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क्यों हमारे बिल्डर्स सबसे ज़्यादा मज़बूत हैं, उनका कभी बाल भी बाँका नहीं होता..!

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 blog : Mukesh Kumar Singh

क्यों हमारे बिल्डर्स सबसे ज़्यादा मज़बूत हैं, उनका कभी बाल भी बाँका नहीं होता..!

बिल्डर्स और डेवेलपर्स होना कोई मज़ाक नहीं है! आपके पास थोड़ा सा पैसा हो और बड़ी से बड़ी बेईमानी करने के लिए बड़ा सा कलेज़ा हो तो आप उम्दा बिल्डर बन सकते हैं! ये ऐसा गोरखधन्धा है जिसमें आप महज़ कुछ करोड़ रुपये लगाइए और अरबों की ज़ायदाद के मालिक बनकर ऐश कीजिए! चाहें तो थोड़ा-बहुत काम भी कर सकते हैं, ताक़ि आपकी दुकान चलती रहे! ताक़ि आप ख़रबों कमा सकें! बिल्डर बनते ही नेता, अफ़सर, इंज़ीनियर, पुलिस, अदालत – सब पर आपका रौब चलने लगेगा! लाखों-करोड़ों की ज़मीन आपको सरकारी एजेंसियाँ इतनी आसान शर्तों पर दे देंगी कि चाहें तो आप कभी उन शर्तों को पूरा नहीं करें! एक अदद घर का सपना देखने वालों से भी आप झूठे वादे करके हज़ारों करोड़ रुपये जमा कर लीजिए! फिर अपनी शर्तों पर घर बनाइए, वो भी यदि मज़बूरी हो तो, वर्ना ग्राहकों के पैसों से ही अन्य ज़मीनें ख़रीदते रहिए! ज़्यादातर बिल्डर्स यही करते हैं!

ग्राहक यदि आपके पास रोता-बिखलता आये तो आपके गुर्गे उसे दुत्कार या मार-पीटकर भगा देंगे! आपको कोई तकलीफ़ नहीं होगी! एकाध कोई सिरफिरा होगा तो वो कोर्ट-कचहरी करेगा, उससे निपटने के लिए आपके पास लीगल डिपार्टमेंट तो होता ही है! वो निपटेगा, ऐसे सारे झंझटों से! वही आपको बताएगा कि यदि बद्किस्मती से आपके ख़िलाफ़ कोई अदालती आदेश पारित हो जाए, तो भी आपके चेहरे पर शिकन नहीं आनी चाहिए! आपके वकील उस ‘दुष्ट ग्राहक’ को अदालतों के इतने चक्कर कटवाएँगे कि उसका हौसला ही पस्त हो जाएगा! उसकी दुर्गति देखकर कोई और ग्राहक आप जैसे ‘शेर से टकराने’ की सपने में भी नहीं सोचेगा! इस तरह, आपकी नाजायज़ सल्तनत को पूरा का पूरा सरकारी तंत्र अपना राष्ट्र-धर्म समझकर चलवाता रहेगा! आपको तो बस, गाहे-बगाहे उनके मुँह में चारा डालते रहना है!

सही मायने में बिल्डर का असली काम ही है कि उन सरकारी लोगों के मुँह में चारा डालते रहना, जो क़ानून की दुहाई देते हुए अपनी चोंच खोलने की कोशिश करें! उधर, पीड़ित ग्राहकों की सुनवाई कहीं नहीं है! क्योंकि क़ानून के रखवालों को सबसे अच्छी तरह से मालूम होता है कि कैसे वो रखवाली करने के अपने काम से कन्नी काट सकते हैं! पीड़ित ग्राहकों की आँसू पोंछना तो दूर, कोई उनकी आवाज़ भी नहीं उठाता! मीडिया मालिकों को भी बाक़ायदा ‘सेट’ करके रखा जाता है! ताक़ि वो पीड़ित ग्राहकों की आवाज़ तक नहीं उठा सकें! ख़ुद को बदनामी और छीछालेदर से बचाने के लिए मीडिया मालिकों से सीधे डील की जाती है! उन्हें ‘बिज़नेस’ के रूप में विज्ञापनों का चढ़ावा चढ़ाया जाता है. कभी-कभार कुछ फ्लैट्स भी ‘कॉर्पोरेट रिबेट’ के साथ बेच दिये जाते हैं.

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बिल्डर्स की कारस्तानियों से सिर्फ़ इतना साबित होता है कि वो हिमालय की तरह अजेय हैं. कोई उनसे पार नहीं पा सकता! क्योंकि देश में क़ानून से तो सिर्फ़ कमज़ोर डरता है, मज़बूत तो उसे ठेंगे पे रखता है..! बिल्डर तो अपने प्रोजक्ट्स से भी लाखों गुना ज़्यादा मज़बूत होते हैं! इसीलिए उनका कभी बाल तक बाँका नहीं होता! हालाँकि, उनकी जमात में एक से बढ़कर एक नंगे भरे हुए हैं! सभी आपस में बेहद संगठित हैं. सबका ढर्रा एक जैसा है. सभी ग्राहकों को रुलाते हैं. नेताओं और सरकारी तंत्र का बिल्डर समुदाय बहुत लाड़ला होता है. क्योंकि एक ओर, इनका ‘निर्माण क्षेत्र’ अर्थव्यवस्था में तेज़ी लाता है. ग़रीबों को रोज़गार देता है. इससे सीमेन्ट-सरिया और भवन निर्माण सेक्टर को धन्धा मिलता है. सरकारें ख़ूब टैक्स बटोरती हैं. दूसरी ओर, काले धन को ठिकाने लगाने के लिए बिल्डर्स को बेहतरीन अड्डा माना जाता है. तीसरी ओर, यही तबक़ा सभी पार्टी के नेताओं को नेतागिरी चमकाने के लिए करोड़ों-अरबों रुपये का चन्दा मुहैया करवाता है. ये आलम अखिल भारतीय है!

लेकिन रात कितनी भी लम्बी हो, सुबह तो होती ही है! ऐसी ही एक सुबह की चाहत लिये दिल्ली के दो जाँबाज़ ग्राहकों ने यूनीटेक कम्पनी के मालिकों को एक दिन के लिए ही सही जेल की हवा तो खिला दी! जेल जाना भी किसी फ़िल्मी ड्रॉमा जैसा था! सालों-साल तक ‘तारीख़-पे-तारीख़’ के बाद अदालत ने यूनीटेक के चार मालिकों को 14 दिन की न्यायिक में भेजने का आदेश सुनाया. ये कहकर ज़मानत की अर्ज़ियाँ ख़ारिज़ कर दीं कि अदालत में अंडरटेकिंग देने के बावजूद एक करोड़ रुपये की ख़ातिर यूनीटेक ने जानबूझकर क़ानून का मज़ाक उड़ाया. मज़िस्ट्रेट साहब बहुत जानकार थे. तभी तो उन्होंने कहा कि बिल्डरों के ख़िलाफ़ अव्वल तो आसानी से एफआईआर तक दर्ज़ नहीं होती! फिर ग़ैर ज़मानती वारंट के बावजूद पुलिस इन्हें पकड़ नहीं पाती! ये तो सिर्फ़ अदालत की सख़्ती से ही क़ाबू में आये हैं!

लेकिन पड़ोसी सेशंस कोर्ट ने चन्द मिनटों में ही तय कर लिया कि ‘बड़ी हस्तियों’ का क़सूर चाहे जो हो, जमानत पाना उनका हक़ है! हमारी अदालतें पीड़ित के हक़ के लिए द्रवित हों या ना हों लेकिन अपराधियों के हक़ की अनदेखी नहीं कर पाती हैं! मोटी-मोटी फ़ीस लेने वाले भारी-भरकम वकील ऐसा होने नहीं देते! इसीलिए यूनिटेक के ‘चन्द्राओं’ फ़टाफ़ट जमानत मिल गयी. लेकिन बद्क़िस्मती से वक़्त रहते रिहाई के क़ाग़जात पूरे नहीं हुए. जेल जाना पड़ा. यूनीटेक के ‘ख़ुदा’ उतने नसीब वाले नहीं थे जैसे सलमान भाई थे, जिन्हें मुम्बई हाईकोर्ट ने इतनी जल्दी ज़मानत दी थी कि इतिहास ही क़ायम हो गया! वैसे झटपट जमानत हासिल करके यूनिटेक के ‘चन्द्राओं’ ने भी तो कीर्तिमान बनाया ही! पूरे प्रसंग से यही साबित हुआ कि क़ानून से तो सिर्फ़ कमज़ोर डरता है, मज़बूत तो उसे ठेंगे पे रखता है!

अब बात उस हैबिटैट प्रोजेक्ट की जिसमें यूनिटेक को ये दिन देखने पड़े! 25 एकड़ वाले इस प्रोजेक्ट में 18 टॉवर्स में विभिन्न श्रेणियों के 902 फ्लैट्स बनने थे. क़ीमत थी 43 लाख से 75 लाख रुपये के बीच. इसकी ज़मीन अलॉट हुई नवम्बर 2004 में, लीज़ डीड पूरी हुई फरवरी 2005 में, पहला पार्ट कम्पलीशन मिला अक्टूबर 2008 में और दूसरा जून 2010 में! लेकिन वक़्त पर घर नहीं मिला तो पीड़ितों ने राज्य उपभोक्ता अदालत से गुहार लगायी. वहाँ से अक्टूबर 2014 तक 11 फ़ीसदी ब्याज़ समेत ग्राहक को पैसा लौटाने का आदेश हुआ लेकिन यूनिटेक ने आदेश को अपने ठेंगे पर रखा. तब पीड़ित ने फौज़दारी का मुक़दमा किया. इसी के तहत ‘चन्द्राओं’ को जेल में डालने का आदेश हुआ.

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यूनिटेक एक दुर्दान्त बिल्डर है! इसी हैबिटैट प्रोजक्ट में ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण का उस पर 65 करोड़ रुपये बकाया है. इसके अलावा वो किसानों की ज़मीन के मुआवज़े का भी 28 करोड़ रुपये दबाये बैठा है. लेकिन यूनिटेक के सुख-चैन में कोई ख़लल नहीं पड़ा, क्योंकि दमदार लोगों के आगे हमारे क़ानून हमेशा से बेदम साबित होते रहे हैं! इसीलिए ताज़्ज़ुब तो उस अफ़सर पर है जिसने नवम्बर 2014 में ग्रेटर नोएडा के ही म्यू-2 सेक्टर में यूनिटेक को दिये गये 100 एकड़ के प्लॉट का आबंटन रद्द कर दिया! 2006 के इस आबंटन को लेकर यूनिटेक पर प्राधिकरण का 1100 करोड़ रुपया बकाया था! ये यूनिटेक की हस्ती ही थी जिसने नौ साल तक आबंटन को रद्द होने से टाले रखा!

बहरहाल, यूनिटेक जैसी लाखों कहानियाँ देश के हरेक छोटे-बड़े शहर में मौज़ूद है. उम्मीद की जा सकती है कि संसद के अगले सत्र में सरकार रियल स्टेट बिल लाकर इस पूरे सेक्टर को नियंत्रित करने का ज़रिया बना देगी. नये क़ानून के तहत देश में टेलीकॉम, बीमा, बिजली, बैंकिंग और शेयर बाज़ार की तरह रेगुलेटर बनाया जाना है. मनमोहन सरकार की ओर से लाया गया ये बिल संसद में दो साल से अटका पड़ा है. अब यदि मोदी सरकार ने इस क़ानून को बना दिया तो 26 बड़े शहरों में चल रहे 17 हज़ार से ज़्यादा प्रोजेक्ट्स के करोड़ों ग्राहकों को राहत मिलेगी. देश के रियल स्टेट सेक्टर में क़रीब 3.5 लाख करोड़ रुपये लगे हैं. इससे हर साल करीब 10 लाख लोगों को उनका घर मिल पाता है. 2012 के एक सरकारी अनुमान के मुताबिक़, देश के शहरों में रहने वाले क़रीब 2 करोड़ परिवारों को पास अपना घर नहीं है. अनुमान है कि अगले 30 साल में भारत की शहरी आबादी दोगुनी होकर 90 करोड़ तक जा पहुँचेगी. इसीलिए रियल स्टेट सेक्टर को सुधारे बग़ैर हालात नहीं बदले जा सकते.

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लौंगी भुइंया से दशरथ मांझी बनने की पूरी कहानी

लौंगी भुइंया के साथ के लोग शायद अब उनके साथ न हों पर आने वाली उस गाँव की पीढ़ी “लौंगी भुइंया” का हमेशा शुक्रगुज़ार रहेगी।

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Longi Bhuiyan

अभी हाल ही में महामारी के दौरान आप सभी को पता लगा… की लोग शहर छोड़ अपने-अपने गाँव लौट रहे है। और उनमें जो मजदूर थे वो ज़्यादातर बिहार से ताल्लुक रखते थे। ख़ैर ये तो बात थी उनके लौटने की।उनके अपने गाँव छोड़ शहर जाने की कहानी भी बहुत लम्बी है …पर उसके बारे में बात फिर कभी।

फिलहाल उन्हीं लम्बी कहानियों में से एक कहानी हैं, बिहार के “गया” ज़िले की राजधानी पटना से 200 किमी दूर बांकेबाज़ार प्रखंड की कहानी हैं।

यहाँ पर रहने वाले लोगों की ज़िन्दगी खेती पर ही निर्भर हैं और खेती निर्भर है पानी पर… यानी सिंचाई पर। और यहीं से शुरू होती है यहाँ पर रहने वाले लोगों के संघर्ष की कहानी।

यहाँ के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। मगर धान और गेहूं की खेती के लिए जो पानी उन्हें चाहिए था उस पानी और वहाँ रहने वालों के बीच जो सबसे बड़ा रोड़ा था वो था एक “पहाड़” ।

और यहीं से शुरू होती है देश के दूसरे दशरथ मांझी लौंगी भुइंया की कहानी।

पानी की किल्लत की वजह से वहां से लोगों का पलायन शुरू हुआ, और पलायन का असर उनके घर तक आ पहुंचा।

यहाँ तक की उनके खुद के बेटों ने भी वो गाँव छोड़ दिया। फिर एक दिन हुआ यूँ की लौंगी भुइंया उसी पहाड़ पर बकरी चरा रहे थे की अचानक उनको ख्याल आया की अगर ये पहाड़ तोड़ दिया जाए तो पलायन रुक सकता है।

उस दिन उस ख्याल ने उन्हें ढंग से सोने नहीं दिया। उनकी पत्नी ने भी उनसे कहा की…. ये तुमसे नहीं हो पायेगा । पर लौंगी भुइंया को अपनी ज़िद्द के आगे कुछ समझ नहीं आया।
फिर क्या था…. फावड़ा उठाया और चल दिया पहाड़ तोड़ने।

30 साल अकेले फावड़े और दूसरे औज़ारों से उन्होंने आज 3 किमी लम्बी नहर खोद डाली और पानी गाँव तक पहुंचा दिया। इस साल पहली बार उनके गाँव तक बारिश का पानी पहुंचा और इसी वजह से आसपास के तीन गाँव के किसानों को भी इसका लाभ मिल रहा हैं। लोगों ने इस बार धान की फसल भी उगाई है। पर अफ़सोस की अब तक गाँव के कई लोग दूसरे शहरों में पलायन कर चुके हैं।

लौंगी भुइंया के साथ के लोग शायद अब उनके साथ न हों पर आने वाली उस गाँव की पीढ़ी “लौंगी भुइंया” का हमेशा शुक्रगुज़ार रहेगी।

लौंगी भुइंया कहते हैं “हम एक बार मन बना लेते हैं तो पीछे नहीं हटते। अपने काम से जब फुर्सत मिलता हम नहर काटने में लग जाते।

हमारी पत्नी कहती थी की तुमसे नहीं हो पायेगा…. लेकिन मुझे लगता था की हो जायेगा।

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कांग्रेस की बीमारियां उन्हें क्यों सता रहीं जिन्होंने इसे वोट दिया ही नहीं?

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Sonia Gandhi and Rahul

मध्यम वर्गीय, शिक्षित, खाते-पीते लोगों और ख़ासकर सवर्णों के बीच कांग्रेस की चिर परिचित बीमारियां अरसे से आपसी चर्चा का मुद्दा बनती रही हैं। लेकिन मज़े की बात तो ये है कि ऐसा अनायास नहीं है। बल्कि बाक़ायदा, सुविचारित रणनीति के तहत ऐसा करवाया जा रहा है। इसे संघ के ‘डैमेज़ कंट्रोल एक्सरसाइज़’ की तरह देखा जा सकता है। इसकी कई वजहें साफ़ दिख रही हैं। संघ को स्पष्ट ‘फ़ीडबैक’ मिल रहा है कि मोदी सरकार की लोकप्रियता में पलीता लगा हुआ है। कोरोना को दैवीय प्रकोप यानी ‘एक्ट ऑफ़ गॉड’ बताने का खेल जनता को हज़म नहीं हो रहा।

औंधी पड़ी अर्थव्यवस्था ने उन करोड़ों लोगों की आँखें भी खोल दी हैं जो ख़ुद को भक्त कहे जाने पर गर्व महसूस करते थे। अब लोगों को अच्छी तरह समझ में आने लगा है कि मोदी सरकार और इसके रणनीतिकार देश को आर्थिक दलदल से बाहर नहीं निकाल सकते। इनके पास ऐसी दृष्टि ही नहीं है। क़ाबिलियत ही नहीं है। ये जितना नुकसान कर चुके हैं, उसकी भरपाई कभी नहीं कर पाएँगे। बोलचाल की भाषा में इसे ही कहते हैं, ‘इनसे ना हो पाएगा!’

दूसरी तरफ, राजनीति में दिलचस्पी रखने वाला हर शख़्स जानता है कि कांग्रेस बीमार है। कई सालों से बीमार है। बीमारी को गम्भीर भी बताया जाता है। हालांकि, कांग्रेसियों को पता है कि उनकी पार्टी में क्या-क्या बीमारियां हैं और वो कितनी गम्भीर हैं? वो बीमारियों के इलाज से भी वाक़िफ़ हैं और अच्छी तरह जानते भी हैं कि इलाज कब और कैसे किया जाना है? इलाज कितना कामयाब रहेगा, इसे लेकर भी वो कोई ख़ुशफ़हमी नहीं पालना चाहते।

कांग्रेस की इन सारी बातों में कोई ख़बर नहीं है। जबकि ख़बर के अन्दर की ख़बर तो ये है कि कांग्रेस की बीमारियों को लेकर, उसके परिवारवाद और वंशवाद को लेकर, तमाम योजनाओं और भवन-मार्ग वग़ैरह के नाम नेहरू-गाँधी परिवार के लोगों के नाम पर आधारित क्यों है, इन बातों को लेकर सबसे ज़्यादा परेशानी उन लोगों को सता रही है जिन्होंने 2019 और 2014 में कांग्रेस को वोट नहीं दिया था। इस परेशानी की असली वजह है मोदी सरकार का कामकाज और इसका प्रदर्शन। क्योंकि अब मध्यम वर्ग की आँखें खुलने लगी हैं। उसे ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे’ का रोज़ाना अहसास हो रहा है। इसीलिए उसे भरमाने के लिए संघियों के दुष्प्रचार वाले सिस्टम ने भी अपने घोड़े खोल दिये हैं।

दरअसल, मध्यम वर्ग बेहद मायूस है। इतना कि उसे अब मौनी मनमोहन सिंह के दिनों की याद बहुत ज़्यादा सताने लगी है। इसे सोनिया-राहुल भी अब पहले जितने ‘घटिया और पतित’ नहीं लग रहे। मोदी जी के भाषण अब इसे भरमा नहीं पा रहे, क्योंकि इनकी बातों, नये-नये मंत्रों तथा जुमलों से उनका मोहभंग होने लगा है। इसने कोरोना काल के 21 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की सच्चाई को क़रीब दे देख लिया है। इसकी समझ में आ गया है कि चीन को लेकर प्रधानमंत्री ने कैसे देश को गुमराह किया।

मध्यम वर्ग को तो 2016 की नोटबन्दी की लम्बी लाइनों से लेकर अब तक के तमाम अनुभवों की एक-एक बात याद आ रही है, क्योंकि तब से अब तक आर्थिक मोर्चों पर इसके हाथ लगातार सिर्फ़ बुरी ख़बरें ही आयी हैं। राम मन्दिर, 370 और तीन तलाक़ जैसे फ़ैसलों से इसे मिली ख़ुशी अब काफ़ूर हो चुकी है। कोरोना में इसने सरकारी दावों और विकास के स्तर की हक़ीक़त को भी बहुत क़रीब से देख लिया है।

छंटनी, बेरोज़गारी और गिरती आमदनी का आलम हर घर में मौजूद है। नयी नौकरियों का कहीं कोई अता-पता नहीं है। यहां तक कि जिन युवाओं को किसी-किसी नौकरी के लिए चुन लिया गया था, उनकी ज्वाइनिंग भी टल चुकी है। आर्थिक आँकड़ों ने कम शिक्षित लोगों को भी ज्ञानवान बना दिया है। ग़रीब तो बुरी तरह से टूटे हुए हैं। सरकारें जो कह और कर रही हैं, उससे उन्हें ढांढस नहीं मिल रहा।

पेट्रोल-डीज़ल के रोज़ाना उछल रहे दामों को लेकर भी जनता में बेहद गुस्सा है। इसने सबका जीना और दुश्वार बना रखा है। जनता को अब विपक्ष वाली उस बीजेपी की बहुत याद सता रही है जो सड़कों पर उतरकर तरह-तरह की ड्रॉमेबाज़ी के ज़रिये मनमोहन सरकार के नाम में दम करके रखती थी। विपक्ष वाली बीजेपी बहुत संगठित थी। उसके पीछे संघ की ताक़त थी। जबकि विपक्ष वाली कांग्रेस ख़ुद ही बहुत लुंज-पुंज है। कई बीमारियों से ग्रस्त है। अपनी सेहत को सुधारने के लिए जो किया जाना चाहिए, उसे भी करती नज़र नहीं आ रही।

मध्यम वर्ग को लगता है कि कांग्रेस वैसे संघर्ष करती नज़र क्यों नहीं आ रही, जैसे विपक्ष वाली बीजेपी किया करती थी? ये सहज प्रश्न घर-घर की चर्चा में स्थान पा रहा है। बात यहां आकर ख़त्म होती है कि राहुल-प्रियंका वग़ैरह से कुछ नहीं हो पाएगा। संघ इसी माहौल को भुनाना चाहता है। इसी मंत्र को फैलाना चाहता है कि कांग्रेस को जनता याद चाहे जितना करे, लेकिन पसन्द बिल्कुल न करे। राजनीति का ये स्वाभाविक व्यवहार भी है। इसीलिए, मौजूदा हालात से मायूस लोग जब भी विकल्प की बातें करते हैं, तो उन्हें ‘टीना फैक्टर’ यानी There is no alternative (TINA) की याद दिलायी जाती है।

मायूस मध्यम वर्ग को बताया जाता है कि कांग्रेस तो ठीक है, लेकिन इसका नेता कौन है, इसका पता ही नहीं है। राहुल गांधी का तो इतना चरित्र हनन किया जा चुका है कि उन्हें लोग विकल्प मान ही नहीं पाते। हालांकि, इसके लिए वो ख़ुद भी कोई कम कसूरवार नहीं हैं। लेकिन एक हक़ीक़त और भी है कि कांग्रेस में इन्दिरा गांधी के बाद जनता की नब्ज़ को पकड़कर सड़क पर संघर्ष करने वाला दूसरा बड़ा नेता नहीं हुआ। राजीव और सोनिया ने कांग्रेस को उबारने के लिए जैसे काम किए, कमोबेश वैसे ही आज भी हो रहा है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि आज जनता और ख़ासकर मध्यम वर्ग की अपेक्षाएं काफ़ी बदल चुकी हैं।

‘अपेक्षाओं के इस बदलाव’ को पैदा करने में संघ के नये-पुराने दुष्प्रचार तंत्र ने कमाल का प्रदर्शन किया है। वर्ना, विरोधी तो हमेशा ही चरित्र हनन और लांछन का सहारा लेते ही रहे हैं। सभी पार्टियाँ यही करती हैं। क्योंकि ये राजनीति का अहिंसक हथियार है। इसके बावजूद अभी संघ की बेचैनी थोड़ी ज़्यादा है। बिहार के चुनाव जो सामने हैं। वहाँ भी नीतीश से टीना फैक्टर को जोड़ने का ही खेल चल रहा है। जनमानस की ख़ुशी या नाराज़गी को फैलने नहीं दिया जा रहा, क्योंकि मेनस्ट्रीम मीडिया मर चुका है। जनता अब सच्चाई को जानकर अपनी राय नहीं बना रही, बल्कि उसे व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी के कंटेंट से ही ज्ञानालोकित किया जा रहा है।

कांग्रेस भी जानती है कि अगर अपनी बीमारियों से उबर भी गयी तो भी बीजेपी को खुले अखाड़े में अपने बूते चित नहीं कर पाएगी। संघ की अफ़ीम ने बीजेपी को अपराजेय बना दिया है। लेकिन संघ अच्छी तरह जानता है कि जब जनता का गुस्सा फूटेगा तो वो ये देखकर वोट नहीं करेगी कि मोदी का विकल्प कौन है? बल्कि ये सोचकर वोट डालेगी कि ‘कोई भी आये, लेकिन मोदी तो नहीं चाहिए!’

ये वही मनोदशा है, जिसने 2014 में कांग्रेस की मिट्टी-पलीद की थी और इतिहास में पहले बार ग़ैर-कांग्रेसी पूर्ण बहुमत वाली सरकार के सत्ता में आने का रास्ता खुला था। जब जनमानस में ये राय बन गयी थी कि अबकी कांग्रेस को वोट नहीं देना है। इसीलिए कांग्रेस मुक्त होने के कगार पर जा पहुंची। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री समेत संघ के रणनीतिकारों को जनता के मनोविज्ञान के इसी पहलू का ख़ौफ़ सता रहा है।

मुमकिन है कि अगले कैबिनेट विस्तार में वित्त मंत्रालय की ज़िम्मेदारी किसी और को थमाकर निर्मला सीतारमन को बलि का बकरा बना दिया जाए। राजनीति में ऐसे नुस्ख़ों को आसान उपायों की तरह देखा जाता है। इसे पार्टी और संघ ऐसे पेश करेंगे कि मोदी जी तो अद्भुत हैं ही, वित्त मंत्री ही नाक़ाबिल थीं, इसलिए उन्हें बदल दिया गया। अब देखना सब ठीक हो जाएगा। राजनीति ऐसे ही नुस्ख़ों का खेल है। यही वजह है कि संघ को कांग्रेस की बीमारी में भी अपने लिए नुस्ख़ा ही नज़र आ रहा है। इसमें ग़लत भी कुछ नहीं है।

उधर, कांग्रेस का सीधा सा मंत्र है कि वो सत्ता में लौटगी या नहीं, ये चुनौती उसकी नहीं बल्कि जनता की है। लिहाज़ा, जान झोंकने से क्या फ़ायदा! इसीलिए कांग्रेस को आप कभी सत्ता में वापसी के लिए वैसे जान झोंकता हुआ नहीं देखेंगे जैसा संघ-बीजेपी कुशलता से किया करती हैं। कांग्रेस आपको कभी संघ की तरह पूरी ताक़त से चुनाव लड़ती हुई भी नहीं नज़र आएगी।

इसके क्षेत्रीय नेता जैसे शरद पवार, ममता बनर्जी, जगन मोहन रेड्डी और चन्द्र शेखर राव भले ही ऐसा करते दिखें, लेकिन शीर्ष नेतृत्व सड़क पर उतरकर पसीना नहीं बहाने वाला। इसे आसानी से समझने के लिए ग़ालिब के एक शेर में ज़रा छेड़-छाड़ करके देखें, तो एक लाइन में सब समझ में आ जाएगा कि ‘हमको उनसे (वफ़ा) संघर्ष की है उम्मीद, जो नहीं जानते (वफ़ा) संघर्ष क्या है!’

Mukesh Kumar Singh मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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ओपिनियन

संविधान बचाने से ज़्यादा ज़रूरी है इसके आन्दोलनकारियों को बचाना

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Students and activists take part in a protest against India's new citizenship law in Bangalore on December 17, 2019 , AFP

सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद प्राचा के हवाले से शाहीन बाग़ वाले संविधान बचाओ आन्दोलन को जल्द बहाल करने की सुगबुगाहट है। इसी तर्ज़ पर क्या सोशल-डिस्टेसिंग का जोख़िम उठाकर 30 अगस्त को मुहर्रम का जुलूस निकालने की इजाज़त माँगने, देने या नहीं देने को लेकर कहीं तनाव के हालात तो नहीं बन जाएँगे? ऐसे दौर में जब रोज़ाना करीब 65 हज़ार कोरोना पॉज़िटिव के मामले सामने रहे हों, जब स्कूल-कॉलेज निलम्बित हों और रेल-सेवा असामान्य हो, जब मैट्रो-सेवा शान्त हो, होटल-रेस्टोरेंट बन्द हों, जब मॉस्क अनिवार्य हो, तब क्या ऐसी बातें होना ठीक है कि जल्द ही ‘शाहीन बाग़’ की बहाली होगी? संविधान बचाओ आन्दोलन के अगले दौर का वक़्त क्या अभी आने से फ़ायदा होगा? क्या सरकारें इसे होने देंगी? कहीं ये पुलिसिया सख़्ती को ‘आ बैल मुझे मार’ का सन्देश तो नहीं देगी?

दरअसल, भारत पर अभी कोरोना-मारीचिका हावी है। मारीचिका एक आभास है। इसमें रेगिस्तान में दुर्लभ पानी दिखने का भाव है। ये आभास और भाव तो असली होते हैं, लेकिन पानी असलियत नहीं होता। मारीचिका आध्यात्मिक ढोंग नहीं, बल्कि भौतिक भ्रम है। ये वैसा ही दृष्टि-दोष है, जैसे दूर जाती रेल की समानान्तर पटरियाँ परस्पर नज़दीक आती हुई प्रतीत होती हैं। बिल्कुल ऐसे ही दृष्टि-दोष की काली छाया अभी ‘कोरोना-अनलॉक’ को लेकर देश पर मँडरा रही है। इसीलिए कोरोना को पुरी में रथयात्रा बर्दाश्त है, अयोध्या का शिला-पूजन बर्दाश्त है, भोपाल, इम्फाल और जयपुर में सरकारों का लुढ़कना-ढनकना बर्दाश्त है, लेकिन किसी भी किस्म के अनलॉक को ईद की सामूहिक नमाज़, मुहर्रम के जुलूस और संविधान बचाने वाले सीएए-एनआरसी आन्दोलन की सुगबुगाहट बर्दाश्त नहीं है।

कोरोना-काल के दौरान उत्तर भारत के मुसलमानों में अज़ीबो-ग़रीब हूक उठती रही हैं। उन्हें यहाँ-वहाँ से अपनी बिरादरी के साथ हो रहे भेदभावों की ख़ूब ख़बरें भी मिलीं। देश देख चुका है कि तब्लीगी जमात के नाम पर उठी नफ़रत की लपटों ने ठेले पर फल-सब्ज़ी बेचने वालों की मज़हबी की पहचान को कैसी प्रमुखता दिलायी। गाय के नाम पर लिंचिंग का नयी घटना को भी कोरोना नहीं टाल सका। दिल्ली के दंगों की पुलिसिया जाँच से कई बदरंग पन्ने भी फिज़ाँ में उड़ते देखे गये। ‘370’ की पहली पुण्यतिथि भी निपट गयी। लॉकडाउन की तकलीफ़ों और बेरोज़गारी के बावजूद जो ग़रीब जीवित रहे, उन्हें भी बाढ़ और अस्पतालों की दुर्दशा ने जमकर डुबोया। लेकिन अमीरों के आईपीएल को न सिर्फ़ डूबने से बचाया गया, बल्कि उसे ‘आत्मनिर्भर’ बनने के लिए ‘वोकल फॉर लोकल’ वाले गुरु-मंत्र से भी विशेष छूट दी गयी। आसार हैं कि स्वतंत्रता-दिवस की भाषणबाज़ी भी कतई फ़ीकी नहीं रहेगी।

लेकिन क्या उपरोक्त तमाम मिसालों को देखते हुए मुस्लिम समाज बराबरी की उम्मीद पाल सकता है? ये सही है कि आन्दोलनकारियों पर कभी दमनकारी सत्ता के बर्बर रवैये का ख़ौफ़ नहीं होता। लेकिन आन्दोलन की कमान थामने वालों को अपनी ताक़त और कमज़ोरियों का भी सही अहसास ज़रूर होना चाहिए। कोरोना से पहले चले आन्दोलन के तज़ुर्बों से सीखना भी बहुत ज़रूरी है। मसलन, उस आन्दोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि ये थी कि वो मुसलमानों की नागरिकता के सवाल से शुरू होकर संविधान बचाने की ओर घूम गयी। इसे शिक्षित और सेक्यूलर मुसलमानों से ज़्यादा इसी श्रेणी के हिन्दुओं और इनमें से भी ख़ासतौर पर युवाओं और महिलाओं का अद्भुत समर्थन मिला। सिर्फ़ इसी इकलौते पहलू से भगवा हुक़्मरानों के माथे पर बल पड़े।

फरवरी में दिल्ली विधानसभा के चुनाव हुए। दिसम्बर-जनवरी में हुक़्मरानों को अपनी ज़मीनी सच्चाई दिखने लगी थी। मेनस्ट्रीम मीडिया तो मुट्ठी में था लेकिन सोशल मीडिया ने नाक में दम कर रखा था। यही देख हुक़्मरानों को डर सताने लगा कि सेक्यूलर हिन्दुओं और मुसलमानों की एकजुटता यदि उसी रफ़्तार से बढ़ती रहती तो उनके लिए ‘मुश्किल-काल’ बहुत दूर नहीं रहता। इसी एकजुटता में सेंधमारी के लिए दिल्ली में दंगों की पटकथा लिखी गयी। नफ़रत और उन्माद फैलाने वाली भाषणबाज़ी के धारावाहिक चले। दंगों में पुलिस ने वही किया जो उसे हुक़्म मिला, ताकि ‘सबसे ज़्यादा अनुशासित और आज्ञाकारी संस्था’ वाला उसका सिंहासन अक्षुण्य रहे।

अब तो सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं में भगवा-समाजवाद आ चुका है। सभी ने पुलिसिया-संस्कारों को ही अपना आराध्य बना लिया है। विधान सिर्फ़ इतना है कि हुक़्म की तामील होगी, हर हाल में होगी, अवश्य होगी। बाक़ी संविधान की बातें जिन्हें करना है वो नक्कारख़ाने में तूती बजाते रहें। नये भारत में सबको इस आकाशवाणी पर यक़ीन करना होगा कि “पूर्वी लद्दाख में न तो कोई हमारी सीमा में घुस आया है, न ही कोई घुसा हुआ है और ना ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्ज़े में है।”

इसीलिए मुस्लिम समाज चाहे तो गाँठ बाँध लें कि उसकी किसी भी किस्म की एकता से हुक़्मरानों की सेहत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला। क्योंकि हुक़्मरानों को कपड़ों से पहचानने में महारत हासिल है। लिहाज़ा, शाहीन बाग़ की बहाली के लिए बेताब लोगों को पहचान के बजाय परिचय को तरजीह देना सीखना होगा। उन्हें समझना होगा कि पहचान तो दूर से ही हो जाती है जबकि परिचय के लिए नज़दीक या रूबरू आना पड़ता है। चन्दन-टीका, पगड़ी-टोपी, दाढ़ी-मूँछ, घूँघट-बुर्का, धोती-पजामा – ये सभी पहचान हैं, जबकि सेक्यूलर-कम्यूनल, कट्टर-उदार, जातिवादी-प्रगतिशील आदि परिचय हैं। इसी परिचय के साथ उन्हें जिन हिन्दुओं, युवाओं और महिलाओं का ज़ोरदार समर्थन मिला था, उसी ताक़त से वो मंज़िल पा सकते हैं।

अभी कोरोना के दौरान जिस स्तर का और जैसा ‘अनलॉक’ सामने आया है, उसमें संविधान बचाने की पैरोकारी करने वाले हिन्दुओं, युवाओं और महिलाओं की एकजुटता में मुश्किल होगी। इसीलिए अभी जोख़िम लेने का वक़्त नहीं है। थोड़ा और इन्तज़ार कर लेने में कोई हर्ज़ नहीं है। 15 अगस्त की बातें यदि सरककर 2 अक्टूबर हो जाए तो कोई आफ़त नहीं आ जाएगी। अबकी बार शाहीन बाग़ के आन्दोलनकारियों को संविधान के अलावा अर्थव्यवस्था की ऐतिहासिक दुर्दशा को भी अपने रडार में लेना होगा। इन्हें ये भी समझना होगा कि सरकार किसी भी कीमत पर अपने क़दम वापस नहीं खींचेंगी। वो ज़्यादा से ज़्यादा अपने क़दमों को आगे बढ़ाने का इरादा तब तक टालती रहेगी, जब तक कि उसका पतन न हो जाए। लेकिन इस दौरान आन्दोलनकारियों को हिंसा और हिरासत के उकसावों से भी ख़ुद को बचाना होगा। बीते एक साल में कश्मीर ने भारत, सेक्यूलरों और संविधान की दुहाई देने वालों को अनेक सबक दिये हैं। बहुसंख्यक समाज ने ताली-थाली और दीया-दिवाली के कई नज़ारे देश को दिखाये हैं। इसीलिए आन्दोलनकारियों को समझना होगा कि जो विरोधियों की ताक़त का सही अन्दाज़ा नहीं लगाते, वो विरोधियों का शिकार बनने के लिए अभिशप्त होते हैं। विरोधी जहाँ बात ख़त्म करना चाहते हैं, आन्दोलनकारियों को वहीं से बात शुरू करने की रणनीति अपनानी होगी। वर्ना, उनका सरकार का जाल में फँसना तय है।

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