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स्वास्थ्य

किशोरावस्था में वजन घटाने की सर्जरी हृदय रोग में मददगार

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motapa-

बेरियाट्रिक सर्जरी (पेट की सर्जरी) करानेवाले किशोर/किशोरियों में हृदय रोग का खतरा कम हो जाता है। एक नए शोध में यह दावा किया गया है।

शोध के निष्कर्षो से पता चलता है कि बेरियाट्रिक या वजन घटाने की सर्जनी अगर किशोरावस्था में ही करा ली जाती है, तो यह जीवन में बाद में भी अनियमित ग्लूकोज चयापचय, एथोरोसलेरॉसिस की हृदय की विफलता और स्ट्रोक के विकास और प्रगति को कम करके अद्वितीय लाभ प्रदान कर सकती है।

अमेरिका के ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी कॉलेज के प्रोफेसर मार्क पी. मिचलस्की ने बताया, “यह बेरिएट्रिक सर्जरी के बाद किशोरावस्था में हृदय रोग के जोखिम कारकों में परिवर्तन के पूर्वानुमान को लेकर पहली बार बड़े पैमाने पर किया गया विश्लेषण है। यह शोध ऑनलाइन जर्नल पेडियाट्रिक्स में प्रकाशित किया गया है। यह अध्ययन 242 किशोर/किशोरियों पर किया गया, जिन्हें जांच में हृदय रोग होने की संभावना पाई गई थी।

शोध में पाया गया कि बेरियाट्रिक सर्जरी से पहले 33 फीसदी प्रतिभागियों में तीन या उससे ज्यादा तरह के हृदय रोग होने का खतरा था। बेरियाट्रिक सर्जरी से न सिर्फ वजन में कमी आती है, बल्कि किशोर/किशोरियों के बीच डायस्लिपेडेमिया का जोखिम भी कम हो जाता है, जो रक्त में कोलेस्ट्रॉल का असामान्य रूप से बढ़ा स्तर होने के कारण होता है।

–आईएएनएस

स्वास्थ्य

‘स्तन कैंसर के इलाज के लिए बेहतर विकल्प है ‘टागेर्टेड रेडिएशन थेरेपी’

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Breast-Cancer
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स्तन कैंसर दुनियाभर में तेजी से पैर पसार रहा है। समय पर जांच और पर्याप्त इलाज ही इसका निदान है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस कैंसर के इलाज की दिशा में टागेर्टेड रेडिएशन थेरेपी को एक बेहतर विकल्प के रूप में देखा जा सकता है।

राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर (आरजीसीआईआरसी) की सीनियर कंसल्टेंट और गायनाक्लॉजी रेडिऐशन विभाग की प्रमुख डॉ. स्वरूपा मित्रा ने यह बात कही।डॉ. स्वरूपा इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए), अलवर शाखा द्वारा आरजीसीआई के साथ मिलकर आयोजित किए गए डॉक्टर्स मीट में बोल रही थीं।

इस बैठक में स्तन कैंसर के इलाज की नई तकनीकों पर चर्चा की गई।डॉ. मित्रा ने बताया, ” कैंसर का इलाज तीन तरह से होता है-सर्जरी, रेडिएशन और कीमोथेरेपी। रेडिएशन थेरेपी का इस्तेमाल सर्जरी के बाद होता है, ताकि दोबारा कैंसर से बचाव हो सके।

रेडिएशन से कैंसर कोशिकाएं तो मर जाती हैं, लेकिन इससे स्वस्थ कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचता है। अब 3डीसीआरटी और आईएमआरटी जैसी टागेर्टेड रेडिएशन थेरेपी से यह परेशानी काफी हद तक दूर हो गई है। इसमें स्वस्थ कोशिकाओं को बचाते हुए सीधे प्रभावित क्षेत्र पर रेडिएशन देना संभव होता है।

डॉ. मित्रा ने ब्रेथ कंट्रोल्ड रेडियो थेरेपी की चर्चा करते हुए कहा कि यह स्तन कैंसर के मरीजों को बेहतर जिंदगी जीने में सहायक है।”बैठक के दौरान आरजीसीआई के ओंकोलॉजी विभाग के कंसल्टेंट डॉ. कुमारदीप दत्ता चौधरी ने स्तन कैंसर की वर्तमान परिस्थिति पर प्रकाश डाला।

उन्होंने बताया कि भारत के शहरी इलाकों में महिलाओं में होने वाले कैंसर में सबसे बड़ा हिस्सा स्तन कैंसर का है। यहां तक कि 20-30 साल की युवतियां भी इसका शिकार हो रही हैं। डॉ. दत्ता ने कहा, “बिना मेहनत वाली लाइफस्टाइल, प्रोसेस्ड और जंक फूड खाने की आदत तथा खेतों में इस्तेमाल होने वाले पेस्टिसाइड्स की वजह से देश में कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। इससे बचने के लिए सभी को शारीरिक श्रम करने, घर पर बना सेहतमंद खाना खाने और खाने से पहले फलों और सब्जियों को अच्छी तरह धोकर खाने की जरूरत है।” इस मौके पर आईएमए अलवर के प्रेसीडेंट डॉ. तैयब खान ने आरजीसीआई के प्रवक्ताओं और अन्य उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त किया।

–आईएएनएस

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स्वास्थ्य

सर्दियों में दिल के मरीजों के लिए जोखिम दोगुना…

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Heart attack-
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चिकित्सकों का कहना है कि सर्दी के महीनों में दिल के दौरे पड़ने के मामले बढ़ जाते हैं, खास तौर पर सुबह के समय क्योंकि उस वक्त रक्त वाहिकाएं सिम्पेथेटिक ओवर एक्टिविटी के कारण संकुचित होती हैं और अगर वातावरण में धुआं हो तो जोखिम दोगुना हो सकता है।

चिकित्सकों के मुताबिक, सर्दियों में हवा की धीमी गति और आद्र्रता के स्तर में वृद्धि हो जाती है। इस कारण से धुएं की स्थिति बिगड़ने लगती है, क्योंकि प्रदूषक तत्व हवा में नीचे बने रहते हैं और इधर-उधर फैल नहीं पाते।

हार्ट केयर फाउंडेशन (एचसीएफआई) के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा, “सर्दियों के शुरुआती दिनों के दौरान अधिक धुंध और स्मॉग आम है। सर्दियों में बारिश के दौरान उच्च आद्र्रता होने पर तापमान में गिरावट आती है। जबकि, शुष्क या जाती हुई सर्दियों में फॉग या स्मॉग गायब कम हो जाता है और ठंडी हवाएं भी बंद हो जाती हैं।”

एक अध्ययन के मुताबिक, वायु की खराब गुणवत्ता या धुआं सबसे खराब प्रकार के दिल के दौरे का एक महत्वपूर्ण कारण है, जिससे समय से पहले मौत हो सकती है। दिल की समस्या वाले लोगों के लिए इन दिनों अधिक जोखिम रहता है।

डॉ. अग्रवाल ने बताया, “स्मॉग से होने वाले नुकसानों में आंखों में लालिमा, खांसी या गले में जलन, सांस लेने में कठिनाई प्रमुख है। स्मॉग से तीव्र अस्थमा के दौरे पड़ सकते हैं, साथ ही यह दिल के दौरे, स्ट्रोक, एरिदमिया को भी बढ़ा सकता है।

बच्चे, वृद्ध, मधुमेह, हृदय और फेफड़ों की बीमारियों वाले रोगी विशेष रूप से स्मॉग के प्रतिकूल प्रभावों के प्रति संवेदनशील होते हैं और इसलिए खुद को बचाने के लिए इन्हें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।”

डॉ. अग्रवाल ने सुझाव देते हुए कहा, “अस्थमा और क्रोनिक ब्रोंकाइटिस वाले मरीजों को स्मॉग वाले दिनों में दवा की खुराक में वृद्धि कर लेनी चाहिए, स्मॉग की स्थिति में जॉगिंग, रनिंग जैसी गतिविधियों से बचें, स्मॉग के दौरान पैदल चलने से बचें, जितना संभव हो बाहर जाने से बचें, स्मॉग के घंटों के दौरान धीरे-धीरे ड्राइव करें, दिल के रोगियों को स्मॉग के दौरान सुबह के टहलना बंद कर देना चाहिए, फ्लू और निमोनिया के टीके लगवा लें।”

–आईएएनएस

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स्वास्थ्य

स्तन कैंसर को महिलाओं के लिए बेहद खतरनाक : डॉ. वी.पी. सिंह

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पटना के सवेरा कैंसर एंड मल्टीस्पेशियल अस्पताल के चर्चित कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. वी.पी. सिंह ने स्तन कैंसर को महिलाओं के लिए बेहद खतरनाक बताते हुए कहा कि इससे बचाव के लिए लोगों में जागरूकता लाने की जरूरत है, जिससे समय रहते इसका निदान हो सके।

उन्होंने चिंता जताते हुए कहा, “हमारे देश में आज भी महिलाएं इसके प्रति जागरूक नहीं है।” डॉ. सिंह ने बताया कि अभी हाल में किए गए एक अध्ययन के मुताकिब, 28 में से एक महिला को अपने जीवनकाल में स्तन कैंसर होता है।

उन्होंने बताया कि शहरी क्षेत्रों में इस बीमारी के मरीजों की संख्या 22 महिलाओं में से एक जबकि ग्रामीण क्षेत्र में 60 में से एक महिलाएं इस बीमारी से जूझ रही हैं। उन्होंने कहा कि स्तन कैंसर के आंकड़े के मामले में भारत पश्चिमी देशों से अलग है। उन्होंने कहा कि भारत में स्तन कैंसर की समस्या 30 से 40 के उम्र में ज्यादा होती है, जबकि पश्चिम में यह 50 साल से अधिक आयु वाली महिलाओं में होता है।

भारत में इसके प्रति जागरूकता और जांच का अभाव काफी देखने को मिलता है, जो अंतिम समय में महिला और उनके परिजनों को पूरी तरह तोड़ देता है। उन्होंने बताया, “पिछले कुछ सालों में भारत में स्तन कैंसर की चपेट में 50 वर्ष से कम उम्र की महिलाएं ज्यादा आई हैं। इसके प्रति जागरूकता का अभाव का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी पहचान तीसरे या चौथे स्टेज में होता है, जब यह रोग मरीज के लिए खतरनाक हो जाता है।”

उन्होंने दावा करते हुए कहा कि अगर इस बीमारी के प्रारंभिक लक्षण का पता लग जाए, तब इलाज काफी आसान हो जाता है और लगभग 80 प्रतिशत मरीज ठीक हो जाते हैं।ऐसे मामले में मरीजों को अंधविश्वास से दूर रहने की चेतावनी देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे चक्कर में ओझा-गुणी से दूर रहना चाहिए। उन्होंने इसके लक्षण की बात करते हुए कहा कि स्तन कैंसर में प्रारंभिक तौर पर स्तन के अंदर दो सेंटीमीटर तक की गांठ बनती है और इससे सूजन, हल्का दर्द, शुरू हो सकता है।

उन्होंने कहा, “अगर शुरुआती दौर में इस बीमारी का पता चल जाए, तब इसका उपचार ऑपरेशन से भी संभव है। इसके अलावा कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी के जरिए भी उपचार संभव हो गया है। इसके लिए बस जागरूक होने की जरूरत है।”

–आईएएनएस

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