भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चालू सप्ताह भारी उथल-पुथल भरा साबित हो रहा है। विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली, आयातकों की ओर से डॉलर की मजबूत मांग और वैश्विक अनिश्चितताओं के चलते न केवल भारतीय रुपया रसातल में चला गया है, बल्कि शेयर बाजार भी औंधे मुंह गिरा है। 15-16 दिसंबर, 2025 के आसपास की ताजा स्थिति देखें तो रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर यानी रिकॉर्ड ‘लो’ 90.91 के करीब पहुंच गया है। कारोबारी सत्र के दौरान तो इसने 90.96 का स्तर भी छू लिया था, जो बाजार के लिए एक गंभीर संकेत है।
रुपये की चाल और डॉलर की मजबूती
मुद्रा बाजार में यह गिरावट अचानक नहीं आई है। सोमवार को रुपया 90.78 पर बंद हुआ था और मंगलवार को इसकी शुरुआत ही कमजोरी के साथ 90.79 पर हुई। भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बनी अनिश्चितता और देरी ने आग में घी का काम किया है। एचडीएफसी सिक्योरिटीज के दिलीप परमार ने मौजूदा हालात पर टिप्पणी करते हुए रुपये को एशियाई मुद्राओं में ‘सबसे खराब प्रदर्शन’ करने वाली करेंसी करार दिया है। उनका कहना है कि व्यापार घाटे के आंकड़ों में सुधार के बावजूद रुपये को वह सहारा नहीं मिल पाया जिसकी उम्मीद थी। वहीं, मिराए एसेट शेयरखान के अनुज चौधरी का अनुमान है कि निकट भविष्य में रुपये में भारी उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है और यह 90.30 से 91 के दायरे में कारोबार करेगा।
व्यापार घाटे के आंकड़ों से उम्मीद की किरण
बाजार के इस निराशाजनक माहौल में जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के वी.के. विजयकुमार एक सकारात्मक पहलू की ओर इशारा करते हैं। नवंबर माह में भारत का व्यापार घाटा घटकर 24.53 बिलियन डॉलर रह गया है, जो अक्टूबर में 41.64 बिलियन डॉलर के उच्च स्तर पर था। यह गिरावट थोड़ी राहत देने वाली है। विशेषज्ञों का मानना है कि कम होता व्यापार घाटा विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) पर बिकवाली के दबाव को कुछ हद तक कम कर सकता है और मुद्रा को स्थिर करने में मदद कर सकता है। हालांकि, अभी तक भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन बाजार को उम्मीद है कि केंद्रीय बैंक रुपये को संभालने के लिए हस्तक्षेप कर सकता है।
दलाल स्ट्रीट पर मंदी का साया
रुपये की इस कमजोरी का सीधा और नकारात्मक असर भारतीय शेयर बाजारों पर देखने को मिला। 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 533.50 अंक या 0.63% टूटकर 84,679.86 के स्तर पर बंद हुआ। दिन के कारोबार में तो एक समय यह 592 अंक तक नीचे चला गया था। इसी तरह एनएसई निफ्टी भी 167.20 अंकों की गिरावट के साथ 25,860.10 पर सिमट गया। बाजार की इस गिरावट में बैंकिंग सेक्टर, विशेषकर एक्सिस बैंक ने सबसे ज्यादा निराश किया, जिसके शेयरों में 5.03% की भारी गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा एचसीएल टेक, टाटा स्टील, अल्ट्राटेक सीमेंट और बजाज फिनसर्व जैसे दिग्गज शेयर भी लाल निशान में बंद हुए। हालांकि, टाइटन, भारती एयरटेल और महिंद्रा एंड महिंद्रा जैसी कंपनियों ने इस तूफानी बाजार में भी अपनी बढ़त बनाए रखी।
विदेशी निवेशकों की बेरुखी और वैश्विक संकेत
बाजार में मंदी का एक बड़ा कारण विदेशी निवेशकों का लगातार पैसा निकालना है। एक्सचेंज के आंकड़ों के मुताबिक, सोमवार को विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने करीब 1,468.32 करोड़ रुपये की इक्विटी बेची। इसके विपरीत, घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने 1,792.25 करोड़ रुपये की खरीदारी कर बाजार को सहारा देने की कोशिश की, लेकिन वैश्विक संकेतों के आगे यह नाकाफी साबित हुआ।
एशियाई बाजारों का हाल भी कुछ ऐसा ही रहा। दक्षिण कोरिया का कोस्पी, जापान का निक्केई और हांगकांग का हैंग सेंग इंडेक्स भारी गिरावट के साथ बंद हुए। अमेरिका और यूरोप के बाजारों से मिल रहे मिश्रित और नकारात्मक संकेतों ने भारतीय निवेशकों के हौसले पस्त कर दिए हैं। हालांकि, ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में 1.54% की गिरावट आई है और यह 59.63 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है, जो भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए थोड़ी राहत की बात हो सकती है।
आम आदमी पर असर और आगे की राह
रुपये की यह ऐतिहासिक गिरावट केवल शेयर बाजार तक सीमित नहीं रहेगी, इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ना तय है। आयात महंगा होने से ईंधन, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य जरूरी सामानों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे परिवारों का बजट और बिगड़ सकता है। यह समय नीति निर्माताओं के लिए भी परीक्षा की घड़ी है। उन्हें व्यापार समझौतों में तेजी लाने और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। रिजर्व बैंक की सतर्कता और सरकार की आर्थिक नीतियां ही यह तय करेंगी कि आने वाले दिनों में हम इस अस्थिरता को स्थिरता में बदल पाते हैं या नहीं।