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आख़िर क्यों झूठ के बग़ैर मोदी का कोई भाषण पूरा नहीं होता…?

मोदी के ऐतिहासिक ज्ञान का आधार भी वही अधकचरी और दुर्भावनापूर्ण जानकारी है, जो संघी ट्रोल्स की ओर से व्हाट्सअप के ज़रिये फैलायी जाती है। इन्हीं भ्रष्ट जानकारियों की बदौलत वो इतिहास और ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ करते रंगे हाथ पकड़े जाते हैं।

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Narendra Modi
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वैसे तो ये हमेशा होता रहा है, फिर भी कर्नाटक चुनाव में तो शायद नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषणों में झूठ बोलने का सारा कीर्तिमान ही ध्वस्त कर दिया। फ़ील्ड मार्शल करियप्पा और जनरल थिमय्या को लेकर मोदी की ओर से बोले गये झूठे को लेकर मीडिया में मचा कोहराम शान्त भी नहीं हुआ था कि प्रधानमंत्री ने शहीद-ए-आज़म भगत सिंह को भी अपने झूठ में लपेट लिया। इसे लेकर भी मोदी की ख़ूब थू-थू हुई। कहा गया कि मोदी के झूठ और उनकी ऐतिहासिक अज्ञानता ने प्रधानमंत्री के पद की गरिमा को गहरा आघात पहुँचाया है। इस सच्चाई को उनके अन्ध भक्त भी नकार नहीं पा रहे हैं। भक्तों को भी सूझ नहीं रहा कि अपने आराध्य की ग़लत-बयानियों को वो कैसे सही ठहरायें!

दरअसल, नरेन्द्र मोदी को ये ग़ुमान है कि वो बहुत धाँसू वक़्ता हैं! ये बात को ख़ारिज़ भी नहीं किया जा सकता। भाषणों की बदौलत ही वो सवा सौ करोड़ लोगों वाले देश के मुखिया के आसन तक जा पहुँचे। वर्ना, उनके प्रशासनिक, कूटनीतिक, आर्थिक, विधायी और राजनीतिक कौशल को तो देश चार साल से झेल ही रहा है। भाषणों की वजह से ही मोदी की फेंकूँ, जुमलेबाज़, झूठ पर झूठ बोलने वाले या कुछ भी बोल देने वाला मसख़रे नेता जैसे ख़ास पहचान बनती चली गयी। मज़े की बात तो ये है कि मोदी हरेक झूठ को अति आत्मविश्वास से बोलते हैं। जबकि तमाम ऐसे मुद्दों पर उन्हें साँप सूँघ जाता है, जिससे समाज में उथल-पुथल मची हो। दिल दहला देने वाली वारदातों और ज्वलन्त मुद्दों पर उनके जैसे वाचाल नेता की ख़ामोशी भी कभी अपना रिकॉर्ड नहीं तोड़ती!

लिहाज़ा, ये कौतूहल होना स्वाभाविक है कि आख़िर क्या वजह है कि झूठ और लन्तरानियों यानी लम्बी-चौड़ी हाँके बग़ैर मोदी का कोई भाषण पूरा नहीं होता? इसकी वजह सिर्फ़ इतनी सी है कि नरेन्द्र मोदी उस पेड़ की तरह हैं जो झूठ के बीज से उस मिट्टी में अंकुरित हुआ जो झूठ से ही बनी थी। झूठ की ही आबोहवा में वो अंकुर ही पौधा बना। झूठ से ही उसके तने मज़बूत हुए। झूठ ही उसकी शाखाओं, टहनियों, पत्तियों और कोपलों में पनपता रहा। इसीलिए इस पेड़ पर लगने वाले फल भी झूठ से ही सराबोर हैं।

झूठों की संगत की वजह से नरेन्द्र मोदी अपने बाल्य-काल में घर से भागे। झूठ से प्रेरित होकर ही ब्याहता पत्नी को मझधार में छोड़ दिया। झूठे, संघियों की शोहबत में आकर ही प्रचारक बने। बतौर प्रचारक, संघ का झूठ फैलाते रहे। झूठ फैलाने की कुशलता को देखते हुए संघ ने इन्हें घूमने-फिरने का ख़ूब मौका दिया। झूठ फैलाने की निपुणता बढ़ती गयी तो अटल जी के ज़माने में नरेन्द्र मोदी को बीजेपी में महासचिव बना दिया गया। महासचिव बनते-बनते, मोदी ये बोधित्व हासिल कर चुके थे कि झूठ में जितनी ताक़त होती है, उतनी सच्चाई में नहीं होती! संघ में सिखाये जाने वाले ‘अफ़वाह-मनोविज्ञान’ ने मोदी की इस धारणा को चट्टान की तरह पुख़्ता बना दिया।

जल्द ही मोदी ने अपने गृहराज्य गुजरात की केशुभाई पटेल सरकार को लेकर झूठ गढ़ने शुरू कर दिये। देखते ही देखते यही संक्रमण केशुभाई सरकार को ले डूबा। फिर लाल कृष्ण आडवाणी की कृपा से उस नरेन्द्र मोदी को बीजेपी के सबसे मज़बूत गढ़ ‘गुजरात’ का संवैधानिक ताज मिल गया, जिसने ज़िन्दगी में पहले कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा था। मुख्यमंत्री बनने के बाद मोदी ने जब पाया कि सिर्फ़ अपने कामकाज़ की बदौलत वो विधानसभा चुनाव नहीं जीत पाएँगे तो उन्होंने साम्प्रदायिक उन्माद के उस ब्रह्मास्त्र को व्यापक पैमाने पर आज़माने की रणनीति बनायी जो संघियों के डीएनए में मौजूद होती है।

नतीज़तन, गुजरात के दंगे हुए। जान-माल की होली जली। साम्प्रदायिकता की भट्टी धधकने लगी। वो चुनाव बाद, मुख्यमंत्री का ताज फिर से मोदी के सिर पर ही फिट हो गया। अब झूठ की बदौलत ही गुजरात-मॉडल का ‘हौवा’खड़ा किया गया। उधर, बीजेपी में वरिष्ठों की बड़ी तादाद को देखते हुए मोदी ने ख़ुद को गुजरात तक ही सीमित रखा। 2009 में शीर्ष नेता के रूप में आडवाणी ने वाजपेयी की जगह ली। लेकिन वो मनमोहन सिंह सरकार को सत्ता से बेदख़ल नहीं कर सके। 2012 में संघ के रणनीतिकारों ने पाया कि व्यापक स्तर पर और प्रचंड झूठ फैलाये बग़ैर काँग्रेस के सामने बीजेपी की दाल नहीं गल पाएगी।

लिहाज़ा, संघ-बीजेपी ने अपनी सारी ताक़त काँग्रेस, मनमोहन सरकार और नेहरू-गाँधी परिवार के ख़िलाफ़ झूठ फैलाने और ओछी तथा छिछोरी बातों के ज़रिये इनका यथासम्भव चरित्रहनन करने में झोंक दी। व्हाट्सअप, फ़ेसबुक और ट्वीटर जैसे सोशल मीडिया के हथकंडों को संघ ने बहुत उपयोगी पाया। उधर, विनोद राय जैसे व्यक्ति ने संवैधानिक संस्था ‘सीएजी’ का दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल करते हुए एक के बाद एक ऐसे घोटालों का पटाक्षेप किया जिसने संघ-बीजेपी के झूठ पर मोहर लगानी शुरू कर दी। देखते ही देखते सियासी हवा काँग्रेसियों के ख़िलाफ़ बहने लगी। अब 2014 के चुनाव के लिए संघ-बीजेपी को एक अदद ऐसे वक़्ता की ज़रूरत थी जो झूठ से तैयार हुए खेत में फसल उगा सके, जिसकी छवि कट्टर हिन्दूत्ववादी की हो।

वैसे तो कट्टरवादी की छवि आडवाणी की भी थी, लेकिन झूठ के अखाड़े में मोदी उनको पछाड़ चुके थे। मोदी ने तब तक संघ को दिखा दिया था कि गुजरात-मॉडल की झूठी ब्रॉन्डिंग से क्या ग़ुल खिलाये जा सकते हैं! सही वक़्त पर मोदी ने संघ में अपने झूठ की गोट बिछायी। फिर दाँव चला कि बूढ़े हो चुके आडवाणी की जगह उन्हें मौक़ा दिया जाए। ये तीर निशाने पर था। संघ ने मोदी को झूठ से खेलने की खुली छूट दे दी। इसीलिए सबको 15-15 लाख रुपये जैसा निखालिस झूठ भी चुनाव में बिक गया!

नतीज़ा, चौंकाने वाला रहा! किसी को यक़ीन नहीं था कि भारत के सियासी मानचित्र पर झूठ की ऐसी फ़िल्म में सुपर-हिट हो जाएगी। पहली बार बीजेपी को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ। फिर तो झूठ और सियासी ड्रामों में माहिर नरेन्द्र मोदी ने शपथग्रहण से ही खुलकर खेलना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि संसद की सीढ़ियों पर मत्था टेकने और सेंट्रल हॉल में अपनी नम आँखों से उन्होंने भावुकता को भी जमकर भुनाया। तब से अभी तक, देश हो या विदेश, मोदी अपने झूठ की डुगडुगी को बजाने का कोई मौक़ा नहीं चूकते। उन्हें अपने सफ़ेद झूठ की पोल खुलते देख भी कोई झेंप नहीं होती!

झूठ के बेनक़ाब होने पर भी उससे कसकर चिपके रहने के लिहाज़ से मोदी का कौशल अद्भुत है। उनकी बेशर्मी और बेहयाई बेजोड़ है। इसकी वजह ये है कि बुनियादी तौर पर मोदी बेहद खोखले नेता हैं। वो ख़ुद स्वीकार करते हैं कि वो तक़रीबन अशिक्षित हैं। उनकी शैक्षिक डिग्रियाँ महज दिखावा हैं। उनके दावों में बड़बोलापन है। उनमें भाषण देने की कला तो है, लेकिन सवाल-जबाव देने की क़ाबलियत नहीं। वो लोकतांत्रिक होने का दावा तो करते हैं, लेकिन उनका मिज़ाज़ तानाशाहों वाला है। उन्हें चमक-दमक और वैभव बहुत पसन्द है, क्योंकि इनके बग़ैर ब्रॉन्डिंग और पैकेज़िंग नहीं हो सकती।

मोदी को अच्छी तरह से पता है कि जनता को नये-नये मुद्दों और विवादों में उलझाकर रखने से लोगों का ध्यान उनकी नाकामियों से भटकाया जा सकता है। उन्हें पता है कि मीडिया और विपक्ष के सिवाय तानाशाह का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इसीलिए, सुविचारित रणनीति के तहत जहाँ मोदी राज में मीडिया का बन्ध्याकरण किया गया, वहीं विपक्ष को झूठे मुक़दमों, चरित्रहनन की बातों में उलझाकर रखा गया। मोदी ने नोटबन्दी, जीएसटी, सर्ज़िकल हमला जैसे उपाय इसलिए नहीं अपनाये कि वो देश हित में ज़रूरी हैं। बल्कि इन्हें सिर्फ़ अपनी छवि चमकाने के लिए अपनाया गया।

इसीलिए अभी कर्नाटक के चुनाव प्रचार में और इससे पहले गुजरात में मोदी या संघ-बीजेपी ने अपनी सरकारों की उपलब्धियों पर दाँव नहीं लगाया। बल्कि विपक्ष का चरित्रहनन करने पर ही सारी ताक़त झोंकी। यही रणनीति अमित शाह और बीजेपी के तमाम नेताओं की है। इसीलिए मोदी को अपने हर भाषण में काँग्रेस के दौर की बातें करनी पड़ती हैं। काँग्रेस के नेताओं और प्रतीकों को बौना, ग़ैर-ज़िम्मेदार, ख़ुदगर्ज़, चरित्रहीन, भ्रष्ट, सत्तालोभी, अन्यायकारी और लोकतंत्र विरोधी साबित करने के लिए मोदी को उन्हीं झूठों का सहारा लेना पड़ता है, जो उनकी रगों में बहता है।

मोदी के ऐतिहासिक ज्ञान का आधार भी वही अधकचरी और दुर्भावनापूर्ण जानकारी है, जो संघी ट्रोल्स की ओर से व्हाट्सअप के ज़रिये फैलायी जाती है। इन्हीं भ्रष्ट जानकारियों की बदौलत वो इतिहास और ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ करते रंगे हाथ पकड़े जाते हैं। भाषणों में यही भ्रष्ट तथ्य, न सिर्फ़ मोदी की ज़ुबान से निकलते हैं, बल्कि उनकी रिसर्च टीम और ट्रोल्स का भी मार्गदर्शन करते हैं। मोदी अच्छी तरह जानते हैं कि वो तभी तक सत्ता में रह पाएँगे, जब तक जनता उनके झूठ के झाँसों में आती रहेगी। इसीलिए वो हर वक़्त अपने झूठ के कारखाने को चलाते रहते हैं।

यहाँ ये समझना भी उपयोगी है कि कोई व्यक्ति झूठ क्यों बोलता है? सच को छिपाने के लिए या औरों को बरगलाने के लिए! सच को कौन छिपाना चाहेगा? जिसे डर हो कि यदि सच उजागर हो गया तो उसकी बहुत छीछालेदर होगी! और, ‘औरों को बरगलाने के लिए’ सच को छिपाने या झूठ बोलने वालों को झाँसेबाज़ कहा जाता है। झाँसेबाज़ का मक़सद, आपसे उस चीज़ को हासिल कर लेने का होता है जिसका वो नैसर्गिक या स्वाभाविक हक़दार नहीं होता!

अब ज़रा ये सोचिए कि यदि मोदी काँग्रेस की उपलब्धियों, उसकी ताक़त और क्षमता की सच्चाईयों से भयभीत ना होते तो केन्द्र में बहुमत की सरकार बनाने के बाद और 22 राज्यों की सत्ता हथियाने के बाद भी ‘सत्ता की ही हवस’ से ही क्यों पीड़ित रहते? सत्ता की यही हवस और सत्ता गँवाने का भय उन्हें एक से बढ़कर एक झूठ गढ़ने और बोलने के लिए प्रेरित करता है।

दूसरी ओर, यदि मोदी को यक़ीन होता कि उन्होंने सत्ता पाने की ख़ातिर जनता को जो सब्ज़बाग़ दिखाये हैं वो साकार हुए हैं तो वो अपनी सच्चाई या उपलब्धियों का बखान करके जनसमर्थन बटोरने की अपेक्षा क्यों नहीं रखते? उन्हें पिछली सरकारों की उपलब्धियों को नज़रअन्दाज़ करने या उसे कमतर आँकने में अपनी ऊर्जा क्यों झोंकना पड़ती! मोदी को अच्छी तरह से पता है कि काँग्रेस ने देश के लिए कब, क्या और कितना किया, कितना कर पायी, क्या छूट गया? इसे लेकर झूठ बोलने की अपेक्षा अपनी उपलब्धियों का सच जनता के सामने रखना उनके लिए कहीं ज़्यादा प्रभावी होता।

लेकिन अफ़सोस कि बड़बोलेपन, जुमलेबाज़ी और विरोधियों के चरित्रहनन में उलझे मोदी के पास अपनी सकारात्मकता को पेश करने के लिए कुछ नहीं है, इसीलिए झूठ से पनपने वाली नकारात्मकता ही उनका इकलौता सहारा बना रहता है! जैसे-जैसे जनता मोदी की नकारात्मकता को समझने लगेगी, वैसे-वैसे पहले तो तिलमिलाहट में झूठ की सप्लाई बढ़ती जाएगी और आख़िरकार, झूठ का मायावी वज्र अपने आप ही चरमराकर ढह जाएगा। 2019 में यही होने वाला है!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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बिहार : समस्तीपुर में डेयरी संयंत्र, भोजपुर में पशु आहार कारखाना लगेंगे

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dairy products

मोतिहारी, 19 जनवरी | बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने यहां शनिवार को कहा कि अगले वित्तीय वर्ष 2019-20 में बिहार राज्य दुग्ध सहकारी संघ लिमिटेड (कम्फेड) द्वारा समस्तीपुर में पांच लाख लीटर प्रतिदिन क्षमता के डेयरी संयंत्र और भोजपुर के बिहिया में 300 मीट्रिक टन प्रतिदिन उत्पादन क्षमता के पशु आहार कारखाने लगाए जाएंगे। पूर्वी चंपारण जिले के मठबनवारी में 11 महीने के रिकार्ड समय में बन कर तैयार मदर डेयरी के प्रति दिन एक लाख लीटर क्षमता के दूध प्रसंस्करण संयंत्र का शनिवार को उद्घाटन करने के बाद बिहार के उपमुख्यमंत्री ने कहा कि इस संयंत्र द्वारा मार्च से 1250 गांवों के 50 हजार किसानों से प्रतिदिन 2 लाख लीटर दूध का संग्रह किया जा सकेगा।

उन्होंने कहा कि अब सुधा व मदर डेयरी, दोनों मिलकर किसानों से दूध खरीदेगी।

मोदी ने कहा, “वर्तमान वित्तीय वर्ष में सुपौल में एक लाख लीटर क्षमता का डेयरी संयंत्र, समस्तीपुर व हाजीपुर में 30-30 मीट्रिक टन के दूध पाउडर संयंत्र, पटना व नालंदा में 20-20 हजार किलो दैनिक क्षमता के आइसक्रीम प्लांट स्थापित किए जाने के साथ ही पटना में पूर्व से स्थापित 100 मीट्रिक टन क्षमता के पशु आहार फैक्ट्री को 150 मीट्रिक टन में विस्तारित और 150 मीट्रिक टन की नई इकाई स्थापित की गई है।”

डेयरी स्थापित करने वाले किसानों को सरकार द्वारा 50 प्रतिशत तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को 66 प्रतिशत अनुदान दिए जाने का दावा करते हुए उन्होंने कहा कि किसानों की आमदनी केवल धान, गेहूं की खेती करने से दोगुनी नहीं होगी, बल्कि इसके लिए समग्र रूप से वानिकी, डेयरी, मछली और मुर्गी पालन को अपनाना होगा।

उन्होंने कहा कि फिलहाल बिहार में प्रतिदिन 18 लाख किलो दूध का संग्रह व 14 लाख लीटर की मार्केटिंग सुधा डेयरी द्वारा की जा रही है।

इस मौके पर केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह, बिहार सरकार में मंत्री प्रमोद कुमार, राणा रणधीर सिंह समेत कई अधिकारी और नेता मौजूद थे।

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मुकेश अंबानी ने ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ अभियान का आह्वान किया

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mukesh ambani

गांधीनगर, 18 जनवरी | औपनिवेशीकरण के खिलाफ महात्मा गांधी के अभियान को याद करते हुए रिलायंस इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक मुकेश अंबानी ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करने की गुजारिश की और कहा कि भारतीय डेटा भारतीयों के ‘स्वामित्व और नियंत्रण’ में होने चाहिए। उन्होंने यहां वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट 2019 में कहा, “हम अपने राष्ट्रपिता को उनकी 150वीं जयंती के वर्ष में श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। गांधी जी ने राजनीतिक औपनिवेशीकरण के खिलाफ आन्दोलन चलाया था.. आज हम सब मिलकर डेटा औपनिवेशीकरण के खिलाफ नया अभियान शुरू कर रहे हैं।” इस समिट का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था।

अंबानी ने कहा कि डेटा नई दुनिया में ‘नया तेल और धन’ है। उन्होंने कहा कि भारत के डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण भारतीय लोगों के हाथ में ही होना चाहिए और कॉर्पोरेट्स द्वारा नहीं किया जाना चाहिए, खासतौर से वैश्विक कॉर्पोरेशंस द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “माननीय प्रधानमंत्री, मैं आश्वस्त हूं कि आप अपने डिजिटल इंडिया मिशन के प्रमुख लक्ष्यों में इसे भी शामिल करेंगे।”

उन्होंने कहा, “भारत को इस डेटा संचालित क्रांति में सफल होने के लिए, हमें भारतीय डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण वापस भारत भेजना होगा.. दूसरे शब्दों में भारतीय संपत्ति वापस लौटानी होगी। भारतीय डेटा को भरतीयों द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए, न कि वैश्विक कॉर्पोरेट्स द्वारा। डेटा का नियंत्रण हमें अपने हाथों में लेने के लिए अभियान चलाने की आवश्यकता है।”

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अक्टूबर में कहा था कि सभी डिजिटल भुगतान कंपनियों जैसे गूगल प्ले, वाट्सएप और अन्य को अपने भारतीय कारोबार का डेटा स्थानीय तौर पर स्टोर करना चाहिए।

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ओपिनियन

बसपा-सपा गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं : शीला दीक्षित

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वरिष्ठ कांग्रेस नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कहना है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं मिल रहे हैं, लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस के परिणाम चौंकाने वाले होंगे।

शीला दीक्षित ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, “उनको एक साथ आने दीजिए। वे मिलते और जुदा होते रहे हैं और फिर साथ आ रहे हैं। मेरा अभिप्राय यह है कि उनमें स्थिरता नहीं है और वे स्थायित्व के संकेत नहीं दे रहे हैं। अब आगे देखते हैं।”

तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं दीक्षित (80) सपा और बसपा गठबंधन को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रही थीं। सपा और बसपा ने कांग्रेस को महागठबंधन से अलग रखते हुए प्रदेश में 80 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए एक गठबंधन किया है। दीक्षित को 10 जनवरी को दिल्ली कांग्रेस की कमान सौंपी गई।

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने से पहले शीला दीक्षित को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था। दीक्षित ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीद क्षीण पड़ गई है।

दीक्षित की टिप्पणी से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेता चुनाव अभियान के दौरान सपा और बसपा को निशाना बनाएंगे, जबकि उनका सीधा मुकाबला सत्ताधारी पार्टी भाजपा से होगा।

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है, लेकिन पार्टी ने भाजपा को शिकस्त देने वाले सेक्यूलर दलों के लिए दरवाजा खुला रखा है।

उत्तर प्रदेश में पार्टी नेता उम्मीदवारों को बता सकते हैं कि कांग्रेस ही नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से बाहर कर सकती है और भाजपा को शिकस्त दे सकती है।

कांग्रेस इस बात पर बल देंगे कि इस चुनाव के नतीजों से प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि देश का प्रधानमंत्री चुना जाएगा।

लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो ही सीटें बचा पाई थीं, जबकि उससे पहले 2009 में पार्टी ने 21 सीटों पर जीत हासिल की थी, जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) दूसरी बार केंद्र की सत्ता को बरकार रख पाई थी।

दीक्षित ने कहा कि उनसे कहा जाएगा तो वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी, लेकिन वह दिल्ली पर अपना अधिक ध्यान केंद्रित करेंगी क्योंकि उनको यहां काफी काम करना है।

उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी को कांग्रेस द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करने का अनुमोदन किया।

उन्होंने कहा, “पार्टी को इस पर फैसला लेने दीजिए। हम चाहते हैं और खासतौर से मैं चाहती हूंं और हमारे बीच अधिकांश लोग चाहते हैं। लेकिन इस पर पूरी पार्टी द्वारा फैसला लिया जाएगा।”

गैर-भाजपा दलों में प्रधानमंत्री का पद विवादास्पद मसला है। राहुल गांधी ने खुद भी कहा कि इसका फैसला चुनाव के बाद लिया जाएगा और पहला काम नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित करना है।

संपूर्ण भारत में महागठबंधन की संभावना पर पूछे जाने पर दीक्षित ने कहा कि लोग इस दिशा में प्रयासरत हैं, लेकिन इस पर अभी पूरी सहमति नहीं बन पाई है।

विपक्षी दलों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में गठबंधन की संभावना कम है, लेकिन भाजपा को शिकस्त देने के लिए राज्य विशेष में गठबंधन होगा।

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