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बदलता जलवायु, गर्माती धरती और पिघलते ग्लेशियर

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Climate change

मार्च 2014 में संयुक्त राष्ट्र की एक वैज्ञानिक समिति के प्रमुख ने चेतावनी दी है कि अगर ग्रीनहाउस गैसों का प्रदूषण कम नहीं किया गया तो जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव बेकाबू हो सकता है। ग्रीनहाउस गैसें धरती की गर्मी को वायुमंडल में अवरुद्ध कर लेती हैं, जिससे वायुमंडल का तामपान बढ़ जाता है और ऋतुचक्र में बदलाव देखे जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी समिति ने इस विषय पर 32 खंडों की एक रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट 2610 पृष्ठ की है।

समय की पुकार है कि अब कार्रवाई की जाए। ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं किया गया, तो हालात बेकाबू हो जाएंगे। नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों के दल द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोप में जानलेवा लू, अमेरिका में दावानल, आस्ट्रेलिया में भीषण सूखा और मोजाम्बिक, थाईलैंड और पाकिस्तान में प्रलयकारी बाढ़ जैसी 21वीं शताब्दी की आपदाओं ने यह दिखा दिया है कि मानवता के लिए मौसम का खतरा कितना बड़ा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अधिक बढ़ा तो खतरा और बढ़ जाएगा।

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अभी हाल ही में उत्तर भारत के कई राज्यों के साथ-साथ हिमालय पर स्थित नेपाल में आया भूकंप, उत्तराखण्ड में आई भीषण प्राकृतिक आपदा, जापान के पिछले 140 सालों के इतिहास में आए सबसे भीषण 8.9 की तीव्रता वाले भूकंप की वजह से प्रशांत महासागर में आई सुनामी के साथ ही यूरोप में जानलेवा लू, अमेरिका में दावानल, आस्ट्रेलिया में भीषण सूखा और मोजाम्बिक, थाईलैंड और पाकिस्तान में प्रलयकारी बाढ़ जैसी 21वीं शताब्दी की आपदाओं ने सारे विश्व का ध्यान इस अत्यन्त ही विनाशकारी समस्या की ओर आकर्षित किया है।

कुछ समय पूर्व पर्यावरण विज्ञान के पितामह जेम्स लवलौक ने चेतावनी दी थी कि यदि दुनिया के निवासियों ने एकजुट होकर पर्यावरण को बचाने का प्रभावशाली प्रयत्न नहीं किया तो जलवायु में भारी बदलाव के परिणामस्वरूप 21वीं सदी के अन्त तक छह अरब व्यक्ति मारे जाएंगे। संसार के एक महान पर्यावरण विशेषज्ञ की इस भविष्यवाणी को मानव जाति को हलके से नहीं लेना चाहिए।

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आज जब दक्षिण अमेरिका में जंगल कटते हैं तो उससे भारत का मानसून प्रभावित होता है। इस प्रकार प्रकृति का कहर किसी देश की सीमाओं को नहीं जानती। वह किसी धर्म किसी जाति व किसी देश व उसमें रहने वाले नागरिकों को पहचानती भी नहीं। वास्तव में आज पूरे विश्व के जलवायु में होने वाले परिवर्तन मनुष्यों के द्वारा ही उत्पन्न किये गये हैं। परमात्मा द्वारा मानव को दिया अमूल्य वरदान है पृथ्वी, लेकिन चिरकाल से मानव उसका दोहन कर रहा है। पेड़ों को काटकर, नाभिकीय यंत्रों का परीक्षण कर वह भयंकर जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण फैला रहा है। जिस पृथ्वी का वातावरण कभी पूरे विश्व के लिए वरदान था आज वहीं अभिशाप बनता जा रहा है।

डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में दिसम्बर, 2010 में आयोजित सम्मेलन में दुनिया भर के 192 देशों से जुटे नेता जलवायु परिवर्तन से संबंधित किसी भी नियम को बनाने में सफल नहीं हुए थे। इस सम्मेलन के तुरंत बाद आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ब्राउन ने कहा कि ‘यह तो बस एक पहला कदम है, इसे कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाने से पहले बहुत से कार्य किये जाने हैं। असली दिक्कत यह है कि सार्वभौमिक हित का मसला होते हुए भी यहा राष्ट्रीय हितों का विकट टकराव है। हमारा मानना है कि कई दशकों से पर्यावरण बचाने के लिए माथापच्ची कर रही दुनिया अब अलग-अलग देशों के कानूनों से ऊब चुकी है। विश्व की कई जानी-मानी हस्तियों का मानना है कि अब अंतर्राष्ट्रीय अदालत बनाने का ही रास्ता बचा है, ताकि हमारी गलतियों की सजा अगली पीढ़ी को न झेलनी पड़ी।

अभी हाल ही में सैन फ्रांसिस्को स्थित गोल्डमैन एनवार्नमेंट फाउंडेशन द्वारा भारत के रमेश अग्रवाल को पर्यावरण के सबसे बड़े पुरस्कार ‘गोल्डमैन प्राइज’ से नवाजा गया है। उन्होंने छत्तीसगढ़ में अंधाधुंध कोयला खनन से निपटने में ग्रामीणों ने मदद की और एक बड़ी कोयला परियोजना को बंद कराया। रमेश अग्रवाल छत्तीसगढ़ में काम करते हैं और वह लोगों की मदद से एक बड़े प्रस्तावित कोयला खनन को बंद कराने में सफल रहे। उनके साथ इस पुरस्कार को पाने वाले अन्य लोगों में पेरु, रूस, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया और अमरीका के 6 पर्यावरण कार्यकर्ता शामिल हैं। इन सभी विजेताओं को प्रत्येक को पौने दो लाख डालर की राशि मिलेगी। इससे पहले ग्लोबल वार्मिग के खिलाफ लड़ाई के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के क्लाइमेट पैनल के राजेन्द्र पचौरी और अमेरिका के पूर्व उप राष्ट्रपति अलगोर को शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

हमारी पूर्व पीढ़ियों ने तो हमारे भविष्य की चिंता की और प्रकृति की धरोहर को संजोकर रखा जबकि वर्तमान पीढ़ी प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन करने में लगी है। एक बार गांधीजी ने दातुन मंगवाई। किसी ने नीम की पूरी डाली तोड़कर उन्हें ला दिया। यह देखकर गांधीजी उस व्यक्ति पर बहुत बिगड़े। उसे डांटते हुए उन्होंने कहा ‘जब छोटे से टुकड़े से मेरा काम चल सकता था तो पूरी डाली क्यों तोड़ी? यह न जाने कितने व्यक्तियों के उपयोग में आ सकती थी।’ गांधीजी की इस फटकार से हम सबको भी सीख लेनी चाहिए। प्रकृति से हमें उतना ही लेना चाहिए जितने से हमारी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है।

जलवायु परिवर्तन की समस्या पर अभी हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी कहा है कि जलवायु परिवर्तन पृथ्वी पर ऐसे बदलाव ला रहा है जिससे मानव जाति पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने अमेरिका के लोगों से स्वस्थ एवं बेहतर भविष्य के लिए पर्यावरण सुरक्षा का आग्रह किया। वास्तव में आज मानव और प्रकृति का सह-संबंध सकारात्मक न होकर विध्वंसात्मक होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में पर्यावरण का प्रदूषण सिर्फ किसी राष्ट्र विशेष की निजी समस्या न होकर एक सार्वभौमिक चिंता का विषय बन गया है। पर्यावरण असंतुलन हर प्राणी को प्रभावित करता है। इसलिए पर्यावरण असंतुलन पर अब केवल विचार-विमर्श के लिए बैठकें आयोजित नहीं करना है वरन अब उसके लिए ठोस पहल करने की आवश्यकता है, अन्यथा बदलता जलवायु, गर्माती धरती और पिघलते ग्लेशियर जीवन के अस्तित्व को ही संकट में डाल देंगे। अत: जरूरी हो जाता है कि विश्व का प्रत्येक नागरिक पर्यावरण समस्याओं के समाधान हेतु अपना-अपना योगदान दें।

विश्व भर में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाले खतरों से निपटने के लिए विश्व के सभी देशों को एक मंच पर आकर तत्काल विश्व संसद, विश्व सरकार तथा विश्व न्यायालय के गठन पर सर्वसम्मति से निर्णय लिया जाना चाहिए। इस विश्व संसद द्वारा विश्व के 2.4 अरब बच्चों के साथ ही आगे जन्म लेने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए जो भी नियम व कानून बनाए जाए, उसे विश्व सरकार द्वारा प्रभावी ढंग से लागू किया जाए और यदि इन कानूनों का किसी देश द्वारा उल्लघंन किया जाए तो उस देश को विश्व न्यायालय द्वारा दण्डित करने का प्राविधान पूरी शक्ति के साथ लागू किया जाए। इस प्रकार विश्व के 2.4 अरब बच्चों के साथ ही आगे जन्म लेने वाली पीढ़ियों को जलवायु परिवर्तन जैसे महाविनाश से बचाने के लिए अति शीघ्र विश्व संसद, विश्व सरकार एवं विश्व न्यायालय का गठन नितान्त आवश्यक है। (आईएएनएस/आईपीएन)

( आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं।)

— आईएएनएस

Viral सच

ज्यादातर पाकिस्तानी नहीं जानते इंटरनेट क्या है : सर्वेक्षण

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Internet

इस्लामाबाद, 12 नवंबर | पाकिस्तान में 15 साल से लेकर 65 साल की उम्र के 69 फीसदी लोगों को नहीं मालूम है कि इंटरनेट क्या होता है। यह बात सूचना-संचार प्रौद्योगिकी है(आईसीटी) आधारित एक सर्वेक्षण में प्रकाश में आई है। श्रीलंका के थिंक टैंक लाइर्नी एशिया द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट सोमवार को डॉन में प्रकाशित हुई है। रिपोर्ट पाकिस्तान के 2,000 लोगों के सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गई है।

सर्वेक्षक थिंक टैंक ने दावा किया है कि नमूने की प्रक्रिया के तहत राष्ट्रीय स्तर पर 15 साल से 65 साल की उम्र की 98 फीसदी आबादी के प्रतिनिधित्व सुनिश्चित की गई है।

लाइनर एशिया की सीईओ हेलनी गलपाया ने कहा, “पाकिस्तान दूरसंचार प्राधिकरण (पीटीए) की वेबसाइट में 15.2 करोड़ सक्रिय सेल्युलर फोन धारक हैं। चाहे वे आदमी हो या औरत, गरीब हो या अमीर लेकिन वे नहीं एप्स का उपयोग करना नहीं जानते हैं।”

–आईएएनएस

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Viral सच

ज़हर उगलने वाले 13 सेकेंड के इस वीडियो को क्या आपने देखा!

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Flag Pakistan

जैसे शरीर के तपने का मतलब बुख़ार होता है, वैसे ही जब फेंकू ख़ानदान Fake News/Views/Video पर उतर आये तो समझ लीजिए कि अपने पतन की आहट सुनकर वो बदहवासी में झूठ तथा अफ़वाह की उल्टियाँ कर रहा है! क्योंकि झूठ किसी को हज़म नहीं होता, भक्तों का पाचन-तंत्र भी इसे हज़म नहीं कर पाता है! लिहाज़ा, भक्तों को भी उल्टी-दस्त यानी डीहाइड्रेशन की तकलीफ़ होना स्वाभाविक है! इसीलिए जैसे ही संघ परिवार के चहेते संगठनों के सर्वेक्षणों ने बताना शुरू किया कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी बुरी तरह से हारने जा रही है, वैसे ही एक ओर तो नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के भाषणों की दिशा पूरी ताक़त से काँग्रेस और राहुल गाँधी के चरित्रहनन की ओर घूम जाती है, वहीं दूसरी ओर, संघियों का अफ़वाह प्रसार तंत्र भी सक्रिय हो जाता है, ताकि समाज में वोट बैंक की सियासत को कोसते हुए ‘हिन्दू-मुसलमान’ करके हिन्दुओं को हिन्दू के नाम पर लामबन्द किया जा सके!

मोदी-शाह के दहकते हुए भाषण तो आपको बन्धक/दलाल न्यूज़ चैनल सारा दिन सुनाते ही रहते हैं! पहले भाषण का लाइव और फिर स्टोरी तथा डिबेट/बहस के रूप में! हालाँकि, इनकी गुणवत्ता को दर्शक/श्रोता/पाठक भी जल्द ही पहचान लेते हैं। इनके सही या ग़लत होने को लेकर अपनी राय भी बनाते हैं। लेकिन इसी के साथ ग़ुमनाम संघियों की ओर से WhatsApp University के ज़रिये हिन्दुओं को मूर्ख बनाकर, उन्हें मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काने का शरारती खेल चालू हो जाता है! ऐसा ही एक घिनौना खेल मेरे हाथ लग गया। मेरे किसी परिचित ने मुझे 13 सेकेंड का एक वीडियो और उसके साथ निम्न टिप्पणी भी भेजी।

“कैसे सौप दे कोंग्रेस को

ये वतन हिन्दुस्तान का,

हमने देखा है तुम्हारी रेली मैं झंडा पकिस्तान का!!

ये विडिओ जरुर देखे”

इस संदेश के वर्तनी दोष की अनदेखी करके आप वीडियो देखने लगेंगे। फिर अपना सिर धुन लेंगे। आपके नथुने फूलने लगेंगे। आपके होंठ अपशब्दों को बुदबुदाने लगेंगे। फिर आप फ़ौरन काँग्रेस को कोसने लगेंगे। उन्हें देश-विरोधी, ग़द्दार और पाकिस्तान परस्त मानने लगेंगे। काँग्रेस के प्रति आपके मन में नफ़रत पैदा होगी। लेकिन अब ज़रा इस वीडियो को बार-बार देखिए। स्लो मोशन यानी धीमी रफ़्तार में भी देखिए, जैसे क्रिकेट मैच में थर्ड अम्पायर देखते हैं! क्योंकि यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो फ़ौरन इस वीडियो को अपने तमाम परिचितों और ख़ासकर उन लोगों को फ़ारवर्ड नहीं करेंगे जो या तो भक्त नहीं हैं या फिर काँग्रेसी हैं!

आप दोनों में से किसी भी विकल्प को चुने, तो भी उन अनाम और ग़ुमनाम ताक़तों का मक़सद पूरा हो जाता है, जिनके झूठ और दुष्प्रचार के लिए ऐसे वीडियो वायरल करवाये जाते हैं। इस काम के लिए संघ-बीजेपी ने देश भर में कम से कम 20 हज़ार लोगों को बाक़ायदा वेतन वाली नौकरी पर लगा रखा है! सोशल मीडिया की भाषा में इन बेहूदा कार्यकर्ताओं/स्वयंसेवकों को ट्रोल या भक्त कहा जाता है। इन्हें बाक़ायदा गुरिल्ला युद्ध-शैली के क्रान्तिकारियों या विषकन्याओं की तरह प्रशिक्षित किया जाता है।

संघी गुरुकुल या शाखाओं में प्रशिक्षित और संस्कारित ऐसे निपट ‘मूर्ख देशभक्तों’ यानी ट्रोल्स की बदौलत ही 2014 में बीजेपी सत्ता में आयी और अब भगवा ख़ेमे को लगता है कि यही देवदूत और ईवीएम में हेराफ़ेरी ही उसे संकट से उबार पाएगी! लेकिन बकरे की माँ कब तक ख़ैर मना पायी है! राक्षसी वृत्ति जब अति कर देती है, तो उसका पतन होता ही है। यही हाल मोदी सरकार का 2019 में होने वाला है। तभी तो इस वीडियो के बारे में आपको ये नहीं बताया जाता कि ये कहाँ का नज़ारा है? कब का नज़ारा है? क्या आयोजन था? कौन आयोजक था? यदि वीडियो आपत्तिजनक है तो पुलिस-प्रशासन, सरकार-क़ानून ने क्या कोई कार्रवाई की या नहीं? आपको कोई ये भी क्यों नहीं बताया कि जब मामला इतना गम्भीर है, तो इस वीडियो को भक्त चैनलों पर क्यों नहीं दिखाया गया? वहाँ इसे लेकर तलवारें क्यों नहीं भाँजी गयीं?

बहरहाल, मैं इन सवालों में नहीं उलझा। क्योंकि मुझे इन सभी का सही जबाब मालूम है। इसीलिए मैंने अपने उस परिचित को पाकिस्तान के झंडे की तस्वीर के साथ सन्देश भेजा कि “संघियों के झूठ ने हिन्दुओं से उनकी प्रगतिशीलता और बुद्धि-विवेक को छीनकर उन्हें मूर्खों में तब्दील कर दिया है। जैसे हर पीली चीज़ सोना नहीं होती वैसे ही हर हरा झंडा और चाँद-तारा पाकिस्तानी नहीं होता! अब ज़रा पाकिस्तान के झंडे को ग़ौर से देखिए। इसमें बायीं तरफ़ सफ़ेद पट्टी भी है। जबकि आपको गुमराह करने वाले झंडे में ये नहीं है! अब आप चाहें तो अपने पाप का प्रायश्चित करते हुए मेरे इस जबाब को वापस उस महामूर्ख को भेज सकते हैं, जिसने आपको ये वीडियो भ्रष्ट टिप्पणी के साथ भेजा है।”

पता नहीं मेरे उस परिचित ने ऐसी किया या नहीं, लेकिन यदि इतना ज़रा दिमाग़ अन्य लोग भी लगाने लगें तो इस वीडियो को फ़ैलाने वालों का मक़सद पूरा नहीं हो सकता। सोशल मीडिया के ज़रिये ज़हर उगलगर हिन्दुओं को उल्लू बनाकर अपना सियासी उल्लू सीधा करने वालों के मंसूबे पूरे नहीं होते! तब टेलिकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद को सोशल मीडिया में जबाबजेही की बातें करते हुए सड़क पर डंडा पटकने का मौक़ा कैसे मिलता? फ़ेसबुक, ट्वीटर और व्हाट्सअप को धमकाने की नौटंकी करके सुर्ख़ियाँ कैसे बटोरी जाती? सूचना-प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर को भी मीडिया संस्थानों के कार्यक्रमों में फ़ेक न्यूज़ पर चिन्ता जताने का मौका कैसे मिलता? दरअसल, संघियों की रणनीति ही यही है कि ‘स्वयंसेवकों से उपद्रव करवाओ और नेताओं से बोलो कि प्रवचन देकर जनता को ग़ुमराह करते रहे!’

हम देख चुके हैं कि दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) को लेकर कैसे झूठ फ़ैलाया गया कि वहाँ देश तोड़ने वाले अर्बन नक्सल तैयार होते हैं। ‘हमें चाहिए आज़ादी’ वाले नारे को जेएनयू में कैसे राष्ट्रविरोधी बनाया गया? इसे सबने क़रीब से देखा। जिन को क़सूरवार बताया गया, उन्हें अदालत में दोषी नहीं साबित किया गया, बल्कि इनकी सुनवाई करने जा रही अदालतों को बलवा-स्थल में बदलने का ज़िम्मा उन्हीं लोगों ने अपने हाथों में ले लिया जो संविधान की शपथ लेकर संवैधानिक पदों पर बैठे हैं। दूसरी ओर, जेएनयू में कबाड़ बन चुके टैंक को खड़ा करके छात्रों में देश भक्ति भरने का ढोंग किया गया।

फ़ेक न्यूज़ की समस्या का समाधान बहुत मुश्किल नहीं है। डिज़ीटल या साइबर जगत में डाटा की वही भूमिका है जो हमारे शरीर में ख़ून की है। इसीलिए डाटा का स्रोत ग़ुमनाम नहीं रह सकता। कम्प्यूटर की भाषा में जिसे आईपी नम्बर या इंटरनेट प्रोटोकॉल करते हैं, उससे किसी भी साइबर सामग्री के निर्माता तक पहुँचा जा सकता है, क्योंकि किसी भी डिज़ीटल उपकरण का अनोखा आईपी नम्बर होता है। ये नम्बर फ़र्ज़ी नहीं हो सकता। भले ही हैकर्स इस नम्बर के साथ कोई भी फ़र्ज़ीवाड़ा कर लें, लेकिन फ़र्ज़ी नम्बर भी डिज़ीटल की परिभाषा में फ़र्ज़ी नहीं हो सकता।

आईपी नम्बर की तह में जाकर ही आईटी विशेषज्ञ उन लोगों तक पहुँचते हैं, जहाँ वो पहुँचना चाहते हैं। कौन नहीं जानता कि हमारे देश की पुलिस जब अपराधी तक पहुँचना चाहती है तो कुछेक अपवादों को छोड़कर ज़रूर पहुँचती है। इसीलिए ये सवाल उठना लाज़िमी है कि यदि मोदी के ख़िलाफ़ अपशब्द लिखने वालों को पकड़ा जा सकता है तो राहुल के ख़िलाफ़ झूठ फ़ैलाने वालों को क्यों नहीं पकड़ा जाता? इसकी वजह ये है कि हरेक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के पास अपने हरेक उपभोक्ता का ब्यौरा होता है। इसी ब्यौरा को यदि हरेक सन्देश के साथ चिपकाने की शर्त अनिवार्य कर दी जाए तो फ़ेक न्यूज़ गढ़ने और उसे फ़ैलाने वालों के गिरेबान तक पहुँचा जा सकता है।

सोशल मीडिया कम्पनियों को सिर्फ़ किसी सन्देश को भेजने वाले की पहचान ज़ाहिर करने का टूल सार्वजनिक करना है। आगे का काम क़ानून और उसकी एजेंसियों का है। लेकिन गोपनीयता या इंस्क्रिप्शन के नाम पर अपराधियों को छिपाकर रखा जाता है। अब ज़रा सोचिए कि साइबर अपराधियों को छिपाकर रखने से कौन फ़ायदे में है!

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लोगों ने 3 महीनों में व्हाट्सएप पर बिताए 85 अरब घंटे

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सैन फ्रांसिस्को, 21 अगस्त | सोशल मीडिया प्लेटफार्म व्हाट्सएप के संबंध में एक रोचक जानकारी सामने आई है। एक रपट से पता चला है कि लोगों ने बीते तीन महीनों में फेसबुक के स्वामित्व वाले व्हाट्सएप पर 85 अरब घंटे समय बिताया। फोर्ब्स की सोमवार को रपट के अनुसार, अमेरिका स्थित एप विश्लेषक कंपनी एप्पटोपिया की ओर से जारी आंकड़े में बताया गया है कि बीते तीन महीनों में लोगों ने व्हाट्सएप पर अपने 85 अरब घंटे खर्च किए। इस एप को दुनिया भर में 1.5 अरब प्रयोगकर्ता इस्तेमाल करते हैं।

इसी प्रकार, प्रयोगकर्ताओं ने इस दौरान इसकी स्वामित्व वाली कंपनी, फेसबुक पर 30 अरब घंटे का समय बिताया।

एप्पटोपिया के प्रवक्ता एडम ब्लैकर ने कहा, “यह स्पष्ट है कि व्हाट्सएप पसंद किया जाने वाला वैश्विक मैसेजिंग एप है।”

दुनियाभर में प्रयोगकर्ता जिन 10 एप पर सबसे ज्यादा समय बिताते हैं, उनमें व्हाट्सएप, वीचैट, फेसबुक, मैसेंजर, पेंडोरा, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, ट्विटर, गूगल मैप्स और स्पॉटीफाई प्रमुख हैं।

–आईएएनएस

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