर चैन मिला होगा, ज़रूर चिर-शान्ति का अहसास हो रहा होगा कि उनके विद्रूप ख़ानदान में आख़िर एक नौनिहाल तो ऐसा पैदा हुआ जो कुल-ख़ानदान की धर्म-ध्वजा को आसमान से भी ऊपर ले गया! मनुष्य के रूप में जन्म लेकर जीते-जी देवत्व प्राप्त करने के लिए जितने भी वीभत्स कर्मों की सम्भावना हो सकती है, इन्होंने अल्पकाल में ही वो सब करके दिखाया है, जिसे ‘टाइम’ ने लिखा है। वैसे अभी तो इनके स्वर्ण काल में क़रीब साढ़े तीन वर्ष और शेष हैं। तब तक भारतवर्ष को ये ऐसी जगह तक पहुँचा देंगे जहाँ से वापस आने में सदियाँ लगेंगी!

देशद्रोही किसान?

उधर, ताज़ा कृषि क़ानूनों को लेकर गरमायी सियासत के तहत अब पंजाब और हरियाणा के ‘बड़ी जोत वाले किसानों’ पर देशद्रोहियों का ठप्पा लगा दिया गया है, क्योंकि वो देश भर के अपनी किसान बिरादरी के हितों के ख़िलाफ़ जाकर विपक्षियों की कठपुतली बन गये हैं। शाहीन बाग़ वालों की तरह बरगलाये और ग़ुमराह किये जा चुके हैं। दरअसल, मोदी सरकार ये साबित करना चाहती है कि पंजाब और हरियाणा के किसान बुद्धू हैं, मूर्ख हैं, नासमझ हैं, दिग्भ्रमित हैं। जबकि बाक़ी देश के किसान ख़ुश और गदगद हैं कि ‘मोदी जी ने एक और चमत्कार कर दिखाया है। किसानों की आमदनी दोगुनी तो पहले ही हो चुकी थी, अब चौगुनी होने वाली है।’

तो क्या हम ये मानें कि पंजाब और हरियाणा के आन्दोलनकारी किसान जागरूक, समझदार और दूरदर्शी हैं? उन्होंने नोटबन्दी, कैशलेस लेन-देन, जियो क्रान्ति, स्टार्ट अप इंडिया, मेक इन इंडिया, इंक्रेडिबल इंडिया, आरोग्य सेतु, ताली-थाली, दीया-पटाखा, पुष्प वर्षा, कोरोना पैकेज़ और आत्मनिर्भर भारत के चमत्कारी जुमलों के अंज़ाम को क़रीब से देखा है। इसी ख़ुशी में हरसिमरत कौर बादल ने कैबिनेट मंत्री की कुर्सी पर लात मार दी। उनकी भी आँख खुल गयी कि मोदी सरकार अब खेती-किसानी को भी अपने चहेतों के हाथों बेचने पर आमादा है। इन्हें भी साफ़ दिखने लगा कि मोदी युग में जिस मुस्तैदी से सरकारी सम्पदा को बेचने-ख़रीदने और औने-पौने दाम पर निजीकरण करने की जो बयार बह रही उसमें शिरोमणि अकाली दल का बह जाना तय है?

किस्सा-ए-बोलिविया

सारे घटनाक्रम को देखकर लगता है कि किसी ने पंजाब और हरियाणा के किसानों को लैटिन अमेरिकी देश बोलिविया का 20 साल पुराना किस्सा सुना दिया है। वैसे ये किस्सा एनसीईआरटी की कक्षा-9 के पाठ्यक्रम में भी है। हुआ यूँ कि दशकों के फ़ौजी शासन के बाद 1982 में बोलिविया में राजनीतिक सत्ता बहाल हुई। फिर अर्थव्यवस्था इतनी चरमराई कि अगले 15 साल में महँगाई 25 हज़ार गुना तक बढ़ गयी। तब विश्व बैंक की सलाह पर वहाँ की सरकार ने अपने रेलवे, संचार, पेट्रोलियम, उड्डयन जैसे बुनियादी क्षेत्रों का निजीकरण शुरू हुआ। इसी सिलसिले में 1999 में देश के चौथे बड़े शहर कोचाबांबा की जलापूर्ति व्यवस्था का निजीकरण का फ़ैसला लिया गया।

निजी कम्पनी को शहर की जलापूर्ति सुधारने के लिए एक बाँध बनाना था। इसके लिए धन जुटाने के नाम पर पानी का दाम चार गुना बढ़ा दिया गया। इससे ऐसा हाहाकार मचा कि पाँच हज़ार रुपये महीना औसत कमाई वाले परिवारों को एक हज़ार रुपये का पानी का बिल मिलने लगा। ख़र्च घटाने के लिए जब लोग नदी और नहरों से पानी लाने लगे तो वहाँ पहरा बिठा दिया गया। कुछ लोगों ने बारिश का पानी जमा करके अपना काम चलाना चाहा तो आदेश आया कि बारिश का पानी इकठ्ठा करने पर चोरी का केस दर्ज़ होगा, क्योंकि वो पानी भी निजी कम्पनी का है। इससे ऐसा जनाक्रोश फूटा कि पुलिस और सेना को भी सड़कों पर उतारने के बावजूद बात नहीं बनी। आख़िरकार, छह महीने के उग्र विद्रोह के बाद सरकार को फ़ैसला वापस लेना पड़ा। निजीकरण से पहले शहर की 80 प्रतिशत आबादी को स्थानीय संस्था से बिजली और अन्य ख़र्च को जोड़कर पर्याप्त पानी मिल जाता था। लेकिन निजीकरण की ख़ातिर इस संस्था को भ्रष्ट और लुटेरा करार दिया गया।

सर्वहारा बना भिखमंगा

दरअसल, बोलिविया की तरह भारत में भी पूँजीवाद और बाज़ारवाद ने दशकों की मेहनत से ये ‘नैरेटिव’ यानी धारणा बनायी है कि सरकारी तंत्र, सरकारी कम्पनियाँ और सरकारी ताना-बाना निहायत घटिया और भ्रष्ट है। इसे निजीकरण के बग़ैर नहीं सुधारा जा सकता। भारत में इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि देश के ज़्यादातर नेता और अफ़सर देखते-देखते सम्पन्न लोगों की ऐसी जमात का हिस्सा बन चुके हैं जो पब्लिक या जनता और ख़ासकर ग़रीबों, मज़दूरों और सर्वहारा वर्ग को चोर और भिखमंगा समझते हैं। इन्हें इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि सामाजिक व्यवस्थाएँ निजी हाथों में हैं या सरकारों के।

इससे भी रोचक तथ्य ये है कि ऐसे लोगों को ये मुग़ालता होता है कि वो शिक्षित, देशभक्त और क्रान्तिकारी हैं, जबकि वास्तव में वही समाज का सबसे भ्रष्ट तबका होते हैं। तमाम सरकारी लूट की बन्दरबाट भी यही समुदाय करता है। सार्वजनिक क्षेत्र की लूट-खसोट में शामिल ये तबका अपने घरों के ड्रॉइंग रूम में अपने ही जैसे लोगों के बीच परिचर्चाएँ करता है और निजी शिक्षण संस्थाओं, अस्पतालों, म्यूनिस्पैलिटी, पुलिस, कोर्ट, चुनाव प्रक्रिया और आरक्षण को कोसते हुए उस निजीकरण की पैरोकारी करता है जिससे देश लगातार और तबाह हो रहा है।

प्राइवेट के लिए मरेगा सरकारी

अर्थशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो निजी क्षेत्र के विस्तार में कोई बुराई नहीं है। बशर्ते, इसमें सरकारी क्षेत्र को मिटाकर पनपने से रोकने की व्यवस्था हो। मसलन, देश में ऑटोमोबाइल सेक्टर की तरक्की निजी क्षेत्र या बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की बदौलत ही हुई है। लेकिन ऐसा अन्य सेक्टरों में नहीं हुआ। दरअसल, मोटे तौर पर दो तरह की व्यवस्थाएँ होती हैं – सरकारी या सहकारी और प्राइवेट। आदर्श स्थिति में दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। लेकिन यदि एक की कामयाबी के लिए दूसरे का मरना ज़रूरी होगा, तो निजीकरण दैत्य और राक्षस बन जाएगा। बड़ी पूँजी, छोटी पूँजी को खा जाएगी क्योंकि प्राइवेट की बुनियाद ही मुनाफ़ाख़ोरी है, जबकि सरकारी तंत्र को सियासत के प्रति संवेदनशील रहते हुए व्यावयासिक हितों को साधना पड़ता है। यही इसकी ख़ामी भी है और ख़ूबी भी।

भारत में सरकारी शिक्षा, स्वास्थ्य, दूरसंचार और उड्डयन क्षेत्र के डूबने का भरपूर उदाहरण हमारे सामने है। सरकारी क्षेत्र में कमियाँ होती हैं, लेकिन प्राइवेट के आने से पहले और बाद में इन्हें और बढ़ाया जाता है। क्योंकि सरकारी व्यवस्था ठीक रहेगी तो प्राइवेट में कौन जाएगा? मुनाफ़ाख़ोरी कैसे होगी? इसीलिए सरकारी तंत्र की जड़ों में मट्ठा डाला जाता है। सरकारी कम्पनियों को बीमार बनाया जाता है। ताकि प्राइवेट पूँजी लहलहा सके। शुरुआती पीढ़ी वाले काँग्रेसियों ने सैकड़ों सरकारी कम्पनियाँ स्थापित कीं। कई तरह के राष्ट्रीयकरण किये। लेकिन इनकी ही अगली पीढ़ियों ने तमाम किस्म की लूट-खसोट करके सरकारी तंत्र को खोखला करने की प्रथा भी स्थापित की।

अरबों का माल करोड़ों में

बीजेपी में काँग्रेस वाली अच्छाईयाँ भले ही न हों, लेकिन काँग्रेस वाली ख़ामियों के लिहाज़ से भगवा उससे हज़ार दर्ज़ा आगे निकल चुका है। सरकारी कम्पनियों को बेचने या निजीकरण के मोर्चों पर तो ये ख़ूब हुआ। इनका नया रचने में कोई ख़ास यक़ीन नहीं है। लेकिन बेचने में इनके जैसी तेज़ी और किसी में नहीं। वाजपेयी ने विनिवेश मंत्रालय बनाकर अरुण शौरी को सरकारी सम्पदा बेचने का ज़िम्मा सौंपा। इन्होंने भी अरबों का माल करोड़ों में बेचने का काम बहुत बहादुरी से किया। अब मुक़दमे की गाज़ गिरी है। शायद, इसलिए क्योंकि अब वो मोदी राज के आलोचक हैं। फिर भी कहना मुश्किल है कि इसका अंज़ाम क्या निकलेगा?

धीरुभाई ने जब टेलीकॉम सेक्टर का रुख़ किया तो वाजपेयी ने वीएसएनएल, एमटीएनएल और बीएसएनएल जैसी तीन सरकारी कम्पनियों के हितों की अनदेखी करके रिलायंस कम्युनिकेशन को लॉन्च किया। समारोह में तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री प्रमोद महाजन ने मंच संचालन किया। आज सभी देख रहे हैं कि जियो लहलहा रहा है और सरकारी कम्पनियाँ बिकने को हैं। उड्डयन सेक्टर में भी निजी कम्पनियाँ को मुनाफ़ा कमाने वाले रूट थमाये गये। ताकि वो निहाल हो सकें और सरकारी कम्पनी डूबती रहे। रेलवे भी इसी राह पर चल पड़ा है। कई साल से इसका घाटा लगातार बढ़ाया जा रहा है। ताकि ये दलील तैयार हो सके कि रेलवे को बेचने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

कहाँ बनते हैं झाँसे?

रेलवे की ज़मीन बेची जा रही है ताकि चहेतों को और मालामाल बनाया जा सके। बुलेट ट्रेन तो चलने से रही, लिहाज़ा निजी ट्रेनों को ही चलाने की तैयारी हो रही है। जनता के पैसों से बनी पटरियों पर निजी ट्रेन दौड़ेंगी। ठेके पर कर्मचारी तैनात होंगे। जनता दुबली होती जाएगी। नेता और अफ़सर मोटे होते जाएँगे। ट्रेड यूनियनों का सौदा हो चुका है। नीति आयोग के सबसे बड़े कलाकार अमिताभ कान्त लगातार अपने आका के लिए नये झाँसे तैयार करते रहते हैं। इन्हीं का शिग़ूफ़ा है कि निजीकरण से रेलवे में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। किराया कम होगा। जनता को लाभ होगा। भले ही सभी दिहाड़ी मज़दूर बन जाएँ।

अभी युवा बेरोज़गारी से तड़प रहा है। मज़दूर भूख से सिसक रहा है। किसान गिड़गिड़ा रहा है कि बस, इतनी घोषणा कर दीजिए कि मंडी से बाहर भी कोई सौदा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे नहीं होगा। लेकिन कोई सुनवाई नहीं। इन्हीं अमिताभ कान्त ने दिसम्बर 2015 में प्रकाशित नीति आयोग के एक दस्तावेज़ में किसानों की आमदनी को दोगुना करने वाला जुमला पकाया था। इसमें कहा गया था कि ‘एमएसपी से किसानों का भला नहीं हो सकता क्योंकि सरकार सारी उपज नहीं ख़रीद सकती और ना ही उसे ख़रीदना चाहिए’।

‘काम की बात’ को ढूँढ़ना मुहाल

2016 में नोटबन्दी के बाद इसी अमिताभ कान्त ने कहा था कि दो-तीन साल में अर्थव्यवस्था कैशलेस हो जाएगी। हम देख चुके हैं कि कोरोना की दस्तक से पहले लगातार 16 तिमाहियों तक भारतीय अर्थव्यवस्था गर्त में जाती रही। कोरोना के आंकड़े रोज़ाना आरोग्य सेतु की पोल खोल रहे हैं। यही हाल पीएम केयर्स का है। 5 ट्रिलियन डॉलर भी इनके ही दिमाग़ की ख़ुराफ़ात थी तो ‘स्टार्ट अप इंडिया’ के भी बुनियादी चिन्तक और विचारक यही हैं। 2019 में एक सर्वे में 33 हज़ार स्टार्टअप वालों से पूछा गया कि आख़िर योजना फेल क्यों हुई? जवाब में 80 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें स्टार्टअप इंडिया से कोई फ़ायदा नहीं मिला। 50 प्रतिशत ने बताया कि अधिकारी ही लूट लेते हैं। वर्ष 2016-19 के दौरान सिर्फ़ 88 स्टार्टअप ही टैक्स लाभ लेने के लायक बन सके।

2014 में शुरू हुआ ‘मेक इन इंडिया’ भी इन्हीं के दिमाग़ का कीड़ा था। मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर का बदहाली और बेरोज़गारों की तादाद सारे दावों की पोल खोल देते हैं। कोई नहीं जानता कि देश की पहली स्मार्ट सिटी कहाँ है? ‘इंक्रेडिबल इंडिया’ तो ऐसी मनहूस योजना साबित हुई कि इसके विज्ञापनों पर जितना ख़र्च बढ़ता गया उतना ही विदेशी सैलानियों की संख्या घटती गयी। कुलमिलाकर, मोदी युग की सबसे बड़ी पहचान यही हो गयी है कि यहाँ ‘मन की बात’ की तो भरमार है लेकिन ‘काम की बात’ को ढूँढ़ना मुहाल है। इसीलिए ‘टाइम’ और बोलिविया के अनुभवों से सीखना ज़रूरी है। देश बेचने वालों से निपटना ज़रूरी है।

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ओपिनियन

संविधान बचाने से ज़्यादा ज़रूरी है इसके आन्दोलनकारियों को बचाना

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Students and activists take part in a protest against India's new citizenship law in Bangalore on December 17, 2019 , AFP

सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद प्राचा के हवाले से शाहीन बाग़ वाले संविधान बचाओ आन्दोलन को जल्द बहाल करने की सुगबुगाहट है। इसी तर्ज़ पर क्या सोशल-डिस्टेसिंग का जोख़िम उठाकर 30 अगस्त को मुहर्रम का जुलूस निकालने की इजाज़त माँगने, देने या नहीं देने को लेकर कहीं तनाव के हालात तो नहीं बन जाएँगे? ऐसे दौर में जब रोज़ाना करीब 65 हज़ार कोरोना पॉज़िटिव के मामले सामने रहे हों, जब स्कूल-कॉलेज निलम्बित हों और रेल-सेवा असामान्य हो, जब मैट्रो-सेवा शान्त हो, होटल-रेस्टोरेंट बन्द हों, जब मॉस्क अनिवार्य हो, तब क्या ऐसी बातें होना ठीक है कि जल्द ही ‘शाहीन बाग़’ की बहाली होगी? संविधान बचाओ आन्दोलन के अगले दौर का वक़्त क्या अभी आने से फ़ायदा होगा? क्या सरकारें इसे होने देंगी? कहीं ये पुलिसिया सख़्ती को ‘आ बैल मुझे मार’ का सन्देश तो नहीं देगी?

दरअसल, भारत पर अभी कोरोना-मारीचिका हावी है। मारीचिका एक आभास है। इसमें रेगिस्तान में दुर्लभ पानी दिखने का भाव है। ये आभास और भाव तो असली होते हैं, लेकिन पानी असलियत नहीं होता। मारीचिका आध्यात्मिक ढोंग नहीं, बल्कि भौतिक भ्रम है। ये वैसा ही दृष्टि-दोष है, जैसे दूर जाती रेल की समानान्तर पटरियाँ परस्पर नज़दीक आती हुई प्रतीत होती हैं। बिल्कुल ऐसे ही दृष्टि-दोष की काली छाया अभी ‘कोरोना-अनलॉक’ को लेकर देश पर मँडरा रही है। इसीलिए कोरोना को पुरी में रथयात्रा बर्दाश्त है, अयोध्या का शिला-पूजन बर्दाश्त है, भोपाल, इम्फाल और जयपुर में सरकारों का लुढ़कना-ढनकना बर्दाश्त है, लेकिन किसी भी किस्म के अनलॉक को ईद की सामूहिक नमाज़, मुहर्रम के जुलूस और संविधान बचाने वाले सीएए-एनआरसी आन्दोलन की सुगबुगाहट बर्दाश्त नहीं है।

कोरोना-काल के दौरान उत्तर भारत के मुसलमानों में अज़ीबो-ग़रीब हूक उठती रही हैं। उन्हें यहाँ-वहाँ से अपनी बिरादरी के साथ हो रहे भेदभावों की ख़ूब ख़बरें भी मिलीं। देश देख चुका है कि तब्लीगी जमात के नाम पर उठी नफ़रत की लपटों ने ठेले पर फल-सब्ज़ी बेचने वालों की मज़हबी की पहचान को कैसी प्रमुखता दिलायी। गाय के नाम पर लिंचिंग का नयी घटना को भी कोरोना नहीं टाल सका। दिल्ली के दंगों की पुलिसिया जाँच से कई बदरंग पन्ने भी फिज़ाँ में उड़ते देखे गये। ‘370’ की पहली पुण्यतिथि भी निपट गयी। लॉकडाउन की तकलीफ़ों और बेरोज़गारी के बावजूद जो ग़रीब जीवित रहे, उन्हें भी बाढ़ और अस्पतालों की दुर्दशा ने जमकर डुबोया। लेकिन अमीरों के आईपीएल को न सिर्फ़ डूबने से बचाया गया, बल्कि उसे ‘आत्मनिर्भर’ बनने के लिए ‘वोकल फॉर लोकल’ वाले गुरु-मंत्र से भी विशेष छूट दी गयी। आसार हैं कि स्वतंत्रता-दिवस की भाषणबाज़ी भी कतई फ़ीकी नहीं रहेगी।

लेकिन क्या उपरोक्त तमाम मिसालों को देखते हुए मुस्लिम समाज बराबरी की उम्मीद पाल सकता है? ये सही है कि आन्दोलनकारियों पर कभी दमनकारी सत्ता के बर्बर रवैये का ख़ौफ़ नहीं होता। लेकिन आन्दोलन की कमान थामने वालों को अपनी ताक़त और कमज़ोरियों का भी सही अहसास ज़रूर होना चाहिए। कोरोना से पहले चले आन्दोलन के तज़ुर्बों से सीखना भी बहुत ज़रूरी है। मसलन, उस आन्दोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि ये थी कि वो मुसलमानों की नागरिकता के सवाल से शुरू होकर संविधान बचाने की ओर घूम गयी। इसे शिक्षित और सेक्यूलर मुसलमानों से ज़्यादा इसी श्रेणी के हिन्दुओं और इनमें से भी ख़ासतौर पर युवाओं और महिलाओं का अद्भुत समर्थन मिला। सिर्फ़ इसी इकलौते पहलू से भगवा हुक़्मरानों के माथे पर बल पड़े।

फरवरी में दिल्ली विधानसभा के चुनाव हुए। दिसम्बर-जनवरी में हुक़्मरानों को अपनी ज़मीनी सच्चाई दिखने लगी थी। मेनस्ट्रीम मीडिया तो मुट्ठी में था लेकिन सोशल मीडिया ने नाक में दम कर रखा था। यही देख हुक़्मरानों को डर सताने लगा कि सेक्यूलर हिन्दुओं और मुसलमानों की एकजुटता यदि उसी रफ़्तार से बढ़ती रहती तो उनके लिए ‘मुश्किल-काल’ बहुत दूर नहीं रहता। इसी एकजुटता में सेंधमारी के लिए दिल्ली में दंगों की पटकथा लिखी गयी। नफ़रत और उन्माद फैलाने वाली भाषणबाज़ी के धारावाहिक चले। दंगों में पुलिस ने वही किया जो उसे हुक़्म मिला, ताकि ‘सबसे ज़्यादा अनुशासित और आज्ञाकारी संस्था’ वाला उसका सिंहासन अक्षुण्य रहे।

अब तो सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं में भगवा-समाजवाद आ चुका है। सभी ने पुलिसिया-संस्कारों को ही अपना आराध्य बना लिया है। विधान सिर्फ़ इतना है कि हुक़्म की तामील होगी, हर हाल में होगी, अवश्य होगी। बाक़ी संविधान की बातें जिन्हें करना है वो नक्कारख़ाने में तूती बजाते रहें। नये भारत में सबको इस आकाशवाणी पर यक़ीन करना होगा कि “पूर्वी लद्दाख में न तो कोई हमारी सीमा में घुस आया है, न ही कोई घुसा हुआ है और ना ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्ज़े में है।”

इसीलिए मुस्लिम समाज चाहे तो गाँठ बाँध लें कि उसकी किसी भी किस्म की एकता से हुक़्मरानों की सेहत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला। क्योंकि हुक़्मरानों को कपड़ों से पहचानने में महारत हासिल है। लिहाज़ा, शाहीन बाग़ की बहाली के लिए बेताब लोगों को पहचान के बजाय परिचय को तरजीह देना सीखना होगा। उन्हें समझना होगा कि पहचान तो दूर से ही हो जाती है जबकि परिचय के लिए नज़दीक या रूबरू आना पड़ता है। चन्दन-टीका, पगड़ी-टोपी, दाढ़ी-मूँछ, घूँघट-बुर्का, धोती-पजामा – ये सभी पहचान हैं, जबकि सेक्यूलर-कम्यूनल, कट्टर-उदार, जातिवादी-प्रगतिशील आदि परिचय हैं। इसी परिचय के साथ उन्हें जिन हिन्दुओं, युवाओं और महिलाओं का ज़ोरदार समर्थन मिला था, उसी ताक़त से वो मंज़िल पा सकते हैं।

अभी कोरोना के दौरान जिस स्तर का और जैसा ‘अनलॉक’ सामने आया है, उसमें संविधान बचाने की पैरोकारी करने वाले हिन्दुओं, युवाओं और महिलाओं की एकजुटता में मुश्किल होगी। इसीलिए अभी जोख़िम लेने का वक़्त नहीं है। थोड़ा और इन्तज़ार कर लेने में कोई हर्ज़ नहीं है। 15 अगस्त की बातें यदि सरककर 2 अक्टूबर हो जाए तो कोई आफ़त नहीं आ जाएगी। अबकी बार शाहीन बाग़ के आन्दोलनकारियों को संविधान के अलावा अर्थव्यवस्था की ऐतिहासिक दुर्दशा को भी अपने रडार में लेना होगा। इन्हें ये भी समझना होगा कि सरकार किसी भी कीमत पर अपने क़दम वापस नहीं खींचेंगी। वो ज़्यादा से ज़्यादा अपने क़दमों को आगे बढ़ाने का इरादा तब तक टालती रहेगी, जब तक कि उसका पतन न हो जाए। लेकिन इस दौरान आन्दोलनकारियों को हिंसा और हिरासत के उकसावों से भी ख़ुद को बचाना होगा। बीते एक साल में कश्मीर ने भारत, सेक्यूलरों और संविधान की दुहाई देने वालों को अनेक सबक दिये हैं। बहुसंख्यक समाज ने ताली-थाली और दीया-दिवाली के कई नज़ारे देश को दिखाये हैं। इसीलिए आन्दोलनकारियों को समझना होगा कि जो विरोधियों की ताक़त का सही अन्दाज़ा नहीं लगाते, वो विरोधियों का शिकार बनने के लिए अभिशप्त होते हैं। विरोधी जहाँ बात ख़त्म करना चाहते हैं, आन्दोलनकारियों को वहीं से बात शुरू करने की रणनीति अपनानी होगी। वर्ना, उनका सरकार का जाल में फँसना तय है।

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