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आख़िर क्यों झूठ के बग़ैर मोदी का कोई भाषण पूरा नहीं होता…?

मोदी के ऐतिहासिक ज्ञान का आधार भी वही अधकचरी और दुर्भावनापूर्ण जानकारी है, जो संघी ट्रोल्स की ओर से व्हाट्सअप के ज़रिये फैलायी जाती है। इन्हीं भ्रष्ट जानकारियों की बदौलत वो इतिहास और ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ करते रंगे हाथ पकड़े जाते हैं।

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Narendra Modi
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वैसे तो ये हमेशा होता रहा है, फिर भी कर्नाटक चुनाव में तो शायद नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषणों में झूठ बोलने का सारा कीर्तिमान ही ध्वस्त कर दिया। फ़ील्ड मार्शल करियप्पा और जनरल थिमय्या को लेकर मोदी की ओर से बोले गये झूठे को लेकर मीडिया में मचा कोहराम शान्त भी नहीं हुआ था कि प्रधानमंत्री ने शहीद-ए-आज़म भगत सिंह को भी अपने झूठ में लपेट लिया। इसे लेकर भी मोदी की ख़ूब थू-थू हुई। कहा गया कि मोदी के झूठ और उनकी ऐतिहासिक अज्ञानता ने प्रधानमंत्री के पद की गरिमा को गहरा आघात पहुँचाया है। इस सच्चाई को उनके अन्ध भक्त भी नकार नहीं पा रहे हैं। भक्तों को भी सूझ नहीं रहा कि अपने आराध्य की ग़लत-बयानियों को वो कैसे सही ठहरायें!

दरअसल, नरेन्द्र मोदी को ये ग़ुमान है कि वो बहुत धाँसू वक़्ता हैं! ये बात को ख़ारिज़ भी नहीं किया जा सकता। भाषणों की बदौलत ही वो सवा सौ करोड़ लोगों वाले देश के मुखिया के आसन तक जा पहुँचे। वर्ना, उनके प्रशासनिक, कूटनीतिक, आर्थिक, विधायी और राजनीतिक कौशल को तो देश चार साल से झेल ही रहा है। भाषणों की वजह से ही मोदी की फेंकूँ, जुमलेबाज़, झूठ पर झूठ बोलने वाले या कुछ भी बोल देने वाला मसख़रे नेता जैसे ख़ास पहचान बनती चली गयी। मज़े की बात तो ये है कि मोदी हरेक झूठ को अति आत्मविश्वास से बोलते हैं। जबकि तमाम ऐसे मुद्दों पर उन्हें साँप सूँघ जाता है, जिससे समाज में उथल-पुथल मची हो। दिल दहला देने वाली वारदातों और ज्वलन्त मुद्दों पर उनके जैसे वाचाल नेता की ख़ामोशी भी कभी अपना रिकॉर्ड नहीं तोड़ती!

लिहाज़ा, ये कौतूहल होना स्वाभाविक है कि आख़िर क्या वजह है कि झूठ और लन्तरानियों यानी लम्बी-चौड़ी हाँके बग़ैर मोदी का कोई भाषण पूरा नहीं होता? इसकी वजह सिर्फ़ इतनी सी है कि नरेन्द्र मोदी उस पेड़ की तरह हैं जो झूठ के बीज से उस मिट्टी में अंकुरित हुआ जो झूठ से ही बनी थी। झूठ की ही आबोहवा में वो अंकुर ही पौधा बना। झूठ से ही उसके तने मज़बूत हुए। झूठ ही उसकी शाखाओं, टहनियों, पत्तियों और कोपलों में पनपता रहा। इसीलिए इस पेड़ पर लगने वाले फल भी झूठ से ही सराबोर हैं।

झूठों की संगत की वजह से नरेन्द्र मोदी अपने बाल्य-काल में घर से भागे। झूठ से प्रेरित होकर ही ब्याहता पत्नी को मझधार में छोड़ दिया। झूठे, संघियों की शोहबत में आकर ही प्रचारक बने। बतौर प्रचारक, संघ का झूठ फैलाते रहे। झूठ फैलाने की कुशलता को देखते हुए संघ ने इन्हें घूमने-फिरने का ख़ूब मौका दिया। झूठ फैलाने की निपुणता बढ़ती गयी तो अटल जी के ज़माने में नरेन्द्र मोदी को बीजेपी में महासचिव बना दिया गया। महासचिव बनते-बनते, मोदी ये बोधित्व हासिल कर चुके थे कि झूठ में जितनी ताक़त होती है, उतनी सच्चाई में नहीं होती! संघ में सिखाये जाने वाले ‘अफ़वाह-मनोविज्ञान’ ने मोदी की इस धारणा को चट्टान की तरह पुख़्ता बना दिया।

जल्द ही मोदी ने अपने गृहराज्य गुजरात की केशुभाई पटेल सरकार को लेकर झूठ गढ़ने शुरू कर दिये। देखते ही देखते यही संक्रमण केशुभाई सरकार को ले डूबा। फिर लाल कृष्ण आडवाणी की कृपा से उस नरेन्द्र मोदी को बीजेपी के सबसे मज़बूत गढ़ ‘गुजरात’ का संवैधानिक ताज मिल गया, जिसने ज़िन्दगी में पहले कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा था। मुख्यमंत्री बनने के बाद मोदी ने जब पाया कि सिर्फ़ अपने कामकाज़ की बदौलत वो विधानसभा चुनाव नहीं जीत पाएँगे तो उन्होंने साम्प्रदायिक उन्माद के उस ब्रह्मास्त्र को व्यापक पैमाने पर आज़माने की रणनीति बनायी जो संघियों के डीएनए में मौजूद होती है।

नतीज़तन, गुजरात के दंगे हुए। जान-माल की होली जली। साम्प्रदायिकता की भट्टी धधकने लगी। वो चुनाव बाद, मुख्यमंत्री का ताज फिर से मोदी के सिर पर ही फिट हो गया। अब झूठ की बदौलत ही गुजरात-मॉडल का ‘हौवा’खड़ा किया गया। उधर, बीजेपी में वरिष्ठों की बड़ी तादाद को देखते हुए मोदी ने ख़ुद को गुजरात तक ही सीमित रखा। 2009 में शीर्ष नेता के रूप में आडवाणी ने वाजपेयी की जगह ली। लेकिन वो मनमोहन सिंह सरकार को सत्ता से बेदख़ल नहीं कर सके। 2012 में संघ के रणनीतिकारों ने पाया कि व्यापक स्तर पर और प्रचंड झूठ फैलाये बग़ैर काँग्रेस के सामने बीजेपी की दाल नहीं गल पाएगी।

लिहाज़ा, संघ-बीजेपी ने अपनी सारी ताक़त काँग्रेस, मनमोहन सरकार और नेहरू-गाँधी परिवार के ख़िलाफ़ झूठ फैलाने और ओछी तथा छिछोरी बातों के ज़रिये इनका यथासम्भव चरित्रहनन करने में झोंक दी। व्हाट्सअप, फ़ेसबुक और ट्वीटर जैसे सोशल मीडिया के हथकंडों को संघ ने बहुत उपयोगी पाया। उधर, विनोद राय जैसे व्यक्ति ने संवैधानिक संस्था ‘सीएजी’ का दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल करते हुए एक के बाद एक ऐसे घोटालों का पटाक्षेप किया जिसने संघ-बीजेपी के झूठ पर मोहर लगानी शुरू कर दी। देखते ही देखते सियासी हवा काँग्रेसियों के ख़िलाफ़ बहने लगी। अब 2014 के चुनाव के लिए संघ-बीजेपी को एक अदद ऐसे वक़्ता की ज़रूरत थी जो झूठ से तैयार हुए खेत में फसल उगा सके, जिसकी छवि कट्टर हिन्दूत्ववादी की हो।

वैसे तो कट्टरवादी की छवि आडवाणी की भी थी, लेकिन झूठ के अखाड़े में मोदी उनको पछाड़ चुके थे। मोदी ने तब तक संघ को दिखा दिया था कि गुजरात-मॉडल की झूठी ब्रॉन्डिंग से क्या ग़ुल खिलाये जा सकते हैं! सही वक़्त पर मोदी ने संघ में अपने झूठ की गोट बिछायी। फिर दाँव चला कि बूढ़े हो चुके आडवाणी की जगह उन्हें मौक़ा दिया जाए। ये तीर निशाने पर था। संघ ने मोदी को झूठ से खेलने की खुली छूट दे दी। इसीलिए सबको 15-15 लाख रुपये जैसा निखालिस झूठ भी चुनाव में बिक गया!

नतीज़ा, चौंकाने वाला रहा! किसी को यक़ीन नहीं था कि भारत के सियासी मानचित्र पर झूठ की ऐसी फ़िल्म में सुपर-हिट हो जाएगी। पहली बार बीजेपी को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ। फिर तो झूठ और सियासी ड्रामों में माहिर नरेन्द्र मोदी ने शपथग्रहण से ही खुलकर खेलना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि संसद की सीढ़ियों पर मत्था टेकने और सेंट्रल हॉल में अपनी नम आँखों से उन्होंने भावुकता को भी जमकर भुनाया। तब से अभी तक, देश हो या विदेश, मोदी अपने झूठ की डुगडुगी को बजाने का कोई मौक़ा नहीं चूकते। उन्हें अपने सफ़ेद झूठ की पोल खुलते देख भी कोई झेंप नहीं होती!

झूठ के बेनक़ाब होने पर भी उससे कसकर चिपके रहने के लिहाज़ से मोदी का कौशल अद्भुत है। उनकी बेशर्मी और बेहयाई बेजोड़ है। इसकी वजह ये है कि बुनियादी तौर पर मोदी बेहद खोखले नेता हैं। वो ख़ुद स्वीकार करते हैं कि वो तक़रीबन अशिक्षित हैं। उनकी शैक्षिक डिग्रियाँ महज दिखावा हैं। उनके दावों में बड़बोलापन है। उनमें भाषण देने की कला तो है, लेकिन सवाल-जबाव देने की क़ाबलियत नहीं। वो लोकतांत्रिक होने का दावा तो करते हैं, लेकिन उनका मिज़ाज़ तानाशाहों वाला है। उन्हें चमक-दमक और वैभव बहुत पसन्द है, क्योंकि इनके बग़ैर ब्रॉन्डिंग और पैकेज़िंग नहीं हो सकती।

मोदी को अच्छी तरह से पता है कि जनता को नये-नये मुद्दों और विवादों में उलझाकर रखने से लोगों का ध्यान उनकी नाकामियों से भटकाया जा सकता है। उन्हें पता है कि मीडिया और विपक्ष के सिवाय तानाशाह का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इसीलिए, सुविचारित रणनीति के तहत जहाँ मोदी राज में मीडिया का बन्ध्याकरण किया गया, वहीं विपक्ष को झूठे मुक़दमों, चरित्रहनन की बातों में उलझाकर रखा गया। मोदी ने नोटबन्दी, जीएसटी, सर्ज़िकल हमला जैसे उपाय इसलिए नहीं अपनाये कि वो देश हित में ज़रूरी हैं। बल्कि इन्हें सिर्फ़ अपनी छवि चमकाने के लिए अपनाया गया।

इसीलिए अभी कर्नाटक के चुनाव प्रचार में और इससे पहले गुजरात में मोदी या संघ-बीजेपी ने अपनी सरकारों की उपलब्धियों पर दाँव नहीं लगाया। बल्कि विपक्ष का चरित्रहनन करने पर ही सारी ताक़त झोंकी। यही रणनीति अमित शाह और बीजेपी के तमाम नेताओं की है। इसीलिए मोदी को अपने हर भाषण में काँग्रेस के दौर की बातें करनी पड़ती हैं। काँग्रेस के नेताओं और प्रतीकों को बौना, ग़ैर-ज़िम्मेदार, ख़ुदगर्ज़, चरित्रहीन, भ्रष्ट, सत्तालोभी, अन्यायकारी और लोकतंत्र विरोधी साबित करने के लिए मोदी को उन्हीं झूठों का सहारा लेना पड़ता है, जो उनकी रगों में बहता है।

मोदी के ऐतिहासिक ज्ञान का आधार भी वही अधकचरी और दुर्भावनापूर्ण जानकारी है, जो संघी ट्रोल्स की ओर से व्हाट्सअप के ज़रिये फैलायी जाती है। इन्हीं भ्रष्ट जानकारियों की बदौलत वो इतिहास और ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ करते रंगे हाथ पकड़े जाते हैं। भाषणों में यही भ्रष्ट तथ्य, न सिर्फ़ मोदी की ज़ुबान से निकलते हैं, बल्कि उनकी रिसर्च टीम और ट्रोल्स का भी मार्गदर्शन करते हैं। मोदी अच्छी तरह जानते हैं कि वो तभी तक सत्ता में रह पाएँगे, जब तक जनता उनके झूठ के झाँसों में आती रहेगी। इसीलिए वो हर वक़्त अपने झूठ के कारखाने को चलाते रहते हैं।

यहाँ ये समझना भी उपयोगी है कि कोई व्यक्ति झूठ क्यों बोलता है? सच को छिपाने के लिए या औरों को बरगलाने के लिए! सच को कौन छिपाना चाहेगा? जिसे डर हो कि यदि सच उजागर हो गया तो उसकी बहुत छीछालेदर होगी! और, ‘औरों को बरगलाने के लिए’ सच को छिपाने या झूठ बोलने वालों को झाँसेबाज़ कहा जाता है। झाँसेबाज़ का मक़सद, आपसे उस चीज़ को हासिल कर लेने का होता है जिसका वो नैसर्गिक या स्वाभाविक हक़दार नहीं होता!

अब ज़रा ये सोचिए कि यदि मोदी काँग्रेस की उपलब्धियों, उसकी ताक़त और क्षमता की सच्चाईयों से भयभीत ना होते तो केन्द्र में बहुमत की सरकार बनाने के बाद और 22 राज्यों की सत्ता हथियाने के बाद भी ‘सत्ता की ही हवस’ से ही क्यों पीड़ित रहते? सत्ता की यही हवस और सत्ता गँवाने का भय उन्हें एक से बढ़कर एक झूठ गढ़ने और बोलने के लिए प्रेरित करता है।

दूसरी ओर, यदि मोदी को यक़ीन होता कि उन्होंने सत्ता पाने की ख़ातिर जनता को जो सब्ज़बाग़ दिखाये हैं वो साकार हुए हैं तो वो अपनी सच्चाई या उपलब्धियों का बखान करके जनसमर्थन बटोरने की अपेक्षा क्यों नहीं रखते? उन्हें पिछली सरकारों की उपलब्धियों को नज़रअन्दाज़ करने या उसे कमतर आँकने में अपनी ऊर्जा क्यों झोंकना पड़ती! मोदी को अच्छी तरह से पता है कि काँग्रेस ने देश के लिए कब, क्या और कितना किया, कितना कर पायी, क्या छूट गया? इसे लेकर झूठ बोलने की अपेक्षा अपनी उपलब्धियों का सच जनता के सामने रखना उनके लिए कहीं ज़्यादा प्रभावी होता।

लेकिन अफ़सोस कि बड़बोलेपन, जुमलेबाज़ी और विरोधियों के चरित्रहनन में उलझे मोदी के पास अपनी सकारात्मकता को पेश करने के लिए कुछ नहीं है, इसीलिए झूठ से पनपने वाली नकारात्मकता ही उनका इकलौता सहारा बना रहता है! जैसे-जैसे जनता मोदी की नकारात्मकता को समझने लगेगी, वैसे-वैसे पहले तो तिलमिलाहट में झूठ की सप्लाई बढ़ती जाएगी और आख़िरकार, झूठ का मायावी वज्र अपने आप ही चरमराकर ढह जाएगा। 2019 में यही होने वाला है!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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‘मी टू मूवमेंट’ का एकजुट होकर समर्थन करना चाहिए : महेश भट्ट

“हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

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नई दिल्ली, 16 अक्टूबर | फिल्मों के जरिए बेबाकी से सामाजिक मुद्दों को सुनहरे पर्दे पर उतारने वाले निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट ने देश में चल रहे ‘मी टू मूवमेंट’ पर भी बेबाकी से अपनी राय दी है। उन्होंने कहा है कि यह कुछ ऐसा है, जिससे हम अलग-अलग विचार रखकर नहीं निपट सकते हैं। हमें पूरी जिम्मेदारी व एकजुटता के साथ इसका समर्थन करना चाहिए।

महेश भट्ट 12 अक्टूबर को रिलीज हुई अपनी होम प्रोडक्शन की फिल्म ‘जलेबी’ के प्रचार के लिए दिल्ली आए थे। उन्होंने बताया कि उनकी फिल्म में दिखाया गया प्यार किस तरह हिंदी फिल्मों में दिखाए जाने वाले पारंपरिक प्यार से अलग है।

महेश से जब पूछा गया कि फिल्म की कहानी अन्य प्रेम कहानियों से कितनी अलग है तो उन्होंने आईएएनएस को बताया, “हमारी फिल्म प्यार के उतार-चढ़ावों और उसकी बारीकियों से बड़ी हिम्मत से आंख मिलाती है। यह पारंपरिक हिंदी फिल्मों से इतर है। इसके अंत में लिखा आता है ‘एंड दे लिव्ड हैपिली एवर आफ्टर’। लेकिन वास्तव में प्यार परियों की कहानी से परे है। इंसानी सोच ने प्यार को शादी की परंपरा से जोड़ दिया, लेकिन प्यार तो कुदरत की देन है।

उन्होंने कहा, “आप देखें कि इस देश में राधा-कृष्ण के प्रेम को मंदिरों में बिठाया गया है, जबकि राधा-कृष्ण का प्यार शादी के बंधन तक सीमित नहीं था। हमारी फिल्म एक तरह से इसी तरह के प्यार और दो इंसानों की भावनाओं को पेश करती है।”

महेश कहते हैं, “फिल्म की सबसे खास बात यह है कि इसने नौजवान पीढ़ी को बहुत सम्मान दिया है। फिल्म के माध्यम से बताया गया है कि यह आज के दौर के जो युवा हैं या दर्शक हैं, वे जिंदगी से जुड़ी इस गहरी बात को समझेंगे।”

‘जलेबी’ के पोस्टर ने सुर्खियां और विवाद दोनों बटोरे थे। इसमें फिल्म की हीरोइन ट्रेन की खिड़की से चेहरा निकालकर हीरो को ‘किस’ करती नजर आती है। इसका जिक्र करने पर महेश हंसते हुए कहते हैं, “यह मार्केटिंग की जरूरत थी कि हम फिल्म की पहली ऐसी तस्वीर जारी करें, जिससे हल्ला मच जाए और देखिए आज आप भी यही सवाल पूछ रही हैं।..दरअसल, जब से हमारे संचार के माध्यम बदले हैं और हम शब्दों से तस्वीरों पर आए हैं, तब से अभिव्यक्ति ज्यादा असरदार हो गई है। तस्वीरों का असर ज्यादा होता है..उसका मिजाज कुछ अलग होता है। वास्तव में यह तस्वीर महिलाओं की आजादी को प्रतिबिंबित करती है।”

फिल्म की पृष्ठभूमि पुरानी दिल्ली है। इसके पीछे की वजह पूछे जाने पर महेश ने कहा, “इसका श्रेय फिल्म के निर्देशक (पुष्पदीप भारद्वाज) को जाता है। इनकी परवरिश पुरानी दिल्ली की जिन गलियों में हुई है, उन्होंने उन्हीं गलियों को पर्दे पर उतारा है। कोई शख्स जब किसी दौर में जिन पलों को जीता है तो जब वह उन्हें पर्दे पर उतारता है तो उसकी अदा कुछ और होती है।

महेश कहते हैं, “हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

‘मी टू मूवमेंट’ के बारे में आलिया भट्ट के पापा ने कहा, “हमें इस पहल का समर्थन करना चाहिए। यहां हमें अपनी जिम्मेदारी भी निभाने की जरूरत है। हम अलग-अलग राय रखकर इस समस्या का हल नहीं निकाल सकते, हम संवेदना और समझदारी के साथ इसका समाधान तलाशना होगा।”

–आईएएनएस

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‘आयुष्मान योजना काफी नहीं, लोगों को मिले स्वास्थ्य का अधिकार’

मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।

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Picture Credit : Quartz

नई दिल्ली, 17 अक्टूबर | देश में एक तरफ जहां महिला सशक्तिकरण का बड़ा जोरो-शोरो से ढिंढोरा पीटा जाता है, वहीं एक विश्वविद्यालय की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कामकाजी 92 प्रतिशत महिलाओं को प्रति माह 10,000 रुपये से भी कम की तनख्वाह मिलती है। इस मामले में पुरुष थोड़ा बेहतर स्थिति में हैं। लेकिन हैरत की बात यह है कि 82 प्रतिशत पुरुषों को भी 10,000 रुपये प्रति माह से कम की तनख्वाह मिलती है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र ने श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधार पर स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें उन्होंने देश में कामकाजी पुरुषों और महिलाओं पर आंकड़े तैयार किए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर 67 प्रतिशत परिवारों की मासिक आमदनी 10,000 रुपये थी जबकि सातवें केंद्रीय वेतन आयोग (सीपीसी) द्वारा अनुशंसित न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये प्रति माह है। इससे साफ होता है कि भारत में एक बड़े तबके को मजदूरी के रूप में उचित भुगतान नहीं मिल रहा है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है। यह आंकड़े पूरे भारत के हैं।”

उन्होंने कहा, “मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुताबिक, चिंता की बात यह है कि विनिर्माण क्षेत्र में भी 90 प्रतिशत उद्योग मजदूरों को न्यूनतम वेतन से नीचे मजदूरी का भुगतान करते हैं। असंगठित क्षेत्र की हालत और भी ज्यादा खराब है। अध्ययन के मुताबिक, तीन दशकों में संगठित क्षेत्र की उत्पादक कंपनियों में श्रमिकों की उत्पादकता छह प्रतिशत तक बढ़ी है, जबकि उनके वेतन में मात्र 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

क्या आप मानते हैं कि शिक्षित युवाओं के लिए वर्तमान हालात काफी खराब हो चुके हैं, जिस पर सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने कहा, “आज की स्थिति निश्चित रूप से काफी खराब है, खासकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में। हमें उन कॉलेजों से बाहर आने वाले बड़ी संख्या में शिक्षित युवाओं का बेहतर उपयोग करने की आवश्यकता है।”

इस स्थिति को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है, के सवाल पर उन्होंने आईएएनएस को बताया, “स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं, जैसे अगर सरकार सीधे गांवों व छोटे शहरों में रोजगार पैदा करे, इसके साथ ही बेहतर बुनियादी ढांचे (बिजली, सड़कों) उपलब्ध कराएं और युवाओं को कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध को सुनिश्चित करें, जिससे कुछ हद तक हालात सुधर सकते हैं।”

श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) के मुताबिक, 2015-16 के दौरान, भारत की बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी जबकि 2013-14 में यह 4.9 फीसदी थी। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि बेरोजगारी दर शहरी क्षेत्रों (4.9 फीसदी) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों (5.1 फीसदी) नें मामूली रूप से अधिक है।

अध्ययन के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाओं के बीच बेरोजगारी दर अधिक है। राष्ट्रीय स्तर पर महिला बेरोजगारी दर जहां 8.7 प्रतिशत है वहीं पुरुषों के बीच यह दर चार प्रतिशत है। काम में लगे हुए व्यक्तियों में से अधिकांश व्यक्ति स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं। राष्ट्र स्तर पर 46.6 प्रतिशत श्रमिकों स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं, इसके बाद 32.8 प्रतिशत सामयिक मजदूर हैं।

अध्ययन के मुताबिक, भारत में केवल 17 प्रतिशत व्यक्ति वेतन पर कार्य करते हैं और शेष 3.7 प्रतिशत संविदा कर्मी हैं।

–आईएएनएस

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नई नौकरियां नहीं पैदा हुई, देश में बढ़ी बेरोजगारी दर

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

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unemployment in India

नई दिल्ली/बेंगलुरू, 16 अक्टूबर | अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र की एक हालिया रिपोर्ट में बेरोजगारी दर के 20 वर्षो में सबसे अधिक होने की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने भारत में बेरोजगारी दर के बढ़ने की वजह नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना और शिक्षित युवाओं के तेजी से श्रमबल में शामिल होने को बताया है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है।”

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

अमित बसोले ने कहा, “देश में बढ़ती बेरोजगारी के पीछे दो कारक हैं, पहला 2013 से 2015 के बीच नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना क्योंकि कुल कार्यबल (नौकरियों में लगे लोगों की संख्या) बढ़ने की बजाय घट गया है। दूसरा कारक यह है कि श्रम बल में प्रवेश करने वाले अधिक शिक्षित युवा, जो उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी, जो पिछले 20 वर्षो में सबसे ज्यादा देखी गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में वृद्धि नहीं हुई है। अध्ययन के मुताबिक, जीडीपी में 10 फीसदी की वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में एक प्रतिशत से भी कम की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में बढ़ती बेरोजगारी को भारत के लिए एक नई समस्या बताया गया है।

इन हालात से निपटने के लिए क्या सरकार ने पर्याप्त कदम उठाए हैं, इस पर अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने बताया, “इन हालात पर सरकार के प्रदर्शन का मूल्यांकन करना थोड़ा मुश्किल है, विशेष रूप से 2015 के बाद क्योंकि उसके बाद से सरकार ने समग्र रोजगार की स्थिति पर कोई डेटा जारी नहीं किया है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग द इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) जैसे निजी स्रोतों के उपलब्ध डेटा से पता चलता है कि नौकरियों का सृजन कमजोर ही बना रहेगा। सीएमआईई डेटा यह भी इंगित करता है कि नोटबंदी के परिणामस्वरूप नौकरियों में कमी आई है, सरकार ने इस पर भी कोई डेटा जारी नहीं किया है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2018 की रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में अंडर एंप्लॉयमेंट और कम मजदूरी की भी समस्या हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त और युवाओं में बेरोजगारी 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है। बेरोजगारी पूरे देश में हैं, लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देश के उत्तरी राज्य हैं।

अमित बसोले ने यह भी कहा कि भारत के नौकरी बाजार की प्रकृति बदल गई है क्योंकि बाजार में अब अधिक शिक्षित लोग आ चुके हैं, वह उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं। उन्होंने कहा, “पिछले दशक में श्रम बाजार बदल गया है, विभिन्न डिग्रियों के अनुरूप रोजगार पैदा नहीं हुए हैं।”

हालात को सामान्य बनाने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाने चाहिए, इस सवाल पर रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने आईएएनएस को बताया, “यह हालात को सामान्य बनाने का सवाल नहीं है। इसके बजाय, हमें एक उचित राष्ट्रीय रोजगार नीति विकसित करने की आवश्यकता है, जो केंद्र द्वारा आर्थिक नीति बनाने में नौकरियों का सृजन करेगी।”

–आईएएनएस

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रक्षा मंत्री के दावे को पूर्व एचएएल चीफ ने नकारा, कहा- भारत में ही बना सकते थे राफेल

man-min (1)
ज़रा हटके4 weeks ago

इस हॉस्पिटल में भूत-प्रेत करते हैं मरीजों का इलाज

Kapil Sibal
टेक2 weeks ago

बहुमत के फ़ैसले के बावजूद ग़रीब और सम्पन्न लोगों के ‘आधार’ में हुई चूक!

Sonarika Bhadauriya
टेक2 weeks ago

सोशल मीडिया पर कमेंट्स पढ़ना फिजूल : सोनारिका भदौरिया

Matka
ज़रा हटके3 weeks ago

मटकावाला : लंदन से आकर दिल्ली में पिलाते हैं प्यासे को पानी

,Excercise-
लाइफस्टाइल3 weeks ago

उम्र को 10 साल बढ़ा सकती हैं आपकी ये 5 आदतें…

IAF Chief Dhanoa Rafale Jet
ब्लॉग2 weeks ago

राफ़ेल पर सफ़ाई देकर धनोया ने वायुसेना की गरिमा गिरायी!

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ब्लॉग4 weeks ago

मोहन भागवत झूठ पर झूठ परोसते रहे और भक्त झूम-झूमकर कीर्तिन करते रहे!

Vivek Tiwari
ब्लॉग3 weeks ago

विवेक की हत्या के लिए अफ़सरों और नेताओं पर भी मुक़दमा क्यों नहीं चलना चाहिए?

राजनीति2 weeks ago

छेड़छाड़ पर आईएएस की पत्नी ने चप्पल से बीजेपी नेता को पीटा, देखें वीडियो

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राष्ट्रीय2 weeks ago

Air Force Day: 8000 फीट की ऊंचाई से उतरे पैरा जंपर्स

Assam
शहर2 weeks ago

…अचानक हाथी से गिर पड़े असम के डेप्युटी स्पीकर, देखें वीडियो

Karnataka
ज़रा हटके2 weeks ago

कर्नाटक में लंगूर ने चलाई यात्रियों से भरी बस, देखें वीडियो

Kangana Ranaut-
मनोरंजन2 weeks ago

कंगना की फिल्म ‘मणिकर्णिका’ का टीजर जारी

BIHAR
राजनीति3 weeks ago

नीतीश के मंत्री का मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार, देखें वीडियो

Hyderabad Murder on Road
शहर3 weeks ago

हैदराबाद: दिनदहाड़े पुलिस के सामने कुल्हाड़ी से युवक की हत्या

Thugs of Hindostan-
मनोरंजन3 weeks ago

धोखे और भरोसे के बीच आमिर-अमिताभ की जंग, ट्रेलर जारी

kapil sibal
राष्ट्रीय3 weeks ago

‘आधार’ पर मोदी सरकार का कदम असंवैधानिक ही नहीं अलोकतांत्रिक भी था: सिब्‍बल

rahul gandhi
राजनीति4 weeks ago

राहुल ने मोदी से पूछा- अब तो बताओ, ओलांद सच कह रहे हैं या झूठ

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