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‘शुभ्रक’ घोड़े का वायरल सच

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Shubhrak Ghora

संघियों को जब-जब लगता है कि उनकी प्रतिष्ठा गिर रही है, तब-तब उनके ट्रोल्स सोशल मीडिया और ख़ासकर WhatsApp पर झूठ की सप्लाई बढ़ा देते हैं। फिर संघी ट्रोल्स इसी झूठ को वायरल करते है। इसका मक़सद बग़ैर सामने आये जनता के दिमाग़ में ज़हर भरना होता है। आपकी जानकारी के लिए हम ऐसे ही एक और मैसेज़ को हूबहू यहाँ कॉपी-पेस्ट कर रहे हैं। साथ ही पूरे प्रसंग की सच्चाई भी बता रहे हैं। ताकि नयी पीढ़ी को बरगलाना मुमकिन नहीं हो सके।

WhatsApp पर फैलाया जा रहा झूठ

कुतुबुद्दीन ऐबक घोड़े से गिर कर मरा, यह तो सब जानते हैं, लेकिन कैसे?

यह आज हम आपको बताएंगे..

वो वीर महाराणा प्रताप जी का ‘चेतक’ सबको याद है,

लेकिन ‘शुभ्रक’ नहीं!

तो मित्रो आज सुनिए कहानी ‘शुभ्रक’ की…..

सूअर कुतुबुद्दीन ऐबक ने राजपूताना में जम कर कहर बरपाया, और उदयपुर के ‘राजकुंवर कर्णसिंह’ को बंदी बनाकर लाहौर ले गया।

कुंवर का ‘शुभ्रक’ नामक एक स्वामिभक्त घोड़ा था,

जो कुतुबुद्दीन को पसंद आ गया और वो उसे भी साथ ले गया।

एक दिन कैद से भागने के प्रयास में कुँवर सा को सजा-ए-मौत सुनाई गई.. और सजा देने के लिए ‘जन्नत बाग’ में लाया गया। यह तय हुआ कि राजकुंवर का सिर काटकर उससे ‘पोलो’ (उस समय उस खेल का नाम और खेलने का तरीका कुछ और ही था) खेला जाएगा…

कुतुबुद्दीन ख़ुद कुँवर सा के ही घोड़े ‘शुभ्रक’ पर सवार होकर अपनी खिलाड़ी टोली के साथ ‘जन्नत बाग’ में आया।

‘शुभ्रक’ ने जैसे ही कैदी अवस्था में राजकुंवर को देखा, उसकी आंखों से आंसू टपकने लगे। जैसे ही सिर कलम करने के लिए कुँवर सा की जंजीरों को खोला गया, तो ‘शुभ्रक’ से रहा नहीं गया.. उसने उछलकर कुतुबुद्दीन को घोड़े से गिरा दिया और उसकी छाती पर अपने मजबूत पैरों से कई वार किए, जिससे कुतुबुद्दीन के प्राण पखेरू उड़ गए! इस्लामिक सैनिक अचंभित होकर देखते रह गए…

मौके का फायदा उठाकर कुंवर सा सैनिकों से छूटे और ‘शुभ्रक’ पर सवार हो गए। ‘शुभ्रक’ ने हवा से बाजी लगा दी.. लाहौर से उदयपुर बिना रुके दौडा और उदयपुर में महल के सामने आकर ही रुका!

राजकुंवर घोड़े से उतरे और अपने प्रिय अश्व को पुचकारने के लिए हाथ बढ़ाया, तो पाया कि वह तो प्रतिमा बना खडा था.. उसमें प्राण नहीं बचे थे।

सिर पर हाथ रखते ही ‘शुभ्रक’ का निष्प्राण शरीर लुढक गया..

भारत के इतिहास में यह तथ्य कहीं नहीं पढ़ाया जाता क्योंकि वामपंथी और मुल्लापरस्त लेखक अपने नाजायज बाप की ऐसी दुर्गति वाली मौत बताने से हिचकिचाते हैं! जबकि फारसी की कई प्राचीन पुस्तकों में कुतुबुद्दीन की मौत इसी तरह लिखी बताई गई है।

नमन स्वामीभक्त ‘शुभ्रक’ को..

‘शुभ्रक’ घोड़े के उपरोक्त प्रसंग की सच्चाई

सच्चाई ये है कि क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ लाहौर के शासक मोहम्मद गोरी का ग़ुलाम था। मोहम्मद गोरी की मौत के बाद क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ ने ख़ुद को लाहौर का शासक घोषित कर दिया। 24 जून 1206 को लाहौर में उसकी ताजपोशी हुई। दिल्ली के प्रसिद्ध चिश्ती सन्त शेख क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी से अगाध प्रेम होने की वजह से क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ ने अपनी राजधानी को लाहौर से दिल्ली लाने का फ़ैसला किया। इससे दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई। लेकिन ग़ुलाम क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ सिर्फ़ चार साल तक ही दिल्ली का शासक रहा। उसने बख़्तियार काकी की याद में क़ुतुब मीनार का निर्माण शुरू करवाया। लेकिन इसे पूरा उसके ग़ुलाम इल्तुतमिश ने करवाया।

1210 में लाहौर में चौगान (पोलो) खेलते वक़्त क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ की घोड़े से गिरने की वजह से मौत हो गयी। उसे लाहौर में ही दफ़्नाया गया। क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ की मौत के बाद उसके बेटे ‘आरामशाह’ को शासक घोषित किया गया। लेकिन इल्तुतमिश ने उसे बन्दी बना लिया और ख़ुद शासक बन गया। इल्तुतमिश भी ग़ुलाम था। उसे क़ुतुबुद्दीन ने 1197 में अन्हिलवाड के युद्ध के दौरान ख़रीदा था। एक ग़ुलाम के बाद दूसरे ग़ुलाम के शासक बनने की वजह से दिल्ली सल्तनत का वो दौर ग़ुलाम वंश कहलाया। आगे चलकर ग़ुलामों को हराकर ख़िलज़ियों ने अपना राजवंश स्थापित किया।

क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ के शासनकाल के समय मेवाड़ के राजा मन्थन सिंह (1191–1211) थे। जबकि रण सिंह (कर्ण सिंह-1) का कार्यकाल 1158 से 1168 तक रहा। इन दोनों के दरम्यान क्षेम सिंह, सामन्त सिंह और कुमार सिंह भी मेवाड़ के शासक रहे। मेवाड़ में राणा राजवंश में कर्ण सिंह-2 का शासनकाल 1620 से 1628 तक था। यानी, ये राजा तो क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ का समकालीन हो नहीं सकता क्योंकि दोनों के बीच 400 साल का फ़ासला है।

अब यदि ये मान भी लिया जाए कि कर्ण सिंह-1 के पास कोई ‘शुभ्रक’ नाम का घोड़ा था और जिसकी स्वामी भक्ति बेजोड़ थी तो भी उस कर्ण सिंह प्रथम की सामना कभी क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ से नहीं हो सकता। क्योंकि दोनों के शासन काल में 32 साल का अन्तर था। लिहाज़ा, शुभ्रक नामक घोड़े की सारी वीरगाथा महज़ एक कपोल-कल्पना है। वैसे भी घोड़े की उम्र 20-25 साल ही होती है।

दरअसल, हिन्दू शासकों की सच्ची या काल्पनिक कहानियों को हमेशा आलोचनात्मक नज़रिये से देखिए, क्योंकि हिन्दुओं की वीरता का किस्सा चाहे जितने गाया जाए, लेकिन इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता है कि वो दौर ‘वीर भोग्य वसुन्धरा’ का था। ये सर्वविदित है कि हिन्दू शासकों ने कभी संगठित होकर विदेशी हमलावरों का मुक़ाबला नहीं किया। वो तो हमेशा आपस में ही लड़ते रहे। इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि उस दौर में कोई भी अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए नहीं लड़ता था। सैनिक अपने राजा की शान में उसके प्रति स्वामी-भक्ति दिखाने के लिए लड़ते थे। जबकि राजा अपना राजपाट बचाने या फैलाने के लिए लड़ता था। प्रजा के लिए कोई जीते-हारे इससे कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता था! इसीलिए उस दौर में प्रजा का कोई विद्रोह नहीं होता था।

अँग्रेज़ों के आने से पहले तक भारतवर्ष नाम की कोई राजनीतिक सत्ता नहीं थी। भारतीय उपमहाद्वीप का भौगोलिक इलाका ज़रूर था। इसे ही हिन्दूस्तान और भारतवर्ष कहा जाता था। हिन्दूस्तान को 1935 के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट के मुताबिक, आधिकारिक रूप से ‘इंडिया’ कहा गया। यही इंडिया, हिन्दूस्तान और भारतवर्ष का पर्यायवाची बना। सदियों तक भारत, पृथ्वी के इस इलाका का वैसा ही नाम था, जैसे अफ़ीका एक महाद्वीप है। जिसमें हमेशा से कई देश या कबीले या संस्कृतियाँ पलती-बढ़ती रही हैं। उसी तरह से भारतवर्ष हमेशा अलग-अलग रजवाड़ों, रियासतों, मनसबों और प्रान्तों में बँटा रहा।

अब लगे हाथ, ‘भारत माता’ और ‘वन्दे मातरम्’ की ऐतिहासिकता को भी जान लीजिए। ‘भारत माता’ का नामकरण, पहली बार, 1873 में मंचित किरन चन्द्र बनर्जी के बाँग्ला नाटक से हुआ। इससे प्रेरित होकर ही 1882 में बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने ‘आनन्द मठ’ नामक बाँग्ला उपन्यास लिखा। इस उपन्यास में ‘वन्दे मातरम्’ नामक कविता संस्कृत में लिखी गयी। कालान्तर में स्वतंत्रता आन्दोलन को नयी बुलन्दियों पर पहुँचाने में काँग्रेस पार्टी के लिए ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम्’ जैसे नारों ने अहम भूमिका निभायी। ‘जय हिन्द’ नामक सम्बोधन का जन्म तो आज़ादी के बाद हुआ।

आख़िर में, संघी ट्रोल्स को ये भी जान लेना चाहिए कि भारत के इतिहास में काल्पनिक तथ्य नहीं पढ़ाये जाते। क्योंकि इतिहासकार वामपन्थी या मुल्लापरस्त नहीं हो सकता। इतिहास-लेखन एक वैज्ञानिक विधा है और कोई भी इसे मनमाफ़िक तरीक़े से नहीं लिख सकता!

(यदि आप चाहते हैं कि आपके दोस्त या परिचित आपको लगातार मूर्ख बनाकर हाँकते नहीं रहें तो कृपया इस सन्देश को उन लोगों को ज़रूर भेजें जो आपके सामने झूठ परोसते हैं।)

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लोगों ने 3 महीनों में व्हाट्सएप पर बिताए 85 अरब घंटे

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सैन फ्रांसिस्को, 21 अगस्त | सोशल मीडिया प्लेटफार्म व्हाट्सएप के संबंध में एक रोचक जानकारी सामने आई है। एक रपट से पता चला है कि लोगों ने बीते तीन महीनों में फेसबुक के स्वामित्व वाले व्हाट्सएप पर 85 अरब घंटे समय बिताया। फोर्ब्स की सोमवार को रपट के अनुसार, अमेरिका स्थित एप विश्लेषक कंपनी एप्पटोपिया की ओर से जारी आंकड़े में बताया गया है कि बीते तीन महीनों में लोगों ने व्हाट्सएप पर अपने 85 अरब घंटे खर्च किए। इस एप को दुनिया भर में 1.5 अरब प्रयोगकर्ता इस्तेमाल करते हैं।

इसी प्रकार, प्रयोगकर्ताओं ने इस दौरान इसकी स्वामित्व वाली कंपनी, फेसबुक पर 30 अरब घंटे का समय बिताया।

एप्पटोपिया के प्रवक्ता एडम ब्लैकर ने कहा, “यह स्पष्ट है कि व्हाट्सएप पसंद किया जाने वाला वैश्विक मैसेजिंग एप है।”

दुनियाभर में प्रयोगकर्ता जिन 10 एप पर सबसे ज्यादा समय बिताते हैं, उनमें व्हाट्सएप, वीचैट, फेसबुक, मैसेंजर, पेंडोरा, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, ट्विटर, गूगल मैप्स और स्पॉटीफाई प्रमुख हैं।

–आईएएनएस

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लड़कियों की तुलना में लड़कों का यौन उत्पीड़न ज्यादा!

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Child Sexual Abuse in India

नई दिल्ली, 6 अगस्त | देश में अक्सर जब बात बच्चों से यौन उत्पीड़न के मामलों की आती है तो दिमाग में लड़कियों के साथ होने वाली यौन उत्पीड़न की घटनाएं आंखों के सामने उमड़ने लगती हैं, लेकिन इसका एक पहलू कहीं अंधकार में छिप सा गया है। महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की 2007 की रिपोर्ट दर्शाती है कि देश में 53.22 फीसदी बच्चों को यौन शोषण के एक या अधिक रूपों का सामना करना पड़ा, जिसमें से 52.94 फीसदी लड़के इन यौन उत्पीड़न की घटनाओं का शिकार हुए।

चेंज डॉट ओआरजी के माध्यम से बाल यौन उत्पीड़न के मामले को उठाने वाली याचिकाकर्ता, फिल्म निर्माता और लेखक इंसिया दरीवाला ने मुंबई से फोन पर आईएएनएस को बताया, “सबसे बड़ी समस्या है कि इस तरह के मामले कभी सामने आती ही नहीं क्योंकि हमारे समाज में बाल यौन उत्पीड़न को लेकर जो मानसिकता है उसके कारण बहुत से मामले दर्ज ही नहीं होते और होते भी हैं तो मेरी नजर में बहुत ही कम ऐसा होता है। इस तरह के मामले सामने आने पर समाज की पहली प्रतिक्रिया होती है कि लड़कों के साथ तो कभी यौन शोषण हो नहीं सकता, क्योंकि वे पुरुष हैं और पुरुषों के साथ कभी यौन उत्पीड़न नहीं होता।”

उन्होंने कहा, “समाज का जो यह नजरिया है लड़कों को देखने का ठीक नहीं है क्योंकि पुरुष बनने से पहले वह लड़के और बच्चे ही होते हैं। बच्चों की यह जो श्रेणी है काफी दोषपूर्ण है इसमें कोई लड़का-लड़की का भेद नहीं होता। लड़कों का जो शोषण हो रहा है अधिकतर पुरुषों द्वारा ही हो रहा है। मेरे हिसाब से यह काफी नजरअंदाज कर दी जाने वाली सच्चाई है और मैं पहले भी कई बार बोल चुकी हूं हम जो बच्चों व महिलाओं पर यह यौन हिंसा हमारे समाज में देख रहे हैं, कहीं न कहीं हम उसकी जड़ को नहीं पकड़ पा रहे हैं।”

लड़कों के साथ यौन उत्पीड़न होने पर बताने में कतराने की वजह के सवाल पर फिल्मनिर्माता ने कहा, “दरअसल जब समाज में किसी लड़की के साथ यौन उत्पीड़न की घटना होती है तो समाज की पहली प्रतिक्रिया हमदर्दी की होती है, उन्हें बचाने के लिए सपोर्ट सिस्टम होता है लेकिन अगर कोई लड़का अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामले को लेकर बोलता भी है तो पहले लोग उसपर हंसेंगे, उसका मजाक उड़ाएंगे व मानेंगे भी नहीं और उसकी बातों का विश्वास नहीं करेंगे, कहेंगे तुम झूठ बोल रहे हो यह तो हो नहीं सकता। हंसी और मजाक बनाए जाने के कारण लड़कों को आगे आने से डर लगता है इसलिए समाज बाल यौन उत्पीड़न में एक अहम भूमिका निभा रहा है।”

उन्होंने बताया, “पिछले एक साल में जब से मैंने अपना अभियान और लोगों से बात करना शुरू किया है तब से काफी चीजें हुई हैं। इसलिए मैं सरकार की शुक्रगुजार हूं कि कम से कम वह इस ओर ध्यान दे रहे हैं। आज सामान्य कानूनों को निष्पक्ष बनाने की प्रक्रिया चल रही है, इसकी शुरुआत पॉस्को कानून से हुई और अब धारा 377, पुरुषों के दुष्कर्म कानून को भी देखा जा रहा है। अब अखिरकार हम लोग लिंग समानता की बात कर सकते हैं, जिससे वास्तव में समानता आएगी। लिंग समानता का मतलब यह नहीं है कि वह एक लिंग को ध्यान में रखकर सारे कानून बनाए, यह सिर्फ महिलाओं की बात नहीं है। पुरुष और महिलाओं को समान रूप से सुरक्षा मिलनी चाहिए।”

लेखक इंसिया दरीवाल ने कहा, “देखिए पॉस्को कानून निष्पक्ष है लेकिन जब आप लड़कों के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में दंड के प्रावधान को देखते हैं तो वह धारा 377 के तहत दिया जाता था। जैसे पहले अगर दो पुरुषों के बीच सहमति से हुआ तो भी धारा 377 के तहत दोनों लोगों को सजा मिलती थी और नहीं हुआ तो भी दोनों को इसी धारा के तहत सजा दी जाती थी। इसमें पीड़ित को भी सजा मिलने का खतरा था, हालांकि अब चीजों में सुधार हुआ है और इसपर अब काफी चर्चा हो रही है और समाज में भी बदलाव आ रहा है।”

महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी से मिले समर्थन पर उन्होंने कहा, “उन्होंने मेरे काम की सराहना की है और कहा कि यह काम काफी जरूरी है। मैंने उनसे एक स्टडी की मांग की थी, जिसमें यह देखना था कि बाल यौन उत्पीड़न की हमारे समाज में कितनी प्रबलता है और इसके जो प्रभाव हैं वह बच्चों और पुरुषों पर क्या हैं, इसमें यौन प्रभाव, उनके संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ता है, उनके मानसिकता और शारिरिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता यह सब शामिल है। इस स्टडी के निष्कर्षो से मुझे मापदंड तैयार करने हैं और उन मापदंड़ों को मैं इसलिए तैयार करना चाहती हूं क्योंकि जब तक हम जड़ की जांच नहीं करेंगे तब तक नहीं पता चलेगा कि यह क्यों हो रहा है।”

बाल यौन उत्पीड़न मामलों में समाज की गलती के सवाल पर इंसिया ने कहा, “समाज कौन है हम लोग, इसलिए मानसिकता बदलना बहुत जरूरी है क्योंकि अगर हम लोग मानसिकता नहीं बदल पाए तो कानून कितने भी सख्त हो जाए तो उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। जब भी कोई घटना होती है तो हम सरकार, कानून और वकीलों को दोषी ठहराते हैं लेकिन हमें कहीं न कहीं खुद को भी देखना चाहिए क्योंकि हमारे समाज में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग भूमिका तैयार कर दी गई है, जिसे उन्हें निभाना पड़ता है, इसे बदलने की जरूरत है।”

भारत सरकार ने लिंग निष्पक्ष कानून बनाने के मद्दनेजर लड़कों के साथ होने वाले यौन शोषण को मौजूदा यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा (पॉस्को) अधिनियम में संशोधनों को मंजूरी दे दी है जिसे कैबिनेट के पास मंजूरी के लिए भेजा जाना बाकी है।

–आईएएनएस

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अपहरण के आरोपी सबसे अधिक सांसद-विधायक भाजपा से

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नई दिल्ली, 30 जुलाई | भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कम से कम 16 सांसदों और विधायकों के खिलाफ अपहरण से संबंधित आपराधिक मामले दर्ज हैं। यह भारत में किसी भी राजनीतिक दल से सबसे ज्यादा है। मौजूदा 4,867 सांसदों और विधायकों द्वारा दाखिल हलफनामों के एक विश्लेषण से यह खुलासा हुआ है। चुनाव एवं राजनीतिक सुधारों के लिए काम करने वाली एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स द्वारा सोमवार को यह निष्कर्ष जारी किया गया।

निष्कर्ष में कहा गया है कि 770 सांसदों और 4,086 विधायकों के हलफनामों से यह खुलासा हुआ कि 1,024 या कुछ 21 फीसदी देश के सांसदों-विधायकों ने यह घोषित किया है कि उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

इसमें से 64 ने अपने खिलाफ अपहरण से संबंधित मामलों की घोषणा की है। इसमें से 17 विभिन्न राजनीतक दलों से ताल्लुक रखते हैं, जबकि चार निर्दलीय हैं।

भाजपा इस सूची में शीर्ष पर है। जबकि कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) दोनों दूसरे स्थान पर हैं। दोनों के छह-छह सदस्य इस सूची में शामिल हैं।

एडीआर के मुताबिक, सूची में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के पांच, बीजू जनता दल (बीजद) और द्रमुक के चार-चार, समाजवादी पार्टी (सपा), तेदेपा के तीन-तीन, तृणमूल कांग्रेस, माकपा, और शिवसेना के दो-दो सदस्य शामिल हैं।

साथ ही इस सूची में लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा), जद (यू), टीआरएस और उत्तर प्रदेश की निषाद पार्टी के एक-एक सदस्य का नाम भी शामिल है।

अपहरण से संबंधित आरोपों की घोषणा करने वाले विधायकों में बिहार व उत्तर प्रदेश से नौ-नौ, महाराष्ट्र के आठ, पश्चिम बंगाल के छह, ओडिशा व तमिलनाडु से चार-चार, आंध्र प्रदेश, गुजरात व राजस्थान से तीन-तीन, और छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, पंजाब व तेलंगाना से एक-एक सदस्य शामिल हैं।

–आईएएनएस

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