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हजारों किसानों की चेतावनी : मांगें माने सरकार, वरना तख्ता पलट देंगे

“2019 के चुनाव से पहले किसानों का यह आंदोलन बहुत अहम है और अगर सरकार इसे पिछले कुछ किसान आंदोलनों की तरह हल्के में लेने की सोच रही है तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल होगी, क्योंकि इस बार सीधा सरकार का तख्तापलट होगा।”

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Farmers Protest
Farmer March in Delhi (Pic Twitter)

नई दिल्ली, 30 नवंबर | देशभर के किसान अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाने एक बार फिर हजारों मील का सफर तय कर राष्ट्रीय राजधानी में आकर मोर्चा संभाले हुए हैं। चार बार आकर गच्चा खा चुके किसान अब धैर्य खोने लगे हैं। वे दो टूक कहने लगे हैं- “अगर अब भी सरकार नहीं जागी तो 2019 के चुनाव में हम अपनी ताकत का अहसास करा देंगे।”

किसानों का यह ‘मुक्ति मोर्चा’ पिछले कुछ किसान आंदोलनों से थोड़ा अलग है। यही वजह है कि राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, सीताराम येचुरी से लेकर मेधा पाटकर, जिग्नेश मेवाणी तक कई विपक्ष के जानेमाने चेहरे यहां किसानों को समर्थन देने पहुंचे।

किसान नेता और सामाजिक कार्यकर्ता आशीष सागर ने आईएएनएस को फोन पर बताया, “2019 के चुनाव से पहले किसानों का यह आंदोलन बहुत अहम है और अगर सरकार इसे पिछले कुछ किसान आंदोलनों की तरह हल्के में लेने की सोच रही है तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल होगी, क्योंकि इस बार सीधा सरकार का तख्तापलट होगा।”

आमतौर पर इस तरह के आंदोलनों के प्रायोजित होने की अफवाहों पर आशीष टका सा जवाब देकर कहते हैं, “हमेशा किसान आंदोलनों को ही प्रायोजित कहा जाता है, मगर किसान सिर्फ अन्नदाता नहीं हैं, किसानों में तख्तापलट करने से लेकर सरकार की ईंट से ईंट बजाने तक की हिम्मत होती है। मैं बुंदेलखंड से हूं, इस वक्त खेती का जो मौसम है, जिस तरह बुवाई छोड़कर दिल्ली में डेरा जमाए हैं, उससे समझा जा सकता है कि किसानों की हालत कितनी दयनीय है और अब वह अपना हक मांगने से पीछे नहीं हटने वाले।”

बुंदेलखंड के भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष शिवनारायण सिंह कहते हैं, “राहुल गांधी से लेकर अरविंद केजरीवाल, सीताराम येचुरी, योगेंद्र यादव, मेधा पाटकर, जिग्नेश मेवाणी यहां मौजूद हैं, ये संकेत है कि केंद्र सरकार हर बार की तरह किसानों को हल्के में नहीं ले।”

आशीष किसानों की आवाज हुक्मरान और जनता तक पहुंचाने में मीडिया की कोताही पर बरसते हुए कहते हैं, “किसानों के मुद्दों को मीडिया कितनी तवज्जो देता है, यह अखबारों से पता चलता है। कल ही के एक राष्ट्रीय दैनिक अखबार में किसान मुक्ति मोर्चा की खबर को कोने में एक कॉलम में जगह दी गई थी, जबकि दीपिका, रणवीर की शादी को इससे ज्यादा कवरेज मिलती है।”

वह कहते हैं, “अगर ये सरकार किसानों की नहीं सुनेगी तो बेशक हाथ-पैर जोड़कर अगली बार भी सत्ता पा ले, लेकिन बहुमत तो शायद ही मिल पाए। सरकार हर बार किसान बीमा योजना की दुहाई देकर हमें बहलाने की कोशिश करती है, लेकिन इसका फायदा किसानों के बजाय बीमा कंपनियों को मिल रहा है। किसान मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार पी.साईंनाथ ने मुझसे कहा था कि यह बहुत बड़ा घोटाला है।”

देश में अब किसान आंदोलन इतने सफल क्यों नहीं होते? इसका कारण बताते हुए आशीष कहते हैं, “किसान अब पूरी तरह से वोटबैंक बन गया है। सभी पार्टियां एक ही थाली के चट्टे-बट्ट हैं, किसी को किसानों की चिंता नहीं है, सब अपनी रोटियां सेंकने में लगे हैं। ये जब सरकार में नहीं होंगे तो दूसरे पर आरोप लगाएंगे और जब खुद सरकार में होंगे तो चुप्पी साधकर बैठ जाएंगे।”

किसानों की मांग है कि कर्जमाफी के साथ एक कठोर नीति भी बननी चाहिए। किसानों के कर्ज और उपज की लागत को लेकर पेश दो प्राइवेट मेंबर्स बिल संसद में पारित हों।

–आईएएनएस

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क्या कांग्रेस मप्र की जनता की आवाज सुनेगी?

राज्य की जनता ने भाजपा को सत्ता से उतारकर कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका दिया है। कांग्रेस क्या वास्तव में जनता की मंशा और भाव को समझ पा रही है? इस पर थोड़े सवाल उठ रहे हैं

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farmer strike in madhya pradesh

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में जनता ने किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया है, मगर कांग्रेस को बहुमत के करीब लाकर खड़ा कर दिया है। कांग्रेस सरकार बनाने जा रही है, बस सवाल एक ही उठ रहा है कि क्या कांग्रेस आलाकमान जनता की आवाज सुनेगी या राजनीतिक गणित के चलते अपना फैसला सुनाएगी।

राज्य के विधानसभा चुनाव के 11 दिसंबर की देर रात तक नतीजे आ गए, उसके बाद बुधवार को कांग्रेस विधायकों की भोपाल में बैठक बुलाई गई। इस बैठक में केंद्रीय पर्यवेक्षक के तौर पर ए.के. एंटनी आए, उन्होंने विधायकों की बैठक की, एक लाइन का प्रस्ताव पारित किया गया, जिसके जरिए मुख्यमंत्री चुनने का अधिकार पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को दिया गया। उसके बाद गुरुवार को प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और प्रचार अभियान समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने कई दौर की बात की।

कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी ने पर्यवेक्षक बनाकर भेजे गए एंटोनी की रिपोर्ट, शक्ति एप के जरिए पार्टी कार्यकर्ताओं से ली गई राय और नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों से आए नतीजों के साथ आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर रखकर कमलनाथ व सिंधिया की मौजूदगी में सभी प्रमुख नेताओं से चर्चा की। राहुल गांधी के साथ हुई बैठक में कमलनाथ, सिंधिया, एंटनी, प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया मौजूद रहे।

इतना ही नहीं, मप्र में मुख्यमंत्री को लेकर चल रही खींचतान के बीच सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी भी राहुल गांधी के आवास पर पहुंचीं। कहा जा रहा है कि मप्र के मुख्यमंत्री के मसले पर राहुल गांधी से सोनिया और प्रियंका ने भी चर्चा की।

वरिष्ठ पत्रकार रवींद्र व्यास का कहना है कि राज्य की जनता ने भाजपा को सत्ता से उतारकर कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका दिया है। कांग्रेस क्या वास्तव में जनता की मंशा और भाव को समझ पा रही है? इस पर थोड़े सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि दिल्ली में मुख्यमंत्री के नाम को लेकर कई घंटों तक माथापच्ची चली।

व्यास ने आगे कहा कि पार्टी हाईकमान कोई ऐसा फैसला भी नहीं करना चाहती, जिससे प्रदेश के मतदाताओं में नकारात्मक संदेश जाए। कांग्रेस को अंदेशा है कि अगर नकारात्मक संदेश चला गया, कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ गया तो लोकसभा चुनाव में संभावनाओं को बनाए रखना आसान नहीं होगा।

विधानसभा चुनाव में सफलता मिलने से कार्यकर्ताओं का उत्साह उफान पर है। राज्य के विभिन्न हिस्सों से सैकड़ों की तादाद में कार्यकर्ता राजधानी पहुंच चुके हैं। प्रदेश कार्यालय के बाहर सुबह से ही कार्यकर्ताओं का जमावड़ा है, कमलनाथ और सिंधिया के कटआउट, पोस्टर हाथ में थामे कार्यकर्ता जिंदाबाद के नारे लगाने में लगे हैं।

By : संदीप पौराणिक

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चुनाव

अब भारत से EVM का अलविदा होना ज़रूरी है!

EVM की तारीफ़ इसलिए भी की जाती थी कि इससे मतदान के नतीज़े महज कुछ घंटों में ही मिल जाते थे। लेकिन ताज़ा विधानसभा चुनाव की तमाम सीटों पर नतीज़े आने में 24 घंटे तक का वक़्त लग गया। इतना वक़्त तो बैलेट के दौर में पहले कभी नहीं लगा।

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evm

इतिहास बताता है कि तकनीकें न तो चिरजीवी होती हैं और ना कालजयी। हरेक तकनीक का अपना कार्यकाल होता है। नयी तकनीकें जन्म लेती हैं तो पुरानी का सफ़ाया होता है। EVM भी एक तकनीकी उपकरण है। इसका जीवन-काल पूरा हो चुका है! अब हमें वापस बैलेट यानी मतपत्र की ओर लौटना होगा। ये काम जितनी जल्दी होगा, उतना ही लोकतंत्र फ़ायदे में रहेगा। ताज़ा विधानसभा चुनावों ने उन आरोपों को और पुख्ता किया है कि EVM में घपला हो सकता है। बेशक़, ये हुआ भी है! तर्कवादी इसका सबूत चाहेंगे। ये स्वाभाविक है। मेरे पास घपलों के सबूत नहीं हैं। लेकिन प्रति-तर्क ज़रूर हैं।

सार्वजनिक जीवन में ‘छवि’ यानी इमेज़ का सबसे ज़्यादा महत्व है। EVM पर जितने लाँछन लगे हैं, उससे उसकी छवि कलंकित हुई है। ये लाँछन उन्हीं लोगों के हैं, जिन्हें EVM को विश्वसनीय बताना चाहिए। जब खिलाड़ी ही अम्पायर पर शक़ करें, तब अम्पायर को निष्ठा का निष्कलंकित होना अनिवार्य होना चाहिए। दर्जनों राजनीतिक दलों ने EVM की सच्चाई पर सवाल उठाये हैं। वैसे भी EVM में अब वो गुण भी नहीं रहे, जिसने कभी इसे श्रेष्ठ बनाया था।

मसलन, EVM की वजह से ये बात अब गोपनीय नहीं रह जाती कि किसी मतदान केन्द्र के मतदाताओं की पसन्द क्या रही है? कभी वोटों की गिनती से पहले EVM को बैलेट की तरह मिलाया जाता था ताकि मतदान की गोपनीयता पर आँच नहीं आये, लेकिन EVM में हुए घपलों को देखते हुए अब हरेक मशीन के आँकड़ों को अलग-अलग हासिल किया जाता है। कभी EVM की तारीफ़ इसलिए भी की जाती थी कि इससे मतदान के नतीज़े महज कुछ घंटों में ही मिल जाते थे। लेकिन ताज़ा विधानसभा चुनाव की तमाम सीटों पर नतीज़े आने में 24 घंटे तक का वक़्त लग गया। इतना वक़्त तो बैलेट के दौर में पहले कभी नहीं लगा।

EVM की ये भी तारीफ़ हुआ करती थी कि इससे बूथ कब्ज़ा करने वाले हतोत्साहित होते हैं। कभी ऐसा हुआ भी, लेकिन अब लोगों ने बेईमानी करने के नये-नये हथकंडे विकसित कर लिये हैं। जैसे मशीन की जाँच करने वाले Mock Poll की क़वायद को भी पोलिंग एजेंट की मिलीभगत से भ्रष्ट किया जा चुका है। ताज़ा चुनावों में तो कई ऐसे वीडियो भी वायरल हुए कि मतदान कर्मी EVM को लेकर उन जगहों पर जा पहुँचे जहाँ उनका होना पूरी तरह से ग़ैरक़ानूनी था। EVM के पक्ष में दलील भी थी कि इससे मतपत्र वाले काग़ज़ों की भारी बचत होती है। लेकिन अब साफ़ दिख रहा है कि ये बचत भारतीय लोकतंत्र के लिए काफ़ी भारी पड़ी है।

हमने देखा है कि मोदी राज ने उस EVM की ख़ूब तरफ़दारी की, जिसे लेकर ख़ुद उसने ही उस दौर में भरपूर हॉय-तौबा मचायी थी, जब वो विपक्ष में थी। लिहाज़ा, क्या वजह है कि सत्ता में आने के बाद बीजेपी को EVM पसन्द आने लगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने EVM में सेंधमारी की तकनीक को साध लिया है! 2014 के बाद हुए तमाम विधानसभा चुनावों में EVM की सच्चाई पर सवाल दाग़े गये। सुप्रीम कोर्ट के दख़ल के बाद चुनाव आयोग ने भी अपनी साख बचाने के लिए VVPAT (Voter-verified paper audit trail) की जुगत अपनायी। लेकिन इससे भी EVM की प्रतिष्ठा बहाल नहीं हुई।

EVM की तकनीक और मशीन यदि बेदाग़ होती तो आज सारी दुनिया में इसका डंका बज रहा होता। बेहतर तकनीक अपनी जगह बना ही लेती है। जीवन का कोई भी क्षेत्र नयी तकनीक से अछूता नहीं रहता। टेलिग्राम को किसने ख़त्म किया? पेज़र कहाँ चले गये? बजाज स्कूटर को कौन निगल गया? LED लाइट्स ने पुराने बल्ब-ट्यूब का क्या हाल किया? ऐसे असंख्य उदाहरण हैं। लेकिन तकनीक के बेहिसाब विस्तार के बावजूद तमाम विकसित देशों ने EVM को आज़माने के बाद इसे अनफिट ही क्यों पाया? क्यों चुनाव फिर से बैलेट पर ही लौट गये? वजह साफ़ है कि EVM की ख़ामियाँ, उसकी ख़ूबियों पर भारी पड़ीं! ये तर्क अकाट्य हैं।

सबसे बड़ा आरोप ये है कि EVM के हैकर्स विकसित हो चुके हैं! लेकिन चुनाव आयोग की ज़िद है कि मेरे सामने EVM को हैक करके दिखाओ, तभी मानेंगे कि हैकिंग सम्भव है! दुर्भाग्यवश, वो ये समझने को तैयार नहीं है कि करोड़ों-अरबों रुपये का वारा-न्यारा करने वाले हैकर्स और उनका फ़ायदा लेने वाले लोग क्यों अपने पाँव पर ही कुल्हाड़ी मारने को तैयार होंगे? इनसे ये अपेक्षा रखना नादानी होगी कि वो चुनाव आयोग की सनक को मिटाने के लिए अपनी कामधेनु का बलिदान दे दें!

अब तो ऐसे भी संकेत मिल रहे हैं कि EVM के हैकर्स, चुनाव जीतने और हारने वाली यानी दोनों पार्टियों से सौदा कर रहे हैं। जनाक्रोश से बचने के लिए वो हारने वाली पार्टियों की सीटों को सम्मानजनक बना रहे हैं तो जीतने वाले की जीत का अन्तर घटा रहे हैं। ये बात सच हो या अफ़वाह, लेकिन लोकतंत्र के लिए इसका किसी भी रूप में होना ही कोई कम नुकसानदायक नहीं है। सीता की अग्निपरीक्षा तो लंका में ही हो चुकी थी। फिर भी राम ने उन्होंने अयोध्या से बाहर इसलिए कर दिया क्योंकि एक धोबी ने सीता के शील-स्वभाव पर निराधार ही सही, लेकिन सन्देह की जता दिया था! EVM पर तो सन्देहों का भरमार है। बेचारे स्ट्रॉग रूम में भी महफ़ूज़ नहीं रहते! लिहाज़ा, अब EVM का अलविदा होना बेहद ज़रूरी है।

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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नोटबंदी ने राजनीतिक, आर्थिक उलझनें पैदा की : अरविंद सुबह्मण्यम

“इसका प्रमुख कारण भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था की एक व्यापक समझ में छिपा हुआ है, इस बारे में कि लोग वोट कैसे करते हैं।”

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Arvind Subramanian

नई दिल्ली, 9 दिसम्बर | देश के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुबह्मण्यम ने नोटबंदी और जीडीपी के आंकड़ों में संबंध स्थापित करते हुए कहा है कि नोटबंदी के कारण पैदा हुई उलझन के दोहरे पक्ष रहे हैं। क्या जीडीपी के आंकड़ों पर दिखे इसके प्रभाव ने एक लचीली अर्थव्यवस्था को प्रतिबिंबित किया है, और क्या वृद्धि दर के आंकड़ों ने आधिकारिक डेटा संग्रह प्रक्रिया पर सवाल खड़ा किए हैं।

सुबह्मण्यम इस समय हार्वर्ड केरेडी स्कूल में पढ़ा रहे हैं। वह यहां पेंगुइन द्वारा प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘ऑफ काउंसिल : द चैलेंजेस ऑफ द मोदी-जेटली इकॉनॉमी’ के विमोचन समारोह में हिस्सा लेने आए थे।

उन्होंने आईएएनएस के साथ एक बातचीत में पुस्तक के एक अध्याय ‘द टू पजल्स ऑफ डीमोनेटाइजेशन-पॉलिटिकल एंड इकॉनॉमिक’ का जिक्र किया।

उन्होंने अपनी पुस्तक में मौजूद दूसरे पजल का भी जिक्र किया, और यह पजल है भारत में पलायन और आर्थिक वृद्धि जैसी समकारी ताकतों के बावजूद क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में विचलन। उन्होंने कहा कि राज्यों की एक गतिशीलता प्रतिस्पर्धी संघवाद के तर्क के खिलाफ होती है।

उन्होंने कहा, “अपनी नई पुस्तक के जरिए मैं इस पजल (उलझन), नोटबंदी के बाद नकदी में 86 प्रतिशत कमी की बड़ी उलझन, बावजूद इसके अर्थव्यवस्था पर काफी कम असर की तरफ ध्यान खींचने की कोशिश की है।”

सुबह्मण्यम ने कहा, “ये उलझनें खासतौर से इस सच्चाई से पैदा होती हैं कि यह कदम राजनीतिक रूप से क्यों सफल हुआ, और जीडीपी पर इसका इतना कम असर हुआ..क्या यह ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हम जीडीपी को ठीक से माप नहीं रहे हैं, अनौपचारिक क्षेत्र को नहीं माप रहे हैं, या यह अर्थव्यवस्था में मौजूद लचीलेपन को रेखांकित कर रहा है?”

सुबह्मण्यम ने अपनी किताब में लिखा है, “नोटबंदी के पहली छह तिमाहियों में औसत वृद्धि दर आठ प्रतिशत थी और इसके बाद सात तिमाहियों में औसत वृद्धि दर 6.8 प्रतिशत।”

उन्होंने कहा, “इसका प्रमुख कारण भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था की एक व्यापक समझ में छिपा हुआ है, इस बारे में कि लोग वोट कैसे करते हैं।”

उन्होंने केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जीडीपी के बैक सीरीज डेटा को जारी करने के दौरान नीति आयोग की उपस्थिति को लेकर जारी विवाद का जिक्र किया। जीडीपी के इस आंकड़े में आधार वर्ष बदल दिया गया, और पूर्व की संप्रग सरकार के दौरान देश की आर्थिक विकास दर को कम कर दिया गया।

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि जीडीपी की गणना एक बहुत ही तकनीकी काम है और तकनीकी विशेषज्ञों को ही यह काम करना चाहिए। जिस संस्थान के पास तकनीकी विशेषज्ञ नहीं हैं, उसे इसमें शामिल नहीं होना चाहिए।”

सुब्रह्मण्यम ने कहा, “जब मानक बहुत ऊंचे होंगे और वृद्धि दर फिर भी समान रहेगी तो अर्थशास्त्री स्वाभाविक रूप से सवाल उठाएंगे। यह आंकड़े की विश्वसनीयता को लेकर उतना नहीं है, जितना कि आंकड़े पैदा करने की प्रक्रिया को लेकर और उन संस्थानों को लेकर जिन्होंने इस काम को किया है।”

क्या नोटबंदी पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में वह शामिल थे? सुब्रह्मण्यम ने कहा, “जैसा कि मैंने किताब में कहा है, यह कोई निजी संस्मरण नहीं है..यह गॉसिप लिखने वाले स्तंभकारों का काम है।”

सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बीच हाल के गतिरोध के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि आरबीआई के स्वायत्तता की हर हाल में रक्षा की जानी चाहिए, क्योंकि संस्थानों के मजबूत रहने से देश को लाभ होगा।

उन्होंने कहा, “मैंने इस बात की खुद वकालत की है कि आरबीआई को एक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, लेकिन इसके अधिशेष कोष को खर्च के लिए नियमित वित्तपोषण और घाटा वित्तपोषण में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। यह आरबीआई पर छापा मारना जैसा होगा।”

–आईएएनएस

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