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बदलता जलवायु, गर्माती धरती और पिघलते ग्लेशियर

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Climate change

मार्च 2014 में संयुक्त राष्ट्र की एक वैज्ञानिक समिति के प्रमुख ने चेतावनी दी है कि अगर ग्रीनहाउस गैसों का प्रदूषण कम नहीं किया गया तो जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव बेकाबू हो सकता है। ग्रीनहाउस गैसें धरती की गर्मी को वायुमंडल में अवरुद्ध कर लेती हैं, जिससे वायुमंडल का तामपान बढ़ जाता है और ऋतुचक्र में बदलाव देखे जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी समिति ने इस विषय पर 32 खंडों की एक रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट 2610 पृष्ठ की है।

समय की पुकार है कि अब कार्रवाई की जाए। ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं किया गया, तो हालात बेकाबू हो जाएंगे। नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों के दल द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोप में जानलेवा लू, अमेरिका में दावानल, आस्ट्रेलिया में भीषण सूखा और मोजाम्बिक, थाईलैंड और पाकिस्तान में प्रलयकारी बाढ़ जैसी 21वीं शताब्दी की आपदाओं ने यह दिखा दिया है कि मानवता के लिए मौसम का खतरा कितना बड़ा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अधिक बढ़ा तो खतरा और बढ़ जाएगा।

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अभी हाल ही में उत्तर भारत के कई राज्यों के साथ-साथ हिमालय पर स्थित नेपाल में आया भूकंप, उत्तराखण्ड में आई भीषण प्राकृतिक आपदा, जापान के पिछले 140 सालों के इतिहास में आए सबसे भीषण 8.9 की तीव्रता वाले भूकंप की वजह से प्रशांत महासागर में आई सुनामी के साथ ही यूरोप में जानलेवा लू, अमेरिका में दावानल, आस्ट्रेलिया में भीषण सूखा और मोजाम्बिक, थाईलैंड और पाकिस्तान में प्रलयकारी बाढ़ जैसी 21वीं शताब्दी की आपदाओं ने सारे विश्व का ध्यान इस अत्यन्त ही विनाशकारी समस्या की ओर आकर्षित किया है।

कुछ समय पूर्व पर्यावरण विज्ञान के पितामह जेम्स लवलौक ने चेतावनी दी थी कि यदि दुनिया के निवासियों ने एकजुट होकर पर्यावरण को बचाने का प्रभावशाली प्रयत्न नहीं किया तो जलवायु में भारी बदलाव के परिणामस्वरूप 21वीं सदी के अन्त तक छह अरब व्यक्ति मारे जाएंगे। संसार के एक महान पर्यावरण विशेषज्ञ की इस भविष्यवाणी को मानव जाति को हलके से नहीं लेना चाहिए।

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आज जब दक्षिण अमेरिका में जंगल कटते हैं तो उससे भारत का मानसून प्रभावित होता है। इस प्रकार प्रकृति का कहर किसी देश की सीमाओं को नहीं जानती। वह किसी धर्म किसी जाति व किसी देश व उसमें रहने वाले नागरिकों को पहचानती भी नहीं। वास्तव में आज पूरे विश्व के जलवायु में होने वाले परिवर्तन मनुष्यों के द्वारा ही उत्पन्न किये गये हैं। परमात्मा द्वारा मानव को दिया अमूल्य वरदान है पृथ्वी, लेकिन चिरकाल से मानव उसका दोहन कर रहा है। पेड़ों को काटकर, नाभिकीय यंत्रों का परीक्षण कर वह भयंकर जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण फैला रहा है। जिस पृथ्वी का वातावरण कभी पूरे विश्व के लिए वरदान था आज वहीं अभिशाप बनता जा रहा है।

डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में दिसम्बर, 2010 में आयोजित सम्मेलन में दुनिया भर के 192 देशों से जुटे नेता जलवायु परिवर्तन से संबंधित किसी भी नियम को बनाने में सफल नहीं हुए थे। इस सम्मेलन के तुरंत बाद आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ब्राउन ने कहा कि ‘यह तो बस एक पहला कदम है, इसे कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाने से पहले बहुत से कार्य किये जाने हैं। असली दिक्कत यह है कि सार्वभौमिक हित का मसला होते हुए भी यहा राष्ट्रीय हितों का विकट टकराव है। हमारा मानना है कि कई दशकों से पर्यावरण बचाने के लिए माथापच्ची कर रही दुनिया अब अलग-अलग देशों के कानूनों से ऊब चुकी है। विश्व की कई जानी-मानी हस्तियों का मानना है कि अब अंतर्राष्ट्रीय अदालत बनाने का ही रास्ता बचा है, ताकि हमारी गलतियों की सजा अगली पीढ़ी को न झेलनी पड़ी।

अभी हाल ही में सैन फ्रांसिस्को स्थित गोल्डमैन एनवार्नमेंट फाउंडेशन द्वारा भारत के रमेश अग्रवाल को पर्यावरण के सबसे बड़े पुरस्कार ‘गोल्डमैन प्राइज’ से नवाजा गया है। उन्होंने छत्तीसगढ़ में अंधाधुंध कोयला खनन से निपटने में ग्रामीणों ने मदद की और एक बड़ी कोयला परियोजना को बंद कराया। रमेश अग्रवाल छत्तीसगढ़ में काम करते हैं और वह लोगों की मदद से एक बड़े प्रस्तावित कोयला खनन को बंद कराने में सफल रहे। उनके साथ इस पुरस्कार को पाने वाले अन्य लोगों में पेरु, रूस, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया और अमरीका के 6 पर्यावरण कार्यकर्ता शामिल हैं। इन सभी विजेताओं को प्रत्येक को पौने दो लाख डालर की राशि मिलेगी। इससे पहले ग्लोबल वार्मिग के खिलाफ लड़ाई के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के क्लाइमेट पैनल के राजेन्द्र पचौरी और अमेरिका के पूर्व उप राष्ट्रपति अलगोर को शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

हमारी पूर्व पीढ़ियों ने तो हमारे भविष्य की चिंता की और प्रकृति की धरोहर को संजोकर रखा जबकि वर्तमान पीढ़ी प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन करने में लगी है। एक बार गांधीजी ने दातुन मंगवाई। किसी ने नीम की पूरी डाली तोड़कर उन्हें ला दिया। यह देखकर गांधीजी उस व्यक्ति पर बहुत बिगड़े। उसे डांटते हुए उन्होंने कहा ‘जब छोटे से टुकड़े से मेरा काम चल सकता था तो पूरी डाली क्यों तोड़ी? यह न जाने कितने व्यक्तियों के उपयोग में आ सकती थी।’ गांधीजी की इस फटकार से हम सबको भी सीख लेनी चाहिए। प्रकृति से हमें उतना ही लेना चाहिए जितने से हमारी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है।

जलवायु परिवर्तन की समस्या पर अभी हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी कहा है कि जलवायु परिवर्तन पृथ्वी पर ऐसे बदलाव ला रहा है जिससे मानव जाति पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने अमेरिका के लोगों से स्वस्थ एवं बेहतर भविष्य के लिए पर्यावरण सुरक्षा का आग्रह किया। वास्तव में आज मानव और प्रकृति का सह-संबंध सकारात्मक न होकर विध्वंसात्मक होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में पर्यावरण का प्रदूषण सिर्फ किसी राष्ट्र विशेष की निजी समस्या न होकर एक सार्वभौमिक चिंता का विषय बन गया है। पर्यावरण असंतुलन हर प्राणी को प्रभावित करता है। इसलिए पर्यावरण असंतुलन पर अब केवल विचार-विमर्श के लिए बैठकें आयोजित नहीं करना है वरन अब उसके लिए ठोस पहल करने की आवश्यकता है, अन्यथा बदलता जलवायु, गर्माती धरती और पिघलते ग्लेशियर जीवन के अस्तित्व को ही संकट में डाल देंगे। अत: जरूरी हो जाता है कि विश्व का प्रत्येक नागरिक पर्यावरण समस्याओं के समाधान हेतु अपना-अपना योगदान दें।

विश्व भर में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाले खतरों से निपटने के लिए विश्व के सभी देशों को एक मंच पर आकर तत्काल विश्व संसद, विश्व सरकार तथा विश्व न्यायालय के गठन पर सर्वसम्मति से निर्णय लिया जाना चाहिए। इस विश्व संसद द्वारा विश्व के 2.4 अरब बच्चों के साथ ही आगे जन्म लेने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए जो भी नियम व कानून बनाए जाए, उसे विश्व सरकार द्वारा प्रभावी ढंग से लागू किया जाए और यदि इन कानूनों का किसी देश द्वारा उल्लघंन किया जाए तो उस देश को विश्व न्यायालय द्वारा दण्डित करने का प्राविधान पूरी शक्ति के साथ लागू किया जाए। इस प्रकार विश्व के 2.4 अरब बच्चों के साथ ही आगे जन्म लेने वाली पीढ़ियों को जलवायु परिवर्तन जैसे महाविनाश से बचाने के लिए अति शीघ्र विश्व संसद, विश्व सरकार एवं विश्व न्यायालय का गठन नितान्त आवश्यक है। (आईएएनएस/आईपीएन)

( आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं।)

— आईएएनएस

Viral सच

लड़कियों की तुलना में लड़कों का यौन उत्पीड़न ज्यादा!

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Child Sexual Abuse in India

नई दिल्ली, 6 अगस्त | देश में अक्सर जब बात बच्चों से यौन उत्पीड़न के मामलों की आती है तो दिमाग में लड़कियों के साथ होने वाली यौन उत्पीड़न की घटनाएं आंखों के सामने उमड़ने लगती हैं, लेकिन इसका एक पहलू कहीं अंधकार में छिप सा गया है। महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की 2007 की रिपोर्ट दर्शाती है कि देश में 53.22 फीसदी बच्चों को यौन शोषण के एक या अधिक रूपों का सामना करना पड़ा, जिसमें से 52.94 फीसदी लड़के इन यौन उत्पीड़न की घटनाओं का शिकार हुए।

चेंज डॉट ओआरजी के माध्यम से बाल यौन उत्पीड़न के मामले को उठाने वाली याचिकाकर्ता, फिल्म निर्माता और लेखक इंसिया दरीवाला ने मुंबई से फोन पर आईएएनएस को बताया, “सबसे बड़ी समस्या है कि इस तरह के मामले कभी सामने आती ही नहीं क्योंकि हमारे समाज में बाल यौन उत्पीड़न को लेकर जो मानसिकता है उसके कारण बहुत से मामले दर्ज ही नहीं होते और होते भी हैं तो मेरी नजर में बहुत ही कम ऐसा होता है। इस तरह के मामले सामने आने पर समाज की पहली प्रतिक्रिया होती है कि लड़कों के साथ तो कभी यौन शोषण हो नहीं सकता, क्योंकि वे पुरुष हैं और पुरुषों के साथ कभी यौन उत्पीड़न नहीं होता।”

उन्होंने कहा, “समाज का जो यह नजरिया है लड़कों को देखने का ठीक नहीं है क्योंकि पुरुष बनने से पहले वह लड़के और बच्चे ही होते हैं। बच्चों की यह जो श्रेणी है काफी दोषपूर्ण है इसमें कोई लड़का-लड़की का भेद नहीं होता। लड़कों का जो शोषण हो रहा है अधिकतर पुरुषों द्वारा ही हो रहा है। मेरे हिसाब से यह काफी नजरअंदाज कर दी जाने वाली सच्चाई है और मैं पहले भी कई बार बोल चुकी हूं हम जो बच्चों व महिलाओं पर यह यौन हिंसा हमारे समाज में देख रहे हैं, कहीं न कहीं हम उसकी जड़ को नहीं पकड़ पा रहे हैं।”

लड़कों के साथ यौन उत्पीड़न होने पर बताने में कतराने की वजह के सवाल पर फिल्मनिर्माता ने कहा, “दरअसल जब समाज में किसी लड़की के साथ यौन उत्पीड़न की घटना होती है तो समाज की पहली प्रतिक्रिया हमदर्दी की होती है, उन्हें बचाने के लिए सपोर्ट सिस्टम होता है लेकिन अगर कोई लड़का अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामले को लेकर बोलता भी है तो पहले लोग उसपर हंसेंगे, उसका मजाक उड़ाएंगे व मानेंगे भी नहीं और उसकी बातों का विश्वास नहीं करेंगे, कहेंगे तुम झूठ बोल रहे हो यह तो हो नहीं सकता। हंसी और मजाक बनाए जाने के कारण लड़कों को आगे आने से डर लगता है इसलिए समाज बाल यौन उत्पीड़न में एक अहम भूमिका निभा रहा है।”

उन्होंने बताया, “पिछले एक साल में जब से मैंने अपना अभियान और लोगों से बात करना शुरू किया है तब से काफी चीजें हुई हैं। इसलिए मैं सरकार की शुक्रगुजार हूं कि कम से कम वह इस ओर ध्यान दे रहे हैं। आज सामान्य कानूनों को निष्पक्ष बनाने की प्रक्रिया चल रही है, इसकी शुरुआत पॉस्को कानून से हुई और अब धारा 377, पुरुषों के दुष्कर्म कानून को भी देखा जा रहा है। अब अखिरकार हम लोग लिंग समानता की बात कर सकते हैं, जिससे वास्तव में समानता आएगी। लिंग समानता का मतलब यह नहीं है कि वह एक लिंग को ध्यान में रखकर सारे कानून बनाए, यह सिर्फ महिलाओं की बात नहीं है। पुरुष और महिलाओं को समान रूप से सुरक्षा मिलनी चाहिए।”

लेखक इंसिया दरीवाल ने कहा, “देखिए पॉस्को कानून निष्पक्ष है लेकिन जब आप लड़कों के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में दंड के प्रावधान को देखते हैं तो वह धारा 377 के तहत दिया जाता था। जैसे पहले अगर दो पुरुषों के बीच सहमति से हुआ तो भी धारा 377 के तहत दोनों लोगों को सजा मिलती थी और नहीं हुआ तो भी दोनों को इसी धारा के तहत सजा दी जाती थी। इसमें पीड़ित को भी सजा मिलने का खतरा था, हालांकि अब चीजों में सुधार हुआ है और इसपर अब काफी चर्चा हो रही है और समाज में भी बदलाव आ रहा है।”

महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी से मिले समर्थन पर उन्होंने कहा, “उन्होंने मेरे काम की सराहना की है और कहा कि यह काम काफी जरूरी है। मैंने उनसे एक स्टडी की मांग की थी, जिसमें यह देखना था कि बाल यौन उत्पीड़न की हमारे समाज में कितनी प्रबलता है और इसके जो प्रभाव हैं वह बच्चों और पुरुषों पर क्या हैं, इसमें यौन प्रभाव, उनके संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ता है, उनके मानसिकता और शारिरिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता यह सब शामिल है। इस स्टडी के निष्कर्षो से मुझे मापदंड तैयार करने हैं और उन मापदंड़ों को मैं इसलिए तैयार करना चाहती हूं क्योंकि जब तक हम जड़ की जांच नहीं करेंगे तब तक नहीं पता चलेगा कि यह क्यों हो रहा है।”

बाल यौन उत्पीड़न मामलों में समाज की गलती के सवाल पर इंसिया ने कहा, “समाज कौन है हम लोग, इसलिए मानसिकता बदलना बहुत जरूरी है क्योंकि अगर हम लोग मानसिकता नहीं बदल पाए तो कानून कितने भी सख्त हो जाए तो उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। जब भी कोई घटना होती है तो हम सरकार, कानून और वकीलों को दोषी ठहराते हैं लेकिन हमें कहीं न कहीं खुद को भी देखना चाहिए क्योंकि हमारे समाज में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग भूमिका तैयार कर दी गई है, जिसे उन्हें निभाना पड़ता है, इसे बदलने की जरूरत है।”

भारत सरकार ने लिंग निष्पक्ष कानून बनाने के मद्दनेजर लड़कों के साथ होने वाले यौन शोषण को मौजूदा यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा (पॉस्को) अधिनियम में संशोधनों को मंजूरी दे दी है जिसे कैबिनेट के पास मंजूरी के लिए भेजा जाना बाकी है।

–आईएएनएस

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अपहरण के आरोपी सबसे अधिक सांसद-विधायक भाजपा से

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bjp corporate donations

नई दिल्ली, 30 जुलाई | भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कम से कम 16 सांसदों और विधायकों के खिलाफ अपहरण से संबंधित आपराधिक मामले दर्ज हैं। यह भारत में किसी भी राजनीतिक दल से सबसे ज्यादा है। मौजूदा 4,867 सांसदों और विधायकों द्वारा दाखिल हलफनामों के एक विश्लेषण से यह खुलासा हुआ है। चुनाव एवं राजनीतिक सुधारों के लिए काम करने वाली एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स द्वारा सोमवार को यह निष्कर्ष जारी किया गया।

निष्कर्ष में कहा गया है कि 770 सांसदों और 4,086 विधायकों के हलफनामों से यह खुलासा हुआ कि 1,024 या कुछ 21 फीसदी देश के सांसदों-विधायकों ने यह घोषित किया है कि उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

इसमें से 64 ने अपने खिलाफ अपहरण से संबंधित मामलों की घोषणा की है। इसमें से 17 विभिन्न राजनीतक दलों से ताल्लुक रखते हैं, जबकि चार निर्दलीय हैं।

भाजपा इस सूची में शीर्ष पर है। जबकि कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) दोनों दूसरे स्थान पर हैं। दोनों के छह-छह सदस्य इस सूची में शामिल हैं।

एडीआर के मुताबिक, सूची में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के पांच, बीजू जनता दल (बीजद) और द्रमुक के चार-चार, समाजवादी पार्टी (सपा), तेदेपा के तीन-तीन, तृणमूल कांग्रेस, माकपा, और शिवसेना के दो-दो सदस्य शामिल हैं।

साथ ही इस सूची में लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा), जद (यू), टीआरएस और उत्तर प्रदेश की निषाद पार्टी के एक-एक सदस्य का नाम भी शामिल है।

अपहरण से संबंधित आरोपों की घोषणा करने वाले विधायकों में बिहार व उत्तर प्रदेश से नौ-नौ, महाराष्ट्र के आठ, पश्चिम बंगाल के छह, ओडिशा व तमिलनाडु से चार-चार, आंध्र प्रदेश, गुजरात व राजस्थान से तीन-तीन, और छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, पंजाब व तेलंगाना से एक-एक सदस्य शामिल हैं।

–आईएएनएस

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Viral सच

ये सरासर झूठ है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने फ़्राँस को पछाड़ दिया है!

यदि भारत की जीडीपी एक दशक में दोगुनी हो गयी और वो कौन-कौन से देश हैं, जिनकी जीडीपी इसी दौरान भारत की जीडीपी से पहले दोगुनी हुई है?

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Indian economy

भारत का भक्त-मीडिया आपको ये तो बताता है कि हम अब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में छठे स्थान पर आ चुके हैं और अब फ़्राँस से आगे हैं। लेकिन वो आपको ये नहीं बताता कि भारतीयों के मुक़ाबले फ़्राँसिसियों की प्रति व्यक्ति आय 20 गुना ज़्यादा है। आपको ये भी नहीं बताया जाता कि फ़्राँस की आबादी से ज़्यादा लोग भारत में आज भी ग़रीबी रेखा से नीचे हैं। राजा का बाजा बन चुका भारतीय मीडिया आपको ये भी नहीं समझता कि कैसे मोदी सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास-दर का हिसाब रखने वाले फ़ार्मूले को ही बदल दिया, जिसकी वजह से मनमोहन सरकार के मुक़ाबले अभी दर्ज होने वाली विकास-दर में दो फ़ीसदी का इज़ाफ़ा अपने आप आ जाता है।

भारतीय मीडिया अपने आप बेईमान नहीं हो गया। मोदी राज में एक बड़ी साज़िश के तहत मीडिया संस्थानों को हिदायत दी गयी कि वो ख़बरों को ऐसे तोड़-मरोड़कर पेश करें, जिससे जनता के सामने हमेशा सरकार की उपलब्धियों की झूठी तस्वीरें ही पहुँचती रहें। वर्ना, हरेक पेशेवर पत्रकार और उसके मीडिया संस्थान को अच्छी तरह पता है कि भारत का फ़्राँस से आगे निकलना सिर्फ़ एक आँकड़ा है। आँकड़ों की तुलनात्मक व्याख्या के बग़ैर वो सिर्फ़ अंक हैं और कुछ नहीं! किसी देश की अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का मतलब है कि उसकी आबादी की ख़ुशहाली का बढ़ना। ख़ुशहाली को नापने के कई पैमाने हैं। लेकिन सबसे आसान है प्रति व्यक्ति आय। दूसरा पैमाना है कि शिक्षा-स्वास्थ्य-सड़क-पानी-बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं का स्तर और इस पर होने वाला ख़र्च।

अब ज़रा ये सोचिए कि क्या आप उस व्यक्ति को ज़्यादा धनवान मानेंगे जिसके पास ज़्यादा ज़मीन हो या फिर उसे जिसके पास ज़्यादा उपजाऊ ज़मीन हो? हो सकता है कि किसी के पास सौ बीघा ज़मीन हो, लेकिन वो बंजर हो। जबकि किसी के पास दस बीघा ही हो और वो खेतीहर हो। अब यदि आप अंक के आधार पर सोचेंगे तो ज़ाहिर है कि आप सौ को दस के मुक़ाबले दस गुना बड़ा ही मानेंगे। ऐसा ही बड़क्पन विश्व बैंक की ओर से जारी सालाना, सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का है। ये आँकड़ा कहता है कि साल 2017 में भारत की जीडीपी 2597 अरब डॉलर हो गयी, जबकि फ़्राँस की जीडीपी 2582 अरब डॉलर दर्ज की गयी। ये आँकड़ा ऊपर दिये गये उदाहरण के मुताबिक़, सकल या कुल ज़मीन जैसा है।

विश्व बैंक के आँकड़े के आधार पर ये हर्ग़िज़ नहीं कहा जा सकता कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। क्योंकि फ़्राँस के 6.04 करोड़ लोगों की उत्पादकता की तुलना यदि भारत 134 करोड़ की आबादी की उत्पादकता से की जाएगी तो हम उसके मुक़ाबले बेहद बौने साबित होंगे। इसीलिए, लोगों की ख़ुशहाली जानने के लिए प्रति व्यक्ति आय को आधार माना जाता है। फ़्राँसिसियों की सालाना प्रति व्यक्ति आय जहाँ 38,477 डॉलर है, वहीं भारत के मामले में ये सिर्फ़ 1,940 डॉलर ही बैठती है। इसका मतलब ये हुआ कि एक आम फ़्राँसिसी नागरिक के मुक़ाबले एक आम भारतीय 20 गुना ग़रीब है।

लगे हाथ ग़रीबी को भी समझते चलें। वर्ल्ड पावर्टी क्लॉक और ब्रूकिंग्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अब भी भारत में 7 करोड़ लोग बेहद ग़रीबी में जी रहे हैं। भारत अब दुनिया में सबसे ज़्यादा ग़रीबों की आबादी वाला देश नहीं रहा। क्योंकि नाइजीरिया में बेहद ग़रीब लोगों की आबादी 8.7 करोड़ है। ग़रीबों की संख्या की तुलना करने वक़्त भी ये ग़ौर करना ज़रूरी होगा कि बीते दशकों में देश की कुल आबादी में बेहद ग़रीबों की संख्या और उनका अनुपात क्या रहा है? क्या मोदी राज में ग़रीब घटे हैं? कुल आबादी में ग़रीबों का अनुपात कम हुआ है? क्या ये संख्या और अनुपात मोदी राज से पहले की सरकारों के मुक़ाबले बेहतर हुआ है या बदतर? याद रखिये कि संख्या का महत्व बेहद मामूली है। असली आँकड़ा तो अनुपात का है। यदि अनुपात सुधर रहा है, तभी हम बेहतर हो रहे हैं। वर्ना, नहीं।

इसी तरह, विश्व बैंक की रिपोर्ट की आड़ में भक्त-मीडिया हमें बता रहा है कि नोटबन्दी और जीएसटी से भारतीय अर्थव्यवस्था में तेज़ी आयी है। और, बीते दशक में भारत की जीडीपी दोगुनी हो गयी है। जबकि सच्चाई ये है कि मोदी सरकार यही झूठ तो फैलाना चाहती है। सवाल है कि ये तेज़ी क्या होती है? तेज़ एक तुलनात्मक दशा है। सजातीय की तो तुलना हो सकती है, लेकिन विजातीय की नहीं। मिसाल के तौर पर, साइकिल और बाइक की रफ़्तार की तुलना नहीं हो सकती, हाथी और घोड़े की ताक़त की तुलना नहीं हो सकती, स्त्री और पुरुष की तुलना नहीं हो सकती। लिहाज़ा, जब हम विकास-दर की तेज़ी पर ग़ौर करें, तब ये देखना ज़रूरी होगा कि सम्बन्धित अर्थव्यवस्था का आकार कितना बड़ा है। चीन की अर्थव्यवस्था भारत से छह गुना बड़ी है। वास्तविक मात्रा के लिहाज़ से उनका आकार का 6 फ़ीसदी हमारे आकार के 36 फ़ीसदी के बराबर होगा।

हम देख चुके हैं कि नोटबन्दी अपने हरेक मक़सद में विफल साबित हुई है। इससे काले धन की कोई रोकथाम नहीं हो सकी। उल्टा, सारा काला धन सरकार की मिली-भगत से सफ़ेद होकर बैंकों में जा पहुँचा। आतंकवाद और नक्सलवाद पर भी नोटबन्दी ने कोई प्रभाव नहीं डाला। कैश-लेस यानी डिज़ीटाइज़ेशन के मोर्चे पर भी कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ। दूसरी ओर, नोटबन्दी का भारी-भरकम ख़र्च अर्थव्यवस्था पर पड़ा। करोड़ों लोगों का काम-धन्धा चौपट हो गया। रोज़गार-व्यापार पर ऐसा असर पड़ा कि अभी तक हालात सामान्य नहीं हो पाया है। इसी तरह, जीएसटी को भी जिस तरह से लागू किया गया, उसने महँगाई तथा जनता की मुश्किलों को बढ़ाया ही।

इस तरह, बीते एक दशक में भारत की जीडीपी के दोगुना होने की बातों को भी गहराई से समझना बेहद ज़रूरी है। दस साल की उपलब्धि में से मोदी राज के चार साल की औसत विकास-दर की तुलना मनमोहन सिंह सरकार के छह सालों की औसत विकास-दर से करने पर पता चलेगा कि मौजूदा चार साल के मुक़ाबले उससे पहले के छह साल बेहद उम्दा थे। मनमोहन सरकार में औसत विकास-दर 8.5 फ़ीसदी रही, जबकि मोदी राज में यही औसत 6.5 फ़ीसदी का रहा है। इससे दशक का औसत 7.7 फ़ीसदी बैठेगा। अब ज़रा सोचिए कि जो ख़ुद को तेज़ बता रहे हैं क्या वो अपने से पहले वालों के मुक़ाबले 1.2 अंक या 18 फ़ीसदी धीमे नहीं है!

इसी धीमेपन का दूसरे पहलू को भी हमें समझना होगा कि यदि भारत की जीडीपी एक दशक में दोगुनी हो गयी और वो कौन-कौन से देश हैं, जिनकी जीडीपी इसी दौरान भारत की जीडीपी से पहले दोगुनी हुई है? ऐसी तुलना के बग़ैर कोई कैसे कह सकता है कि हमारी उपलब्धि औरों से बेहतर है। विकास-दर की तुलना करते समय ये देखना भी ज़रूरी है कि अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं में महँगाई और मुद्रास्फीति का दशा क्या रही है? क्योंकि जिन देशों में महँगाई नियंत्रण में है, वहाँ ब्याज़-दरें बहुत कम हैं। उनकी मुद्रा की क्रय-शक्ति जहाँ दस साल पहले जितनी ही है, वहीं हमारे रुपये की औक़ात कहीं ज़्यादा कम हो चुकी है। लिहाज़ा, मुमकिन है कि हम रुपये ज़्यादा कमाने लगें, लेकिन ज़रूरी नहीं कि ज़्यादा रुपयों से हमारी ख़ुशहाली भी बढ़ी ही होगी। इसीलिए, हमें आँकड़ों की बाज़ीगरी को समझना आना चाहिए।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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