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संघी ट्रोल ये झूठ क्यों फैला रहे हैं कि नेहरू ने अपनी बीमार पत्नी का ख़्याल नहीं रखा?

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nehru kamla

1925 से ही झूठ और अफ़वाह फ़ैलाना संघियों का स्थायी स्वभाव रहा है। आज़ादी से पहले जहाँ काँग्रेस की अगुवाई में चल रहे स्वतंत्रता आन्दोलन में पलीता लगाना संघ का मक़सद था, वहीं आज़ादी के बाद जब चुनाव दर चुनाव भारत की जनता संघियों को नकारती रही तो उन्होंने झूठ की बदौलत विरोधियों का चरित्र-हनन करने को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। इसी उद्देश्य के तहत जवाहर लाल नेहरू को लेकर असंख्य झूठ गढ़े और फैलाये गये। फिर भी जनता को संघियों पर यक़ीन नहीं हुआ। गाँधी के हत्यारों की जमात को जनता ने हमेशा हाशिये पर ही रखा। आगे चलकर चरित्र-हनन के दायरे में इन्दिरा, राजीव, सोनिया और राहुल जैसे गाँधी-नेहरू परिवार के हरेक सदस्य को खींच लिया गया।

मज़े की बात ये है कि संघियों को जब-जब लगता है कि उनकी प्रतिष्ठा गिर रही है, तब-तब उनके ट्रोल्स सोशल मीडिया और ख़ासकर WhatsApp पर झूठ की सप्लाई बढ़ा देते हैं। अभी चुनावी माहौल में गुजरात के ट्रोल्स ने निम्न मैसेज़ को वायरल कर दिया है। आपकी जानकारी के लिए हम उस मैसेज़ को हूबहू यहाँ कॉपी-पेस्ट कर रहे हैं। साथ ही पूरे प्रसंग की सच्चाई भी बता रहे हैं। ताकि नयी पीढ़ी को बरगलाना मुमकिन नहीं हो सके।

WhatsApp पर फैलाया जा रहा झूठ

जवाहर लाल नेहरु ने अपनी पत्नी के साथ जो किया वो इतना भयावह था की जान कर आप नेहरु से नफरत करने लगेंगे..

टीवी चैनेल पर कांग्रेस पार्टी के नेताओ के द्वारा अक्सर ये आरोप लगते हुए सुना जाता है की प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी पत्नी को छोड़ दिया. लेकिन क्या आप को यह पता है जवाहर लाल नेहरु ने अपनी पत्नी के साथ क्या किया?

जवाहरलाल नेहरु की पत्नी कमला नेहरु को टीबी हो गया था.. उस जमाने में टीबी की दहशत ठीक ऐसा ही थी जैसे आज एड्स की है.. क्योंकि तब टीबी का इलाज नही था और इन्सान तिल तिल तडप तडप कर पूरी तरह गलकर हड्डी का ढांचा बनकर मरता था… और कोई भी टीबी मरीज के पास भी नहीं जाता था क्योंकि टीबी सांस से फैलती थी… लोग मरीजोंको पहाड़ी इलाके में बने टीबी सेनिटोरियम में भर्ती कर देते थे..

नेहरु ने अपनी पत्नी को युगोस्लाविया [आज चेक रिपब्लिक] के प्राग शहर में दुसरे इन्सान के साथ सेनिटोरियम में भर्ती कर दिया..

कमला नेहरु पुरे दस सालो तक अकेले टीबी सेनिटोरियम में पल पल मौत का इंतजार करती रही.. लेकिन नेहरु दिल्ली में एडविना बेंटन के साथ इश्क करते थे.. सबसे शर्मनाक बात तो ये है की इस दौरान नेहरु कई बार ब्रिटेन गये लेकिन एक बार भी उन्होंने प्राग जाकर अपनी धर्मपत्नी का हालचाल नही लिया.

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को जब पता चला तब वो प्राग गये.. और डाक्टरों से और अच्छे इलाज के बारे में बातचीत की.. प्राग के डाक्टरों ने बोला की स्विट्जरलैंड के बुसान शहर में एक आधुनिक टीबी होस्पिटल है जहाँ इनका अच्छा इलाज हो सकता है..

तुरंत ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने उस जमाने में 70 हजार रूपये इकट्ठे किये और उन्हें विमान से स्विटजरलैंड के बुसान शहर में होस्पिटल में भर्ती किया..

लेकिन कमला नेहरु असल में मन से बेहद टूट चुकी थी.. उन्हें इस बात का दुःख था की उनका पति उनके पास पिछले दस सालो से हाल चाल लेने तक नही आया और गैर लोग उनकी देखभाल कर रहे है..दो महीनों तक बुसान में भर्ती रहने के बाद 28 February 1936 को बुसान में ही कमला नेहरु की मौत हो गयी..

उनके मौत के दस दिन पहले ही नेताजी सुभाषचन्द्र ने नेहरु को तार भेजकर तुरंत बुसान आने को कहा था.. लेकिन नेहरु नही आये.. फिर नेहरु को उनकी पत्नी की मौत की खबर भेजी गयी.. फिर भी नेहरु अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार में भी नही आये..

अंत में स्विटजरलैंड के बुसान शहर में ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने नेहरु की पत्नी कमला नेहरु का अंतिम संस्कार करवाया. जिस व्यक्ति ने अपनी पत्नी के साथ ऐसा व्यवहार किया उसे हम चाचा नेहरू कहते हैं।

यह मेसेज इतना फैलाओ की मोदी मजबुर हो जावे और चाचा की पदवी निकाल ली जावे.

कमला नेहरू के उपरोक्त प्रसंग की सच्चाई

1. ये व्याख्या ही पूरी तरह से भ्रष्ट है कि नेहरू के नक्शे-क़दम पर चलकर नरेन्द्र मोदी ने अपनी पत्नी जशोदाबेन को लावारिस छोड़ दिया! पहला सवाल ये है कि क्या जशोदाबेन भी लाइलाज़ और जानलेवा तपेदिक (टीबी) से पीड़ित थीं कि मोदी ने उनके साथ सात-फेरों की लाज़ नहीं निभायी? यदि नहीं, तो ये तुलना वैसी ही है जैसे किसी Reptile या Insect की तुलना Mammal से की जाए? ऐसा सिर्फ़ लोगों को मूर्ख बनाने के लिए ही किया जा सकता है। लिहाज़ा, ये समझना बहुत ज़रूरी है कि आपको कौन मूर्ख बना रहा है और क्यों? ऐसा करके वो क्या हासिल करना चाहता है?

2. जवाहर लाल नेहरू और उनकी पत्नी कमला नेहरू का वैवाहिक जीवन बेहद सुखमय था। कमला अपने पति जवाहर और बेटी इन्दिरा के लिए बहुत बड़ी प्रेरणा स्रोत थीं। अपने पूरे परिवार की तरह कमला भी आज़ादी के परवानों में शुमार थीं। बीमार होने से पहले तक कमला नेहरू ने स्वतंत्रता आन्दोलन में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। कमला के तमाम क्रियाकलाप सबूतों के साथ मौजूद हैं। लेकिन वो आपको कभी नहीं बताया जाएगा। क्योंकि संघी ट्रोल्स का मक़सद नेहरू ख़ानदान का चरित्रहनन करना है, जो तरह-तरह के झूठ फैलाने के सिवाय किसी और तरीके से नहीं हो सकता!

3. पोस्ट में लिखी ये बात सही है कि उस ज़माने में टीबी को लेकर जो दहशत थी, वैसी तो आज एड्स को लेकर भी नहीं है। क्योंकि टीबी का संक्रमण हवा में फैलता है। लेकिन एड्स के मामले में ऐसा नहीं है। इसीलिए तब टीबी के मरीज़ों को एकान्त में रखा जाता था। गाँवों में तो लोग अपने घरों से दूर अलग कमरा या झोपड़ी बनाकर मरीज़ को रखकर उसकी यथासम्भव सेवा करते थे। तब अमीर हो या ग़रीब, टीबी के हरेक मरीज़ को जीर्णहीन बनने तक अपनी मौत का इन्तज़ार ही करना पड़ता था। हालाँकि, सम्पन्न होने की वजह से मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरू ने कमला नेहरू का यथासम्भव इलाज़ करवाया था।

4. कमला नेहरू का जन्म 1 अगस्त 1899 को हुआ। 17 साल की उम्र में 8 फरवरी 1916 को जवाहर लाल से उनकी शादी हुई। 19 नवम्बर 1917 को इन्दिरा प्रियदर्शिनी का जन्म हुआ। इसके सात साल बाद अक्टूबर 1924 में कमला नेहरू ने एक पुत्र को भी जन्म दिया। लेकिन वो हफ़्ते भर में ही चल बसा। अपने सास-ससुर और पति की तरह कमला भी स्वतंत्रता सेनानी थीं। उन्होंने 1921 के असहयोग आन्दोलन में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। इलाहाबाद में महिलाओं के कई दस्ते बनाकर विदेशी कपड़ों और शराब की होली जलाये जाने की मुहिम का नेतृत्व किया। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान जवाहर लाल नौ बार जेल गये। असहयोग आन्दोलन के वक़्त जब अँग्रेज़ों ने देशद्रोहपूर्ण भाषण देने के लिए उन्हें जेल में डाल दिया तो कमला नेहरू ने पति की जगह उनका भाषण पढ़ा। इसी वजह से जल्द ही अँग्रेज़ों को कमला नेहरू भी बेहद ख़तरनाक लगने लगीं। इसीलिए, उन्हें अपनी सास स्वरूपरानी और सरोजिनी नायडू के साथ दो बार जेल जाना पड़ा।

5. 1934 के आख़िरी महीनों में कमला नेहरू की सेहत अक्सर ख़राब रहने लगी। तब उनकी देखरेख के लिए इलाहाबाद के स्वराज भवन में एक डिस्पेंसरी बनवायी गयी। इसमें ही स्वतंत्रता आन्दोलन के घायलों का उपचार भी होने लगा। लेकिन 1935 के शुरुआती महीनों में जब ये पता चला कि कमला को टीबी हो गया है, तब उन्हें नैनीताल के भोवाली सैनिटोरियम में भेज दिया गया। वहाँ कमला 10 मार्च से 15 मई 1935 तक रहीं। उस वक़्त जवाहर लाल नेहरू, अलमोड़ा जेल में बन्द थे। भोवाली में जब कमला की सेहत कुछ सुधरी तब उन्हें वहीं से स्विटज़रलैंड भेजा गया। जहाँ से 1935 में वो कुछ स्वस्थ होकर भारत लौटीं भी। लेकिन थोड़े समय में ही उनकी तबीयत फिर से बिगड़ गयी तो उन्हें वापस स्विटज़रलैंड ले जाया गया। वहीं, कमला ने 28 फरवरी 1936 को अन्तिम साँस ली।

6. इससे पहले, कमला की बिगड़ी सेहत के आधार पर जवाहर लाल नेहरू को जेल से पैरोल मिला तो वो अक्टूबर 1935 में कमला से मिलने स्विटज़रलैंड भी गये थे। मृत्यु के बाद कमला को स्विटज़रलैंड में ही दफ़्नाना पड़ा, क्योंकि टीबी संक्रमण के वजह से न तो उनके शव को भारत लाना सम्भव था और न ही वहाँ उनका दाह-संस्कार करने की अनुमति थी।

7. कमला के निधन के बाद उनकी याद में महात्मा गाँधी ने स्वराज भवन की डिस्पेंसरी को एक बड़े अस्पताल में तब्दील करवा दिया। वही कमला नेहरू अस्पताल आज भी इलाहाबाद का एक बहुत बड़ा महिला अस्पताल है, जिसे सरकार नहीं बल्कि ट्रस्ट चलाता है। कमला की बीमारी के वक़्त नेहरू परिवार पर आज़ादी के आन्दोलन का जुनून इस क़दर सवार था कि ख़ुद नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ‘मैंने उसकी बहुत अनदेखी की! उसकी मौत से मैं तबाह हो चुका था! कई महीने तक मैं शोक में डूबा रहा!’ ज़रा सोचिए कि ये शब्द अफ़सोस या पश्चाताप के हैं या बिगड़े दाम्पत्य के प्रतीक? लेकिन नेहरू का चरित्रहनन करने वाले इसे कभी नहीं समझ पाएँगे!

8. संघियों के घृणित पोस्ट में लिखे गये ‘प्राग, बुसान, 70 हज़ार रुपये इक्कठा करना और एडविना से इश्क़’ की कहानी भी कपोल-कल्पना है। कमला कभी प्राग़ के किसी टीबी सैनिटोरियम में भर्ती नहीं रहीं। न ही सुभाष चन्द्र बोस ने उन्हें प्राग से स्विटज़रलैंड भिजवाने जैसा कोई काम किया। हाँ, ये सही है कि जब काँग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू जेल में थे तो बोस ने वियना (आस्ट्रिया) की यात्रा की थी। वहीं से वो स्विटज़रलैंड के बडेनवीलर में टीबी सैनिटोरियम में भर्ती कमला नेहरू को देखने भी गये थे। उन्होंने ही जवाहर को तार भेजकर उनके अन्तिम दिनों में होने की इत्तेला भी दी थी। उसी तार के आधार पर नेहरू को जेल से पैरोल मिला। लेकिन जवाहर और इन्दिरा के बडेनवीलर पहुँचने से पहले कमला ने दम तोड़ दिया। इस दौरान सुभाष चन्द्र बोस वहीं रुके रहे, क्योंकि उनकी जवाहर लाल नेहरू से शानदार दोस्ती थी। सुभाष ने ही कमला के अन्तिम संस्कार का सारा इन्तज़ाम भी सम्भाला था।

9. नेहरू और बोस के रिश्ते इतने प्रगाढ़ थे कि ख़ुद नेहरू ने 1937 में अपने बाद सुभाष को ही काँग्रेस का अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव रखा था। इसका महात्मा गाँधी ने भी समर्थन किया था। कमला के निधन के बाद, सुभाष के विदेश से लौटते ही मई 1936 में अँग्रेज़ों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया था। सुभाष चन्द्र बोस की मौत आज़ादी से दो साल पहले 18 अगस्त 1945 को ताइवान में हुए एक विमान हादसे में हुई। लेकिन संघियों ने हमेशा उनकी मौत को लेकर ख़ूब दुष्प्रचार किया। अफ़वाह फैलायी गयी कि नेहरू ने सुभाष को मरवा दिया। बोस की मौत को लेकर कई जाँच आयोग भी बने। इस बीच भी संघी झूठ फैलाते रहे कि सुभाष की मौत से जुड़ी ‘फ़ाइलों’ में ऐसी गोपनीय बातें हैं जिससे नेहरू-गाँधी परिवार और काँग्रेस शर्मसार हो सकती है, इसलिए उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जाता!

10. सुभाष की बदौलत नेहरू का चरित्र-हनन करने वाले इस सच्चाई को बिल्कुल भुला देते हैं कि नेहरू और बोस, दोनों ही काँग्रेस के समाजवादी खेमे के नेता थे। उनके बीच कोई निजी मतभेद नहीं था। अलबत्ता, सुभाषचन्द्र बोस की ‘सैन्यवादी प्रवृत्ति’ को गाँधी और नेहरू जैसे उनके अनुयायी उचित नहीं मानते थे। नेहरू और बोस के बीच परस्पर सम्मान ऐसा था कि सुभाष चन्द्र बोस ने जब आज़ाद हिन्द फ़ौज बनायी तो उसके एक ब्रिगेड का नाम ‘नेहरू’ रखा गया! यहाँ तक कि गाँधीजी को भी ‘राष्ट्रपिता’ का सम्बोधन देने वाले नेताजी ही थे!

11. नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद, संघियों ने एक बार फिर से अपनी चरित्र-हनन की रणनीति को ख़ूब हवा दी। वो जहाँ-तहाँ सरदार पटेल, आम्बेडकर, सुभाष चन्द्र बोस जैसे नेताओं से अपनी और संघ परिवार की वैचारिक नज़दीकियाँ दिखाने का भ्रम फैलाने लगे। जबकि इसमें लेस-मात्र भी सच नहीं है। इस बात के असंख्य सबूत मौजूद हैं कि काँग्रेस के ये सभी महान नेता संघियों को बुरी तरह से नापसन्द करते थे, जो महात्मा गाँधी की हत्या के बाद काफ़ी बढ़ चुकी थी। मोदी राज में ‘बोस फ़ाइल्स’ का ख़ूब हल्ला मचाया गया। तब जनवरी 2016 में बोस से जुड़ी कई गोपनीय फ़ाइलें सार्वजनिक भी गयीं। लेकिन इससे जो तथ्य सामने आये, उससे तो भगवा ख़ानदान के हाथ से तोते ही उड़ गये। दशकों से संघियों की ओर फैलाये जा रहे दुष्प्रचार पर भी पानी फिर गया।

12. इन्हीं ‘बोस फ़ाइल्स’ से पहली बार पता चला कि जवाहर लाल नेहरू ने वियना में रह रही सुभाष चन्द्र बोस की बेटी अनिता बोस को हर महीने आर्थिक मदद भिजवाने की व्यवस्था की थी। इसके लिए 23 मई 1954 को ‘अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी’ (एआईसीसी) ने नेताजी की बेटी अनिता बोस के लिए 2 लाख रुपये की पूँजी से एक ट्रस्ट बनाया। नेहरू और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिधान चन्द्र रॉय, इसके ट्रस्टी थे। ट्रस्ट के ज़रिये अनिता बोस को हर महीने 500 रुपये की आर्थिक मदद दी जाती थी। 23 मई 1954 को नेहरू की ओर से हस्ताक्षरित एक दस्तावेज़ के अनुसार, “डॉ. बी. सी. राय और मैंने आज वियना में सुभाष चन्द्र बोस की बच्ची के लिए एक ट्रस्ट डीड पर हस्ताक्षर किये हैं। दस्तावेज़ों को सुरक्षित रखने के लिए मैंने उनकी मूल प्रति एआईसीसी को दे दी है।”

13. 1954 से लेकर 1964 तक तक अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी की ओर से अनिता बोस को सालाना 6,000 रुपये की मदद भेजी जाती रही। इसे 1965 में अनिता की शादी के बाद बन्द कर दिया गया। यहाँ ये समझना भी बहुत ज़रूरी है कि उस ज़माने में 500 रुपये महीना अपने आप में ख़ासी बड़ी रक़म थी, क्योंकि इतना वेतन तो बड़े-बड़े अफ़सरों का भी नहीं होता था! इस प्रसंग का एक दिलचस्प पहलू ये भी रहा कि जवाहर लाल नेहरू ने कभी अपनी नेक़-दिली का ढिंढ़ोरा नहीं पीटा। यहाँ तक कि इन्दिरा, राजीव, सोनिया और राहुल वग़ैरह ने भी कभी इन जानकारियों का सियासी लाभ बटोरने की कोशिश नहीं की। एक ओर ये ऐतिहासिक तथ्य हैं और दूसरी ओर है संघियों की जगज़ाहिर बदनीयत!

आख़िर में मेरी बात

संघियों के झूठ से भरा उपरोक्त पोस्ट जब मेरे पास आया तो मैंने उसे मेरे पास फ़ारवर्ड करने वाले व्यक्ति को पूरी सच्चाई लिखकर भेजी। वो भी इस आग्रह के साथ कि वो भी मेरे जबाव को उन लोगों को फ़ारवर्ड कर दें, जो झूठ के फ़ैक्ट्री के मुफ़्त के सेल्समैन बन जाते हैं। इस तरह यदि उन सभी लोगों तक सच्चाई पहुँच जाएगी जिनके दिमाग़ में लगातार झूठ का ज़हर भरा जा रहा है, तो आने वाले पीढ़ियाँ ग़ुमराह होने से बच जाएँगी और संघियों को मंसूबों पर पानी फिर जाएगा।

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ज्यादातर पाकिस्तानी नहीं जानते इंटरनेट क्या है : सर्वेक्षण

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इस्लामाबाद, 12 नवंबर | पाकिस्तान में 15 साल से लेकर 65 साल की उम्र के 69 फीसदी लोगों को नहीं मालूम है कि इंटरनेट क्या होता है। यह बात सूचना-संचार प्रौद्योगिकी है(आईसीटी) आधारित एक सर्वेक्षण में प्रकाश में आई है। श्रीलंका के थिंक टैंक लाइर्नी एशिया द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट सोमवार को डॉन में प्रकाशित हुई है। रिपोर्ट पाकिस्तान के 2,000 लोगों के सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गई है।

सर्वेक्षक थिंक टैंक ने दावा किया है कि नमूने की प्रक्रिया के तहत राष्ट्रीय स्तर पर 15 साल से 65 साल की उम्र की 98 फीसदी आबादी के प्रतिनिधित्व सुनिश्चित की गई है।

लाइनर एशिया की सीईओ हेलनी गलपाया ने कहा, “पाकिस्तान दूरसंचार प्राधिकरण (पीटीए) की वेबसाइट में 15.2 करोड़ सक्रिय सेल्युलर फोन धारक हैं। चाहे वे आदमी हो या औरत, गरीब हो या अमीर लेकिन वे नहीं एप्स का उपयोग करना नहीं जानते हैं।”

–आईएएनएस

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ज़हर उगलने वाले 13 सेकेंड के इस वीडियो को क्या आपने देखा!

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जैसे शरीर के तपने का मतलब बुख़ार होता है, वैसे ही जब फेंकू ख़ानदान Fake News/Views/Video पर उतर आये तो समझ लीजिए कि अपने पतन की आहट सुनकर वो बदहवासी में झूठ तथा अफ़वाह की उल्टियाँ कर रहा है! क्योंकि झूठ किसी को हज़म नहीं होता, भक्तों का पाचन-तंत्र भी इसे हज़म नहीं कर पाता है! लिहाज़ा, भक्तों को भी उल्टी-दस्त यानी डीहाइड्रेशन की तकलीफ़ होना स्वाभाविक है! इसीलिए जैसे ही संघ परिवार के चहेते संगठनों के सर्वेक्षणों ने बताना शुरू किया कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी बुरी तरह से हारने जा रही है, वैसे ही एक ओर तो नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के भाषणों की दिशा पूरी ताक़त से काँग्रेस और राहुल गाँधी के चरित्रहनन की ओर घूम जाती है, वहीं दूसरी ओर, संघियों का अफ़वाह प्रसार तंत्र भी सक्रिय हो जाता है, ताकि समाज में वोट बैंक की सियासत को कोसते हुए ‘हिन्दू-मुसलमान’ करके हिन्दुओं को हिन्दू के नाम पर लामबन्द किया जा सके!

मोदी-शाह के दहकते हुए भाषण तो आपको बन्धक/दलाल न्यूज़ चैनल सारा दिन सुनाते ही रहते हैं! पहले भाषण का लाइव और फिर स्टोरी तथा डिबेट/बहस के रूप में! हालाँकि, इनकी गुणवत्ता को दर्शक/श्रोता/पाठक भी जल्द ही पहचान लेते हैं। इनके सही या ग़लत होने को लेकर अपनी राय भी बनाते हैं। लेकिन इसी के साथ ग़ुमनाम संघियों की ओर से WhatsApp University के ज़रिये हिन्दुओं को मूर्ख बनाकर, उन्हें मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काने का शरारती खेल चालू हो जाता है! ऐसा ही एक घिनौना खेल मेरे हाथ लग गया। मेरे किसी परिचित ने मुझे 13 सेकेंड का एक वीडियो और उसके साथ निम्न टिप्पणी भी भेजी।

“कैसे सौप दे कोंग्रेस को

ये वतन हिन्दुस्तान का,

हमने देखा है तुम्हारी रेली मैं झंडा पकिस्तान का!!

ये विडिओ जरुर देखे”

इस संदेश के वर्तनी दोष की अनदेखी करके आप वीडियो देखने लगेंगे। फिर अपना सिर धुन लेंगे। आपके नथुने फूलने लगेंगे। आपके होंठ अपशब्दों को बुदबुदाने लगेंगे। फिर आप फ़ौरन काँग्रेस को कोसने लगेंगे। उन्हें देश-विरोधी, ग़द्दार और पाकिस्तान परस्त मानने लगेंगे। काँग्रेस के प्रति आपके मन में नफ़रत पैदा होगी। लेकिन अब ज़रा इस वीडियो को बार-बार देखिए। स्लो मोशन यानी धीमी रफ़्तार में भी देखिए, जैसे क्रिकेट मैच में थर्ड अम्पायर देखते हैं! क्योंकि यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो फ़ौरन इस वीडियो को अपने तमाम परिचितों और ख़ासकर उन लोगों को फ़ारवर्ड नहीं करेंगे जो या तो भक्त नहीं हैं या फिर काँग्रेसी हैं!

आप दोनों में से किसी भी विकल्प को चुने, तो भी उन अनाम और ग़ुमनाम ताक़तों का मक़सद पूरा हो जाता है, जिनके झूठ और दुष्प्रचार के लिए ऐसे वीडियो वायरल करवाये जाते हैं। इस काम के लिए संघ-बीजेपी ने देश भर में कम से कम 20 हज़ार लोगों को बाक़ायदा वेतन वाली नौकरी पर लगा रखा है! सोशल मीडिया की भाषा में इन बेहूदा कार्यकर्ताओं/स्वयंसेवकों को ट्रोल या भक्त कहा जाता है। इन्हें बाक़ायदा गुरिल्ला युद्ध-शैली के क्रान्तिकारियों या विषकन्याओं की तरह प्रशिक्षित किया जाता है।

संघी गुरुकुल या शाखाओं में प्रशिक्षित और संस्कारित ऐसे निपट ‘मूर्ख देशभक्तों’ यानी ट्रोल्स की बदौलत ही 2014 में बीजेपी सत्ता में आयी और अब भगवा ख़ेमे को लगता है कि यही देवदूत और ईवीएम में हेराफ़ेरी ही उसे संकट से उबार पाएगी! लेकिन बकरे की माँ कब तक ख़ैर मना पायी है! राक्षसी वृत्ति जब अति कर देती है, तो उसका पतन होता ही है। यही हाल मोदी सरकार का 2019 में होने वाला है। तभी तो इस वीडियो के बारे में आपको ये नहीं बताया जाता कि ये कहाँ का नज़ारा है? कब का नज़ारा है? क्या आयोजन था? कौन आयोजक था? यदि वीडियो आपत्तिजनक है तो पुलिस-प्रशासन, सरकार-क़ानून ने क्या कोई कार्रवाई की या नहीं? आपको कोई ये भी क्यों नहीं बताया कि जब मामला इतना गम्भीर है, तो इस वीडियो को भक्त चैनलों पर क्यों नहीं दिखाया गया? वहाँ इसे लेकर तलवारें क्यों नहीं भाँजी गयीं?

बहरहाल, मैं इन सवालों में नहीं उलझा। क्योंकि मुझे इन सभी का सही जबाब मालूम है। इसीलिए मैंने अपने उस परिचित को पाकिस्तान के झंडे की तस्वीर के साथ सन्देश भेजा कि “संघियों के झूठ ने हिन्दुओं से उनकी प्रगतिशीलता और बुद्धि-विवेक को छीनकर उन्हें मूर्खों में तब्दील कर दिया है। जैसे हर पीली चीज़ सोना नहीं होती वैसे ही हर हरा झंडा और चाँद-तारा पाकिस्तानी नहीं होता! अब ज़रा पाकिस्तान के झंडे को ग़ौर से देखिए। इसमें बायीं तरफ़ सफ़ेद पट्टी भी है। जबकि आपको गुमराह करने वाले झंडे में ये नहीं है! अब आप चाहें तो अपने पाप का प्रायश्चित करते हुए मेरे इस जबाब को वापस उस महामूर्ख को भेज सकते हैं, जिसने आपको ये वीडियो भ्रष्ट टिप्पणी के साथ भेजा है।”

पता नहीं मेरे उस परिचित ने ऐसी किया या नहीं, लेकिन यदि इतना ज़रा दिमाग़ अन्य लोग भी लगाने लगें तो इस वीडियो को फ़ैलाने वालों का मक़सद पूरा नहीं हो सकता। सोशल मीडिया के ज़रिये ज़हर उगलगर हिन्दुओं को उल्लू बनाकर अपना सियासी उल्लू सीधा करने वालों के मंसूबे पूरे नहीं होते! तब टेलिकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद को सोशल मीडिया में जबाबजेही की बातें करते हुए सड़क पर डंडा पटकने का मौक़ा कैसे मिलता? फ़ेसबुक, ट्वीटर और व्हाट्सअप को धमकाने की नौटंकी करके सुर्ख़ियाँ कैसे बटोरी जाती? सूचना-प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर को भी मीडिया संस्थानों के कार्यक्रमों में फ़ेक न्यूज़ पर चिन्ता जताने का मौका कैसे मिलता? दरअसल, संघियों की रणनीति ही यही है कि ‘स्वयंसेवकों से उपद्रव करवाओ और नेताओं से बोलो कि प्रवचन देकर जनता को ग़ुमराह करते रहे!’

हम देख चुके हैं कि दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) को लेकर कैसे झूठ फ़ैलाया गया कि वहाँ देश तोड़ने वाले अर्बन नक्सल तैयार होते हैं। ‘हमें चाहिए आज़ादी’ वाले नारे को जेएनयू में कैसे राष्ट्रविरोधी बनाया गया? इसे सबने क़रीब से देखा। जिन को क़सूरवार बताया गया, उन्हें अदालत में दोषी नहीं साबित किया गया, बल्कि इनकी सुनवाई करने जा रही अदालतों को बलवा-स्थल में बदलने का ज़िम्मा उन्हीं लोगों ने अपने हाथों में ले लिया जो संविधान की शपथ लेकर संवैधानिक पदों पर बैठे हैं। दूसरी ओर, जेएनयू में कबाड़ बन चुके टैंक को खड़ा करके छात्रों में देश भक्ति भरने का ढोंग किया गया।

फ़ेक न्यूज़ की समस्या का समाधान बहुत मुश्किल नहीं है। डिज़ीटल या साइबर जगत में डाटा की वही भूमिका है जो हमारे शरीर में ख़ून की है। इसीलिए डाटा का स्रोत ग़ुमनाम नहीं रह सकता। कम्प्यूटर की भाषा में जिसे आईपी नम्बर या इंटरनेट प्रोटोकॉल करते हैं, उससे किसी भी साइबर सामग्री के निर्माता तक पहुँचा जा सकता है, क्योंकि किसी भी डिज़ीटल उपकरण का अनोखा आईपी नम्बर होता है। ये नम्बर फ़र्ज़ी नहीं हो सकता। भले ही हैकर्स इस नम्बर के साथ कोई भी फ़र्ज़ीवाड़ा कर लें, लेकिन फ़र्ज़ी नम्बर भी डिज़ीटल की परिभाषा में फ़र्ज़ी नहीं हो सकता।

आईपी नम्बर की तह में जाकर ही आईटी विशेषज्ञ उन लोगों तक पहुँचते हैं, जहाँ वो पहुँचना चाहते हैं। कौन नहीं जानता कि हमारे देश की पुलिस जब अपराधी तक पहुँचना चाहती है तो कुछेक अपवादों को छोड़कर ज़रूर पहुँचती है। इसीलिए ये सवाल उठना लाज़िमी है कि यदि मोदी के ख़िलाफ़ अपशब्द लिखने वालों को पकड़ा जा सकता है तो राहुल के ख़िलाफ़ झूठ फ़ैलाने वालों को क्यों नहीं पकड़ा जाता? इसकी वजह ये है कि हरेक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के पास अपने हरेक उपभोक्ता का ब्यौरा होता है। इसी ब्यौरा को यदि हरेक सन्देश के साथ चिपकाने की शर्त अनिवार्य कर दी जाए तो फ़ेक न्यूज़ गढ़ने और उसे फ़ैलाने वालों के गिरेबान तक पहुँचा जा सकता है।

सोशल मीडिया कम्पनियों को सिर्फ़ किसी सन्देश को भेजने वाले की पहचान ज़ाहिर करने का टूल सार्वजनिक करना है। आगे का काम क़ानून और उसकी एजेंसियों का है। लेकिन गोपनीयता या इंस्क्रिप्शन के नाम पर अपराधियों को छिपाकर रखा जाता है। अब ज़रा सोचिए कि साइबर अपराधियों को छिपाकर रखने से कौन फ़ायदे में है!

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लोगों ने 3 महीनों में व्हाट्सएप पर बिताए 85 अरब घंटे

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सैन फ्रांसिस्को, 21 अगस्त | सोशल मीडिया प्लेटफार्म व्हाट्सएप के संबंध में एक रोचक जानकारी सामने आई है। एक रपट से पता चला है कि लोगों ने बीते तीन महीनों में फेसबुक के स्वामित्व वाले व्हाट्सएप पर 85 अरब घंटे समय बिताया। फोर्ब्स की सोमवार को रपट के अनुसार, अमेरिका स्थित एप विश्लेषक कंपनी एप्पटोपिया की ओर से जारी आंकड़े में बताया गया है कि बीते तीन महीनों में लोगों ने व्हाट्सएप पर अपने 85 अरब घंटे खर्च किए। इस एप को दुनिया भर में 1.5 अरब प्रयोगकर्ता इस्तेमाल करते हैं।

इसी प्रकार, प्रयोगकर्ताओं ने इस दौरान इसकी स्वामित्व वाली कंपनी, फेसबुक पर 30 अरब घंटे का समय बिताया।

एप्पटोपिया के प्रवक्ता एडम ब्लैकर ने कहा, “यह स्पष्ट है कि व्हाट्सएप पसंद किया जाने वाला वैश्विक मैसेजिंग एप है।”

दुनियाभर में प्रयोगकर्ता जिन 10 एप पर सबसे ज्यादा समय बिताते हैं, उनमें व्हाट्सएप, वीचैट, फेसबुक, मैसेंजर, पेंडोरा, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, ट्विटर, गूगल मैप्स और स्पॉटीफाई प्रमुख हैं।

–आईएएनएस

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