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वाहवाही लूटने की आपाधापी ने पठानकोट में देश की सबसे ज़्यादा भद्द पिटवायी!

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Mukesh Kumar

By:मुकेश कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

भारतीय अफ़सरशाही ने नेताओं से जो सबसे ख़राब चीज़ सीखी है, उसे येन-केन-प्रकारेण ‘वाहवाही लूटने’ या सच-झूठ के नाम पर ‘क्रेडिट लेने’ की बीमारी के रूप में देखा जा सकता है. इस बीमारी का सबसे शर्मनाक चेहरा देश ने पठानकोट आतंकी हमले के दौरान देखा. इसे लेकर सबसे ज़्यादा गुस्सा उन लोगों में है जो पूरे सुरक्षा तंत्र और फौज़ के कामकाज से बहुत क़रीब से जुड़े रहे हैं. क्योंकि पठानकोट ऑपरेशन में जितने व्यापक पैमाने पर हमारी पूरी व्यवस्था की ख़ामियाँ उजागर हुईं, वैसा पहले कभी देखने को नहीं मिला. वैसे विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय और तालमेल की ख़ामियाँ तो मुम्बई हमले (26/11) में भी कोई कम नहीं थीं. लेकिन पठानकोट ने तो सारे रिकॉर्ड ही तोड़ दिये. इस ऑपरेशन में जो भी गुड़गोबर हुआ, उसकी सबसे बड़ी वजह तमाम अफ़सरों और नेताओं में ‘वाहवाही लूटने की आपाधापी’ थी.

पूरी दुनिया में राजनेता तो सार्वजनिक जीवन में तरह-तरह के सब्ज़बाग़ दिखाकर जनता को हमेशा से और बरगलाते रहते हैं. सत्ता पक्ष या विपक्ष कोई भी इसका अपवाद नहीं होता. लेकिन देखते ही देखते कारपोरेट सेक्टर की ‘पैकेज़िंग’ वाली बीमारी ने सरकारी तंत्र में भी अपना संक्रमण फैला दिया. अब सरकारी अफ़सरों में भी ‘अपने नम्बर बनाने’ की बीमारी घर कर गयी है. नौकरी में चमचागिरी तो हमेशा थी, लेकिन ‘वाहवाही लूटने की आपाधापी’ वाला जज़्बा मोदी राज में सिर चढ़कर बोल रहा है. सारा ध्यान सिर्फ़ बॉस को ख़ुश करने पर जाकर टिक गया है. प्रधानमंत्री मोदी की ही तरह उनके इर्द-गिर्द जमा लोगों में भी अपनी उपलब्धि से कई गुना ज़्यादा वाहवाही लूटने की होड़ दिखायी देती है. जिसको देखो वही ‘वन मैन शो’ वाली वाहवाही चाहता है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लोगों ने शायद यही सबसे बड़ी प्रेरणा ली है. मोदी का भी ये स्टाइल है कि वो सारे काम ख़ुद ही करते हुए दिखना चाहते हैं. उन्हें सामूहिकता रास नहीं आती. एकल उपलब्धियाँ उन्हें कहीं ज़्यादा आकर्षित करती हैं. इसीलिए सामूहिक उपलब्धियों की अहमियत घटती हुई दिख रही है. एकल उपलब्धियों का बोलबाला है. यही वजह है कि पठानकोट आतंकी हमले को देखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, अजीत डोभाल जैसा चोटी का अफ़सर ख़ुद ऐसे फ़ैसले लेने लगता है जो अन्य एजेंसियों के नेतृत्व को लेना चाहिए था. वो भूल जाता है कि उसका काम बड़े फ़ैसले लेना है. उस पर वाहवाही लूटने का ऐसा भूत सवार हो जाता है कि वो छोटी और बारीक़ बातों में भी ख़ुद को उलझा लेता है.

यही वजह है कि पठानकोट हमले को लेकर अजीत डोभाल ऐसे पेश आये, मानो प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री और गृह मंत्री सब कुछ वही हैं. उन्होंने ही आपदा प्रबन्धन समूह (Crises Management Group) और कैबिनेट की सुरक्षा मामलों की समिति (Cabinet Committee on Security) को सिरे से नज़रअन्दाज़ किया. अजीत डोभाल ने ही ये ग़लत आंकलन किया कि आतंकी चार ही थे. इसीलिए चारों के मार गिराये जाने के बाद ही उन पर वाहवाही लूटने का भूत सवार हो गया. उन्होंने ऑपरेशन के ख़त्म होने का औपचारिक ऐलान हुए बग़ैर ही राजनाथ सिंह, मनोहर पर्रिकर और नरेन्द्र मोदी से बधाई सन्देश (ट्वीट) जारी करवाने में हड़बड़ी दिखायी.

अजीत डोभाल ने ही आतंकियों के हमला शुरू करने से पहले ही एनएसजी की टीम को पठानकोट पहुँचा दिया था. जबकि इससे पहले उन्हें पठानकोट छावनी में मौजूद विशाल सैन्य शक्ति को मौक़ा देना चाहिए था. उन्होंने ही पूरे ऑपरेशन की कमांड उन सक्षम हाथों के हवाले नहीं की, जो इसके विशेषज्ञ रहे हैं. यही वजह है कि ऑपरेशन के बारे में प्रेस कांफ्रेंस करने का काम इतने ज़्यादा लोगों ने किया जैसा पहले कभी दिखायी नहीं दिया. इसकी वजह भी सिर्फ़ इतनी थी कि हरेक अफ़सर में वाहवाही लूटने की होड़ थी. इसी होड़ की ख़ातिर अजीत डोभाल को ये फ़ैसला लेना पड़ा कि वो चीन के साथ सीमा विवाद पर होने वाली निर्धारित बैठक में नहीं जा सके. यही होड़ ऑपरेशन ख़त्म होने के बाद उस वक़्त भी दिखायी दी जब वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पठानकोट वायु सेना स्टेशन का दौरा करवाने ले गये. इसका भी इरादा सिर्फ़ इतना था कि ऑपरेशन की कामयाबी का सेहरा सिर्फ़ उनके सिर ही बँधे!

इसीलिए दुआ कीजिए कि पठानकोट जैसी ग़लतियाँ आईन्दा कभी ना दोहराई जाएँ. इससे हरेक मुनासिब सबक़ ज़रूर लिया जाए. बहुत पुरानी बात नहीं है जब वाहवाही लूटने की इसी प्रवृति की वजह से ऐसे बयान दिये गये कि भारतीय सेना ने म्यांमार की सीमा में घुसकर आतंकियों का सफ़ाया किया था. तब भी सरकार को अपनी ग़लतियाँ समझ में आती इससे पहले ही चिड़ियों ने खेत चुग लिया था. इसी तरह, नेपाल के मामले में भी उस वक़्त सिर्फ़ वाहवाही लूटने का ही इरादा था जबकि भारतीय मीडिया में ये लीक करवा दिया गया कि नेपाल के संविधान में भारत किन-किन बातों को जोड़े जाने के पक्ष में है? कालान्तर में इसी रुख ने भारत-नेपाल सम्बन्धों को सबसे ख़राब स्तर पर पहुँचा दिया.

वैसे वाहवाही लूटने की बीमारी का ताल्लुक सिर्फ़ मोदी राज से ही नहीं है. पूर्व केन्द्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने भी कमोबेश इसी मनोदशा से प्रेरित होकर उस गड़े मुर्दे को उखाड़ दिया जिसमें ये बातें लीक हुई थीं कि 2012 में भारतीय सेना की दो बड़ी टुकड़ियों ने हिसार और आगरा से दिल्ली की ओर इसलिए कूच किया है, क्योंकि उसका इरादा दिल्ली में ‘तख़्तापलट’ का था. मुमकिन है कि मनीष तिवारी ने उस वक़्त सेनाध्यक्ष रहे जनरल वी के सिंह की साख़ को गिराने के लिए ये दाँव खेला हो. जनरल सिंह इस वक़्त मोदी सरकार में राज्यमंत्री हैं. लेकिन मनीष का दाँव ख़ुद उनकी पार्टी और उसके तत्कालीन रक्षा मंत्री ए के एंटोनी के लिए उल्टा पड़ गया. क्योंकि सरकार में बैठे मंत्रियों ने अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए जानबूझकर ख़ुलासा करने अख़बार की ख़बर को ग़लत ठहराया था. यही वजह है कि अब काँग्रेस पार्टी ने मनीष तिवारी के तेवर से कन्नी काट ली है.

मनीष से पहले फ़ोकट की वाहवाही लूटने की फ़ितरत मणि शंकर अय्यर और सलमान ख़ुर्शीद जैसे नेता भी दिखा चुके हैं. इसी बीमारी ने इन दिनों बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी को भी सुर्ख़ियों में बना रखा है. स्वामी भी राम मन्दिर को लेकर दिये जा रहे अपने बयानों की वजह से चर्चा में हैं. कभी कहते हैं कि दिसम्बर से राम मन्दिर बनना शुरू हो जाएगा. कभी वो अयोध्या के बाद मथुरा-काशी को लेकर भी माहौल गरमाने लगते हैं. ताज़्ज़ुब की बात ये है कि कभी इन्हीं मुद्दों को दरकिनार करके बीजेपी ने उस एनडीए को बनाया था, जिसकी क़मान अटल बिहारी वाजपेयी ने थामी थी. वैसे बीजेपी के पास पूर्ण बहुमत होने के बावजूद तकनीकी रूप से मौजूदा मोदी सरकार भी एनडीए की ही है. कहने के लिए सही, दोनों ही एनडीए सरकारों ने बीजेपी के विवादित मुद्दों से ख़ुद को दूर रखा है!

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चक्रवात निवार ने पार किया तमिलनाडु और पुडुचेरी समुद्री तट

मौसम विभाग ने कहा कि हवा की गति तमिलनाडु के आंध्र प्रदेश और चित्तूर जिले के आंतरिक जिलों (रानीपेट, तिरुवन्नमलाई, तिरुपत्तूर, वेल्लोर) में 65-75 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक कम होने की संभावना है।

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Nivar Cyclone Chennai Rain

चेन्नई, 26 नवंबर । गंभीर चक्रवाती तूफान निवार (Cyclone Storm Nivar) ने 25 नवंबर की रात और 26 नवंबर की सुबह के दौरान पुडुचेरी के पास से पुडुचेरी और तमिलनाडु तट को 120-130 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पार कर लिया है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने गुरुवार को यह जानकारी दी।

चक्रवात के कारण तमिलनाडु का कुड्डालोर जिला बहुत प्रभावित हुआ है, वहां तेज हवाओं के कारण कई पेड़ गिर गए। जिला प्रशासन गिरे हुए पेड़ों को हटाने में जुटा है।

मौसम विभाग के अनुसार, तटीय तमिलनाडु और पुडुचेरी में चक्रवात का केन्द्र पुडुचेरी से उत्तर में 25 किलोमीटर पर वायु गति 90-100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार के बीच बना हुआ है।

आईएमडी ने कहा कि अगले 3 घंटों के दौरान चक्रवाती तूफान और कमजोर होगा।

चक्रवात ने बुधवार रात लगभग 10.30 बजे तटीय इलाके में दस्तक दिया। इस दौरान उसकी गति 16 किलोमीटर प्रतिघंटा थी।

मौसम विभाग के अनुसार, निवार ने 25 नवंबर को रात 11.30 बजे से 26 नवंबर को सुबह 2:50 बजे के बीच तटीय इलाके को पार किया। करीब 6 घंटे तक तेज रहने के बाद अब इसके धीरे-धीरे कमजोर होने की संभावना है।

समुद्र के किनारे अभी लहरें में भारी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है, जिसके कारण भारी लहरें तटों से टकरा रही हैं। इसके चलते 26 नवंबर को अधिकांश या कई स्थानों पर भारी/बहुत भारी वर्षा होने की संभावना है। इसमें तमिलनाडु के रानीपेट, तिरुवन्नमलाई, तिरुपत्तूर, वेल्लोर जिलों और चित्तूर, कुरनूल, प्रकाशम और आंध्र प्रदेश के कुडप्पा जिले शामिल हैं।

मौसम विभाग ने कहा कि हवा की गति तमिलनाडु के आंध्र प्रदेश और चित्तूर जिले के आंतरिक जिलों (रानीपेट, तिरुवन्नमलाई, तिरुपत्तूर, वेल्लोर) में 65-75 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक कम होने की संभावना है।

पुडुचेरी सरकार ने चक्रवात के चलते गुरुवार को भी सार्वजनिक अवकाश घोषणा की है। वहीं राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) की 25 टीमों को तमिलनाडु, पुदुचेरी और आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों में तैनात किया गया है।

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कांग्रेस के दिग्गज-निष्ठावान नेता अहमद पटेल का निधन – श्रद्धांजलि

पटेल को पत्रकारों का मित्र माना जाता था। वह देर रात पत्रकारों को बुलाते थे। लेकिन कभी भी सीधे तौर पर कोई बयान नहीं देते थे। उनके द्वारा दिए गए जवाब के अनुसार, उन्हें जज करना होता था।

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ahmed patel

नई दिल्ली । कांग्रेस के दिग्गज और निष्ठावान नेता अहमद पटेल का बुधवार को निधन हो गया। उन्होंने कई मौकों पर पार्टी के लिए संकटमोचक का काम किया था। कोरोना से संक्रमित होने के बाद वह स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याओं से जूझ रहे थे और उनके कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया जिस कारण बुधवार तड़के उनका निधन हो गया।

कांग्रेस पार्टी के निष्ठावान और संकटमोचक की छवि के रूप में पहचाने जाने वाले पटेल ने कई बार पार्टी को मुश्किलों से निकाला। 2008 में जब वाम दलों के समर्थन वापस लेने के बाद यूपीए सरकार विश्वास प्रस्ताव का सामना कर रही थी, तो वह सरकार को बचाने के लिए पर्याप्त संख्या बल जुटाने में कामयाब रहे थे।

उनके निधन से पार्टी में जो खालीपन आया है वह कभी नहीं भर सकेगा क्योंकि वह एक पुरानी शैली के राजनेता थे, जिनकी पार्टी लाइन के परे भी अच्छी पहुंच थी और हर जगह उनके दोस्त थे। 2007 में, जब सोनिया गांधी ने उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी को लॉन्च करने की जिम्मेदारी पटेल को सौंपी तो वह पटेल ही थे जिन्होंने हर चीज का प्रबंधन किया। एक मुस्लिम बहुल सीट अमरोहा में राहुल गांधी की जनसभा में बड़ी भीड़ उमड़ी। जब इस पत्रकार ने उस समय के एक निर्दलीय सांसद से स्थानीय सांसद के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा कि अहमद भाई कहते हैं तो करना पड़ता है। तो कुछ ऐसा पटेल का प्रभाव था।

वह अपने सभी कौशल के साथ पीछे पहकर सबकुछ संभालते थे, एक ऐसे नेता थे जो आपको बता सकते थे कि राजनीतिक गलियारे में हवा का रुख किस ओर है। 2019 में, आम चुनावों से पहले उन्हें पता था कि उनकी पार्टी की स्थिति अच्छी नहीं है और उन्होंने मीडिया के सामने यह व्यक्त किया। 23 मदर टेरेसा क्रिसेंट में उनका निवास स्थल 10 जनपथ के बाद सबसे अधिक मांग और सुखिर्यो वाला था।

21 अगस्त, 1949 को गुजरात के भरूच में जन्मे, वह देश के सबसे प्रभावशाली राजनेताओं में से एक थे। यूपीए शासन के दौरान यहां तक कि मंत्री और मुख्यमंत्री उनके कार्यालय से अपॉइंटमेंट के लिए इंतजार करते थे। यद्यपि वह शक्तिशाली थे, वह दूसरों से विनम्रता से मिलते थे। वह पत्रकारों के लिए हमेशा उपलब्ध रहते थे।

पटेल अपने समय के सबसे युवा नेताओं में से एक थे जब उन्हें गुजरात कांग्रेस का नेतृत्व करने के लिए राजीव गांधी द्वारा चुना गया था। बाद में वह संसदीय सचिव के रूप में राजीव की टीम में शामिल हो गए, और कांग्रेस पार्टी के सत्ता संभालने के बाद वे सोनिया गांधी के सबसे करीबी विश्वासपात्र और उनके पास पहुंचने वाले एकमात्र चैनल बन गए।

उन्हें राहुल गांधी द्वारा अपने कार्यकाल में पार्टी के कोषाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था। पटेल पार्टी लाइन के पार संबंधों को बनाए रखने में यकीन रखते थे।

अहमद पटेल ने 1976 में अपने गृह राज्य गुजरात में भरूच में स्थानीय निकाय चुनाव लड़कर अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत की। वह तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के संसदीय सचिव थे, पटेल सरदार सरोवर परियोजना की निगरानी के लिए नर्मदा प्रबंधन प्राधिकरण की स्थापना में सक्रिय थे।

जवाहरलाल नेहरू के शताब्दी समारोह के पूर्व, पटेल को 1988 में जवाहर भवन ट्रस्ट का सचिव नियुक्त किया गया। राजीव गांधी ने उन्हें नई दिल्ली के रायसीना रोड में जवाहर भवन के निर्माण की निगरानी करने के लिए कहा, ऐसी परियोजना जो एक दशक से अधिक समय से रुका हुआ था। नेहरू के जन्म शताब्दी समारोह के लिए रिकॉर्ड एक साल की अवधि में, उन्होंने सफलतापूर्वक जवाहर भवन का काम पूरा किया।

वह विनम्र होने के साथ-साथ तेज-तर्रार नेता भी थे और 2017 के राज्यसभा चुनावों के दौरान वह कसौटी पर खरे उतरे, जब उन्होंने अमित शाह के सभी प्रयासों के बावजूद भाजपा उम्मीदवार को हराया था।

हाल ही में कांग्रेस के उथल-पुथल के दौरान, वह सीडब्ल्यूसी में सोनिया गांधी के पीछे चट्टान की तरह खड़े रहे और यहां तक कि उन्होंने सोनिया गांधी को पत्र लिखने के लिए अपने दोस्तों की आलोचना भी की।

पटेल को पत्रकारों का मित्र माना जाता था। वह देर रात पत्रकारों को बुलाते थे। लेकिन कभी भी सीधे तौर पर कोई बयान नहीं देते थे। उनके द्वारा दिए गए जवाब के अनुसार, उन्हें जज करना होता था।

आदर्श सोसाइटी घोटाले में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण का नाम सामने आने के बाद जब महाराष्ट्र में बदलाव हुआ था, तब वह पत्रकारों को बयान देने वाले एकमात्र व्यक्ति थे। और उनका तगड़ा जवाब था, पृथ्वी, लेकिन मुझे मत उद्धृत करो।

पत्रकार भी उन्हें उतना ही याद करेंगे। लेकिन कांग्रेस और पार्टी आलाकमान के लिए नुकसान बहुत बड़ा और कठिन है, खासकर ऐसे समय में जब पार्टी अच्छा प्रदर्शन नहीं करने के कारण दबाव में है।

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चुनाव

“अबकी बार किसका बिहार?”, ये 12 सीटें जिन पर होंगी सबकी नजर

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Bihar Election Results

“अबकी बार किसका बिहार?” ये सवाल बीते कई महीनों से बिहार की सियासी फिजाओं और लोगों की जुबान पर तैर रहा है। कल यानी मंगलवार 10 नंवबर को ये इंतजार खत्म हो जाएगा। सुबह 8 बजे से जनता द्वारा ईवीएम में कैद नेताओं की किस्मत के पिटारे खुलने शुरू हो जाएंगे और चढ़ते दिन के साथ ये स्पष्ट हो जाएगा कि इस बार राज्य की जनता ने सत्ता की चाभी “युवराज” को सौंपी है या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर भरोसा बरकरार रखा है। कोरोना महामारी के बीच राज्य में तीन चरणों में चुनाव संपन्न 7 नवंबर को संपन्न हुए हैं।

इस बार चुनावी मैदान में सीएम की रेस में प्रमुख दावेदार के तौर पर महागठबंधन का चेहरा और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव, एनडीए की तरफ से मौजूदा सीएम नीतीश कुमार और नई नवेली प्लुरल पार्टी की मुखिया और लंदन से पढ़ाई कर लौटने वाली पुष्पम प्रिया चौधरी हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) और मायावती की पार्टी बसपा के साथ 6 दलों ने गठबंधन कर चुनाव लड़ा है और ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट की तरफ से पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा को सीएम पद का दावेदार बनाया है। जनअधिकार पार्टी के अध्यक्ष पप्पू यादव को प्रगतिशील लोकतांत्रिक गठबंधन ने मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर मैदान में उतारा है। राज्य में एनडीए से अलग होकर 143 सीटों पर दिवंगत नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी चिराग पासवान की अगुवाई में चुनाव लड़ रही है। हालांकि, चिराग ने खुद को सीएम पद के लिए घोषित नहीं कर रखा है।

राज्य की एक दर्जन से अधिक हॉट सीटें, जिस पर टिकेंगी हर किसी की नजर 

राघोपुर विधानसभा

वैशाली जिले के राघोपुर विधानसभा से राजद नेता और महागठबंधन की तरफ से सीएम पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव चुनाव लड़ रहे हैं। यह राजद का गढ़ माना जाता रहा है। लेकिन साल 2010 में पूर्व सीएम राबड़ी देवी यहां से चुनाव हार गई थी। लेकिन, 2015 में जब राजद ने एनडीए का साथ छोड़ने वाली पार्टी जेडीयू की अगुवाई में चुनाव लड़ा था और राघोपुर से तेजस्वी यादव को मैदान में उतारा था, वो जीत दर्ज करने में सफल रहे। लालू यादव ने भी यहीं से साल 1995 में चुनाव लड़ा था। क्षेत्र में करीब 3.17 लाख मतदाता हैं। यहां से तेजस्वी को टक्कर देने के लिए भाजपा की तरफ से सतीश कुमार को मैदान में उतारा है। सतीश 2015 में यहां से हार गए थे। इस साल भाजपा और लोजपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था। अब देखना होगा कि यहां से तेजस्वी के तेवर कितने असर दिखाते हैं।

इमामगंज विधानसभा

हिंदुस्तान आवाम मोर्चा (हम) के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जितनराम मांझी एनडीए के सहयोगी दल हैं, जिन्हें सात सीटें जेडीयू के खाते से मिली है। गया जिले के इमामगंज विधानसभा से वो अपनी किस्मत आजमां रहे हैं। वहीं, मांझी को टक्कर देने के लिए महागठबंधन की तरफ से पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उदयनारायण चौधरी मैदान में हैं। ये आरक्षित सीट है। चौधरी यहां से पांच बार विधायक रह चुके हैं।

पटना साहिब

मौजूदा पथ निर्माण मंत्री नंदकिशोर यादव को एनडीए ने पटना साहिब से मैदान में उतारा है। यह सीट भाजपा के लिए सुरक्षित मानी जाती रही है। यादव को टक्कर देने के लिए मैदान में कांग्रेस की तरफ से प्रवीण सिंह को उतारा है। यहां से विभिन्न दलों के 12 प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं। नंद किशोर यादव दो बार यहां से बाजी मार चुके हैं।

बोचहां विधानसभा

पूर्व भूमि सुधार मंत्री और परिवहन मंत्री रमई राम मुजफ्फरपुर के बोचहां विधानसभा से आठ बार विधायक रह चुके हैं। जेडीयू से नाता तोड़ इस बार वो राजद की पिच से बैटिंग कर रहे हैं। टक्कर में एनडीए की सहयोगी पार्टी वीआईपी ने मुशाफिर पासवान को मैदान में उतारा है। वीआईपी एनडीए का घटक दल है और 11 सीटों पर चुनाव लड़ रही है।

सिमरी बख्तियारपुर

सन् ऑफ मल्लाह के नाम से खुद को राजनीतिक पटल पर रखने वाले वीआईपी प्रमुख मुकेश साहनी पहली बार विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत सिमरी बख्तियारपुर सीट से आजमां रहे हैं। वहीं, राजद ने साहनी के सामने यूसुफ सलाउद्दीन को उतारा है। महागठबंधन से नाराज होने के बाद साहनी ने एनडीए का दामन थामा है।

चेरिया-बरियारपुर

मुजफ्फरपुर शेल्टर होम के बाद विवादों में घिरने वाली पूर्व सामाजिक कल्याण मंत्री मंजू वर्मा जेडीयू की तरफ से बेगुसराय के चेरिया-बरियारपुर से चुनाव लड़ी हैं। वर्मा को चुनौती देने के लिए राजद से राजवंशी महतो ने चुनाव लड़ा है।

मोकामा विधानसभा

मोकामा से बहुचर्चित बाहुबली अनंत सिंह राजद की तरफ से चुनाव मैदान में हैं। अनंत सिंह को टक्कर देने के लिए नीतीश कुमार ने राजीव लोचन को मैदान में उतारा है। यहां से अनंत सिंह का दबदबा दशकों से रहा है। 2015 वो निर्दलीय चुनाव लड़े थे।

जमुई विधानसभा

यहां से भाजपा ने श्रेयसी सिंह को मैदान में उतारा है। जबकि राजद ने वर्तमान विधायक विजय प्रकाश को महागठबंधन की तरफ से भरोसा जताया है। यह सीट इस लिए अहम माना जा रहा ह क्योंकि श्रेयसी सिंह नेशनल सूटर रही हैं और केंद्रीय मंत्री स्व. दिग्विजय सिंह की पुत्री हैं। जबकि विजय प्रकाश पूर्व केंद्रीय मंत्री जयप्रकाश नारायण के छोटे भाई हैं।

हसनपुर विधानसभा

समस्तीपुर के हसनपुर से राजद सुप्रीमो लालू यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव ताल ठोक रहे हैं। वहीं, जेडीयू ने राजकुमार राय को मैदान में उतारा है। पिछली बार राजकुमार राय यहां से जीते थे।

बांकीपुर विधानसभा

पटना का बांकीपुर विधानसभा सीट खूब सुर्खियों में रहा हैं। इस सीट से अभिनेता और पूर्व सांसद शत्रुघ्न सिन्हा के बेटे लव सिन्हा ने कांग्रेस के टिकट पर चुनावी लड़ा हैं। वहीं, एनडीए की तरफ से मौजूदा विधायक नितिन नवीन हैं। यह सीट और भी दिलचस्प इस लिए है क्योंकि मार्च में अखबार के छपे विज्ञापन के जरिए बिहार के अगले सीएम की दावेदारी करने वाली प्लुरल्स पार्टी की अध्यक्ष पुष्पम प्रिया चौधरी हैं। 

परसा विधानसभा

सारण जिले का परसा विधानसभा क्षेत्र खास है। लालू के समधी और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रिका राय को जेडीयू ने यहां से उतारा है। वहीं, लालू के समधी को टक्कर देने के लिए आरजेडी से छोटे लाल राय हैं।

मधेपुरा विधानसभा

यहां से जाप के अध्यक्ष और मधेपुरा के पूर्व सांसद पप्पू यादव मैदान में हैं। उनको टक्कर देने के लिए जेडीयू ने निखिल मंडल पर भरोसा जताया है। जबकि राजद की तरफ से प्रो. चंद्रशेखर मैदान में हैं।

भले ही पार्टी ने इन नेताओं पर भरोसा जताया है लेकिन मतगणना के बाद यह स्पष्ट हो जाएगा कि आखिर जनता ने किस पर भरोसा जताया है।

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