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कांग्रेस के दिग्गज-निष्ठावान नेता अहमद पटेल का निधन – श्रद्धांजलि

पटेल को पत्रकारों का मित्र माना जाता था। वह देर रात पत्रकारों को बुलाते थे। लेकिन कभी भी सीधे तौर पर कोई बयान नहीं देते थे। उनके द्वारा दिए गए जवाब के अनुसार, उन्हें जज करना होता था।

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नई दिल्ली । कांग्रेस के दिग्गज और निष्ठावान नेता अहमद पटेल का बुधवार को निधन हो गया। उन्होंने कई मौकों पर पार्टी के लिए संकटमोचक का काम किया था। कोरोना से संक्रमित होने के बाद वह स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याओं से जूझ रहे थे और उनके कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया जिस कारण बुधवार तड़के उनका निधन हो गया।

कांग्रेस पार्टी के निष्ठावान और संकटमोचक की छवि के रूप में पहचाने जाने वाले पटेल ने कई बार पार्टी को मुश्किलों से निकाला। 2008 में जब वाम दलों के समर्थन वापस लेने के बाद यूपीए सरकार विश्वास प्रस्ताव का सामना कर रही थी, तो वह सरकार को बचाने के लिए पर्याप्त संख्या बल जुटाने में कामयाब रहे थे।

उनके निधन से पार्टी में जो खालीपन आया है वह कभी नहीं भर सकेगा क्योंकि वह एक पुरानी शैली के राजनेता थे, जिनकी पार्टी लाइन के परे भी अच्छी पहुंच थी और हर जगह उनके दोस्त थे। 2007 में, जब सोनिया गांधी ने उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी को लॉन्च करने की जिम्मेदारी पटेल को सौंपी तो वह पटेल ही थे जिन्होंने हर चीज का प्रबंधन किया। एक मुस्लिम बहुल सीट अमरोहा में राहुल गांधी की जनसभा में बड़ी भीड़ उमड़ी। जब इस पत्रकार ने उस समय के एक निर्दलीय सांसद से स्थानीय सांसद के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा कि अहमद भाई कहते हैं तो करना पड़ता है। तो कुछ ऐसा पटेल का प्रभाव था।

वह अपने सभी कौशल के साथ पीछे पहकर सबकुछ संभालते थे, एक ऐसे नेता थे जो आपको बता सकते थे कि राजनीतिक गलियारे में हवा का रुख किस ओर है। 2019 में, आम चुनावों से पहले उन्हें पता था कि उनकी पार्टी की स्थिति अच्छी नहीं है और उन्होंने मीडिया के सामने यह व्यक्त किया। 23 मदर टेरेसा क्रिसेंट में उनका निवास स्थल 10 जनपथ के बाद सबसे अधिक मांग और सुखिर्यो वाला था।

21 अगस्त, 1949 को गुजरात के भरूच में जन्मे, वह देश के सबसे प्रभावशाली राजनेताओं में से एक थे। यूपीए शासन के दौरान यहां तक कि मंत्री और मुख्यमंत्री उनके कार्यालय से अपॉइंटमेंट के लिए इंतजार करते थे। यद्यपि वह शक्तिशाली थे, वह दूसरों से विनम्रता से मिलते थे। वह पत्रकारों के लिए हमेशा उपलब्ध रहते थे।

पटेल अपने समय के सबसे युवा नेताओं में से एक थे जब उन्हें गुजरात कांग्रेस का नेतृत्व करने के लिए राजीव गांधी द्वारा चुना गया था। बाद में वह संसदीय सचिव के रूप में राजीव की टीम में शामिल हो गए, और कांग्रेस पार्टी के सत्ता संभालने के बाद वे सोनिया गांधी के सबसे करीबी विश्वासपात्र और उनके पास पहुंचने वाले एकमात्र चैनल बन गए।

उन्हें राहुल गांधी द्वारा अपने कार्यकाल में पार्टी के कोषाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था। पटेल पार्टी लाइन के पार संबंधों को बनाए रखने में यकीन रखते थे।

अहमद पटेल ने 1976 में अपने गृह राज्य गुजरात में भरूच में स्थानीय निकाय चुनाव लड़कर अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत की। वह तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के संसदीय सचिव थे, पटेल सरदार सरोवर परियोजना की निगरानी के लिए नर्मदा प्रबंधन प्राधिकरण की स्थापना में सक्रिय थे।

जवाहरलाल नेहरू के शताब्दी समारोह के पूर्व, पटेल को 1988 में जवाहर भवन ट्रस्ट का सचिव नियुक्त किया गया। राजीव गांधी ने उन्हें नई दिल्ली के रायसीना रोड में जवाहर भवन के निर्माण की निगरानी करने के लिए कहा, ऐसी परियोजना जो एक दशक से अधिक समय से रुका हुआ था। नेहरू के जन्म शताब्दी समारोह के लिए रिकॉर्ड एक साल की अवधि में, उन्होंने सफलतापूर्वक जवाहर भवन का काम पूरा किया।

वह विनम्र होने के साथ-साथ तेज-तर्रार नेता भी थे और 2017 के राज्यसभा चुनावों के दौरान वह कसौटी पर खरे उतरे, जब उन्होंने अमित शाह के सभी प्रयासों के बावजूद भाजपा उम्मीदवार को हराया था।

हाल ही में कांग्रेस के उथल-पुथल के दौरान, वह सीडब्ल्यूसी में सोनिया गांधी के पीछे चट्टान की तरह खड़े रहे और यहां तक कि उन्होंने सोनिया गांधी को पत्र लिखने के लिए अपने दोस्तों की आलोचना भी की।

पटेल को पत्रकारों का मित्र माना जाता था। वह देर रात पत्रकारों को बुलाते थे। लेकिन कभी भी सीधे तौर पर कोई बयान नहीं देते थे। उनके द्वारा दिए गए जवाब के अनुसार, उन्हें जज करना होता था।

आदर्श सोसाइटी घोटाले में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण का नाम सामने आने के बाद जब महाराष्ट्र में बदलाव हुआ था, तब वह पत्रकारों को बयान देने वाले एकमात्र व्यक्ति थे। और उनका तगड़ा जवाब था, पृथ्वी, लेकिन मुझे मत उद्धृत करो।

पत्रकार भी उन्हें उतना ही याद करेंगे। लेकिन कांग्रेस और पार्टी आलाकमान के लिए नुकसान बहुत बड़ा और कठिन है, खासकर ऐसे समय में जब पार्टी अच्छा प्रदर्शन नहीं करने के कारण दबाव में है।

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मध्य प्रदेश: आतंकवादी और नक्सली बनने की ली शपथ

उनका आरोप था कि नगरपालिका द्वारा आवंटित दुकानों का प्रतिमाह किराया दिये जाने के बावजूद कार्रवाई की गई और न्यायालय में विचाराधीन मामलों को लेकर भी संज्ञान नहीं लिया गया न ही उचित माध्यम से सूचना दी गई।

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मध्यप्रदेश के खरगोन जिले के भीकनगांव में अतिक्रमण मुहिम से आक्रोशित लोगों द्वारा आतंकवादी और नक्सलवादी बनने की शपथ लिए जाने को लेकर 12 लोगों के खिलाफ प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की गई है।

भीकनगांव के अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) ओम नारायण सिंह बड़कुल ने बताया कि सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के परीक्षण के उपरांत 12 लोगों के खिलाफ तहसीलदार द्वारा प्रतिबंधात्मक कार्यवाही का नोटिस जारी किया गया है। उन्होंने बताया कि इस वीडियो में पुष्टि हुई है कि इन लोगों ने अतिक्रमण मुहिम के विरोध में आतंकवादी व नक्सलवादी बनने की सार्वजनिक शपथ ली है। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक कार्रवाई की प्रतिक्रिया स्वरूप इस तरह का कृत्य स्पष्ट रूप से विधि विरुद्ध है।

भीकनगांव कस्बे में 6 जनवरी को विभिन्न वार्डों में अतिक्रमण हटाए जाने की कार्रवाई से आक्रोशित प्रभावितों ने उनके रोजगार समाप्त हो जाने का हवाला देते हुए सार्वजनिक रूप से आतंकवादी तथा नक्सलवादी बन जाने की शपथ ले ली थी। उन्होंने इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया था।

उनका आरोप था कि नगरपालिका द्वारा आवंटित दुकानों का प्रतिमाह किराया दिये जाने के बावजूद कार्रवाई की गई और न्यायालय में विचाराधीन मामलों को लेकर भी संज्ञान नहीं लिया गया न ही उचित माध्यम से सूचना दी गई। दूसरी ओर प्रशासन ने उनके आरोपों से नकारते हुए स्पष्ट किया था कि अतिक्रमण के विरुद्ध सम्बन्धितों को आवश्यक सूचना देने के उपरांत ही समस्त कार्रवाई संपादित की गई थी।

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अंतरराष्ट्रीय

चीन ने कैसे कोविड-19 महामारी पर काबू पाया

महामारी के दौरान वुहान में ठहरे फ्रांसीसी चिकित्सक फिलिप क्लेन ने कहा कि चीन सरकार ने महामारी की रोकथाम में चौंकाने वाला प्रयास किया है, और चीनी लोगों ने भी इसमें बड़ा योगदान दिया है।

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बीजिंग, 9 जनवरी । वर्ष 2021 की शुरूआत में चीन के वुहान शहर के वाणिज्यिक सड़क पर लोगों की भीड़ नजर आती है। वुहान वासी मास्क पहने हुए परिजनों और दोस्तों के साथ खुशी से शॉपिंग करते दिखाई देते हैं। लेकिन एक साल पहले वुहान में कोविड-19 महामारी की वजह से 76 दिनों तक लॉकडॉउन लगा रहा, और सारी सड़कें सुनसान दिखाई देती थीं।

सिर्फ कुछ महीनों में चीन ने महामारी पर काबू पाया, और आम लोगों का जीवन सामान्य हो गया। रूसी लड़की अन्ना ने कहा कि कुल 1.7 लाख चिकित्सकों ने वुहान में महामारी की रोकथाम का प्रयास किया, और चिकित्सा उपकरणों की कुल लागत 1 अरब युआन से अधिक रही। हर गंभीर मरीजों के इलाज में कम से कम 1 लाख युआन का खर्च आया है। पिछले साल मार्च के मध्य तक महामारी की रोकथाम में चीन ने 1 खरब 16 अरब 90 करोड़ युआन खर्च किया, जो दुनिया में सबसे अधिक है। महामारी फैलने के बाद लगभग सभी देशों ने आर्थिक विकास पर ध्यान दिया, सिर्फ चीन ने अपना पूरा ध्यान जनता की जान पर केंद्रित किया।

पिछले 10 मार्च को चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने वुहान का दौरा किया। उन्होंने सामुदायिक क्षेत्र जाकर स्थानीय लोगों का हालचाल जाना और महामारी की रोकथाम व लोगों के जीवन की स्थिति का जायजा लिया।

महामारी के दौरान वुहान में ठहरे फ्रांसीसी चिकित्सक फिलिप क्लेन ने कहा कि चीन सरकार ने महामारी की रोकथाम में चौंकाने वाला प्रयास किया है, और चीनी लोगों ने भी इसमें बड़ा योगदान दिया है।

वहीं, अमेरिका के कुह्न् फाउंडेशन के अध्यक्ष रॉबर्ट लॉरेंस कुह्न् ने कहा कि चीन सरकार की संगठनात्मक क्षमता अद्भुत है। कोई अन्य देश ऐसा नहीं कर सकता है। चीन में इतनी जल्दी महामारी की रोकथाम में विजय पाने का कारण चीनी कम्यनिस्ट पार्टी का नेतृत्व है।

(साभार—-चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

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Mirza Ghalib: मिर्जा गालिब के वो जबरदस्त शेर जो अमर हैं

गालिब की मां शिक्षित थीं उन्होंने गालिब को घर पर ही शिक्षा दी जिसकी वजह से उन्हें नियमित शिक्षा कुछ ज़्यादा नहीं मिल सकी। गालिब ने आगरा के पास उस समय के प्रतिष्ठित विद्वान ‘मौलवी मोहम्मद मोवज्जम’ से फारसी की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की।

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Mirza Ghalib

वह कुछ दिन लाहौर रहे, फिर दिल्ली चले आए। क़ौकान बेग के चार बेटे और तीन बेटियां थीं। इतिहास के पन्ने पलटें तो उनके बेटों में अब्दुल्लाबेग और नसरुल्लाबेगका वर्णन मिलता है। गालिब अब्दुल्लाबेग के ही पुत्र थे। जब गालिब पांच साल के थे, तभी पिता का देहांत हो गया। पिता के बाद चाचा नसरुल्ला बेग खां ने गालिब का पालन-पोषण किया। नसरुल्ला बेग खां मराठों की ओर से आगरा के सूबेदार थे।

गालिब की मां शिक्षित थीं उन्होंने गालिब को घर पर ही शिक्षा दी जिसकी वजह से उन्हें नियमित शिक्षा कुछ ज़्यादा नहीं मिल सकी। गालिब ने आगरा के पास उस समय के प्रतिष्ठित विद्वान ‘मौलवी मोहम्मद मोवज्जम’ से फारसी की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की। ज्योतिष, तर्क, दर्शन, संगीत एवं रहस्यवाद इत्यादि से इनका कुछ न कुछ परिचय होता गया। गालिब की कम ही समय में फारसी में गजलें भी लिखने लगें थे। आज हम आपको उनके कुछ मशहूर शेर पढ़ाएंगे।

-हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है

-मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

-हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

-उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

-ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

-रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

-इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

-न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

-रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं

-आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

-बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना

-हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और

-रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ‘ग़ालिब’
कहते हैं अगले ज़माने में कोई ‘मीर’ भी था

-बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे

-काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’
शर्म तुम को मगर नहीं आती

-दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ

-कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

-क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ
रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन

-कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

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