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पठानकोट हमले में ‘सरकारी चाल’ की जैसी पोल खुली वैसा पहले कभी नहीं हुआ!

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पठानकोट हमले में ‘सरकारी चाल’ की जैसी पोल खुली वैसा पहले कभी नहीं हुआ!

By:मुकेश कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

सीमापार से आये आतंकियों की वजह से देश पर छोटे-बड़े आतंकवादी हमलों की फ़ेहरिश्त बहुत लम्बी है. हर वारदात का अपना अनोखा क़िस्सा होता है. लेकिन पठानकोट बेजोड़ है. इसने सबको पीछे छोड़ दिया. क्योंकि ये पहला मौक़ा था, जब ख़ुफ़िया जानकारी न सिर्फ़ सबसे पुख़्ता थी, बल्कि ख़ासा पहले मिल गयी थी. लेकिन इस वारदात में समूचे सरकारी अमले की कार्रवाई सबसे लचर और अफ़सोसनाक थी. इसमें केन्द्रीय गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, पंजाब सरकार, पंजाब पुलिस, सीमा सुरक्षा बल, थल सेना, वायु सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) जैसे सभी संगठन शामिल हैं. सभी के स्तर पर कुछ न कुछ कमज़ोरी सामने आयी है. इसके जड़ में है हमारी ‘सरकारी चाल’, जहाँ हरेक अफ़सर अपनी महानता के नशे में चूर रहता है. जहाँ सबको ये तो मालूम है कि औरों का काम क्या है? लेकिन अपने फ़र्ज़ को कैसे मुस्तैदी से निभाये, इसकी सूझबूझ नदारद रहती है.

पठानकोट आतंकी हमले ने हमारी लापरवाह और जंग खा चुकी व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी. राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) इसकी भी पड़ताल करेगी. उसकी रिपोर्ट भी आएगी. लेकिन देख लीजिएगा, सांकेतिक तबादले के अलावा किसी भी अफ़सर के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होगी. इसकी वजह भी हमारी ‘सरकारी चाल’ ही होगी. जो किसी की भी जवाबदेही तय नहीं कर पाती. या, जिसका सबसे बड़ा कौशल अपनी ‘बिरादरी’ और उसकी ‘नौकरी’ को बचाने का होता है. जिसमें कोई किसी के ‘पेट पर लात’ नहीं मारता क्योंकि सभी ‘बाल-बच्चेदार’ होते हैं. सबका एक ही फ़र्ज़ होता है ‘एक-दूसरे को बचाना.’ देश की पूरी सरकारी व्यवस्था की यही सबसे बड़ी बीमारी है. गहरे ज़ख़्मों में देर तक दर्द होता है और वो देर से ही भरते हैं. पठानकोट का दर्द भी धीरे-धीरे हल्का पड़ जाएगा.

ये अनोखा मामला था जहाँ आतंकियों ने देश के एक बेहद महत्वपूर्ण वायु सेना स्टेशन पर हमला किया. वो भी ताल ठोककर. क्योंकि आतंकियों ने इसकी योजना ख़ासा पहले बना ली थी. तभी तो ख़ुफ़िया तंत्र को भनक लगी होगी. ख़ुफ़िया विभाग ने भी 29 दिसम्बर को पूरे सरकारी अमले को आगाह करने के लिए अपनी रिपोर्ट भेजी थी. ज़ाहिर है, एकाध दिन तो उसने भी अपनी सूचना को पुख़्ता करने में लगाये होंगे. लेकिन एक बार जब ख़ुफ़िया रिपोर्ट आ गयी, जब उसमें सैनिक ठिकानों और यहाँ तक कि पठानकोट एयर फोर्स स्टेशन तक के निशाने पर होने की बात की गयी थी, तब भी केन्द्र और राज्य सरकार का पूरा अमला वक़्त रहते इतना चाक-चौबन्द क्यों नहीं हो पाया, जितना अपेक्षित था? इसकी वजह है हमारी ‘सरकारी चाल’, जो स्वभाव से ही बेहद सुस्त और लापरवाह है. घंटों के काम को दिनों में करने में जिसे महारत हासिल है.

यही ‘सरकारी चाल’ दिल्ली में केन्द्र सरकार के सर्वोच्च स्तर पर हावी रही तो इसी ने पंजाब सरकार के हरेक स्तर और सेना तथा पुलिस के निचले स्तर पर अपना असर दिखाया. ये तमाम बातें इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं, क्योंकि ये हमला किसी मॉल, रेलवे स्टेशन या अन्य ऐसे सिविलियन ठिकाने पर नहीं हुआ जहाँ आमतौर पर निहत्थे लोग रहते हैं और जहाँ हरेक व्यक्ति के आने-जाने पर नज़र रखना सम्भव नहीं होता है. लेकिन यहाँ तो बात ऐसे सैनिक अड्डे की थी जिसे चाक-चौबन्द सुरक्षा में होना चाहिए था, इसलिए भी क्योंकि ये पाकिस्तानी सीमा के बेहद नज़दीक है. सरकारी अमला भले ही इस बात के लिए ख़ुद अपनी पीठ ठोंकता रहे कि उसने आतंकियों से अपनी सामरिक सम्पत्तियों (Strategic Assets) को सुरक्षित रखने में कामयाबी पायी, लेकिन ये झूठ है.

नौकरशाह देश को बरगलाने के लिए सामरिक सम्पत्तियों की परिभाषा को भ्रष्ट कर रहे हैं. सच तो ये है कि पूरा का पूरा 2000 एकड़ में फैला पठानकोट वायु सेना स्टेशन ही अपने आप में परिपूर्ण सामरिक सम्पत्ति है. इसीलिए इसे 10-11 फ़ीट ऊँची चहरदीवारी और उसके ऊपर दो फ़ीट की कंटीले तारों की बाड़ से घेरा गया है. इसकी चौकसी के लिए ऐसे हरेक इंतज़ाम किये गये हैं, जो मुमकिन हो सकते थे. ये व्यवस्था किसी क़िले की सुरक्षा से कम नहीं थी. तो क्या क़िले भेदकर आतंकियों का वायु सेना स्टेशन के परिसर में दाख़िल हो जाना ही कोई मामूली चूक है. यहाँ जानबूझकर सीमा पार करके आने वालों की बहादुरी और होशियारी तथा सीमा सुरक्षा बल (BSF) की ‘मुस्तैदी’ की बात नहीं की जा रही है, क्योंकि उसके पहरे में तो सैकड़ों सुराग़ होने का ख़ुलासा पहले भी होता रहा है.

बीएसएफ की तरह ही पंजाब पुलिस की ‘सरकारी चाल’ का आलम भी किससे छिपा है. दोनों के पास ही ज़रूरी संसाधनों की क़िल्लत रहती है. दोनों का ही पूरा ज़ोर अपने-अपने असली काम पर कम और मादक पदार्थों की तस्करी से मलाई काटने पर ज़्यादा रहता है. ये भी उस ‘सरकारी चाल’ की तरह ही है जिसके तहत कहीं एक डॉक्टर अपने मरीज़ के प्रति लापरवाही दिखाता है तो कहीं एक अध्यापक अपने छात्रों के प्रति वैसी ही नाइंसाफ़ी करता है जैसा हमारी अदालतों में इंसाफ़ का हाल है. साफ़ है कि ये कैसे होगा कि समाज का एक तबक़ा तो ‘सरकारी चाल’ का मज़ा लूटे और बाक़ी इससे वंचित रहें. इसीलिए ‘सरकारी चाल’ की बीमारी सार्वभौमिक हो गयी है.

पूरे सरकारी अमले का लीपा-पोती करना और विपक्ष का इस्तीफ़े माँगना भी भारत की चिरपरिचित ‘सरकारी चाल’ का ही नतीज़ा है. ‘सरकारी चाल’ की सबसे बड़ी ख़ासियत होती है, ‘पिछले अनुभवों से कोई सबक़ नहीं लेना’. यदि देश में सबक़ लेने का संस्कार होता तो ‘सरकारी चाल’ का मौज़ूदा जलवा कैसे दिन-ब-दिन बुलन्द होता रहता. ये ‘सरकारी चाल’ ही है कि पठानकोट ऑपरेशन के ख़त्म होने से पहले ही देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह, इसे सम्पन्न बताते हुए अपने नेतृत्व की सराहना करने लगते हैं. ये ‘सरकारी चाल’ ही है कि सेना, पंजाब पुलिस, एनएसजी, बीएसएफ, वायुसेना और ख़ुद रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को देश को ये समझाना पड़ता है कि सभी ने बहुत अच्छा काम किया है. नादान देशवासी इसे समझ नहीं पा रहे थे.
देख लीजिएगा, एनआईए की जाँच से भी इन्हीं ‘रहस्यों’ की पुष्टि करवायी जाएगी. लीपा-पोती के नाम पर जाँच रिपोर्ट में सिर्फ़ इतना लिखा होगा कि समन्वय और नेतृत्व (Coordination and Command) के मोर्चों पर कुछ ग़फ़लत ज़रूर थी. भविष्य में इसे सुधारा जाना चाहिए. ये भी सम्भव है कि ऐसे ‘सुधार’ के लिए कोई और उच्चस्तरीय आयोग बना दिया जाए. ये आयोग भी ‘सरकारी चाल’ के मुताबिक़, सालों-साल में अपनी रिपोर्ट तैयार करे और वो रिपोर्ट भी ‘सरकारी चाल’ के मुताबिक़, सरकारी फ़ाइलों में धूल ही खाती रहे. बहरहाल, पूरे पठानकोट प्रसंग में बस एक ही बात राहत देने वाली है कि सत्ता प्रतिष्ठान में बैठे लोगों ने ये नहीं कहा कि जिन्हें ‘सरकारी चाल’ में क़सर दिख रही है वो राष्ट्र-द्रोही हैं. अब तो ‘सरकारी चाल’ का गुणगान करना ही राष्ट्र-भक्ति की नयी परिभाषा बन चुका है.

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राम लीला मैदान की ओर कूच कर रहे किसान, पुलिस ने निरंकारी मैदान में लाकर छोड़ा

दरअसल निरंकारी मैदान पर किसानों के लिए बेसिक आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का फैसला किया है। इसके तहत सबसे पहले यहां किसानों के लिए पेयजल की व्यवस्था करवाई जा रही है।

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farmers at Sindhu border

नई दिल्ली, 27 नवंबर । कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों ने टिकरी और सिंघु बॉर्डर पर अपना डेरा बनाया हुआ है। हालांकि पंजाब से दिल्ली आए किसानों को बुराड़ी के निरंकारी मैदान पर प्रदर्शन की अनुमति दी गई है। लेकिन फिलहाल किसान अभी बॉर्डर पर जमे हुए हैं। जो किसान दिल्ली में घुस गए थे और रामलीला मैदान पहुंचने की कोशिश कर रहे थे उन्हें पुलिस ने हिरासत में लेकर बुराड़ी के निरंकारी मैदान में लाकर छोड़ दिया है।

पंजाब से दिल्ली अपना विरोध जताने आई सुनीता रानी और उनके साथी आज दिल्ली के राम लीला मैदान की ओर कूच करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन उनके मुताबिक पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेकर बुराड़ी के निरंकारी मैदान छोड़ दिया है। उनके साथ और भी महिलाएं मौजूद है।

सुनीता रानी ने आईएएनएस को बताया, 2 दिन पहले हम पंजाब से चले थे। हमारे और भी साथी सिंघु बॉर्डर पर मौजूद है। दो दिन के सफर के बाद हम राम लीला मैदान पहुचने वाले थे मुश्किल से 1 किलोमीटर रह गए थे। वहीं हम सबको इकठ्ठा होना था वहाँ हमें करीब 2 बजे पुलिस ने हिरासत में ले लिया।

पुलिस ने हमें पूरे दिन घुमाया और अब हमें यहां बुराड़ी मैदान में छोड़ दिया है।

सुनीता के साथ आए अन्य लोग भी फिलहाल बुराड़ी के निरंकारी मैदान में बैठे हुए हैं। हालांकि इन लोगों का कहना है कि हम सभी को सिंघु बॉर्डर जाना है। लेकिन अब फिलहाल पुलिस इन्हें वापस बॉर्डर जाने देगी या नहीं ये अभी तक साफ नहीं हो सका है।

इन सभी की गाड़ियों पर ऑल इंडिया किसान सभा का झंडा लगा हुआ है। वहीं एक बस और 2 अन्य 4 पहिया गाडियां साथ मे मौजूद है। फिलहाल सभी ने बुराड़ी के निरंकारी मैदान में की गई लंगर की व्यवस्था से इन लोगों ने खाने का इंतजाम किया है।

दरअसल निरंकारी मैदान पर किसानों के लिए बेसिक आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का फैसला किया है। इसके तहत सबसे पहले यहां किसानों के लिए पेयजल की व्यवस्था करवाई जा रही है।

दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष राघव चड्ढा खुद बुराड़ी पहुंचकर स्वयं व्यवस्था का जायजा लिया था। किसानों के लिए टेंट, शेल्टर, चलते-फिरते टॉइलट उपलब्ध कराने की तैयारी चल रही है।

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चक्रवात निवार ने पार किया तमिलनाडु और पुडुचेरी समुद्री तट

मौसम विभाग ने कहा कि हवा की गति तमिलनाडु के आंध्र प्रदेश और चित्तूर जिले के आंतरिक जिलों (रानीपेट, तिरुवन्नमलाई, तिरुपत्तूर, वेल्लोर) में 65-75 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक कम होने की संभावना है।

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Nivar Cyclone Chennai Rain

चेन्नई, 26 नवंबर । गंभीर चक्रवाती तूफान निवार (Cyclone Storm Nivar) ने 25 नवंबर की रात और 26 नवंबर की सुबह के दौरान पुडुचेरी के पास से पुडुचेरी और तमिलनाडु तट को 120-130 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पार कर लिया है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने गुरुवार को यह जानकारी दी।

चक्रवात के कारण तमिलनाडु का कुड्डालोर जिला बहुत प्रभावित हुआ है, वहां तेज हवाओं के कारण कई पेड़ गिर गए। जिला प्रशासन गिरे हुए पेड़ों को हटाने में जुटा है।

मौसम विभाग के अनुसार, तटीय तमिलनाडु और पुडुचेरी में चक्रवात का केन्द्र पुडुचेरी से उत्तर में 25 किलोमीटर पर वायु गति 90-100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार के बीच बना हुआ है।

आईएमडी ने कहा कि अगले 3 घंटों के दौरान चक्रवाती तूफान और कमजोर होगा।

चक्रवात ने बुधवार रात लगभग 10.30 बजे तटीय इलाके में दस्तक दिया। इस दौरान उसकी गति 16 किलोमीटर प्रतिघंटा थी।

मौसम विभाग के अनुसार, निवार ने 25 नवंबर को रात 11.30 बजे से 26 नवंबर को सुबह 2:50 बजे के बीच तटीय इलाके को पार किया। करीब 6 घंटे तक तेज रहने के बाद अब इसके धीरे-धीरे कमजोर होने की संभावना है।

समुद्र के किनारे अभी लहरें में भारी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है, जिसके कारण भारी लहरें तटों से टकरा रही हैं। इसके चलते 26 नवंबर को अधिकांश या कई स्थानों पर भारी/बहुत भारी वर्षा होने की संभावना है। इसमें तमिलनाडु के रानीपेट, तिरुवन्नमलाई, तिरुपत्तूर, वेल्लोर जिलों और चित्तूर, कुरनूल, प्रकाशम और आंध्र प्रदेश के कुडप्पा जिले शामिल हैं।

मौसम विभाग ने कहा कि हवा की गति तमिलनाडु के आंध्र प्रदेश और चित्तूर जिले के आंतरिक जिलों (रानीपेट, तिरुवन्नमलाई, तिरुपत्तूर, वेल्लोर) में 65-75 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक कम होने की संभावना है।

पुडुचेरी सरकार ने चक्रवात के चलते गुरुवार को भी सार्वजनिक अवकाश घोषणा की है। वहीं राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) की 25 टीमों को तमिलनाडु, पुदुचेरी और आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों में तैनात किया गया है।

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कांग्रेस के दिग्गज-निष्ठावान नेता अहमद पटेल का निधन – श्रद्धांजलि

पटेल को पत्रकारों का मित्र माना जाता था। वह देर रात पत्रकारों को बुलाते थे। लेकिन कभी भी सीधे तौर पर कोई बयान नहीं देते थे। उनके द्वारा दिए गए जवाब के अनुसार, उन्हें जज करना होता था।

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ahmed patel

नई दिल्ली । कांग्रेस के दिग्गज और निष्ठावान नेता अहमद पटेल का बुधवार को निधन हो गया। उन्होंने कई मौकों पर पार्टी के लिए संकटमोचक का काम किया था। कोरोना से संक्रमित होने के बाद वह स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याओं से जूझ रहे थे और उनके कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया जिस कारण बुधवार तड़के उनका निधन हो गया।

कांग्रेस पार्टी के निष्ठावान और संकटमोचक की छवि के रूप में पहचाने जाने वाले पटेल ने कई बार पार्टी को मुश्किलों से निकाला। 2008 में जब वाम दलों के समर्थन वापस लेने के बाद यूपीए सरकार विश्वास प्रस्ताव का सामना कर रही थी, तो वह सरकार को बचाने के लिए पर्याप्त संख्या बल जुटाने में कामयाब रहे थे।

उनके निधन से पार्टी में जो खालीपन आया है वह कभी नहीं भर सकेगा क्योंकि वह एक पुरानी शैली के राजनेता थे, जिनकी पार्टी लाइन के परे भी अच्छी पहुंच थी और हर जगह उनके दोस्त थे। 2007 में, जब सोनिया गांधी ने उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी को लॉन्च करने की जिम्मेदारी पटेल को सौंपी तो वह पटेल ही थे जिन्होंने हर चीज का प्रबंधन किया। एक मुस्लिम बहुल सीट अमरोहा में राहुल गांधी की जनसभा में बड़ी भीड़ उमड़ी। जब इस पत्रकार ने उस समय के एक निर्दलीय सांसद से स्थानीय सांसद के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा कि अहमद भाई कहते हैं तो करना पड़ता है। तो कुछ ऐसा पटेल का प्रभाव था।

वह अपने सभी कौशल के साथ पीछे पहकर सबकुछ संभालते थे, एक ऐसे नेता थे जो आपको बता सकते थे कि राजनीतिक गलियारे में हवा का रुख किस ओर है। 2019 में, आम चुनावों से पहले उन्हें पता था कि उनकी पार्टी की स्थिति अच्छी नहीं है और उन्होंने मीडिया के सामने यह व्यक्त किया। 23 मदर टेरेसा क्रिसेंट में उनका निवास स्थल 10 जनपथ के बाद सबसे अधिक मांग और सुखिर्यो वाला था।

21 अगस्त, 1949 को गुजरात के भरूच में जन्मे, वह देश के सबसे प्रभावशाली राजनेताओं में से एक थे। यूपीए शासन के दौरान यहां तक कि मंत्री और मुख्यमंत्री उनके कार्यालय से अपॉइंटमेंट के लिए इंतजार करते थे। यद्यपि वह शक्तिशाली थे, वह दूसरों से विनम्रता से मिलते थे। वह पत्रकारों के लिए हमेशा उपलब्ध रहते थे।

पटेल अपने समय के सबसे युवा नेताओं में से एक थे जब उन्हें गुजरात कांग्रेस का नेतृत्व करने के लिए राजीव गांधी द्वारा चुना गया था। बाद में वह संसदीय सचिव के रूप में राजीव की टीम में शामिल हो गए, और कांग्रेस पार्टी के सत्ता संभालने के बाद वे सोनिया गांधी के सबसे करीबी विश्वासपात्र और उनके पास पहुंचने वाले एकमात्र चैनल बन गए।

उन्हें राहुल गांधी द्वारा अपने कार्यकाल में पार्टी के कोषाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था। पटेल पार्टी लाइन के पार संबंधों को बनाए रखने में यकीन रखते थे।

अहमद पटेल ने 1976 में अपने गृह राज्य गुजरात में भरूच में स्थानीय निकाय चुनाव लड़कर अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत की। वह तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के संसदीय सचिव थे, पटेल सरदार सरोवर परियोजना की निगरानी के लिए नर्मदा प्रबंधन प्राधिकरण की स्थापना में सक्रिय थे।

जवाहरलाल नेहरू के शताब्दी समारोह के पूर्व, पटेल को 1988 में जवाहर भवन ट्रस्ट का सचिव नियुक्त किया गया। राजीव गांधी ने उन्हें नई दिल्ली के रायसीना रोड में जवाहर भवन के निर्माण की निगरानी करने के लिए कहा, ऐसी परियोजना जो एक दशक से अधिक समय से रुका हुआ था। नेहरू के जन्म शताब्दी समारोह के लिए रिकॉर्ड एक साल की अवधि में, उन्होंने सफलतापूर्वक जवाहर भवन का काम पूरा किया।

वह विनम्र होने के साथ-साथ तेज-तर्रार नेता भी थे और 2017 के राज्यसभा चुनावों के दौरान वह कसौटी पर खरे उतरे, जब उन्होंने अमित शाह के सभी प्रयासों के बावजूद भाजपा उम्मीदवार को हराया था।

हाल ही में कांग्रेस के उथल-पुथल के दौरान, वह सीडब्ल्यूसी में सोनिया गांधी के पीछे चट्टान की तरह खड़े रहे और यहां तक कि उन्होंने सोनिया गांधी को पत्र लिखने के लिए अपने दोस्तों की आलोचना भी की।

पटेल को पत्रकारों का मित्र माना जाता था। वह देर रात पत्रकारों को बुलाते थे। लेकिन कभी भी सीधे तौर पर कोई बयान नहीं देते थे। उनके द्वारा दिए गए जवाब के अनुसार, उन्हें जज करना होता था।

आदर्श सोसाइटी घोटाले में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण का नाम सामने आने के बाद जब महाराष्ट्र में बदलाव हुआ था, तब वह पत्रकारों को बयान देने वाले एकमात्र व्यक्ति थे। और उनका तगड़ा जवाब था, पृथ्वी, लेकिन मुझे मत उद्धृत करो।

पत्रकार भी उन्हें उतना ही याद करेंगे। लेकिन कांग्रेस और पार्टी आलाकमान के लिए नुकसान बहुत बड़ा और कठिन है, खासकर ऐसे समय में जब पार्टी अच्छा प्रदर्शन नहीं करने के कारण दबाव में है।

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