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Viral सच

‘हे मूर्खज्ञ, इतना तो मोदी भी अपने बारे में नहीं जानते, जितना आपका दावा है!’

क्या आपने कभी सोचा है कि मोदी की तारीफ़ और विरोधियों के चरित्रहनन के मक़सद से लिखे गये ऐसे भ्रामक सन्देशों को कौन लिखवा और फैला रहा है? ये करतूत मोदी के ट्रोल्स की है। जिन्होंने बाक़ायदा तनख्वाहें देकर पाला-पोसा जा रहा है।

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1925 में जब से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्म हुआ, तभी से वो जिस जन्मजात विकृति से पीड़ित है उसका नाम है ‘झूठ और अफ़वाह के ज़रिये साम्प्रदायिक उन्माद फ़ैलाना, 18 फ़ीसदी मुसलमानों को 80 फ़ीसदी हिन्दुओं के अस्तित्व के ख़तरा बताना और येन-केन-प्रकारेण सत्ता पाने के लिए अपने विरोधियों का मनगढ़न्त चरित्रहनन करना। ये संघियों का स्थायी और अनुवांशिक स्वभाव रहा है। विज्ञान की भाषा में इसे ही डीएनए कहते हैं। आज़ादी से पहले जहाँ काँग्रेस की अगुवाई में चल रहे स्वतंत्रता आन्दोलन में पलीता लगाना संघ का सबसे बड़ा मक़सद था, क्योंकि ऐसा करने के लिए ही उन्हें अँग्रेज़ों ने पाला-पोसा था।

लेकिन आज़ादी के बाद जब चुनाव दर चुनाव भारत की जनता संघियों को नकारती रही तो उन्होंने झूठ की बदौलत विरोधियों का चरित्र-हनन करने को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। इसी उद्देश्य के तहत संघियों का नेहरू-गाँधी परिवार और काँग्रेस का चरित्र-हनन करने का सिलसिला लगातार जारी है। मज़े की बात ये है कि संघियों को जब-जब लगता है कि उनकी और बीजेपी की प्रतिष्ठा गिर रही है, तब-तब उनके ट्रोल्स सोशल मीडिया और ख़ासकर WhatsApp पर झूठ की सप्लाई बढ़ा देते हैं। अभी-अभी ताज़ा चुनावों में मुँह की खाने के बाद संघी ट्रोल्स ने निम्न मैसेज़ को वायरल कर दिया है। आपकी जानकारी के लिए हम उस मैसेज़ को पहले तो हूबहू यहाँ कॉपी-पेस्ट कर रहे हैं। और आगे इसकी पूरी सच्चाई भी बता रहे हैं। ताकि आपको बरगलाना नहीं जा सके।

WhatsApp पर फैलाया जा रहा झूठ

जब आप फुर्सत मे हों तब पढ़ लीजियेगा, किंतु पढ़ना धैर्य और शांति से, फिर निष्कर्ष निकलना! मोदी जी को हिंदू और मुसलमान दोनों हटाना चाहते हैं, किंतु दोनों के बीच अंतर देखिये:

हिन्दू पेट्रोल का दाम देख रहा है और मुसलमान रोहिंग्या मुसलमान को! हिन्दू जीएसटी से रूठे हैं और कांग्रेस को लाना चाहते हैं और मुसलमान भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाना चाहते हैं, इसलिए कांग्रेस को लाना चाहते हैं! कारण जो भी हो उद्देश्य सबका एक ही है! भारत में बहुत से लोग हैं, जो भ्रष्ट नेताओं की बातों में आकर नरेन्द्र मोदी का विरोध करते हैं! अच्छा है, लोकतंत्र है विरोध करें या समर्थन ये तो आपका अपना हक है, पर मोदी का विरोध करके आप समर्थन किसका कर रहे हैं, ये बडा गंभीर सवाल है, इसलिए निर्णय भी गंभीरता पूर्वक ही होना चाहिये! क्या मुलायम, लालू, मायावती, सोनिया, राहुल, केजरीवाल, ममता बनर्जी, वामपंथी ये सब नरेन्द्र मोदी से बेहतर हैं या इनका रिकॉर्ड बेहतर है?

क्या नरेन्द्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्रीकाल की तुलना मे ममता बनर्जी, अखिलेश आदि का कार्यकाल बेहतर नजर आता है? तुलना करनी है तो गुजरात के किसी छोटे शहर मे जाकर एक नजर मार लीजिये और फिर इन अन्य राज्यों की राजधानी का भ्रमण कीजिये! राजनीति मे प्रवेश के समय लालू और मुलायम, दोनों के घर की स्थिति ऎसी थी कि इनके पास साइकिल और लालटेन खरीदने तक के पैसे नहीं थे, जाति के नाम पर चलने वाले ये नेता आज अरबपति हैं, रामगोपाल चार्टर्ड प्लेन में घूमता है, तो शिवपाल ऑडी मे, कहां से आया इतना अकूत धन, क्या ये लोग नरेन्द्र मोदी से बेहतर हैं?

सोनिया जी के बेटा-बेटी और दामाद आज सभी अरबपति है, क्या ये नरेन्द्र मोदी से बेहतर हैं? क्या 35 साल बंगाल में राज करने वाले वामपंथी, नरेन्द्र मोदी से बेहतर हैं? पांच साल केजरीवाल ने विज्ञापन चलाकर दिल्ली के लोगों को चूना लगाया, WIFI, CCTV, 150 कॉलेज, 500 स्कूल, क्या ये कुकुरमुत्ता नरेंद्र मोदी से बेहतर है? जब मायावती राजनीती करने निकली थी और काशीराम की साथी थी, तब उसके घर में दिया जलाने का धन नहीं था, साईकल से प्रचार करती थी, आज उसका सैंडल भी प्लेन से आता है, उसके भाई के पास 497 कंपनियां हैं, क्या ये नरेंद्र मोदी से बेहतर है? मोदी का विरोध करने वालों, विरोध करो, पर समर्थन किसका करना है ये तो तय करो कोई बेहतर विकल्प हो तो बताना, थोड़ा देश का भी सोचो, कितना बर्बाद करवाना है, कितना लूटवाना है? बाहर निकलो जातियो के बंधनों से इसे उबारकर ये लूटेरे हमे ही लूटते हैं!

मुझे नहीं मालूम कि मैं मोदी को क्यों पसंद करता हूं, लेकिन मेरे पास कांग्रेस, सपा, बसपा, आप को नापसंद करने के बहुत कारण हैं! मुझे नहीं मालूम कि अच्छे दिन आयेंगे या नहीं, पर मोदी जी के अतिरिक्त और कोई राजनेता दूर दूर तक दिखाई नहीं देता जो भारत के अच्छे दिनों के लिए तन और मन से प्रयत्न करता हो! मुझे ये भी नहीं मालूम कि मोदी जी भारत को हिन्दू राष्ट्र बना पायेंगे या नहीं, लेकिन ये पूरा यकीन हैं कि वो पूरी संजीदगी और गंभीरता से भारत माता को पुनः विश्वगुरु का दर्जा दिलवाने हेतु प्रयासरत हैं! मुझे फर्क नहीं पड़ता कि मोदी जी के पास इतिहास की जानकारी है या नही, पर मुझे पक्का यकीन है कि उनके पास भविष्य की पूरी तैयारी है।

मोदी का गुणगान करते उपरोक्त प्रसंग की सच्चाई

क्या आपने कभी सोचा है कि मोदी की तारीफ़ और विरोधियों के चरित्रहनन के मक़सद से लिखे गये ऐसे भ्रामक सन्देशों को कौन लिखवा और फैला रहा है? ये करतूत मोदी के ट्रोल्स की है। जिन्होंने बाक़ायदा तनख्वाहें देकर पाला-पोसा जा रहा है। देश में हज़ारों युवाओं को इसी काम के लिए तैनात किया गया है। सही मायने में इन लोगों से बड़ा भारत का दुश्मन और कोई नहीं है! इनसे बहुत सावधान रहने की ज़रूरत है! अब उपरोक्त WhatsApp मैसेज़ को ही देखिए, ये पूरा का पूरा सन्देश जनता में ये भ्रम फैलाने के लिए है कि हर मोर्चे पर पूरी तरह से विफल रहे नरेन्द्र मोदी को सत्ता में रखना देश की मज़बूरी है। क्योंकि और कोई विकल्प नहीं है। इसे अँग्रेज़ी में TINA (There is no alternative) फ़ैक्टर यानी ‘विकल्प-हीनता का भ्रम फ़ैलाने की रणनीति’ कहते हैं! WhatsApp के ज़रिये फैलाये जाने वाले ऐसे सन्देश पूर्णतः मनगढ़न्त होते हैं। इसीलिए इन्हें लिखने और फ़ारवर्ड करने वालों का लोगों को पता तक नहीं चलता।

दरअसल, ऐसे मैसेज़ सिर्फ़ उन मन्दबुद्धि हिन्दुओं को बरगलाने के लिए गढ़े जाते हैं, जिनके पास सच्चाई को जानने-परखने की न तो अक्ल है और ना क़ाबलियत और ना ही फ़ुर्सत! उल्टा, ऐसे लोगों का बौद्धिक स्तर इतना अविकसित होता है कि वो न सिर्फ़ हरेक लिखित बात को सच समझते हैं, बल्कि बार-बार उन तक पहुँचने वाले लिखित झूठ पर भी यक़ीन कर लेते हैं। राजनीति में होने वाले दुष्प्रचार के लिहाज़ से देखे तो अब ऐसे झूठ को फैलाना ही बीजेपी और मोदी राज के लिए आख़िरी सहारा है! क्योंकि जनता ने अब तय कर लिया है कि तरह-तरह का झूठ फैलाकर सत्ता हथियाने वाले मोदी राज ने चार साल में ही देश को गर्त में पहुँचा दिया। लिहाज़ा, इसे 2019 में उखाड़ फेंका जाएगा! बहरहाल, फ़िलहाल तो आपको ये समझना है कि उपरोक्त मैसेज़ में सच क्या है और झूठ क्या?

मैसेज़ में लिखा है कि ‘मुसलमान भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाना चाहते हैं, इसलिए कांग्रेस को लाना चाहते हैं!’ काँग्रेस ने आज़ादी के बाद 55 साल तक सरकार चलायी। इस दौरान कौन सा इस्लामी राष्ट्र बना? उल्टा, आज़ादी के बाद पहले नेहरू ने पुर्तगाल से छीनकर गोवा को और फ्राँस से लेकर पुडुचेरी को भारत में मिलाया, तो इन्दिरा गाँधी ने पाकिस्तान के दो टुकड़े करके बाँग्लादेश की स्थापना करवायी। आज़ादी की लड़ाई में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले काँग्रेसियों ने कभी कन्धार जाकर आतंकवादियों को रिहा करने का काम नहीं किया। पाकिस्तान की आतंकवादी हरक़तों को हमेशा मुँहतोड़ जबाब दिया लेकिन कभी सर्ज़िकल हमले को फ़र्ज़ी ढोल नहीं पीटा। काँग्रेस के राज में सेना के बेहद अहम ठिकानों या संसद पर वैसे हमले कभी नहीं हुए जैसा इतिहास बीजेपी के राज में बना है।

भ्रामक मैसेज़ में आपसे पूछा जा रहा है कि ‘मोदी का विरोध करके आप समर्थन किसका कर रहे हैं?’ और ‘क्या मुलायम, लालू, मायावती, सोनिया, राहुल, केजरीवाल, ममता बनर्जी, वामपंथी ये सब नरेन्द्र मोदी से बेहतर हैं या इनका रिकॉर्ड बेहतर है?’ अब ज़रा सोचिए कि क्या लेखक ने आपको बताया है कि कैसे मोदी का रिकॉर्ड बेहतर है? आपसे कहा जाता है कि गुजरात को देखो। जबकि लिखने वाले ने ख़ुद कभी गुजरात को नहीं देखा है, न उसके गाँवों को, ना वहाँ के शहरों को ना ही वहाँ की बदहाली के सरकारी आँकड़ों को! आपसे तो बस कहा जा रहा है कि गुजरात स्वर्ग जैसा ख़ुशहाल बन चुका है! लिहाज़ा, आप यक़ीन कर लें। अरे भाई, यदि ऐसा ही है तो चार साल में बीजेपी शासित अन्य राज्यों को भी तो लघु-स्वर्ग बन जाना चाहिए था। ज़रा ऐसे किसी लघु-स्वर्ग का नाम भी ले लेते! वैसे यदि गुजरात ऐसा ही ख़ुशहाल हो चुका था जो जनता ने क्यों बीजेपी की मिट्टी पलीद कर दी? साफ़ है कि झूठ को पकड़ें!

लोकतंत्र में विरोधियों के लिए किस तरह की भाषा इस्तेमाल करने चाहिए? संस्कारी संघी इसे नहीं जानते हैं। वो विरोधियों को कुकुरमुत्ता, पप्पू वगैरह कहकर में वीरता प्रदर्शित करते हैं। वो भूल जाते हैं कि कुकुरमुत्ता ने डायनासोर का भ्रम पाले बैठे लोगों को उस अखाड़े में नेस्तनाबूद किया था, जहाँ उनके पास सात सांसद थे और चार नगर निगम! इसी तरह, जिसे आप पप्पू बताते हैं, वो आपसे बड़ी और गौरवशाली अतीत वाली पार्टी का मुखिया है। आपसे ज़्यादा शिक्षित है। आपसे ज़्यादा सभ्य और शालीन है। उसे भी उसकी पार्टी के लोगों ने वैसे ही अपना अध्यक्ष चुना है, जैसे आपकी और अन्य पार्टियों में अध्यक्ष चुने जाते हैं।

याद रखिए, देश की किसी भी पार्टी में उसके सदस्य अपने अध्यक्ष का प्रत्यक्ष-निर्वाचन (Direct Election) नहीं करते। बीजेपी में भी मुट्ठीभर लोगों ने तय किया कि उनका अध्यक्ष कौन होगा? अमित शाह हों, या नीतिन गडकरी, या राजनाथ सिंह, या लाल कृष्ण आडवाणी, या कुशाभाऊ ठाकरे, या जना कृष्णमूर्ति, या मुरली मनोहर जोशी, या बंगारू लक्ष्मण, या वेंकैया नायडू, या अटल बिहारी वाजपेयी, किसी को भी बीजेपी के सदस्यों ने वोट देकर नहीं चुना। इसी तरह, काँग्रेस ने भी राहुल गाँधी को जन्म लेते ही अपना अध्यक्ष नहीं बना लिया। न ही सोनिया, ना राजीव और ना ही इन्दिरा गाँधी ने पार्टी का क़मान वैसे पायी जैसे राजवाड़ों की रीत थी।

मैसेज़ की सबसे शानदार बात तो ये है कि इसके लेखक को ही ये नहीं पता कि वो ‘मोदी को क्यों पसंद करता’ है! उसके पास मोदी की उपलब्धियों को बताने के लिए कुछ नहीं है, लेकिन उसका मनगढ़न्त झूठ देखिए कि उसे ‘मोदी जी के अतिरिक्त और कोई राजनेता दूर दूर तक दिखाई नहीं देता!’ अरे, ये निपट धूर्त तो मोतियाबिन्द से पीड़ित निकला! और, इसे जनता का मार्गदर्शन करने का काम दिया गया है! अलबत्ता, मैसेज़ के लेखक को ये ज़रूर पता है कि मोदी जी अच्छे दिनों की बात करके देश का सत्यानाश करने का ‘प्रयत्न’ करने में कोई क़सर नहीं छोड़ रहे! जिस दिन मोदी अपने लक्ष्य का पा लेंगे, उस दिन भारत ‘हिन्दू राष्ट्र’ और ‘विश्व-गुरु’ बन जाएगा, क्योंकि उसके आराध्य मोदी जी के पास ‘इतिहास की जानकारी’ हो या ना हो, लेकिन ‘भविष्य की पूरी तैयारी’ है!

कुलमिलाकर, उपरोक्त WhatsApp मैसेज़ के लेखक के लिए ये लिखना मुफ़ीद होगा कि ‘हे मूर्खज्ञ, इतना तो मोदी भी अपने बारे में नहीं जानते, जितना आपका दावा है!’

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बदलता जलवायु, गर्माती धरती और पिघलते ग्लेशियर

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Climate change

मार्च 2014 में संयुक्त राष्ट्र की एक वैज्ञानिक समिति के प्रमुख ने चेतावनी दी है कि अगर ग्रीनहाउस गैसों का प्रदूषण कम नहीं किया गया तो जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव बेकाबू हो सकता है। ग्रीनहाउस गैसें धरती की गर्मी को वायुमंडल में अवरुद्ध कर लेती हैं, जिससे वायुमंडल का तामपान बढ़ जाता है और ऋतुचक्र में बदलाव देखे जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी समिति ने इस विषय पर 32 खंडों की एक रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट 2610 पृष्ठ की है।

समय की पुकार है कि अब कार्रवाई की जाए। ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं किया गया, तो हालात बेकाबू हो जाएंगे। नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों के दल द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोप में जानलेवा लू, अमेरिका में दावानल, आस्ट्रेलिया में भीषण सूखा और मोजाम्बिक, थाईलैंड और पाकिस्तान में प्रलयकारी बाढ़ जैसी 21वीं शताब्दी की आपदाओं ने यह दिखा दिया है कि मानवता के लिए मौसम का खतरा कितना बड़ा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अधिक बढ़ा तो खतरा और बढ़ जाएगा।

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अभी हाल ही में उत्तर भारत के कई राज्यों के साथ-साथ हिमालय पर स्थित नेपाल में आया भूकंप, उत्तराखण्ड में आई भीषण प्राकृतिक आपदा, जापान के पिछले 140 सालों के इतिहास में आए सबसे भीषण 8.9 की तीव्रता वाले भूकंप की वजह से प्रशांत महासागर में आई सुनामी के साथ ही यूरोप में जानलेवा लू, अमेरिका में दावानल, आस्ट्रेलिया में भीषण सूखा और मोजाम्बिक, थाईलैंड और पाकिस्तान में प्रलयकारी बाढ़ जैसी 21वीं शताब्दी की आपदाओं ने सारे विश्व का ध्यान इस अत्यन्त ही विनाशकारी समस्या की ओर आकर्षित किया है।

कुछ समय पूर्व पर्यावरण विज्ञान के पितामह जेम्स लवलौक ने चेतावनी दी थी कि यदि दुनिया के निवासियों ने एकजुट होकर पर्यावरण को बचाने का प्रभावशाली प्रयत्न नहीं किया तो जलवायु में भारी बदलाव के परिणामस्वरूप 21वीं सदी के अन्त तक छह अरब व्यक्ति मारे जाएंगे। संसार के एक महान पर्यावरण विशेषज्ञ की इस भविष्यवाणी को मानव जाति को हलके से नहीं लेना चाहिए।

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आज जब दक्षिण अमेरिका में जंगल कटते हैं तो उससे भारत का मानसून प्रभावित होता है। इस प्रकार प्रकृति का कहर किसी देश की सीमाओं को नहीं जानती। वह किसी धर्म किसी जाति व किसी देश व उसमें रहने वाले नागरिकों को पहचानती भी नहीं। वास्तव में आज पूरे विश्व के जलवायु में होने वाले परिवर्तन मनुष्यों के द्वारा ही उत्पन्न किये गये हैं। परमात्मा द्वारा मानव को दिया अमूल्य वरदान है पृथ्वी, लेकिन चिरकाल से मानव उसका दोहन कर रहा है। पेड़ों को काटकर, नाभिकीय यंत्रों का परीक्षण कर वह भयंकर जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण फैला रहा है। जिस पृथ्वी का वातावरण कभी पूरे विश्व के लिए वरदान था आज वहीं अभिशाप बनता जा रहा है।

डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में दिसम्बर, 2010 में आयोजित सम्मेलन में दुनिया भर के 192 देशों से जुटे नेता जलवायु परिवर्तन से संबंधित किसी भी नियम को बनाने में सफल नहीं हुए थे। इस सम्मेलन के तुरंत बाद आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ब्राउन ने कहा कि ‘यह तो बस एक पहला कदम है, इसे कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाने से पहले बहुत से कार्य किये जाने हैं। असली दिक्कत यह है कि सार्वभौमिक हित का मसला होते हुए भी यहा राष्ट्रीय हितों का विकट टकराव है। हमारा मानना है कि कई दशकों से पर्यावरण बचाने के लिए माथापच्ची कर रही दुनिया अब अलग-अलग देशों के कानूनों से ऊब चुकी है। विश्व की कई जानी-मानी हस्तियों का मानना है कि अब अंतर्राष्ट्रीय अदालत बनाने का ही रास्ता बचा है, ताकि हमारी गलतियों की सजा अगली पीढ़ी को न झेलनी पड़ी।

अभी हाल ही में सैन फ्रांसिस्को स्थित गोल्डमैन एनवार्नमेंट फाउंडेशन द्वारा भारत के रमेश अग्रवाल को पर्यावरण के सबसे बड़े पुरस्कार ‘गोल्डमैन प्राइज’ से नवाजा गया है। उन्होंने छत्तीसगढ़ में अंधाधुंध कोयला खनन से निपटने में ग्रामीणों ने मदद की और एक बड़ी कोयला परियोजना को बंद कराया। रमेश अग्रवाल छत्तीसगढ़ में काम करते हैं और वह लोगों की मदद से एक बड़े प्रस्तावित कोयला खनन को बंद कराने में सफल रहे। उनके साथ इस पुरस्कार को पाने वाले अन्य लोगों में पेरु, रूस, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया और अमरीका के 6 पर्यावरण कार्यकर्ता शामिल हैं। इन सभी विजेताओं को प्रत्येक को पौने दो लाख डालर की राशि मिलेगी। इससे पहले ग्लोबल वार्मिग के खिलाफ लड़ाई के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के क्लाइमेट पैनल के राजेन्द्र पचौरी और अमेरिका के पूर्व उप राष्ट्रपति अलगोर को शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

हमारी पूर्व पीढ़ियों ने तो हमारे भविष्य की चिंता की और प्रकृति की धरोहर को संजोकर रखा जबकि वर्तमान पीढ़ी प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन करने में लगी है। एक बार गांधीजी ने दातुन मंगवाई। किसी ने नीम की पूरी डाली तोड़कर उन्हें ला दिया। यह देखकर गांधीजी उस व्यक्ति पर बहुत बिगड़े। उसे डांटते हुए उन्होंने कहा ‘जब छोटे से टुकड़े से मेरा काम चल सकता था तो पूरी डाली क्यों तोड़ी? यह न जाने कितने व्यक्तियों के उपयोग में आ सकती थी।’ गांधीजी की इस फटकार से हम सबको भी सीख लेनी चाहिए। प्रकृति से हमें उतना ही लेना चाहिए जितने से हमारी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है।

जलवायु परिवर्तन की समस्या पर अभी हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी कहा है कि जलवायु परिवर्तन पृथ्वी पर ऐसे बदलाव ला रहा है जिससे मानव जाति पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने अमेरिका के लोगों से स्वस्थ एवं बेहतर भविष्य के लिए पर्यावरण सुरक्षा का आग्रह किया। वास्तव में आज मानव और प्रकृति का सह-संबंध सकारात्मक न होकर विध्वंसात्मक होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में पर्यावरण का प्रदूषण सिर्फ किसी राष्ट्र विशेष की निजी समस्या न होकर एक सार्वभौमिक चिंता का विषय बन गया है। पर्यावरण असंतुलन हर प्राणी को प्रभावित करता है। इसलिए पर्यावरण असंतुलन पर अब केवल विचार-विमर्श के लिए बैठकें आयोजित नहीं करना है वरन अब उसके लिए ठोस पहल करने की आवश्यकता है, अन्यथा बदलता जलवायु, गर्माती धरती और पिघलते ग्लेशियर जीवन के अस्तित्व को ही संकट में डाल देंगे। अत: जरूरी हो जाता है कि विश्व का प्रत्येक नागरिक पर्यावरण समस्याओं के समाधान हेतु अपना-अपना योगदान दें।

विश्व भर में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाले खतरों से निपटने के लिए विश्व के सभी देशों को एक मंच पर आकर तत्काल विश्व संसद, विश्व सरकार तथा विश्व न्यायालय के गठन पर सर्वसम्मति से निर्णय लिया जाना चाहिए। इस विश्व संसद द्वारा विश्व के 2.4 अरब बच्चों के साथ ही आगे जन्म लेने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए जो भी नियम व कानून बनाए जाए, उसे विश्व सरकार द्वारा प्रभावी ढंग से लागू किया जाए और यदि इन कानूनों का किसी देश द्वारा उल्लघंन किया जाए तो उस देश को विश्व न्यायालय द्वारा दण्डित करने का प्राविधान पूरी शक्ति के साथ लागू किया जाए। इस प्रकार विश्व के 2.4 अरब बच्चों के साथ ही आगे जन्म लेने वाली पीढ़ियों को जलवायु परिवर्तन जैसे महाविनाश से बचाने के लिए अति शीघ्र विश्व संसद, विश्व सरकार एवं विश्व न्यायालय का गठन नितान्त आवश्यक है। (आईएएनएस/आईपीएन)

( आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं।)

— आईएएनएस

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BJP कॉर्पोरेट की चहेती, 5 पार्टियों के संयुक्त चंदे से 9 गुणा अधिक चंदा मिला : report

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नई दिल्ली, 30 मई | सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) को वर्ष 2016-17 में पांच राष्ट्रीय पार्टियों के संयुक्त चंदे का नौ गुणा चंदा प्राप्त हुआ है। एक रपट से यह खुलासा हुआ। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने बुधवार को अपनी रपट में बताया, “भाजपा कॉर्पोरेट दानदाताओं के लिए स्पष्ट रूप से पसंदीदा पार्टी है। इनके द्वारा चंदे के रूप में दी गई यह राशि कांग्रेस को पहले दी गई राशि से 14 गुणा ज्यादा है।”

20,000 रुपये से अधिक चंदा पाने वाली सात राष्ट्रीय पार्टियों द्वारा घोषित चंदे की कुल राशि 589.38 करोड़ रुपये है, जिसे 2,123 चंदों (निजी और कॉर्पोरेट) के द्वारा दिया गया।

भाजपा ने 1,194 चंदों के जरिए प्राप्त 532.27 करोड़ रुपये की घोषणा की, जबकि कांग्रेस ने 599 चंदों के जरिए प्राप्त 41.90 करोड़ रुपये की घोषणा की।

रपट के अनुसार, “एक ही समय में भाजपा द्वारा घोषित चंदा कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी(राकांपा), मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी(माकपा), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) और तृणमूल कांग्रेस द्वारा मिलाकर घोषित किए गए चंदे का नौ गुणा ज्यादा है।”

मायावती की बहुजन समाज पार्टी(बसपा) ने घोषणा की है कि पार्टी को वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान 20,000 रुपये से ज्यादा का चंदा नहीं मिला।

 

रपट के अनुसार, “वित्त वर्ष 2016-17 में कॉर्पोरेट सेक्टर ने 708 चंदों के रूप में 563.24 करोड़ रुपये का चंदा दिया, जबकि 1,354 व्यक्तिगत डोनरों ने 25.07 करोड़ रुपये चंदे के रूप में दिए।”

कॉर्पोरेट घरानों ने भाजपा को 531 बार 515.43 करोड़ रुपये चंदे के रूप में दिए, जबकि 663 व्यक्तिगत डोनरों ने 16.82 करोड़ रुपये चंदे के तौर पर दिए।

वहीं कांग्रेस को कॉर्पोरेट घरानों ने 98 बार चंदा दिया, जिससे उसे 36.06 करोड़ रुपये प्राप्त हुए, वहीं इसी दौरान 501 व्यक्तिग डोनरों ने 5.84 करोड़ रुपये का चंदा दिया।

–आईएएनएस

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संघी ट्रोल ये झूठ क्यों फैला रहे हैं कि नेहरू ने अपनी बीमार पत्नी का ख़्याल नहीं रखा?

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nehru kamla

1925 से ही झूठ और अफ़वाह फ़ैलाना संघियों का स्थायी स्वभाव रहा है। आज़ादी से पहले जहाँ काँग्रेस की अगुवाई में चल रहे स्वतंत्रता आन्दोलन में पलीता लगाना संघ का मक़सद था, वहीं आज़ादी के बाद जब चुनाव दर चुनाव भारत की जनता संघियों को नकारती रही तो उन्होंने झूठ की बदौलत विरोधियों का चरित्र-हनन करने को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। इसी उद्देश्य के तहत जवाहर लाल नेहरू को लेकर असंख्य झूठ गढ़े और फैलाये गये। फिर भी जनता को संघियों पर यक़ीन नहीं हुआ। गाँधी के हत्यारों की जमात को जनता ने हमेशा हाशिये पर ही रखा। आगे चलकर चरित्र-हनन के दायरे में इन्दिरा, राजीव, सोनिया और राहुल जैसे गाँधी-नेहरू परिवार के हरेक सदस्य को खींच लिया गया।

मज़े की बात ये है कि संघियों को जब-जब लगता है कि उनकी प्रतिष्ठा गिर रही है, तब-तब उनके ट्रोल्स सोशल मीडिया और ख़ासकर WhatsApp पर झूठ की सप्लाई बढ़ा देते हैं। अभी चुनावी माहौल में गुजरात के ट्रोल्स ने निम्न मैसेज़ को वायरल कर दिया है। आपकी जानकारी के लिए हम उस मैसेज़ को हूबहू यहाँ कॉपी-पेस्ट कर रहे हैं। साथ ही पूरे प्रसंग की सच्चाई भी बता रहे हैं। ताकि नयी पीढ़ी को बरगलाना मुमकिन नहीं हो सके।

WhatsApp पर फैलाया जा रहा झूठ

जवाहर लाल नेहरु ने अपनी पत्नी के साथ जो किया वो इतना भयावह था की जान कर आप नेहरु से नफरत करने लगेंगे..

टीवी चैनेल पर कांग्रेस पार्टी के नेताओ के द्वारा अक्सर ये आरोप लगते हुए सुना जाता है की प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी पत्नी को छोड़ दिया. लेकिन क्या आप को यह पता है जवाहर लाल नेहरु ने अपनी पत्नी के साथ क्या किया?

जवाहरलाल नेहरु की पत्नी कमला नेहरु को टीबी हो गया था.. उस जमाने में टीबी की दहशत ठीक ऐसा ही थी जैसे आज एड्स की है.. क्योंकि तब टीबी का इलाज नही था और इन्सान तिल तिल तडप तडप कर पूरी तरह गलकर हड्डी का ढांचा बनकर मरता था… और कोई भी टीबी मरीज के पास भी नहीं जाता था क्योंकि टीबी सांस से फैलती थी… लोग मरीजोंको पहाड़ी इलाके में बने टीबी सेनिटोरियम में भर्ती कर देते थे..

नेहरु ने अपनी पत्नी को युगोस्लाविया [आज चेक रिपब्लिक] के प्राग शहर में दुसरे इन्सान के साथ सेनिटोरियम में भर्ती कर दिया..

कमला नेहरु पुरे दस सालो तक अकेले टीबी सेनिटोरियम में पल पल मौत का इंतजार करती रही.. लेकिन नेहरु दिल्ली में एडविना बेंटन के साथ इश्क करते थे.. सबसे शर्मनाक बात तो ये है की इस दौरान नेहरु कई बार ब्रिटेन गये लेकिन एक बार भी उन्होंने प्राग जाकर अपनी धर्मपत्नी का हालचाल नही लिया.

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को जब पता चला तब वो प्राग गये.. और डाक्टरों से और अच्छे इलाज के बारे में बातचीत की.. प्राग के डाक्टरों ने बोला की स्विट्जरलैंड के बुसान शहर में एक आधुनिक टीबी होस्पिटल है जहाँ इनका अच्छा इलाज हो सकता है..

तुरंत ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने उस जमाने में 70 हजार रूपये इकट्ठे किये और उन्हें विमान से स्विटजरलैंड के बुसान शहर में होस्पिटल में भर्ती किया..

लेकिन कमला नेहरु असल में मन से बेहद टूट चुकी थी.. उन्हें इस बात का दुःख था की उनका पति उनके पास पिछले दस सालो से हाल चाल लेने तक नही आया और गैर लोग उनकी देखभाल कर रहे है..दो महीनों तक बुसान में भर्ती रहने के बाद 28 February 1936 को बुसान में ही कमला नेहरु की मौत हो गयी..

उनके मौत के दस दिन पहले ही नेताजी सुभाषचन्द्र ने नेहरु को तार भेजकर तुरंत बुसान आने को कहा था.. लेकिन नेहरु नही आये.. फिर नेहरु को उनकी पत्नी की मौत की खबर भेजी गयी.. फिर भी नेहरु अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार में भी नही आये..

अंत में स्विटजरलैंड के बुसान शहर में ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने नेहरु की पत्नी कमला नेहरु का अंतिम संस्कार करवाया. जिस व्यक्ति ने अपनी पत्नी के साथ ऐसा व्यवहार किया उसे हम चाचा नेहरू कहते हैं।

यह मेसेज इतना फैलाओ की मोदी मजबुर हो जावे और चाचा की पदवी निकाल ली जावे.

कमला नेहरू के उपरोक्त प्रसंग की सच्चाई

1. ये व्याख्या ही पूरी तरह से भ्रष्ट है कि नेहरू के नक्शे-क़दम पर चलकर नरेन्द्र मोदी ने अपनी पत्नी जशोदाबेन को लावारिस छोड़ दिया! पहला सवाल ये है कि क्या जशोदाबेन भी लाइलाज़ और जानलेवा तपेदिक (टीबी) से पीड़ित थीं कि मोदी ने उनके साथ सात-फेरों की लाज़ नहीं निभायी? यदि नहीं, तो ये तुलना वैसी ही है जैसे किसी Reptile या Insect की तुलना Mammal से की जाए? ऐसा सिर्फ़ लोगों को मूर्ख बनाने के लिए ही किया जा सकता है। लिहाज़ा, ये समझना बहुत ज़रूरी है कि आपको कौन मूर्ख बना रहा है और क्यों? ऐसा करके वो क्या हासिल करना चाहता है?

2. जवाहर लाल नेहरू और उनकी पत्नी कमला नेहरू का वैवाहिक जीवन बेहद सुखमय था। कमला अपने पति जवाहर और बेटी इन्दिरा के लिए बहुत बड़ी प्रेरणा स्रोत थीं। अपने पूरे परिवार की तरह कमला भी आज़ादी के परवानों में शुमार थीं। बीमार होने से पहले तक कमला नेहरू ने स्वतंत्रता आन्दोलन में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। कमला के तमाम क्रियाकलाप सबूतों के साथ मौजूद हैं। लेकिन वो आपको कभी नहीं बताया जाएगा। क्योंकि संघी ट्रोल्स का मक़सद नेहरू ख़ानदान का चरित्रहनन करना है, जो तरह-तरह के झूठ फैलाने के सिवाय किसी और तरीके से नहीं हो सकता!

3. पोस्ट में लिखी ये बात सही है कि उस ज़माने में टीबी को लेकर जो दहशत थी, वैसी तो आज एड्स को लेकर भी नहीं है। क्योंकि टीबी का संक्रमण हवा में फैलता है। लेकिन एड्स के मामले में ऐसा नहीं है। इसीलिए तब टीबी के मरीज़ों को एकान्त में रखा जाता था। गाँवों में तो लोग अपने घरों से दूर अलग कमरा या झोपड़ी बनाकर मरीज़ को रखकर उसकी यथासम्भव सेवा करते थे। तब अमीर हो या ग़रीब, टीबी के हरेक मरीज़ को जीर्णहीन बनने तक अपनी मौत का इन्तज़ार ही करना पड़ता था। हालाँकि, सम्पन्न होने की वजह से मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरू ने कमला नेहरू का यथासम्भव इलाज़ करवाया था।

4. कमला नेहरू का जन्म 1 अगस्त 1899 को हुआ। 17 साल की उम्र में 8 फरवरी 1916 को जवाहर लाल से उनकी शादी हुई। 19 नवम्बर 1917 को इन्दिरा प्रियदर्शिनी का जन्म हुआ। इसके सात साल बाद अक्टूबर 1924 में कमला नेहरू ने एक पुत्र को भी जन्म दिया। लेकिन वो हफ़्ते भर में ही चल बसा। अपने सास-ससुर और पति की तरह कमला भी स्वतंत्रता सेनानी थीं। उन्होंने 1921 के असहयोग आन्दोलन में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। इलाहाबाद में महिलाओं के कई दस्ते बनाकर विदेशी कपड़ों और शराब की होली जलाये जाने की मुहिम का नेतृत्व किया। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान जवाहर लाल नौ बार जेल गये। असहयोग आन्दोलन के वक़्त जब अँग्रेज़ों ने देशद्रोहपूर्ण भाषण देने के लिए उन्हें जेल में डाल दिया तो कमला नेहरू ने पति की जगह उनका भाषण पढ़ा। इसी वजह से जल्द ही अँग्रेज़ों को कमला नेहरू भी बेहद ख़तरनाक लगने लगीं। इसीलिए, उन्हें अपनी सास स्वरूपरानी और सरोजिनी नायडू के साथ दो बार जेल जाना पड़ा।

5. 1934 के आख़िरी महीनों में कमला नेहरू की सेहत अक्सर ख़राब रहने लगी। तब उनकी देखरेख के लिए इलाहाबाद के स्वराज भवन में एक डिस्पेंसरी बनवायी गयी। इसमें ही स्वतंत्रता आन्दोलन के घायलों का उपचार भी होने लगा। लेकिन 1935 के शुरुआती महीनों में जब ये पता चला कि कमला को टीबी हो गया है, तब उन्हें नैनीताल के भोवाली सैनिटोरियम में भेज दिया गया। वहाँ कमला 10 मार्च से 15 मई 1935 तक रहीं। उस वक़्त जवाहर लाल नेहरू, अलमोड़ा जेल में बन्द थे। भोवाली में जब कमला की सेहत कुछ सुधरी तब उन्हें वहीं से स्विटज़रलैंड भेजा गया। जहाँ से 1935 में वो कुछ स्वस्थ होकर भारत लौटीं भी। लेकिन थोड़े समय में ही उनकी तबीयत फिर से बिगड़ गयी तो उन्हें वापस स्विटज़रलैंड ले जाया गया। वहीं, कमला ने 28 फरवरी 1936 को अन्तिम साँस ली।

6. इससे पहले, कमला की बिगड़ी सेहत के आधार पर जवाहर लाल नेहरू को जेल से पैरोल मिला तो वो अक्टूबर 1935 में कमला से मिलने स्विटज़रलैंड भी गये थे। मृत्यु के बाद कमला को स्विटज़रलैंड में ही दफ़्नाना पड़ा, क्योंकि टीबी संक्रमण के वजह से न तो उनके शव को भारत लाना सम्भव था और न ही वहाँ उनका दाह-संस्कार करने की अनुमति थी।

7. कमला के निधन के बाद उनकी याद में महात्मा गाँधी ने स्वराज भवन की डिस्पेंसरी को एक बड़े अस्पताल में तब्दील करवा दिया। वही कमला नेहरू अस्पताल आज भी इलाहाबाद का एक बहुत बड़ा महिला अस्पताल है, जिसे सरकार नहीं बल्कि ट्रस्ट चलाता है। कमला की बीमारी के वक़्त नेहरू परिवार पर आज़ादी के आन्दोलन का जुनून इस क़दर सवार था कि ख़ुद नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ‘मैंने उसकी बहुत अनदेखी की! उसकी मौत से मैं तबाह हो चुका था! कई महीने तक मैं शोक में डूबा रहा!’ ज़रा सोचिए कि ये शब्द अफ़सोस या पश्चाताप के हैं या बिगड़े दाम्पत्य के प्रतीक? लेकिन नेहरू का चरित्रहनन करने वाले इसे कभी नहीं समझ पाएँगे!

8. संघियों के घृणित पोस्ट में लिखे गये ‘प्राग, बुसान, 70 हज़ार रुपये इक्कठा करना और एडविना से इश्क़’ की कहानी भी कपोल-कल्पना है। कमला कभी प्राग़ के किसी टीबी सैनिटोरियम में भर्ती नहीं रहीं। न ही सुभाष चन्द्र बोस ने उन्हें प्राग से स्विटज़रलैंड भिजवाने जैसा कोई काम किया। हाँ, ये सही है कि जब काँग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू जेल में थे तो बोस ने वियना (आस्ट्रिया) की यात्रा की थी। वहीं से वो स्विटज़रलैंड के बडेनवीलर में टीबी सैनिटोरियम में भर्ती कमला नेहरू को देखने भी गये थे। उन्होंने ही जवाहर को तार भेजकर उनके अन्तिम दिनों में होने की इत्तेला भी दी थी। उसी तार के आधार पर नेहरू को जेल से पैरोल मिला। लेकिन जवाहर और इन्दिरा के बडेनवीलर पहुँचने से पहले कमला ने दम तोड़ दिया। इस दौरान सुभाष चन्द्र बोस वहीं रुके रहे, क्योंकि उनकी जवाहर लाल नेहरू से शानदार दोस्ती थी। सुभाष ने ही कमला के अन्तिम संस्कार का सारा इन्तज़ाम भी सम्भाला था।

9. नेहरू और बोस के रिश्ते इतने प्रगाढ़ थे कि ख़ुद नेहरू ने 1937 में अपने बाद सुभाष को ही काँग्रेस का अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव रखा था। इसका महात्मा गाँधी ने भी समर्थन किया था। कमला के निधन के बाद, सुभाष के विदेश से लौटते ही मई 1936 में अँग्रेज़ों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया था। सुभाष चन्द्र बोस की मौत आज़ादी से दो साल पहले 18 अगस्त 1945 को ताइवान में हुए एक विमान हादसे में हुई। लेकिन संघियों ने हमेशा उनकी मौत को लेकर ख़ूब दुष्प्रचार किया। अफ़वाह फैलायी गयी कि नेहरू ने सुभाष को मरवा दिया। बोस की मौत को लेकर कई जाँच आयोग भी बने। इस बीच भी संघी झूठ फैलाते रहे कि सुभाष की मौत से जुड़ी ‘फ़ाइलों’ में ऐसी गोपनीय बातें हैं जिससे नेहरू-गाँधी परिवार और काँग्रेस शर्मसार हो सकती है, इसलिए उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जाता!

10. सुभाष की बदौलत नेहरू का चरित्र-हनन करने वाले इस सच्चाई को बिल्कुल भुला देते हैं कि नेहरू और बोस, दोनों ही काँग्रेस के समाजवादी खेमे के नेता थे। उनके बीच कोई निजी मतभेद नहीं था। अलबत्ता, सुभाषचन्द्र बोस की ‘सैन्यवादी प्रवृत्ति’ को गाँधी और नेहरू जैसे उनके अनुयायी उचित नहीं मानते थे। नेहरू और बोस के बीच परस्पर सम्मान ऐसा था कि सुभाष चन्द्र बोस ने जब आज़ाद हिन्द फ़ौज बनायी तो उसके एक ब्रिगेड का नाम ‘नेहरू’ रखा गया! यहाँ तक कि गाँधीजी को भी ‘राष्ट्रपिता’ का सम्बोधन देने वाले नेताजी ही थे!

11. नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद, संघियों ने एक बार फिर से अपनी चरित्र-हनन की रणनीति को ख़ूब हवा दी। वो जहाँ-तहाँ सरदार पटेल, आम्बेडकर, सुभाष चन्द्र बोस जैसे नेताओं से अपनी और संघ परिवार की वैचारिक नज़दीकियाँ दिखाने का भ्रम फैलाने लगे। जबकि इसमें लेस-मात्र भी सच नहीं है। इस बात के असंख्य सबूत मौजूद हैं कि काँग्रेस के ये सभी महान नेता संघियों को बुरी तरह से नापसन्द करते थे, जो महात्मा गाँधी की हत्या के बाद काफ़ी बढ़ चुकी थी। मोदी राज में ‘बोस फ़ाइल्स’ का ख़ूब हल्ला मचाया गया। तब जनवरी 2016 में बोस से जुड़ी कई गोपनीय फ़ाइलें सार्वजनिक भी गयीं। लेकिन इससे जो तथ्य सामने आये, उससे तो भगवा ख़ानदान के हाथ से तोते ही उड़ गये। दशकों से संघियों की ओर फैलाये जा रहे दुष्प्रचार पर भी पानी फिर गया।

12. इन्हीं ‘बोस फ़ाइल्स’ से पहली बार पता चला कि जवाहर लाल नेहरू ने वियना में रह रही सुभाष चन्द्र बोस की बेटी अनिता बोस को हर महीने आर्थिक मदद भिजवाने की व्यवस्था की थी। इसके लिए 23 मई 1954 को ‘अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी’ (एआईसीसी) ने नेताजी की बेटी अनिता बोस के लिए 2 लाख रुपये की पूँजी से एक ट्रस्ट बनाया। नेहरू और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिधान चन्द्र रॉय, इसके ट्रस्टी थे। ट्रस्ट के ज़रिये अनिता बोस को हर महीने 500 रुपये की आर्थिक मदद दी जाती थी। 23 मई 1954 को नेहरू की ओर से हस्ताक्षरित एक दस्तावेज़ के अनुसार, “डॉ. बी. सी. राय और मैंने आज वियना में सुभाष चन्द्र बोस की बच्ची के लिए एक ट्रस्ट डीड पर हस्ताक्षर किये हैं। दस्तावेज़ों को सुरक्षित रखने के लिए मैंने उनकी मूल प्रति एआईसीसी को दे दी है।”

13. 1954 से लेकर 1964 तक तक अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी की ओर से अनिता बोस को सालाना 6,000 रुपये की मदद भेजी जाती रही। इसे 1965 में अनिता की शादी के बाद बन्द कर दिया गया। यहाँ ये समझना भी बहुत ज़रूरी है कि उस ज़माने में 500 रुपये महीना अपने आप में ख़ासी बड़ी रक़म थी, क्योंकि इतना वेतन तो बड़े-बड़े अफ़सरों का भी नहीं होता था! इस प्रसंग का एक दिलचस्प पहलू ये भी रहा कि जवाहर लाल नेहरू ने कभी अपनी नेक़-दिली का ढिंढ़ोरा नहीं पीटा। यहाँ तक कि इन्दिरा, राजीव, सोनिया और राहुल वग़ैरह ने भी कभी इन जानकारियों का सियासी लाभ बटोरने की कोशिश नहीं की। एक ओर ये ऐतिहासिक तथ्य हैं और दूसरी ओर है संघियों की जगज़ाहिर बदनीयत!

आख़िर में मेरी बात

संघियों के झूठ से भरा उपरोक्त पोस्ट जब मेरे पास आया तो मैंने उसे मेरे पास फ़ारवर्ड करने वाले व्यक्ति को पूरी सच्चाई लिखकर भेजी। वो भी इस आग्रह के साथ कि वो भी मेरे जबाव को उन लोगों को फ़ारवर्ड कर दें, जो झूठ के फ़ैक्ट्री के मुफ़्त के सेल्समैन बन जाते हैं। इस तरह यदि उन सभी लोगों तक सच्चाई पहुँच जाएगी जिनके दिमाग़ में लगातार झूठ का ज़हर भरा जा रहा है, तो आने वाले पीढ़ियाँ ग़ुमराह होने से बच जाएँगी और संघियों को मंसूबों पर पानी फिर जाएगा।

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