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विरोधियों को तो मक्कार बताने का रिवाज़ है लेकिन शुभचिन्तकों के बारे में क्या कहेंगे नरेन्द्र मोदी!

ब्लॉग- मुकेश कुमार सिंह

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने तमाम भाषणों की बदौलत ख़ुद को ऐसे अप्रतिम आसन पर बैठा लिया है कि अब वो ज़बरदस्त आलोचना की केन्द्र बन गये हैं. पठानकोट आतंकी हमले के बाद मोदी, बीजेपी और उनके संघ परिवार को इस बात का अहसास ज़रूर हो रहा होगा. लीपापोती के लिए बातें चाहे जो की जाएं लेकिन कहीं न कहीं मोदी को अपने बड़बोलेपन के लिए पश्चाताप भी हो रहा होगा. शायद अब उन्हें समझ में आया होगा कि सार्वजनिक जीवन में लंतरानियां से जितना फ़ायदा होता है, उससे ज़्यादा नुक़सान होने की आशंका रहती है. वीर रस से ओत-प्रोत मोदी के पुराने भाषण इस क़दर सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं, जिसकी कभी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी.

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में विदेश मंत्री रहे यशवन्त सिन्हा आज भी बीजेपी में हैं. उनका बेटा जयन्त सिन्हा, मोदी सरकार में वित्त राज्यमंत्री है. लेकिन पठानकोट आतंकी हमले ने सिन्हा को इस क़दर झकझोर दिया कि उन्होंने मोदी सरकार की विदेश नीति की जमकर ख़बर ली. यशवन्त सिन्हा ने दो टूक कहा कि ‘पाकिस्तान से बातचीत नहीं होनी चाहिए. वर्ना जैसे सरकार मुम्बई हमले को भूल गयी, वैसा ही पठानकोट के साथ होगा.’ सिन्हा की आलोचना को ‘विरोधियों की मक्कारी’ के रूप में नहीं देखा जा सकता. वो ‘मोदी भक्त’ भले न हों लेकिन ‘राष्ट्रद्रोही’ नहीं हो सकते. ये भी नहीं कह सकते कि विरोधी कांग्रेस की इशारों पर सिन्हा मक्कारी कर रहे हैं या फिर वो क्या जानें कि विदेश नीति या पाकिस्तान नीति क्या होती है!

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इसीलिए सिन्हा का ये बयान बहुत बड़ा है कि ‘आतंकवाद पर सरकार की पॉलिसी बदली है. इसकी वजह क्या है? यह मैं नहीं जानता. वाजपेयी सरकार में मैं न सिर्फ़ विदेश मंत्री था, बल्कि विदेश मामलों में बीजेपी का प्रवक्ता भी था. हमने पाकिस्तान से साफ़ कहा था कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ चल सकते. 2004 में पाकिस्तान ने इस पर रज़ामन्दी भी दी थी. लेकिन वो हमेशा ज़ुबानी हामी भरता है. क़ाग़जों पर कभी सहमति नहीं जताता. वो कहता था कि ये आतंकवादी ‘नॉन स्टेट ऐक्टर्स’ हैं. हम क्या कर सकते हैं? लेकिन अगर हाफ़िज़ सईद वहां से आग उगल रहा है तो पाकिस्तान ज़िम्मेदार कैसे नहीं है?

भारत को यह बात समझनी चाहिए कि पाकिस्तान बातचीत की बातें सिर्फ़ इसलिए करता है कि ताकि उसे अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर इज़्ज़त मिलती रहे.’ यशवन्त सिन्हा ने मोदी के विदेश दौरों में सुषमा की ग़ैरमौजूदगी पर भी चुटकी ली. उन्होंने कहा, ‘ऐसी कोई विदेशी मीटिंग नहीं होती थी, जिसमें अटलजी मुझसे नहीं कहते थे कि आप मेरे साथ चलिए. लेकिन सुषमा तो विदेश मंत्री से ज़्यादा ओवरसीज इंडियंस की मंत्री नज़र आती हैं. सुषमा से जुड़ी जो भी ख़बरें सामने आती हैं, उसमें सिर्फ़ प्रवासी भारतीयों का हित होता है. विदेशी नीति पर उनका बयान कम ही होता है.’

सिन्हा की तरह शिवसेना को भी राष्ट्रद्रोही या हिन्दुत्व विरोधी तो नहीं कहा जा सकता. वो एनडीए का घटक दल भी है. इसीलिए ‘सामना’ में लिखी शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की बातों को भी शुभचिन्तकों की आलोचना ही मानना पड़ेगा. उद्धव लिखते हैं कि ‘विपत्ति के समय सरकार के विरोध में बोलना ठीक नहीं. देश की सुरक्षा का मामला हो सरकार का समर्थन करो. लेकिन सुरक्षा को लेकर क्या सरकार गम्भीर है? सिर्फ़ 6-7 आतंकियों ने हमारे ख़िलाफ़ युद्ध कर दिया. जिस बड़ी फौज़ का ढोल हम बजाते रहते हैं वो पठानकोट में फोड़ दिया गया. सीमा ही नहीं आतंरिक सुरक्षा भी धाराशायी हो गयी.’

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सीधे नरेन्द्र मोदी को आड़े हाथ लेते हुए उद्धव ने लिखा कि ‘अब दुनिया की तरफ़ नहीं बल्कि अपने देश पर ध्यान देने का वक़्त है. आतंकी घुसे तो दुनिया मदद के लिए नहीं दौड़ी. मोदी जब प्रधानमंत्री नहीं थे तब उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, बन्दूक की गोली की गूंज में वार्ता कैसे हो सकती है? मोदी का उस समय किया गया सवाल उचित था. हमें वही मोदी चाहिए. आज भी बन्दूक और तोप की आवाज़ से देश के कान पक गये हैं.’

इसमें कोई शक़ नहीं कि मोदी सरकार भी पाकिस्तान के झांसे में आ गयी. 1999 में नवाज़ शरीफ़ से दोस्ती निभाने के लिए बस लेकर लाहौर गये और बदले में मिला कारगिल युद्ध. उसी साल जसवन्त सिंह, आतंकवादियों को छोड़ने कन्धार गये थे. 2001 में संसद पर हमले के बाद वाजपेयी ने ‘आर-पार की लड़ाई’ का वादा किया था. थोड़े समय बाद वो परवेज़ मुशर्रफ़ से दोस्ती का हाथ मिला रहे थे. मनमोहन सरकार की पाकिस्तान नीति पर हमला बोलते हुए प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेन्द्र मोदी से पूछा गया था कि ‘यदि मुम्बई हमले के वक़्त आप इन्चार्ज़ होते तो क्या करते?’ मोदी का जबाव था, ‘जो मैंने गुजरात में किया वो करके दिखाता, मुझे देर नहीं लगती. मैं आज भी कहता हूं, पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देना चाहिए, ये लव लेटर लिखना बन्द कर देना चाहिए. प्रणव मुखर्जी (तत्कालीन रक्षा मंत्री) रोज़ एक चिट्ठी भेज रहे हैं. और वो सवाल भेज रहे हैं, ये जवाब देते फ़िरते हैं. ग़ुनाह वो करें और जवाब भारत सरकार दे रही है.’

मोदी से अगला सवाल था, ‘लेकिन इंटरनैशनल प्रेशर है, उसका भी तो ख्याल रखना पड़ेगा भारत सरकार को.’ इस पर मोदी का जबाव था, ‘इंटरनैशनल प्रेशर पैदा करने की ताक़त आज हिन्दुस्तान में है. 100 करोड़ का देश है. पूरी दुनिया पर प्रेशर आज हम पैदा कर सकते हैं जी. मैं तो हैरान हूं जी, पाकिस्तान हमको मारकर चला गया, पाकिस्तान ने हम पर हमला बोल दिया मुम्बई में और हमारे मंत्री जी अमेरिका गये और रोने लगे. ओबामा, ओबामा, पाकिस्तान हमको मारकर चला गया, बचाओ, बचाओ. ये कोई तरीक़ा होता है क्या? पड़ोसी मारकर चला जाए और अमेरिका जाते हो, अरे पाकिस्तान जाओ ना.’ फिर पूरक प्रश्न था, ‘क्या तरीका होता है?’ मोदी का जबाव था, ‘पाकिस्तान जिस भाषा में समझे, समझाना चाहिए.’

Indian soldiers guard at the Indian air force base in Pathankot, India, Tuesday, Jan.5, 2016. Indian forces have killed the last of the six militants who attacked the air force base near the Pakistan border over the weekend, the defense minister said Tuesday, though soldiers were still searching the base as a precaution. (AP Photo/Channi Anand)

मोदी की आज चाहे जो लाचारी हो, लेकिन देश उनका ये ओजपूर्ण भाषण कभी भूल नहीं सकता. पठानकोट जैसे हमले देश पर पहले भी होते रहे हैं. इनका किसी पार्टी विशेष की सरकार के सत्ता में होने से कोई नाता नहीं है. कोई ये दावा नहीं कर सकता कि भविष्य में इनकी पुनरावृत्ति नहीं होगी. इसीलिए दूरदर्शी नेता वही कहलाएगा जो आज बोलने से पहले इस बात की परवाह करे कि आगे क्या उसके बयान का क्या हश्र हो सकता है! मोदी राज में ऐसी चूक अन्य महारथियों ने भी ख़ूब की है. सबसे पहले तो मोदी के शपथ-ग्रहण में नवाज़ शरीफ़ को न्यौता देकर अपनी पीठ ख़ुद ठोकी जाती है. मोदी का ऐसा गुणगान किया जाता है, जो ऐतिहासिक था. फिर सीमा पर गोली-बारी होती है तो कहा जाता है कि हम ‘मुंह-तोड़ जवाब’ दे रहे हैं. यही बोली लगातार दोहरायी जाती है.

इसके बाद शान्ति बहाली के लिए बातचीत के जिस रास्ते को तैयार किया जाता है, उस पर पहले से तमाम बारूदी सुरंगी बिछी होती हैं. कुछ ही महीने पहले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा था कि जब तक मुम्बई हमलों का सरगना ज़की-उर-रहमान लखवी जेल से बाहर रहेगा, तब तक बातचीत नहीं हो सकती. दिसम्बर 2014 में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने पाकिस्तान को ‘कड़ी कार्रवाई’ की चेतावनी दी थी. इसके बाद पर्रिकर ने जनवरी 2015 में भी चेतावनी दी कि इस्लामाबाद ‘कोई सबक नहीं सीखने को तैयार नहीं है.’ इसी तरह, जब सीमा पर धुआंधार गोलीबारी चल रही थी, तब ऊफा में सचिव स्तरीय बातचीत का समझौता हो जाता है. फिर हुर्रियत से बात नहीं की जाए, इसे लेकर बातचीत नहीं हो पाती.

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थोड़े ही समय बाद अमेरिका में नवाज़ शरीफ़ मुस्कुराकर मिलते हैं तो नरेन्द्र मोदी का दिल पिघल जाता है. आनन-फ़ानन में बैंकाक में गुपचुप बातचीत का ख़ाक़ा तैयार हो जाता है. उसके बाद ‘बुलेट ट्रेन की रफ़्तार से’ विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी इस्लामाबाद का दौरा कर आती हैं. इतने बड़े-बड़े नेता न जाने ये कैसे भूल जाते हैं कि पाकिस्तानियों का तो डीएनए ही ‘मुंह में राम बग़ल में छुरी’ का रहा है. सांप क्या दुनिया को बताता फ़िरता है कि उसके मुंह में ज़हर भरा पड़ा है, जो पाकिस्तानी बताएंगे! लेकिन मोदी जी को इतिहास रचने की आदत और इतनी ज़ल्दबाज़ी है कि सारी दुनिया को चमत्कृत करके हुए वो लाहौर जा पहुंचे. पता नहीं उन्होंने किस भाषा में बातें कीं कि उधर से न सिर्फ़ भारत में ‘पठानकोट’ आया बल्कि अफ़ग़ानिस्तान के मज़ार-ए-शरीफ़ में भारतीय दूतावास पर भी फ़िदाईन दस्तों को ‘अमन का पैगम्बर’ बनाकर भेजा गया.

पठानकोट की वजह से भी सरकार में बैठे बयान बहादुरों के हौसलों पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा है. केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने आज ही कहा है कि ‘हम पाकिस्तान से दोस्ती बनाना चाहते हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम कमज़ोर हैं. अगर पाकिस्तान आतंक की मदद से भारत में इस तरह की घटनाओं को अंज़ाम देता है तो हम ईंट का जवाब पत्थर से देंगे.’ पाकिस्तान के भी कान पक गये होंगे, भारतीय नेताओं से इस तरह के बयान सुनते-सुनते! इसीलिए जब ज़मीनी हक़ीक़त ऐसी तो विरोधियों को ‘राष्ट्रद्रोही’ बताना ही तो राष्ट्रधर्म क्यों नहीं होगा! पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कार्रवाई तो जब होगी, तब होगी. लेकिन सरकार को विरोधियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की तैयारी फ़ौरन करनी चाहिए.

ज़रा इनकी ज़ुर्रत तो देखिए! जनता दल यूनाइटेड के प्रवक्ता नीरज कुमार ने कह दिया कि ‘देश को 56 इंच के सीने वाला नहीं, बल्कि छह इंच के दिमाग वाला प्रधानमंत्री चाहिए. लेकिन मोदी तो विदेश नीति के ‘आइटम बॉय’ बन चुके हैं.’ इसी तरह, कांग्रेस के प्रवक्ता आनन्द शर्मा भी क्या ये पूछकर लक्ष्मण-रेखा नहीं लांघ रहे कि ‘ऐसा कौन सा आश्वासन मिला था जिसके बाद मोदी अचानक लाहौर चले गये?’ वैसे अगले ही पल शर्मा ये कहकर नरम पड़ जाते हैं कि ‘मौज़ूदा हालात में देश की आवाज़ एक होनी चाहिए. कांग्रेस, पाकिस्तान के साथ बातचीत की पक्षधर है. लेकिन देश को नरम या कमज़ोर नहीं पड़ना चाहिए.’ बहरहाल, कांग्रेस और जेडीयू जैसे विरोधियों को तो मक्कार बताया जा सकता है. लेकिन यशवन्त सिन्हा और उद्धव ठाकरे जैसे शुभचिन्तकों के बारे में नरेन्द्र मोदी क्या कहना चाहेंगे?

ब्लॉग

लौंगी भुइंया से दशरथ मांझी बनने की पूरी कहानी

लौंगी भुइंया के साथ के लोग शायद अब उनके साथ न हों पर आने वाली उस गाँव की पीढ़ी “लौंगी भुइंया” का हमेशा शुक्रगुज़ार रहेगी।

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Longi Bhuiyan

अभी हाल ही में महामारी के दौरान आप सभी को पता लगा… की लोग शहर छोड़ अपने-अपने गाँव लौट रहे है। और उनमें जो मजदूर थे वो ज़्यादातर बिहार से ताल्लुक रखते थे। ख़ैर ये तो बात थी उनके लौटने की।उनके अपने गाँव छोड़ शहर जाने की कहानी भी बहुत लम्बी है …पर उसके बारे में बात फिर कभी।

फिलहाल उन्हीं लम्बी कहानियों में से एक कहानी हैं, बिहार के “गया” ज़िले की राजधानी पटना से 200 किमी दूर बांकेबाज़ार प्रखंड की कहानी हैं।

यहाँ पर रहने वाले लोगों की ज़िन्दगी खेती पर ही निर्भर हैं और खेती निर्भर है पानी पर… यानी सिंचाई पर। और यहीं से शुरू होती है यहाँ पर रहने वाले लोगों के संघर्ष की कहानी।

यहाँ के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। मगर धान और गेहूं की खेती के लिए जो पानी उन्हें चाहिए था उस पानी और वहाँ रहने वालों के बीच जो सबसे बड़ा रोड़ा था वो था एक “पहाड़” ।

और यहीं से शुरू होती है देश के दूसरे दशरथ मांझी लौंगी भुइंया की कहानी।

पानी की किल्लत की वजह से वहां से लोगों का पलायन शुरू हुआ, और पलायन का असर उनके घर तक आ पहुंचा।

यहाँ तक की उनके खुद के बेटों ने भी वो गाँव छोड़ दिया। फिर एक दिन हुआ यूँ की लौंगी भुइंया उसी पहाड़ पर बकरी चरा रहे थे की अचानक उनको ख्याल आया की अगर ये पहाड़ तोड़ दिया जाए तो पलायन रुक सकता है।

उस दिन उस ख्याल ने उन्हें ढंग से सोने नहीं दिया। उनकी पत्नी ने भी उनसे कहा की…. ये तुमसे नहीं हो पायेगा । पर लौंगी भुइंया को अपनी ज़िद्द के आगे कुछ समझ नहीं आया।
फिर क्या था…. फावड़ा उठाया और चल दिया पहाड़ तोड़ने।

30 साल अकेले फावड़े और दूसरे औज़ारों से उन्होंने आज 3 किमी लम्बी नहर खोद डाली और पानी गाँव तक पहुंचा दिया। इस साल पहली बार उनके गाँव तक बारिश का पानी पहुंचा और इसी वजह से आसपास के तीन गाँव के किसानों को भी इसका लाभ मिल रहा हैं। लोगों ने इस बार धान की फसल भी उगाई है। पर अफ़सोस की अब तक गाँव के कई लोग दूसरे शहरों में पलायन कर चुके हैं।

लौंगी भुइंया के साथ के लोग शायद अब उनके साथ न हों पर आने वाली उस गाँव की पीढ़ी “लौंगी भुइंया” का हमेशा शुक्रगुज़ार रहेगी।

लौंगी भुइंया कहते हैं “हम एक बार मन बना लेते हैं तो पीछे नहीं हटते। अपने काम से जब फुर्सत मिलता हम नहर काटने में लग जाते।

हमारी पत्नी कहती थी की तुमसे नहीं हो पायेगा…. लेकिन मुझे लगता था की हो जायेगा।

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ब्लॉग

कांग्रेस की बीमारियां उन्हें क्यों सता रहीं जिन्होंने इसे वोट दिया ही नहीं?

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Sonia Gandhi and Rahul

मध्यम वर्गीय, शिक्षित, खाते-पीते लोगों और ख़ासकर सवर्णों के बीच कांग्रेस की चिर परिचित बीमारियां अरसे से आपसी चर्चा का मुद्दा बनती रही हैं। लेकिन मज़े की बात तो ये है कि ऐसा अनायास नहीं है। बल्कि बाक़ायदा, सुविचारित रणनीति के तहत ऐसा करवाया जा रहा है। इसे संघ के ‘डैमेज़ कंट्रोल एक्सरसाइज़’ की तरह देखा जा सकता है। इसकी कई वजहें साफ़ दिख रही हैं। संघ को स्पष्ट ‘फ़ीडबैक’ मिल रहा है कि मोदी सरकार की लोकप्रियता में पलीता लगा हुआ है। कोरोना को दैवीय प्रकोप यानी ‘एक्ट ऑफ़ गॉड’ बताने का खेल जनता को हज़म नहीं हो रहा।

औंधी पड़ी अर्थव्यवस्था ने उन करोड़ों लोगों की आँखें भी खोल दी हैं जो ख़ुद को भक्त कहे जाने पर गर्व महसूस करते थे। अब लोगों को अच्छी तरह समझ में आने लगा है कि मोदी सरकार और इसके रणनीतिकार देश को आर्थिक दलदल से बाहर नहीं निकाल सकते। इनके पास ऐसी दृष्टि ही नहीं है। क़ाबिलियत ही नहीं है। ये जितना नुकसान कर चुके हैं, उसकी भरपाई कभी नहीं कर पाएँगे। बोलचाल की भाषा में इसे ही कहते हैं, ‘इनसे ना हो पाएगा!’

दूसरी तरफ, राजनीति में दिलचस्पी रखने वाला हर शख़्स जानता है कि कांग्रेस बीमार है। कई सालों से बीमार है। बीमारी को गम्भीर भी बताया जाता है। हालांकि, कांग्रेसियों को पता है कि उनकी पार्टी में क्या-क्या बीमारियां हैं और वो कितनी गम्भीर हैं? वो बीमारियों के इलाज से भी वाक़िफ़ हैं और अच्छी तरह जानते भी हैं कि इलाज कब और कैसे किया जाना है? इलाज कितना कामयाब रहेगा, इसे लेकर भी वो कोई ख़ुशफ़हमी नहीं पालना चाहते।

कांग्रेस की इन सारी बातों में कोई ख़बर नहीं है। जबकि ख़बर के अन्दर की ख़बर तो ये है कि कांग्रेस की बीमारियों को लेकर, उसके परिवारवाद और वंशवाद को लेकर, तमाम योजनाओं और भवन-मार्ग वग़ैरह के नाम नेहरू-गाँधी परिवार के लोगों के नाम पर आधारित क्यों है, इन बातों को लेकर सबसे ज़्यादा परेशानी उन लोगों को सता रही है जिन्होंने 2019 और 2014 में कांग्रेस को वोट नहीं दिया था। इस परेशानी की असली वजह है मोदी सरकार का कामकाज और इसका प्रदर्शन। क्योंकि अब मध्यम वर्ग की आँखें खुलने लगी हैं। उसे ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे’ का रोज़ाना अहसास हो रहा है। इसीलिए उसे भरमाने के लिए संघियों के दुष्प्रचार वाले सिस्टम ने भी अपने घोड़े खोल दिये हैं।

दरअसल, मध्यम वर्ग बेहद मायूस है। इतना कि उसे अब मौनी मनमोहन सिंह के दिनों की याद बहुत ज़्यादा सताने लगी है। इसे सोनिया-राहुल भी अब पहले जितने ‘घटिया और पतित’ नहीं लग रहे। मोदी जी के भाषण अब इसे भरमा नहीं पा रहे, क्योंकि इनकी बातों, नये-नये मंत्रों तथा जुमलों से उनका मोहभंग होने लगा है। इसने कोरोना काल के 21 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की सच्चाई को क़रीब दे देख लिया है। इसकी समझ में आ गया है कि चीन को लेकर प्रधानमंत्री ने कैसे देश को गुमराह किया।

मध्यम वर्ग को तो 2016 की नोटबन्दी की लम्बी लाइनों से लेकर अब तक के तमाम अनुभवों की एक-एक बात याद आ रही है, क्योंकि तब से अब तक आर्थिक मोर्चों पर इसके हाथ लगातार सिर्फ़ बुरी ख़बरें ही आयी हैं। राम मन्दिर, 370 और तीन तलाक़ जैसे फ़ैसलों से इसे मिली ख़ुशी अब काफ़ूर हो चुकी है। कोरोना में इसने सरकारी दावों और विकास के स्तर की हक़ीक़त को भी बहुत क़रीब से देख लिया है।

छंटनी, बेरोज़गारी और गिरती आमदनी का आलम हर घर में मौजूद है। नयी नौकरियों का कहीं कोई अता-पता नहीं है। यहां तक कि जिन युवाओं को किसी-किसी नौकरी के लिए चुन लिया गया था, उनकी ज्वाइनिंग भी टल चुकी है। आर्थिक आँकड़ों ने कम शिक्षित लोगों को भी ज्ञानवान बना दिया है। ग़रीब तो बुरी तरह से टूटे हुए हैं। सरकारें जो कह और कर रही हैं, उससे उन्हें ढांढस नहीं मिल रहा।

पेट्रोल-डीज़ल के रोज़ाना उछल रहे दामों को लेकर भी जनता में बेहद गुस्सा है। इसने सबका जीना और दुश्वार बना रखा है। जनता को अब विपक्ष वाली उस बीजेपी की बहुत याद सता रही है जो सड़कों पर उतरकर तरह-तरह की ड्रॉमेबाज़ी के ज़रिये मनमोहन सरकार के नाम में दम करके रखती थी। विपक्ष वाली बीजेपी बहुत संगठित थी। उसके पीछे संघ की ताक़त थी। जबकि विपक्ष वाली कांग्रेस ख़ुद ही बहुत लुंज-पुंज है। कई बीमारियों से ग्रस्त है। अपनी सेहत को सुधारने के लिए जो किया जाना चाहिए, उसे भी करती नज़र नहीं आ रही।

मध्यम वर्ग को लगता है कि कांग्रेस वैसे संघर्ष करती नज़र क्यों नहीं आ रही, जैसे विपक्ष वाली बीजेपी किया करती थी? ये सहज प्रश्न घर-घर की चर्चा में स्थान पा रहा है। बात यहां आकर ख़त्म होती है कि राहुल-प्रियंका वग़ैरह से कुछ नहीं हो पाएगा। संघ इसी माहौल को भुनाना चाहता है। इसी मंत्र को फैलाना चाहता है कि कांग्रेस को जनता याद चाहे जितना करे, लेकिन पसन्द बिल्कुल न करे। राजनीति का ये स्वाभाविक व्यवहार भी है। इसीलिए, मौजूदा हालात से मायूस लोग जब भी विकल्प की बातें करते हैं, तो उन्हें ‘टीना फैक्टर’ यानी There is no alternative (TINA) की याद दिलायी जाती है।

मायूस मध्यम वर्ग को बताया जाता है कि कांग्रेस तो ठीक है, लेकिन इसका नेता कौन है, इसका पता ही नहीं है। राहुल गांधी का तो इतना चरित्र हनन किया जा चुका है कि उन्हें लोग विकल्प मान ही नहीं पाते। हालांकि, इसके लिए वो ख़ुद भी कोई कम कसूरवार नहीं हैं। लेकिन एक हक़ीक़त और भी है कि कांग्रेस में इन्दिरा गांधी के बाद जनता की नब्ज़ को पकड़कर सड़क पर संघर्ष करने वाला दूसरा बड़ा नेता नहीं हुआ। राजीव और सोनिया ने कांग्रेस को उबारने के लिए जैसे काम किए, कमोबेश वैसे ही आज भी हो रहा है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि आज जनता और ख़ासकर मध्यम वर्ग की अपेक्षाएं काफ़ी बदल चुकी हैं।

‘अपेक्षाओं के इस बदलाव’ को पैदा करने में संघ के नये-पुराने दुष्प्रचार तंत्र ने कमाल का प्रदर्शन किया है। वर्ना, विरोधी तो हमेशा ही चरित्र हनन और लांछन का सहारा लेते ही रहे हैं। सभी पार्टियाँ यही करती हैं। क्योंकि ये राजनीति का अहिंसक हथियार है। इसके बावजूद अभी संघ की बेचैनी थोड़ी ज़्यादा है। बिहार के चुनाव जो सामने हैं। वहाँ भी नीतीश से टीना फैक्टर को जोड़ने का ही खेल चल रहा है। जनमानस की ख़ुशी या नाराज़गी को फैलने नहीं दिया जा रहा, क्योंकि मेनस्ट्रीम मीडिया मर चुका है। जनता अब सच्चाई को जानकर अपनी राय नहीं बना रही, बल्कि उसे व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी के कंटेंट से ही ज्ञानालोकित किया जा रहा है।

कांग्रेस भी जानती है कि अगर अपनी बीमारियों से उबर भी गयी तो भी बीजेपी को खुले अखाड़े में अपने बूते चित नहीं कर पाएगी। संघ की अफ़ीम ने बीजेपी को अपराजेय बना दिया है। लेकिन संघ अच्छी तरह जानता है कि जब जनता का गुस्सा फूटेगा तो वो ये देखकर वोट नहीं करेगी कि मोदी का विकल्प कौन है? बल्कि ये सोचकर वोट डालेगी कि ‘कोई भी आये, लेकिन मोदी तो नहीं चाहिए!’

ये वही मनोदशा है, जिसने 2014 में कांग्रेस की मिट्टी-पलीद की थी और इतिहास में पहले बार ग़ैर-कांग्रेसी पूर्ण बहुमत वाली सरकार के सत्ता में आने का रास्ता खुला था। जब जनमानस में ये राय बन गयी थी कि अबकी कांग्रेस को वोट नहीं देना है। इसीलिए कांग्रेस मुक्त होने के कगार पर जा पहुंची। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री समेत संघ के रणनीतिकारों को जनता के मनोविज्ञान के इसी पहलू का ख़ौफ़ सता रहा है।

मुमकिन है कि अगले कैबिनेट विस्तार में वित्त मंत्रालय की ज़िम्मेदारी किसी और को थमाकर निर्मला सीतारमन को बलि का बकरा बना दिया जाए। राजनीति में ऐसे नुस्ख़ों को आसान उपायों की तरह देखा जाता है। इसे पार्टी और संघ ऐसे पेश करेंगे कि मोदी जी तो अद्भुत हैं ही, वित्त मंत्री ही नाक़ाबिल थीं, इसलिए उन्हें बदल दिया गया। अब देखना सब ठीक हो जाएगा। राजनीति ऐसे ही नुस्ख़ों का खेल है। यही वजह है कि संघ को कांग्रेस की बीमारी में भी अपने लिए नुस्ख़ा ही नज़र आ रहा है। इसमें ग़लत भी कुछ नहीं है।

उधर, कांग्रेस का सीधा सा मंत्र है कि वो सत्ता में लौटगी या नहीं, ये चुनौती उसकी नहीं बल्कि जनता की है। लिहाज़ा, जान झोंकने से क्या फ़ायदा! इसीलिए कांग्रेस को आप कभी सत्ता में वापसी के लिए वैसे जान झोंकता हुआ नहीं देखेंगे जैसा संघ-बीजेपी कुशलता से किया करती हैं। कांग्रेस आपको कभी संघ की तरह पूरी ताक़त से चुनाव लड़ती हुई भी नहीं नज़र आएगी।

इसके क्षेत्रीय नेता जैसे शरद पवार, ममता बनर्जी, जगन मोहन रेड्डी और चन्द्र शेखर राव भले ही ऐसा करते दिखें, लेकिन शीर्ष नेतृत्व सड़क पर उतरकर पसीना नहीं बहाने वाला। इसे आसानी से समझने के लिए ग़ालिब के एक शेर में ज़रा छेड़-छाड़ करके देखें, तो एक लाइन में सब समझ में आ जाएगा कि ‘हमको उनसे (वफ़ा) संघर्ष की है उम्मीद, जो नहीं जानते (वफ़ा) संघर्ष क्या है!’

Mukesh Kumar Singh मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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ओपिनियन

संविधान बचाने से ज़्यादा ज़रूरी है इसके आन्दोलनकारियों को बचाना

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Students and activists take part in a protest against India's new citizenship law in Bangalore on December 17, 2019 , AFP

सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद प्राचा के हवाले से शाहीन बाग़ वाले संविधान बचाओ आन्दोलन को जल्द बहाल करने की सुगबुगाहट है। इसी तर्ज़ पर क्या सोशल-डिस्टेसिंग का जोख़िम उठाकर 30 अगस्त को मुहर्रम का जुलूस निकालने की इजाज़त माँगने, देने या नहीं देने को लेकर कहीं तनाव के हालात तो नहीं बन जाएँगे? ऐसे दौर में जब रोज़ाना करीब 65 हज़ार कोरोना पॉज़िटिव के मामले सामने रहे हों, जब स्कूल-कॉलेज निलम्बित हों और रेल-सेवा असामान्य हो, जब मैट्रो-सेवा शान्त हो, होटल-रेस्टोरेंट बन्द हों, जब मॉस्क अनिवार्य हो, तब क्या ऐसी बातें होना ठीक है कि जल्द ही ‘शाहीन बाग़’ की बहाली होगी? संविधान बचाओ आन्दोलन के अगले दौर का वक़्त क्या अभी आने से फ़ायदा होगा? क्या सरकारें इसे होने देंगी? कहीं ये पुलिसिया सख़्ती को ‘आ बैल मुझे मार’ का सन्देश तो नहीं देगी?

दरअसल, भारत पर अभी कोरोना-मारीचिका हावी है। मारीचिका एक आभास है। इसमें रेगिस्तान में दुर्लभ पानी दिखने का भाव है। ये आभास और भाव तो असली होते हैं, लेकिन पानी असलियत नहीं होता। मारीचिका आध्यात्मिक ढोंग नहीं, बल्कि भौतिक भ्रम है। ये वैसा ही दृष्टि-दोष है, जैसे दूर जाती रेल की समानान्तर पटरियाँ परस्पर नज़दीक आती हुई प्रतीत होती हैं। बिल्कुल ऐसे ही दृष्टि-दोष की काली छाया अभी ‘कोरोना-अनलॉक’ को लेकर देश पर मँडरा रही है। इसीलिए कोरोना को पुरी में रथयात्रा बर्दाश्त है, अयोध्या का शिला-पूजन बर्दाश्त है, भोपाल, इम्फाल और जयपुर में सरकारों का लुढ़कना-ढनकना बर्दाश्त है, लेकिन किसी भी किस्म के अनलॉक को ईद की सामूहिक नमाज़, मुहर्रम के जुलूस और संविधान बचाने वाले सीएए-एनआरसी आन्दोलन की सुगबुगाहट बर्दाश्त नहीं है।

कोरोना-काल के दौरान उत्तर भारत के मुसलमानों में अज़ीबो-ग़रीब हूक उठती रही हैं। उन्हें यहाँ-वहाँ से अपनी बिरादरी के साथ हो रहे भेदभावों की ख़ूब ख़बरें भी मिलीं। देश देख चुका है कि तब्लीगी जमात के नाम पर उठी नफ़रत की लपटों ने ठेले पर फल-सब्ज़ी बेचने वालों की मज़हबी की पहचान को कैसी प्रमुखता दिलायी। गाय के नाम पर लिंचिंग का नयी घटना को भी कोरोना नहीं टाल सका। दिल्ली के दंगों की पुलिसिया जाँच से कई बदरंग पन्ने भी फिज़ाँ में उड़ते देखे गये। ‘370’ की पहली पुण्यतिथि भी निपट गयी। लॉकडाउन की तकलीफ़ों और बेरोज़गारी के बावजूद जो ग़रीब जीवित रहे, उन्हें भी बाढ़ और अस्पतालों की दुर्दशा ने जमकर डुबोया। लेकिन अमीरों के आईपीएल को न सिर्फ़ डूबने से बचाया गया, बल्कि उसे ‘आत्मनिर्भर’ बनने के लिए ‘वोकल फॉर लोकल’ वाले गुरु-मंत्र से भी विशेष छूट दी गयी। आसार हैं कि स्वतंत्रता-दिवस की भाषणबाज़ी भी कतई फ़ीकी नहीं रहेगी।

लेकिन क्या उपरोक्त तमाम मिसालों को देखते हुए मुस्लिम समाज बराबरी की उम्मीद पाल सकता है? ये सही है कि आन्दोलनकारियों पर कभी दमनकारी सत्ता के बर्बर रवैये का ख़ौफ़ नहीं होता। लेकिन आन्दोलन की कमान थामने वालों को अपनी ताक़त और कमज़ोरियों का भी सही अहसास ज़रूर होना चाहिए। कोरोना से पहले चले आन्दोलन के तज़ुर्बों से सीखना भी बहुत ज़रूरी है। मसलन, उस आन्दोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि ये थी कि वो मुसलमानों की नागरिकता के सवाल से शुरू होकर संविधान बचाने की ओर घूम गयी। इसे शिक्षित और सेक्यूलर मुसलमानों से ज़्यादा इसी श्रेणी के हिन्दुओं और इनमें से भी ख़ासतौर पर युवाओं और महिलाओं का अद्भुत समर्थन मिला। सिर्फ़ इसी इकलौते पहलू से भगवा हुक़्मरानों के माथे पर बल पड़े।

फरवरी में दिल्ली विधानसभा के चुनाव हुए। दिसम्बर-जनवरी में हुक़्मरानों को अपनी ज़मीनी सच्चाई दिखने लगी थी। मेनस्ट्रीम मीडिया तो मुट्ठी में था लेकिन सोशल मीडिया ने नाक में दम कर रखा था। यही देख हुक़्मरानों को डर सताने लगा कि सेक्यूलर हिन्दुओं और मुसलमानों की एकजुटता यदि उसी रफ़्तार से बढ़ती रहती तो उनके लिए ‘मुश्किल-काल’ बहुत दूर नहीं रहता। इसी एकजुटता में सेंधमारी के लिए दिल्ली में दंगों की पटकथा लिखी गयी। नफ़रत और उन्माद फैलाने वाली भाषणबाज़ी के धारावाहिक चले। दंगों में पुलिस ने वही किया जो उसे हुक़्म मिला, ताकि ‘सबसे ज़्यादा अनुशासित और आज्ञाकारी संस्था’ वाला उसका सिंहासन अक्षुण्य रहे।

अब तो सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं में भगवा-समाजवाद आ चुका है। सभी ने पुलिसिया-संस्कारों को ही अपना आराध्य बना लिया है। विधान सिर्फ़ इतना है कि हुक़्म की तामील होगी, हर हाल में होगी, अवश्य होगी। बाक़ी संविधान की बातें जिन्हें करना है वो नक्कारख़ाने में तूती बजाते रहें। नये भारत में सबको इस आकाशवाणी पर यक़ीन करना होगा कि “पूर्वी लद्दाख में न तो कोई हमारी सीमा में घुस आया है, न ही कोई घुसा हुआ है और ना ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्ज़े में है।”

इसीलिए मुस्लिम समाज चाहे तो गाँठ बाँध लें कि उसकी किसी भी किस्म की एकता से हुक़्मरानों की सेहत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला। क्योंकि हुक़्मरानों को कपड़ों से पहचानने में महारत हासिल है। लिहाज़ा, शाहीन बाग़ की बहाली के लिए बेताब लोगों को पहचान के बजाय परिचय को तरजीह देना सीखना होगा। उन्हें समझना होगा कि पहचान तो दूर से ही हो जाती है जबकि परिचय के लिए नज़दीक या रूबरू आना पड़ता है। चन्दन-टीका, पगड़ी-टोपी, दाढ़ी-मूँछ, घूँघट-बुर्का, धोती-पजामा – ये सभी पहचान हैं, जबकि सेक्यूलर-कम्यूनल, कट्टर-उदार, जातिवादी-प्रगतिशील आदि परिचय हैं। इसी परिचय के साथ उन्हें जिन हिन्दुओं, युवाओं और महिलाओं का ज़ोरदार समर्थन मिला था, उसी ताक़त से वो मंज़िल पा सकते हैं।

अभी कोरोना के दौरान जिस स्तर का और जैसा ‘अनलॉक’ सामने आया है, उसमें संविधान बचाने की पैरोकारी करने वाले हिन्दुओं, युवाओं और महिलाओं की एकजुटता में मुश्किल होगी। इसीलिए अभी जोख़िम लेने का वक़्त नहीं है। थोड़ा और इन्तज़ार कर लेने में कोई हर्ज़ नहीं है। 15 अगस्त की बातें यदि सरककर 2 अक्टूबर हो जाए तो कोई आफ़त नहीं आ जाएगी। अबकी बार शाहीन बाग़ के आन्दोलनकारियों को संविधान के अलावा अर्थव्यवस्था की ऐतिहासिक दुर्दशा को भी अपने रडार में लेना होगा। इन्हें ये भी समझना होगा कि सरकार किसी भी कीमत पर अपने क़दम वापस नहीं खींचेंगी। वो ज़्यादा से ज़्यादा अपने क़दमों को आगे बढ़ाने का इरादा तब तक टालती रहेगी, जब तक कि उसका पतन न हो जाए। लेकिन इस दौरान आन्दोलनकारियों को हिंसा और हिरासत के उकसावों से भी ख़ुद को बचाना होगा। बीते एक साल में कश्मीर ने भारत, सेक्यूलरों और संविधान की दुहाई देने वालों को अनेक सबक दिये हैं। बहुसंख्यक समाज ने ताली-थाली और दीया-दिवाली के कई नज़ारे देश को दिखाये हैं। इसीलिए आन्दोलनकारियों को समझना होगा कि जो विरोधियों की ताक़त का सही अन्दाज़ा नहीं लगाते, वो विरोधियों का शिकार बनने के लिए अभिशप्त होते हैं। विरोधी जहाँ बात ख़त्म करना चाहते हैं, आन्दोलनकारियों को वहीं से बात शुरू करने की रणनीति अपनानी होगी। वर्ना, उनका सरकार का जाल में फँसना तय है।

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