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कैसे मरी पड़ी काँग्रेस को संजीवनी दे रहे हैं बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी?

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कैसे मरी पड़ी काँग्रेस को संजीवनी दे रहे हैं बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी?

By:मुकेश कुमार सिंह

एक मुहावरा है, ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना’. यही निचोड़ है नैशनल हेराल्ड मामले का. जिसे लेकर सोनिया और राहुल गाँधी को निपटा देने का मंसूबा पाला है बीजेपी के स्वनाम धन्य नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने. लेकिन इससे भी विचित्र बात ये है कि स्वामी के पीछे आधे-अधूरे मन से ही सही बीजेपी को भी ख़ड़ा होना पड़ा है. बीजेपी की अब लाचारी ये हो चुकी है कि उसे स्वामी के उन मनगढ़न्त तर्कों और निष्कर्षों का साथ देना पड़ा रहा है जो मूलतः एक निजी संस्था के ख़िलाफ़ एक निजी व्यक्ति की ओर से की गयी शिकायत का मामला है. इसमें किसी तरह की सरकारी रकम या सम्पत्ति का हेर-फेर नहीं है. इसीलिए ये सारा मामला मरी पड़ी काँग्रेस को संजीवनी देने का बन गया है. मज़ेदार ये भी है कि काँग्रेस के लिए ये पुण्य-कार्य उसके धुर-विरोधी सुब्रमण्यम स्वामी कर रहे हैं.

सुब्रमण्यम स्वामी की दलीलें कितनी कमज़ोर हैं, इसका अन्दाज़ा 19 दिसम्बर को मेट्रोपॉलिटन मज़िस्ट्रेट लवलीन की दो संक्षिप्त टिप्पणियों से लगाया जा सकता है. पहला, ‘at this stage, without evidence, charges can’t be serious in magnitude’ यानी ‘इस मौके पर, ऐसे सबूत नहीं है, जिनसे आरोपों को गम्भीर माना जा सके’. दूसरा, ‘Accused are reputed persons having deep root in society and can be granted bail’ यानी ‘आरोपी, ऐसे प्रतिष्ठित लोग हैं जिनकी समाज में गहरी पैठ है’. ऐसे में ये सवाल भी उठ सकता है कि यही बातें 7 दिसम्बर को आये दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश में क्यों नहीं थीं, जिसमें सोनिया-राहुल को भेजे गये सम्मन को ख़ारिज़ करने की अपील को जस्टिस सुनील गौड़ ने ठुकरा दिया था. या फिर, उस दिन जस्टिस सुनील गौड़ ने अपने आदेश में ये कैसे लिख दिया कि मामला आरोपियों के आचरण पर कई सवाल ख़ड़े करता है. इससे ‘आपराधिकता की बू’ आती है यानी ‘All this smacks of criminality’.

इसी एक शब्द ‘Criminality’ को लेकर राजनीति गरमा गयी. काँग्रेस इसे नाजायज़ और बीजेपी जायज़ ठहराने लगी. जबकि सच क्या है, यही तो अदालत में तय होना है? अदालत अभी अपने बेहद शुरुआती दौर में है. इसे समझने के लिए हमें पूरी क़ानूनी प्रक्रिया को ठीक से जानना होगा. नैशनल हेराल्ड एक निजी कम्पनी है. सुब्रमण्यम स्वामी को इसमें कुछ ‘गड़बड़ियों’ का पता चला. 2011-12 से वो इसके पीछे लगे हुए हैं. उन्होंने जाँच के लिए तमाम चिट्ठियाँ लिखीं. स्वामी तब बीजेपी में नहीं थे. वो एक व्यक्ति वाली उस ‘जनता पार्टी’ को चला रहे थे जो 1977 में बनी थी. बीते कई दशकों में स्वामी की पहचान एक शिक्षित लेकिन दिग्भ्रमित और शरारती नेता की बनती चली गयी.

सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी निजी हैसियत से जो शिकायत दर्ज़ करवायी, उसकी जाँच प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने की. लेकिन ED को मामला बेजान लगा. लिहाज़ा, उसने उसे बन्द कर दिया. फिर मोदी सरकार ने ED के उस निदेशक को ही हटा दिया जिसने मामला बन्द करने लायक पाया था. अब तक स्वामी बीजेपी में आ चुके थे. उनके प्रभाव में आकर सरकार से नैशनल हेराल्ड मामले को दोबारा खोलने का रास्ता चुना. स्वामी ने एक शिकायत सीधे कोर्ट में भी दर्ज़ करवायी. इस पर कोर्ट ने सोनिया-राहुल समेत छह आरोपियों को सम्मन भेज दिया. सम्मन भेजना अदालत का पहला और बुनियादी काम है. किसी को सम्मन भेजने का सिर्फ़ इतना मतलब है कि अदालत चाहती है कि अमुक व्यक्ति उसके सामने हाज़िर होकर अपना पक्ष रखें.

काँग्रेस ने सम्मन भेजने की इसी बुनियादी कार्यवाही को हाईकोर्ट में चुनौती दी. जबाव में हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपियों को निचली अदालत के बुलावे (सम्मन) का सम्मान करना चाहिए. दरअसल, हाईकोर्ट के लिए सम्मन को ख़ारिज़ करना आसान नहीं होता. क्योंकि ऐसा करने से पहले उसे आरोपों की जाँच करने होती और सबूतों की सत्यता को परखना होता. जो मामले की मौजूदा स्थिति में सम्भव ही नहीं था, क्योंकि ये काम निचली अदालत का होता है. लेकिन हाईकोर्ट ने ज़रा अति उत्साह दिखाते हुए अपने आदेश में ये भी लिख दिया कि उसे इसमें ‘आपराधिकता की बू’ आती है. आमतौर पर ऐसे मामलों में ऊपरी अदालतें ऐसा कुछ भी कहने से परहेज़ करती हैं, जिससे मामले के गुण-दोष (Merit of the case) को लेकर कोई धारणा बनायी जा सके. ये हाईकोर्ट के आदेश का कमज़ोर पहलू है. इसीलिए काँग्रेस में इस बात पर ख़ासा मंथन हुआ कि क्या इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाए.

बीजेपी ने जैसे ही ‘आपराधिकता की बू’ वाले जुमले को सियासी तौर पर भुनाने का रास्ता चुना. वैसे ही काँग्रेस इसे राजनीतिक द्वेष बताते हुए मातम मनाने लगी. इसी से कई दिनों तक संसद का कामकाज़ बाधित हुआ. अब इस मामले ने ऐसा सियासी रंग पकड़ लिया है कि ये एक मेगा टीवी धारावाहिक की तरह सालों-साल गरमाया रहेगा. बहरहाल, अभी तो सबसे पहले सबसे निचली अदालत को ये तय करना है कि वो ‘बू’, दुर्गन्ध है या सुगन्ध या गन्ध रहित. न्यायपालिका का ढर्रे को देखते हुए कोई नहीं जानता कि इस काम में कितने वर्ष लगेंगे. निचली अदालत के फ़ैसलों का ऊपरी अदालतों में भी ज़ोरदार दौड़ चलेगी. तमाम हाई-प्रोफाइल मामलों की तरह नैशनल हेराल्ड मामला भी सर्वोच्च स्तर पर जाये बग़ैर नहीं निपटेगा.

इस दौरान सुब्रमण्यम स्वामी ख़ूब ख़बरों में बने रहेंगे. काँग्रेस, मुक़दमे को हर मोड़ को सियासी रूप से भुनाएगी. बीजेपी, उस पर भ्रष्टाचारी होने और नकारात्मक राजनीति करने का आरोप लगाएगी. लेकिन इन सबसे अलग, सोनिया-राहुल और काँग्रेस को मुफ़्त में इतनी मीडिया पब्लिसिटी मिलेगी कि उसे अपने दिन फ़िरते हुए दिखायी देंगे. बीजेपी को इस बात का अहसास नहीं है कि जनता ने उसे देश का तेज़ी से विकास करने और जनता की बुनियादी समस्याएँ दूर करने के लिए जनादेश दिया है. काँग्रेस को तो जनता ने ख़ुद ही निपटाकर 44 सीटों पर समेट दिया था. इसीलिए, बीजेपी को काँग्रेस की नहीं बल्कि अपनी उपलब्धियों की परवाह करनी चाहिए.

लेकिन ज़िन्दगी भर विपक्ष में बैठी बीजेपी भी अपनी आदतों से लाचार है. जनादेश पाते ही वो काँग्रेस रहित भारत बनाने का सपना देखने लगी. इसे जनता ने नकार दिया. मोदी-लहर के पस्त पड़ते ही जनता लगातार हर चुनाव में बीजेपी को लताड़ रही है. दिल्ली, उत्तर प्रदेश के उपचुनाव, बिहार, गुजरात के स्थानीय निकाय के चुनाव के अलावा मध्य प्रदेश की रतलाम और झारखंड की लोहरदगा सीट का उपचुनाव भी बीजेपी हार गयी. पार्टी को ये तमाम झटके अपने मज़बूत गढ़ों में क्यों लग रहे हैं? ऐसा क्या हुआ है कि मरणासन्न हो चुकी काँग्रेस में साँस लौट रही है? याद रखिए, ये काँग्रेस के बेहतर होने के लक्षण नहीं, बल्कि बीजेपी के बदतर होने के संकेत हैं.

बीजेपी के पुराने नेता भी स्वामी के व्यक्तित्व से बहुत अच्छी तरह से वाकिफ़ थे. पार्टी के बड़े नेता स्वामी के साथ सिर्फ़ शिष्टाचार का नाता रखते थे. सियासी जमात में हर बड़ा नेता ये जानता है कि स्वामी से दोस्ती रखने का कोई फ़ायदा नहीं हो सकता, बल्कि नुकसान की आशंका अवश्य बढ़ जाती है. स्वामी भी हाशिये पर पड़े-पड़े अपना वक़्त काट रहे थे. सुर्ख़ियों में रहने के लिए वो जब-तब ऐसा मुद्दा उछालते रहते हैं जिसका ताल्लुक नेहरू-गाँधी परिवार और जयललिता से रहता हो. इसी वजह से मीडिया भी उन्हें ख़ूब तव्वज़ो देने के लिए मज़बूर होता रहा. अदालत में मुक़दमा ठोंककर अपनी सियासत के चमकाये रहने के अलावा स्वामी की कोई ज़मीनी हस्ती नहीं है.

लोकसभा चुनाव से पहले स्वामी ने काँग्रेस को कोसने के साथ-साथ नरेन्द्र मोदी का ख़ूब गुणगान करना शुरू कर दिया. इससे उन्हें बीजेपी में जगह मिल गयी. अब सोनिया-राहुल पर हमला तेज़ करने की वजह से उन्हें बड़ा सरकारी बंगला और ज़ेड प्लस सुरक्षा का तोहफ़ा भी मिल चुका है. लेकिन ऐसा कब हुआ है कि राजनेताओं के ख़िलाफ़ चली क़ानूनी लड़ाई को सियासी मुद्दा नहीं बनाया गया हो? काँग्रेस भी आज यही कर रही है. उसके लिए तो ‘बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा’ वाली दशा है. ऐसे मामलों ने ही उसे अज्ञासवास से निकालकर मुख्य धारा में खड़ा कर दिया है. यही उसके लिए संजीवनी है. मज़ेदार बात ये है कि ये संजीवनी विपक्षी ख़ेमे से सौग़ात के रूप में आ रही है! लेकिन मोदी सरकार के रणनीतिकारों को न जाने क्यों इसका नफ़ा-नुकसान दिखायी नहीं दे रहा है.

ब्लॉग

मध्य प्रदेश: आतंकवादी और नक्सली बनने की ली शपथ

उनका आरोप था कि नगरपालिका द्वारा आवंटित दुकानों का प्रतिमाह किराया दिये जाने के बावजूद कार्रवाई की गई और न्यायालय में विचाराधीन मामलों को लेकर भी संज्ञान नहीं लिया गया न ही उचित माध्यम से सूचना दी गई।

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मध्यप्रदेश के खरगोन जिले के भीकनगांव में अतिक्रमण मुहिम से आक्रोशित लोगों द्वारा आतंकवादी और नक्सलवादी बनने की शपथ लिए जाने को लेकर 12 लोगों के खिलाफ प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की गई है।

भीकनगांव के अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) ओम नारायण सिंह बड़कुल ने बताया कि सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के परीक्षण के उपरांत 12 लोगों के खिलाफ तहसीलदार द्वारा प्रतिबंधात्मक कार्यवाही का नोटिस जारी किया गया है। उन्होंने बताया कि इस वीडियो में पुष्टि हुई है कि इन लोगों ने अतिक्रमण मुहिम के विरोध में आतंकवादी व नक्सलवादी बनने की सार्वजनिक शपथ ली है। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक कार्रवाई की प्रतिक्रिया स्वरूप इस तरह का कृत्य स्पष्ट रूप से विधि विरुद्ध है।

भीकनगांव कस्बे में 6 जनवरी को विभिन्न वार्डों में अतिक्रमण हटाए जाने की कार्रवाई से आक्रोशित प्रभावितों ने उनके रोजगार समाप्त हो जाने का हवाला देते हुए सार्वजनिक रूप से आतंकवादी तथा नक्सलवादी बन जाने की शपथ ले ली थी। उन्होंने इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया था।

उनका आरोप था कि नगरपालिका द्वारा आवंटित दुकानों का प्रतिमाह किराया दिये जाने के बावजूद कार्रवाई की गई और न्यायालय में विचाराधीन मामलों को लेकर भी संज्ञान नहीं लिया गया न ही उचित माध्यम से सूचना दी गई। दूसरी ओर प्रशासन ने उनके आरोपों से नकारते हुए स्पष्ट किया था कि अतिक्रमण के विरुद्ध सम्बन्धितों को आवश्यक सूचना देने के उपरांत ही समस्त कार्रवाई संपादित की गई थी।

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अंतरराष्ट्रीय

चीन ने कैसे कोविड-19 महामारी पर काबू पाया

महामारी के दौरान वुहान में ठहरे फ्रांसीसी चिकित्सक फिलिप क्लेन ने कहा कि चीन सरकार ने महामारी की रोकथाम में चौंकाने वाला प्रयास किया है, और चीनी लोगों ने भी इसमें बड़ा योगदान दिया है।

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Wuhan China Market

बीजिंग, 9 जनवरी । वर्ष 2021 की शुरूआत में चीन के वुहान शहर के वाणिज्यिक सड़क पर लोगों की भीड़ नजर आती है। वुहान वासी मास्क पहने हुए परिजनों और दोस्तों के साथ खुशी से शॉपिंग करते दिखाई देते हैं। लेकिन एक साल पहले वुहान में कोविड-19 महामारी की वजह से 76 दिनों तक लॉकडॉउन लगा रहा, और सारी सड़कें सुनसान दिखाई देती थीं।

सिर्फ कुछ महीनों में चीन ने महामारी पर काबू पाया, और आम लोगों का जीवन सामान्य हो गया। रूसी लड़की अन्ना ने कहा कि कुल 1.7 लाख चिकित्सकों ने वुहान में महामारी की रोकथाम का प्रयास किया, और चिकित्सा उपकरणों की कुल लागत 1 अरब युआन से अधिक रही। हर गंभीर मरीजों के इलाज में कम से कम 1 लाख युआन का खर्च आया है। पिछले साल मार्च के मध्य तक महामारी की रोकथाम में चीन ने 1 खरब 16 अरब 90 करोड़ युआन खर्च किया, जो दुनिया में सबसे अधिक है। महामारी फैलने के बाद लगभग सभी देशों ने आर्थिक विकास पर ध्यान दिया, सिर्फ चीन ने अपना पूरा ध्यान जनता की जान पर केंद्रित किया।

पिछले 10 मार्च को चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने वुहान का दौरा किया। उन्होंने सामुदायिक क्षेत्र जाकर स्थानीय लोगों का हालचाल जाना और महामारी की रोकथाम व लोगों के जीवन की स्थिति का जायजा लिया।

महामारी के दौरान वुहान में ठहरे फ्रांसीसी चिकित्सक फिलिप क्लेन ने कहा कि चीन सरकार ने महामारी की रोकथाम में चौंकाने वाला प्रयास किया है, और चीनी लोगों ने भी इसमें बड़ा योगदान दिया है।

वहीं, अमेरिका के कुह्न् फाउंडेशन के अध्यक्ष रॉबर्ट लॉरेंस कुह्न् ने कहा कि चीन सरकार की संगठनात्मक क्षमता अद्भुत है। कोई अन्य देश ऐसा नहीं कर सकता है। चीन में इतनी जल्दी महामारी की रोकथाम में विजय पाने का कारण चीनी कम्यनिस्ट पार्टी का नेतृत्व है।

(साभार—-चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

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ब्लॉग

Mirza Ghalib: मिर्जा गालिब के वो जबरदस्त शेर जो अमर हैं

गालिब की मां शिक्षित थीं उन्होंने गालिब को घर पर ही शिक्षा दी जिसकी वजह से उन्हें नियमित शिक्षा कुछ ज़्यादा नहीं मिल सकी। गालिब ने आगरा के पास उस समय के प्रतिष्ठित विद्वान ‘मौलवी मोहम्मद मोवज्जम’ से फारसी की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की।

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Mirza Ghalib

वह कुछ दिन लाहौर रहे, फिर दिल्ली चले आए। क़ौकान बेग के चार बेटे और तीन बेटियां थीं। इतिहास के पन्ने पलटें तो उनके बेटों में अब्दुल्लाबेग और नसरुल्लाबेगका वर्णन मिलता है। गालिब अब्दुल्लाबेग के ही पुत्र थे। जब गालिब पांच साल के थे, तभी पिता का देहांत हो गया। पिता के बाद चाचा नसरुल्ला बेग खां ने गालिब का पालन-पोषण किया। नसरुल्ला बेग खां मराठों की ओर से आगरा के सूबेदार थे।

गालिब की मां शिक्षित थीं उन्होंने गालिब को घर पर ही शिक्षा दी जिसकी वजह से उन्हें नियमित शिक्षा कुछ ज़्यादा नहीं मिल सकी। गालिब ने आगरा के पास उस समय के प्रतिष्ठित विद्वान ‘मौलवी मोहम्मद मोवज्जम’ से फारसी की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की। ज्योतिष, तर्क, दर्शन, संगीत एवं रहस्यवाद इत्यादि से इनका कुछ न कुछ परिचय होता गया। गालिब की कम ही समय में फारसी में गजलें भी लिखने लगें थे। आज हम आपको उनके कुछ मशहूर शेर पढ़ाएंगे।

-हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है

-मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

-हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

-उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

-ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

-रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

-इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

-न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

-रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं

-आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

-बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना

-हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और

-रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ‘ग़ालिब’
कहते हैं अगले ज़माने में कोई ‘मीर’ भी था

-बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे

-काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’
शर्म तुम को मगर नहीं आती

-दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ

-कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

-क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ
रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन

-कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

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