कांग्रेस पार्टी झारखंड में अपने विधायकों को एकजुट रखने की कवायद में संजीदगी के साथ जुटी है। इसी क्रम में 8 फरवरी को नई दिल्ली में राहुल गांधी के साथ राज्य के सभी कांग्रेस विधायकों, सांसदों और पार्टी की राज्य इकाई के आला नेताओं की पंचायत बैठेगी।

इस दौरान राज्य में संगठन के कल-पुर्जे दुरुस्त करने से लेकर झारखंड में चल रही साझा सरकार में पार्टी की भागीदारी और भूमिका तक पर मंथन होगा।

कांग्रेस ने पिछले चार साल से झारखंड में पार्टी का संगठन देखने की जिम्मेदारी आरपीएन सिंह को दे रखी थी। उन्होंने बीते 25 जनवरी को कांग्रेस की कश्ती छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया तो कांग्रेस चिंतित हो उठी कि कहीं इससे झारखंड में पार्टी के किले में सेंध न लग जाये। दरअसल, झारखंड कांग्रेस के कई विधायक आरपीएन सिंह के सीधे प्रभाव में रहे हैं। इनमें कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें पिछले चुनाव में आरपीएन ने ही टिकट दिलाया था। सो, कांग्रेस ने तत्काल अलर्ट कॉल लिया और पार्टी महासिचव अविनाश पांडेय को झारखंड का नया प्रभारी बनाकर विधायकों और पार्टी नेताओं को एकजुट रखने के मिशन पर लगा दिया। अविनाश पांडेय पिछले हफ्ते झारखंड आये और उन्होंने तीन दिनों तक यहां रहकर विधायकों, सांसदों, पार्टी नेताओं के मन-मिजाज की थाह ली। झारखंड में कांग्रेसियों के अपने-अपने दर्द रहे हैं। कोई वर्षों की तपस्या के बाद भी पार्टी संगठन में तरजीह न मिलने से परेशान रहा है, तो किसी को राज्य सरकार में शामिल मंत्रियों से शिकवा रहा है। कोई राज्य में चल रही साझा सरकार में अहमियत चाहता है तो किसी को सरकार का कोई निर्णय रास नहीं आ रहा। यह तो तकरीबन हर कांग्रेसी की शिकायत रही कि आरपीएन सिंह के रहते उन्हें कभी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक सीधे पहुंचने की इजाजत नहीं दी गयी। झारखंड के कांग्रेसियों के तमाम दुख-दर्द सुनने के बाद प्रभारी अविनाश पांडेय ने दिल्ली लौटकर राहुल गांधी को पूरी रिपोर्ट सौंपी और अब राहुल गांधी पहली बार खुद राज्य के सभी विधायकों, सांसदों और पार्टी के नेताओं से मिलेंगे।

कांग्रेस नेतृत्व ने यह बात भी समझ ली है कि राज्य में संगठन के कल-पुर्जे ढीले हैं तो इसके पीछे की वजह यह है कि नेताओं के बीच समन्वय की कमी है। इसी गरज से पांच दिन पहले राज्य में पार्टी ने 17 नेताओं की एक समन्वय समिति भी बना दी है। झारखंड दौरे के दौरान पार्टी के नये प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडेय ने स्वीकार किया था कि राज्य सरकार और कांग्रेस के बीच भी समन्वय में कहीं न कहीं कमी रही है। जाहिर है, दिल्ली में बैठने वाली पंचायत में इस मुद्दे पर भी बात होगी। देखने वाली बात यह होगी कि दिल्ली की पंचायत में मसले किस हद तक सुलझते हैं और वहां से लौटने के बाद पार्टी के विधायक, सांसद और नेता कितना एकजुट रह पाते हैं।

–आईएएनएस

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