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ज़रा हटके

इस शख्स की ठुड्डी के करतब को देख चौंक जाएंगे आप

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SOFA

स्‍वीडन में रहने वाले 33 साल के टॉमी अपने हैरतअंगेज कामों के लिए काफी जाने जाते हैं। 8 साल की उम्र में टॉमी ने एक स्‍टंट का बतौर शौकिया इस्‍तेमाल किया पर अब ये उनकी पहचान बन चुका है।

बता दें कि टॉमी किसी भी चीज को अपनी ठुड्डी से उठा लेते हैं, फिर वो चाहे फोर सीटर भारी-भरकम सोफा हो या मेज कुर्सी। टॉमी इस हुनर के चलते सोशल मीडिया पर वह काफी पॉपुलर हैं। किसी न किसी भारी चीज को ठुड्डी से उठाकर वह वीडियो बनाते हैं और इंस्‍टाग्राम पर पोस्‍ट करते रहते हैं जिससे हजारों लाइक्‍स मिलते हैं।

टॉमी की खासियत है कि वह सिर्फ भारी चीजें उठाते ही नहीं बल्कि उसको बैलेंस भी कर लेते हैं। टॉमी इसे अपनी ठुड्डी से उठाकर हवा में बैलेंस बना लेते हैं। उन्‍होंने करीब 25 साल पहले ऐसे ही खेलते-खेलते पार्क में पहले कुर्सी और मेज उठाने का बैलेंस बनाया। आज इतने सालों की प्रैक्‍टिस के बाद वह बड़ी-बड़ी चीजें ठुड्डी से उठा लिया करते हैं।

टॉमी अपनी बेटी के साथ भी कुछ ऐसा ही करते हैं। शायद इसीलिए कुर्सी में बैठी बेटी को उन्‍होंने हाथों से नहीं ठुड्डी से उठा लिया।

wefornews bureau 

अंतरराष्ट्रीय

ट्रंप के मीडिया पर हमलों के खिलाफ खड़े हुए अमेरिका के 350 अखबार

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वाशिंगटन, 16 अगस्त | अमेरिका में कम से कम 350 समाचार संस्थानों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा मीडिया पर हमले का सामना करने और स्वतंत्र मीडिया के पक्ष में एक अभियान शुरू किया है। सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्थाज विनयार्ड टाइम्स से लेकर डलास मॉर्निग न्यूज, साउथ डकोटा के यांक्तन काउंटी ऑबजर्वर से मैने के बैंगोर डेली न्यूज समेत सैकड़ों अमेरिकी समाचार पत्रों ने गुरुवार को देश में प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के एक संयुक्त प्रयास में अपने-अपने अखबारों में खाली जगह छोड़ी।

यह कदम मीडिया के खिलाफ राष्ट्रपति के ‘डर्टी वॉर’ की राष्ट्रव्यापी निंदा के लिए बॉस्टन ग्लोब द्वारा शुरू किया गया, जिसमें हैशटैग एनेमीऑफनन का प्रयोग किया गया। इसने ‘प्रशासन द्वारा प्रेस पर हमले के खतरों को लेकर’ एक संपादकीय लिखने का संकल्प लिया और दूसरों से भी ऐसा करने को कहा।

यह अभियान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने ही वाशिंगटन और न्यूयॉर्क की सीमा से बाहर निकालकर देश भर के समुदायों को ट्रंप के हमलों को लेकर संवाद शुरू किया है।

ट्रंप अक्सर मीडिया खबरों को ‘झूठी खबरें’ (फेक न्यूज) बताते हैं और पत्रकारों को लोगों का दुशमन करार देते हैं।

शुरू में 100 समाचार संगठनों से मिली सकरात्मक प्रतिक्रिया 350 संगठनों तक पहुंच गई, जिसमें अमेरिका के प्रमुख समाचार पत्रों से लेकर छोटे स्थानीय अखबारों ने ट्रंप के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। इसमें उन्हें अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशक जैसे ब्रिटेन के समाचार पत्र द गार्डियन का भी समर्थन हासिल हुआ।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

अटल बिहारी वाजपेयी : नए भारत के सारथी और सूत्रधार

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नई दिल्ली, 16 अगस्त (आईएएनएस)| भारत रत्न, सरस्वती पुत्र एवं देश की राजनीति के युगवाहक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का संपूर्ण जीवन राष्ट्रसेवा और जनसेवा को समर्पित रहा। वे सच्चे अर्थों में नवीन भारत के सारथी और सूत्रधार थे। वे एक ऐसे युग मनीषी थे, जिनके हाथों में काल के कपाल पर लिखने व मिटाने का अमरत्व था। ओजस्वी वक्ता विराट व्यक्तित्व और बहुआयामी प्रतिभा के धनी वाजपेयी की जीवन यात्रा आजाद भारत के अभ्युदय के साथ शुरू होती है और विश्व पटल पर भारत को विश्वगुरु के पद पर पुन: प्रतिष्ठित करने की आकांक्षा के साथ कई पड़ावों को जीते हुए आगे बढ़ती है। वे भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य थे। वे 1968 से 1973 तक भारतीय जन संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अटल बिहारी वाजपेयी में भारत का भविष्य देखा था। वाजपेयी 10 बार लोक सभा सांसद रहे। वहीं वे दो बार 1962 और 1986 में राज्यसभा सांसद भी रहे। वाजपेयी जी देश के एक मात्र सांसद थे, जिन्होंने देश की छह अलग-अलग सीटों से चुनाव जीता था। सन 1957 से 1977 तक वे लगातार बीस वर्षो तक जन संघ के संसदीय दल के नेता रहे। आपातकाल के बाद देश की जनता द्वारा चुने गए मोरार जी देसाई जी की सरकार में वे विदेश मंत्री बने और विश्व में भारत की एक अलग छवि का निर्माण किया।

इस दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ में पहली बार हिंदी में ओजस्वी उद्बोधन देकर वाजपेयी ने विश्व में मातृभाषा को पहचान दिलाई और भारत की एक अलग छाप छोड़ी। आपातकाल के दौरान उन्हें भी लोकतंत्र की हत्यारी सरकार की प्रताड़ना झेलनी पड़ी। उन्हें जेल में डाल दिया गया लेकिन उन्होंने जेल से ही कलम के सहारे अनुशासन के नाम पर अनुशासन का खून लिख कर राष्ट्र को एकजुट रखने की कवायद जारी रखी।

सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए विचारधारा की राजनीति करने वाले वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद पहले अध्यक्ष बने। उन्होंने तीन बार 1996, 1998-99 और 1999-2004 में प्रधानमंत्री के रूप में देश का प्रतिनिधित्व किया। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फलक पर देश को नई ऊंचाइयों पर प्रतिष्ठित करने वाले वाजपेयी के कार्यकाल में देश ने प्रगति के अनेक आयाम छुए।

अजातशत्रु अटल बिहारी वाजपेयी ने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नारे को आगे बढ़ाते हुए ‘जय जवान-जय किसान- जय विज्ञान’ का नारा दिया। देश की सामरिक सुरक्षा पर उन्हें समझौता बिलकुल भी गंवारा नहीं था। वैश्विक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने 1998 में पोखरण में पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण किए। इस परीक्षण के बाद कई अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद वाजपेयी की दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति ने इन परिस्थितियों में भी उन्हें अटल स्तंभ के रूप में अडिग रखा। कारगिल युद्ध की भयावहता का उन्होंने डट कर मुकाबला किया और पाकिस्तान को राजनीतिक, कूटनीतिक, रणनीतिक और सामरिक सभी स्तरों पर धूल चटाई।

वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में देश में विकास के स्वर्णिम अध्याय की शुरूआत हुई। वे देश के चारों कोनों को जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी अविस्मरणीय योजना के शिल्पी थे। नदियों के एकीकरण जैसे कालजयी स्वप्न के द्रष्टा थे। मानव के रूप में वे महामानव थे। सर्व शिक्षा अभियान, संरचनात्मक ढांचे के सुधार की योजना, सॉफ्टवेयर विकास के लिए सूचना एवं प्रौद्योगिकी कार्यदल का निर्माण और विद्युतीकरण में गति लाने के लिए केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग आदि योजनाओं की शुरुआत कर देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर करने में उनकी भूमिका काफी अनुकरणीय रही। वाजपेयी सरकार की विदेश नीति ने दुनिया में भारत को एक नेतृत्वकर्ता के रूप में प्रतिष्ठित रहा।

अपनी ओजस्वी भाषण शैली, लेखन व विचारधारा के प्रति निष्ठा तथा ठोस फैसले लेने के लिए विख्यात वाजपेयी को कई पुरस्कारों से नवाजा गया। उन्हें 1992 में पद्म विभूषण 1994 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार, 1994 में ही श्रेष्ठ सांसद पुरस्कार, भारत रत्न पंडित गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार और 2015 में उन्हें बांग्लादेश के सर्वोच्च अवार्ड फ्रेंड्स ऑफ बांग्लादेश लिबरेशन वार अवॉर्ड से उन्हें सम्मानित किया गया। देश के विकास में अमूल्य योगदान देने एवं अंतर्राष्ट्रीय फलक पर देश को सम्मान दिलाने के लिए वाजपेयी को 2015 में देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया गया।

— आईएएनएस

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ज़रा हटके

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से बोले ये पांच झूठ

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PM Modi Red Fort

नरेंद्र मोदी ने आज पांचवी बार लाल किले से भाषण दिया। भाषण में उन्होंने अपने चार साल के कामों का लेखा-जोखा भी पेश किया। 2019 के लोकसभा चुनाव में जाने से पहले मोदी का लाल किले पर ये आखिरी भाषण था। फिर भी उन्होंने कुछ Factual Mistakes मतलब तथ्यात्मक गलतियां कर ही दीं।

तथ्यात्मक गलती माफी दी जा सकती है। लेकिन तब नहीं, जब वो दावे की तरह पेश की गई हो। प्रधानमंत्री की भंगिमा भाषण देते हुए जानकारी बांटने वाली नहीं थी. दावे वाली थी। हिंदी में गलत दावे को झूठ कहा जाता है। सो प्रधानमंत्री की ‘गलतियां’ झूठ ही कहलाएंगी। प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले से कहे कुछ झूठ हमने पकड़े। ये रही लिस्ट-

दावा नंबर 1 – स्वच्छ भारत अभियान से तीन लाख बच्चों की जान बच गई.

सच्चाई – विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक अगर स्वच्छ भारत अभियान को 100% लागू कर दिया जाए तो 2019 तक डायरिया और प्रोटीन एनर्जी की कमी से होने वाली करीब 3 लाख बच्चों की मौतों को टाला जा सकता है। तो WHO ने किसी लक्ष्य के तय होने की बात नहीं की थी। उन्होंने महज़ एक अनुमान लगाया भविष्य (अक्टूबर 2019) के लिए। तो मोदी जी पूरे एक साल एडवांस चल रहे थे। फिर WHO की बात में शर्त थी कि स्वच्छ भारत अभियान के 100% टार्गेट पूरे हों। भारत कितना स्वच्छ हुआ है, मोदी जी ही जानते हैं. लेकिन हम इतना जानते हैं कि 100% नहीं हुआ है। तो बच्चों की जान बचने का दावा झूठा है।

दावा नंबर 2 – भारत का पासपोर्ट अब दुनिया के सबसे ज्यादा ‘इज्जतदार’ पासपोर्ट्स में से एक है। अब सब जगह इसका स्वागत होता है।

सच्चाई- पासपोर्ट की ‘इज्जत’ के माप के लिए दुनियाभर में एक रैंकिंग होती है। ‘ग्लोबल पासपोर्ट पावर इंडेक्स’ में किसी देश का पासपोर्ट जहां जगह पाता है, उसे ‘ग्लोबल पासपोर्ट पावर रैंक’ कहते हैं। यदि आपके पास अच्छे रैंक का पासपोर्ट हो तो आपको दुनिया के ज़्यादातर देशों (खासतौर पर यूरोप और अमरीकी महाद्वीप में) में जाने के लिए वीज़ा की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। आप फ्लाइट पकड़कर सीधा उस देश पहुंचें और आपको ‘वीज़ा ऑन अराइवल’ मिल जाएगा। पासपोर्ट का ‘स्वागत’ इसी संदर्भ में होता है। जैसे-जैसे नीचे की रैंकिंग वाले पासपोर्ट पर जाते हैं, वीज़ा ऑन अराइवल देने वाले देश कम होते जाते हैं। ज़्यादा नीचे की रैंकिंग हुई तो विकसित देश जाने के लिए वीज़ा मिलना ही मुश्किल हो जाता है।

फिलहाल ग्लोबल पासपोर्ट पावर इंडेक्स में भारत 65वें नंबर पर है. ये एक औसत रैंकिंग है। माने सबसे ‘इज्जतदार में से एक’ तो कतई नहीं. चीन इस रैंकिंग में 55वें नंबर पर है।

दावा नंबर 3 – भारत का शहद निर्यात दोगुना हो गया है.

सच्चाई – गांधी जी वाला सच (माने तथ्य) ये है कि वित्त वर्ष 2016-17 में भारत ने 55,73.903 करोड़ टन था। 2017-18 में यह बढ़कर 65,35.758 करोड़ टन हो गया। यह बढ़ोत्तरी करीब 17% है. भारत भूमि पर हुए महान गणितज्ञ आर्यभट के अनुसार दोगुना तभी कहा जा सकता है जब 100% की बढ़ोत्तरी हो जाए। हमने अभी कैलकुलेटर में हिसाब किया तो 17, 100 से 83 कम निकला। सो मोदी जी का शहद वाला दावा भी झूठा निकला. जीके के लिए बता दें कि भारत शहद निर्यात के मामले में 11वें नंबर पर है।

दावा नंबर 4 – मुद्रा योजना में बंटे 13 करोड़ लोन से देश में नौकरियां और अपना बिज़नेस (आंत्रप्रन्योरशिप) बढ़ी है।

सच्चाई – इंडिया टुडे द्वारा लगाई गई एक RTI के जवाब में सरकार ने खुद बताया है कि मुद्रा योजना में बांटे गए सभी लोन में से सिर्फ और सिर्फ 1.45% लोन ही 5 लाख से ज्यादा के हैं। 90% से ज्यादा लोन 50,000 से कम के हैं। अर्थशास्त्री अजीत रानाडे के मुताबिक इतने पैसों में लोन लेने वाला कोई बहुत छोटा धंधा (जैसे पकौड़े या चाय का ठेला) तो शुरू किर सकता है लेकिन व्यापक पैमाने पर रोज़गार पैदा नहीं हो सकता।

मुद्रा योजना के तहत 13 करोड़ लोन दिए गए हैं.

दावा नंबर 5 – 2013 में जिस रफ्तार से इलेक्ट्रिफिकेशन यानी विद्युतीकरण हो रहा था, उसी रफ्तार से काम पूरा करने में (सभी गावों तक बिजली पहुंचाने में) एक दशक लग जाता।

सच्चाई – एनडीए सरकार के चार सालों में 18,374 गांवों में बिजली पहुंचाई गई. इंडिया स्पेंड के मुताबिक साल 2005-06 से 2013-14 के बीच राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत 1,08,280 गांवों में बिजली पहुंचाई गई। इसका मतलब कि यूपीए राज में हर साल 14,528 गांवों का औसत रहा। वहीं मोदी सरकार के चार साल में 18,374 मतलब 4,594 गांव हर साल का औसत है।

मोदी सरकार इस बात पर ज़ोर कसती रही है कि साल 2016-17 में उसने यूपीए के आखिरी साल के बनिस्बत पांच गुना गावों में बिजली पहुंचाई। ये बात सरकार ने अपनी प्रेस रिलीज़ में कही भी है। लेकिन जैसा कि हमने ऊपर बताया, अगर मनमोहन सिंह के पूरे कार्यकाल की तुलना मोदी जी के पूरे कार्यकाल से की जाए तो विद्युतीकरण के मामले में यूपीए ने मोदी सरकार से तीन गुना तेज़ी से काम किया।

तो सारा खेल 2013-14 को बेस इयर लेने का है। सिर्फ एक साल के आंकड़े के आधार पर अगर प्रधानमंत्री ये दावा करते हैं कि यूपीए की बनिस्बत उनकी सरकार ने तेज़ काम किया (‘एक दशक’ से उनका संदर्भ यही था) तो वो कतई पचेगा नहीं। बेस ईयर 2004 कर दीजिए (जिस साल भाजपा चुनाव हारी थी) तो मोदी जी की बात सिर के बल पलट जाए।

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