कितना मुनासिब है नीतीश के मंत्रियों की शैक्षिक योग्यता की खिल्ली उड़ाना? | WeForNewsHindi | Latest, News Update, -Top Story
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बिहार में नवगठित नीतीश सरकार के मंत्रियों की ‘शैक्षिक योग्यता’ का सोशल मीडिया पर ख़ूब मज़ाक उड़ाया जा रहा है. ये बात बहुत महत्वपूर्ण है. क्योंकि सोशल मीडिया आज समाज का आईना बन चुका है. खिल्ली तो लालू यादव के नौवीं फेल बेटे तेज प्रकाश की भी उड़ी क्योंकि उसने ‘अपेक्षित’ और ‘उपेक्षित’ बोल दिया. विरोधियों ने उपहास उड़ाया कि उन्हें इन शब्दों का फ़र्क़ ही नहीं मालूम. हालाँकि, ऐसे उदार विरोधी भी सामने आये, जिन्होंने इसे अज्ञानता की जगह ‘ज़ुबान के फ़िसलने’ (Slip of tongue) के रूप में देखा. यही तरीक़ा सही भी है. लेकिन मंत्रियों की ‘शैक्षिक योग्यता’ को लेकर हो रहे उपहास की समीक्षा भी ज़रूरी है. उपहास की ये प्रवृत्ति सदियों पुरानी है. इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं. इसका मनोविज्ञान बहुत गूढ़ (Complicated) है.

भारत में तरह-तरह की शैक्षिक ‘डिग्री’ हासिल करने वालों में ये अहंकार और दुराग्रह ख़ूब दिखायी देता है कि जिनके पास डिग्रियाँ नहीं हैं वो नाक़ाबिल हैं. नाक़ाबिल, श्रेष्ठ कैसे हो सकता है! क़ाबिलों का ‘बॉस’ कैसे बन सकता है! इसीलिए नाक़ाबलियत का उपहास उड़ाया जाता है. किसी ज़माने में ब्राह्मणों को छोड़ अन्य किसी को वेद पढ़ने की छूट नहीं थी. कालान्तर में समाज में जाति के नाम पर जो छुआछूत की परम्परा चली, उसमें मर्म में भी जातिगत उपहास ही था. इसीलिए उपहास एक सामन्तवादी और वर्ण-व्यवस्था वाली मनो-विकृति (Mental Deformity) है. नौकरशाहों ने इसे व्यापक स्तर पर फैला रखा है. इससे वो अपनी नाकामियों पर पर्दा डालते हैं. बड़ी चतुराई से अपनी हरेक ख़ामी को सियासी व्यवस्था पर थोप देते हैं. यही अलग-अलग कामों को ‘छोटा’ और ‘बड़ा’ बनाता है.

इसीलिए जब राजनीति के ज़रिये ‘डिग्री-हीन’ नेता, नौकरशाहों के आक़ा बन जाते हैं तो वो इसे अपनी डिग्रियों का उपहास और अपमान समझते हैं. प्रतिकार में नेतागिरी का उपहास बनाते हैं. व्यवस्था की हरेक ख़ामी के लिए इन्हीं सियासी आक़ाओं और उनकी ‘योग्यता’ को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. ताकि नेताओं का चरित्र-हनन करके नौकरशाह अपना उल्लू सीधा करते रहें. नौकरशाह अपने इस मक़सद में पूरी तरह से कामयाब रहे हैं. यही वजह है कि भारत में नेताओं की तो जबावदेही है, लेकिन नौकरशाही की कोई जबाबदेही नहीं. रिश्वतख़ोरी, हरामख़ोरी, निरंकुश सत्ता, दबंगई और कुर्सी का अहंकार को नौकरशाही अपना हक़ और कर्त्तव्य समझती है. नौकरशाही की ये प्रवृत्ति गहरे चिन्तन का नतीज़ा है. देश की तमाम समस्याओं की जड़ इसी प्रवृत्ति और चिन्तन में है.

संविधान निर्माताओं ने सामन्तवाद और वर्ण-व्यवस्था से पनपने वाली हरेक बीमारी को दूर से ही पहचान लिया था. इसीलिए उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए ‘शैक्षिक योग्यता’ का कोई विधान नहीं बनाया. सिर्फ़ एक कसौटी है, ‘जिस पर जनता को भरोसा हो, वही उसका नुमाइन्दा है.’ भरोसे से बढ़कर कुछ भी नहीं. यही पर्याप्त है. सर्वोपरि है. अकाट्य है. अटल है. इसीलिए नेतागिरी की कोई उम्र सीमा नहीं है. अन्य शर्तों का कोई वज़ूद नहीं है. सिवाय इसके, कि उम्मीदवार भारत का नागरिक हो, एक ख़ास उम्र का हो और मानसिक रूप से ठीक हो. व्यावहारिक जीवन में भी ऐसा ही है. आपके पास डिग्री भले ही न हो, ओलम्पिक पदक हो सकता है. आप बिज़नेस और रोज़गार में बहुत कामयाब हो सकते हैं. सफ़ल उद्यमी हो सकते हैं. इसीलिए नेतागिरी में भी अहम मुक़ाम हासिल कर सकते हैं. बस, आप पर लोगों का भरोसा होना चाहिए.

नौकरशाही को आमतौर पर, जनता के विश्वास और भरोसे से कोई लेना-देना नहीं होता. उसे जनता से मिलने वाले स्नेह और सम्मान की कोई कद्र नहीं होती. क्योंकि वो जनता का ही तो शोषण करती है. इन्हें ठेंगे पे रखती है. इसीलिए जनता भी सिर्फ़ ‘कुर्सी’ को अहमियत देती है. कुर्सी गयी तो जलाल गया, वैभव गया. नौकरशाही को क़ानून के मुताबिक़ चलने के लिए बनाया गया है. जबकि क़ानून बनाना नेतागिरी का काम है. दोनों एक-दूसरे पर अंकुश लगाने के लिए भी बने हैं. नेतागिरी का काम है सही क़ानून बनाना. जबकि नौकरशाही का काम है ग़लत क़ानून नहीं बनने देना. नेतागिरी का दायित्व ये देखना भी है कि क्या क़ानून और नौकरशाही अपना काम सही तरीक़े से कर रही है? यदि नहीं, तो उसकी दिक़्कतें दूर करने का दारोमदार भी नेतागिरी पर ही है. इसीलिए इसे सत्ता या सरकार कहते हैं. जहाँ सत्ता की लग़ाम जनता के हाथों में है, वहाँ लोकतंत्र है.

आज़ादी के बाद देश में शिक्षा और रोज़गार के जिन नये क्षेत्रों का विस्तार हुआ उनमें ‘औपचारिक रूप से शिक्षित’ लोगों को अच्छे अवसर मिले. कालान्तर में यही ‘शिक्षित’ लोग सरकारी या ग़ैर-सरकारी क्षेत्र में नौकरशाही का हिस्सा बने. उन्होंने विभिन्न रोज़गारों के लिए अलग-अलग शैक्षिक योग्यता तय की. जिसके पास ख़ास तरह की शैक्षिक योग्यता या डिग्री नहीं होगी वो ख़ास तरह के काम के लिए अयोग्य होगा. देखते ही देखते समाज, औपचारिक डिग्रियों यानी सनद रूपी प्रतीकों के साथ जीने लगा. लोगों को ये घुट्टी पिलायी गयी कि डिग्री और योग्यता एक-दूसरे के पर्याय हैं. लिहाज़ा, जिसके पास डिग्री नहीं है, जो अँग्रेज़ी बोलना-लिखना नहीं जानता, जो शुद्ध लिखना-पढ़ना नहीं जानता, वो अयोग्य है.

संविधान की तरह ही समाज भी डिग्रीधारियों की श्रेष्ठता को बनावटी मानता है. इसीलिए अपना प्रतिनिधि चुनते वक़्त वो इस बात को नकार देता है कि जो डिग्रीधारी हैं, वही क़ाबिल हैं. जनता को वंशवाद से भी कोई लेना-देना नहीं है. सैकड़ों-हज़ारों नेताओं की सन्तानों को उसने ठुकरा दिया. कुछ ही भाग्यशाली नेता हैं, जिनकी औलादें नेतागिरी में अपने पैर जमा सकीं. सियासी वंशवाद भी आपको सिर्फ़ तेज़ पहचान दिलवा सकता है. जैसे किसी फ़िल्मी हस्ती, कलाकार और खिलाड़ी वग़ैरह को जनता जल्दी पहचान लेती है. क्योंकि वो जीवन के दूसरे क्षेत्रों से प्रसिद्धि लेकर राजनीति में आते हैं. बाक़ी पैमाने तो सबके लिए बराबर ही हैं.  सबको चुनाव जीतना पड़ता है. जनता का भरोसेमन्द बनना पड़ता है. यही असली विधान है. बाक़ी सब झूठ है.

अब ज़रा नीतीश के मंत्रियों का ब्यौरा देखकर ये समझिए कि आख़िर जनता की नज़र में उस शैक्षिक योग्यता का क्या महत्व है जिसे नौकरशाही अपनी सबसे बड़ी विशेषज्ञता समझती है. इसी को लेकर कुंठित रहती है. नयी कुंठा ये भी है कि ऐसा ‘बिहार’ में ही हो सकता है. जबकि हक़ीक़त ये है कि ऐसा देश-व्यापी है. आज़ाद भारत में हमेशा कम या ज़्यादा दिखायी देता रहा है. तमाम ‘अशिक्षित’ या ‘कम शिक्षित’ नेता जनता के भरोसेमन्द बनते रहे हैं. नीतीश मंत्रिमंडल की इस सूची का एक और सन्देश है कि यदि ‘शिक्षित’ लोग राजनीति के थपेड़े झेलने के लिए आगे नहीं आएँगे तो उन्हें ‘अशिक्षित’ लोगों के मातहत रहना पड़ेगा. क्योंकि राजनीति में कभी निर्वात (Vacuum) नहीं होता. ‘अच्छे’ लोग आगे नहीं आएँगे तो ‘ख़राब’ को कोई रोक नहीं सकता. इसीलिए ‘ख़राब’ का रोना व्यर्थ है.

1. नीतीश कुमार, मुख्यमंत्री, गृह, सामान्य प्रशासन और सूचना एवं जनसम्पर्क (इंज़ीनियर); 2. तेजस्वी यादव, उप मुख्यमंत्री, पथ निर्माण, भवन निर्माण और पिछड़ा-अतिपिछड़ा कल्याण (9वीं); 3. तेज प्रताप यादव, स्वास्थ्य, लघु सिंचाई, पर्यावरण (12वीं); 4. अब्दुल बारी सिद्दीकी, वित्त (12वीं); 5. विजेन्द्र प्रसाद यादव, ऊर्जा (10वीं); 6. राजीव रंजन उर्फ़ लल्लन सिंह, जल संसाधन (स्नातक); 7. मंजू वर्मा, समाज कल्याण (12वीं); 8. मदन मोहन झा, राजस्व एवं भूमि सुधार (डॉक्टरेट); 9. मदन साहनी,  खाद्य-आपूर्ति (स्नातक); 10. अशोक चौधरी, शिक्षा एवं आईटी (डॉक्टरेट); 11. विजय प्रकाश, श्रम संसाधन (स्नातकोत्तर); 12. राम विचार राय, कृषि (10वीं); 13. कपिल देव कामत, पंचायती राज (8वीं); 14. सन्तोष निराला, एससी-एसटी कल्याण (स्नातक); 15. अब्दुल जलील मस्तान, उत्पाद एवं निबन्धन (12वीं); 16. अब्दुल गफ़ूर, अल्पसंख्यक कल्याण (डॉक्टरेट); 17. चन्द्रिका राय,  परिवहन (स्नातकोत्तर); 18. महेश्वर हज़ारी, नगर विकास (स्नातक); 19. चन्द्रशेखर, आपदा प्रबन्धन (स्नातकोत्तर); 20. जय कुमार सिंह, उद्योग, विज्ञान-तकनीकी (स्नातक); 21. अनीता देवी, पर्यटन (स्नातक); 22. अवधेश सिंह, पशु पालन (स्नातक); 23. मुनेश्वर चौधरी, खनन एवं भूतत्व (स्नातक); 24. कृष्ण नन्दन वर्मा, जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी एवं क़ानून (स्नातक); 25. ख़ुर्शीद उर्फ़ फ़िरोज़ अहमद, गन्ना उद्योग (10वीं); 26. शैलेश कुमार, ग्रामीण कार्य अभियंत्रण (स्नातकोत्तर); 27. आलोक मेहता, सहकारिता (स्नातक); 28. श्रवण कुमार, ग्रामीण विकास (12वीं); 29. शिवचन्द्र राम, कला-संस्कृति (स्नातक).

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कोविड-19: ताज शहर में फिर से खतरे की घंटी, 56 नए मामले

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आगरा में पिछले 24 घंटों में कोविड -19 के 56 नए मामले दर्ज हुए हैं। जबकि यहां सप्ताहांत पर 55 घंटे का लॉकडाउन भी रहा है। यहां मामले बढ़ने के चलते जिला प्रशासन सख्ती से सप्ताहांत के लॉकडाउन को लागू कर रहा है। वहीं लोगों से भी अपील की गई है कि वे बिना काम के बाहर न निकलें और सोशल डिस्टेसिंग, मास्क पहनने के नियमों का सख्ती से पालन करें।

जिला मजिस्ट्रेट पी.एन. सिंह ने चेतावनी भी दी है कि दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने वालों पर भारी जुमार्ना लगाया जाएगा।

वहीं सरकारी कार्यालयों पर इसका सबसे बुरा असर हो रहा है।

1 सितंबर से शुरू हो रहे अनलॉक 4 के लिए जारी दिशा-निर्देशों से ऐसे संकेत मिले हैं कि जिला अधिकारी 15 सितंबर से ताजमहल और आगरा किले को फिर से खोलने की अनुमति दे सकते हैं।

आगरा जिले में अब तक कोविड के 2,772 मामले सामने आ चुके हैं और 107 मौतें दर्ज हो चुकी हैं। यहां वर्तमान में सक्रिय मामलों की संख्या 363 है। जिले में अब तक 1,12,713 नमूने एकत्र किए गए हैं। यहां रिकवरी दर 83.04 फीसदी है।

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पणजी में भगत सिंह कोश्यारी ने नए राज्यपाल के रूप में शपथ ली

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भगत सिंह कोश्यारी ने पणजी में राज्य के नए राज्यपाल के रूप में शपथ ली। वह महाराष्ट्र के राज्यपाल भी हैं और उन्हें गोवा के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया है।

यह फैसला सत्य पाल मलिक के गोवा से स्थानांतरण और मेघालय के राज्यपाल के रूप में नियुक्त होने के बाद आया है।

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सेना ने इस साल भर्ती टलने की खबरों को बताया गलत, कहा- जल्द शुरू होगी प्रक्रिया

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भारतीय सेना ने इस साल भर्तियां टलने की खबरों को गलत बताया है। सेना ने कहा है कि इस साल होने वाली भर्तियों को टाला नहीं गया है, ऐसी खबरें गलत हैं।

सेना ने कहा है कि राज्य सरकारों की सिफारिशों के आधार पर भर्ती प्रक्रिया जल्द से जल्द शुरू कर दी जाएगी। 

इस संबंध में भारतीय सेना ने एक बयान में कहा, ‘मीडिया के कुछ हिस्सों में ऐसी रिपोर्ट चल रही है कि भारतीय सेना की 2021 के लिए भर्ती टल गई है, जो कि पूरी तरह से गलत है। राज्यों की सिफारिशों पर भर्ती प्रक्रिया को जल्द ही शुरू कर दिया जाएगा।’

भारतीय सेना अब संचालन भूमिकाओं के लिए पुरुष और महिला दोनों उम्मीदवारों की भर्ती करती है। जल्द ही सेना मिलिट्री पुलिस के दूसरे बैच में 100 महिलाओं की भर्ती करने जा रही है। साल 2020-21 की भर्ती के लिए सेना ने एक अधिसूचना भी जारी की थी।

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