क्या दिल्ली के लिए केजरीवाल के विज्ञापन 'अमानत में ख़यानत' नहीं हैं…? | WeForNewsHindi | Latest, News Update, -Top Story
Connect with us

ब्लॉग

क्या दिल्ली के लिए केजरीवाल के विज्ञापन ‘अमानत में ख़यानत’ नहीं हैं…?

Published

on

By:मुकेश कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

11 महीने पहले दिल्ली ने अपनी अमानत (धरोहर) अरविन्द केजरीवाल को सौंपी. सोचा था कि अब केजरीवाल ही दिल्ली को पिछली सरकारों और पार्टियों के ‘भ्रष्टाचार’ से उबारेंगे. क्योंकि ‘भ्रष्टाचार’ ही केजरीवाल का सबसे बड़ा मुद्दा था. लेकिन ‘भ्रष्टाचार’ शब्द की महिमा बड़ी निराली है. ‘हरि अनन्त, हरि कथा अनन्ता’ की तरह. ये ‘भ्रष्ट’ यानी अनैतिक और ‘आचार’ यानी आचरण की सन्धि से बना शब्द-युग्म है. ‘अनैतिक’, सिर्फ़ रिश्वतख़ोरी नहीं है. ऐसा हरेक व्यवहार ‘अनैतिक’ है, जो नीति-सम्मत नहीं है. ‘नीति’ का अर्थ है ‘जन-कल्याणकारी’. यानी, हरेक ऐसा काम जो जनता का कल्याण नहीं करे, वो अनीति है, भ्रष्ट है. इसका एक और मतलब है कि यदि आचरण ऐसा है जो नीति के मुताबिक ‘अनापेक्षित’ है, तो वो भी भ्रष्ट ही है. मसलन, यदि अध्यापक, विद्यालय में नहीं पढ़ाये तो ये उसका भ्रष्टाचार ही है.

अब बात, केजरीवाल के जगज़ाहिर भ्रष्टाचार की. केजरीवाल ने सत्ता के अहंकार में अपनी सरकार के प्रचार बजट को सालाना 24 करोड़ रुपये से बढ़ाकर सीधे 526 करोड़ रुपये पर पहुँचा दिया. ये जनता का पैसा है. जनता ने उन्हें अपना भाग्य-विधाता बनाकर दिल्ली की गद्दी सौंपी थी. जनता ने ऐसा उस प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर अविश्वास करके किया था, जिस पर उसने महज नौ महीने पहले ही अपना पूर्ण विश्वास लुटाया था. दिल्ली की सातों सीटें बीजेपी की झोली में डालकर मोदी की राष्ट्रीय ताजपोशी में अपना शत-प्रतिशत योगदान दिया था. लेकिन नौ महीने में दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटें केजरीवाल के हवाले करके जनता ने मोदी को दिये शत-प्रतिशत समर्थन का तक़रीबन सफ़ाया ही कर दिया था.

ऐसे ऐतिहासिक जनादेश की बदौलत सत्तासीन होते ही अरविन्द केजरीवाल पर अहंकार हावी हो गया. हालाँकि, जनादेश पाते ही उन्होंने सबसे पहली दुआ यही माँगी थी कि भगवान मुझे अहंकार से दूर रखना. अभी तक उनकी दुआ क़बूल नहीं हुई है. क्योंकि दुआ सिर्फ़ माँगने से पूरी नहीं होती. उसके लिए माकूल व्यवहार भी करना पड़ता है. जनता के 526 करोड़ रुपये को अपने ‘सगुण प्रचार’ के लिए इस्तेमाल करना किसी भी तरह से माकूल व्यवहार नहीं माना जा सकता. उनके विज्ञापनों को सुनकर दिल्ली वालों के कान पक चुके हैं. उनकी अच्छी बातें भी झुँझलाहट पैदा करती हैं. विज्ञापनों की ‘बमबारी’ से उनके प्रशंसकों में भी चिड़चिड़ापन काफ़ी बढ़ गया है. एक ही बात का धड़ाधड़ होने वाला री-प्ले सुनते ही लोगों के मुँह से उनकी तारीफ़ नहीं बल्कि अपशब्द निकलते हैं.

मुख्यमंत्री का ऐसा आचरण क्या किसी भ्रष्टाचार से कम है? इस भ्रष्टाचार में भी तो दिल्ली की जनता की वही ख़ून-पसीने की कमाई स्वाहा की जाती है, जिसे काँग्रेस और बीजेपी के घोटालों के रूप में दिल्लीवासी झेलते रहे हैं. साफ़ है कि सरकार के प्रचार बजट को सालाना 24 करोड़ रुपये से बढ़ाकर सीधे 526 करोड़ रुपये पर पहुँचाना भी किसी घोटाले से कम नहीं है. दिल्ली भूली नहीं है कि शीला दीक्षित सरकार पर भी अपना प्रचार करने के लिए जनता के पैसों की चपत लगाने का बहुत संगीन आरोप लगा था. अदालत से उन्हें इसके लिए फ़टकार और सज़ा भी मिली थी. लेकिन क्या वैसा ही काम अब केजरीवाल सरकार नहीं कर रही है? क्या पोशाक बदल लेने से व्यक्तित्व भी बदल सकता है? दुनिया से सवाल पूछने वाले युग-पुरुष केजरीवाल से सवाल भला कौन कर सकता है?

केजरीवाल के सरकारी विज्ञापनों की बदौलत धड़ल्ले से आम आदमी पार्टी की चहेती प्रचार कम्पनियों को मलाई ख़िलायी जा रही है. ये केजरीवाल सरकार का जीता-जागता घोटाला है. जनता इसे टीवी पर दिन-रात देख रही है. एफ़एम रेडियो पर हर वक़्त सुन रही है. केजरीवाल ने ‘अति-विज्ञापनबाज़ी’ के इस खेल को जिस अन्दाज़ से खेला है, उसने सिर्फ़ यही साबित किया है कि ‘समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं.’ इसे ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली अदा भी कह सकते हैं. यही केजरीवाल का विशुद्ध अहंकार भी है. केजरीवाल ने सरकारी ख़ज़ाने पर कम से कम 500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ डाला है. इसका भी सीएजी (नियंत्रक और महालेखाकार परीक्षक) से ऑडिट होना चाहिए. क्योंकि सरकारी रक़म के जायज़-नाजायज़ ख़र्च की समीक्षा (Performance Audit) करने का अधिकार सिर्फ़ सीएजी के पास है, जो एक संवैधानिक संस्था है.

सरकारी विज्ञापनों की सुनामी लाने वाले अरविन्द केजरीवाल के कुतर्क भी बड़े शानदार हैं. उनका कहना है कि दिल्ली के कुल बजट यानी 41,129 करोड़ रुपये में से वो महज डेढ़ फ़ीसदी रक़म ही तो सरकार के कामकाज और उसकी नीतियों के प्रचार के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. एक नज़र से डेढ़ फ़ीसदी का अनुपात मामूली लग सकता है. लेकिन जब 526 करोड़ रुपये की तुलना सरकार की उन योजनाओं से की जाती है, जिनकी जन-कल्याण में कहीं बड़ी भागीदारी है, तो तस्वीर का दूसरा रूप ही नज़र आता है. मसलन, केजरीवाल ने अपने बजट में दलित और कमज़ोर तबक़ों के कल्याण के लिए 338 करोड़ रुपये, कुपोषण का मुक़ाबला करने के लिए 350 करोड़ रुपये, मज़दूरों के कल्याण के लिए 208 करोड़ रुपये और झुग्गी बस्तियों के विकास के लिए 400 करोड़ रुपये रखे थे.

क्या इन आँकड़ों से ये साबित नहीं होता कि केजरीवाल सरकार की प्राथमिकताओं में ‘विज्ञापन और प्रचार’ का कितना ऊँचा स्थान है? हर विज्ञापन जो जनता को दिखाया, सुनाया और पढ़ाया जाता है, उसके पीछे जनता के ही करोड़ों रुपये की बलि चढ़ायी जाती है. विज्ञापनों के बजट से ही तरह-तरह के अभियानों में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं को ‘वॉलिन्टियर्स’ के नाम पर सींचा जाता है. 526 करोड़ रुपये की अहमियत इसलिए भी बहुत है, क्योंकि इसने दिल्ली के विकास पर ख़र्च होने वाली रक़म का पेट काटा है. रोज़ाना के हिसाब से देखें तो ये रक़म 1.44 करोड़ रुपये बैठती है. मतदाताओं के हिसाब से देखें तो दिल्ली का हरेक शख़्स अपने मुख्यमंत्री के प्रचार पर हर रोज़ एक रुपये खर्च करता है. क्या ये फ़िजूलखर्ज़ी नहीं है? क्या ये किसी आम आदमी के लिए विलासिता का नया शौक़ नहीं है?

कल्पना कीजिए कि 526 करोड़ रुपये की जगह यदि ये बजट पिछले वर्षों के अनुपात में होता तो उसका क्या असर पड़ता? दिल्ली में सरकारी प्रचार के लिए शीला दीक्षित सरकार ने 2014-15 के लिए 23.7 करोड़ रुपये रखे थे. जबकि 2013-14 के लिए 25 करोड़ रुपये, 2012-13 के लिए 24.9 करोड़ रुपये और 2011-12 के लिए 27.6 करोड़ रुपये रखे गये थे. साफ़ है कि पिछले वर्षों के अनुपात में यदि सरकार ने 500 करोड़ रुपये कम रखे होते तो उससे दिल्ली में एक फ्लाई ओवर बनाया जा सकता था. या, कितने ही स्कूल की तस्वीर बदली जा सकती थी. या, कितनी बसें ख़रीदकर दिल्ली की परिवहन व्यवस्था को सुधारा जा सकता था. यही ‘ख़यानत’ यानी बेईमानी है, धोखा है, छलावा है.

मज़े की बात ये है कि ‘ख़यानत’ के लिए बड़े ही शातिर तरीक़े से सुप्रीम कोर्ट के उन निर्देशों की भी धज़्ज़ियाँ उड़ायी जा रही हैं, जिसमें नेताओं को सरकारी ख़र्चे पर अपनी तस्वीरें नहीं दिखाने के लिए कहा गया है. इत्तेफ़ाक से आवाज़ को लेकर कोई कोर्ट ने ऐसी कोई बन्दिश नहीं लगायी. लिहाज़ा, केजरीवाल सरकार अपनी सहूलियत से क़ानून के शब्दों से खेल रही है. वो बेहद बेईमानीपूर्वक और जानबूझकर क़ानून की भावना की खिल्ली उड़ा रहे हैं. क्योंकि ‘दिल्ली के लोग बहुत अच्छे हैं.’ उन्हें अपने से भी अच्छा मुख्यमंत्री जो मिला है. अद्भुत और विलक्षण. दिल्ली वाले नहीं जानते कि वो किस मिट्टी का बना है. ऐसे में ये सवाल उठना लाज़िमी है कि आख़िर क्यों केजरीवाल ऐसा कर रहे हैं? इससे उन्हें क्या हासिल हो रहा है?

केजरीवाल, बहुत सयाने हैं. हर तरह की तिकड़म के महारथी हैं. अपनी शर्मनाक विज्ञापन नीति की बदौलत ही आज उन्हें और उनकी आवाज़ को देश का बच्चा-बच्चा भी पहचानने लगा है. ये उनकी ब्रॉन्डिंग का क़माल है जिसने उन्हें दिल्ली से उठाकर देश के राजनीतिक मंच पर एक कद्दावर हस्ती के रूप में स्थापित कर दिया है. बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ और यहाँ तक कि राजनेता भी इसके लिए करोड़ों रुपये बहाते हैं. मीडिया कुछ हस्तियों को उनके कारनामे की वजह से सुर्ख़ियों में रखती है. लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जो ‘एयर टाइम’ ख़रीद लेते हैं. ये भी ‘पेड मीडिया’ का ही एक विद्रूप चेहरा है. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि इसका बोझ दिल्लीवासियों को उठाना पड़ रहा है. कहीं ये केजरीवाल को भारी बहुमत से सत्ता में बिठाने की सज़ा तो नहीं.

ब्लॉग

लौंगी भुइंया से दशरथ मांझी बनने की पूरी कहानी

लौंगी भुइंया के साथ के लोग शायद अब उनके साथ न हों पर आने वाली उस गाँव की पीढ़ी “लौंगी भुइंया” का हमेशा शुक्रगुज़ार रहेगी।

Published

on

Longi Bhuiyan

अभी हाल ही में महामारी के दौरान आप सभी को पता लगा… की लोग शहर छोड़ अपने-अपने गाँव लौट रहे है। और उनमें जो मजदूर थे वो ज़्यादातर बिहार से ताल्लुक रखते थे। ख़ैर ये तो बात थी उनके लौटने की।उनके अपने गाँव छोड़ शहर जाने की कहानी भी बहुत लम्बी है …पर उसके बारे में बात फिर कभी।

फिलहाल उन्हीं लम्बी कहानियों में से एक कहानी हैं, बिहार के “गया” ज़िले की राजधानी पटना से 200 किमी दूर बांकेबाज़ार प्रखंड की कहानी हैं।

यहाँ पर रहने वाले लोगों की ज़िन्दगी खेती पर ही निर्भर हैं और खेती निर्भर है पानी पर… यानी सिंचाई पर। और यहीं से शुरू होती है यहाँ पर रहने वाले लोगों के संघर्ष की कहानी।

यहाँ के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। मगर धान और गेहूं की खेती के लिए जो पानी उन्हें चाहिए था उस पानी और वहाँ रहने वालों के बीच जो सबसे बड़ा रोड़ा था वो था एक “पहाड़” ।

और यहीं से शुरू होती है देश के दूसरे दशरथ मांझी लौंगी भुइंया की कहानी।

पानी की किल्लत की वजह से वहां से लोगों का पलायन शुरू हुआ, और पलायन का असर उनके घर तक आ पहुंचा।

यहाँ तक की उनके खुद के बेटों ने भी वो गाँव छोड़ दिया। फिर एक दिन हुआ यूँ की लौंगी भुइंया उसी पहाड़ पर बकरी चरा रहे थे की अचानक उनको ख्याल आया की अगर ये पहाड़ तोड़ दिया जाए तो पलायन रुक सकता है।

उस दिन उस ख्याल ने उन्हें ढंग से सोने नहीं दिया। उनकी पत्नी ने भी उनसे कहा की…. ये तुमसे नहीं हो पायेगा । पर लौंगी भुइंया को अपनी ज़िद्द के आगे कुछ समझ नहीं आया।
फिर क्या था…. फावड़ा उठाया और चल दिया पहाड़ तोड़ने।

30 साल अकेले फावड़े और दूसरे औज़ारों से उन्होंने आज 3 किमी लम्बी नहर खोद डाली और पानी गाँव तक पहुंचा दिया। इस साल पहली बार उनके गाँव तक बारिश का पानी पहुंचा और इसी वजह से आसपास के तीन गाँव के किसानों को भी इसका लाभ मिल रहा हैं। लोगों ने इस बार धान की फसल भी उगाई है। पर अफ़सोस की अब तक गाँव के कई लोग दूसरे शहरों में पलायन कर चुके हैं।

लौंगी भुइंया के साथ के लोग शायद अब उनके साथ न हों पर आने वाली उस गाँव की पीढ़ी “लौंगी भुइंया” का हमेशा शुक्रगुज़ार रहेगी।

लौंगी भुइंया कहते हैं “हम एक बार मन बना लेते हैं तो पीछे नहीं हटते। अपने काम से जब फुर्सत मिलता हम नहर काटने में लग जाते।

हमारी पत्नी कहती थी की तुमसे नहीं हो पायेगा…. लेकिन मुझे लगता था की हो जायेगा।

Continue Reading

ब्लॉग

कांग्रेस की बीमारियां उन्हें क्यों सता रहीं जिन्होंने इसे वोट दिया ही नहीं?

Published

on

Sonia Gandhi and Rahul

मध्यम वर्गीय, शिक्षित, खाते-पीते लोगों और ख़ासकर सवर्णों के बीच कांग्रेस की चिर परिचित बीमारियां अरसे से आपसी चर्चा का मुद्दा बनती रही हैं। लेकिन मज़े की बात तो ये है कि ऐसा अनायास नहीं है। बल्कि बाक़ायदा, सुविचारित रणनीति के तहत ऐसा करवाया जा रहा है। इसे संघ के ‘डैमेज़ कंट्रोल एक्सरसाइज़’ की तरह देखा जा सकता है। इसकी कई वजहें साफ़ दिख रही हैं। संघ को स्पष्ट ‘फ़ीडबैक’ मिल रहा है कि मोदी सरकार की लोकप्रियता में पलीता लगा हुआ है। कोरोना को दैवीय प्रकोप यानी ‘एक्ट ऑफ़ गॉड’ बताने का खेल जनता को हज़म नहीं हो रहा।

औंधी पड़ी अर्थव्यवस्था ने उन करोड़ों लोगों की आँखें भी खोल दी हैं जो ख़ुद को भक्त कहे जाने पर गर्व महसूस करते थे। अब लोगों को अच्छी तरह समझ में आने लगा है कि मोदी सरकार और इसके रणनीतिकार देश को आर्थिक दलदल से बाहर नहीं निकाल सकते। इनके पास ऐसी दृष्टि ही नहीं है। क़ाबिलियत ही नहीं है। ये जितना नुकसान कर चुके हैं, उसकी भरपाई कभी नहीं कर पाएँगे। बोलचाल की भाषा में इसे ही कहते हैं, ‘इनसे ना हो पाएगा!’

दूसरी तरफ, राजनीति में दिलचस्पी रखने वाला हर शख़्स जानता है कि कांग्रेस बीमार है। कई सालों से बीमार है। बीमारी को गम्भीर भी बताया जाता है। हालांकि, कांग्रेसियों को पता है कि उनकी पार्टी में क्या-क्या बीमारियां हैं और वो कितनी गम्भीर हैं? वो बीमारियों के इलाज से भी वाक़िफ़ हैं और अच्छी तरह जानते भी हैं कि इलाज कब और कैसे किया जाना है? इलाज कितना कामयाब रहेगा, इसे लेकर भी वो कोई ख़ुशफ़हमी नहीं पालना चाहते।

कांग्रेस की इन सारी बातों में कोई ख़बर नहीं है। जबकि ख़बर के अन्दर की ख़बर तो ये है कि कांग्रेस की बीमारियों को लेकर, उसके परिवारवाद और वंशवाद को लेकर, तमाम योजनाओं और भवन-मार्ग वग़ैरह के नाम नेहरू-गाँधी परिवार के लोगों के नाम पर आधारित क्यों है, इन बातों को लेकर सबसे ज़्यादा परेशानी उन लोगों को सता रही है जिन्होंने 2019 और 2014 में कांग्रेस को वोट नहीं दिया था। इस परेशानी की असली वजह है मोदी सरकार का कामकाज और इसका प्रदर्शन। क्योंकि अब मध्यम वर्ग की आँखें खुलने लगी हैं। उसे ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे’ का रोज़ाना अहसास हो रहा है। इसीलिए उसे भरमाने के लिए संघियों के दुष्प्रचार वाले सिस्टम ने भी अपने घोड़े खोल दिये हैं।

दरअसल, मध्यम वर्ग बेहद मायूस है। इतना कि उसे अब मौनी मनमोहन सिंह के दिनों की याद बहुत ज़्यादा सताने लगी है। इसे सोनिया-राहुल भी अब पहले जितने ‘घटिया और पतित’ नहीं लग रहे। मोदी जी के भाषण अब इसे भरमा नहीं पा रहे, क्योंकि इनकी बातों, नये-नये मंत्रों तथा जुमलों से उनका मोहभंग होने लगा है। इसने कोरोना काल के 21 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की सच्चाई को क़रीब दे देख लिया है। इसकी समझ में आ गया है कि चीन को लेकर प्रधानमंत्री ने कैसे देश को गुमराह किया।

मध्यम वर्ग को तो 2016 की नोटबन्दी की लम्बी लाइनों से लेकर अब तक के तमाम अनुभवों की एक-एक बात याद आ रही है, क्योंकि तब से अब तक आर्थिक मोर्चों पर इसके हाथ लगातार सिर्फ़ बुरी ख़बरें ही आयी हैं। राम मन्दिर, 370 और तीन तलाक़ जैसे फ़ैसलों से इसे मिली ख़ुशी अब काफ़ूर हो चुकी है। कोरोना में इसने सरकारी दावों और विकास के स्तर की हक़ीक़त को भी बहुत क़रीब से देख लिया है।

छंटनी, बेरोज़गारी और गिरती आमदनी का आलम हर घर में मौजूद है। नयी नौकरियों का कहीं कोई अता-पता नहीं है। यहां तक कि जिन युवाओं को किसी-किसी नौकरी के लिए चुन लिया गया था, उनकी ज्वाइनिंग भी टल चुकी है। आर्थिक आँकड़ों ने कम शिक्षित लोगों को भी ज्ञानवान बना दिया है। ग़रीब तो बुरी तरह से टूटे हुए हैं। सरकारें जो कह और कर रही हैं, उससे उन्हें ढांढस नहीं मिल रहा।

पेट्रोल-डीज़ल के रोज़ाना उछल रहे दामों को लेकर भी जनता में बेहद गुस्सा है। इसने सबका जीना और दुश्वार बना रखा है। जनता को अब विपक्ष वाली उस बीजेपी की बहुत याद सता रही है जो सड़कों पर उतरकर तरह-तरह की ड्रॉमेबाज़ी के ज़रिये मनमोहन सरकार के नाम में दम करके रखती थी। विपक्ष वाली बीजेपी बहुत संगठित थी। उसके पीछे संघ की ताक़त थी। जबकि विपक्ष वाली कांग्रेस ख़ुद ही बहुत लुंज-पुंज है। कई बीमारियों से ग्रस्त है। अपनी सेहत को सुधारने के लिए जो किया जाना चाहिए, उसे भी करती नज़र नहीं आ रही।

मध्यम वर्ग को लगता है कि कांग्रेस वैसे संघर्ष करती नज़र क्यों नहीं आ रही, जैसे विपक्ष वाली बीजेपी किया करती थी? ये सहज प्रश्न घर-घर की चर्चा में स्थान पा रहा है। बात यहां आकर ख़त्म होती है कि राहुल-प्रियंका वग़ैरह से कुछ नहीं हो पाएगा। संघ इसी माहौल को भुनाना चाहता है। इसी मंत्र को फैलाना चाहता है कि कांग्रेस को जनता याद चाहे जितना करे, लेकिन पसन्द बिल्कुल न करे। राजनीति का ये स्वाभाविक व्यवहार भी है। इसीलिए, मौजूदा हालात से मायूस लोग जब भी विकल्प की बातें करते हैं, तो उन्हें ‘टीना फैक्टर’ यानी There is no alternative (TINA) की याद दिलायी जाती है।

मायूस मध्यम वर्ग को बताया जाता है कि कांग्रेस तो ठीक है, लेकिन इसका नेता कौन है, इसका पता ही नहीं है। राहुल गांधी का तो इतना चरित्र हनन किया जा चुका है कि उन्हें लोग विकल्प मान ही नहीं पाते। हालांकि, इसके लिए वो ख़ुद भी कोई कम कसूरवार नहीं हैं। लेकिन एक हक़ीक़त और भी है कि कांग्रेस में इन्दिरा गांधी के बाद जनता की नब्ज़ को पकड़कर सड़क पर संघर्ष करने वाला दूसरा बड़ा नेता नहीं हुआ। राजीव और सोनिया ने कांग्रेस को उबारने के लिए जैसे काम किए, कमोबेश वैसे ही आज भी हो रहा है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि आज जनता और ख़ासकर मध्यम वर्ग की अपेक्षाएं काफ़ी बदल चुकी हैं।

‘अपेक्षाओं के इस बदलाव’ को पैदा करने में संघ के नये-पुराने दुष्प्रचार तंत्र ने कमाल का प्रदर्शन किया है। वर्ना, विरोधी तो हमेशा ही चरित्र हनन और लांछन का सहारा लेते ही रहे हैं। सभी पार्टियाँ यही करती हैं। क्योंकि ये राजनीति का अहिंसक हथियार है। इसके बावजूद अभी संघ की बेचैनी थोड़ी ज़्यादा है। बिहार के चुनाव जो सामने हैं। वहाँ भी नीतीश से टीना फैक्टर को जोड़ने का ही खेल चल रहा है। जनमानस की ख़ुशी या नाराज़गी को फैलने नहीं दिया जा रहा, क्योंकि मेनस्ट्रीम मीडिया मर चुका है। जनता अब सच्चाई को जानकर अपनी राय नहीं बना रही, बल्कि उसे व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी के कंटेंट से ही ज्ञानालोकित किया जा रहा है।

कांग्रेस भी जानती है कि अगर अपनी बीमारियों से उबर भी गयी तो भी बीजेपी को खुले अखाड़े में अपने बूते चित नहीं कर पाएगी। संघ की अफ़ीम ने बीजेपी को अपराजेय बना दिया है। लेकिन संघ अच्छी तरह जानता है कि जब जनता का गुस्सा फूटेगा तो वो ये देखकर वोट नहीं करेगी कि मोदी का विकल्प कौन है? बल्कि ये सोचकर वोट डालेगी कि ‘कोई भी आये, लेकिन मोदी तो नहीं चाहिए!’

ये वही मनोदशा है, जिसने 2014 में कांग्रेस की मिट्टी-पलीद की थी और इतिहास में पहले बार ग़ैर-कांग्रेसी पूर्ण बहुमत वाली सरकार के सत्ता में आने का रास्ता खुला था। जब जनमानस में ये राय बन गयी थी कि अबकी कांग्रेस को वोट नहीं देना है। इसीलिए कांग्रेस मुक्त होने के कगार पर जा पहुंची। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री समेत संघ के रणनीतिकारों को जनता के मनोविज्ञान के इसी पहलू का ख़ौफ़ सता रहा है।

मुमकिन है कि अगले कैबिनेट विस्तार में वित्त मंत्रालय की ज़िम्मेदारी किसी और को थमाकर निर्मला सीतारमन को बलि का बकरा बना दिया जाए। राजनीति में ऐसे नुस्ख़ों को आसान उपायों की तरह देखा जाता है। इसे पार्टी और संघ ऐसे पेश करेंगे कि मोदी जी तो अद्भुत हैं ही, वित्त मंत्री ही नाक़ाबिल थीं, इसलिए उन्हें बदल दिया गया। अब देखना सब ठीक हो जाएगा। राजनीति ऐसे ही नुस्ख़ों का खेल है। यही वजह है कि संघ को कांग्रेस की बीमारी में भी अपने लिए नुस्ख़ा ही नज़र आ रहा है। इसमें ग़लत भी कुछ नहीं है।

उधर, कांग्रेस का सीधा सा मंत्र है कि वो सत्ता में लौटगी या नहीं, ये चुनौती उसकी नहीं बल्कि जनता की है। लिहाज़ा, जान झोंकने से क्या फ़ायदा! इसीलिए कांग्रेस को आप कभी सत्ता में वापसी के लिए वैसे जान झोंकता हुआ नहीं देखेंगे जैसा संघ-बीजेपी कुशलता से किया करती हैं। कांग्रेस आपको कभी संघ की तरह पूरी ताक़त से चुनाव लड़ती हुई भी नहीं नज़र आएगी।

इसके क्षेत्रीय नेता जैसे शरद पवार, ममता बनर्जी, जगन मोहन रेड्डी और चन्द्र शेखर राव भले ही ऐसा करते दिखें, लेकिन शीर्ष नेतृत्व सड़क पर उतरकर पसीना नहीं बहाने वाला। इसे आसानी से समझने के लिए ग़ालिब के एक शेर में ज़रा छेड़-छाड़ करके देखें, तो एक लाइन में सब समझ में आ जाएगा कि ‘हमको उनसे (वफ़ा) संघर्ष की है उम्मीद, जो नहीं जानते (वफ़ा) संघर्ष क्या है!’

Mukesh Kumar Singh मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

Continue Reading

ओपिनियन

संविधान बचाने से ज़्यादा ज़रूरी है इसके आन्दोलनकारियों को बचाना

Published

on

bengaluru-protest-dec-17-afp
Students and activists take part in a protest against India's new citizenship law in Bangalore on December 17, 2019 , AFP

सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद प्राचा के हवाले से शाहीन बाग़ वाले संविधान बचाओ आन्दोलन को जल्द बहाल करने की सुगबुगाहट है। इसी तर्ज़ पर क्या सोशल-डिस्टेसिंग का जोख़िम उठाकर 30 अगस्त को मुहर्रम का जुलूस निकालने की इजाज़त माँगने, देने या नहीं देने को लेकर कहीं तनाव के हालात तो नहीं बन जाएँगे? ऐसे दौर में जब रोज़ाना करीब 65 हज़ार कोरोना पॉज़िटिव के मामले सामने रहे हों, जब स्कूल-कॉलेज निलम्बित हों और रेल-सेवा असामान्य हो, जब मैट्रो-सेवा शान्त हो, होटल-रेस्टोरेंट बन्द हों, जब मॉस्क अनिवार्य हो, तब क्या ऐसी बातें होना ठीक है कि जल्द ही ‘शाहीन बाग़’ की बहाली होगी? संविधान बचाओ आन्दोलन के अगले दौर का वक़्त क्या अभी आने से फ़ायदा होगा? क्या सरकारें इसे होने देंगी? कहीं ये पुलिसिया सख़्ती को ‘आ बैल मुझे मार’ का सन्देश तो नहीं देगी?

दरअसल, भारत पर अभी कोरोना-मारीचिका हावी है। मारीचिका एक आभास है। इसमें रेगिस्तान में दुर्लभ पानी दिखने का भाव है। ये आभास और भाव तो असली होते हैं, लेकिन पानी असलियत नहीं होता। मारीचिका आध्यात्मिक ढोंग नहीं, बल्कि भौतिक भ्रम है। ये वैसा ही दृष्टि-दोष है, जैसे दूर जाती रेल की समानान्तर पटरियाँ परस्पर नज़दीक आती हुई प्रतीत होती हैं। बिल्कुल ऐसे ही दृष्टि-दोष की काली छाया अभी ‘कोरोना-अनलॉक’ को लेकर देश पर मँडरा रही है। इसीलिए कोरोना को पुरी में रथयात्रा बर्दाश्त है, अयोध्या का शिला-पूजन बर्दाश्त है, भोपाल, इम्फाल और जयपुर में सरकारों का लुढ़कना-ढनकना बर्दाश्त है, लेकिन किसी भी किस्म के अनलॉक को ईद की सामूहिक नमाज़, मुहर्रम के जुलूस और संविधान बचाने वाले सीएए-एनआरसी आन्दोलन की सुगबुगाहट बर्दाश्त नहीं है।

कोरोना-काल के दौरान उत्तर भारत के मुसलमानों में अज़ीबो-ग़रीब हूक उठती रही हैं। उन्हें यहाँ-वहाँ से अपनी बिरादरी के साथ हो रहे भेदभावों की ख़ूब ख़बरें भी मिलीं। देश देख चुका है कि तब्लीगी जमात के नाम पर उठी नफ़रत की लपटों ने ठेले पर फल-सब्ज़ी बेचने वालों की मज़हबी की पहचान को कैसी प्रमुखता दिलायी। गाय के नाम पर लिंचिंग का नयी घटना को भी कोरोना नहीं टाल सका। दिल्ली के दंगों की पुलिसिया जाँच से कई बदरंग पन्ने भी फिज़ाँ में उड़ते देखे गये। ‘370’ की पहली पुण्यतिथि भी निपट गयी। लॉकडाउन की तकलीफ़ों और बेरोज़गारी के बावजूद जो ग़रीब जीवित रहे, उन्हें भी बाढ़ और अस्पतालों की दुर्दशा ने जमकर डुबोया। लेकिन अमीरों के आईपीएल को न सिर्फ़ डूबने से बचाया गया, बल्कि उसे ‘आत्मनिर्भर’ बनने के लिए ‘वोकल फॉर लोकल’ वाले गुरु-मंत्र से भी विशेष छूट दी गयी। आसार हैं कि स्वतंत्रता-दिवस की भाषणबाज़ी भी कतई फ़ीकी नहीं रहेगी।

लेकिन क्या उपरोक्त तमाम मिसालों को देखते हुए मुस्लिम समाज बराबरी की उम्मीद पाल सकता है? ये सही है कि आन्दोलनकारियों पर कभी दमनकारी सत्ता के बर्बर रवैये का ख़ौफ़ नहीं होता। लेकिन आन्दोलन की कमान थामने वालों को अपनी ताक़त और कमज़ोरियों का भी सही अहसास ज़रूर होना चाहिए। कोरोना से पहले चले आन्दोलन के तज़ुर्बों से सीखना भी बहुत ज़रूरी है। मसलन, उस आन्दोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि ये थी कि वो मुसलमानों की नागरिकता के सवाल से शुरू होकर संविधान बचाने की ओर घूम गयी। इसे शिक्षित और सेक्यूलर मुसलमानों से ज़्यादा इसी श्रेणी के हिन्दुओं और इनमें से भी ख़ासतौर पर युवाओं और महिलाओं का अद्भुत समर्थन मिला। सिर्फ़ इसी इकलौते पहलू से भगवा हुक़्मरानों के माथे पर बल पड़े।

फरवरी में दिल्ली विधानसभा के चुनाव हुए। दिसम्बर-जनवरी में हुक़्मरानों को अपनी ज़मीनी सच्चाई दिखने लगी थी। मेनस्ट्रीम मीडिया तो मुट्ठी में था लेकिन सोशल मीडिया ने नाक में दम कर रखा था। यही देख हुक़्मरानों को डर सताने लगा कि सेक्यूलर हिन्दुओं और मुसलमानों की एकजुटता यदि उसी रफ़्तार से बढ़ती रहती तो उनके लिए ‘मुश्किल-काल’ बहुत दूर नहीं रहता। इसी एकजुटता में सेंधमारी के लिए दिल्ली में दंगों की पटकथा लिखी गयी। नफ़रत और उन्माद फैलाने वाली भाषणबाज़ी के धारावाहिक चले। दंगों में पुलिस ने वही किया जो उसे हुक़्म मिला, ताकि ‘सबसे ज़्यादा अनुशासित और आज्ञाकारी संस्था’ वाला उसका सिंहासन अक्षुण्य रहे।

अब तो सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं में भगवा-समाजवाद आ चुका है। सभी ने पुलिसिया-संस्कारों को ही अपना आराध्य बना लिया है। विधान सिर्फ़ इतना है कि हुक़्म की तामील होगी, हर हाल में होगी, अवश्य होगी। बाक़ी संविधान की बातें जिन्हें करना है वो नक्कारख़ाने में तूती बजाते रहें। नये भारत में सबको इस आकाशवाणी पर यक़ीन करना होगा कि “पूर्वी लद्दाख में न तो कोई हमारी सीमा में घुस आया है, न ही कोई घुसा हुआ है और ना ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्ज़े में है।”

इसीलिए मुस्लिम समाज चाहे तो गाँठ बाँध लें कि उसकी किसी भी किस्म की एकता से हुक़्मरानों की सेहत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला। क्योंकि हुक़्मरानों को कपड़ों से पहचानने में महारत हासिल है। लिहाज़ा, शाहीन बाग़ की बहाली के लिए बेताब लोगों को पहचान के बजाय परिचय को तरजीह देना सीखना होगा। उन्हें समझना होगा कि पहचान तो दूर से ही हो जाती है जबकि परिचय के लिए नज़दीक या रूबरू आना पड़ता है। चन्दन-टीका, पगड़ी-टोपी, दाढ़ी-मूँछ, घूँघट-बुर्का, धोती-पजामा – ये सभी पहचान हैं, जबकि सेक्यूलर-कम्यूनल, कट्टर-उदार, जातिवादी-प्रगतिशील आदि परिचय हैं। इसी परिचय के साथ उन्हें जिन हिन्दुओं, युवाओं और महिलाओं का ज़ोरदार समर्थन मिला था, उसी ताक़त से वो मंज़िल पा सकते हैं।

अभी कोरोना के दौरान जिस स्तर का और जैसा ‘अनलॉक’ सामने आया है, उसमें संविधान बचाने की पैरोकारी करने वाले हिन्दुओं, युवाओं और महिलाओं की एकजुटता में मुश्किल होगी। इसीलिए अभी जोख़िम लेने का वक़्त नहीं है। थोड़ा और इन्तज़ार कर लेने में कोई हर्ज़ नहीं है। 15 अगस्त की बातें यदि सरककर 2 अक्टूबर हो जाए तो कोई आफ़त नहीं आ जाएगी। अबकी बार शाहीन बाग़ के आन्दोलनकारियों को संविधान के अलावा अर्थव्यवस्था की ऐतिहासिक दुर्दशा को भी अपने रडार में लेना होगा। इन्हें ये भी समझना होगा कि सरकार किसी भी कीमत पर अपने क़दम वापस नहीं खींचेंगी। वो ज़्यादा से ज़्यादा अपने क़दमों को आगे बढ़ाने का इरादा तब तक टालती रहेगी, जब तक कि उसका पतन न हो जाए। लेकिन इस दौरान आन्दोलनकारियों को हिंसा और हिरासत के उकसावों से भी ख़ुद को बचाना होगा। बीते एक साल में कश्मीर ने भारत, सेक्यूलरों और संविधान की दुहाई देने वालों को अनेक सबक दिये हैं। बहुसंख्यक समाज ने ताली-थाली और दीया-दिवाली के कई नज़ारे देश को दिखाये हैं। इसीलिए आन्दोलनकारियों को समझना होगा कि जो विरोधियों की ताक़त का सही अन्दाज़ा नहीं लगाते, वो विरोधियों का शिकार बनने के लिए अभिशप्त होते हैं। विरोधी जहाँ बात ख़त्म करना चाहते हैं, आन्दोलनकारियों को वहीं से बात शुरू करने की रणनीति अपनानी होगी। वर्ना, उनका सरकार का जाल में फँसना तय है।

Continue Reading
Advertisement
rahul-gandhi
राजनीति15 mins ago

राहुल का तंज- मप्र में कांग्रेस ने किसानों का कर्ज माफ किया, भाजपा ने झूठे वाद किए

PM MODI
राष्ट्रीय17 mins ago

कोरोना से सर्वाधिक प्रभावित सात राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ प्रधानमंत्री मोदी की बैठक

Tomato
व्यापार25 mins ago

महंगे हुए आलू-टमाटर की दिल्ली सरकार ने की समीक्षा

राष्ट्रीय26 mins ago

किसानों के प्रदर्शन को लेकर राजधानी में चौकसी बढ़ी

shashi tharoor
राजनीति34 mins ago

दिनकर को मालूम था इक दिन ऐसे नेता आएंगे, अन्नदाता का हक छीनेंगे : शशि थरूर

शहर40 mins ago

नोएडा: दवा बनाने वाली कंपनी में लगी भीषण आग

Delhi Violence
राष्ट्रीय57 mins ago

दिल्ली पुलिस की चार्जशीट : CAA-NRC विरोध के लिए भाड़े पर लाए गए थे लोग

खेल57 mins ago

आईपीएल-13 : केकेआर का टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी का फैसला

राष्ट्रीय1 hour ago

कृषि विधेयक पर गरमाई राजनीति, 25 सितंबर को भारत बंद का एलान

राजनीति1 hour ago

गुलाम नबी ने की राष्ट्रपति से मुलाकात, कृषि विधेयकों को वापस करने का किया अनुरोध

Mayawati
राजनीति2 weeks ago

मायावती शासन की अनियमितताओं पर शुरू होगी कार्रवाई

राजनीति2 days ago

किसान बिल पर हंगामे के चलते राज्यसभा के 8 सांसद निलंबित

Rhea-
मनोरंजन2 weeks ago

सुशांत केस : ड्रग्स मामले में रिया चक्रवर्ती को भेजा गया मुंबई जेल

former president pranab-mukjerjee
राष्ट्रीय3 weeks ago

भारत रत्न पूर्व राष्ट्रपति का 84 साल की उम्र में निधन

राष्ट्रीय4 weeks ago

सुशांत केस : रिया के भाई से सीबीआई की पूछताछ जारी

Blood Pressure machine
लाइफस्टाइल3 weeks ago

हाई-ब्लड प्रेशर, हाइपरटेंशन में वायु प्रदूषण का योगदान : शोध

Sonia Gandhi and Rahul
ब्लॉग2 weeks ago

कांग्रेस की बीमारियां उन्हें क्यों सता रहीं जिन्होंने इसे वोट दिया ही नहीं?

Rhea Chakraborty
मनोरंजन3 weeks ago

सुशांत मामला : रिया से आज फिर पूछताछ करेगी सीबीआई

Sonia Gandhi Congress Prez
राजनीति4 weeks ago

कांग्रेस कार्यसमिति: 23 नेताओं का शिकायती पत्र खारिज

खेल4 weeks ago

राष्ट्रीय खेल दिवस: खेल रत्न, अर्जुन अवॉर्ड, द्रोणाचार्य-ध्यानचंद पुरस्कार की पूरी लिस्ट

8 suspended Rajya Sabha MPs
राजनीति2 days ago

रात में भी संसद परिसर में डटे सस्पेंड किए गए विपक्षी सांसद, गाते रहे गाना

Ahmed Patel Rajya Sabha Online Education
राष्ट्रीय4 days ago

ऑनलाइन कक्षाओं के लिए गरीब छात्रों को सरकार दे वित्तीय मदद : अहमद पटेल

Sukhwinder-Singh-
मनोरंजन1 month ago

सुखविंदर की नई गीत, स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देश को समर्पित

Modi Independence Speech
राष्ट्रीय1 month ago

Protected: 74वें स्वतंत्रता दिवस पर पीएम मोदी का भाषण, कहा अगले साल मनाएंगे महापर्व

राष्ट्रीय2 months ago

उत्तराखंड में ITBP कैम्‍प के पास भूस्‍खलन, देखें वीडियो

Kapil Sibal
राजनीति3 months ago

तेल से मिले लाभ को जनता में बांटे सरकार: कपिल सिब्बल

Vizag chemical unit
राष्ट्रीय5 months ago

आंध्र प्रदेश: पॉलिमर्स इंडस्ट्री में केमिकल गैस लीक, 8 की मौत

Delhi Police ASI
शहर5 months ago

दिल्ली पुलिस के कोरोना पॉजिटिव एएसआई के ठीक होकर लौटने पर भव्य स्वागत

WHO Tedros Adhanom Ghebreyesus
स्वास्थ्य5 months ago

WHO को दिए जाने वाले अनुदान पर रोक को लेकर टेडरोस ने अफसोस जताया

Sonia Gandhi Congress Prez
राजनीति5 months ago

PM Modi के संबोधन से पहले कोरोना संकट पर सोनिया गांधी का राष्ट्र को संदेश

Most Popular