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आख़िर क्यों झूठ के बग़ैर मोदी का कोई भाषण पूरा नहीं होता…?

मोदी के ऐतिहासिक ज्ञान का आधार भी वही अधकचरी और दुर्भावनापूर्ण जानकारी है, जो संघी ट्रोल्स की ओर से व्हाट्सअप के ज़रिये फैलायी जाती है। इन्हीं भ्रष्ट जानकारियों की बदौलत वो इतिहास और ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ करते रंगे हाथ पकड़े जाते हैं।

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Narendra Modi
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वैसे तो ये हमेशा होता रहा है, फिर भी कर्नाटक चुनाव में तो शायद नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषणों में झूठ बोलने का सारा कीर्तिमान ही ध्वस्त कर दिया। फ़ील्ड मार्शल करियप्पा और जनरल थिमय्या को लेकर मोदी की ओर से बोले गये झूठे को लेकर मीडिया में मचा कोहराम शान्त भी नहीं हुआ था कि प्रधानमंत्री ने शहीद-ए-आज़म भगत सिंह को भी अपने झूठ में लपेट लिया। इसे लेकर भी मोदी की ख़ूब थू-थू हुई। कहा गया कि मोदी के झूठ और उनकी ऐतिहासिक अज्ञानता ने प्रधानमंत्री के पद की गरिमा को गहरा आघात पहुँचाया है। इस सच्चाई को उनके अन्ध भक्त भी नकार नहीं पा रहे हैं। भक्तों को भी सूझ नहीं रहा कि अपने आराध्य की ग़लत-बयानियों को वो कैसे सही ठहरायें!

दरअसल, नरेन्द्र मोदी को ये ग़ुमान है कि वो बहुत धाँसू वक़्ता हैं! ये बात को ख़ारिज़ भी नहीं किया जा सकता। भाषणों की बदौलत ही वो सवा सौ करोड़ लोगों वाले देश के मुखिया के आसन तक जा पहुँचे। वर्ना, उनके प्रशासनिक, कूटनीतिक, आर्थिक, विधायी और राजनीतिक कौशल को तो देश चार साल से झेल ही रहा है। भाषणों की वजह से ही मोदी की फेंकूँ, जुमलेबाज़, झूठ पर झूठ बोलने वाले या कुछ भी बोल देने वाला मसख़रे नेता जैसे ख़ास पहचान बनती चली गयी। मज़े की बात तो ये है कि मोदी हरेक झूठ को अति आत्मविश्वास से बोलते हैं। जबकि तमाम ऐसे मुद्दों पर उन्हें साँप सूँघ जाता है, जिससे समाज में उथल-पुथल मची हो। दिल दहला देने वाली वारदातों और ज्वलन्त मुद्दों पर उनके जैसे वाचाल नेता की ख़ामोशी भी कभी अपना रिकॉर्ड नहीं तोड़ती!

लिहाज़ा, ये कौतूहल होना स्वाभाविक है कि आख़िर क्या वजह है कि झूठ और लन्तरानियों यानी लम्बी-चौड़ी हाँके बग़ैर मोदी का कोई भाषण पूरा नहीं होता? इसकी वजह सिर्फ़ इतनी सी है कि नरेन्द्र मोदी उस पेड़ की तरह हैं जो झूठ के बीज से उस मिट्टी में अंकुरित हुआ जो झूठ से ही बनी थी। झूठ की ही आबोहवा में वो अंकुर ही पौधा बना। झूठ से ही उसके तने मज़बूत हुए। झूठ ही उसकी शाखाओं, टहनियों, पत्तियों और कोपलों में पनपता रहा। इसीलिए इस पेड़ पर लगने वाले फल भी झूठ से ही सराबोर हैं।

झूठों की संगत की वजह से नरेन्द्र मोदी अपने बाल्य-काल में घर से भागे। झूठ से प्रेरित होकर ही ब्याहता पत्नी को मझधार में छोड़ दिया। झूठे, संघियों की शोहबत में आकर ही प्रचारक बने। बतौर प्रचारक, संघ का झूठ फैलाते रहे। झूठ फैलाने की कुशलता को देखते हुए संघ ने इन्हें घूमने-फिरने का ख़ूब मौका दिया। झूठ फैलाने की निपुणता बढ़ती गयी तो अटल जी के ज़माने में नरेन्द्र मोदी को बीजेपी में महासचिव बना दिया गया। महासचिव बनते-बनते, मोदी ये बोधित्व हासिल कर चुके थे कि झूठ में जितनी ताक़त होती है, उतनी सच्चाई में नहीं होती! संघ में सिखाये जाने वाले ‘अफ़वाह-मनोविज्ञान’ ने मोदी की इस धारणा को चट्टान की तरह पुख़्ता बना दिया।

जल्द ही मोदी ने अपने गृहराज्य गुजरात की केशुभाई पटेल सरकार को लेकर झूठ गढ़ने शुरू कर दिये। देखते ही देखते यही संक्रमण केशुभाई सरकार को ले डूबा। फिर लाल कृष्ण आडवाणी की कृपा से उस नरेन्द्र मोदी को बीजेपी के सबसे मज़बूत गढ़ ‘गुजरात’ का संवैधानिक ताज मिल गया, जिसने ज़िन्दगी में पहले कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा था। मुख्यमंत्री बनने के बाद मोदी ने जब पाया कि सिर्फ़ अपने कामकाज़ की बदौलत वो विधानसभा चुनाव नहीं जीत पाएँगे तो उन्होंने साम्प्रदायिक उन्माद के उस ब्रह्मास्त्र को व्यापक पैमाने पर आज़माने की रणनीति बनायी जो संघियों के डीएनए में मौजूद होती है।

नतीज़तन, गुजरात के दंगे हुए। जान-माल की होली जली। साम्प्रदायिकता की भट्टी धधकने लगी। वो चुनाव बाद, मुख्यमंत्री का ताज फिर से मोदी के सिर पर ही फिट हो गया। अब झूठ की बदौलत ही गुजरात-मॉडल का ‘हौवा’खड़ा किया गया। उधर, बीजेपी में वरिष्ठों की बड़ी तादाद को देखते हुए मोदी ने ख़ुद को गुजरात तक ही सीमित रखा। 2009 में शीर्ष नेता के रूप में आडवाणी ने वाजपेयी की जगह ली। लेकिन वो मनमोहन सिंह सरकार को सत्ता से बेदख़ल नहीं कर सके। 2012 में संघ के रणनीतिकारों ने पाया कि व्यापक स्तर पर और प्रचंड झूठ फैलाये बग़ैर काँग्रेस के सामने बीजेपी की दाल नहीं गल पाएगी।

लिहाज़ा, संघ-बीजेपी ने अपनी सारी ताक़त काँग्रेस, मनमोहन सरकार और नेहरू-गाँधी परिवार के ख़िलाफ़ झूठ फैलाने और ओछी तथा छिछोरी बातों के ज़रिये इनका यथासम्भव चरित्रहनन करने में झोंक दी। व्हाट्सअप, फ़ेसबुक और ट्वीटर जैसे सोशल मीडिया के हथकंडों को संघ ने बहुत उपयोगी पाया। उधर, विनोद राय जैसे व्यक्ति ने संवैधानिक संस्था ‘सीएजी’ का दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल करते हुए एक के बाद एक ऐसे घोटालों का पटाक्षेप किया जिसने संघ-बीजेपी के झूठ पर मोहर लगानी शुरू कर दी। देखते ही देखते सियासी हवा काँग्रेसियों के ख़िलाफ़ बहने लगी। अब 2014 के चुनाव के लिए संघ-बीजेपी को एक अदद ऐसे वक़्ता की ज़रूरत थी जो झूठ से तैयार हुए खेत में फसल उगा सके, जिसकी छवि कट्टर हिन्दूत्ववादी की हो।

वैसे तो कट्टरवादी की छवि आडवाणी की भी थी, लेकिन झूठ के अखाड़े में मोदी उनको पछाड़ चुके थे। मोदी ने तब तक संघ को दिखा दिया था कि गुजरात-मॉडल की झूठी ब्रॉन्डिंग से क्या ग़ुल खिलाये जा सकते हैं! सही वक़्त पर मोदी ने संघ में अपने झूठ की गोट बिछायी। फिर दाँव चला कि बूढ़े हो चुके आडवाणी की जगह उन्हें मौक़ा दिया जाए। ये तीर निशाने पर था। संघ ने मोदी को झूठ से खेलने की खुली छूट दे दी। इसीलिए सबको 15-15 लाख रुपये जैसा निखालिस झूठ भी चुनाव में बिक गया!

नतीज़ा, चौंकाने वाला रहा! किसी को यक़ीन नहीं था कि भारत के सियासी मानचित्र पर झूठ की ऐसी फ़िल्म में सुपर-हिट हो जाएगी। पहली बार बीजेपी को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ। फिर तो झूठ और सियासी ड्रामों में माहिर नरेन्द्र मोदी ने शपथग्रहण से ही खुलकर खेलना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि संसद की सीढ़ियों पर मत्था टेकने और सेंट्रल हॉल में अपनी नम आँखों से उन्होंने भावुकता को भी जमकर भुनाया। तब से अभी तक, देश हो या विदेश, मोदी अपने झूठ की डुगडुगी को बजाने का कोई मौक़ा नहीं चूकते। उन्हें अपने सफ़ेद झूठ की पोल खुलते देख भी कोई झेंप नहीं होती!

झूठ के बेनक़ाब होने पर भी उससे कसकर चिपके रहने के लिहाज़ से मोदी का कौशल अद्भुत है। उनकी बेशर्मी और बेहयाई बेजोड़ है। इसकी वजह ये है कि बुनियादी तौर पर मोदी बेहद खोखले नेता हैं। वो ख़ुद स्वीकार करते हैं कि वो तक़रीबन अशिक्षित हैं। उनकी शैक्षिक डिग्रियाँ महज दिखावा हैं। उनके दावों में बड़बोलापन है। उनमें भाषण देने की कला तो है, लेकिन सवाल-जबाव देने की क़ाबलियत नहीं। वो लोकतांत्रिक होने का दावा तो करते हैं, लेकिन उनका मिज़ाज़ तानाशाहों वाला है। उन्हें चमक-दमक और वैभव बहुत पसन्द है, क्योंकि इनके बग़ैर ब्रॉन्डिंग और पैकेज़िंग नहीं हो सकती।

मोदी को अच्छी तरह से पता है कि जनता को नये-नये मुद्दों और विवादों में उलझाकर रखने से लोगों का ध्यान उनकी नाकामियों से भटकाया जा सकता है। उन्हें पता है कि मीडिया और विपक्ष के सिवाय तानाशाह का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इसीलिए, सुविचारित रणनीति के तहत जहाँ मोदी राज में मीडिया का बन्ध्याकरण किया गया, वहीं विपक्ष को झूठे मुक़दमों, चरित्रहनन की बातों में उलझाकर रखा गया। मोदी ने नोटबन्दी, जीएसटी, सर्ज़िकल हमला जैसे उपाय इसलिए नहीं अपनाये कि वो देश हित में ज़रूरी हैं। बल्कि इन्हें सिर्फ़ अपनी छवि चमकाने के लिए अपनाया गया।

इसीलिए अभी कर्नाटक के चुनाव प्रचार में और इससे पहले गुजरात में मोदी या संघ-बीजेपी ने अपनी सरकारों की उपलब्धियों पर दाँव नहीं लगाया। बल्कि विपक्ष का चरित्रहनन करने पर ही सारी ताक़त झोंकी। यही रणनीति अमित शाह और बीजेपी के तमाम नेताओं की है। इसीलिए मोदी को अपने हर भाषण में काँग्रेस के दौर की बातें करनी पड़ती हैं। काँग्रेस के नेताओं और प्रतीकों को बौना, ग़ैर-ज़िम्मेदार, ख़ुदगर्ज़, चरित्रहीन, भ्रष्ट, सत्तालोभी, अन्यायकारी और लोकतंत्र विरोधी साबित करने के लिए मोदी को उन्हीं झूठों का सहारा लेना पड़ता है, जो उनकी रगों में बहता है।

मोदी के ऐतिहासिक ज्ञान का आधार भी वही अधकचरी और दुर्भावनापूर्ण जानकारी है, जो संघी ट्रोल्स की ओर से व्हाट्सअप के ज़रिये फैलायी जाती है। इन्हीं भ्रष्ट जानकारियों की बदौलत वो इतिहास और ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ करते रंगे हाथ पकड़े जाते हैं। भाषणों में यही भ्रष्ट तथ्य, न सिर्फ़ मोदी की ज़ुबान से निकलते हैं, बल्कि उनकी रिसर्च टीम और ट्रोल्स का भी मार्गदर्शन करते हैं। मोदी अच्छी तरह जानते हैं कि वो तभी तक सत्ता में रह पाएँगे, जब तक जनता उनके झूठ के झाँसों में आती रहेगी। इसीलिए वो हर वक़्त अपने झूठ के कारखाने को चलाते रहते हैं।

यहाँ ये समझना भी उपयोगी है कि कोई व्यक्ति झूठ क्यों बोलता है? सच को छिपाने के लिए या औरों को बरगलाने के लिए! सच को कौन छिपाना चाहेगा? जिसे डर हो कि यदि सच उजागर हो गया तो उसकी बहुत छीछालेदर होगी! और, ‘औरों को बरगलाने के लिए’ सच को छिपाने या झूठ बोलने वालों को झाँसेबाज़ कहा जाता है। झाँसेबाज़ का मक़सद, आपसे उस चीज़ को हासिल कर लेने का होता है जिसका वो नैसर्गिक या स्वाभाविक हक़दार नहीं होता!

अब ज़रा ये सोचिए कि यदि मोदी काँग्रेस की उपलब्धियों, उसकी ताक़त और क्षमता की सच्चाईयों से भयभीत ना होते तो केन्द्र में बहुमत की सरकार बनाने के बाद और 22 राज्यों की सत्ता हथियाने के बाद भी ‘सत्ता की ही हवस’ से ही क्यों पीड़ित रहते? सत्ता की यही हवस और सत्ता गँवाने का भय उन्हें एक से बढ़कर एक झूठ गढ़ने और बोलने के लिए प्रेरित करता है।

दूसरी ओर, यदि मोदी को यक़ीन होता कि उन्होंने सत्ता पाने की ख़ातिर जनता को जो सब्ज़बाग़ दिखाये हैं वो साकार हुए हैं तो वो अपनी सच्चाई या उपलब्धियों का बखान करके जनसमर्थन बटोरने की अपेक्षा क्यों नहीं रखते? उन्हें पिछली सरकारों की उपलब्धियों को नज़रअन्दाज़ करने या उसे कमतर आँकने में अपनी ऊर्जा क्यों झोंकना पड़ती! मोदी को अच्छी तरह से पता है कि काँग्रेस ने देश के लिए कब, क्या और कितना किया, कितना कर पायी, क्या छूट गया? इसे लेकर झूठ बोलने की अपेक्षा अपनी उपलब्धियों का सच जनता के सामने रखना उनके लिए कहीं ज़्यादा प्रभावी होता।

लेकिन अफ़सोस कि बड़बोलेपन, जुमलेबाज़ी और विरोधियों के चरित्रहनन में उलझे मोदी के पास अपनी सकारात्मकता को पेश करने के लिए कुछ नहीं है, इसीलिए झूठ से पनपने वाली नकारात्मकता ही उनका इकलौता सहारा बना रहता है! जैसे-जैसे जनता मोदी की नकारात्मकता को समझने लगेगी, वैसे-वैसे पहले तो तिलमिलाहट में झूठ की सप्लाई बढ़ती जाएगी और आख़िरकार, झूठ का मायावी वज्र अपने आप ही चरमराकर ढह जाएगा। 2019 में यही होने वाला है!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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चीन ने मोदी को दिखाया आईना

वुहान सम्मेलन से सिर्फ़ भारतीय अर्थव्यवस्था की कमज़ोरी और लाचारी ज़ाहिर हुई

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Kapil Sibal

चीन के वुहान शहर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति झी जिनपिंग के बीच हुए अनौपचारिक शिखर वार्ता को बदलते वैश्विक माहौल को मद्देनज़र रखकर देखा जाना चाहिए। ये वो दौर है जिसमें चीनी अर्थव्यवस्था और विश्व व्यापार में उसके दख़ल को अमेरिका की श्रेष्ठता से चुनौती मिल रही है।

हाल के वर्षों में चीनी विकास का सामना नरमी से हुआ है। इसकी ‘वन बेल्ट बन रोड’ योजना की शुरुआत का मक़सद सिर्फ़ विकास दर में तेज़ी लाने का नहीं, बल्कि अपने पड़ोसियों को भी प्रभावित करने का है। इस योजना के तहत चीन की रणनीति 150 अरब डॉलर से ज़्यादा बाँग्लादेश, मालदीव, म्याँमार, पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका की अर्थव्यवस्थाओं में निवेश करने की है। इसके अलावा, पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के विकास के पीछे खड़े चीन का असली मक़सद भारत की सांकेतिक घेराबन्दी है।

दूसरी ओर, राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प की ‘अमेरिका फर्स्ट’ वाली नीति से वैश्वरीकरण को गहरा आघात लगा है। ट्रम्प चाहते हैं कि चीन के पक्ष में मौजूद 200 अरब डॉलर के भुगतान सन्तुलन को अमेरिका टैक्स-अंकुश से नियंत्रित कर ले। ट्रम्प चाहते हैं कि अमेरिका का चीनी बाज़ार में दख़ल बढ़े और अमेरिकी हितों के बोझ को नाटो के सहयोगी देश भी साझा करें। ट्रम्प उन देशों पर प्रतिबन्ध लगाना चाहते हैं जो रूस से नज़दीकी रखते हैं। इरान के साथ हुई परमाणु सन्धि को तोड़ देने का भी भारत और विश्व के व्यापार को असर पड़ना स्वाभाविक है।

चीन इन सभी बातों को बख़ूबी समझता है। भारत के पड़ोसियों में चीन की बढ़ती दख़लंदाज़ी और ट्रम्प का व्यापार और कूटनीति के प्रति ग़ैर-भावनात्मक रवैया ही वुहान के केन्द्र में था। बीते चार साल में मोदी सरकार की चीन के प्रति सुविचारित और निरन्तरता वाली नीति नहीं रही है। इसी दिशाहीनता के माहौल की वजह से वुहान में दोनों नेताओं की शिखर वार्ता हुई।

हम देख चुके हैं कि न तो साबरमती के तट पर झूला झूलने से कुछ हासिल हुआ और ना ही डोकलाम में भारतीय रवैये से कोई फ़ायदा हुआ। मोदी ने महसूस किया कि यही वक़्त है ख़ुद को दलाई लामा से दूर कर लिया जाए और चीन से सहयोग बढ़ाया जाए। क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था को कई अहम क्षेत्रों में भारी निवेश की ज़रूरत है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के संचार, बिजली, इंज़ीनियरिंग और बुनियादी क्षेत्रों में चीन ने गहरी पैठ बना ली है। चीन ने यहाँ औद्योगिक पार्क बनाने में भी रूचि दिखायी है। भारत डिज़ीटल प्लेटफ़ॉर्म पेटीएम में 40 फ़ीसदी हिस्सेदारी चीन की है। चीनी कम्पनियाँ जैसे हार्बिन इलेक्ट्रिक, डोंगफैंग इलेक्ट्रिनिक्स, शंघाई इलेक्ट्रिक और सिफांग ऑटोमेशन की ओर से देश के 18 शहरों के बिजली नेटवर्क को या को चलाया जा रहा है या फिर ये उपकरण मुहैया करवा रहे हैं। मोदी राज के पाँच साल पूरे होने तक ये सिलसिला और आगे बढ़ चुका होगा। ज़ाहिर है कि तस्वीरें खिंचवाने और लम्बे-चौड़े बयान देने से कूटनीति के जटिल मसले हल नहीं हो सकते।

लिहाज़ा, चीन के साथ सम्बन्धों को बढ़ाने से पहले भारत को कई बातों को अच्छी तरह से समझ देना होगा। मसलन, चीन अपने सदाबहार दोस्त पाकिस्तान से कभी कन्नी नहीं काटेगा। चीन कभी संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भारत का साथ नहीं देगा। भारत को न्यूक्लिर सप्लाई ग्रुप में जगह देने पर चीन कभी राज़ी नहीं होगा। चीन को भारतीय बाज़ार में आने की तो पूरी छूट है, लेकिन वो अपने बाज़ार में भारत को जगह देने के मामले में बेहद सुस्त है। हमारी आईटी कम्पनियाँ भी इस नीति से प्रभावित होती हैं। भारत-चीन व्यापार में भुगतान सन्तुलन बहुत हद्द तक चीन के हक़ में है। हाल ही में चीन ने भारतीय दवा कम्पनियों के प्रति जो नरमी दिखायी है, वही नीति ही हमारे हित में है।

भारत को ये भी समझना होगा कि हमें चीन से टकराव मोल लेकर नहीं बल्कि उसके साथ सहयोगात्मक रवैया अपनाने से ही फ़ायदा होगा, क्योंकि दोनों देशों में विश्व की 2.5 अरब आबादी का बसेरा है और विश्व के इस इलाके में हम दोनों ही सबसे बड़े खिलाड़ी हैं। विश्व मंच पर कई जगह हमें ऐसी नीति अपनानी होगी जो हमारे विकास की ज़रूरतों को पूरा कर सके। कूटनीति के लिहाज़ से हम अमेरिका से कहीं ज़्यादा क़रीब हैं। वैश्विक ताक़तों के लिहाज़ से भारत को अमेरिका और जापान के साथ ज़्यादा सहयोग रखना चाहिए। हालाँकि, हमारे आर्थिक और विकास से जुड़े हित हमें चीन के ज़्यादा नज़दीकी रखने के लिए मज़बूर करते हैं। इसीलिए हमारा पूरा ज़ोर तेज़ विकास और विश्व व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने पर होना चाहिए।

वुहान में जारी हुए भारत और चीन के वक्तव्यों से पता चलता है कि दोनों देशों का ज़ोर अलग-अलग मुद्दों पर था। भारतीय बयान में जहाँ आतंकवाद का ज़िक्र विस्तार से होता है, वहीं चीनी बयान में ये सिर्फ़ एक बार नज़र आया। चीन सीमा पार से आने वाले आतंकवाद पर सिर्फ़ लीपापोती ही करेगा। वो पाकिस्तान की निन्दा तक नहीं करेगा। डोकलाम संकट के वक़्त सिर्फ़ जापान ने ही भारत के हक़ में बयान जारी किया था, जबकि ट्रम्प ने तो पूरी तरह से चुप्पी ही साधे रखी। दूसरा अन्तर ये रहा कि जहाँ चीन ने भारत में निवेश की बातें कीं, वहीं हमारा ज़ोर भुगतान सन्तुलन की अहमियत पर रहा।

भारत ने सीमा से जुड़े मसलों को लेकर परस्पर विश्वास को बढ़ाने पर ज़ोर दिया, लेकिन चीनी बयान में इसका कोई ज़िक्र नहीं है। भारतीय बयान के अनुसार, हमने सीमा पर शान्ति को बहाल रखने और उसे हद्द से बाहर निकलने से रोकने के लिए समुचित तंत्र बनाने की बात की तो चीन की ओर से अपनी सम्प्रभुता को आगे कर दिया गया। चीन के बयान में 2016-17 में रहे 71.5 अरब डॉलर के व्यापार-अतिरेक यानी ट्रेड सरप्लस की चुनौती का कोई ज़िक्र तक नहीं है।

किसी भी देश की विदेश नीति की रीढ़ उसकी अर्थव्यवस्था होती है। जब विकास दर अधिक होती है, तो कूटनीति के पास विकल्प बढ़ जाते हैं। इसीलिए उन्हीं देशों की विदेश नीति ज़्यादा मज़बूत हो सकती है, जिनकी अर्थव्यवस्था उसे ताक़त दे। इस मोर्चे पर हम चीन की बराबरी नहीं कर सकते।

अमेरिका के साथ भी हमारे द्विपक्षीय सम्बन्धों में उसके आर्थिक हित ही प्रमुखता पा रहे हैं। एच1-बी वीज़ा में कटौती और अमेरिकीयों के आर्थिक हितों को प्रमुखता देने की नीति से साफ़ है कि हम अमेरिका पर ज़्यादा भरोसा नहीं कर सकते। साफ़ है कि चीन हो या अन्य देश, हमें संस्थागत प्रतिक्रिया देने वाली व्यवस्था को बेहद सूझबूझ के साथ विकसित करना होगा। अपनी छवि को चमकाने वाली सोच से संस्थागत तंत्र मज़बूत नहीं बनते। मैं उम्मीद करूँगा कि मोदी ने इस बात तो समझा होगा और वुहान की बातचीत इसी दिशा में बढ़ेगी।

(साभार: टाइम्स ऑफ़ इंडिया)

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येदियुरप्पा के बाद प्रोटेम स्पीकर के चयन में भी राज्यपाल का शर्मनाक रवैया

उन प्रसंगों को देखते हुए राज्यपाल वजुभाई वाला का ये फ़र्ज़ बनाता था कि वो सुप्रीम कोर्ट से मुँह की खाने के बाद तो अपनी बदनीयत से बाज़ आते। लेकिन अफ़सोस कि राज्यपाल की गरिमा को बीजेपी ने अपना मोहरा बना दिया है।

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KG Bopaiah

पुरानी कहावत है कि ‘चोर चोरी से जाए, मगर हेराफ़ेरी से जाए!’ फ़िलहाल, कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला का रवैया बिल्कुल इसी कहावत के मुताबिक़ है। वजुभाई वाला का बर्ताव उन शातिर अपराधियों जैसा भी है जो एक झूठ या ग़लती को छिपाने के लिए बार-बार झूठ बोलता है या ग़लती पर ग़लती ही करता चला जाता है। राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का पहला कर्त्तव्य होना चाहिए कि उसका आचरण संवैधानिक, विधायी और न्यायिक सुचिता के अनुकूल हो और वो सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का सबसे बड़ा संरक्षक हो!

बदकिस्मती से वजुभाई वाला ने लोकलाज़ की सारी सीमाओं को तार-तार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ये बात साफ़ हो चुकी है कि वजुभाई वाला एक निष्पक्ष राज्यपाल की तरह नहीं बल्कि बीजेपी की कठपुलती और एजेंट की तरह व्यवहार कर रहे हैं। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रोटेम स्पीकर यानी कार्यवाहक सभापति की देखरेख में विधानसभा में बहुमत का परीक्षण करवाने का आदेश दिया। लेकिन बेहयाई की सारी सीमाओं और विधायी परम्पराओं को तोड़ते हुए राज्यपाल ने केजी बोपय्या को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त कर दिया। जबकि नव-निर्वाचित विधायकों में उनके भी वरिष्ठ लोग मौजूद हैं।

इसीलिए, काँग्रेस-जेडीएस गठबन्धन ने राज्यपाल के इस फ़ैसले को भी पक्षपातपूर्ण और विधायी परम्पराओं के ख़िलाफ़ बताया है। इस धड़े का कहना है कि बोपय्या जहाँ 4 कार्यकाल (टर्म) से विधायक हैं और 2008 में स्पीकर भी रह चुके हैं वो प्रोटेम स्पीकर बनाये जाने के लिए सर्वथा अयोग्य हैं। क्योंकि सदन में दो विधायक ऐसे हैं जो 8 टर्म का अनुभव रखते हैं और उम्र में भी बोपय्या से बड़े हैं। इनमें पहले स्थान पर हैं काँग्रेस के आरवी देशपांडे और बीजेपी के उमेश विश्वनाथ कट्टी। इन दोनों में से भी उमेश के मुक़ाबले देशपांडे की उम्र अधिक है।

काँग्रेस-जेडीएस का कहना है कि प्रोटेम स्पीकर के चयन का मुद्दा राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों के दायरे में नहीं आता है। बल्कि इसका निर्धारण विधायी परम्पराओं के मुताबिक़ होता है। इस परम्परा के मुताबिक़, सबसे अनुभवी या उम्रदराज़ विधायक को प्रोटेम स्पीकर बनाया जाता है। उधर, राज्यपाल के फ़ैसले को सही ठहराते हुए बीजेपी ने दलील दी है कि चार टर्म की वरिष्ठता भी कम नहीं होती। बोपय्या को इसलिए वरीयता दी गयी है क्योंकि वो पूर्व स्पीकर रह चुके हैं।

लेकिन काँग्रेस-जेडीएस का कहना है कि बोपय्या जब स्पीकर रहे तो कई मौकों पर उनका आचरण निष्पक्ष नहीं रहा। उन्होंने बीजेपी के पक्ष में काम किया। 2008 में बोपय्या को प्रोटेम स्पीकर बनाने के फ़ैसले की इसलिए भी अनदेखी की गयी क्योंकि तब एक-एक वोट की मारामारी वाले हालात नहीं थे। दोनों पक्षों की इसी टकराहट को देखते हुए काँग्रेस-जेडीएस की ओर से देर शाम एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया गया।

विधायी परम्परा ये है कि नयी विधानसभा के चुनाव के बाद राज्यपाल सबसे अनुभवी या/और उम्रदराज़ राजनेता को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त करते हैं। प्रोटेम स्पीकर का काम है कि वो सभी विधायकों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाये। इसके बाद सदन के सभी विधायक अपना नया स्पीकर चुनते हैं। नये स्पीकर का चुनाव सत्ता पक्ष का पहला शक्ति परीक्षण होता है। क्योंकि स्पीकर को भी सदन के बहुमत से ही चुना जाता है। अब यदि सत्ता पक्ष के पास बहुमत नहीं हुआ तो उसका स्पीकर चुना नहीं जा सकता।

सामान्य तौर पर नये स्पीकर को अपने निर्वाचन के तुरन्त बाद सदन के संचालन से जुड़े नियमों के मुताबिक़, विश्वास मत पर बहस और मतदान का संचालन करना होता है। किस पक्ष को कितने मत मिले और प्रस्ताव का क्या हश्र हुआ ये तय करने का अधिकार स्पीकर का ही होता है। स्पीकर का फ़ैसला एक तरह से अन्तिम ही होता है। क्योंकि उसे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में ही चुनौती दी जा सकती है। इन अदालती कार्रवाई में भी ज़्यादा से ज़्यादा स्पीकर के फ़ैसले को ग़लत करार दिया जाता है। स्पीकर की दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई के लिए उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता।

इसीलिए. जब कभी स्पीकर का आचरण पक्षपातपूर्ण होता है तो विधानसभा में अव्यवस्था फैल जाती है। यही अव्यवस्था अन्ततः विधायकों के बीच की हिंसा में बदल जाती है। स्पीकर के आपत्तिजनक व्यवहार की वजह से देश की कई विधानसभाओं में कई बार शर्मसार करने वाली हिंसक वारदातें हो चुकी हैं। उन प्रसंगों को देखते हुए राज्यपाल वजुभाई वाला का ये फ़र्ज़ बनाता था कि वो सुप्रीम कोर्ट से मुँह की खाने के बाद तो अपनी बदनीयत से बाज़ आते। लेकिन अफ़सोस कि राज्यपाल की गरिमा को बीजेपी ने अपना मोहरा बना दिया है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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सत्ता के नाटक का कर्नाटक में खेल

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Yeddyrappa

खंडित जनादेश, राज्यपाल का स्वविवेक और लोकतंत्र की परीक्षा ऐसा ही कुछ माहौल कर्नाटक में चुनाव नतीजों के बाद दिख रहा है। नतीजों के मायने क्या कहें कांग्रेस मुक्त भारत या नए गठबंधन युक्त राजनीतिक संभावनाएं? इतना जरूर है कि इंदिरा गांधी ने राजनीति में जो पहचान बनाई थी उसे वो उतार-चढ़ाव के बावजूद 4.5 दशक तक बरकरार रख पाईं तो क्या नरेन्द्र मोदी की पहचान वैसी ही राजनीति की नई पैकेजिंग तो नहीं? सवाल कई हैं और जवाब भी समय के साथ मिलता जाएगा।

फिलाहाल कर्नाटक की सियासी तस्वीर काफी दिलचस्प हो गई है। गेंद राज्यपाल के पाले में है। वह सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए बुलाते हैं या बहुमत का आंकड़ा पार कर चुके कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन को? गोवा, मेघालय और मणिपुर की थोड़ा पहले की सियासी तस्वीरों की नजीर सामने है। जिन हालातों में राज्यपालों ने बहुमत वाले गठबंधन को वहां सरकार बनाने का न्योता दिया, क्या वैसा ही न्योता कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन को यहां मिलेगा या सबसे बड़े दल भाजपा को? जेडीएस-कांग्रेस की साझा सीटें बहुमत के पार हैं यहां भी दावा मजबूत है। ऐसे में राज्यपाल चाहें तो बहुमत के आंकड़े को देखते हुए कांग्रेस-जेडीएस को भी सरकार बनाने का मौका दे सकते हैं।

अब यहीं इंतजार करना होगा, लेकिन कर्नाटक के ही पूर्व मुख्यमंत्री एसआर बोम्मई बनाम केंद्र सरकार का एक अहम मामला नजीर बन सकता है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय आदेश दे चुका है कि बहुमत का फैसला राजनिवास में नहीं बल्कि विधानसभा के पटल पर होगा। कई तरह के तर्को से हटकर सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार बनाने का न्योता देने का अधिकार राज्यपाल को उनके विवेक पर छोड़ रखा है। राज्यपाल चुनाव से पहले या बाद में बने गठबंधन को भी न्योता दे सकते हैं लेकिन संतुष्ट हों कि वह सदन में बहुमत साबित करेगा।

राज्यपाल का फैसला गलत भी हो सकता है फिर भी उनसे यह अधिकार छीना नहीं गया है। हां बहुमत सदन में ही साबित करना होगा। जस्टिस आरएस सरकारिया कमिशन ने विकल्पों और उनकी प्राथमिकताओं को साफ किया है लेकिन साथ ही राज्यपाल के खुद के फैसले को भी अहम बताया है। संविधान में गठबंधन सरकार बनने पर राज्यपाल को कैसे मुख्यमंत्री की नियुक्ति करनी है, इस बारे में कुछ साफ नहीं है।

कर्नाटक के नतीजे सभी दलों के लिए काफी सबक देने वाले हैं क्योंकि शुरू में लगा कि भाजपा स्पष्ट बहुमत की ओर अग्रसर है लेकिन बाद में 104 पर ही अटक गई। जबकि कांग्रेस दूसरे और जेडीएस तीसरे नंबर रह गई। प्रधानमंत्री ने सबसे ज्यादा 21 जन सभाएं कर्नाटक में की थीं वहीं अमित शाह ने पूरी ताकत झोंक दी थी। वोट शेयर के मामले में कांग्रेस जीतकर भी हार गई और भाजपा हारकर भी जीत गई। भाजपा और कांग्रेस के बीच मत प्रतिशत क्रमश: 37 प्रतिशत और 38 प्रतिशत है।

हां, कर्नाटक में ही इतिहास फिर खुद को दोहरा रहा है। लगभग 2004 वाली स्थिति है। उस वक्त भाजपा को 79, कांग्रेस को 65 और जेडीएस को 58 सीटें मिली थीं। कांग्रेस एसएम कृष्णा को मुख्यमंत्री बनाना चाहती थी जबकि देवगौड़ा एन धरम सिंह को। तब भी कांग्रेस को झुकना पड़ा था। यकीनन देवगौड़ा का ठीक वैसा ही दांव 2018 के इस चुनाव में दिखा जब उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों को चित्त कर दिया। इस चुनाव में फिर रोचक स्थिति बनी कि राजनीति में कोई दुश्मन या दोस्त नहीं होता है। याद कीजिए 2005 में कुमार स्वामी से मतभेदों के कारण ही सिद्धारमैया पार्टी से निकाले गए थे लेकिन हालात देखिए 12 साल बाद उन्हीं सिद्धारमैया ने अपने राजनैतिक विरोधी का नाम मुख्यमंत्री के लिए आगे किया।

फिलाहाल कर्नाटक नतीजों को 2019 का सेमीफाइनल कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि अभी सबसे अधिक सांसद देने वाले उप्र के कैराना में 28 मई को होने जा रहे उपचुनाव में नए फार्मूले की टेस्टिंग होगी। यहां सपा-बसपा के बजाय अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल के चिन्ह पर सपा उम्मीदवार तबस्सुम का लड़ना और बसपा का समर्थन करना बड़ा पैंतरा है। निश्चित रूप से यह जहां भाजपा को परेशान करने वाला है वहीं 2019 के आम चुनाव के लिए गठबंधन की नई संभावनाओं का दरवाजा भी खोलता दिख रहा है। लेकिन मप्र और राजस्थान में हुए उपचुनावों में कांग्रेस को मिली सफलता के बाद कर्नाटक के नतीजों ने मंसूबों पर पानी फेर दिया है।

साल के आखिर में मप्र, राजस्थान, छग में विधानसभा चुनाव हैं और यहां भाजपा से मुकाबले के लिए कांग्रेस जोश में थी। यकीनन कांग्रेस का मनोबल गिरा होगा क्योंकि तीनों राज्यों में मुख्य विपक्षी भूमिका में वही है। साथ ही गठबंधन के लिहाज से तीनों राज्यों की राजनैतिक पैंतरेबाजी भी जुदा है। ऐसे में तीनों राज्य में अलग-अलग क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा देश की गठबंधन राजनीति में निश्चित रूप से बेहद उलझा और नाजुक होगा। फिलहाल कर्नाटक के नाटक पर सबकी नजर है।

By : ऋतुपर्ण दवे

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

–आईएएनएस

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