'शुभ्रक' घोड़े का वायरल सच | WeForNewsHindi | Latest, News Update, -Top Story
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‘शुभ्रक’ घोड़े का वायरल सच

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Shubhrak Ghora

संघियों को जब-जब लगता है कि उनकी प्रतिष्ठा गिर रही है, तब-तब उनके ट्रोल्स सोशल मीडिया और ख़ासकर WhatsApp पर झूठ की सप्लाई बढ़ा देते हैं। फिर संघी ट्रोल्स इसी झूठ को वायरल करते है। इसका मक़सद बग़ैर सामने आये जनता के दिमाग़ में ज़हर भरना होता है। आपकी जानकारी के लिए हम ऐसे ही एक और मैसेज़ को हूबहू यहाँ कॉपी-पेस्ट कर रहे हैं। साथ ही पूरे प्रसंग की सच्चाई भी बता रहे हैं। ताकि नयी पीढ़ी को बरगलाना मुमकिन नहीं हो सके।

WhatsApp पर फैलाया जा रहा झूठ

कुतुबुद्दीन ऐबक घोड़े से गिर कर मरा, यह तो सब जानते हैं, लेकिन कैसे?

यह आज हम आपको बताएंगे..

वो वीर महाराणा प्रताप जी का ‘चेतक’ सबको याद है,

लेकिन ‘शुभ्रक’ नहीं!

तो मित्रो आज सुनिए कहानी ‘शुभ्रक’ की…..

सूअर कुतुबुद्दीन ऐबक ने राजपूताना में जम कर कहर बरपाया, और उदयपुर के ‘राजकुंवर कर्णसिंह’ को बंदी बनाकर लाहौर ले गया।

कुंवर का ‘शुभ्रक’ नामक एक स्वामिभक्त घोड़ा था,

जो कुतुबुद्दीन को पसंद आ गया और वो उसे भी साथ ले गया।

एक दिन कैद से भागने के प्रयास में कुँवर सा को सजा-ए-मौत सुनाई गई.. और सजा देने के लिए ‘जन्नत बाग’ में लाया गया। यह तय हुआ कि राजकुंवर का सिर काटकर उससे ‘पोलो’ (उस समय उस खेल का नाम और खेलने का तरीका कुछ और ही था) खेला जाएगा…

कुतुबुद्दीन ख़ुद कुँवर सा के ही घोड़े ‘शुभ्रक’ पर सवार होकर अपनी खिलाड़ी टोली के साथ ‘जन्नत बाग’ में आया।

‘शुभ्रक’ ने जैसे ही कैदी अवस्था में राजकुंवर को देखा, उसकी आंखों से आंसू टपकने लगे। जैसे ही सिर कलम करने के लिए कुँवर सा की जंजीरों को खोला गया, तो ‘शुभ्रक’ से रहा नहीं गया.. उसने उछलकर कुतुबुद्दीन को घोड़े से गिरा दिया और उसकी छाती पर अपने मजबूत पैरों से कई वार किए, जिससे कुतुबुद्दीन के प्राण पखेरू उड़ गए! इस्लामिक सैनिक अचंभित होकर देखते रह गए…

मौके का फायदा उठाकर कुंवर सा सैनिकों से छूटे और ‘शुभ्रक’ पर सवार हो गए। ‘शुभ्रक’ ने हवा से बाजी लगा दी.. लाहौर से उदयपुर बिना रुके दौडा और उदयपुर में महल के सामने आकर ही रुका!

राजकुंवर घोड़े से उतरे और अपने प्रिय अश्व को पुचकारने के लिए हाथ बढ़ाया, तो पाया कि वह तो प्रतिमा बना खडा था.. उसमें प्राण नहीं बचे थे।

सिर पर हाथ रखते ही ‘शुभ्रक’ का निष्प्राण शरीर लुढक गया..

भारत के इतिहास में यह तथ्य कहीं नहीं पढ़ाया जाता क्योंकि वामपंथी और मुल्लापरस्त लेखक अपने नाजायज बाप की ऐसी दुर्गति वाली मौत बताने से हिचकिचाते हैं! जबकि फारसी की कई प्राचीन पुस्तकों में कुतुबुद्दीन की मौत इसी तरह लिखी बताई गई है।

नमन स्वामीभक्त ‘शुभ्रक’ को..

‘शुभ्रक’ घोड़े के उपरोक्त प्रसंग की सच्चाई

सच्चाई ये है कि क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ लाहौर के शासक मोहम्मद गोरी का ग़ुलाम था। मोहम्मद गोरी की मौत के बाद क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ ने ख़ुद को लाहौर का शासक घोषित कर दिया। 24 जून 1206 को लाहौर में उसकी ताजपोशी हुई। दिल्ली के प्रसिद्ध चिश्ती सन्त शेख क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी से अगाध प्रेम होने की वजह से क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ ने अपनी राजधानी को लाहौर से दिल्ली लाने का फ़ैसला किया। इससे दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई। लेकिन ग़ुलाम क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ सिर्फ़ चार साल तक ही दिल्ली का शासक रहा। उसने बख़्तियार काकी की याद में क़ुतुब मीनार का निर्माण शुरू करवाया। लेकिन इसे पूरा उसके ग़ुलाम इल्तुतमिश ने करवाया।

1210 में लाहौर में चौगान (पोलो) खेलते वक़्त क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ की घोड़े से गिरने की वजह से मौत हो गयी। उसे लाहौर में ही दफ़्नाया गया। क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ की मौत के बाद उसके बेटे ‘आरामशाह’ को शासक घोषित किया गया। लेकिन इल्तुतमिश ने उसे बन्दी बना लिया और ख़ुद शासक बन गया। इल्तुतमिश भी ग़ुलाम था। उसे क़ुतुबुद्दीन ने 1197 में अन्हिलवाड के युद्ध के दौरान ख़रीदा था। एक ग़ुलाम के बाद दूसरे ग़ुलाम के शासक बनने की वजह से दिल्ली सल्तनत का वो दौर ग़ुलाम वंश कहलाया। आगे चलकर ग़ुलामों को हराकर ख़िलज़ियों ने अपना राजवंश स्थापित किया।

क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ के शासनकाल के समय मेवाड़ के राजा मन्थन सिंह (1191–1211) थे। जबकि रण सिंह (कर्ण सिंह-1) का कार्यकाल 1158 से 1168 तक रहा। इन दोनों के दरम्यान क्षेम सिंह, सामन्त सिंह और कुमार सिंह भी मेवाड़ के शासक रहे। मेवाड़ में राणा राजवंश में कर्ण सिंह-2 का शासनकाल 1620 से 1628 तक था। यानी, ये राजा तो क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ का समकालीन हो नहीं सकता क्योंकि दोनों के बीच 400 साल का फ़ासला है।

अब यदि ये मान भी लिया जाए कि कर्ण सिंह-1 के पास कोई ‘शुभ्रक’ नाम का घोड़ा था और जिसकी स्वामी भक्ति बेजोड़ थी तो भी उस कर्ण सिंह प्रथम की सामना कभी क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ से नहीं हो सकता। क्योंकि दोनों के शासन काल में 32 साल का अन्तर था। लिहाज़ा, शुभ्रक नामक घोड़े की सारी वीरगाथा महज़ एक कपोल-कल्पना है। वैसे भी घोड़े की उम्र 20-25 साल ही होती है।

दरअसल, हिन्दू शासकों की सच्ची या काल्पनिक कहानियों को हमेशा आलोचनात्मक नज़रिये से देखिए, क्योंकि हिन्दुओं की वीरता का किस्सा चाहे जितने गाया जाए, लेकिन इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता है कि वो दौर ‘वीर भोग्य वसुन्धरा’ का था। ये सर्वविदित है कि हिन्दू शासकों ने कभी संगठित होकर विदेशी हमलावरों का मुक़ाबला नहीं किया। वो तो हमेशा आपस में ही लड़ते रहे। इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि उस दौर में कोई भी अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए नहीं लड़ता था। सैनिक अपने राजा की शान में उसके प्रति स्वामी-भक्ति दिखाने के लिए लड़ते थे। जबकि राजा अपना राजपाट बचाने या फैलाने के लिए लड़ता था। प्रजा के लिए कोई जीते-हारे इससे कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता था! इसीलिए उस दौर में प्रजा का कोई विद्रोह नहीं होता था।

अँग्रेज़ों के आने से पहले तक भारतवर्ष नाम की कोई राजनीतिक सत्ता नहीं थी। भारतीय उपमहाद्वीप का भौगोलिक इलाका ज़रूर था। इसे ही हिन्दूस्तान और भारतवर्ष कहा जाता था। हिन्दूस्तान को 1935 के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट के मुताबिक, आधिकारिक रूप से ‘इंडिया’ कहा गया। यही इंडिया, हिन्दूस्तान और भारतवर्ष का पर्यायवाची बना। सदियों तक भारत, पृथ्वी के इस इलाका का वैसा ही नाम था, जैसे अफ़ीका एक महाद्वीप है। जिसमें हमेशा से कई देश या कबीले या संस्कृतियाँ पलती-बढ़ती रही हैं। उसी तरह से भारतवर्ष हमेशा अलग-अलग रजवाड़ों, रियासतों, मनसबों और प्रान्तों में बँटा रहा।

अब लगे हाथ, ‘भारत माता’ और ‘वन्दे मातरम्’ की ऐतिहासिकता को भी जान लीजिए। ‘भारत माता’ का नामकरण, पहली बार, 1873 में मंचित किरन चन्द्र बनर्जी के बाँग्ला नाटक से हुआ। इससे प्रेरित होकर ही 1882 में बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने ‘आनन्द मठ’ नामक बाँग्ला उपन्यास लिखा। इस उपन्यास में ‘वन्दे मातरम्’ नामक कविता संस्कृत में लिखी गयी। कालान्तर में स्वतंत्रता आन्दोलन को नयी बुलन्दियों पर पहुँचाने में काँग्रेस पार्टी के लिए ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम्’ जैसे नारों ने अहम भूमिका निभायी। ‘जय हिन्द’ नामक सम्बोधन का जन्म तो आज़ादी के बाद हुआ।

आख़िर में, संघी ट्रोल्स को ये भी जान लेना चाहिए कि भारत के इतिहास में काल्पनिक तथ्य नहीं पढ़ाये जाते। क्योंकि इतिहासकार वामपन्थी या मुल्लापरस्त नहीं हो सकता। इतिहास-लेखन एक वैज्ञानिक विधा है और कोई भी इसे मनमाफ़िक तरीक़े से नहीं लिख सकता!

(यदि आप चाहते हैं कि आपके दोस्त या परिचित आपको लगातार मूर्ख बनाकर हाँकते नहीं रहें तो कृपया इस सन्देश को उन लोगों को ज़रूर भेजें जो आपके सामने झूठ परोसते हैं।)

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जहां 40 की उम्र में आता है बुढ़ापा

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बीजापुर छत्तीसगढ़, 9 जनवरी । ‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून..’ रहीम की ये पंक्ति पानी की महत्ता को दर्शा रही है कि यदि पानी नहीं रहेगा तो कुछ भी नहीं रहेगा, लेकिन जब पानी अमृत के बजाय जहर बन जाए तो पूरा जीवन अपंगता की ओर बढ़ चलता है। यह कोई कहानी नहीं बल्कि हकीकत है।

बीजापुर जिला मुख्यालय से तकरीबन 60 किमी दूर भोपालपटनम में स्थित छत्तीसगढ़ का एक ऐसा गांव जहां पर युवा 25 वर्ष की आयु में ही लाठी लेकर चलने को मजबूर हो जाते हैं और 40 साल के पड़ाव में प्रकृति के नियम के विपरित बुढ़े होने लग जाते हैं। यहां 40 फीसदी लोग उम्र से पहले ही या तो लाठी के सहारे चलने लगते हैं या तो बुढ़े हो जाते हैं। इसकी वजह कोई शारीरिक दोष नहीं, बल्कि यहां के भूगर्भ में ठहरा पानी हैए जो इनके लिए अमृत नहीं, बल्कि जहर साबित हो रहा है।

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Health Issue in India

यहां के हैंडपंपों और कुओं से निकलने वाले पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण पूरा का पूरा गांव समय से पहले ही अपंगता के साथ-साथ लगातार मौत की ओर बढ़ रहा है। शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं होने के कारण मजबूरन आज भी यहां के लोग फलोराइड युक्त पानी पीने को मजबूर हैं, बावजूद शासन-प्रशासन मौत की ओर बढ़ रहे इस गांव और ग्रामीणों की ना तो सुध ले रहा है ना ही इस खतरनाक हालात से बचने के लिए कोई कार्ययोजना तैयार करता नजर आ रहा है, जबकि इस गांव में आठ वर्ष के उम्र से लेकर 40 वर्ष तक का हर तीसरे व्यक्ति में कुबड़पन, दांतों में सड़न, पीलापन और बुढ़ापा नजर आता है।

प्रशासन ने यहां तक सड़क तो बना दी, पर विडंबना तो देखिए कि सड़क बनाने वाले प्रशासन की नजर इन पीड़ितों पर अब तक नहीं पड़ पाई।

यहां के सेवानिवृत्त शिक्षक तामड़ी नागैया, जनप्रतिनिधि नीलम गणपत और फलोराइड युक्त पानी से पीड़ित तामड़ी गोपाल का कहना है कि गांव में पांच नलकूप और चार कुएं हैं, इनमें से सभी नलकूपों और कुओं में फलोराइड युक्त पानी निकलता है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने सभी नलकूपों को सील कर दिया था लेकिन गांव के लोग अब भी दो नलकूपों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

उनका कहना है कि हर व्यक्ति शहर से खरीदकर पानी नहीं ला सकता है, इसलिए यही पानी पीने में इस्तेमाल होता है। यही नहीं, बल्कि गर्मी के दिनों में कुछ लोग तीन किमी दूर इंद्रावती नदी से पानी लाकर उबालकर पीते हैं।

इनमें से तामड़ी नागैया का कहना है कि यह समस्या पिछले तीस सालों से ज्यादा बढ़ी हैए क्योंकि तीस साल पहले तक यहां के लोग कुएं का पानी पीने के लिए उपयोग किया करते थे, मगर जब से नलकूपों का खनन किया गया तब से यह समस्या विराट रूप लेने लगा और अब स्थिति ऐसी है कि गांव की 40 फीसदी आबादी 25 वर्ष की उम्र में लाठी के सहारे चलनेए कुबड़पन को ढोने और 40 वर्ष की अवस्था में ही बुढ़े होकर जीवन जीने को मजबूर है। यहां पर लगभग 60 फीसदी लोगों के दांत पीले होकर सड़ने लगे हैं।

बताया जा रहा है कि यह पूरा गांव भू गर्भ में स्थित चट्टान पर बसा हुआ है और यही वजह है कि पानी में फलोराइड की मात्रा अधिक है और इस भू गर्भ से निकलने वाला पानी यहां के ग्रामीणों के लिए जहर बना हुआ है।

जानकार बताते हैं कि वन पार्ट पर मिलियन यानि पीपीएम तक फलोराइड की मौजूदगी इस्तेमाल करने लायक हैए जबकि पीपीएम को मार्जिनल सेप माना गया है। डेढ़ पीएम से अधिक फलोराइड की मौजूदगी को खतरनाक माना गया है और गेर्रागुड़ा में डेढ़ से दो पीपीएम तक इसकी मौजूदगी का पता चला है और लोगों पर इसका खतरनाक असर साफ नजर आ रहा है।

इस समस्या से निजात पाने के लिए एक साल पहले पीएचई विभाग ने इस गांव में एक ओवरहेड टैंक का निर्माण कर गांव के हर मकान तक पाइप लाइन विस्तार के साथ नल कनेक्शन भी दे रखा है, मगर प्रशासन की लापरवाही के चलते आज र्पयत तक पाइप लाइन के सहारे घरों में मौजूद नल कनेक्शनों में शुद्ध पेयजल की सप्लाई करने में प्रशासन और विभाग असफल रहा है। परिणामस्वरूप गांव के संपन्न लोग किसी तरह भोपालपटनम स्थित वाटर प्लांट से शुद्ध पेयजल खरीदकर पीने में उपयोग तो कर लेते हैं, मगर गरीब तबके के लोग अब भी फलोराइड युक्त पानी पीकर जवानी में ही बुढ़ापे को समय से पहले पाने को मजबूर हैं।

इस मामले में सीएमएचओ डॉ. बी.आर. पुजारी का कहना है कि ग्रामीणों की शिकायत के बाद गांव में कैम्प लगाकर लोगों का इलाज किया गया था और कुछ लोगों को बीजापुर भी बुलाया गया था। चूंकि इस गांव के पानी में फलोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण हड्डियों में टेड़ापन, कुबड़पन और दांतों में पीलेपन के साथ सड़न की समस्या आती है, जिसका इलाज सिर्फ शुद्ध पेयजल से ही हो पाएगा। शिकायत के बाद गांव के अधिकांश हैंडपंपों को सील करवा दिया गया था।

फलोराइड समस्या के निदान के लिए पीएचई की ओर से निर्मित वाटर ओवरहेड टैंक से पेयजल आपूर्ति ना होने की बात पर कार्यपालन अभियंता जगदीश कुमार का कहना है कि विभाग की ओर से टैंक के निर्माण बाद पंचायत को हैंडओवर किया जा चुका है। पेयजल आपूर्ति शुरू करने की जिम्मेदारी अब पंचायत की है, फिर भी अगर पानी की सप्लाई नहीं की जा रही है तो विभाग इसे अवश्य संज्ञान में लेगा।

–आईएएनएस

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ज्यादातर पाकिस्तानी नहीं जानते इंटरनेट क्या है : सर्वेक्षण

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इस्लामाबाद, 12 नवंबर | पाकिस्तान में 15 साल से लेकर 65 साल की उम्र के 69 फीसदी लोगों को नहीं मालूम है कि इंटरनेट क्या होता है। यह बात सूचना-संचार प्रौद्योगिकी है(आईसीटी) आधारित एक सर्वेक्षण में प्रकाश में आई है। श्रीलंका के थिंक टैंक लाइर्नी एशिया द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट सोमवार को डॉन में प्रकाशित हुई है। रिपोर्ट पाकिस्तान के 2,000 लोगों के सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गई है।

सर्वेक्षक थिंक टैंक ने दावा किया है कि नमूने की प्रक्रिया के तहत राष्ट्रीय स्तर पर 15 साल से 65 साल की उम्र की 98 फीसदी आबादी के प्रतिनिधित्व सुनिश्चित की गई है।

लाइनर एशिया की सीईओ हेलनी गलपाया ने कहा, “पाकिस्तान दूरसंचार प्राधिकरण (पीटीए) की वेबसाइट में 15.2 करोड़ सक्रिय सेल्युलर फोन धारक हैं। चाहे वे आदमी हो या औरत, गरीब हो या अमीर लेकिन वे नहीं एप्स का उपयोग करना नहीं जानते हैं।”

–आईएएनएस

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ज़हर उगलने वाले 13 सेकेंड के इस वीडियो को क्या आपने देखा!

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जैसे शरीर के तपने का मतलब बुख़ार होता है, वैसे ही जब फेंकू ख़ानदान Fake News/Views/Video पर उतर आये तो समझ लीजिए कि अपने पतन की आहट सुनकर वो बदहवासी में झूठ तथा अफ़वाह की उल्टियाँ कर रहा है! क्योंकि झूठ किसी को हज़म नहीं होता, भक्तों का पाचन-तंत्र भी इसे हज़म नहीं कर पाता है! लिहाज़ा, भक्तों को भी उल्टी-दस्त यानी डीहाइड्रेशन की तकलीफ़ होना स्वाभाविक है! इसीलिए जैसे ही संघ परिवार के चहेते संगठनों के सर्वेक्षणों ने बताना शुरू किया कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी बुरी तरह से हारने जा रही है, वैसे ही एक ओर तो नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के भाषणों की दिशा पूरी ताक़त से काँग्रेस और राहुल गाँधी के चरित्रहनन की ओर घूम जाती है, वहीं दूसरी ओर, संघियों का अफ़वाह प्रसार तंत्र भी सक्रिय हो जाता है, ताकि समाज में वोट बैंक की सियासत को कोसते हुए ‘हिन्दू-मुसलमान’ करके हिन्दुओं को हिन्दू के नाम पर लामबन्द किया जा सके!

मोदी-शाह के दहकते हुए भाषण तो आपको बन्धक/दलाल न्यूज़ चैनल सारा दिन सुनाते ही रहते हैं! पहले भाषण का लाइव और फिर स्टोरी तथा डिबेट/बहस के रूप में! हालाँकि, इनकी गुणवत्ता को दर्शक/श्रोता/पाठक भी जल्द ही पहचान लेते हैं। इनके सही या ग़लत होने को लेकर अपनी राय भी बनाते हैं। लेकिन इसी के साथ ग़ुमनाम संघियों की ओर से WhatsApp University के ज़रिये हिन्दुओं को मूर्ख बनाकर, उन्हें मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काने का शरारती खेल चालू हो जाता है! ऐसा ही एक घिनौना खेल मेरे हाथ लग गया। मेरे किसी परिचित ने मुझे 13 सेकेंड का एक वीडियो और उसके साथ निम्न टिप्पणी भी भेजी।

“कैसे सौप दे कोंग्रेस को

ये वतन हिन्दुस्तान का,

हमने देखा है तुम्हारी रेली मैं झंडा पकिस्तान का!!

ये विडिओ जरुर देखे”

इस संदेश के वर्तनी दोष की अनदेखी करके आप वीडियो देखने लगेंगे। फिर अपना सिर धुन लेंगे। आपके नथुने फूलने लगेंगे। आपके होंठ अपशब्दों को बुदबुदाने लगेंगे। फिर आप फ़ौरन काँग्रेस को कोसने लगेंगे। उन्हें देश-विरोधी, ग़द्दार और पाकिस्तान परस्त मानने लगेंगे। काँग्रेस के प्रति आपके मन में नफ़रत पैदा होगी। लेकिन अब ज़रा इस वीडियो को बार-बार देखिए। स्लो मोशन यानी धीमी रफ़्तार में भी देखिए, जैसे क्रिकेट मैच में थर्ड अम्पायर देखते हैं! क्योंकि यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो फ़ौरन इस वीडियो को अपने तमाम परिचितों और ख़ासकर उन लोगों को फ़ारवर्ड नहीं करेंगे जो या तो भक्त नहीं हैं या फिर काँग्रेसी हैं!

आप दोनों में से किसी भी विकल्प को चुने, तो भी उन अनाम और ग़ुमनाम ताक़तों का मक़सद पूरा हो जाता है, जिनके झूठ और दुष्प्रचार के लिए ऐसे वीडियो वायरल करवाये जाते हैं। इस काम के लिए संघ-बीजेपी ने देश भर में कम से कम 20 हज़ार लोगों को बाक़ायदा वेतन वाली नौकरी पर लगा रखा है! सोशल मीडिया की भाषा में इन बेहूदा कार्यकर्ताओं/स्वयंसेवकों को ट्रोल या भक्त कहा जाता है। इन्हें बाक़ायदा गुरिल्ला युद्ध-शैली के क्रान्तिकारियों या विषकन्याओं की तरह प्रशिक्षित किया जाता है।

संघी गुरुकुल या शाखाओं में प्रशिक्षित और संस्कारित ऐसे निपट ‘मूर्ख देशभक्तों’ यानी ट्रोल्स की बदौलत ही 2014 में बीजेपी सत्ता में आयी और अब भगवा ख़ेमे को लगता है कि यही देवदूत और ईवीएम में हेराफ़ेरी ही उसे संकट से उबार पाएगी! लेकिन बकरे की माँ कब तक ख़ैर मना पायी है! राक्षसी वृत्ति जब अति कर देती है, तो उसका पतन होता ही है। यही हाल मोदी सरकार का 2019 में होने वाला है। तभी तो इस वीडियो के बारे में आपको ये नहीं बताया जाता कि ये कहाँ का नज़ारा है? कब का नज़ारा है? क्या आयोजन था? कौन आयोजक था? यदि वीडियो आपत्तिजनक है तो पुलिस-प्रशासन, सरकार-क़ानून ने क्या कोई कार्रवाई की या नहीं? आपको कोई ये भी क्यों नहीं बताया कि जब मामला इतना गम्भीर है, तो इस वीडियो को भक्त चैनलों पर क्यों नहीं दिखाया गया? वहाँ इसे लेकर तलवारें क्यों नहीं भाँजी गयीं?

बहरहाल, मैं इन सवालों में नहीं उलझा। क्योंकि मुझे इन सभी का सही जबाब मालूम है। इसीलिए मैंने अपने उस परिचित को पाकिस्तान के झंडे की तस्वीर के साथ सन्देश भेजा कि “संघियों के झूठ ने हिन्दुओं से उनकी प्रगतिशीलता और बुद्धि-विवेक को छीनकर उन्हें मूर्खों में तब्दील कर दिया है। जैसे हर पीली चीज़ सोना नहीं होती वैसे ही हर हरा झंडा और चाँद-तारा पाकिस्तानी नहीं होता! अब ज़रा पाकिस्तान के झंडे को ग़ौर से देखिए। इसमें बायीं तरफ़ सफ़ेद पट्टी भी है। जबकि आपको गुमराह करने वाले झंडे में ये नहीं है! अब आप चाहें तो अपने पाप का प्रायश्चित करते हुए मेरे इस जबाब को वापस उस महामूर्ख को भेज सकते हैं, जिसने आपको ये वीडियो भ्रष्ट टिप्पणी के साथ भेजा है।”

पता नहीं मेरे उस परिचित ने ऐसी किया या नहीं, लेकिन यदि इतना ज़रा दिमाग़ अन्य लोग भी लगाने लगें तो इस वीडियो को फ़ैलाने वालों का मक़सद पूरा नहीं हो सकता। सोशल मीडिया के ज़रिये ज़हर उगलगर हिन्दुओं को उल्लू बनाकर अपना सियासी उल्लू सीधा करने वालों के मंसूबे पूरे नहीं होते! तब टेलिकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद को सोशल मीडिया में जबाबजेही की बातें करते हुए सड़क पर डंडा पटकने का मौक़ा कैसे मिलता? फ़ेसबुक, ट्वीटर और व्हाट्सअप को धमकाने की नौटंकी करके सुर्ख़ियाँ कैसे बटोरी जाती? सूचना-प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर को भी मीडिया संस्थानों के कार्यक्रमों में फ़ेक न्यूज़ पर चिन्ता जताने का मौका कैसे मिलता? दरअसल, संघियों की रणनीति ही यही है कि ‘स्वयंसेवकों से उपद्रव करवाओ और नेताओं से बोलो कि प्रवचन देकर जनता को ग़ुमराह करते रहे!’

हम देख चुके हैं कि दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) को लेकर कैसे झूठ फ़ैलाया गया कि वहाँ देश तोड़ने वाले अर्बन नक्सल तैयार होते हैं। ‘हमें चाहिए आज़ादी’ वाले नारे को जेएनयू में कैसे राष्ट्रविरोधी बनाया गया? इसे सबने क़रीब से देखा। जिन को क़सूरवार बताया गया, उन्हें अदालत में दोषी नहीं साबित किया गया, बल्कि इनकी सुनवाई करने जा रही अदालतों को बलवा-स्थल में बदलने का ज़िम्मा उन्हीं लोगों ने अपने हाथों में ले लिया जो संविधान की शपथ लेकर संवैधानिक पदों पर बैठे हैं। दूसरी ओर, जेएनयू में कबाड़ बन चुके टैंक को खड़ा करके छात्रों में देश भक्ति भरने का ढोंग किया गया।

फ़ेक न्यूज़ की समस्या का समाधान बहुत मुश्किल नहीं है। डिज़ीटल या साइबर जगत में डाटा की वही भूमिका है जो हमारे शरीर में ख़ून की है। इसीलिए डाटा का स्रोत ग़ुमनाम नहीं रह सकता। कम्प्यूटर की भाषा में जिसे आईपी नम्बर या इंटरनेट प्रोटोकॉल करते हैं, उससे किसी भी साइबर सामग्री के निर्माता तक पहुँचा जा सकता है, क्योंकि किसी भी डिज़ीटल उपकरण का अनोखा आईपी नम्बर होता है। ये नम्बर फ़र्ज़ी नहीं हो सकता। भले ही हैकर्स इस नम्बर के साथ कोई भी फ़र्ज़ीवाड़ा कर लें, लेकिन फ़र्ज़ी नम्बर भी डिज़ीटल की परिभाषा में फ़र्ज़ी नहीं हो सकता।

आईपी नम्बर की तह में जाकर ही आईटी विशेषज्ञ उन लोगों तक पहुँचते हैं, जहाँ वो पहुँचना चाहते हैं। कौन नहीं जानता कि हमारे देश की पुलिस जब अपराधी तक पहुँचना चाहती है तो कुछेक अपवादों को छोड़कर ज़रूर पहुँचती है। इसीलिए ये सवाल उठना लाज़िमी है कि यदि मोदी के ख़िलाफ़ अपशब्द लिखने वालों को पकड़ा जा सकता है तो राहुल के ख़िलाफ़ झूठ फ़ैलाने वालों को क्यों नहीं पकड़ा जाता? इसकी वजह ये है कि हरेक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के पास अपने हरेक उपभोक्ता का ब्यौरा होता है। इसी ब्यौरा को यदि हरेक सन्देश के साथ चिपकाने की शर्त अनिवार्य कर दी जाए तो फ़ेक न्यूज़ गढ़ने और उसे फ़ैलाने वालों के गिरेबान तक पहुँचा जा सकता है।

सोशल मीडिया कम्पनियों को सिर्फ़ किसी सन्देश को भेजने वाले की पहचान ज़ाहिर करने का टूल सार्वजनिक करना है। आगे का काम क़ानून और उसकी एजेंसियों का है। लेकिन गोपनीयता या इंस्क्रिप्शन के नाम पर अपराधियों को छिपाकर रखा जाता है। अब ज़रा सोचिए कि साइबर अपराधियों को छिपाकर रखने से कौन फ़ायदे में है!

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