Kapil Sibal

Kapil Sibal

The writer is a Senior Congress leader and former union minister....

राफ़ेल सौदे में सीएजी ने उड़ाई पारदर्शिता की धज़्ज़ियाँ

राफ़ेल रिपोर्ट में सीएजी ने अपनी प्रतिष्ठा गँवाई, इसने जितने सवालों के जबाब दिये उसके ज़्यादा तो प्रश्न खड़े किये

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जुमलेबाज़ी के बजाय प्रधानमंत्री राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवालों का जवाब दें

बालाकोट की बमबारी को प्रधानमंत्री ने ‘पायलट प्रोजेक्ट’ बताया है। उन्होंने कहा कि असली प्रोजेक्ट तो अभी शुरू होना बाक़ी है। पायलट प्रोजेक्ट का मतलब होता है किसी नयी योजना...

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मोदी राज में लुप्त हुआ संसदीय संवाद

संसद में सार्थक चर्चा नहीं हो रही। प्रक्रिया और परम्परा दम तोड़ चुकी है। नौकरशाही भी दमघोटू हाल में है। लोकतंत्र की लौ फड़फड़ा रही है।

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अयोध्या: कोर्ट की अवमानना वाले बयान नहीं, बल्कि फ़ैसले का इन्तज़ार होना चाहिए

ताज़्ज़ुब की बात है कि क़ानून मंत्री और केन्द्र तथा बीजेपी शासित राज्यों की सरकारों में बैठे गणमान्य लोग, सार्वजनिक तौर पर ऐसे बयान देते रहे हैं, जिनसे साफ़ तौर...

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सुप्रीम कोर्ट में ही हादसे का शिकार हुई राफ़ेल की सच्चाई

संविधान के अनुच्छेद 32 के सीमित दायरे का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तय किया कि वो 36 राफ़ेल विमानों की ख़रीदारी पर सवाल नहीं खड़े करेगा। कोर्ट के...

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लोकतांत्रिक संस्थाओं को उन शासकों की परवाह क्यों है जो क़ानून को ही ठेंगा दिखाते हैं?

देश की संस्थाओं से उठने वाले स्वतंत्र आवाज़ों का गला घोंटा जा रहा है। इसीलिए जिन्हें क़ानून के राज की दुहाई देनी चाहिए वो उनके साथ खड़े मिलते हैं, जिनका...

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बहुमत के फ़ैसले के बावजूद ग़रीब और सम्पन्न लोगों के ‘आधार’ में हुई चूक!

आधार पर फ़ैसला सुनाते वक़्त सुप्रीम कोर्ट ने ग़रीब और सम्पन्न के बीच जो फ़र्क़ देखा है, वो चिन्ताजनक है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी नागरिक को मिलने...

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मोदी सरकार को बिना विचारे नयी नीतियाँ लागू करने की बीमारी है!

काग़ज़ों पर कोई नीति भले ही शानदार लगे, लेकिन उसे सफलतापूर्वक लागू करना ही सबसे अहम है। युगान्कारकारी नीतियों का ऐलान करने से पहले ज़मीनी हक़ीक़त का जायज़ा लेना बेहद...

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लिंचिंग के ख़िलाफ़ राजनीतिक एकजुटता ज़रूरी

तकनीक यदि सुरक्षित हाथों में होगी तो जनहित के लिए वरदान बनेगी, लेकिन यदि ग़लत हाथों में पड़ जाए तो ऐसा नुकसान करेगी जिसे सोचना भी मुश्किल है। तकनीक की...

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लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक है: न्यायपालिका और कार्यपालिका की मिलीभगत

सतर्क और सक्रिय न्यायपालिका की बदौलत ही नागरिकों के बुनियादी और संवैधानिक अधिकारों की हिफ़ाज़त हो पाती है। ऐसी सतर्कता के बग़ैर लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता।

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पीडीपी से जुड़ते ही बीजेपी लिखने लगी टूटने की पटकथा

बीजेपी और पीडीपी का गठबन्धन अपने जन्म से ही बेमेल था। दोनों की विचारधाराओं के बीच उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव जैसी दूरी थी। इस गठजोड़ को बनाने के लिए नरेन्द्र...

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सुप्रीम कोर्ट को ही बचानी होगी राज्यपाल की गरिमा

यदि सुप्रीम कोर्ट ने दूरदर्शिता दिखाते हुए विश्वास मत हासिल करने के लिए 19 मई का वक़्त तय नहीं किया होता तो विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त की रोकथाम बेहद मुश्किल होती।...

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जस्टिस जोसेफ़ के विरोध पूर्णतः दुर्भावनापूर्ण है

मोदी सरकार ने जिन तर्कों, तथ्यों और आँकड़ों के आधार पर उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस के.एम. जोसफ़ को सुप्रीम कोर्ट भेजने का विरोध किया है वो हरेक कसौटी...

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ज़रा देखिए तो कि न्यायपालिका के पतन की दुहाई कौन दे रहा है!

विपक्ष पर राजनीति करने का आरोप लगाया हास्यास्पद है। सच तो ये है कि जाँच से बचने के लिए सरकार ही राजनीति कर रही है।

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विफल होते क़ानूनों की वजह से ख़तरे में लोकतंत्र

बीते चार सालों में हमारे संवैधानिक लोकतंत्र की दो अहम विशेषताओं का पतन हुआ है। पहला, क़ानून के सर्वोपरि होने की धारणा पर हमले हुए हैं। दूसरा, क़ानूनी प्रक्रिया का...

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राजनेता-व्यापारी-बैंकर के गिरोह से हुआ बैंकिंग का सत्यानाश

घोटालेबाज़ जनता का पैसा हड़पकर अरबपति बन जाते हैं। भारत की सरकारी बैंकिंग प्रणाली से उन्हें पूरी मदद मिलती है।

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बढ़ती असमानता और सिकुड़ती आज़ादी ही अब भारतीय जनतंत्र की पहचान बनी

हमारे लोकतंत्र की बुनियाद उन उदार मूल्यों पर आधारित है, जिसमें क़ानून का राज होगा और अदालतें इसे निष्पक्ष होकर लागू करेंगी। लेकिन आज उदार विचारों को शक़ की नज़र...

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मुसलिम महिला-हित नहीं बल्कि सियासी खेल की एक और मिसाल है तीन तलाक़ बिल

प्रस्तावित तीन तलाक विधेयक, सियासी मौक़ापरस्ती की एक और मिसाल है, जिसका मक़सद सिर्फ़ चुनावी फ़ायदा उठाना है।

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2018 का स्वागत ज़रूर करें, लेकिन ये भी जानें कि कितना बदल गया है भारत..!

साल 2014 से 2017 के जाते-जाते हिन्दुस्तान की रंगत बहुत बदल गयी। इसीलिए 2018 का स्वागत करते वक़्त हमें ज़रूर समझना चाहिए कि अब हम कहाँ खड़े हैं? बीते साल...

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2जी फ़ैसले से काँग्रेस को नैतिक जीत तो मिली, लेकिन नुकसान की भरपायी कभी नहीं होगी

2जी फ़ैसले से साबित हो चुका है कि सारा क़सूर सीएजी और सुप्रीम कोर्ट की अदूरदर्शिता का है! लेकिन विपक्ष भी कोई कम गुनाहगार नहीं, जिसने 2जी के नाम पर...

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झूठ और अर्धसत्य की बदौलत मोदी ने चुनाव तो जीता लेकिन दिल नहीं!

गुजरात मॉडल का हर वक़्त बख़ान करने वाले नरेन्द्र मोदी को गुजरात में प्रचार के लिए इतना अधिक वक़्त लगाना पड़ा, मानो वो देश के प्रधानमंत्री नहीं बल्कि राज्य के...

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मोदी, संख्या से भले ही गुजरात जीत गये लेकिन दिलों को नहीं जीत पाये…!

राजनीति में संख्या यानी अंकगणित, बहुत मायने रखती है। चुनाव में बीजेपी जीती है। हालाँकि गुजरात में उसकी संख्या कम हो गयी। हिमाचल को काँग्रेस से छीन लिया गया। जब...

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दमनकारी विचारधारा के ज़रिये आस्था के नाम पर भय फैलाना बेहद ख़तरनाक है

हिन्दूवाद एक जीवनशैली है। इसीलिए इसे विचारधारा के दायरे में नहीं बाँधा जा सकता। जब भी ऐसा करने की कोशिश की जाएगी, तब हिन्दूवाद की आत्मा नष्ट हो जाएगी।

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क्यों विश्व बैंक की रैंकिंग असली तस्वीर नहीं दिखा रही?

देश के व्यापारिक माहौल का जश्न हम तभी मना सकते हैं जब असंगठित क्षेत्र के लघु और मझोले व्यापारी ये महसूस करने लगें कि उनके लिए वाक़ई, व्यापार करना आसान...

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40 महीने तक ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्ज़ीमम गवर्नेंस’ की सिर्फ़ बातें ही होती रही, हुआ बिल्कुल उलटा

Senior Congress leader and former Union minister Kapil Sibal प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऐसे ‘नये भारत’ का वादा किया था जो भ्रष्टाचार रहित, कारोबार को प्रोत्साहित...

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मानहानि की आड़ में ‘मुँह बन्द’ नहीं कराये जा सकते

ऐसे मनमानी भरे अदालती आदेशों के जारी किये जाने पर सुप्रीम कोर्ट कई बार नाराज़गी जता चुका है। हाल ही में प्रोफेसर काँचा इलैया लिखित पुस्तक ‘सामाजिक स्मगलुरुलु कोमाटोल्लु’ पर...

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कैसे भविष्य के साथ खिलवाड़ के रवैये से आयी आर्थिक तबाही?

एनपीए की समस्या के लिए अदालतों के वो फ़ैसले ज़िम्मेदार हैं, जिनके ज़रिये स्पैक्ट्रम और कोयला खदानों के आबंटन को रद्द किया गया था। अति-उत्साही सीएजी, रक्त-पिपासु मीडिया, कुएँ के...

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सेंसरशिप और पुलिस के साये तले शैक्षिक संस्थानों में नये आइडिया पर चर्चा कैसे होगी!

भविष्य सिर्फ़ उनकी राह देखता है जो नयी सरहदें तय करने के लिए निकलते हैं। इस विजय यात्रा की बुनियाद उस माहौल में छिपी होती है जहाँ नये आविष्कारों का...

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नये भारत के लिए नया नज़रिया

मोदी राज का उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से प्रभावित होना और भी घातक है जिसकी विकृत विचारधारा सरकार पर थोपी जाती है और उसकी ही पैरोकारी की जाती है।

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ऐसे आर्थिक आँकड़े जो हमें सच्चाई नहीं बताते

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन ने बिल्कुल सही राह दिखायी है कि हमें ऐसी सामाजिक और आर्थिक नीतियाँ बनानी चाहिए जिससे विकास का फ़ायदा हरेक वर्ग और तबके को मिल सके।

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इंसाफ़ के गलियारों में भी पारदर्शिता होनी ही चाहिए

चीफ़ जस्टिस को प्रधानमंत्री के सामने सार्वजनिक तौर पर ये क्यों कहना पड़ता है कि छुट्टियों में तीन अहम मामलों की सुनवाई की जाएगी? किस आधार पर तीन ख़ास मामलों...

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साढ़े तीन साल बीतने के बावजूद आर्थिक गिरावट पर नकेल नहीं

अर्थव्यवस्था गम्भीर संकट में है। विकास के सभी मानक लगातार गिर रहे हैं। वित्तीय वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के दौरान तो विकास दर गिरकर 5.7...

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तकनीक के इस्तेमाल से कहीं मुश्किल है इसका दुरुपयोग रोकना

तकनीकों की वजह से हमारी ज़िन्दगी बहुत आरामदायक बन पायी है। लेकिन तकनीक में ही हमारी तबाही के बीज भी मौजूद हैं। इतिहास गवाह है कि हरेक तकनीकी क्रान्ति ने...

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लोकतंत्र में ‘धर्म की राजनीति’ को ‘राजनीति का धर्म’ से अलग रहना ज़रूरी

सदियों से सामाजिक सुधार की प्रक्रिया बहुत धीमी और कष्टकारी रही है। 500 साल पहले मार्टिन लूथर किंग ने कैथोलिक चर्च में सुधार लाने की कोशिश की थी। फिर भी...

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निजता के बग़ैर बेमानी है आज़ादी

निजता के अधिकार को लेकर दुनिया भर के लोकतंत्र में ज़बरदस्त बहस छिड़ी हुई है। संचार क्रान्ति से जुड़ी उन्नत तकनीकों ने इस बहस को ख़ासा तूल दिया है। क्योंकि...

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तबाह होती लोकतांत्रिक संस्थाएँ

भारत को अभी निष्पक्ष मीडिया, स्वतंत्र न्यायपालिका, प्रमाणिक जाँच एजेंसियाँ, ईमानदार सरकारी अफ़सरों के अलावा एक ऐसे अर्थतंत्र की बेहद ज़रूरत है जिसे पुख़्ता बैंकिंग आधार की गति मिले।

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राष्ट्रपति पद को जातिवादी प्रतीकों से बचाना ज़रूरी है

आज यदि अम्बेडकर हमारे बीच होते तो वो इस पद के लिए आदर्श व्यक्ति होते। इसलिए नहीं कि वो दलित थे, बल्कि वो जातिवाद, कट्टरवाद और धर्मान्धता के धुर-विरोधी थे।...

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महज जीत है मोदी-शाह की ख़्वाहिश

मोदी के लिए सरकारी तंत्र का इकलौता मतलब है ‘आत्म-प्रचार’, जिसकी उपयोगिता तरह-तरह की घोषणाएँ करने और अपनी उपलब्धियों का सच्चा-झूठा और जायज़-नाजायज़ गुणगान करने के सिवाय और कुछ नहीं...

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खोखली है मोदी की अर्थ-नीति

बैंकों का 11 प्रतिशत क़र्ज़ा डूब चुका है। इससे क़र्ज़ पाना मुश्किल हो गया है। माँग में कमी होने की वजह से क़र्ज़ लेने की गतिविधि का बुरी तरह से...

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