ISIS: सेक्स गुलाम बनने से इनकार करने पर 19 यजीदी लड़कियों को जिंदा जलाया | WeForNewsHindi | Latest, News Update, -Top Story
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ISIS: सेक्स गुलाम बनने से इनकार करने पर 19 यजीदी लड़कियों को जिंदा जलाया

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मोसुल: आईएसआईएस आतंकी संगठन ने 19 यजीदी लड़कियों को लोहे के पिंजरे में बंद करके जिंदा जला दिया। एआरए न्यूज साइट की रिपोर्ट के मुताबिक, इन लड़कियों ने सेक्स गुलाम बनने की बात को दरकिनार कर दिया था।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, गुरुवार को मोसुल में भारी भीड़ के सामने इन लड़कियों को आग लग गई। मीडिया कार्यकर्ता अबदुल्ला-अल-माल्ला ने एआरए न्यूज को बताया, ‘ वे लोग उन्हें आतंकवादियों के साथ सेक्स करने से इनकार करने की सजा दे रहे थे। 19 लड़कियों को सैकड़ों लोगों के सामने जलाकर आग जलने के लिए डाल दिया गया लेकिन लोगों के पास इस जुल्म को देखते रहने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था।

अगस्त 2014 में आईएसआईएस ने उत्तरी इराक के सिंजर इलाके में कब्जा करने के बाद 3000 से भी ज्यादा यजीदी लड़कियों को सेक्स गुलाम बनाया था। यहां से करीब 400000 लोगों ने इराक के कुर्दिस्तान प्रांत के दोहक और इरबिल में पलायन किया था। कुर्दिस्तान की क्षेत्रीय सरकार के अधिकारियों के मुताबिक, आईएसआईएस ने लगभग 1800 किडनेप की गईं महिलाओं और लड़कियों को इराक और सीरिया में कैद कर रखा है।

आईएसआईएस ने 2014 में मोसुल पर कब्जा कर उसे इराक और सीरिया तक फैले स्वात इलाके में अपनी खिलाफत की राजधानी बना लिया था।

इराकी सेना ने अपने शिया सैन्य बलों और अमेरिका समर्थित गठबंधन सेना के हवाई हमलों की मदद से गत 24 मार्च को आईएसआईएस के कब्जे से मोसुल को छुड़ाने के लिए आक्रामक अभियान छेड़ा है।

wefornews bureau 

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राजनीति

रात में भी संसद परिसर में डटे सस्पेंड किए गए विपक्षी सांसद, गाते रहे गाना

संसद के उच्च सदन में कृषि विधेयकों के पारित होने के दौरान हंगामें को लेकर बचे हुए मॉनसून सत्र के लिए कांग्रेस, सीपीएम, तृणमूल कांग्रेस और AAP के बीच आठ सांसदों को पहले ही दिन निलंबित कर दिया गया था।

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8 suspended Rajya Sabha MPs

नई दिल्ली: आठ राज्यसभा सांसदों के निलंबन को लेकर विपक्षी दलों ने सोमवार को सरकार पर निशाना साधा और इस कदम के खिलाफ संसद परिसर में निलंबित सांसदों का अनिश्चितकालीन विरोध प्रदर्शन जारी है। दरअसल, राज्यसभा में कृषि विधेयकों के पारित होने के दौरान हंगामे को लेकर कांग्रेस, सीपीएम, तृणमूल कांग्रेस और AAP के आठ सांसदों को बचे हुए मॉनसून सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया है।

वहीं राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि बिल बिना वोटिंग के पास हो गया, जिसका विपक्ष के सांसदों ने विरोध किया। सरकार और अधिकारियों की गलती है, लेकिन सजा विपक्षी सांसदों को दी जा रही है।

पोस्टर और बैनर के साथ शुरू किया प्रदर्शन

सोमवार को सत्ता पक्ष की ओर से डेरेक ओ ब्रायन (TMC), संजय सिंह (AAP), राजीव सातव (कांग्रेस), केके रागेश (CPM), सैयद नजीर हुसैन (कांग्रेस), रिपुन बोरेन (कांग्रेस), डोला सेन (टीएमसी) और एलाराम करीम (सीपीएम) को निलंबित करने की मांग की गई थी। विरोध प्रदर्शनों के बीच कृषि बिल को ध्वनि मत से पारित किया गया था। इसके विरोध में कांग्रेस, सीपीएम, शिवसेना, जेडीएस, टीएमसी, सीपीआई, और समाजवादी पार्टी जैसी विपक्षी पार्टियां संसद परिसर में ‘मर्डर ऑफ़ डेमोक्रेसी’, ‘डेथ ऑफ़ पार्लियामेंट’ और ‘शेम’ जैसे तखितयों के साथ संसद परिसर में विरोध प्रदर्शन कर रही हैं।

संजय सिंह बोले, अडानी-अंबानी के सामने गिरवी रखे गए किसान

आप पार्टी के सांसद संजय सिंह ने कहा कि देश के करोड़ों किसान अपने हक के लिए आवाज उठाएं, बीजपी सरकार ने अडानी-अंबानी के सामने किसानों को गिरवी रख दिया है। उन्होंने किसानों से अपील की कि इस काले कानून का विरोध करें। उनका कहना है कि वे संसद में एक आंदोलन पर हैं। उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार ने किसानों के खिलाफ एक काला कानून पारित किया है। हमें बिल का विरोध करने के कारण सस्पेंड किया गया है।

ममता बनर्जी ने भी की मुखालफत

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उनके समर्थन में ट्वीट किया, हम धरने पर बैठे हैं और जब तक बीजेपी सरकार यह नहीं बताती कि लोकतंत्र का गला घोंट कर यह काला कानून क्यों पारित किया गया, तब तक बैठे रहेंगे। हम किसानों के हितों की रक्षा के लिए इस निरंकुश सरकार की मानसिकता से लड़ रहे हैं, हम झुकेंगे नहीं और हम संसद में और सड़कों पर इस फासीवादी सरकार से लड़ेंगे।

सीतराम येचुरी बोले- बिल का इस तरह पास होना लोकतंत्र पर तमाचा

वहीं सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने भी सरकार पर हमला बोला और इन बिलों को पारित करने की प्रक्रिया को लोकतंत्र का हनन करार दिया। उन्होंने ट्वीट किया कि सभी संसदीय प्रक्रियाओं का इस तरह उल्लंघन और सांसदों को कानून पर चर्चा के अधिकार से वंचित करना, भारतीय संसदीय लोकतंत्र के बुनियादी ताने-बाने को कमजोर कर रहा है। मोदी सरकार को संसद को बर्बाद करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने कहा कि ये नए कानून नाजायज, गैरकानूनी हैं और भारत के राष्ट्रपति को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत पुनर्विचार के लिए इन विधानसभाओं को वापस भेजना होगा।

सांसदों ने तकिए और कंबल ले रखे हैं और चिलचिलाती गर्मी से लड़ने में उनकी मदद करने के लिए पैदल पंखे रखे गए थे। वहीं कई सांसदों को फल खाते देखा गया। सांसदों का कहना है ये एक अनिश्चितकालीन धरना होने जा रहा है।

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संसद ने महामारी संशोधन विधेयक को मंजूरी दी

यह विधेयक संबंधित अध्यादेश के स्थान पर लाया गया । इस संबंध में अध्यादेश अप्रैल में जारी किया गया था ।

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Lok Sabha

नयी दिल्ली, 21 सितंबर : संसद ने सोमवार को महामारी (संशोधन) विधेयक को मंजूरी दे दी, जिसमें महामारियों से जूझने वाले स्वास्थ्य कर्मियों को संरक्षण प्रदान करने का प्रस्ताव किया गया है।

लोकसभा में विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डा. हर्ष वर्द्धन ने कहा कि पिछले 3-4 वर्षों से हमारी सरकार लगातार महामारी जैसे विषयों से निपटने के बारे में समग्र एवं समावेशी पहल अपना रही है. ’’

डॉ. हर्षवर्द्धन ने कहा, ‘‘ इस दिशा में सरकार ‘राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिनियम’ बनाने पर काम कर रही है ।’’ उन्होंने कहा कि इस बारे में विधि विभाग ने राज्यों के विचार जानने का सुझाव दिया था।

केंद्रीय मंत्री ने कहा, ‘‘पहले दो वर्षो हमें सिर्फ चार राज्यों मध्यप्रदेश, त्रिपुरा, गोवा और हिमाचल प्रदेश से सुझाव मिले। अभी हमारे पास 14 राज्यों से सुझाव आ चुके हैं।’’

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री ने कहा कि प्रस्तावित राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिनियम बनाने की प्रक्रिया जारी है।

उन्होंने वायरस पर शोध के संबंध में जीनोम श्रृंखला तैयार करने सहित कई अन्य कार्यो का उल्लेख किया ।

उन्होंने कहा कि पिछले नौ महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्यों के साथ मिलकर कोविड के खिलाफ अभियान चलाया । प्रधानमंत्री ने स्वयं कई बार राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ संवाद किया ।

मंत्री के जवाब के बाद सदन ने कुछ सदस्यों के संशोधनों को अस्वीकार करते हुए सोमवार को इसे मंजूरी दी । उच्च सदन ने कुछ दिन पहले महामारी (संशोधन) विधेयक को मंजूरी दी थी ।

यह विधेयक संबंधित अध्यादेश के स्थान पर लाया गया । इस संबंध में अध्यादेश अप्रैल में जारी किया गया था ।

उल्लेखनीय है कि इस विधेयक के माध्यम से महामारी रोग अधिनियम 1897 में संशोधन किया गया है। इसमें महामारियों से जूझने वाले स्वास्थ्य कर्मियों को संरक्षण प्रदान करने का प्रस्ताव किया गया है । साथ ही, विधेयक में बीमारियों को फैलने से रोकने के लिए केंद्र सरकार की शक्तियों में विस्तार करने का भी प्रावधान है।

इसके तहत स्वास्थ्य कर्मियों के जीवन को नुकसान, चोट, क्षति या खतरा पहुंचाने कर्तव्यों का पालन करने में बाधा उत्पन्न करने और स्वास्थ्य सेवा कर्मी की संपत्ति या दस्तावेजों को नुकसान या क्षति पहुंचाने पर जुर्माने और दंड का प्रावधान किया गया है। इसके तहत अधिकतम पांच लाख रूपये तक जुर्माना और अधिकतम सात साल तक सजा का प्रावधान किया गया है।

निचले सदन में विधेयक पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए कांग्रेस के कोडिकुन्निल सुरेश ने कहा कि यह सरकार डॉक्टरों, नर्सों, स्वास्थ्यकर्मियों और आशा कर्मियों की तरफ ध्यान नहीं दे रही, जबकि उन्हें ‘‘कोरोना योद्धा’’ कहती है।

उन्होंने हालांकि कोरोना वायरस महामारी से निपटने के लिए स्वास्थ्य मंत्री और उनकी टीम द्वारा रात-दिन किये गये परिश्रम की सराहना की।

उन्होंने कहा कि डॉक्टरों और अर्द्धचिकित्साकर्मियों की समस्याओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

चर्चा में हिस्सा लेते हुए भाजपा के सुभाष भामरे ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों को सर्वाधिक सम्मान दिया और उनका मनोबल बढ़ाया।

उन्होंने कहा कि इस वैश्विक महामारी ने समाज के दो रूप दिखाए। एक में जहां समाज के सभी वर्गों ने जरूरतमंदों और गरीबों की मदद की, वहीं समाज ने दूसरा रूप भी देखा कि किसी सोसाइटी में या घर में रोगी पाये जाने पर पड़ोसियों ने उनका बहिष्कार किया।

पेशे से चिकित्सक रहे भामरे ने कहा कि डॉक्टर और अन्य सभी स्वास्थ्य कर्मी संक्रमित होने का खतरा होते हुए भी दिन रात काम करते रहे। प्रधानमंत्री ने डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों को सर्वाधिक सम्मान दिया। उनका मनोबल बढ़ा।

उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन उन पर हमलों से मन व्यथित होता है। डॉक्टरों को सम्मान मिलना चाहिए।’ द्रमुक की टी सुमति ने कहा कि यह संशोधन ऐसे समय में किया गया, जब तमिलनाडु में हजारों छात्रों ने सरकार से नीट को टालने की मांग की।

वहीं, तृणमूल कांग्रेस के कल्याण बनर्जी ने कहा कि यह रवैया नहीं चलेगा कि राज्य सरकार काम करे और केंद्र केवल आदेश दे।

उन्होंने कहा कि विधेयक में इस बारे में स्पष्ट नहीं किया गया कि कौन कार्रवाई करेगा, कौन सी एजेंसी कार्रवाई करेगी।

वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के कृष्ण देवरयालू ने कहा कि हमें डॉक्टरों का सम्मान करना चाहिए।

शिवसेना के श्रीकांत शिंदे, बीजद के बी महताब, बसपा के गिरीश चंद्र, भाजपा की हिना गावित, कांग्रेस के सप्तगिरी उल्का, हनुमाल बेनीवाल आदि सदस्यों ने भी चर्चा में भाग लिया।

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केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा : डिजिटल मीडिया अनियंत्रित, पहले इसके नियम बनाए जाएं

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सुदर्शन न्यूज विवाद में केंद्र ने दोहराया है कि मौजूदा कोड की पृष्ठभूमि में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए दिशानिर्देश देने के लिए सुप्रीम कोर्ट को कवायद करने की कोई जरूरत नहीं है। केंद्र ने कहा कि इसके बजाय उसे डिजिटल मीडिया के संदर्भ में मुद्दों पर अभ्यास शुरू करना चाहिए।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक हलफनामे में कहा कि अगर शीर्ष अदालत इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के लिए दिशानिदेशरें को रखना आवश्यक समझती है, जिसकी आवश्यकता नहीं है, तो अदालत को डिजिटल मीडिया के साथ पहले अभ्यास शुरू करना चाहिए।

केंद्र ने शीर्ष अदालत को बताया कि डिजिटल मीडिया पूरी तरह से अनियंत्रित है।

हलफनामे में कहा गया है कि वेब-आधारित डिजिटल मीडिया पर पूरी तरह से कोई जांच-पड़ताल नहीं है और इससे न केवल हिंसा बल्कि जहरीली घृणा फैलती है। इसमें कहा गया है कि यह संस्थानों और व्यक्तियों की छवि को धूमिल करने में भी सक्षम है।

शीर्ष अदालत में सुदर्शन न्यूज विवाद के बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को विनियमित करने की आवश्यकता से संबंधित एक सवाल पर सरकार की प्रतिक्रिया आई है। शीर्ष अदालत ने यूपीएससी जिहाद नामक सुदर्शन न्यूज चैनल के कार्यक्रम के पांच एपिसोड के प्रसारण पर रोक लगा दी थी।

हलफनामे में कहा गया है, अगर यह अदालत व्यापक मुद्दों से निपटने की इच्छा रखती है तो डिजिटल मीडिया के साथ शुरूआत करना बिल्कुल जरूरी होगा।

हलफनामे में आगे कहा गया है कि ब्रॉडकास्टर और प्रकाशक, जब उन्हें पता चला है कि वे निश्चित सामग्री के लिए रडार पर हैं, तो हो सकता है कि वे उसी चीज को प्रकाशित करने के लिए डिजिटल मीडिया का उपयोग करना शुरू कर दें, क्योंकि इसमें कोई नियम नहीं है।

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