एनएसजी की सदस्यता भारत के लिए साबित होगी 'हांथी के दांत' | WeForNewsHindi | Latest, News Update, -Top Story
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एनएसजी की सदस्यता भारत के लिए साबित होगी ‘हांथी के दांत’

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अगर हम बात करें मोदी के इन 5 देशों के तूफानी दौरों के उद्देश्य की.. तो जाहिर है कि पीएम का मुख्य उद्देश्य मात्र एनएसजी की सदस्यता हासिल करना ही है। लेकिन सोचने की बात तो ये है कि एनएसजी में भारत की सदस्यता के लिए पीएम की ये जद्दोजहद काफी हैं, क्या पीएम मोदी अपनी इन कोशिशों में कामयाब होंगे….जाहिर है कि चीन के अलावा भी कई ऐसे देश हैं जो कि भारत की एनएसजी सदस्यता के मुद्दे पर सहमत नहीं हैं। वहीं दूसरी तरफ ध्यान देने की बात ये है कि भारत लगातार अपने डिप्लोमेट्स को एनएसजी सदस्य देशों के दौरों पर भेज रहा है।

एनएसजी मेंबरशिप को लेकर भारत की इस जल्दबाजी से भारत का उतावलापन जाहिर होता है। और इस उतावलेपन की वजह भी बिल्कुल साफ है। आपको बता दें कि बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति हैं लेकिन कुछ महीनों के बाद उनका कार्यकाल खत्म हो रहा है। और अमेरिका में चल रहे राष्ट्रपति चुनाव के बाद अमेरिका में किसकी सरकार होगी और तब अमेरिका के भारत के साथ कैसे रिश्ते होंगे ये तो भविष्य में ही पता चलेगा। लेकिन अगर हम पिछले दिनों की बात करें तो अमरीका ने भारत को एनएसजी में सदस्यता दिलाने में पूरे सहयोग का वादा किया था।

modi and obama

लेकिन ये जाहिर है कि एनएसजी में कुल 48 देश सदस्य हैं और इसमें भारत की सदस्यता के लिए इन सब देशों की सहमति भी जरूरी है। आपको बता दें कि पिछली बार जब जॉर्ज बुश ने चीन से भारत को अपवाद के रूप में एनएसजी मेंबरशिप देने की बात कही तो भी एनपीटी की शर्तों पर पेंच फंसा था….सवाल ये था कि भारत एनपीटी की शर्तों पर तैयार होगा या नहीं? लेकिन भारत ने अभी तक एनपीटी पर दस्तखत नहीं किए हैं। अब एनपीटी के सदस्यों के सामने ये मुश्किल खड़ी होती है कि एनएसजी की सदस्यता भारत को इस समय क्यों दी जाए।

modi and nawaz shareef

जाहिर है कि भारत को सदस्यता पाने के लिए और भी मशक्कत करने की जरूरत होगी। जहां तक चीन के विरोध का सवाल है तो चीन का कहना सिर्फ इतना है कि किसी भी नए सदस्य को समूह में जोड़ने के लिए एक वाजिब नियम बने। चीन का ये भी कहना है कि पाकिस्तान को भी एनएसजी का सदस्य बनाया जाना चाहिए। लेकिन सोचने की बात तो ये है कि जब भारत ने एनएसजी मेंबरशिप के लिए आवेदन किया है तो उसी समय पाकिस्तान को भी ये कदम उठाने की सूझी। ऐसे में अमेरिका के सामने कश्मकश की स्थिति पैदा हो गई है कि आखिर वो भारत का समर्थन और इसके उलट पाकिस्तान की एनएसजी सदस्यता का विरोध कैसे करे। और अगर किसी हालात में अमेरिका ऐसा करता भी है तो उसे चीन के सवालों के तीर को झेलना पड़ेगा।

epa04747488 Indian Prime Minister Narendra Modi (L) and Chinese President Xi Jinping wave to journalists before holding a meeting, in Xian, Shaanxi province, China, 14 May 2015. Modi arrived in China early 14 May where he visited the Terracotta Warriors exhibition in President Xi Jinping's home province, ahead of summit talks expected to focus on economic ties between the two Asian giants. China is investing heavily in a 'New Silk Road' project to ease access to markets in Central Asia and Europe. Modi was due to meet Xi later 14 May, with formal talks set for 15 May in Beijing. EPA/KIM KYUNG-HOON/POOL

दरअसल चीन केवल भारत की एनएसजी सदस्यता को चुनौती देने के लिए पाकिस्तान की सिफारिश कर एक पांसा फेक रहा है। हालांकि पाकिस्तान खुद ये जानता है कि एनएसजी में उसका आवेदन स्वीकार नहीं होगा। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि ये दोनों देश आख़िर इस वक़्त एनएसजी की सदस्यता क्यों चाहते हैं? अगर हम इस पूरे मामले पर नजर डालें तो ऐसी कोई बड़ी वजह नज़र नहीं आती। आपको बता दें कि भारत को अपने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए पहले से ही यूरेनियम हासिल करने की सहूलियत मिली हुई है।

दरअसल भारत का एनएसजी सदस्य बनने का उद्देश्य केवल इतना है कि वो सदस्य देशों के साथ मिलकर परमाणु मुद्दों पर नियम बना सके। तो इससे साफ होता है कि भारत ये जद्दोजहद केवल रुतबे के लिए कर रहा है ना कि किसी जरूरत के लिए। क्योंकि भारत को साल 2008 में ही परमाणु पदार्थों के आयात के लिए सुविधा मिली हुई है। तो भारत को एनएसजी की सदस्यता मिलने पर वैश्विक स्तर पर भारत की हैसियत बढ़ जाएगी। गौरतलब है कि एनएसजी की स्थापना साल 1975 में हुई थी। और इसकी वजह भी खुद भारत ही था।

nuclear test in india

आपको बता दें कि साल 1974 में भारत के परमाणु परीक्षण के विरोध में ही इस समूह की स्थापना हुई थी। यानी जिस समूह की शुरुआत ही भारत का विरोध करने के लिए हुई थी, और अगर अब भारत उसका सदस्य बन जाता है तो ये उसके लिए एक बड़ी सफलता होगी। साथ ही भारत की ये मांग है कि उसे एक परमाणु हथियार संपन्न देश माना जाए। लेकिन इसका अधिकार एनपीटी को ही है, जो कि ये बताती है कि कौन सा देश परमाणु हथियार संपन्न है और कौन नहीं। वहीं भारत ने एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं और वो उसके तहत ग़ैर परमाणु हथियार संपन्न देश की श्रेणी में आता है। ऐसे में अगर भारत को एनपीटी पर हस्ताक्षर करना हो तो उसे एक ग़ैर परमाणु हथियार संपन्न देश के रूप में हस्ताक्षर करना होगा जिसके पक्ष में भारत नहीं है।

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि एनपीटी क्या भारत को परमाणु हथियार संपन्न देश का श्रेणी में डालेगा। तो ऐसे में भारत के सामने मुश्किलों का पहाड़ खड़ा होना वाज़िब है क्योंकि एनपीटी पर हस्ताक्षर करने वाले सभी देश इसका विरोध कर सकते हैं। और ऐसे में अगर भारत एनएसजी मेंबर बनता भी है तो नफ़ा केवल इतना है कि भारत वैश्विक स्तर अपनी हैसियत का ढ़ोल पीट सकेगा।

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वहीं दूसरी तरफ स्विट्ज़रलैंड की तरफ भारत को मिल रहे समर्थन के पीछे कहीं ना कहीं उसका यानी स्विट्जरलैंड का स्वार्थ छुपा हुआ है। क्यों कि स्विट्जरलैंड भी सिक्योरिटी काउंसिल में जल्द से जल्द अस्थाई सदस्यता पाना चाहता है और भारत की भी यही मंशा है। इसीलिए दोनों एक-दूसरे का भरपूर समर्थन कर रहे हैं। लेकिन दूसरे सदस्य देशों का भारत के साथ ऐसा कोई मतलब नहीं छुपा हुआ है। तो कुल मिलाकर इन सभी बातों का निष्कर्ष ये निकलता है कि भारत की इन तमाम कोशिशों के बाद अगर भारत को एनएसजी सदस्यता मिलती है तो ये उपलब्धि भारत के लिए केवल और केवल ‘हांथी का दांत’ साबित होगी।

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कांग्रेस की बीमारियां उन्हें क्यों सता रहीं जिन्होंने इसे वोट दिया ही नहीं?

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Sonia Gandhi and Rahul

मध्यम वर्गीय, शिक्षित, खाते-पीते लोगों और ख़ासकर सवर्णों के बीच कांग्रेस की चिर परिचित बीमारियां अरसे से आपसी चर्चा का मुद्दा बनती रही हैं। लेकिन मज़े की बात तो ये है कि ऐसा अनायास नहीं है। बल्कि बाक़ायदा, सुविचारित रणनीति के तहत ऐसा करवाया जा रहा है। इसे संघ के ‘डैमेज़ कंट्रोल एक्सरसाइज़’ की तरह देखा जा सकता है। इसकी कई वजहें साफ़ दिख रही हैं। संघ को स्पष्ट ‘फ़ीडबैक’ मिल रहा है कि मोदी सरकार की लोकप्रियता में पलीता लगा हुआ है। कोरोना को दैवीय प्रकोप यानी ‘एक्ट ऑफ़ गॉड’ बताने का खेल जनता को हज़म नहीं हो रहा।

औंधी पड़ी अर्थव्यवस्था ने उन करोड़ों लोगों की आँखें भी खोल दी हैं जो ख़ुद को भक्त कहे जाने पर गर्व महसूस करते थे। अब लोगों को अच्छी तरह समझ में आने लगा है कि मोदी सरकार और इसके रणनीतिकार देश को आर्थिक दलदल से बाहर नहीं निकाल सकते। इनके पास ऐसी दृष्टि ही नहीं है। क़ाबिलियत ही नहीं है। ये जितना नुकसान कर चुके हैं, उसकी भरपाई कभी नहीं कर पाएँगे। बोलचाल की भाषा में इसे ही कहते हैं, ‘इनसे ना हो पाएगा!’

दूसरी तरफ, राजनीति में दिलचस्पी रखने वाला हर शख़्स जानता है कि कांग्रेस बीमार है। कई सालों से बीमार है। बीमारी को गम्भीर भी बताया जाता है। हालांकि, कांग्रेसियों को पता है कि उनकी पार्टी में क्या-क्या बीमारियां हैं और वो कितनी गम्भीर हैं? वो बीमारियों के इलाज से भी वाक़िफ़ हैं और अच्छी तरह जानते भी हैं कि इलाज कब और कैसे किया जाना है? इलाज कितना कामयाब रहेगा, इसे लेकर भी वो कोई ख़ुशफ़हमी नहीं पालना चाहते।

कांग्रेस की इन सारी बातों में कोई ख़बर नहीं है। जबकि ख़बर के अन्दर की ख़बर तो ये है कि कांग्रेस की बीमारियों को लेकर, उसके परिवारवाद और वंशवाद को लेकर, तमाम योजनाओं और भवन-मार्ग वग़ैरह के नाम नेहरू-गाँधी परिवार के लोगों के नाम पर आधारित क्यों है, इन बातों को लेकर सबसे ज़्यादा परेशानी उन लोगों को सता रही है जिन्होंने 2019 और 2014 में कांग्रेस को वोट नहीं दिया था। इस परेशानी की असली वजह है मोदी सरकार का कामकाज और इसका प्रदर्शन। क्योंकि अब मध्यम वर्ग की आँखें खुलने लगी हैं। उसे ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे’ का रोज़ाना अहसास हो रहा है। इसीलिए उसे भरमाने के लिए संघियों के दुष्प्रचार वाले सिस्टम ने भी अपने घोड़े खोल दिये हैं।

दरअसल, मध्यम वर्ग बेहद मायूस है। इतना कि उसे अब मौनी मनमोहन सिंह के दिनों की याद बहुत ज़्यादा सताने लगी है। इसे सोनिया-राहुल भी अब पहले जितने ‘घटिया और पतित’ नहीं लग रहे। मोदी जी के भाषण अब इसे भरमा नहीं पा रहे, क्योंकि इनकी बातों, नये-नये मंत्रों तथा जुमलों से उनका मोहभंग होने लगा है। इसने कोरोना काल के 21 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की सच्चाई को क़रीब दे देख लिया है। इसकी समझ में आ गया है कि चीन को लेकर प्रधानमंत्री ने कैसे देश को गुमराह किया।

मध्यम वर्ग को तो 2016 की नोटबन्दी की लम्बी लाइनों से लेकर अब तक के तमाम अनुभवों की एक-एक बात याद आ रही है, क्योंकि तब से अब तक आर्थिक मोर्चों पर इसके हाथ लगातार सिर्फ़ बुरी ख़बरें ही आयी हैं। राम मन्दिर, 370 और तीन तलाक़ जैसे फ़ैसलों से इसे मिली ख़ुशी अब काफ़ूर हो चुकी है। कोरोना में इसने सरकारी दावों और विकास के स्तर की हक़ीक़त को भी बहुत क़रीब से देख लिया है।

छंटनी, बेरोज़गारी और गिरती आमदनी का आलम हर घर में मौजूद है। नयी नौकरियों का कहीं कोई अता-पता नहीं है। यहां तक कि जिन युवाओं को किसी-किसी नौकरी के लिए चुन लिया गया था, उनकी ज्वाइनिंग भी टल चुकी है। आर्थिक आँकड़ों ने कम शिक्षित लोगों को भी ज्ञानवान बना दिया है। ग़रीब तो बुरी तरह से टूटे हुए हैं। सरकारें जो कह और कर रही हैं, उससे उन्हें ढांढस नहीं मिल रहा।

पेट्रोल-डीज़ल के रोज़ाना उछल रहे दामों को लेकर भी जनता में बेहद गुस्सा है। इसने सबका जीना और दुश्वार बना रखा है। जनता को अब विपक्ष वाली उस बीजेपी की बहुत याद सता रही है जो सड़कों पर उतरकर तरह-तरह की ड्रॉमेबाज़ी के ज़रिये मनमोहन सरकार के नाम में दम करके रखती थी। विपक्ष वाली बीजेपी बहुत संगठित थी। उसके पीछे संघ की ताक़त थी। जबकि विपक्ष वाली कांग्रेस ख़ुद ही बहुत लुंज-पुंज है। कई बीमारियों से ग्रस्त है। अपनी सेहत को सुधारने के लिए जो किया जाना चाहिए, उसे भी करती नज़र नहीं आ रही।

मध्यम वर्ग को लगता है कि कांग्रेस वैसे संघर्ष करती नज़र क्यों नहीं आ रही, जैसे विपक्ष वाली बीजेपी किया करती थी? ये सहज प्रश्न घर-घर की चर्चा में स्थान पा रहा है। बात यहां आकर ख़त्म होती है कि राहुल-प्रियंका वग़ैरह से कुछ नहीं हो पाएगा। संघ इसी माहौल को भुनाना चाहता है। इसी मंत्र को फैलाना चाहता है कि कांग्रेस को जनता याद चाहे जितना करे, लेकिन पसन्द बिल्कुल न करे। राजनीति का ये स्वाभाविक व्यवहार भी है। इसीलिए, मौजूदा हालात से मायूस लोग जब भी विकल्प की बातें करते हैं, तो उन्हें ‘टीना फैक्टर’ यानी There is no alternative (TINA) की याद दिलायी जाती है।

मायूस मध्यम वर्ग को बताया जाता है कि कांग्रेस तो ठीक है, लेकिन इसका नेता कौन है, इसका पता ही नहीं है। राहुल गांधी का तो इतना चरित्र हनन किया जा चुका है कि उन्हें लोग विकल्प मान ही नहीं पाते। हालांकि, इसके लिए वो ख़ुद भी कोई कम कसूरवार नहीं हैं। लेकिन एक हक़ीक़त और भी है कि कांग्रेस में इन्दिरा गांधी के बाद जनता की नब्ज़ को पकड़कर सड़क पर संघर्ष करने वाला दूसरा बड़ा नेता नहीं हुआ। राजीव और सोनिया ने कांग्रेस को उबारने के लिए जैसे काम किए, कमोबेश वैसे ही आज भी हो रहा है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि आज जनता और ख़ासकर मध्यम वर्ग की अपेक्षाएं काफ़ी बदल चुकी हैं।

‘अपेक्षाओं के इस बदलाव’ को पैदा करने में संघ के नये-पुराने दुष्प्रचार तंत्र ने कमाल का प्रदर्शन किया है। वर्ना, विरोधी तो हमेशा ही चरित्र हनन और लांछन का सहारा लेते ही रहे हैं। सभी पार्टियाँ यही करती हैं। क्योंकि ये राजनीति का अहिंसक हथियार है। इसके बावजूद अभी संघ की बेचैनी थोड़ी ज़्यादा है। बिहार के चुनाव जो सामने हैं। वहाँ भी नीतीश से टीना फैक्टर को जोड़ने का ही खेल चल रहा है। जनमानस की ख़ुशी या नाराज़गी को फैलने नहीं दिया जा रहा, क्योंकि मेनस्ट्रीम मीडिया मर चुका है। जनता अब सच्चाई को जानकर अपनी राय नहीं बना रही, बल्कि उसे व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी के कंटेंट से ही ज्ञानालोकित किया जा रहा है।

कांग्रेस भी जानती है कि अगर अपनी बीमारियों से उबर भी गयी तो भी बीजेपी को खुले अखाड़े में अपने बूते चित नहीं कर पाएगी। संघ की अफ़ीम ने बीजेपी को अपराजेय बना दिया है। लेकिन संघ अच्छी तरह जानता है कि जब जनता का गुस्सा फूटेगा तो वो ये देखकर वोट नहीं करेगी कि मोदी का विकल्प कौन है? बल्कि ये सोचकर वोट डालेगी कि ‘कोई भी आये, लेकिन मोदी तो नहीं चाहिए!’

ये वही मनोदशा है, जिसने 2014 में कांग्रेस की मिट्टी-पलीद की थी और इतिहास में पहले बार ग़ैर-कांग्रेसी पूर्ण बहुमत वाली सरकार के सत्ता में आने का रास्ता खुला था। जब जनमानस में ये राय बन गयी थी कि अबकी कांग्रेस को वोट नहीं देना है। इसीलिए कांग्रेस मुक्त होने के कगार पर जा पहुंची। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री समेत संघ के रणनीतिकारों को जनता के मनोविज्ञान के इसी पहलू का ख़ौफ़ सता रहा है।

मुमकिन है कि अगले कैबिनेट विस्तार में वित्त मंत्रालय की ज़िम्मेदारी किसी और को थमाकर निर्मला सीतारमन को बलि का बकरा बना दिया जाए। राजनीति में ऐसे नुस्ख़ों को आसान उपायों की तरह देखा जाता है। इसे पार्टी और संघ ऐसे पेश करेंगे कि मोदी जी तो अद्भुत हैं ही, वित्त मंत्री ही नाक़ाबिल थीं, इसलिए उन्हें बदल दिया गया। अब देखना सब ठीक हो जाएगा। राजनीति ऐसे ही नुस्ख़ों का खेल है। यही वजह है कि संघ को कांग्रेस की बीमारी में भी अपने लिए नुस्ख़ा ही नज़र आ रहा है। इसमें ग़लत भी कुछ नहीं है।

उधर, कांग्रेस का सीधा सा मंत्र है कि वो सत्ता में लौटगी या नहीं, ये चुनौती उसकी नहीं बल्कि जनता की है। लिहाज़ा, जान झोंकने से क्या फ़ायदा! इसीलिए कांग्रेस को आप कभी सत्ता में वापसी के लिए वैसे जान झोंकता हुआ नहीं देखेंगे जैसा संघ-बीजेपी कुशलता से किया करती हैं। कांग्रेस आपको कभी संघ की तरह पूरी ताक़त से चुनाव लड़ती हुई भी नहीं नज़र आएगी।

इसके क्षेत्रीय नेता जैसे शरद पवार, ममता बनर्जी, जगन मोहन रेड्डी और चन्द्र शेखर राव भले ही ऐसा करते दिखें, लेकिन शीर्ष नेतृत्व सड़क पर उतरकर पसीना नहीं बहाने वाला। इसे आसानी से समझने के लिए ग़ालिब के एक शेर में ज़रा छेड़-छाड़ करके देखें, तो एक लाइन में सब समझ में आ जाएगा कि ‘हमको उनसे (वफ़ा) संघर्ष की है उम्मीद, जो नहीं जानते (वफ़ा) संघर्ष क्या है!’

Mukesh Kumar Singh मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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ओपिनियन

संविधान बचाने से ज़्यादा ज़रूरी है इसके आन्दोलनकारियों को बचाना

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Students and activists take part in a protest against India's new citizenship law in Bangalore on December 17, 2019 , AFP

सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद प्राचा के हवाले से शाहीन बाग़ वाले संविधान बचाओ आन्दोलन को जल्द बहाल करने की सुगबुगाहट है। इसी तर्ज़ पर क्या सोशल-डिस्टेसिंग का जोख़िम उठाकर 30 अगस्त को मुहर्रम का जुलूस निकालने की इजाज़त माँगने, देने या नहीं देने को लेकर कहीं तनाव के हालात तो नहीं बन जाएँगे? ऐसे दौर में जब रोज़ाना करीब 65 हज़ार कोरोना पॉज़िटिव के मामले सामने रहे हों, जब स्कूल-कॉलेज निलम्बित हों और रेल-सेवा असामान्य हो, जब मैट्रो-सेवा शान्त हो, होटल-रेस्टोरेंट बन्द हों, जब मॉस्क अनिवार्य हो, तब क्या ऐसी बातें होना ठीक है कि जल्द ही ‘शाहीन बाग़’ की बहाली होगी? संविधान बचाओ आन्दोलन के अगले दौर का वक़्त क्या अभी आने से फ़ायदा होगा? क्या सरकारें इसे होने देंगी? कहीं ये पुलिसिया सख़्ती को ‘आ बैल मुझे मार’ का सन्देश तो नहीं देगी?

दरअसल, भारत पर अभी कोरोना-मारीचिका हावी है। मारीचिका एक आभास है। इसमें रेगिस्तान में दुर्लभ पानी दिखने का भाव है। ये आभास और भाव तो असली होते हैं, लेकिन पानी असलियत नहीं होता। मारीचिका आध्यात्मिक ढोंग नहीं, बल्कि भौतिक भ्रम है। ये वैसा ही दृष्टि-दोष है, जैसे दूर जाती रेल की समानान्तर पटरियाँ परस्पर नज़दीक आती हुई प्रतीत होती हैं। बिल्कुल ऐसे ही दृष्टि-दोष की काली छाया अभी ‘कोरोना-अनलॉक’ को लेकर देश पर मँडरा रही है। इसीलिए कोरोना को पुरी में रथयात्रा बर्दाश्त है, अयोध्या का शिला-पूजन बर्दाश्त है, भोपाल, इम्फाल और जयपुर में सरकारों का लुढ़कना-ढनकना बर्दाश्त है, लेकिन किसी भी किस्म के अनलॉक को ईद की सामूहिक नमाज़, मुहर्रम के जुलूस और संविधान बचाने वाले सीएए-एनआरसी आन्दोलन की सुगबुगाहट बर्दाश्त नहीं है।

कोरोना-काल के दौरान उत्तर भारत के मुसलमानों में अज़ीबो-ग़रीब हूक उठती रही हैं। उन्हें यहाँ-वहाँ से अपनी बिरादरी के साथ हो रहे भेदभावों की ख़ूब ख़बरें भी मिलीं। देश देख चुका है कि तब्लीगी जमात के नाम पर उठी नफ़रत की लपटों ने ठेले पर फल-सब्ज़ी बेचने वालों की मज़हबी की पहचान को कैसी प्रमुखता दिलायी। गाय के नाम पर लिंचिंग का नयी घटना को भी कोरोना नहीं टाल सका। दिल्ली के दंगों की पुलिसिया जाँच से कई बदरंग पन्ने भी फिज़ाँ में उड़ते देखे गये। ‘370’ की पहली पुण्यतिथि भी निपट गयी। लॉकडाउन की तकलीफ़ों और बेरोज़गारी के बावजूद जो ग़रीब जीवित रहे, उन्हें भी बाढ़ और अस्पतालों की दुर्दशा ने जमकर डुबोया। लेकिन अमीरों के आईपीएल को न सिर्फ़ डूबने से बचाया गया, बल्कि उसे ‘आत्मनिर्भर’ बनने के लिए ‘वोकल फॉर लोकल’ वाले गुरु-मंत्र से भी विशेष छूट दी गयी। आसार हैं कि स्वतंत्रता-दिवस की भाषणबाज़ी भी कतई फ़ीकी नहीं रहेगी।

लेकिन क्या उपरोक्त तमाम मिसालों को देखते हुए मुस्लिम समाज बराबरी की उम्मीद पाल सकता है? ये सही है कि आन्दोलनकारियों पर कभी दमनकारी सत्ता के बर्बर रवैये का ख़ौफ़ नहीं होता। लेकिन आन्दोलन की कमान थामने वालों को अपनी ताक़त और कमज़ोरियों का भी सही अहसास ज़रूर होना चाहिए। कोरोना से पहले चले आन्दोलन के तज़ुर्बों से सीखना भी बहुत ज़रूरी है। मसलन, उस आन्दोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि ये थी कि वो मुसलमानों की नागरिकता के सवाल से शुरू होकर संविधान बचाने की ओर घूम गयी। इसे शिक्षित और सेक्यूलर मुसलमानों से ज़्यादा इसी श्रेणी के हिन्दुओं और इनमें से भी ख़ासतौर पर युवाओं और महिलाओं का अद्भुत समर्थन मिला। सिर्फ़ इसी इकलौते पहलू से भगवा हुक़्मरानों के माथे पर बल पड़े।

फरवरी में दिल्ली विधानसभा के चुनाव हुए। दिसम्बर-जनवरी में हुक़्मरानों को अपनी ज़मीनी सच्चाई दिखने लगी थी। मेनस्ट्रीम मीडिया तो मुट्ठी में था लेकिन सोशल मीडिया ने नाक में दम कर रखा था। यही देख हुक़्मरानों को डर सताने लगा कि सेक्यूलर हिन्दुओं और मुसलमानों की एकजुटता यदि उसी रफ़्तार से बढ़ती रहती तो उनके लिए ‘मुश्किल-काल’ बहुत दूर नहीं रहता। इसी एकजुटता में सेंधमारी के लिए दिल्ली में दंगों की पटकथा लिखी गयी। नफ़रत और उन्माद फैलाने वाली भाषणबाज़ी के धारावाहिक चले। दंगों में पुलिस ने वही किया जो उसे हुक़्म मिला, ताकि ‘सबसे ज़्यादा अनुशासित और आज्ञाकारी संस्था’ वाला उसका सिंहासन अक्षुण्य रहे।

अब तो सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं में भगवा-समाजवाद आ चुका है। सभी ने पुलिसिया-संस्कारों को ही अपना आराध्य बना लिया है। विधान सिर्फ़ इतना है कि हुक़्म की तामील होगी, हर हाल में होगी, अवश्य होगी। बाक़ी संविधान की बातें जिन्हें करना है वो नक्कारख़ाने में तूती बजाते रहें। नये भारत में सबको इस आकाशवाणी पर यक़ीन करना होगा कि “पूर्वी लद्दाख में न तो कोई हमारी सीमा में घुस आया है, न ही कोई घुसा हुआ है और ना ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्ज़े में है।”

इसीलिए मुस्लिम समाज चाहे तो गाँठ बाँध लें कि उसकी किसी भी किस्म की एकता से हुक़्मरानों की सेहत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला। क्योंकि हुक़्मरानों को कपड़ों से पहचानने में महारत हासिल है। लिहाज़ा, शाहीन बाग़ की बहाली के लिए बेताब लोगों को पहचान के बजाय परिचय को तरजीह देना सीखना होगा। उन्हें समझना होगा कि पहचान तो दूर से ही हो जाती है जबकि परिचय के लिए नज़दीक या रूबरू आना पड़ता है। चन्दन-टीका, पगड़ी-टोपी, दाढ़ी-मूँछ, घूँघट-बुर्का, धोती-पजामा – ये सभी पहचान हैं, जबकि सेक्यूलर-कम्यूनल, कट्टर-उदार, जातिवादी-प्रगतिशील आदि परिचय हैं। इसी परिचय के साथ उन्हें जिन हिन्दुओं, युवाओं और महिलाओं का ज़ोरदार समर्थन मिला था, उसी ताक़त से वो मंज़िल पा सकते हैं।

अभी कोरोना के दौरान जिस स्तर का और जैसा ‘अनलॉक’ सामने आया है, उसमें संविधान बचाने की पैरोकारी करने वाले हिन्दुओं, युवाओं और महिलाओं की एकजुटता में मुश्किल होगी। इसीलिए अभी जोख़िम लेने का वक़्त नहीं है। थोड़ा और इन्तज़ार कर लेने में कोई हर्ज़ नहीं है। 15 अगस्त की बातें यदि सरककर 2 अक्टूबर हो जाए तो कोई आफ़त नहीं आ जाएगी। अबकी बार शाहीन बाग़ के आन्दोलनकारियों को संविधान के अलावा अर्थव्यवस्था की ऐतिहासिक दुर्दशा को भी अपने रडार में लेना होगा। इन्हें ये भी समझना होगा कि सरकार किसी भी कीमत पर अपने क़दम वापस नहीं खींचेंगी। वो ज़्यादा से ज़्यादा अपने क़दमों को आगे बढ़ाने का इरादा तब तक टालती रहेगी, जब तक कि उसका पतन न हो जाए। लेकिन इस दौरान आन्दोलनकारियों को हिंसा और हिरासत के उकसावों से भी ख़ुद को बचाना होगा। बीते एक साल में कश्मीर ने भारत, सेक्यूलरों और संविधान की दुहाई देने वालों को अनेक सबक दिये हैं। बहुसंख्यक समाज ने ताली-थाली और दीया-दिवाली के कई नज़ारे देश को दिखाये हैं। इसीलिए आन्दोलनकारियों को समझना होगा कि जो विरोधियों की ताक़त का सही अन्दाज़ा नहीं लगाते, वो विरोधियों का शिकार बनने के लिए अभिशप्त होते हैं। विरोधी जहाँ बात ख़त्म करना चाहते हैं, आन्दोलनकारियों को वहीं से बात शुरू करने की रणनीति अपनानी होगी। वर्ना, उनका सरकार का जाल में फँसना तय है।

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ओपिनियन

गाय, गधा, ग़ालिब और दिलीप घोष की मज़ेदार जुगलबन्दी

दिलीप घोष ने बीते नवम्बर में रहस्योद्घाटन किया था कि ‘भारतीय नस्ल की गायों में एक खासियत होती है। इनके दूध में सोना मिला होता है और इसी वजह से उनके दूध का रंग सुनहरा होता है। उनके एक नाड़ी होती है जो सूर्य की रोशनी की मदद से सोने का उत्पादन करने में सहायक होती है। इसलिए हमें देसी गायें पालनी चाहिए।

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mamata banerjee dilip ghosh

बात बहुत मज़ेदार है। मज़ेदार बातें करने में बीजेपी के नेताओं का कोई सानी नहीं। फिर यदि बात गाय की हो तो बीजेपी के नेता किसी भी सीमा तक चले जाते हैं। अब ज़रा पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बनने के लिए आतुर बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष के एक और मज़ेदार तथा ताज़ा बयान पर ग़ौर करें कि ‘…गधे कभी भी गाय की अहमियत नहीं समझेंगे। …हमें स्वस्थ रहने के लिए गोमूत्र पीना चाहिए। जो शराब पीते हैं वो कैसे एक गाय की अहमियत को समझेंगे।’ संघियों ने गोमूत्र की अवैज्ञानिक महिमा का बातें तो पहले भी ख़ूब की हैं, लेकिन दिलीप घोष ने अब ‘गधे’ को गाय से जोड़कर गज़ब कर दिया है।

इन्हीं दिलीप घोष ने बीते नवम्बर में रहस्योद्घाटन किया था कि ‘भारतीय नस्ल की गायों में एक खासियत होती है। इनके दूध में गोल्ड मिला होता है और इसी वजह से उनके दूध का रंग सुनहरा होता है। उनके एक नाड़ी होती है, जो सूर्य की रोशनी की मदद से सोने का उत्पादन करने में सहायक होती है। इसलिए हमें ऐसी देसी गायें पालनी चाहिए। अगर हम देसी गाय का दूध पिएंगे तो स्वस्थ रहेंगे और बीमारियों से भी बचाव होगा।’

घोष बाबू के ऐसे बयान सहसा राजस्थान हाईकोर्ट के जज महेश शर्मा की उस बयान की याद ताज़ा कर देते हैं कि ‘मोर ज़िन्दगी भर ब्रह्मचारी रहता है। उसके आँसू चुगकर मोरनी गर्भवती होती है। इसीलिए मोर को राष्ट्रीय पक्षी बनाया गया। मोर पंख को भगवान कृष्ण ने इसलिए सिर में लगाया क्योंकि वह ब्रह्मचारी है। साधु-सन्त भी इसीलिए मोर पंख का इस्तेमाल करते हैं। मन्दिरों में भी इसीलिए मोर पंख लगाया जाता है। ठीक इसी तरह गाय के अन्दर भी इतने गुण हैं कि उसे राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाना चाहिए।’

दिलीप घोष और जस्टिस महेश शर्मा की तरह ही त्रिपुरा के मुख्यमंत्री विप्लव देव भी अपने विचित्र बयानों को लेकर ही पहचाने गये, भले ही इससे उनका ख़ूब उपहास हुआ हो। मैकेनिकल इंज़ीनियर की डिग्रीधारी विप्लव देव बता चुके हैं कि ‘महाभारत के दौरान संजय ने हस्तिनापुर में बैठकर धृतराष्ट्र को बताया था कि कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध में क्या हो रहा है। संजय इतनी दूर रहकर आँख से कैसे देख सकते हैं। सो, इसका मतलब है कि उस समय भी तकनीक, इंटरनेट और सैटेलाइट था।’

इसी तरह, विप्लव देव ने रहस्योद्घाटन किया था कि ‘’जब बतख पानी में तैरते हैं, तो जलाशय में ऑक्सीजन का स्तर अपने आप बढ़ जाता है। इससे ऑक्सीजन रिसाइकिल होता है। पानी में रहने वाली मछलियों को ज़्यादा ऑक्सीजन मिलता है। इस तरह मछलियाँ तेज़ी से बढ़ती हैं और ऑर्गनिक तरीके से मत्स्यपालन को बढ़ावा मिलता है।’ उनके सामाजिक ज्ञान की झलक भी कई बयानों से मिली। जैसे, ‘युवा नौकरी पाने के पीछे नहीं भागें बल्कि पान की दुकान खोंले और गाय पालें।’ या फिर ‘मॉब लिंचिग की वारदातों के पीछे अन्तरराष्ट्रीय षड्यंत्र है।’ या, ‘डायना हेडन इंडियन ब्यूटी नहीं हैं। डायना हेडन की जीत फ़िक्स थी। क्योंकि डायना हेडन भारतीय महिलाओं की सुन्दरता की नुमाइन्दगी नहीं करतीं।’ और ये भी कि ‘मैकेनिकल इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि वाले लोगों को सिविल सेवाओं का चयन नहीं करना चाहिए।’

यदि आप ऐसे सिरफिरे बयानों को लेकर अपना सिर धुनना चाहते हैं तो धुनते रहें, लेकिन बीजेपी के बड़े-बड़े नेताओं को ऐसे ही सियायी बयानों को फ़ायदा मिलता रहा है। याद है न कि 2014 में 35 रुपये लीटर पेट्रोल बेचने का सपना बेचकर बीजेपी ने मनमोहन सरकार का तख़्ता पटल दिया था। यही हाल ‘काला धन’ और ‘अच्छे दिन’ का भी रहा। इसी तरह 50 दिन में नोटबन्दी के कष्टों से उबारने की बात की गयी थी, तो 18 दिन चले महाभारत के युद्ध का वास्ता देकर 21 दिन में कोरोना के सफ़ाया का सब्ज़बाग़ भी दिखाया गया था।

इसी तरह, जब ‘विकास’ लापता हो गया तो ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ से उसे ढूँढ़ निकालने को कहा गया। इसी तर्ज़ पर कहा गया कि “पूर्वी लद्दाख में न तो कोई हमारी सीमा में घुस आया है, न ही कोई घुसा हुआ है और ना ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्ज़े में है।” उधर, रक्षामंत्री भी लद्दाख जाकर भाषण दे आये कि ‘भारत ने कभी किसी देश की एक इंच ज़मीन भी नहीं हथियाई।’ अब किससे पूछें कि गोवा और पांडिचेरी से पुर्तगालियों और फ्रांसीसियों की विदाई की ख़ातिर हो सैनिक कार्रवाई हुई थी, क्या उससे क्या भारत का क्षेत्रफल नहीं बढ़ा था?

ऐसे ही एक से बढ़कर एक मज़ेदार बयानों को देखकर कभी-कभार तो शक़ होता है कि क्या जनता ने ऐसे ही मज़ेदार बयान सुनने के लिए बीजेपी को सत्ता दी है? बहरहाल, दिलीप घोष की मज़ेदार बातों को सुनकर ये कौतूहल क्या लाज़िमी नहीं है कि यदि गाय के दूध में सोना होता है तो दुनिया भर में सोने की खदानों से इसके अयस्क (Ore) का खनन क्यों होता है? क्यों दुनिया भर में धरती को खोदकर इसे क्षत-विक्षत किया जाता है? भारत में भी बीजेपी शासित कर्नाटक के कोलार ज़िले में सोने की खदानें हैं। इन्हें अब तक बन्द क्यों नहीं किया गया? देसी गाय के दूध में यदि सोना है तो सोने का आयात और तस्करी क्यों होती है? गायों को सड़कों पर घूम-घूमकर कूड़ा-कचरा और पॉलीथीन क्यों खाना पड़ता है? गाय को माता बताकर उसे पूजने वालों, गऊदान रूपी सनातनी कर्मकांड का महिमामंडन करने वालों के सत्ता-काल में भी गौवंश के प्रति ऐसा सतत अनर्थ आख़िर क़ायम कैसे है?

ये कैसी विचित्र बात है कि जो शराब पीते हैं वो गाय की अहमियत को नहीं समझ सकते? मुझे कूड़ा-कचरा खाने वाली गायों के मूत्र के सेवन से सख़्त आपत्ति और परहेज़ है। लेकिन मेरी आपत्ति से उन्हें क्या? बाबू मोशाय के जीवन का तो बस एक ही लक्ष्य है कि बंगाल के हिन्दुओं में धार्मिक अन्धविश्वास और भ्रान्तियों को फैलाकर ममता दीदी को सत्ता से बाहर करना और यदि मोदी-शाह की कृपा हो जाए तो सूबे का अगला मुख्यमंत्री बनना। बाक़ी मेरे जैसों को तो उन्होंने अस्वस्थ का सर्टिफ़िकेट भी इसलिए दे दिया है क्योंकि मैं गोमूत्र नहीं पीता। अब यदि उनके बयान से किसी की मानहानि हुई है तो हुआ करे, उनकी बला से। वो तो हर क़ानून और संविधान से ऊपर हैं।

रही बात गधे की विशेषता बताने की तो इसे लेकर मुझे मिर्ज़ा असदउल्ला बेग़ ख़ान उर्फ़ ग़ालिब के चर्चित किस्सों की याद अनायस ही आ गयी। हुआ यूँ कि ग़ालिब को आम बहुत पसन्द थे। इतने कि उन्हें आम के आगे गन्ने की मिठास भी कमतर लगती थी। उन्होंने एक दोस्त से कहा था कि ‘मुझसे पूछो तुम्हें ख़बर क्या है, आम के आगे नेशकर क्या है’। नेशकर यानी गन्ना। आम के प्रति ग़ालिब की चाहत को देखते हुए ही गर्मी के मौसम में उनके दोस्त उन्हें तरह-तरह के आमों की टोकरियाँ भिजवाया करते थे। लेकिन ग़ालिब के एक अज़ीज़ दोस्त हकीम रज़ी उद्दीन ख़ान को आम बिल्कुल पसन्द नहीं थे।

एक दफ़ा ग़ालिब और हकीम रज़ी उद्दीन अपने घर के बरामदे में बैठे थे। आम को लेकर दोनों एक-दूसरे की पसन्द-नापसन्द से बख़ूबी वाक़िफ़ थे। इसके बावजूद, उनकी गुफ़्तगूँ के दौरान, जैसे ही घर के सामने से एक गधा-गाड़ी गुज़री तो इसके गधे ने रास्ते में पड़े आम के छिलके को सूँघा और अपना मुँह हटाकर चलता बना। ये देख हकीम साहब ने अचानक विषयान्तर करते हुए चुहल की कि ‘आप भले ही आम के दीवाने हैं लेकिन देखिए कि एक गधा भी आम नहीं खाता!’ इस पर हाज़िर-जबाब ग़ालिब ने कहा कि ‘जी हाँ, इसमें कोई शक़ नहीं कि गधे आम नहीं खाते!’

अब मैं जनाब दिलीप घोष से कैसे पूछूँ कि भले ही मैं गोमूत्र नहीं पीता कि लेकिन मुझे भी ग़ालिब की तरह आम बहुत पसन्द हैं, लिहाज़ा, मुझे ‘गधा’ माना जाएगा या नहीं? मज़ेदार बात ये भी है कि गोबरपट्टी में गधे को महज एक पशु के नाम की तरह ही नहीं बल्कि मूर्खता की एक उपमा के रूप में भी पेश किया जाता है। अब मैं घोष बाबू को मूर्ख कहकर उनकी हेठी करने की हिमाक़त तो करने से रहा कि अनर्थ से हमेशा डरना चाहिए। बहरहाल, जब ग़ालिब और आम की बात हुई है तो ग़ालिब के आम-प्रेम से जुड़े एक और मशहूर किस्से का ज़िक्र भी लाज़िमी है।

हुआ यूँ कि एक बार ग़ालिब और बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र अपने कुछ साथियों के साथ दिल्ली के लाल क़िला यानी क़िला-ए-मुबारक़ के बाग़-ए-हयात बख़्श में टहल रहे थे। इस बाग़ में कई किस्म के आम के पेड़ थे। लेकिन इसके आम सिर्फ़ बादशाह, शहज़ादों और हरम की औरतों के लिए होते थे। बाग़ के टहल-क़दमी के दौरान ग़ालिब हरेक पेड़ पर झूल रहे आमों को बड़े ध्यान से देख रहे थे। ये देख बादशाह ने उनसे पूछ लिया कि ‘अमां, आप हर आम को इतने ध्यान से क्यों देख रहे हैं?’

जबाब में ग़ालिब ने बेहद संजीदगी से कहा कि ‘मेरे मालिक और मेरे रहनुमा, एक बार किसी शायर ने कहा था कि हर आम पर, उसके खाने वाले का नाम लिखा होता है। मैं अपने दादा, अब्बा और अपना नाम तलाश रहा हूँ।’ बादशाह, ये सुनकर मुस्कुराये। फिर ग़ालिब की हाज़िर जबाबी की दाद देते हुए उन्होंने पुराने दस्तूर को तोड़कर शाम तक मिर्ज़ा के घर बाग़ के आमों की टोकरी भिजवा दी।

आख़िर में, फिर से रुख़ करते हैं दिलीप घोष के गाय-ज्ञान की ओर। ताकि इनका अहम गाय-सिद्धान्त एक जगह मिल सके। गाय तो लेकर दिलीप घोष के दो अन्य बयान भी कोई कम दिलचस्प या हास्यास्पद नहीं है। पहला बयान है कि ‘विदेश से जिन नस्लों की गायें हम लाते हैं, वे गाय नहीं हैं। वे एक तरह के जानवर हैं। ये विदेशी नस्लें गायों की तरह आवाज़ नहीं निकालती हैं। वे हमारी गोमाता नहीं बल्कि हमारी आँटी हैं। अगर हम ऐसी आँटियों की पूजा करेंगे तो देश के लिए अच्छा नहीं होगा।’ और दूसरा बयान है कि ‘कुछ बुद्धिजीवी सड़कों पर गोमाँस खाते हैं, मैं उनसे कहता हूं कि वे कुत्ते का माँस भी खाएँ, जिससे उनका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। उन्हें जिस भी जानवर का माँस खाना हो खाएँ लेकिन सड़कों पर क्यों, अपने घर पर खाएँ?’

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