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कैसे मरी पड़ी काँग्रेस को संजीवनी दे रहे हैं बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी?

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कैसे मरी पड़ी काँग्रेस को संजीवनी दे रहे हैं बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी?

By:मुकेश कुमार सिंह

एक मुहावरा है, ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना’. यही निचोड़ है नैशनल हेराल्ड मामले का. जिसे लेकर सोनिया और राहुल गाँधी को निपटा देने का मंसूबा पाला है बीजेपी के स्वनाम धन्य नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने. लेकिन इससे भी विचित्र बात ये है कि स्वामी के पीछे आधे-अधूरे मन से ही सही बीजेपी को भी ख़ड़ा होना पड़ा है. बीजेपी की अब लाचारी ये हो चुकी है कि उसे स्वामी के उन मनगढ़न्त तर्कों और निष्कर्षों का साथ देना पड़ा रहा है जो मूलतः एक निजी संस्था के ख़िलाफ़ एक निजी व्यक्ति की ओर से की गयी शिकायत का मामला है. इसमें किसी तरह की सरकारी रकम या सम्पत्ति का हेर-फेर नहीं है. इसीलिए ये सारा मामला मरी पड़ी काँग्रेस को संजीवनी देने का बन गया है. मज़ेदार ये भी है कि काँग्रेस के लिए ये पुण्य-कार्य उसके धुर-विरोधी सुब्रमण्यम स्वामी कर रहे हैं.

सुब्रमण्यम स्वामी की दलीलें कितनी कमज़ोर हैं, इसका अन्दाज़ा 19 दिसम्बर को मेट्रोपॉलिटन मज़िस्ट्रेट लवलीन की दो संक्षिप्त टिप्पणियों से लगाया जा सकता है. पहला, ‘at this stage, without evidence, charges can’t be serious in magnitude’ यानी ‘इस मौके पर, ऐसे सबूत नहीं है, जिनसे आरोपों को गम्भीर माना जा सके’. दूसरा, ‘Accused are reputed persons having deep root in society and can be granted bail’ यानी ‘आरोपी, ऐसे प्रतिष्ठित लोग हैं जिनकी समाज में गहरी पैठ है’. ऐसे में ये सवाल भी उठ सकता है कि यही बातें 7 दिसम्बर को आये दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश में क्यों नहीं थीं, जिसमें सोनिया-राहुल को भेजे गये सम्मन को ख़ारिज़ करने की अपील को जस्टिस सुनील गौड़ ने ठुकरा दिया था. या फिर, उस दिन जस्टिस सुनील गौड़ ने अपने आदेश में ये कैसे लिख दिया कि मामला आरोपियों के आचरण पर कई सवाल ख़ड़े करता है. इससे ‘आपराधिकता की बू’ आती है यानी ‘All this smacks of criminality’.

इसी एक शब्द ‘Criminality’ को लेकर राजनीति गरमा गयी. काँग्रेस इसे नाजायज़ और बीजेपी जायज़ ठहराने लगी. जबकि सच क्या है, यही तो अदालत में तय होना है? अदालत अभी अपने बेहद शुरुआती दौर में है. इसे समझने के लिए हमें पूरी क़ानूनी प्रक्रिया को ठीक से जानना होगा. नैशनल हेराल्ड एक निजी कम्पनी है. सुब्रमण्यम स्वामी को इसमें कुछ ‘गड़बड़ियों’ का पता चला. 2011-12 से वो इसके पीछे लगे हुए हैं. उन्होंने जाँच के लिए तमाम चिट्ठियाँ लिखीं. स्वामी तब बीजेपी में नहीं थे. वो एक व्यक्ति वाली उस ‘जनता पार्टी’ को चला रहे थे जो 1977 में बनी थी. बीते कई दशकों में स्वामी की पहचान एक शिक्षित लेकिन दिग्भ्रमित और शरारती नेता की बनती चली गयी.

सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी निजी हैसियत से जो शिकायत दर्ज़ करवायी, उसकी जाँच प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने की. लेकिन ED को मामला बेजान लगा. लिहाज़ा, उसने उसे बन्द कर दिया. फिर मोदी सरकार ने ED के उस निदेशक को ही हटा दिया जिसने मामला बन्द करने लायक पाया था. अब तक स्वामी बीजेपी में आ चुके थे. उनके प्रभाव में आकर सरकार से नैशनल हेराल्ड मामले को दोबारा खोलने का रास्ता चुना. स्वामी ने एक शिकायत सीधे कोर्ट में भी दर्ज़ करवायी. इस पर कोर्ट ने सोनिया-राहुल समेत छह आरोपियों को सम्मन भेज दिया. सम्मन भेजना अदालत का पहला और बुनियादी काम है. किसी को सम्मन भेजने का सिर्फ़ इतना मतलब है कि अदालत चाहती है कि अमुक व्यक्ति उसके सामने हाज़िर होकर अपना पक्ष रखें.

काँग्रेस ने सम्मन भेजने की इसी बुनियादी कार्यवाही को हाईकोर्ट में चुनौती दी. जबाव में हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपियों को निचली अदालत के बुलावे (सम्मन) का सम्मान करना चाहिए. दरअसल, हाईकोर्ट के लिए सम्मन को ख़ारिज़ करना आसान नहीं होता. क्योंकि ऐसा करने से पहले उसे आरोपों की जाँच करने होती और सबूतों की सत्यता को परखना होता. जो मामले की मौजूदा स्थिति में सम्भव ही नहीं था, क्योंकि ये काम निचली अदालत का होता है. लेकिन हाईकोर्ट ने ज़रा अति उत्साह दिखाते हुए अपने आदेश में ये भी लिख दिया कि उसे इसमें ‘आपराधिकता की बू’ आती है. आमतौर पर ऐसे मामलों में ऊपरी अदालतें ऐसा कुछ भी कहने से परहेज़ करती हैं, जिससे मामले के गुण-दोष (Merit of the case) को लेकर कोई धारणा बनायी जा सके. ये हाईकोर्ट के आदेश का कमज़ोर पहलू है. इसीलिए काँग्रेस में इस बात पर ख़ासा मंथन हुआ कि क्या इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाए.

बीजेपी ने जैसे ही ‘आपराधिकता की बू’ वाले जुमले को सियासी तौर पर भुनाने का रास्ता चुना. वैसे ही काँग्रेस इसे राजनीतिक द्वेष बताते हुए मातम मनाने लगी. इसी से कई दिनों तक संसद का कामकाज़ बाधित हुआ. अब इस मामले ने ऐसा सियासी रंग पकड़ लिया है कि ये एक मेगा टीवी धारावाहिक की तरह सालों-साल गरमाया रहेगा. बहरहाल, अभी तो सबसे पहले सबसे निचली अदालत को ये तय करना है कि वो ‘बू’, दुर्गन्ध है या सुगन्ध या गन्ध रहित. न्यायपालिका का ढर्रे को देखते हुए कोई नहीं जानता कि इस काम में कितने वर्ष लगेंगे. निचली अदालत के फ़ैसलों का ऊपरी अदालतों में भी ज़ोरदार दौड़ चलेगी. तमाम हाई-प्रोफाइल मामलों की तरह नैशनल हेराल्ड मामला भी सर्वोच्च स्तर पर जाये बग़ैर नहीं निपटेगा.

इस दौरान सुब्रमण्यम स्वामी ख़ूब ख़बरों में बने रहेंगे. काँग्रेस, मुक़दमे को हर मोड़ को सियासी रूप से भुनाएगी. बीजेपी, उस पर भ्रष्टाचारी होने और नकारात्मक राजनीति करने का आरोप लगाएगी. लेकिन इन सबसे अलग, सोनिया-राहुल और काँग्रेस को मुफ़्त में इतनी मीडिया पब्लिसिटी मिलेगी कि उसे अपने दिन फ़िरते हुए दिखायी देंगे. बीजेपी को इस बात का अहसास नहीं है कि जनता ने उसे देश का तेज़ी से विकास करने और जनता की बुनियादी समस्याएँ दूर करने के लिए जनादेश दिया है. काँग्रेस को तो जनता ने ख़ुद ही निपटाकर 44 सीटों पर समेट दिया था. इसीलिए, बीजेपी को काँग्रेस की नहीं बल्कि अपनी उपलब्धियों की परवाह करनी चाहिए.

लेकिन ज़िन्दगी भर विपक्ष में बैठी बीजेपी भी अपनी आदतों से लाचार है. जनादेश पाते ही वो काँग्रेस रहित भारत बनाने का सपना देखने लगी. इसे जनता ने नकार दिया. मोदी-लहर के पस्त पड़ते ही जनता लगातार हर चुनाव में बीजेपी को लताड़ रही है. दिल्ली, उत्तर प्रदेश के उपचुनाव, बिहार, गुजरात के स्थानीय निकाय के चुनाव के अलावा मध्य प्रदेश की रतलाम और झारखंड की लोहरदगा सीट का उपचुनाव भी बीजेपी हार गयी. पार्टी को ये तमाम झटके अपने मज़बूत गढ़ों में क्यों लग रहे हैं? ऐसा क्या हुआ है कि मरणासन्न हो चुकी काँग्रेस में साँस लौट रही है? याद रखिए, ये काँग्रेस के बेहतर होने के लक्षण नहीं, बल्कि बीजेपी के बदतर होने के संकेत हैं.

बीजेपी के पुराने नेता भी स्वामी के व्यक्तित्व से बहुत अच्छी तरह से वाकिफ़ थे. पार्टी के बड़े नेता स्वामी के साथ सिर्फ़ शिष्टाचार का नाता रखते थे. सियासी जमात में हर बड़ा नेता ये जानता है कि स्वामी से दोस्ती रखने का कोई फ़ायदा नहीं हो सकता, बल्कि नुकसान की आशंका अवश्य बढ़ जाती है. स्वामी भी हाशिये पर पड़े-पड़े अपना वक़्त काट रहे थे. सुर्ख़ियों में रहने के लिए वो जब-तब ऐसा मुद्दा उछालते रहते हैं जिसका ताल्लुक नेहरू-गाँधी परिवार और जयललिता से रहता हो. इसी वजह से मीडिया भी उन्हें ख़ूब तव्वज़ो देने के लिए मज़बूर होता रहा. अदालत में मुक़दमा ठोंककर अपनी सियासत के चमकाये रहने के अलावा स्वामी की कोई ज़मीनी हस्ती नहीं है.

लोकसभा चुनाव से पहले स्वामी ने काँग्रेस को कोसने के साथ-साथ नरेन्द्र मोदी का ख़ूब गुणगान करना शुरू कर दिया. इससे उन्हें बीजेपी में जगह मिल गयी. अब सोनिया-राहुल पर हमला तेज़ करने की वजह से उन्हें बड़ा सरकारी बंगला और ज़ेड प्लस सुरक्षा का तोहफ़ा भी मिल चुका है. लेकिन ऐसा कब हुआ है कि राजनेताओं के ख़िलाफ़ चली क़ानूनी लड़ाई को सियासी मुद्दा नहीं बनाया गया हो? काँग्रेस भी आज यही कर रही है. उसके लिए तो ‘बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा’ वाली दशा है. ऐसे मामलों ने ही उसे अज्ञासवास से निकालकर मुख्य धारा में खड़ा कर दिया है. यही उसके लिए संजीवनी है. मज़ेदार बात ये है कि ये संजीवनी विपक्षी ख़ेमे से सौग़ात के रूप में आ रही है! लेकिन मोदी सरकार के रणनीतिकारों को न जाने क्यों इसका नफ़ा-नुकसान दिखायी नहीं दे रहा है.

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लौंगी भुइंया से दशरथ मांझी बनने की पूरी कहानी

लौंगी भुइंया के साथ के लोग शायद अब उनके साथ न हों पर आने वाली उस गाँव की पीढ़ी “लौंगी भुइंया” का हमेशा शुक्रगुज़ार रहेगी।

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Longi Bhuiyan

अभी हाल ही में महामारी के दौरान आप सभी को पता लगा… की लोग शहर छोड़ अपने-अपने गाँव लौट रहे है। और उनमें जो मजदूर थे वो ज़्यादातर बिहार से ताल्लुक रखते थे। ख़ैर ये तो बात थी उनके लौटने की।उनके अपने गाँव छोड़ शहर जाने की कहानी भी बहुत लम्बी है …पर उसके बारे में बात फिर कभी।

फिलहाल उन्हीं लम्बी कहानियों में से एक कहानी हैं, बिहार के “गया” ज़िले की राजधानी पटना से 200 किमी दूर बांकेबाज़ार प्रखंड की कहानी हैं।

यहाँ पर रहने वाले लोगों की ज़िन्दगी खेती पर ही निर्भर हैं और खेती निर्भर है पानी पर… यानी सिंचाई पर। और यहीं से शुरू होती है यहाँ पर रहने वाले लोगों के संघर्ष की कहानी।

यहाँ के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। मगर धान और गेहूं की खेती के लिए जो पानी उन्हें चाहिए था उस पानी और वहाँ रहने वालों के बीच जो सबसे बड़ा रोड़ा था वो था एक “पहाड़” ।

और यहीं से शुरू होती है देश के दूसरे दशरथ मांझी लौंगी भुइंया की कहानी।

पानी की किल्लत की वजह से वहां से लोगों का पलायन शुरू हुआ, और पलायन का असर उनके घर तक आ पहुंचा।

यहाँ तक की उनके खुद के बेटों ने भी वो गाँव छोड़ दिया। फिर एक दिन हुआ यूँ की लौंगी भुइंया उसी पहाड़ पर बकरी चरा रहे थे की अचानक उनको ख्याल आया की अगर ये पहाड़ तोड़ दिया जाए तो पलायन रुक सकता है।

उस दिन उस ख्याल ने उन्हें ढंग से सोने नहीं दिया। उनकी पत्नी ने भी उनसे कहा की…. ये तुमसे नहीं हो पायेगा । पर लौंगी भुइंया को अपनी ज़िद्द के आगे कुछ समझ नहीं आया।
फिर क्या था…. फावड़ा उठाया और चल दिया पहाड़ तोड़ने।

30 साल अकेले फावड़े और दूसरे औज़ारों से उन्होंने आज 3 किमी लम्बी नहर खोद डाली और पानी गाँव तक पहुंचा दिया। इस साल पहली बार उनके गाँव तक बारिश का पानी पहुंचा और इसी वजह से आसपास के तीन गाँव के किसानों को भी इसका लाभ मिल रहा हैं। लोगों ने इस बार धान की फसल भी उगाई है। पर अफ़सोस की अब तक गाँव के कई लोग दूसरे शहरों में पलायन कर चुके हैं।

लौंगी भुइंया के साथ के लोग शायद अब उनके साथ न हों पर आने वाली उस गाँव की पीढ़ी “लौंगी भुइंया” का हमेशा शुक्रगुज़ार रहेगी।

लौंगी भुइंया कहते हैं “हम एक बार मन बना लेते हैं तो पीछे नहीं हटते। अपने काम से जब फुर्सत मिलता हम नहर काटने में लग जाते।

हमारी पत्नी कहती थी की तुमसे नहीं हो पायेगा…. लेकिन मुझे लगता था की हो जायेगा।

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कांग्रेस की बीमारियां उन्हें क्यों सता रहीं जिन्होंने इसे वोट दिया ही नहीं?

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Sonia Gandhi and Rahul

मध्यम वर्गीय, शिक्षित, खाते-पीते लोगों और ख़ासकर सवर्णों के बीच कांग्रेस की चिर परिचित बीमारियां अरसे से आपसी चर्चा का मुद्दा बनती रही हैं। लेकिन मज़े की बात तो ये है कि ऐसा अनायास नहीं है। बल्कि बाक़ायदा, सुविचारित रणनीति के तहत ऐसा करवाया जा रहा है। इसे संघ के ‘डैमेज़ कंट्रोल एक्सरसाइज़’ की तरह देखा जा सकता है। इसकी कई वजहें साफ़ दिख रही हैं। संघ को स्पष्ट ‘फ़ीडबैक’ मिल रहा है कि मोदी सरकार की लोकप्रियता में पलीता लगा हुआ है। कोरोना को दैवीय प्रकोप यानी ‘एक्ट ऑफ़ गॉड’ बताने का खेल जनता को हज़म नहीं हो रहा।

औंधी पड़ी अर्थव्यवस्था ने उन करोड़ों लोगों की आँखें भी खोल दी हैं जो ख़ुद को भक्त कहे जाने पर गर्व महसूस करते थे। अब लोगों को अच्छी तरह समझ में आने लगा है कि मोदी सरकार और इसके रणनीतिकार देश को आर्थिक दलदल से बाहर नहीं निकाल सकते। इनके पास ऐसी दृष्टि ही नहीं है। क़ाबिलियत ही नहीं है। ये जितना नुकसान कर चुके हैं, उसकी भरपाई कभी नहीं कर पाएँगे। बोलचाल की भाषा में इसे ही कहते हैं, ‘इनसे ना हो पाएगा!’

दूसरी तरफ, राजनीति में दिलचस्पी रखने वाला हर शख़्स जानता है कि कांग्रेस बीमार है। कई सालों से बीमार है। बीमारी को गम्भीर भी बताया जाता है। हालांकि, कांग्रेसियों को पता है कि उनकी पार्टी में क्या-क्या बीमारियां हैं और वो कितनी गम्भीर हैं? वो बीमारियों के इलाज से भी वाक़िफ़ हैं और अच्छी तरह जानते भी हैं कि इलाज कब और कैसे किया जाना है? इलाज कितना कामयाब रहेगा, इसे लेकर भी वो कोई ख़ुशफ़हमी नहीं पालना चाहते।

कांग्रेस की इन सारी बातों में कोई ख़बर नहीं है। जबकि ख़बर के अन्दर की ख़बर तो ये है कि कांग्रेस की बीमारियों को लेकर, उसके परिवारवाद और वंशवाद को लेकर, तमाम योजनाओं और भवन-मार्ग वग़ैरह के नाम नेहरू-गाँधी परिवार के लोगों के नाम पर आधारित क्यों है, इन बातों को लेकर सबसे ज़्यादा परेशानी उन लोगों को सता रही है जिन्होंने 2019 और 2014 में कांग्रेस को वोट नहीं दिया था। इस परेशानी की असली वजह है मोदी सरकार का कामकाज और इसका प्रदर्शन। क्योंकि अब मध्यम वर्ग की आँखें खुलने लगी हैं। उसे ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे’ का रोज़ाना अहसास हो रहा है। इसीलिए उसे भरमाने के लिए संघियों के दुष्प्रचार वाले सिस्टम ने भी अपने घोड़े खोल दिये हैं।

दरअसल, मध्यम वर्ग बेहद मायूस है। इतना कि उसे अब मौनी मनमोहन सिंह के दिनों की याद बहुत ज़्यादा सताने लगी है। इसे सोनिया-राहुल भी अब पहले जितने ‘घटिया और पतित’ नहीं लग रहे। मोदी जी के भाषण अब इसे भरमा नहीं पा रहे, क्योंकि इनकी बातों, नये-नये मंत्रों तथा जुमलों से उनका मोहभंग होने लगा है। इसने कोरोना काल के 21 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की सच्चाई को क़रीब दे देख लिया है। इसकी समझ में आ गया है कि चीन को लेकर प्रधानमंत्री ने कैसे देश को गुमराह किया।

मध्यम वर्ग को तो 2016 की नोटबन्दी की लम्बी लाइनों से लेकर अब तक के तमाम अनुभवों की एक-एक बात याद आ रही है, क्योंकि तब से अब तक आर्थिक मोर्चों पर इसके हाथ लगातार सिर्फ़ बुरी ख़बरें ही आयी हैं। राम मन्दिर, 370 और तीन तलाक़ जैसे फ़ैसलों से इसे मिली ख़ुशी अब काफ़ूर हो चुकी है। कोरोना में इसने सरकारी दावों और विकास के स्तर की हक़ीक़त को भी बहुत क़रीब से देख लिया है।

छंटनी, बेरोज़गारी और गिरती आमदनी का आलम हर घर में मौजूद है। नयी नौकरियों का कहीं कोई अता-पता नहीं है। यहां तक कि जिन युवाओं को किसी-किसी नौकरी के लिए चुन लिया गया था, उनकी ज्वाइनिंग भी टल चुकी है। आर्थिक आँकड़ों ने कम शिक्षित लोगों को भी ज्ञानवान बना दिया है। ग़रीब तो बुरी तरह से टूटे हुए हैं। सरकारें जो कह और कर रही हैं, उससे उन्हें ढांढस नहीं मिल रहा।

पेट्रोल-डीज़ल के रोज़ाना उछल रहे दामों को लेकर भी जनता में बेहद गुस्सा है। इसने सबका जीना और दुश्वार बना रखा है। जनता को अब विपक्ष वाली उस बीजेपी की बहुत याद सता रही है जो सड़कों पर उतरकर तरह-तरह की ड्रॉमेबाज़ी के ज़रिये मनमोहन सरकार के नाम में दम करके रखती थी। विपक्ष वाली बीजेपी बहुत संगठित थी। उसके पीछे संघ की ताक़त थी। जबकि विपक्ष वाली कांग्रेस ख़ुद ही बहुत लुंज-पुंज है। कई बीमारियों से ग्रस्त है। अपनी सेहत को सुधारने के लिए जो किया जाना चाहिए, उसे भी करती नज़र नहीं आ रही।

मध्यम वर्ग को लगता है कि कांग्रेस वैसे संघर्ष करती नज़र क्यों नहीं आ रही, जैसे विपक्ष वाली बीजेपी किया करती थी? ये सहज प्रश्न घर-घर की चर्चा में स्थान पा रहा है। बात यहां आकर ख़त्म होती है कि राहुल-प्रियंका वग़ैरह से कुछ नहीं हो पाएगा। संघ इसी माहौल को भुनाना चाहता है। इसी मंत्र को फैलाना चाहता है कि कांग्रेस को जनता याद चाहे जितना करे, लेकिन पसन्द बिल्कुल न करे। राजनीति का ये स्वाभाविक व्यवहार भी है। इसीलिए, मौजूदा हालात से मायूस लोग जब भी विकल्प की बातें करते हैं, तो उन्हें ‘टीना फैक्टर’ यानी There is no alternative (TINA) की याद दिलायी जाती है।

मायूस मध्यम वर्ग को बताया जाता है कि कांग्रेस तो ठीक है, लेकिन इसका नेता कौन है, इसका पता ही नहीं है। राहुल गांधी का तो इतना चरित्र हनन किया जा चुका है कि उन्हें लोग विकल्प मान ही नहीं पाते। हालांकि, इसके लिए वो ख़ुद भी कोई कम कसूरवार नहीं हैं। लेकिन एक हक़ीक़त और भी है कि कांग्रेस में इन्दिरा गांधी के बाद जनता की नब्ज़ को पकड़कर सड़क पर संघर्ष करने वाला दूसरा बड़ा नेता नहीं हुआ। राजीव और सोनिया ने कांग्रेस को उबारने के लिए जैसे काम किए, कमोबेश वैसे ही आज भी हो रहा है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि आज जनता और ख़ासकर मध्यम वर्ग की अपेक्षाएं काफ़ी बदल चुकी हैं।

‘अपेक्षाओं के इस बदलाव’ को पैदा करने में संघ के नये-पुराने दुष्प्रचार तंत्र ने कमाल का प्रदर्शन किया है। वर्ना, विरोधी तो हमेशा ही चरित्र हनन और लांछन का सहारा लेते ही रहे हैं। सभी पार्टियाँ यही करती हैं। क्योंकि ये राजनीति का अहिंसक हथियार है। इसके बावजूद अभी संघ की बेचैनी थोड़ी ज़्यादा है। बिहार के चुनाव जो सामने हैं। वहाँ भी नीतीश से टीना फैक्टर को जोड़ने का ही खेल चल रहा है। जनमानस की ख़ुशी या नाराज़गी को फैलने नहीं दिया जा रहा, क्योंकि मेनस्ट्रीम मीडिया मर चुका है। जनता अब सच्चाई को जानकर अपनी राय नहीं बना रही, बल्कि उसे व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी के कंटेंट से ही ज्ञानालोकित किया जा रहा है।

कांग्रेस भी जानती है कि अगर अपनी बीमारियों से उबर भी गयी तो भी बीजेपी को खुले अखाड़े में अपने बूते चित नहीं कर पाएगी। संघ की अफ़ीम ने बीजेपी को अपराजेय बना दिया है। लेकिन संघ अच्छी तरह जानता है कि जब जनता का गुस्सा फूटेगा तो वो ये देखकर वोट नहीं करेगी कि मोदी का विकल्प कौन है? बल्कि ये सोचकर वोट डालेगी कि ‘कोई भी आये, लेकिन मोदी तो नहीं चाहिए!’

ये वही मनोदशा है, जिसने 2014 में कांग्रेस की मिट्टी-पलीद की थी और इतिहास में पहले बार ग़ैर-कांग्रेसी पूर्ण बहुमत वाली सरकार के सत्ता में आने का रास्ता खुला था। जब जनमानस में ये राय बन गयी थी कि अबकी कांग्रेस को वोट नहीं देना है। इसीलिए कांग्रेस मुक्त होने के कगार पर जा पहुंची। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री समेत संघ के रणनीतिकारों को जनता के मनोविज्ञान के इसी पहलू का ख़ौफ़ सता रहा है।

मुमकिन है कि अगले कैबिनेट विस्तार में वित्त मंत्रालय की ज़िम्मेदारी किसी और को थमाकर निर्मला सीतारमन को बलि का बकरा बना दिया जाए। राजनीति में ऐसे नुस्ख़ों को आसान उपायों की तरह देखा जाता है। इसे पार्टी और संघ ऐसे पेश करेंगे कि मोदी जी तो अद्भुत हैं ही, वित्त मंत्री ही नाक़ाबिल थीं, इसलिए उन्हें बदल दिया गया। अब देखना सब ठीक हो जाएगा। राजनीति ऐसे ही नुस्ख़ों का खेल है। यही वजह है कि संघ को कांग्रेस की बीमारी में भी अपने लिए नुस्ख़ा ही नज़र आ रहा है। इसमें ग़लत भी कुछ नहीं है।

उधर, कांग्रेस का सीधा सा मंत्र है कि वो सत्ता में लौटगी या नहीं, ये चुनौती उसकी नहीं बल्कि जनता की है। लिहाज़ा, जान झोंकने से क्या फ़ायदा! इसीलिए कांग्रेस को आप कभी सत्ता में वापसी के लिए वैसे जान झोंकता हुआ नहीं देखेंगे जैसा संघ-बीजेपी कुशलता से किया करती हैं। कांग्रेस आपको कभी संघ की तरह पूरी ताक़त से चुनाव लड़ती हुई भी नहीं नज़र आएगी।

इसके क्षेत्रीय नेता जैसे शरद पवार, ममता बनर्जी, जगन मोहन रेड्डी और चन्द्र शेखर राव भले ही ऐसा करते दिखें, लेकिन शीर्ष नेतृत्व सड़क पर उतरकर पसीना नहीं बहाने वाला। इसे आसानी से समझने के लिए ग़ालिब के एक शेर में ज़रा छेड़-छाड़ करके देखें, तो एक लाइन में सब समझ में आ जाएगा कि ‘हमको उनसे (वफ़ा) संघर्ष की है उम्मीद, जो नहीं जानते (वफ़ा) संघर्ष क्या है!’

Mukesh Kumar Singh मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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ओपिनियन

संविधान बचाने से ज़्यादा ज़रूरी है इसके आन्दोलनकारियों को बचाना

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Students and activists take part in a protest against India's new citizenship law in Bangalore on December 17, 2019 , AFP

सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद प्राचा के हवाले से शाहीन बाग़ वाले संविधान बचाओ आन्दोलन को जल्द बहाल करने की सुगबुगाहट है। इसी तर्ज़ पर क्या सोशल-डिस्टेसिंग का जोख़िम उठाकर 30 अगस्त को मुहर्रम का जुलूस निकालने की इजाज़त माँगने, देने या नहीं देने को लेकर कहीं तनाव के हालात तो नहीं बन जाएँगे? ऐसे दौर में जब रोज़ाना करीब 65 हज़ार कोरोना पॉज़िटिव के मामले सामने रहे हों, जब स्कूल-कॉलेज निलम्बित हों और रेल-सेवा असामान्य हो, जब मैट्रो-सेवा शान्त हो, होटल-रेस्टोरेंट बन्द हों, जब मॉस्क अनिवार्य हो, तब क्या ऐसी बातें होना ठीक है कि जल्द ही ‘शाहीन बाग़’ की बहाली होगी? संविधान बचाओ आन्दोलन के अगले दौर का वक़्त क्या अभी आने से फ़ायदा होगा? क्या सरकारें इसे होने देंगी? कहीं ये पुलिसिया सख़्ती को ‘आ बैल मुझे मार’ का सन्देश तो नहीं देगी?

दरअसल, भारत पर अभी कोरोना-मारीचिका हावी है। मारीचिका एक आभास है। इसमें रेगिस्तान में दुर्लभ पानी दिखने का भाव है। ये आभास और भाव तो असली होते हैं, लेकिन पानी असलियत नहीं होता। मारीचिका आध्यात्मिक ढोंग नहीं, बल्कि भौतिक भ्रम है। ये वैसा ही दृष्टि-दोष है, जैसे दूर जाती रेल की समानान्तर पटरियाँ परस्पर नज़दीक आती हुई प्रतीत होती हैं। बिल्कुल ऐसे ही दृष्टि-दोष की काली छाया अभी ‘कोरोना-अनलॉक’ को लेकर देश पर मँडरा रही है। इसीलिए कोरोना को पुरी में रथयात्रा बर्दाश्त है, अयोध्या का शिला-पूजन बर्दाश्त है, भोपाल, इम्फाल और जयपुर में सरकारों का लुढ़कना-ढनकना बर्दाश्त है, लेकिन किसी भी किस्म के अनलॉक को ईद की सामूहिक नमाज़, मुहर्रम के जुलूस और संविधान बचाने वाले सीएए-एनआरसी आन्दोलन की सुगबुगाहट बर्दाश्त नहीं है।

कोरोना-काल के दौरान उत्तर भारत के मुसलमानों में अज़ीबो-ग़रीब हूक उठती रही हैं। उन्हें यहाँ-वहाँ से अपनी बिरादरी के साथ हो रहे भेदभावों की ख़ूब ख़बरें भी मिलीं। देश देख चुका है कि तब्लीगी जमात के नाम पर उठी नफ़रत की लपटों ने ठेले पर फल-सब्ज़ी बेचने वालों की मज़हबी की पहचान को कैसी प्रमुखता दिलायी। गाय के नाम पर लिंचिंग का नयी घटना को भी कोरोना नहीं टाल सका। दिल्ली के दंगों की पुलिसिया जाँच से कई बदरंग पन्ने भी फिज़ाँ में उड़ते देखे गये। ‘370’ की पहली पुण्यतिथि भी निपट गयी। लॉकडाउन की तकलीफ़ों और बेरोज़गारी के बावजूद जो ग़रीब जीवित रहे, उन्हें भी बाढ़ और अस्पतालों की दुर्दशा ने जमकर डुबोया। लेकिन अमीरों के आईपीएल को न सिर्फ़ डूबने से बचाया गया, बल्कि उसे ‘आत्मनिर्भर’ बनने के लिए ‘वोकल फॉर लोकल’ वाले गुरु-मंत्र से भी विशेष छूट दी गयी। आसार हैं कि स्वतंत्रता-दिवस की भाषणबाज़ी भी कतई फ़ीकी नहीं रहेगी।

लेकिन क्या उपरोक्त तमाम मिसालों को देखते हुए मुस्लिम समाज बराबरी की उम्मीद पाल सकता है? ये सही है कि आन्दोलनकारियों पर कभी दमनकारी सत्ता के बर्बर रवैये का ख़ौफ़ नहीं होता। लेकिन आन्दोलन की कमान थामने वालों को अपनी ताक़त और कमज़ोरियों का भी सही अहसास ज़रूर होना चाहिए। कोरोना से पहले चले आन्दोलन के तज़ुर्बों से सीखना भी बहुत ज़रूरी है। मसलन, उस आन्दोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि ये थी कि वो मुसलमानों की नागरिकता के सवाल से शुरू होकर संविधान बचाने की ओर घूम गयी। इसे शिक्षित और सेक्यूलर मुसलमानों से ज़्यादा इसी श्रेणी के हिन्दुओं और इनमें से भी ख़ासतौर पर युवाओं और महिलाओं का अद्भुत समर्थन मिला। सिर्फ़ इसी इकलौते पहलू से भगवा हुक़्मरानों के माथे पर बल पड़े।

फरवरी में दिल्ली विधानसभा के चुनाव हुए। दिसम्बर-जनवरी में हुक़्मरानों को अपनी ज़मीनी सच्चाई दिखने लगी थी। मेनस्ट्रीम मीडिया तो मुट्ठी में था लेकिन सोशल मीडिया ने नाक में दम कर रखा था। यही देख हुक़्मरानों को डर सताने लगा कि सेक्यूलर हिन्दुओं और मुसलमानों की एकजुटता यदि उसी रफ़्तार से बढ़ती रहती तो उनके लिए ‘मुश्किल-काल’ बहुत दूर नहीं रहता। इसी एकजुटता में सेंधमारी के लिए दिल्ली में दंगों की पटकथा लिखी गयी। नफ़रत और उन्माद फैलाने वाली भाषणबाज़ी के धारावाहिक चले। दंगों में पुलिस ने वही किया जो उसे हुक़्म मिला, ताकि ‘सबसे ज़्यादा अनुशासित और आज्ञाकारी संस्था’ वाला उसका सिंहासन अक्षुण्य रहे।

अब तो सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं में भगवा-समाजवाद आ चुका है। सभी ने पुलिसिया-संस्कारों को ही अपना आराध्य बना लिया है। विधान सिर्फ़ इतना है कि हुक़्म की तामील होगी, हर हाल में होगी, अवश्य होगी। बाक़ी संविधान की बातें जिन्हें करना है वो नक्कारख़ाने में तूती बजाते रहें। नये भारत में सबको इस आकाशवाणी पर यक़ीन करना होगा कि “पूर्वी लद्दाख में न तो कोई हमारी सीमा में घुस आया है, न ही कोई घुसा हुआ है और ना ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्ज़े में है।”

इसीलिए मुस्लिम समाज चाहे तो गाँठ बाँध लें कि उसकी किसी भी किस्म की एकता से हुक़्मरानों की सेहत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला। क्योंकि हुक़्मरानों को कपड़ों से पहचानने में महारत हासिल है। लिहाज़ा, शाहीन बाग़ की बहाली के लिए बेताब लोगों को पहचान के बजाय परिचय को तरजीह देना सीखना होगा। उन्हें समझना होगा कि पहचान तो दूर से ही हो जाती है जबकि परिचय के लिए नज़दीक या रूबरू आना पड़ता है। चन्दन-टीका, पगड़ी-टोपी, दाढ़ी-मूँछ, घूँघट-बुर्का, धोती-पजामा – ये सभी पहचान हैं, जबकि सेक्यूलर-कम्यूनल, कट्टर-उदार, जातिवादी-प्रगतिशील आदि परिचय हैं। इसी परिचय के साथ उन्हें जिन हिन्दुओं, युवाओं और महिलाओं का ज़ोरदार समर्थन मिला था, उसी ताक़त से वो मंज़िल पा सकते हैं।

अभी कोरोना के दौरान जिस स्तर का और जैसा ‘अनलॉक’ सामने आया है, उसमें संविधान बचाने की पैरोकारी करने वाले हिन्दुओं, युवाओं और महिलाओं की एकजुटता में मुश्किल होगी। इसीलिए अभी जोख़िम लेने का वक़्त नहीं है। थोड़ा और इन्तज़ार कर लेने में कोई हर्ज़ नहीं है। 15 अगस्त की बातें यदि सरककर 2 अक्टूबर हो जाए तो कोई आफ़त नहीं आ जाएगी। अबकी बार शाहीन बाग़ के आन्दोलनकारियों को संविधान के अलावा अर्थव्यवस्था की ऐतिहासिक दुर्दशा को भी अपने रडार में लेना होगा। इन्हें ये भी समझना होगा कि सरकार किसी भी कीमत पर अपने क़दम वापस नहीं खींचेंगी। वो ज़्यादा से ज़्यादा अपने क़दमों को आगे बढ़ाने का इरादा तब तक टालती रहेगी, जब तक कि उसका पतन न हो जाए। लेकिन इस दौरान आन्दोलनकारियों को हिंसा और हिरासत के उकसावों से भी ख़ुद को बचाना होगा। बीते एक साल में कश्मीर ने भारत, सेक्यूलरों और संविधान की दुहाई देने वालों को अनेक सबक दिये हैं। बहुसंख्यक समाज ने ताली-थाली और दीया-दिवाली के कई नज़ारे देश को दिखाये हैं। इसीलिए आन्दोलनकारियों को समझना होगा कि जो विरोधियों की ताक़त का सही अन्दाज़ा नहीं लगाते, वो विरोधियों का शिकार बनने के लिए अभिशप्त होते हैं। विरोधी जहाँ बात ख़त्म करना चाहते हैं, आन्दोलनकारियों को वहीं से बात शुरू करने की रणनीति अपनानी होगी। वर्ना, उनका सरकार का जाल में फँसना तय है।

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