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राजनीति को अपराधियों से बचाये बग़ैर नहीं बचेंगी बेटियां

पुलिस या न्यायिक सुधारों को लेकर देश या राज्यों में काँग्रेसी सरकारों ने अतीत में जैसी लापरवाही दिखायी, उसी का दंश मौजूदा काँग्रेसियों को ख़ून के आँसू रोकर भोगना पड़ रहा है। दमन और उत्पीड़न विरोधी क़ानूनों को संसद और विधानसभा में बनाने के बावजूद ज़मीनी हालात में अपेक्षित बदलाव इसीलिए नहीं हुआ क्योंकि वहाँ बदलते दौर की चुनौतियों से निपटने वाला पारदर्शी और जवाबदेह तंत्र मौजूद नहीं रहा।

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Rape Sexual Violence

हाथरस वाले निर्भया कांड ने एक बार फिर देश के सामने महिलाओं के प्रति होने वाला अपराध सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है। अतीत में भी अनेक बार ऐसा हो चुका है और भविष्य में तब तक होता रहेगा जब तक कि भारतीय समाज ‘राजनीति के अपराधीकरण’ के ख़िलाफ़ हल्ला नहीं बोलेगा, क्योंकि ‘बेटी बचाओ’ के लिए जैसे पुलिस और अदालती सुधारों की ज़रूरत है उसे राजनीति को अपराधियों से मुक्त किये बग़ैर कभी हासिल नहीं किया जा सकता। ऐसा हो नहीं सकता कि हमारे राजनीतिक कर्णधार ख़ुद तो अपराधी हों या आपराधिक पृष्ठभूमि वाले हों और समाज में चप्पे-चप्पे पर मौजूद उनके गुर्गे सदाचारी हों।

सारी दुनिया में यही सिद्धान्त लागू है कि अपराध की जड़ों पर हमला किये बग़ैर उसे मिटाया नहीं जा सकता। लेकिन जब मुख्यमंत्री बनते ही कोई ख़ुद के ख़िलाफ़ दर्ज़ गम्भीर अपराधों के मुक़दमों को पलक झपकते ख़त्म कर देगा तो पुलिस और अदालतों में इंसाफ़ क्या ख़ाक़ होगा! जब सैकड़ों-हज़ारों लोगों के क़त्ल के साज़िशकर्ता राजनीतिक सत्ता के शीर्ष पर होंगे, जब दिनदहाड़े और डंके की चोट पर हुए अपराधों के क़िरदार अदालत से बाइज़्ज़त बरी हो जाएँगी, जब सुप्रीम कोर्ट जैसे न्याय के सर्वोच्च मन्दिर में क़ानून के मुताबिक़ नहीं बल्कि जनभावनाओं के अनुसार इंसाफ़ बाँटा जाएगा तो ये उम्मीद बेमानी है कि देश गाँवों और शहरों में हमारी-आपकी बहन-बेटियाँ सुरक्षित रहेंगी।

बेक़ाबू अपराधों की समस्या किसी एक पार्टी से जुड़ी नहीं है। सभी का राज, जंगलराज जैसा ही है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े सिर्फ़ पत्रकारों और विपक्ष के लोगों का दिल दहलाते हैं। सत्ता प्रतिष्ठान का नहीं। उसे मालूम है कि सच तो आंकड़ों से भी कहीं ज़्यादा भयावह है। कभी-कभार ‘राजनीति’ की नौबत आ जाती है, वर्ना सबको अपनी सत्ता में ‘सब चंगा सी’ वाला मंत्र ही सटीक लगता है। इसीलिए भारतीय राजनीति को समझना होगा कि रोज़ाना के ‘निर्भया कांडों’ की रोकथाम तब तक असम्भव है जब तक पुलिस और अदालतों के दस्तूर में आमूलचूल बदलाव नहीं आएगा।

ऐसे बदलाव की पहली और सबसे बड़ी बाधा है ‘राजनीति का अपराधीकरण’, क्योंकि लोकतंत्र का ये स्थापित सत्य है कि हम जैसे लोगों को चुनते हैं, हमें वैसी ही सरकार मिलती है। जब तक हमारे राजनीतिक दल ‘राजनीति को अपराधीकरण’ से मुक्त करने और पुलिस तथा अदालती रिफ़ॉर्म यानी सुधार लाने के मुद्दे पर चुनाव नहीं लड़ेंगे तब तक हम चाहे किसी भी पार्टी की सरकार बनाते रहें, हमारे दिन नहीं फिरने वाले।

दरअसल, ‘जुमलेबाज़ी का ढोंग’ भारतीय समाज की शाश्वत और सनातन परम्परा रही है। यहाँ बातें तो होंगी ‘वसुधैव कुटम्बकम्’ और ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ की, लेकिन दुनिया को कुटुम्ब मानने का उपदेश देने वालों को न तो अल्पसंख्यक मुसलमान और मिशनरी बर्दाश्त होंगे और ना ही दलित समाज के लोग। इसी तरह, ये मानना निपट ढोंग और पाखंड है कि ‘जहाँ नारी पूज्यनीय होगी वहीं देवता रहेंगे’। नारियों को पूज्यनीय बताने वाले वैदिक जुमलों का ही आधुनिक संस्करण है ‘बेटी बचाओ’।

अरे! जिस परम्परा में देवी अहिल्या का सतीत्व हरने वाला सदियों से देवराज के आसान पर विराजमान हो, जहाँ नदियों को माता बताकर उनकी अस्मत तार-तार की जा रही हो, वहाँ ‘बेटी बचाओ’ से बड़ा ढोंग और क्या हो सकता है? इसीलिए आज भारत में छह महीने से लेकर छियासी साल तक की नारियाँ भी महफ़ूज़ नहीं रहीं। माना कि इन अपराधों को चन्द वहशी अंज़ाम देते हैं, लेकिन माता रूपी नदियों की दुर्दशा तो सारा का सारा समाज कर रहा है। इसके लिए भी क्या हम अँग्रेज़ों और तथाकथित विदेश आक्रान्ताओं को ज़िम्मेदार ठहरा सकते हैं?

अँग्रेज़ तो हमारी नदियों को ऐसा जहरीला नहीं बना गये, जैसी वो आज हैं। मुग़ल, तुग़लक, ख़िलज़ी वग़ैरह ने भी हमारी नदियों, जंगलों या पर्यावरण का सत्यानाश नहीं किया तो फिर आज़ादी के बाद हमने पूरी ताक़त से अपने पर्यावरण को लूटने-खसोटने का रास्ता क्यों चुना? एक पार्टी की नीतियों ने यदि सारा सत्यानाश किया तो दूसरी पार्टी की सत्ता ने सुधार क्यों नहीं किया? आज देश में कौन सी ऐसी अहम पार्टी है जिसने सत्ता-सुख नहीं भोगा है?

भारत का बहुसंख्यक हिन्दू समाज और ख़ासकर इसका बुर्ज़ुआ सवर्ण समाज ये साबित कर चुका है कि युगों के बदलने से भी सिर्फ़ हमारे जुमले ही बदलते हैं। हमारी उपमाओं का रस, भाव और अलंकार नहीं बदलता। वर्ना, समाज में नारियों के प्रति होने वाले अपराधों के अम्बार को देखकर क्या अब तक ये मान्यता स्थापित नहीं हो जाती कि उत्तर भारत में कहीं भी, किसी भी मन्दिर या मठ में देवताओं का प्रवास तो छोड़िए, नामोनिशान भी नहीं हो सकता। हमें साफ़ क्यों नहीं दिख रहा कि बेहतर भारतीय समाज या ‘नया भारत’ बनाने में हमारे धार्मिक स्थलों का न तो कोई ‘धार्मिक’ योगदान है और ना ही कोई ‘धार्मिक’ उपलब्धि।

बेहतर होता कि हम प्राणी जगत के अन्य जीवों की तरह नास्तिक ही रहते। कम से कम इंसान को इंसान तो समझते। हम देख चुके हैं कि मज़हबों ने इंसान को और क्रूर तथा वीभत्स ही बनाया है। राजनीति का अपराधीकरण भी इसी मानसिकता का अन्तिम संस्करण है। इससे उबरने के लिए ही ‘सभ्य समाज’ तथा ‘संविधान और क़ानून के राज’ की परिकल्पना की गयी थी। प्रमाणिक पुलिस और न्यायतंत्र इसी की अनिवार्य शर्त है। वर्ना, सब कुछ ‘एक्ट ऑफ़ गॉड’ ही बना रहेगा।

प्राचीन काल में सत्ता प्रतिष्ठान के शीर्ष का प्रतीक राजा या बादशाह, भेष बदलकर जनता का हाल जानने जाता था। क्योंकि मक़सद सच्चाई को जानने का था। आज बीजेपी को हाथरस में किसी का जाना पसन्द नहीं तो बंगाल में ममता को बीजेपी के खेल बर्दाश्त नहीं। अज़ब दस्तूर है! एक की ज़बरदस्ती, नैतिक और लोकतांत्रिक है तो दूसरे की अनैतिक और तानाशाहीपूर्ण। जब राजनीति ऐसे खोखले ढर्रों पर टिकी होगी तो नतीज़े भी खोखले ही मिलेंगे।

‘अन्धेर नगरी चौपट राजा’ वाली व्यवस्था में न्याय के लिए गले के अनुसार फन्दा नहीं बनाया जाता बल्कि फन्दे के साइज़ के मुताबिक़ गले को ढूँढा जाता है। न्याय के लिए सज़ा ज़रूरी है। लेकिन साफ़ दिख रहा है कि आधुनिक न्याय व्यवस्था में इसकी ज़रूरत ही नहीं रही। अपराध हुआ। जाँच हुई। गिरफ़्तारी हुई। ज़मानत मिली। मुक़दमा चला। सभी ससम्मान बरी किये गये। फिर फ़रमान जारी हुआ कि इसे ही न्याय कहो। न्याय समझो। चीख़-चीख़कर दुनिया को बताओ कि यही है असली ‘एक्ट ऑफ़ गॉड’। अब ये आपकी मर्ज़ी है कि आप चाहें तो इस ‘गॉड’ को निराकार ‘ऊपर वाला’ समझें या फिर साकार ‘प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री’। दोनों रास्ते एक ही ‘गॉड’ पर जाकर ख़त्म होते हैं।

एक देश के रूप में, एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में यदि हमें ‘भयमुक्त रामराज्य’ की कल्पना को साकार करना है तो सुपर हाईवे, हर घर में बिजली, शौचालय, 24 घंटा पानी, बुलेट ट्रेन, एयरपोर्ट, टनल, राफ़ेल और आत्मनिर्भर बनने जैसे तमाम आधुनिक और विश्वस्तरीय सुविधाओं वाले ‘विकास’ से पहले हमें ‘क़ानून के राज’ को स्थापित करके दिखाना होगा। पुलिस और अदालत को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर, इसमें सबसे अधिक निवेश करके और आमूलचूल सुधार लाकर ही हम समाज को जीने लायक और तरक्की करने के क़ाबिल बना पाएँगे।

हम देख चुके हैं कि राम मन्दिर, अनुच्छेद 370, नागरिकता क़ानून, तीन तलाक़, मनरेगा, सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार जैसे क्रान्तिकारी परिवर्तनों की बुनियाद पार्टियों के चुनावी घोषणापत्रों से ही आयी है। इसीलिए यदि हम भारत के आपराधिक परिदृश्य में बदलाव चाहते हैं तो हमें ऐसी राजनीतिक पार्टी को सत्ता सौंपना होगा जिसका सबसे पहला एजेंडा या चुनावी घोषणापत्र ‘पुलिस और न्यायिक क्रान्ति’ लाने का हो। इस मंत्र को सबसे पहले काँग्रेस को ही थामना होगा। उसे ही पुरखों का पाप धोने का संकल्प दिखाना होगा। क्योंकि भारत में राजनीति के अपराधीकरण के लिए सबसे पहली कसूरवार काँग्रेस ही है।

उत्तर भारत के अपराध-बहुल प्रदेशों में काँग्रेस की दशकों से क़ायम बेहद पतली हालत के लिए ऐतिहासिक ग़रीबी, पिछड़ापन, मनुवादी और सामन्तवादी व्यवस्थाओं से भी कहीं अधिक ज़िम्मेदार इनका चरमरा चुका पुलिस और न्याय-तंत्र है। महिलाओं की सुरक्षा या कथित जंगलराज के लिहाज़ से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब जैसे राज्यों के हालात में सिर्फ़ उन्नीस-बीस का ही फ़र्क़ है। इन राज्यों में काँग्रेसी सत्ता के दौरान पुलिस और अदालत का जो पतन हुआ वो अन्य पार्टियों की हुक़ूमत के दौरान सिर्फ़ कई गुना बढ़ा ही है, घटा कभी नहीं। क्योंकि अपराधीकरण के मोर्चों पर बाक़ी पार्टियाँ, दशकों पहले ही काँग्रेस को पटखनी दे चुकी हैं।

पुलिस या न्यायिक सुधारों को लेकर देश या राज्यों में काँग्रेसी सरकारों ने अतीत में जैसी लापरवाही दिखायी, उसी का दंश मौजूदा काँग्रेसियों को ख़ून के आँसू रोकर भोगना पड़ रहा है। दमन और उत्पीड़न विरोधी क़ानूनों को संसद और विधानसभा में बनाने के बावजूद ज़मीनी हालात में अपेक्षित बदलाव इसीलिए नहीं हुआ क्योंकि वहाँ बदलते दौर की चुनौतियों से निपटने वाला पारदर्शी और जवाबदेह तंत्र मौजूद नहीं रहा। यही वजह है कि पुलिस वालों के निलम्बन या तबादलों और यहाँ तक कि सरकारों के बदलने से भी पुलिस और कोर्ट के दस्तूर में कोई सुधार नज़र नहीं आया। ज़ाहिर है, राजनीति के अपराधीकरण को मिटाये बग़ैर हम सामाजिक अपराधों पर काबू पाने का लक्ष्य कभी हासिल नहीं कर सकते।

ज़रा हटके

कोविड-19 : मंदिरों को फिर से बंद करने की उठ रही मांग

पुरोहित मिश्रा ने केंद्र सरकार से अपील की है कि देश में कोरोना के मामले बढ़ने को ध्यान में रखते हुए देशभर के मंदिरों को अभी बंद ही रखा जाए, ताकि मंदिर कोरोना के प्रसार का वाहक न बने।

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Social Distancing in Temple

नई दिल्ली, 13 जून । देशभर में कोरोना वायरस से संक्रमण के मामले तेजी से बढ़ने का असर अब मंदिरों, मस्जिदों और गिरजाघरोंपर दिखने लगा है। दिल्ली में जामा मस्जिद को फिर से बंद कर दिया गया है। देश के कई भागों में भी मंदिरों को फिर से बंद करने या श्रद्धालुओं के प्रवेश पर रोक लगाने की मांग उठने लगी है।

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित गंगोत्री और यमुनोत्री धामों में पुजारियों के एक वर्ग ने मंदिरों में स्थानीय श्रद्धालुओं को दर्शन की अनुमति नहीं दिए जाने की मांग की है। पुजारियों ने चारधाम देवस्थानम् प्रबंधन बोर्ड के निर्णय का विरोध करते हुए कहा कि कोरोना वायरस का संक्रमण पूर्ण रूप से समाप्त होने तक किसी श्रद्धालु को धाम में प्रवेश नहीं करने दिया जाए।

यमुनोत्री मंदिर समिति ने साफ-साफ कहा है कि यमुनोत्री धाम के पुरोहित और पंडा समाज देवस्थानम बोर्ड के आदेश को तब तक नहीं मानेंगे, जब तक उत्तराखंड में कोरोना वायरस का संक्रमण पूर्ण रूप से खत्म नहीं हो जाता। वहीं दूसरी ओर गंगोत्री मंदिर समिति के तीर्थ पुरोहित भी देवस्थानम बोर्ड के उस फैसले का विरोध कर रहे हैं, जिसमें मंदिर में श्रद्धालुओं के प्रवेश की बात कही गई है।

aइधर हिमाचल से सटे और हरियाणा के प्रसिद्ध तीर्थस्थल आदि बद्री मंदिर को भी नहीं खोले जाने की मांग हो रही है। मंदिर के महंत फिलहाल इस मंदिर को बंद रखे जाने की मांग कर रहे हैं।

इस मुद्दे पर आदि बद्री मां मंत्रा देवी गोरक्षा समिति के अध्यक्ष विनय स्वरूप ने प्रशासन से कहा है कि मंदिर को फिलहाल बंद ही रखा जाए। उन्होंने प्रशासन के इस फैसले का भी विरोध किया है, जिसमें मंदिरों को अल्कोहल-युक्त सैनिटाइजर से सैनिटाइज किए जाने की बात कही गई है।

दिनेश स्वरूप ने यह भी कहा है कि मंदिरों को खोलकर मंदिरों के जरिये कोरोना बढ़ाने की तैयारी हो रही है। इस बावत उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी एक पत्र लिखा है, और गुजारिश की है कि मंदिर को खोले जाने के अपने फैसले पर फिर से विचार करें।

इस बीच झारखंड के देवघर स्थिति विश्व प्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ धाम को अभी भी नहीं खोला गया है। मंदिर लॉकडाउन के समय से ही बंद है। मंदिर के अंदर सिर्फ सरकारी पूजा नियमित हो रही है। मंदिर प्रशासन का मानना है कि जब तक देश में कोरोना के मामले सामान्य नहीं हो जाते, तब तक मंदिरों को श्रद्धालुओं के लिए नहीं खोला जाना चाहिए।

बैधनाथ धाम के तीर्थ पुरोहित बिहारी लाल मिश्रा कहते हैं कि बाबाधाम में कोरोना का प्रसार नहीं हो, इसलिए मंदिर को आम लोगों के लिए अभी नहीं खोला गया है। यहां तक कि विश्व प्रसिद्ध सावन मेले को भी पहली बार रद्द कर दिया गया है।

पुरोहित मिश्रा ने केंद्र सरकार से अपील की है कि देश में कोरोना के मामले बढ़ने को ध्यान में रखते हुए देशभर के मंदिरों को अभी बंद ही रखा जाए, ताकि मंदिर कोरोना के प्रसार का वाहक न बने।

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ज़रा हटके

दिल्ली के चिड़ियाघर में कोरोना से नहीं

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नई दिल्ली, 24 अप्रैल | दिल्ली के चिड़ियाघर में सफेद बाघिन कल्पना की मौत कोरोना वायरस के कारण नहीं हुई थी। बरेली के भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान(IVRI) से आई जांच रिपोर्ट में बाघिन की COVID-19 रिपोर्ट निगेटिव मिली है।

पर्यावरण मंत्रालय के प्रवक्ता ने बताया कि शाम को आईवीआरआई से बाघिन की कोविड 19 टेस्ट की रिपोर्ट मिली। इसके बाद सभी आशंकाएं खत्म हो गईं हैं। दरअसल बीते मंगलवार को बाघिन कल्पना की सेहत खराब हो गई थी। वहीं अगले दिन बुधवार को उसकी मौत हो गई। डॉक्टरों और चिड़ियाघर प्रशासन ने किडनी फेल होने और उम्र अधिक होने से मौत के पीछे वजह बताई थी।

हालांकि बाघिन में कोरोना वायरस के किसी तरह के लक्षण नहीं दिखे थे। फिर भी चिड़िया घर प्रशासन ने ब्लड सैंपल लेकर जांच के लिए बरेली के भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) को भेजा था। शुक्रवार की शाम आईवीआरआई ने रिपोर्ट भेज दी। पर्यावरण मंत्रालय के प्रवक्ता ने आईएएनएस को बताया कि बाघिन की कोविड 19 रिपोर्ट निगेटिव मिली है।

बता दें कि वर्ष 2008 में ओडिशा के नंदन कानन में कल्पना बाघिन का जन्म हुआ था। वहां से एक बाघ विजय के साथ कल्पना को दिल्ली के चिड़ियाघर लाया गया था। दिल्ली के चिड़ियाघर में इस बाघिन ने सात बच्चो को जन्म दिया था। बीते मंगलवार को बाघिन का स्वास्थ्य खराब होने के बाद टाइगर विशेषज्ञ एपी श्रीवास्तव की भी वीडियो कॉल से मदद ली गई थी। तीन अन्य चिकित्सक इलाज में लगे थे। मगर बाघिन को नहीं बचाया जा सका था।

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ज़रा हटके

उत्तर प्रदेश: हेड कांस्टेबल ने सीनियर को डंडे से पीटा

आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के तहत और एक लोक सेवक पर हमला करने के आरोप में पुलिसकर्मी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।

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सीतापुर (उत्तर प्रदेश), 22 अप्रैल | एक हेड कांस्टेबल ने सीनियर सब-इंस्पेक्टर (एसएसआई) पर मंगलवार को सीतापुर जिले में डंडे से हमला कर दिया। पुलिस ने इस बात की जानकारी दी। वरिष्ठ अधिकारी के पिटाई की यह घटना मंगलवार की है। हेड कांस्टेबल को निलंबित कर उसके खिलाफ जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र में एक प्राथमिकी दर्ज की गई है।

घटना के कुछ घंटों के बाद ही इससे जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसमें हेड कांस्टेबल वरिष्ठ पुलिसकर्मी को डंडे से मारता दिखाई दे रहा है।

सीतापुर के पुलिस अधीक्षक (एसपी) एल.आर. कुमार ने कहा, “घटना कोतवाली नगर इलाके में आरएमपी तिराहे की है। एसएसआई रमेश चौहान ने लॉकडाउन के दौरान सही चेकिंग नहीं करने के लिए हेड कांस्टेबल रामाश्रय को डांटा, जिसके बाद पुलिसकर्मी उत्तेजित हो गया और उसने अपने सीनियर पर कई बार लाठी से हमला किया।”

एसपी ने कहा, “कोतवाली थाना क्षेत्र में तैनात रमेश चौहान मंगलवार सुबह राउंड पर निकले और उन्होंने हेड कांस्टेबल रामाश्रय को एक कुर्सी पर बैठा पाया। बैरिकेड्स पर चेकिंग का संचालन ठीक से करने के लिए कहने पर उन्हें उनके जूनियर ने डंडे से पीटना शुरू कर दिया।”

आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के तहत और एक लोक सेवक पर हमला करने के आरोप में पुलिसकर्मी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।

एसपी ने यह भी कहा कि रामाश्रय के खिलाफ एक विभागीय कार्रवाई भी की जाएगी।

अधिकारी ने कहा, “उसे या तो बर्खास्त कर दिया जाएगा या उसे उसकी रैंक से डिमोट कर दिया जाएगा।”

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