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बिहार चुनाव में आएगा ज्यादा खर्च, कोरोना के कारण लगेंगे 1.8 लाख ज्यादा कर्मचारी

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Election Commission

नई दिल्ली, 17 जुलाई(आईएएनएस)। कोरोना काल में आगामी बिहार विधानसभा चुनाव कराने में ज्यादा खर्च आएगा। वजह कि मतदाताओं के बीच सोशल डिस्टैंसिंग के लिए 34 हजार से ज्यादा नए पोलिंग सेंटर्स बनाने से एक लाख से अतिरिक्त कर्मचारियों की नियुक्ति करनी होगी। बिहार विधानसभा का कार्यकाल नवंबर में खत्म हो रहा है।

माना जा रहा है कि सब कुछ ठीक रहने पर समय से चुनाव होगा। चुनाव आयोग अभी से सभी चुनौतियों पर विचार करने में जुटा है। चुनाव तैयारियों की लगातार समीक्षा हो रही है।

चुनाव आयोग साफ कर चुका है कि कोरोना के कारण इस बार एक मतदान केंद्र पर एक हजार मतदाता ही वोट देंगे। लिहाजा अतिरिक्त मतदान केंद्र बनाने का फैसला हुआ है।

चुनाव आयोग के सूत्रों ने आईएएनएस को बताया कि एक पोलिंग सेंटर पर एक हजार वोटर्स के फॉर्मूले के कारण करीब 34 हजार अतिरिक्त पोलिंग सेंटर्स बनाए जाने की तैयारी चल रही है। इस प्रकार बिहार में एक लाख छह हजार पोलिंग सेंटर्स पर चुनाव होगा। जब अतिरिक्त पोलिंग सेंटर्स बनेंगे तो अतिरिक्त मतदान कार्मिकों की भी नियुक्ति होगी। ऐसे में आयोग ने आकलन किया है कि 34 हजार अतिरिक्त केंद्रों पर कम से कम एक लाख 8 हजार कर्मचारियों की नियुक्ति करनी होगी।

चुनाव आयोग के सूत्रों ने बताया कि अतिरिक्त मतदान केंद्रों पर अतिरिक्त कर्मचारियों को ले जाने के लिए वाहन भी चाहिए। चुनाव के लिए और भी तमाम संसाधनों की अतिरिक्त व्यवस्था करनी होगी। अतिरिक्त कर्मचारियों को भत्ता भी देना होगा। इस प्रकार कोरोना काल में चुनाव कराने में पहले से कहीं ज्यादा खर्च आएगा। हालांकि, अभी यह आकलन नहीं हुआ है कि बिहार चुनाव कराने में इस बार कुल कितना खर्च आ रहा है, लेकिन इतना साफ है कि पिछले चुनाव से काफी ज्यादा धनराशि इस बार खर्च होगी। क्योंकि अतिरिक्त केंद्र बनाने के साथ ज्यादा कर्मचारियों की व्यवस्था करनी पड़ेगी।

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बिहार : कांग्रेस चुनाव से पहले जातीय समीकरण दुरुस्त करने में जुटी

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पटना, 30 जुलाई (आईएएनएस)। बिहार में इस साल होने वाले संभावित विधानसभा चुनाव को लेकर लगभग सभी पार्टियों ने तैयारी शुरू कर दी है। इस बीच, पार्टी के अंदर ही पिछड़े समुदाय की उपेक्षा करने का आरोप झेल रही कांग्रेस अब जातीय सीमकरण दुरुस्त करने में जुटी है। 

कांग्रेस ने दो दिन पूर्व जिला अध्यक्षों के मनोनयन के जरिए जातीय समीकरण को मजबूत करने के संदेश देने की कोशिश की है। कांग्रेस ने दो दिन पूर्व भागलपुर जिले में अध्यक्ष के रूप में परवेज आलम को मनोनीत कर जहां मुस्ल्मि मतदाताओं को खुश करने की कोशश की है, वहीं इसी जिले में कार्यकारी अध्यक्ष के पद पर अभयानंद झा और विपिन बिहारी यादव को मनोनीत कर सवर्ण और पिछड़ा कार्ड भी खेला है।

इसी तरह शेखपुरा जिले की जिम्मेदारी जहां सुंदर सहनी को दिया गया है, वहीं पटना नगर का नेतृत्व शशिरंजन यादव को सौंप दिया गया है। इसके अलावा, कांग्रेस ने भोजपुर जिला में कार्यकारी अध्यक्ष श्रीधर तिवारी को बनाया है, जबकि नवादा जिला का अध्यक्ष सतीश कुमार को और कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी बंगाली पासवान को दिया गया है।

कांग्रेस के एक नेता भी इसे स्वीकार करते हुए नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहते हैं, कांग्रेस ने इन सात नेताओं के मनोनयन के जरिए में जहां सवर्ण और मुस्लिम समुदाय को साधने की कोशिश की है, वहीं पार्टी के अंदर ही पिछड़ा समुदाय की उपेक्षा करने के आरोप में उठ रहे बगावती आवाजों को भी शांत करने के प्रयास में जुट गई है।

इन सात मनोनीत नेताओं में से चार पहले युवक कांग्रेस में रह चुके हैं।

उल्लेखनीय है कि कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष रहे कैलाश पाल ने पिछले दिनों कांग्रेस के चुनाव अभियान समिति की बैठक में कई वरिष्ठ नेताओं के सामने पार्टी में पिछड़ों की उपेक्षा करने का आरोप लगाते हुए सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद चुनाव अभियान समिति के प्रमुख और राज्यसभा सांसद अखिलेश सिंह को भी सामने आना पड़ा था और तब उन्होंने कहा था कि कांग्रेस सभी समुदायों का सम्मान करती है और आगे भी ख्याल रखेगी।

इधर, कांग्रेस के कैलाश पाल ने जिले के अध्यक्षों के मनोनयन में सभी समुदायों को तरजीह देने पर संतोष प्रकट करते हुए कहा कि यह एक अच्छी पहल है। उन्होंने कहा, यह एक अच्छी शुरुआत है। हमलोग कांग्रेस में और क्या चाहते हैं। हमलोग तो यही चाहते हैं कि पार्टी में सामाजिक न्याय बनी रहे।

पार्टी से नाराजगी दूर होने के संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि अभी लड़ाई जारी है।

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चुनाव

बिहार चुनाव में ‘टूथ पिक’ से दबेगी ईवीएम की बटन, मतदान कर्मी पहनेंगे पीपीई किट

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कोरोना महामारी और बाढ़ की विभीषिका के बीच बिहार विधानसभा चुनाव को वक्त पर कराने को लेकर चुनाव आयोग ने शुक्रवार को मंथन किया। इसके बाद आयोग ने दिशानिर्देशों का मसौदा तैयार किया है।

इसमें चुनाव के दौरान मतदानकर्मियों के पीपीई किट पहनने, मतदाताओं को संक्रमण से बचाने के लिए ईवीएम मशीन की बटन दबाने के लिए टूथ पिक या दस्ताने का इस्तेमाल करने का विकल्प देने की बात कही गई है।

आयोग के सचिव एनटी भूटिया ने राजनीतिक दलों से 31 जुलाई तक इस मसौदे पर सुझाव मांगा है। इनके आधार पर आयोग दिशानिर्देश जारी करेगा। मसौदे के मुताबिक सभी कर्मचारियों और चुनाव काम में लगे लोगों को मास्क और दस्ताना पहनना अनिवार्य होगा। सार्वजनिक स्थलों, चुनाव कार्यालयों और पोलिंग बूथों पर सामाजिक दूरी का पालन करना होगा।

राजनीतिक दल रैली नहीं कर सकेंगे। सामाजिक समारोह और धार्मिक आयोजनों पर पाबंदी रहेगी। स्क्रीनिंग सख्ती से होगी। पोलिंग बूथों पर मतदाताओं की थर्मल स्क्रीनिंग की जाएगी और उनकी संख्या में कमी की जाएगी।

इसके अलावा भीड़ होने से रोकने के लिए मतदान के दौरान व्यापक नियंत्रण सिस्टम लागू किया जाएगा। हालांकि राज्य के कई राजनीतिक दल बाढ़ और कोरोना संकट के बीच चुनाव कराने के पक्ष में नहीं हैं।

आयोग के एक अधिकारी ने बताया कि बिहार चुनाव को लेकर तैयारियां चल रही हैं। आयोग चुनाव के लिए कर्मचारियों और बूथों की संख्या में बढ़ोतरी पर भी विचार कर रहा है।

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चुनाव

महाराष्ट्र चुनाव में BJP आईटी सेल को सौंपी सोशल मीडिया की जिम्मेदारी: चुनाव आयोग

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देश में स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव कराने का दावा करने वाले चुनाव आयोग अब पक्षपात और डेटा लीक के अहम सवालों और गंभीर आरोपों से घिरता दिख रहा है।

चुनाव आयोग पर आरोप है कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान आयोग के सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स की देखरेख करने का जिम्मा भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता और आईटी सेल को दिया गया था यानी आयोग के पास मौजूद डेटा तक किसी ऐसी निजी कंपनी की पहुंच थी जो साफ और घोषित तौर पर राज्य की तत्कालीन सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़ी हुई थी।

चुनाव आयोग का जिम्मा राजनीतिक दलों के सोशल मीडिया हैंडल और पेज पर पैनी निगाह रखना था. लेकिन खुद आयोग के सोशल मीडिया हैंडल, वेबसाइट, पेज और इनमें दर्ज डेटा एक खास राजनीतिक दल के कारोबारी पदाधिकारी के पास गिरवी रखे थे. आयोग की आंखों में उंगुली डालकर दिखाए जाने के बाद मामले की जांच के लिए हलचल तेज़ हो गई है।

अपने स्वतंत्र और निष्पक्ष होने के दावों पर आंच, सवाल और आरोपों पर अब चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र के सीईओ से जवाब तलब किया है। आयोग की प्रवक्ता से जब इस बारे में और उनके ट्वीट पर पूछा गया तो उन्होंने भी इसकी तस्दीक की कि सीईओ से पूरी जानकारी मिलने के बाद बताया जाएगा।

हालांकि चौंकाने वाला खुलासा है कि सोशल मीडिया पर चुनाव आयोग के जन जागरण अभियान और पूरे चुनावी मिशन पर निगरानी का काम जिस कंपनी और शख्स को दिया गया वो तो बीजेपी के युवा विंग बीजेवाईएम यानी भारतीय जनता युवा मोर्चा के आईटी सेल का संयोजक भी रहा है।

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