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लौंगी भुइंया से दशरथ मांझी बनने की पूरी कहानी

लौंगी भुइंया के साथ के लोग शायद अब उनके साथ न हों पर आने वाली उस गाँव की पीढ़ी “लौंगी भुइंया” का हमेशा शुक्रगुज़ार रहेगी।

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Longi Bhuiyan

अभी हाल ही में महामारी के दौरान आप सभी को पता लगा… की लोग शहर छोड़ अपने-अपने गाँव लौट रहे है। और उनमें जो मजदूर थे वो ज़्यादातर बिहार से ताल्लुक रखते थे। ख़ैर ये तो बात थी उनके लौटने की।उनके अपने गाँव छोड़ शहर जाने की कहानी भी बहुत लम्बी है …पर उसके बारे में बात फिर कभी।

फिलहाल उन्हीं लम्बी कहानियों में से एक कहानी हैं, बिहार के “गया” ज़िले की राजधानी पटना से 200 किमी दूर बांकेबाज़ार प्रखंड की कहानी हैं।

यहाँ पर रहने वाले लोगों की ज़िन्दगी खेती पर ही निर्भर हैं और खेती निर्भर है पानी पर… यानी सिंचाई पर। और यहीं से शुरू होती है यहाँ पर रहने वाले लोगों के संघर्ष की कहानी।

यहाँ के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। मगर धान और गेहूं की खेती के लिए जो पानी उन्हें चाहिए था उस पानी और वहाँ रहने वालों के बीच जो सबसे बड़ा रोड़ा था वो था एक “पहाड़” ।

और यहीं से शुरू होती है देश के दूसरे दशरथ मांझी लौंगी भुइंया की कहानी।

पानी की किल्लत की वजह से वहां से लोगों का पलायन शुरू हुआ, और पलायन का असर उनके घर तक आ पहुंचा।

यहाँ तक की उनके खुद के बेटों ने भी वो गाँव छोड़ दिया। फिर एक दिन हुआ यूँ की लौंगी भुइंया उसी पहाड़ पर बकरी चरा रहे थे की अचानक उनको ख्याल आया की अगर ये पहाड़ तोड़ दिया जाए तो पलायन रुक सकता है।

उस दिन उस ख्याल ने उन्हें ढंग से सोने नहीं दिया। उनकी पत्नी ने भी उनसे कहा की…. ये तुमसे नहीं हो पायेगा । पर लौंगी भुइंया को अपनी ज़िद्द के आगे कुछ समझ नहीं आया।
फिर क्या था…. फावड़ा उठाया और चल दिया पहाड़ तोड़ने।

30 साल अकेले फावड़े और दूसरे औज़ारों से उन्होंने आज 3 किमी लम्बी नहर खोद डाली और पानी गाँव तक पहुंचा दिया। इस साल पहली बार उनके गाँव तक बारिश का पानी पहुंचा और इसी वजह से आसपास के तीन गाँव के किसानों को भी इसका लाभ मिल रहा हैं। लोगों ने इस बार धान की फसल भी उगाई है। पर अफ़सोस की अब तक गाँव के कई लोग दूसरे शहरों में पलायन कर चुके हैं।

लौंगी भुइंया के साथ के लोग शायद अब उनके साथ न हों पर आने वाली उस गाँव की पीढ़ी “लौंगी भुइंया” का हमेशा शुक्रगुज़ार रहेगी।

लौंगी भुइंया कहते हैं “हम एक बार मन बना लेते हैं तो पीछे नहीं हटते। अपने काम से जब फुर्सत मिलता हम नहर काटने में लग जाते।

हमारी पत्नी कहती थी की तुमसे नहीं हो पायेगा…. लेकिन मुझे लगता था की हो जायेगा।

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चुनाव

क्या मोदी सरकार पर चुनाव आचार संहिता लागू नहीं है?

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NIRMALA SITHARAMAN

चुनाव आयोग, क्या सरकारी कर्मचारियों को मतदाता नहीं मानता? क्योंकि यदि सरकारी कर्मचारी भी मतदाता हैं तो चुनाव की घोषणा होने या आदर्श चुनाव संहिता के लागू होने बाद इन्हें रिझाने या बहलाने के लिए किसी रियायत या राहत पैकेज़ का एलान नहीं हो सकता। लिहाज़ा, ये सवाल तो है कि अर्थव्यवस्था में माँग बढ़ाने के लिए 12 अक्टूबर को घोषित वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के ‘डिमांड इंफ़्यूज़न’ पैकेज़ को आचार संहिता का उल्लंघन क्यों नहीं माना गया? इसी पैकेज़ में ‘LTC कैश वाउचर’ और ‘स्पेशल फ़ेस्टिवल एडवांस’ स्कीम का शिगूफ़ा छोड़ा गया है।

भले ही राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग से शिकायत नहीं की हो, लेकिन निष्पक्ष चुनाव करवाने का संवैधानिक दायित्व निभाते हुए चुनाव आयोग ने आचार संहिता के उल्लंघन का स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लिया? दलील हो सकती है कि बिहार के 7.26 करोड़ मतदाताओं में से केन्द्र सरकार के कर्मचारियों की संख्या बहुत मामूली है, इसीलिए राष्ट्रीय स्तर की नीति के एलान में आचार संहिता बाधक नहीं मानी गयी। हालाँकि, उल्लंघन यदि है तो है। इसे छोटा-बड़ा बताना बेमानी है। नियमानुसार वित्त मंत्री को चुनाव आयोग की पूर्वानुमति से ही एलान करना चाहिए था। अभी तक चुनाव आयोग या वित्त मंत्रालय ने पूर्वानुमति को लेकर कोई स्पष्टीकरण नहीं है।

वैसे, दिलचस्प ये भी है कि वित्त मंत्री की घोषणा में 28,000 करोड़ रुपये के ‘डिमांड इंफ़्यूज़न’ का जैसा सब्ज़बाग़ दिखाया है, वैसा फ़ायदा अर्थव्यवस्था को कतई नहीं होने वाला। सच तो ये है कि मई में भी घोषणाओं की झड़ी लगाकर वित्तमंत्री ने जिस ढंग से 20-21 लाख करोड़ रुपये वाले ‘आत्मनिर्भर पैकेज़’ का झाँसा देश के आगे परोसा था, उसी तरह अभी केन्द्रीय कर्मचारियों को झुनझुना थमाया गया है। इसे सरकारी लॉलीपॉप, खयाली पुलाव, हवाई क़िला और मुंगेरी लाल के हसीन सपने की तरह भी देख सकते हैं। इसी कड़ी में, भारी आर्थिक दवाब से जूझ रहे राज्यों के लिए पेश 12,000 करोड़ रुपये का ब्याज़-मुक्त पैकेज़ भी महज ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ ही है।

DA काटा सबका, राहत कुछेक को

केन्द्र सरकार के 48.34 लाख कर्मचारी और 65.26 लाख पेंशनर्स हैं। राज्यों के कर्मचारियों और पेंशनधारियों की संख्या इसकी कऱीब डेढ़ गुनी है। कुलमिलाकर, 137 करोड़ की आबादी में से 2 फ़ीसदी लोगों की जीविका सरकारी नौकरियों या पेंशन से चलती है। कोरोना संकट में केन्द्र सरकार ने 23 अप्रैल को अपने सभी कर्मचारियों और पेंशनर्स के महँगाई भत्ते को दो साल के लिए ख़त्म कर दिया। तब बताया गया कि इससे केन्द्र सरकार के खर्च में सालाना 21,000 करोड़ रुपये की कटौती हुई। लेकिन अब ‘ब्याज़-मुक्त कर्ज़’ का ‘तोहफ़ा’ सिर्फ़ कर्मचारियों के लिए है। वित्त मंत्री ने पेंशनर्स का पत्ता काट दिया। हालाँकि, लॉकडाउन से पहले 13 मार्च को कैबिनेट ने दोनों तबकों के लिए महँगाई भत्ते को 17 से बढ़ाकर 21 प्रतिशत करने की मंज़ूरी दी थी।

कोरोना से आयी मन्दी से सबकी आमदनी प्रभावित हुई। पक्की तनख़्वाह और सुरक्षित सरकारी नौकरियाँ करने वालों की भी आमदनी घटी। इनके महँगाई भत्ते का छमाही इज़ाफ़ा अब जनवरी 2022 तक तो नहीं बढ़ने वाला। आगे का पता नहीं। बहरहाल, वित्त मंत्रालय के अर्थशास्त्री अफ़सरों ने ‘एलटीसी कैश वाउचर’ और ‘स्पेशल फ़ेस्टिवल एडवांस’ स्कीम की जैसी रूपरेखा बनायी, उसमें पेंशनर्स की अनदेखी लाज़िमी थी, क्योंकि सिर्फ़ नियमित सरकारी कर्मचारी ही लीव ट्रैवल कंसेशन (LTC) और फ़ेस्टिवल एडवांस के हक़दार होते हैं। पेशनर्स इसे नहीं पा सकते।

झुनझुना है LTC कैश स्कीम

लीव ट्रैवल कंसेशन (LTC) की कैश वाउचर स्कीम से पर्दा हटाते हुए वित्तमंत्री ने बताया कि ‘सरकार को लगता है कि कोराना प्रतिबन्धों के दौरान सरकारी कर्मचारियों ने काफ़ी रुपये बचाये हैं’। लिहाज़ा, खयाली पुलाव पकाया गया कि यदि 31 मार्च 2021 तक सरकारी कर्मचारी अपनी बचत को खर्च कर दें तो अर्थव्यवस्था को संजीवनी मिल जाएगी। आँकड़ा तैयार हुआ कि LTC कैश वाउचर स्कीम की बदौलत 7,575 करोड़ रुपये सरकारी ख़ज़ाने से निकलकर कर्मचारियों के पास पहुँच सकते हैं। इसमें केन्द्रीय कर्मचारियों का हिस्सा 5,675 करोड़ रुपये का होगा तो सरकारी बैंकों तथा केन्द्रीय उद्यमों (पीएसयू) के कर्मचारियों की हिस्सेदारी 1,900 करोड़ रुपये की होगी।

वित्त मंत्री ने इसी 7,575 करोड़ रुपये को आयकर-मुक्त बनाने की ‘सरकारी दरियादिली’ दिखायी और बताया कि राज्य सरकारों और निजी क्षेत्र के कर्मचारी भी गाइडलाइंस का पालन करके ‘LTC कैश वाउचर स्कीम’ से निहाल हो सकते हैं। वित्तमंत्री का सरकारी दावा है कि इस ‘क्रान्तिकारी’ स्कीम की बदौलत अर्थव्यवस्था में क़रीब 19,000 करोड़ रुपये की माँग पैदा हो जाएगी। ये भी हवाई क़िला ही है कि भारी वित्तीय तंगी झेल रहीं राज्य सरकारें भले ही अपने कर्मचारियों को नियमित वेतन नहीं दे पा रही हों, लेकिन निर्मला सीतारमन के ‘डिमांड इंफ़्यूज़न’ पैकेज़ की क़ामयाबी के लिए वो अपने कर्मचारियों को ‘टैक्स-फ़्री एलटीसी कैश’ का भुगतान ज़रूर करेंगी। ताकि अर्थव्यवस्था में 9,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त माँग पैदा हो जाए और चुटकी बजाकर 28,000 करोड़ रुपये के पैकेज़ का सब्ज़बाग़ तैयार हो जाए।

गाइडलाइंस का लॉलीपॉप

नियमित केन्द्रीय कर्मचारी चार साल में एक-एक बार ‘एलटीसी’ और ‘होम टाउन’ जाने-आने का किराया पाते हैं। इसका मौजूदा ‘ब्लॉक इयर’ 2018 से 2021 है। एलटीसी के तहत देश में कहीं भी सपरिवार पर्यटन पर खर्च हुए वाहन किराये की भरपाई होती है तो ‘होम टाउन’ में पैतृक स्थान आने-जाने का किराया सरकार देती है। इनमें अफ़सरों का तबक़ा जहाँ हवाई किराया पाता है वहीं बाक़ी कर्मचारी राजधानी एक्सप्रेस के एसी-3 का किराया सरकार से ले सकते हैं। कर्मचारी चाहें तो ‘एलटीसी’ को ‘होम टाउन’ में बदल भी सकते हैं।

सरकार देख रही थी कि कोरोना प्रभाव में उसके एलटीसी या होम-टाउन वाले लाभार्थी ठंडे हैं। इन्हें लुभाने के लिए ऐसी ‘पर्यटन-विहीन एलटीसी’ की नीति बनी जिसमें कर्मचारी ऐसे सामान की खरीदारी का बिल करके अपनी एलटीसी भुना सकते हैं जिस पर 12 फ़ीसदी या अधिक जीएसटी लागू हो। ताकि ऐसा न हो कि कर्मचारी फ़र्ज़ी बिल लगाकर सरकार से तो रकम ले लें लेकिन उसे बाज़ार में खर्च नहीं करें। वर्ना, ‘डिमांड इंफ़्यूज़न’ पर पानी फिर जाता। दूसरी ओर, निजी क्षेत्र के कर्मचारी साल भर में एक महीने का मूल-वेतन (बेसिक पे) एलटीसी के रूप में पाते हैं। लेकिन ये उनके वेतन या ‘कॉस्ट टू कम्पनी’ का हिस्सा होता है। अलबत्ता, इसकी रकम हर दूसरे साल ही टैक्स-फ़्री होती है।

तीन लगाओ एक पाओ की शर्त

एलटीसी कैश वाउचर स्कीम का लाभ उठाने की अगली शर्त तो बड़ा छलावा है, क्योंकि इसमें कर्मचारियों को एलटीसी की रकम पर टैक्स बचाने के लिए इसके मुक़ाबले तीन गुना ज़्यादा दाम का सामान ख़रीदना होगा। यानी, यदि कर्मचारी 50 हज़ार रुपये के एलटीसी भत्ते का हक़दार है तो उसे स्कीम का फ़ायदा लेने के लिए 1.5 लाख रुपये के सामान खरीदने होंगे। ज़्यादातर कर्मचारियों के लिए 50 हज़ार पर आयकर बचाने के लिए अपनी बचत से एक लाख रुपये निकालकर खर्च करना न तो आसान होगा और ना ही व्यावहारिक। इससे उन्हें शायद ही कोई खुशी या सन्तोष मिले। फिर भी यदि कर्मचारी हिम्मती निकला तो उसके खर्च से सरकार कम से कम 18 हज़ार रुपये बतौर जीएसटी ज़रूर पा जाएगी।

दरअसल, नार्थ ब्लॉक में बैठे वित्त मंत्रालय के अफ़सरों ने हिसाब लगाया कि एलटीसी लेने वालों को घूमने-फिरने, खाने-पीने और होटल का किराया तो अपनी बचत से ही भरना पड़ता है। इससे अर्थव्यवस्था में जो माँग पैदा होती वो 1.5 लाख रुपये की ख़रीदारी से पैदा हो सकती है। एलटीसी के लाभार्थियों को दस दिन के अर्जित अवकाश यानी ‘अर्न लीव’ को भुनाने यानी ‘लीव इनकैशमेंट’ की सुविधा भी मिलती है। आमतौर पर ये ‘टैक्सेबल इनकम’ रकम होती है। लेकिन इसे ही वित्तमंत्री ने अभी ‘कर-मुक्त’ बनाकर कर्मचारियों को ‘बड़ा तोहफ़ा’ दिया है।

वास्तव में, ये तोहफ़ा भी एक झाँसा ही है। इसे उदाहरण से समझिए। यदि किसी कर्मचारी का दस दिन का वेतन 25 हज़ार रुपये है तो 31 मार्च 2021 तक एलटीसी कैश वाउचर स्कीम का लाभ लेने पर ये रकम ‘नॉन टैक्सेबल’ मानी जाएगी। आमतौर पर ‘लीव इनकैशमेंट’ वही कर्मचारी लेते हैं जो इससे पैदा होने वाले टैक्स की देनदारी को ‘मैनेज़’ करने में सक्षम हों। बड़े अफ़सरों के लिए भी ‘लीव इनकैशमेंट’ पर टैक्स की देनदारी महज चन्द सौ रुपये ही बैठती है। यानी, इस योजना का असली फ़ायदा ऐसे फिर मुट्ठी भर अफ़सरों को ही मिलेगा जिनकी कर-योग्य आमदनी इतनी ज़्यादा है कि वो टैक्स से बच नहीं पाते।

निचले और मध्यम स्तर के 95 फ़ीसदी कर्मचारियों को एलटीसी कैश वाउचर स्कीम से कोई लाभ नहीं होगा। उनके लिए ये आकर्षक भी नहीं है क्योंकि एक रुपया पर लागू टैक्स बचाने के लिए उन्हें तीन रुपये खर्च करने होंगे। पूरी स्कीम को अलोकप्रिय बनाने और वित्त मंत्री के सपनों पर पानी फेरने के लिए यही पहलू पर्याप्त साबित होगा। साफ़ है कि वित्त मंत्री भले में खुशफ़हमी पाले रखें कि सरकारी या निजी क्षेत्र के सभी कर्मचारी उनके ‘तोहफ़े’ पर टूट पड़ेंगे, लेकिन ऐसा हो नहीं सकता।

कर्ज़ लें, खर्च करें और उत्सव मनाएँ

वित्तमंत्री ये भी चाहती हैं कि सभी केन्द्रीय कर्मचारी 31 मार्च 2021 तक सरकार से 10,000 रुपये तक का ब्याज़-मुक्त कर्ज़ लें और इसे खर्च करके उत्सव मनाएँ। इसे ‘स्पेशल फ़ेस्टिवल एडवांस स्कीम’ कहा गया। सातवें वेतन आयोग की जनवरी 2016 से लागू सिफ़ारिशें से पहले कर्मचारियों को साल में एक बार 7,500 रुपये तक के ‘फ़ेस्टिवल एडवांस’ सुविधा मिलती थी। उसे ही सिर्फ़ मौजूदा वर्ष के लिए 10,000 रुपये बनाकर पुनर्जीवित किया गया है। इसकी किस्तें 10 महीने तक कर्मचारियों के वेतन से काटी जाएगी।

अब समझते हैं कि यदि सरकार ने 10,000 रुपये को 10 महीने के लिए 6 प्रतिशत ब्याज़ पर देने की पेशकश की होती तो लाभार्थी कितना ब्याज़ चुकाते? ईएमआई के फ़ॉर्मूले के मुताबिक़, यदि 1028 रुपये महीने की किस्त हो तो 10,000 रुपये के कर्ज़ पर 10 महीनों में कुल 10,280 रुपये चुकाने पड़ेंगे। साफ़ है कि ब्याज़-मुक्त कर्ज़ से 28 रुपये महीने या 10 महीने में 280 रुपये की राहत मिलेगी। ये राहत एक रुपया रोज़ भी नहीं है। यहाँ 6% ब्याज़-दर की कल्पना इसलिए है क्योंकि किसान क्रेडिट कार्ड पर ब्याज़ दर 4 प्रतिशत है। इसमें तय वक़्त पर कर्ज़ उतारने वालों को अतिरिक्त राहत भी मिलती है।

आँकड़ों की बाज़ीगरी

अब यदि हम मान भी लें कि एक रुपया रोज़ वाले ब्याज़-मुक्त कर्ज़ का सुख लूटने के लिए सभी 48 लाख केन्द्रीय कर्मचारी ‘फ़ेस्टिवल एडवांस’ पर टूट ही पड़ेंगे तो भी इससे अर्थव्यवस्था में रोज़ाना 48 लाख रुपये ही खर्च होंगे। महीने भर के लिए ये रकम 13.44 करोड़ रुपये होगी तो दस महीने में 134 करोड़ रुपये। दूसरी ओर, यदि सभी 48 लाख कर्मचारी इसी महीने 10,000 रुपये का ‘फ़ेस्टिवल एडवांस’ ले लें तो भी सरकार को एकमुस्त सिर्फ़ 4,800 करोड़ रुपये का ही कर्ज़ देना पड़ेगा।

केन्द्र सरकार ने इस साल 200 लाख करोड़ रुपये की जीडीपी का अनुमान लगाया था, हालाँकि लॉकडाउन के बाद आये आँकड़ों को देखते हुए वित्त वर्ष के अन्त तक भारत की जीडीपी 100-110 लाख करोड़ रुपये के आसपास ही सिमटने की उम्मीद है। इसीलिए ज़रा सोचिए कि जीडीपी के लिए 4,800 करोड़ रुपये यानी क़रीब 0.04 प्रतिशत हिस्सेदारी वाला वित्त मंत्री का ‘कर्ज़ मुक्त पैकेज़’ कैसा धमाका पैदा कर पाएगा? ज़ाहिर है, अर्थव्यवस्था हो या सरकारी कर्मचारी, दोनों को ही वित्तमंत्री सिर्फ़ झाँसा ही परोस रही हैं।

12,000 करोड़ रुपये का हवाई क़िला

वित्त मंत्री का ये कहना सही है कि ढाँचागत खर्चों से न सिर्फ़ अल्पकाल में बल्कि भविष्य में भी जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) बेहतर बनती है। इसके लिए उन्होंने राज्यों को 12,000 करोड़ रुपये को भी ब्याज़-मुक्त कर्ज़ वाला पैकेज़ दिया है। इस कर्ज़ की वापसी 50 वर्षों में होगी। इससे राज्यों के पूँजीगत खर्चों यानी कैपिटल एक्सपेंडीचर में जोश भरा जाएगा। हालाँकि, इस रकम की विशालता भी बहुत रोचक है।

12,000 करोड़ रुपये में से 2,500 करोड़ रुपये का पहला हिस्सा पूर्वोत्तर के 8 राज्यों के अलावा उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के लिए है, तो 7,500 करोड़ रुपये का दूसरा हिस्सा बाक़ी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों का है, इसे वित्त आयोग के उस फ़ॉर्मूले के मुताबिक बाँटा जाएगा जिससे राज्यों के बीच केन्द्रीय राजस्व बँटता है। तीसरे हिस्से के रूप में 2,000 करोड़ रुपये उन राज्यों के लिए होंगे जो ‘आत्मनिर्भर’ पैकेज़ वाले चार में से तीन सुधारों को साकार करेंगे। अभी तो ये सुधार खुद ही बहुत बोझिल हैं। लिहाज़ा, जब तस्वीर साफ़ होगी तब अर्थव्यवस्था में 2,000 करोड़ रुपये की माँग नज़र आएगी।

12,000 करोड़ रुपये वाले पैकेज़ में सबसे विचित्र है 7,500 करोड़ रुपये वाला दूसरा हिस्सा। क्योंकि इसमें पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, पुडुचेरी, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों के अलावा लक्षद्वीप, अंडमान-निकोबार, दादरा नागर हवेली, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे केन्द्र शासित प्रदेशों की हिस्सेदारी होगी। ज़ाहिर है, 7,500 करोड़ रुपये का हाल ‘एक अनार सौ बीमार’ वाला ही होगा।   कुलमिलाकर, ‘डिमांड इंफ़्यूज़न’ पैकेज़ की समीक्षा से साफ़ है कि ‘आत्मनिर्भर पैकेज़’ की तरह ये भी फ़ुस्स पटाखा ही साबित होगी। इससे तो ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री ने वित्त मंत्री को एक के बाद एक, ऐसे ‘फ़्लॉप पैकेज़’ के एलान की ज़िम्मेदारी दी है, जिसका ज़मीनी हश्र ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ वाला ही हो। या फिर, सरकार ठाने बैठी है कि हिन्दुत्ववादी अफ़ीम के नशे में चूर जनता को हवाबाज़ी भरे पैकेज़ों से ही बहलाना चाहिए कि ‘सब चंगा सी’। वर्ना, 28,000 करोड़ रुपये के पैकेज़ की बदौलत अर्थव्यवस्था में माँग बढ़ने का चमत्कार तो सिर्फ़ ‘मुंगेरी लाल के हसीन सपनों’ में ही सम्भव है।

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चुनाव

नीतीश को निपटाने के लिए बीजेपी ने अपनी दो टीमें मैदान में उतारीं

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Nitish Modi

अंक और गिनती से पनपी गणित की दर्ज़नों शाखाएँ हैं। अंकगणित, बीजगणित, ज्यामिति वग़ैरह से तो सभी परिचित हैं। गणित विज्ञान है। विज्ञान की तरह गणित के भी नियम और सिद्धान्त अकाट्य होते हैं। तभी तो पूरे ब्रह्मांड में हर जगह दो और दो, चार ही होता है। लेकिन ‘सियासी-गणित’ ऐसी विचित्र विधा है जिसमें ‘चार’ कभी ‘साढ़े तीन’ बन जाता है तो कभी ‘साढ़े चार’। मज़ेदार तो ये है कि दुनिया भर में ‘राजनीति-विज्ञान’ ऐसे ही बेतुके नियमों से चलती है। इसीलिए पुराने तज़ुर्बों की बदौलत राजनीतिक प्रेक्षक भी तमाम तिकड़मों की समीक्षा करते हैं।

अभी बिहार की राजनीति सबसे मौजूँ है। वहाँ सियासी बिसात पर सभी ख़ेमे भीतरघाती चालें ही चल रहे हैं। इसने घाट-घाट का पानी पीये नीतीश कुमार की दशा ‘पानी में मीन प्यासी’ वाली बना दी है। ऐन चुनावी बेला पर ‘कुर्सी कुमार’ के नाम से धन्य नीतीश बाबू की आँखों में धूल झोंककर किरकिरी पैदा करने का काम जहाँ प्रत्यक्ष में ‘मौसम विज्ञानी’ राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी कर रही है तो परोक्ष रूप से इसे बीजेपी का आला नेतृत्व इसे हवा दे रहा है। सभी नाज़ुक वक़्त का फ़ायदा उठाने की फ़िराक़ में हैं।

बिहार के चुनावी महाभारत में चिराग़ पासवान में उस अर्जुन का चेहरा दिख रहा है जो शिखंडी की तरह बाग़ियों और दलबदलुओं के पीछे छिपकर नीतीश जैसे भीष्म को निपटाने के लिए आतुर है। फ़र्क़ इतना है कि कुरुक्षेत्र में भीष्म ने ख़ुद ही शिखंडी का नुस्ख़ा बताया था जबकि बिहार में बीजेपी ने इतिहास से सबक सीखने की रणनीति बनायी है। इसी रणनीति के तहत महीनों से अधिक सीटों के नाम पर शुरू हुई खींचतान ने ‘दो-एनडीए’ पैदा कर दिये हैं। दोनों एनडीए असली हैं क्योंकि दोनों में बीजेपी मौजूद है।

दरअसल, बीजेपी ने ख़ुद को टीम-ए और टीम-बी में बाँट लिया है। टीम-ए में बीजेपी के साथ औपचारिक तौर पर नीतीश हैं तो टीम-बी में अनौपचारिक तौर पर चिराग़। कृष्ण की तरह मोदी-शाह ने अपनी सेना तो कौरव रूपी नीतीश तो दे दी है, लेकिन ख़ुद युद्ध नहीं करने का संकल्प लेकर चिराग़ रूपी पाँडवों के साथ हैं। संघ के खाँटी नेताओं या कार्यकर्ताओं का बीजेपी के ‘कमल’ को डंके की चोट में हाथ में थामे रखकर चिराग़ की ‘झोंपड़ी’ में जाना अनायास नहीं है। टिकट तो बस बहाना है। बग़ावत छलावा है। मक़सद तो मौक़ा पाकर नीतीश को ठिकाने लगाना है।

बीजेपी ने चिराग़ के चुनाव-चिन्ह की बदौलत चोर दरवाज़े से नीतीश के मुक़ाबले अपने ज़्यादा उम्मीदवारों को मैदान में उतारने का खेल खेला है। इसीलिए चिराग़ के पास जाकर टिकट पाने वाले संघी नेता बहुत गर्व से कहते हैं कि उन्होंने घर बदला है, विचारधारा या संस्कार नहीं है। ये ‘दोस्ताना मुक़ाबले’ का सबसे शानदार फ़रेब है कि विरोधी ख़ेमे में भी अपने ही उम्मीदवार मौजूद हों। यानी, ‘ये’ जीते या ‘वो’, संख्या तो अपनी ही बढ़ेगी। फिर भी यदि कसर रह जाएगी तो चुनाव के बाद जनता दल यूनाइटेड में वैसी ही तोड़-फोड़ क्यों नहीं होगी, जैसे हम अनेक मौकों पर देख चुके हैं। विधायकों की मंडी लगाना बीजेपी के लिए बायें हाथ का खेल है।

लिहाज़ा, ये चिराग़ का सियासी ढोंग या पैंतरा नहीं तो फिर और क्या है कि हम मोदी के साथ तो हैं लेकिन मोदी जिसके साथ हैं उसके साथ नहीं हैं। ये फ़रेब नहीं तो फिर और क्या है कि ‘नीतीश की ख़ैर नहीं, मोदी से बैर नहीं’? अकाली, शिवसेना और तेलगू देशम् ने एनडीए और बीजेपी से नाता तोड़ा तो सत्ता की मलाई खाने के लिए मोदी की गोदी में ही नहीं बैठे रहे। लेकिन पासवान ऐसे नहीं हैं। उन्हें भी नीतीश की तरह जीने के लिए सत्ता की संजीवनी चाहिए ही। नीतीश-पासवान, दोनों ही इस पाखंड की गिरफ़्त हैं कि उनकी दोस्ती सिर्फ़ बीजेपी से है। हालाँकि, राज्यसभा की सीट लेने के लिए पासवान ने थोड़ी देर के लिए नीतीश को दोस्त मानने में ही अपना स्वार्थ देखा।

ज़ाहिर है, बीजेपी भी साफ़-साफ़ बोलकर तो नीतीश को ठिकाने लगाएगी नहीं, इसीलिए महीनों से बयान जारी होते आये हैं कि मुख्यमंत्री का चेहरा वही रहेंगे। चिराग़ ने नीतीश के उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ अगड़ी जाति के लोगों को टिकट देने की रणनीति बनायी है। ताकि अगड़ी जाति वाले बीजेपी के वोट नीतीश के उम्मीदवारों को नहीं मिले। इस तरह, चिराग़ के उम्मीदवार यदि नहीं भी जीतें तो नीतीश के लिए वोट-कटुआ तो बन ही जाएँ। उधर, बीजेपी के कोटे वाली सीटों पर नीतीश के वोटरों के लिए कमल की अनदेखी करना सम्भव नहीं होगा। गठबन्धन की वजह से नीतीश के समर्थकों को भी बीजेपी को वोट देना ही पड़ेगा।

लगता है कि बीजेपी और एलजेपी की रणनीति है कि ‘सुशासन बाबू’ को सही वक़्त पर उनके उसी हथकंडे से ठिकाने लगाया जाए जिससे 2015 में उन्होंने पहले 17 साल पुराने दोस्त बीजेपी को और फिर 2017 में महागठबन्धन को गच्चा दिया था। इसीलिए अबकी बिहार चुनाव का सबसे दिलचस्प सवाल ये बन गया कि अव्वल दर्ज़े के ‘गच्चेबाज़’ और अव्वल दर्ज़े के ‘सौदागार’ में से बाज़ी कौन मारेगा? नीतीश बाबू यदि ‘पलटी-मार’ हैं तो बीजेपी भी उनसे कतई कम नहीं है। इसके मौजूदा कर्णधारों को विधायकों को ख़रीदने, राज्यपालों से मनमर्ज़ी फ़ैसले करवाने और मुक़दमों-छापों के ज़रिये विरोधियों का चरित्रहनन करके अन्ततः सत्ता हथियाने में महारत हासिल है।

ऐसा नहीं है कि नीतीश को ये खेल समझ में नहीं आ रहा है। उनके पास दोस्तों के पीठ या सीने में छुरा भोंकने का इतना तज़ुर्बा है कि उन्होंने उड़ती चिड़िया के पंख गिन लिये। नीतीश को साफ़ दिख रहा है चिराग़ की पार्टी से बीजेपी के बाग़ी नहीं बल्कि सिपाही पा रहे हैं टिकट। कई महीने से नीतीश बारम्बार बीजेपी को आगाह करते रहे कि पासवान को सेट कीजिए। बीजेपी उन्हें तरह-तरह से गच्चा देती रही ताकि वक़्त निकलता चला जाए। अन्त में, नीतीश को चक्रव्यूह में फँसाने के लिए चिराग़ से नौटंकी करवायी गयी। ख़ुद को चक्रव्यूह में घिरा पाकर नीतीश ने सख़्त नाराज़गी जतायी तो ‘सियासी-मरहम’ लगाते हुए बीजेपी ने साझा प्रेस कांफ्रेंस के दौरान 44 सेकेंड में 5 बार नीतीश के नेतृत्व में आस्था जता दी।

‘डैमेज़ कंट्रोल’ के नाम पर कहा गया कि मोदी के नाम पर चिराग़ वोट नहीं मान सकते। फ़िलहाल, मोदी का ‘कॉपीराइट’ नीतीश के पास है। चिराग़ पर अपनी पार्टी के बैनर-पोस्टर में बीजेपी के नेताओं के इस्तेमाल पर भी रोक लगा दी गयी। लेकिन एलजेपी को एनडीए से बाहर नहीं किया गया। क्योंकि चिराग़ जो कुछ भी करते रहे हैं उसकी रणनीति तो बीजेपी ने बनायी है। एकलव्य की तरह चिराग़ भी मोदी को ही द्रोणाचार्य बता रहे हैं तो बीजेपी कह रही है कि वो गुरु-दक्षिणा में अंगूठा नहीं माँग सकती, क्योंकि ये द्वापर नहीं बल्कि घोर-कलियुग है। लीपा-पोती की ख़ातिर ये एलान ज़रूर हो गया कि चुनाव के बाद चाहे नीतीश की सीटें कम भी रह जाएँ लेकिन मुख्यमंत्री पद के दावेदार वही रहेंगे।

बीजेपी की ऐसी ‘राजनीतिक प्रतिज्ञाओं’ पर जिन्हें यक़ीन हो उन्हें भी शातिर ही मानना चाहिए। नीतीश हों या पासवान या संघ के मोदी-शाह, सबका रिकॉर्ड दग़ाबाज़ियों से भरपूर रहा है। मौजूदा दौर की राजनीति में तमाम जाने-पहचाने दस्तूर हैं। चाल-चरित्र-चेहरा तो कब का बेमानी हो चुका है। यहाँ कोई किसी का सगा नहीं। येन-केन-प्रकारेण सबको सत्ता, कुर्सी और ओहदा चाहिए। राजनीति में जनहित की बारी आत्महित के बाद ही आती है। जनता लाख छटपटाये लेकिन उसे इसी भंवर या दलदल में जीना पड़ता है।

यही भंवर फ़िलहाल, बिहार में सियासी बवंडर बना हुआ है। अभी वहाँ भीतरघातियों और दलबदलुओं का बाज़ार उफ़ान पर है। वहाँ टिकटों के बँटवारे की अन्तिम घड़ी तक सभी नेता, पार्टियाँ और गठबन्धन एक-दूसरे को लूट-ख़सोटने पर लगे हैं। राजनीति में इन लुटेरों को बाग़ी भी कहते हैं। आपराधिक छवि या पृष्ठभूमि वाले नेताओं की तरह बाग़ियों का ख़ानदान भी हर पार्टी में मौजूद है। सभी ने बग़ावत, दग़ाबाज़ी और भीतरघात के संस्कार अपने आला-नेताओं से ही सीखें हैं।

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ज़रा हटके

राजनीति को अपराधियों से बचाये बग़ैर नहीं बचेंगी बेटियां

पुलिस या न्यायिक सुधारों को लेकर देश या राज्यों में काँग्रेसी सरकारों ने अतीत में जैसी लापरवाही दिखायी, उसी का दंश मौजूदा काँग्रेसियों को ख़ून के आँसू रोकर भोगना पड़ रहा है। दमन और उत्पीड़न विरोधी क़ानूनों को संसद और विधानसभा में बनाने के बावजूद ज़मीनी हालात में अपेक्षित बदलाव इसीलिए नहीं हुआ क्योंकि वहाँ बदलते दौर की चुनौतियों से निपटने वाला पारदर्शी और जवाबदेह तंत्र मौजूद नहीं रहा।

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हाथरस वाले निर्भया कांड ने एक बार फिर देश के सामने महिलाओं के प्रति होने वाला अपराध सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है। अतीत में भी अनेक बार ऐसा हो चुका है और भविष्य में तब तक होता रहेगा जब तक कि भारतीय समाज ‘राजनीति के अपराधीकरण’ के ख़िलाफ़ हल्ला नहीं बोलेगा, क्योंकि ‘बेटी बचाओ’ के लिए जैसे पुलिस और अदालती सुधारों की ज़रूरत है उसे राजनीति को अपराधियों से मुक्त किये बग़ैर कभी हासिल नहीं किया जा सकता। ऐसा हो नहीं सकता कि हमारे राजनीतिक कर्णधार ख़ुद तो अपराधी हों या आपराधिक पृष्ठभूमि वाले हों और समाज में चप्पे-चप्पे पर मौजूद उनके गुर्गे सदाचारी हों।

सारी दुनिया में यही सिद्धान्त लागू है कि अपराध की जड़ों पर हमला किये बग़ैर उसे मिटाया नहीं जा सकता। लेकिन जब मुख्यमंत्री बनते ही कोई ख़ुद के ख़िलाफ़ दर्ज़ गम्भीर अपराधों के मुक़दमों को पलक झपकते ख़त्म कर देगा तो पुलिस और अदालतों में इंसाफ़ क्या ख़ाक़ होगा! जब सैकड़ों-हज़ारों लोगों के क़त्ल के साज़िशकर्ता राजनीतिक सत्ता के शीर्ष पर होंगे, जब दिनदहाड़े और डंके की चोट पर हुए अपराधों के क़िरदार अदालत से बाइज़्ज़त बरी हो जाएँगी, जब सुप्रीम कोर्ट जैसे न्याय के सर्वोच्च मन्दिर में क़ानून के मुताबिक़ नहीं बल्कि जनभावनाओं के अनुसार इंसाफ़ बाँटा जाएगा तो ये उम्मीद बेमानी है कि देश गाँवों और शहरों में हमारी-आपकी बहन-बेटियाँ सुरक्षित रहेंगी।

बेक़ाबू अपराधों की समस्या किसी एक पार्टी से जुड़ी नहीं है। सभी का राज, जंगलराज जैसा ही है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े सिर्फ़ पत्रकारों और विपक्ष के लोगों का दिल दहलाते हैं। सत्ता प्रतिष्ठान का नहीं। उसे मालूम है कि सच तो आंकड़ों से भी कहीं ज़्यादा भयावह है। कभी-कभार ‘राजनीति’ की नौबत आ जाती है, वर्ना सबको अपनी सत्ता में ‘सब चंगा सी’ वाला मंत्र ही सटीक लगता है। इसीलिए भारतीय राजनीति को समझना होगा कि रोज़ाना के ‘निर्भया कांडों’ की रोकथाम तब तक असम्भव है जब तक पुलिस और अदालतों के दस्तूर में आमूलचूल बदलाव नहीं आएगा।

ऐसे बदलाव की पहली और सबसे बड़ी बाधा है ‘राजनीति का अपराधीकरण’, क्योंकि लोकतंत्र का ये स्थापित सत्य है कि हम जैसे लोगों को चुनते हैं, हमें वैसी ही सरकार मिलती है। जब तक हमारे राजनीतिक दल ‘राजनीति को अपराधीकरण’ से मुक्त करने और पुलिस तथा अदालती रिफ़ॉर्म यानी सुधार लाने के मुद्दे पर चुनाव नहीं लड़ेंगे तब तक हम चाहे किसी भी पार्टी की सरकार बनाते रहें, हमारे दिन नहीं फिरने वाले।

दरअसल, ‘जुमलेबाज़ी का ढोंग’ भारतीय समाज की शाश्वत और सनातन परम्परा रही है। यहाँ बातें तो होंगी ‘वसुधैव कुटम्बकम्’ और ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ की, लेकिन दुनिया को कुटुम्ब मानने का उपदेश देने वालों को न तो अल्पसंख्यक मुसलमान और मिशनरी बर्दाश्त होंगे और ना ही दलित समाज के लोग। इसी तरह, ये मानना निपट ढोंग और पाखंड है कि ‘जहाँ नारी पूज्यनीय होगी वहीं देवता रहेंगे’। नारियों को पूज्यनीय बताने वाले वैदिक जुमलों का ही आधुनिक संस्करण है ‘बेटी बचाओ’।

अरे! जिस परम्परा में देवी अहिल्या का सतीत्व हरने वाला सदियों से देवराज के आसान पर विराजमान हो, जहाँ नदियों को माता बताकर उनकी अस्मत तार-तार की जा रही हो, वहाँ ‘बेटी बचाओ’ से बड़ा ढोंग और क्या हो सकता है? इसीलिए आज भारत में छह महीने से लेकर छियासी साल तक की नारियाँ भी महफ़ूज़ नहीं रहीं। माना कि इन अपराधों को चन्द वहशी अंज़ाम देते हैं, लेकिन माता रूपी नदियों की दुर्दशा तो सारा का सारा समाज कर रहा है। इसके लिए भी क्या हम अँग्रेज़ों और तथाकथित विदेश आक्रान्ताओं को ज़िम्मेदार ठहरा सकते हैं?

अँग्रेज़ तो हमारी नदियों को ऐसा जहरीला नहीं बना गये, जैसी वो आज हैं। मुग़ल, तुग़लक, ख़िलज़ी वग़ैरह ने भी हमारी नदियों, जंगलों या पर्यावरण का सत्यानाश नहीं किया तो फिर आज़ादी के बाद हमने पूरी ताक़त से अपने पर्यावरण को लूटने-खसोटने का रास्ता क्यों चुना? एक पार्टी की नीतियों ने यदि सारा सत्यानाश किया तो दूसरी पार्टी की सत्ता ने सुधार क्यों नहीं किया? आज देश में कौन सी ऐसी अहम पार्टी है जिसने सत्ता-सुख नहीं भोगा है?

भारत का बहुसंख्यक हिन्दू समाज और ख़ासकर इसका बुर्ज़ुआ सवर्ण समाज ये साबित कर चुका है कि युगों के बदलने से भी सिर्फ़ हमारे जुमले ही बदलते हैं। हमारी उपमाओं का रस, भाव और अलंकार नहीं बदलता। वर्ना, समाज में नारियों के प्रति होने वाले अपराधों के अम्बार को देखकर क्या अब तक ये मान्यता स्थापित नहीं हो जाती कि उत्तर भारत में कहीं भी, किसी भी मन्दिर या मठ में देवताओं का प्रवास तो छोड़िए, नामोनिशान भी नहीं हो सकता। हमें साफ़ क्यों नहीं दिख रहा कि बेहतर भारतीय समाज या ‘नया भारत’ बनाने में हमारे धार्मिक स्थलों का न तो कोई ‘धार्मिक’ योगदान है और ना ही कोई ‘धार्मिक’ उपलब्धि।

बेहतर होता कि हम प्राणी जगत के अन्य जीवों की तरह नास्तिक ही रहते। कम से कम इंसान को इंसान तो समझते। हम देख चुके हैं कि मज़हबों ने इंसान को और क्रूर तथा वीभत्स ही बनाया है। राजनीति का अपराधीकरण भी इसी मानसिकता का अन्तिम संस्करण है। इससे उबरने के लिए ही ‘सभ्य समाज’ तथा ‘संविधान और क़ानून के राज’ की परिकल्पना की गयी थी। प्रमाणिक पुलिस और न्यायतंत्र इसी की अनिवार्य शर्त है। वर्ना, सब कुछ ‘एक्ट ऑफ़ गॉड’ ही बना रहेगा।

प्राचीन काल में सत्ता प्रतिष्ठान के शीर्ष का प्रतीक राजा या बादशाह, भेष बदलकर जनता का हाल जानने जाता था। क्योंकि मक़सद सच्चाई को जानने का था। आज बीजेपी को हाथरस में किसी का जाना पसन्द नहीं तो बंगाल में ममता को बीजेपी के खेल बर्दाश्त नहीं। अज़ब दस्तूर है! एक की ज़बरदस्ती, नैतिक और लोकतांत्रिक है तो दूसरे की अनैतिक और तानाशाहीपूर्ण। जब राजनीति ऐसे खोखले ढर्रों पर टिकी होगी तो नतीज़े भी खोखले ही मिलेंगे।

‘अन्धेर नगरी चौपट राजा’ वाली व्यवस्था में न्याय के लिए गले के अनुसार फन्दा नहीं बनाया जाता बल्कि फन्दे के साइज़ के मुताबिक़ गले को ढूँढा जाता है। न्याय के लिए सज़ा ज़रूरी है। लेकिन साफ़ दिख रहा है कि आधुनिक न्याय व्यवस्था में इसकी ज़रूरत ही नहीं रही। अपराध हुआ। जाँच हुई। गिरफ़्तारी हुई। ज़मानत मिली। मुक़दमा चला। सभी ससम्मान बरी किये गये। फिर फ़रमान जारी हुआ कि इसे ही न्याय कहो। न्याय समझो। चीख़-चीख़कर दुनिया को बताओ कि यही है असली ‘एक्ट ऑफ़ गॉड’। अब ये आपकी मर्ज़ी है कि आप चाहें तो इस ‘गॉड’ को निराकार ‘ऊपर वाला’ समझें या फिर साकार ‘प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री’। दोनों रास्ते एक ही ‘गॉड’ पर जाकर ख़त्म होते हैं।

एक देश के रूप में, एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में यदि हमें ‘भयमुक्त रामराज्य’ की कल्पना को साकार करना है तो सुपर हाईवे, हर घर में बिजली, शौचालय, 24 घंटा पानी, बुलेट ट्रेन, एयरपोर्ट, टनल, राफ़ेल और आत्मनिर्भर बनने जैसे तमाम आधुनिक और विश्वस्तरीय सुविधाओं वाले ‘विकास’ से पहले हमें ‘क़ानून के राज’ को स्थापित करके दिखाना होगा। पुलिस और अदालत को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर, इसमें सबसे अधिक निवेश करके और आमूलचूल सुधार लाकर ही हम समाज को जीने लायक और तरक्की करने के क़ाबिल बना पाएँगे।

हम देख चुके हैं कि राम मन्दिर, अनुच्छेद 370, नागरिकता क़ानून, तीन तलाक़, मनरेगा, सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार जैसे क्रान्तिकारी परिवर्तनों की बुनियाद पार्टियों के चुनावी घोषणापत्रों से ही आयी है। इसीलिए यदि हम भारत के आपराधिक परिदृश्य में बदलाव चाहते हैं तो हमें ऐसी राजनीतिक पार्टी को सत्ता सौंपना होगा जिसका सबसे पहला एजेंडा या चुनावी घोषणापत्र ‘पुलिस और न्यायिक क्रान्ति’ लाने का हो। इस मंत्र को सबसे पहले काँग्रेस को ही थामना होगा। उसे ही पुरखों का पाप धोने का संकल्प दिखाना होगा। क्योंकि भारत में राजनीति के अपराधीकरण के लिए सबसे पहली कसूरवार काँग्रेस ही है।

उत्तर भारत के अपराध-बहुल प्रदेशों में काँग्रेस की दशकों से क़ायम बेहद पतली हालत के लिए ऐतिहासिक ग़रीबी, पिछड़ापन, मनुवादी और सामन्तवादी व्यवस्थाओं से भी कहीं अधिक ज़िम्मेदार इनका चरमरा चुका पुलिस और न्याय-तंत्र है। महिलाओं की सुरक्षा या कथित जंगलराज के लिहाज़ से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब जैसे राज्यों के हालात में सिर्फ़ उन्नीस-बीस का ही फ़र्क़ है। इन राज्यों में काँग्रेसी सत्ता के दौरान पुलिस और अदालत का जो पतन हुआ वो अन्य पार्टियों की हुक़ूमत के दौरान सिर्फ़ कई गुना बढ़ा ही है, घटा कभी नहीं। क्योंकि अपराधीकरण के मोर्चों पर बाक़ी पार्टियाँ, दशकों पहले ही काँग्रेस को पटखनी दे चुकी हैं।

पुलिस या न्यायिक सुधारों को लेकर देश या राज्यों में काँग्रेसी सरकारों ने अतीत में जैसी लापरवाही दिखायी, उसी का दंश मौजूदा काँग्रेसियों को ख़ून के आँसू रोकर भोगना पड़ रहा है। दमन और उत्पीड़न विरोधी क़ानूनों को संसद और विधानसभा में बनाने के बावजूद ज़मीनी हालात में अपेक्षित बदलाव इसीलिए नहीं हुआ क्योंकि वहाँ बदलते दौर की चुनौतियों से निपटने वाला पारदर्शी और जवाबदेह तंत्र मौजूद नहीं रहा। यही वजह है कि पुलिस वालों के निलम्बन या तबादलों और यहाँ तक कि सरकारों के बदलने से भी पुलिस और कोर्ट के दस्तूर में कोई सुधार नज़र नहीं आया। ज़ाहिर है, राजनीति के अपराधीकरण को मिटाये बग़ैर हम सामाजिक अपराधों पर काबू पाने का लक्ष्य कभी हासिल नहीं कर सकते।

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