राजनीतिआर्थिक सुधारों के 30 साल: मनमोहन सिंह ने कहा यह आत्मनिरीक्षण का समय, 1991 के मुकाबले मुश्किल वक्त

WeForNews DeskJuly 23, 20213311 min

आज से 30 साल पहले 24 जुलाई 1991 को कांग्रेस पार्टी ने भारत की अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण सुधारों की शुरुआत की और हमारे देश की आर्थिक नीति के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त किया। बीते तीन दशकों में, सभी सरकारों ने देश को 3 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की लीग में ले जाने के लिए इस रास्ते का अनुसरण किया है।

इन सुधारों की सबसे अहम बात यह है कि इससे करीब 30 करोड़ भारतीयों को गरीबी से बाहर निकाला गया और हमारे युवाओं के लिए करोड़ों नई नौकरियों के अवसर पैदा हुए। आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया ने देश में मुक्त उद्यम की भावना को उजागर किया जिससे देश में कुछ विश्व स्तरीय कंपनियों की स्थापना हुई और भारत को कई क्षेत्रों में वैश्विक शक्ति के रूप में उभरने में मदद मिली। 1991 में आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया एक आर्थिक संकट से शुरू हुई थी जो उस समय हमारे देश के सामने थी, लेकिन यह संकट प्रबंधन तक सीमित नहीं था। भारत के आर्थिक सुधारों की इमारत बुनियाद समृद्ध होने की इच्छा, हमारी क्षमताओं में विश्वास और सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण छोड़ने के विश्वास पर बनी थी।

कांग्रेस पार्टी में अपने कई सहयोगियों के साथ इस सुधार प्रक्रिया में भूमिका निभाने का मुझे सौभाग्य मिला। आज तीन दशक बाद जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो इन तीन दशकों में हमारे राष्ट्र द्वारा की गई जबरदस्त आर्थिक प्रगति पर गर्व के साथ बहुत खुशी होती है। लेकिन मुझे कोविड-19 महामारी से हुई तबाही और लाखों साथी भारतीयों के नुकसान का गहरा दुख है। स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सामाजिक क्षेत्र पिछड़ गए हैं और हमारी आर्थिक प्रगति के साथ तालमेल नहीं बिठा पाए हैं।

यह समय आनंद और उल्लास का नहीं बल्कि आत्मनिरीक्षण और चिंतन करने का समय है। 1991 के संकट की तुलना में आगे की राह और भी कठिन है। एक राष्ट्र के रूप में हमारी प्राथमिकताओं को हर भारतीय के लिए एक स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के लिए पुनर्गणना करने की आवश्यकता है।

 

1991 में वित्त मंत्री के रूप में, मैंने विक्टर ह्यूगो को उद्धृत करते हुए अपना बजट भाषण समाप्त किया था, जिसमें कहा गया था कि, “पृथ्वी पर कोई भी शक्ति उस विचार को नहीं रोक सकती जिसका समय आ गया है”, 30 साल बाद, एक राष्ट्र के रूप में, हमें रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविता को याद रखना चाहिए, “लेकिन मुझे वादे निभाने हैं, और अभी बहुत दूर जाना है (“But I have promises to keep, And miles to go before I sleep”).

 

डॉ मनमोहन सिंह

 

यह समय आनंद और उल्लास का नहीं बल्कि आत्मनिरीक्षण और चिंतन करने का समय है। 1991 के संकट की तुलना में आगे की राह और भी कठिन है। एक राष्ट्र के रूप में हमारी प्राथमिकताओं को हर भारतीय के लिए एक स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के लिए पुनर्गणना करने की आवश्यकता है।

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