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Viral सच

‘हे मूर्खज्ञ, इतना तो मोदी भी अपने बारे में नहीं जानते, जितना आपका दावा है!’

क्या आपने कभी सोचा है कि मोदी की तारीफ़ और विरोधियों के चरित्रहनन के मक़सद से लिखे गये ऐसे भ्रामक सन्देशों को कौन लिखवा और फैला रहा है? ये करतूत मोदी के ट्रोल्स की है। जिन्होंने बाक़ायदा तनख्वाहें देकर पाला-पोसा जा रहा है।

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1925 में जब से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्म हुआ, तभी से वो जिस जन्मजात विकृति से पीड़ित है उसका नाम है ‘झूठ और अफ़वाह के ज़रिये साम्प्रदायिक उन्माद फ़ैलाना, 18 फ़ीसदी मुसलमानों को 80 फ़ीसदी हिन्दुओं के अस्तित्व के ख़तरा बताना और येन-केन-प्रकारेण सत्ता पाने के लिए अपने विरोधियों का मनगढ़न्त चरित्रहनन करना। ये संघियों का स्थायी और अनुवांशिक स्वभाव रहा है। विज्ञान की भाषा में इसे ही डीएनए कहते हैं। आज़ादी से पहले जहाँ काँग्रेस की अगुवाई में चल रहे स्वतंत्रता आन्दोलन में पलीता लगाना संघ का सबसे बड़ा मक़सद था, क्योंकि ऐसा करने के लिए ही उन्हें अँग्रेज़ों ने पाला-पोसा था।

लेकिन आज़ादी के बाद जब चुनाव दर चुनाव भारत की जनता संघियों को नकारती रही तो उन्होंने झूठ की बदौलत विरोधियों का चरित्र-हनन करने को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। इसी उद्देश्य के तहत संघियों का नेहरू-गाँधी परिवार और काँग्रेस का चरित्र-हनन करने का सिलसिला लगातार जारी है। मज़े की बात ये है कि संघियों को जब-जब लगता है कि उनकी और बीजेपी की प्रतिष्ठा गिर रही है, तब-तब उनके ट्रोल्स सोशल मीडिया और ख़ासकर WhatsApp पर झूठ की सप्लाई बढ़ा देते हैं। अभी-अभी ताज़ा चुनावों में मुँह की खाने के बाद संघी ट्रोल्स ने निम्न मैसेज़ को वायरल कर दिया है। आपकी जानकारी के लिए हम उस मैसेज़ को पहले तो हूबहू यहाँ कॉपी-पेस्ट कर रहे हैं। और आगे इसकी पूरी सच्चाई भी बता रहे हैं। ताकि आपको बरगलाना नहीं जा सके।

WhatsApp पर फैलाया जा रहा झूठ

जब आप फुर्सत मे हों तब पढ़ लीजियेगा, किंतु पढ़ना धैर्य और शांति से, फिर निष्कर्ष निकलना! मोदी जी को हिंदू और मुसलमान दोनों हटाना चाहते हैं, किंतु दोनों के बीच अंतर देखिये:

हिन्दू पेट्रोल का दाम देख रहा है और मुसलमान रोहिंग्या मुसलमान को! हिन्दू जीएसटी से रूठे हैं और कांग्रेस को लाना चाहते हैं और मुसलमान भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाना चाहते हैं, इसलिए कांग्रेस को लाना चाहते हैं! कारण जो भी हो उद्देश्य सबका एक ही है! भारत में बहुत से लोग हैं, जो भ्रष्ट नेताओं की बातों में आकर नरेन्द्र मोदी का विरोध करते हैं! अच्छा है, लोकतंत्र है विरोध करें या समर्थन ये तो आपका अपना हक है, पर मोदी का विरोध करके आप समर्थन किसका कर रहे हैं, ये बडा गंभीर सवाल है, इसलिए निर्णय भी गंभीरता पूर्वक ही होना चाहिये! क्या मुलायम, लालू, मायावती, सोनिया, राहुल, केजरीवाल, ममता बनर्जी, वामपंथी ये सब नरेन्द्र मोदी से बेहतर हैं या इनका रिकॉर्ड बेहतर है?

क्या नरेन्द्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्रीकाल की तुलना मे ममता बनर्जी, अखिलेश आदि का कार्यकाल बेहतर नजर आता है? तुलना करनी है तो गुजरात के किसी छोटे शहर मे जाकर एक नजर मार लीजिये और फिर इन अन्य राज्यों की राजधानी का भ्रमण कीजिये! राजनीति मे प्रवेश के समय लालू और मुलायम, दोनों के घर की स्थिति ऎसी थी कि इनके पास साइकिल और लालटेन खरीदने तक के पैसे नहीं थे, जाति के नाम पर चलने वाले ये नेता आज अरबपति हैं, रामगोपाल चार्टर्ड प्लेन में घूमता है, तो शिवपाल ऑडी मे, कहां से आया इतना अकूत धन, क्या ये लोग नरेन्द्र मोदी से बेहतर हैं?

सोनिया जी के बेटा-बेटी और दामाद आज सभी अरबपति है, क्या ये नरेन्द्र मोदी से बेहतर हैं? क्या 35 साल बंगाल में राज करने वाले वामपंथी, नरेन्द्र मोदी से बेहतर हैं? पांच साल केजरीवाल ने विज्ञापन चलाकर दिल्ली के लोगों को चूना लगाया, WIFI, CCTV, 150 कॉलेज, 500 स्कूल, क्या ये कुकुरमुत्ता नरेंद्र मोदी से बेहतर है? जब मायावती राजनीती करने निकली थी और काशीराम की साथी थी, तब उसके घर में दिया जलाने का धन नहीं था, साईकल से प्रचार करती थी, आज उसका सैंडल भी प्लेन से आता है, उसके भाई के पास 497 कंपनियां हैं, क्या ये नरेंद्र मोदी से बेहतर है? मोदी का विरोध करने वालों, विरोध करो, पर समर्थन किसका करना है ये तो तय करो कोई बेहतर विकल्प हो तो बताना, थोड़ा देश का भी सोचो, कितना बर्बाद करवाना है, कितना लूटवाना है? बाहर निकलो जातियो के बंधनों से इसे उबारकर ये लूटेरे हमे ही लूटते हैं!

मुझे नहीं मालूम कि मैं मोदी को क्यों पसंद करता हूं, लेकिन मेरे पास कांग्रेस, सपा, बसपा, आप को नापसंद करने के बहुत कारण हैं! मुझे नहीं मालूम कि अच्छे दिन आयेंगे या नहीं, पर मोदी जी के अतिरिक्त और कोई राजनेता दूर दूर तक दिखाई नहीं देता जो भारत के अच्छे दिनों के लिए तन और मन से प्रयत्न करता हो! मुझे ये भी नहीं मालूम कि मोदी जी भारत को हिन्दू राष्ट्र बना पायेंगे या नहीं, लेकिन ये पूरा यकीन हैं कि वो पूरी संजीदगी और गंभीरता से भारत माता को पुनः विश्वगुरु का दर्जा दिलवाने हेतु प्रयासरत हैं! मुझे फर्क नहीं पड़ता कि मोदी जी के पास इतिहास की जानकारी है या नही, पर मुझे पक्का यकीन है कि उनके पास भविष्य की पूरी तैयारी है।

मोदी का गुणगान करते उपरोक्त प्रसंग की सच्चाई

क्या आपने कभी सोचा है कि मोदी की तारीफ़ और विरोधियों के चरित्रहनन के मक़सद से लिखे गये ऐसे भ्रामक सन्देशों को कौन लिखवा और फैला रहा है? ये करतूत मोदी के ट्रोल्स की है। जिन्होंने बाक़ायदा तनख्वाहें देकर पाला-पोसा जा रहा है। देश में हज़ारों युवाओं को इसी काम के लिए तैनात किया गया है। सही मायने में इन लोगों से बड़ा भारत का दुश्मन और कोई नहीं है! इनसे बहुत सावधान रहने की ज़रूरत है! अब उपरोक्त WhatsApp मैसेज़ को ही देखिए, ये पूरा का पूरा सन्देश जनता में ये भ्रम फैलाने के लिए है कि हर मोर्चे पर पूरी तरह से विफल रहे नरेन्द्र मोदी को सत्ता में रखना देश की मज़बूरी है। क्योंकि और कोई विकल्प नहीं है। इसे अँग्रेज़ी में TINA (There is no alternative) फ़ैक्टर यानी ‘विकल्प-हीनता का भ्रम फ़ैलाने की रणनीति’ कहते हैं! WhatsApp के ज़रिये फैलाये जाने वाले ऐसे सन्देश पूर्णतः मनगढ़न्त होते हैं। इसीलिए इन्हें लिखने और फ़ारवर्ड करने वालों का लोगों को पता तक नहीं चलता।

दरअसल, ऐसे मैसेज़ सिर्फ़ उन मन्दबुद्धि हिन्दुओं को बरगलाने के लिए गढ़े जाते हैं, जिनके पास सच्चाई को जानने-परखने की न तो अक्ल है और ना क़ाबलियत और ना ही फ़ुर्सत! उल्टा, ऐसे लोगों का बौद्धिक स्तर इतना अविकसित होता है कि वो न सिर्फ़ हरेक लिखित बात को सच समझते हैं, बल्कि बार-बार उन तक पहुँचने वाले लिखित झूठ पर भी यक़ीन कर लेते हैं। राजनीति में होने वाले दुष्प्रचार के लिहाज़ से देखे तो अब ऐसे झूठ को फैलाना ही बीजेपी और मोदी राज के लिए आख़िरी सहारा है! क्योंकि जनता ने अब तय कर लिया है कि तरह-तरह का झूठ फैलाकर सत्ता हथियाने वाले मोदी राज ने चार साल में ही देश को गर्त में पहुँचा दिया। लिहाज़ा, इसे 2019 में उखाड़ फेंका जाएगा! बहरहाल, फ़िलहाल तो आपको ये समझना है कि उपरोक्त मैसेज़ में सच क्या है और झूठ क्या?

मैसेज़ में लिखा है कि ‘मुसलमान भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाना चाहते हैं, इसलिए कांग्रेस को लाना चाहते हैं!’ काँग्रेस ने आज़ादी के बाद 55 साल तक सरकार चलायी। इस दौरान कौन सा इस्लामी राष्ट्र बना? उल्टा, आज़ादी के बाद पहले नेहरू ने पुर्तगाल से छीनकर गोवा को और फ्राँस से लेकर पुडुचेरी को भारत में मिलाया, तो इन्दिरा गाँधी ने पाकिस्तान के दो टुकड़े करके बाँग्लादेश की स्थापना करवायी। आज़ादी की लड़ाई में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले काँग्रेसियों ने कभी कन्धार जाकर आतंकवादियों को रिहा करने का काम नहीं किया। पाकिस्तान की आतंकवादी हरक़तों को हमेशा मुँहतोड़ जबाब दिया लेकिन कभी सर्ज़िकल हमले को फ़र्ज़ी ढोल नहीं पीटा। काँग्रेस के राज में सेना के बेहद अहम ठिकानों या संसद पर वैसे हमले कभी नहीं हुए जैसा इतिहास बीजेपी के राज में बना है।

भ्रामक मैसेज़ में आपसे पूछा जा रहा है कि ‘मोदी का विरोध करके आप समर्थन किसका कर रहे हैं?’ और ‘क्या मुलायम, लालू, मायावती, सोनिया, राहुल, केजरीवाल, ममता बनर्जी, वामपंथी ये सब नरेन्द्र मोदी से बेहतर हैं या इनका रिकॉर्ड बेहतर है?’ अब ज़रा सोचिए कि क्या लेखक ने आपको बताया है कि कैसे मोदी का रिकॉर्ड बेहतर है? आपसे कहा जाता है कि गुजरात को देखो। जबकि लिखने वाले ने ख़ुद कभी गुजरात को नहीं देखा है, न उसके गाँवों को, ना वहाँ के शहरों को ना ही वहाँ की बदहाली के सरकारी आँकड़ों को! आपसे तो बस कहा जा रहा है कि गुजरात स्वर्ग जैसा ख़ुशहाल बन चुका है! लिहाज़ा, आप यक़ीन कर लें। अरे भाई, यदि ऐसा ही है तो चार साल में बीजेपी शासित अन्य राज्यों को भी तो लघु-स्वर्ग बन जाना चाहिए था। ज़रा ऐसे किसी लघु-स्वर्ग का नाम भी ले लेते! वैसे यदि गुजरात ऐसा ही ख़ुशहाल हो चुका था जो जनता ने क्यों बीजेपी की मिट्टी पलीद कर दी? साफ़ है कि झूठ को पकड़ें!

लोकतंत्र में विरोधियों के लिए किस तरह की भाषा इस्तेमाल करने चाहिए? संस्कारी संघी इसे नहीं जानते हैं। वो विरोधियों को कुकुरमुत्ता, पप्पू वगैरह कहकर में वीरता प्रदर्शित करते हैं। वो भूल जाते हैं कि कुकुरमुत्ता ने डायनासोर का भ्रम पाले बैठे लोगों को उस अखाड़े में नेस्तनाबूद किया था, जहाँ उनके पास सात सांसद थे और चार नगर निगम! इसी तरह, जिसे आप पप्पू बताते हैं, वो आपसे बड़ी और गौरवशाली अतीत वाली पार्टी का मुखिया है। आपसे ज़्यादा शिक्षित है। आपसे ज़्यादा सभ्य और शालीन है। उसे भी उसकी पार्टी के लोगों ने वैसे ही अपना अध्यक्ष चुना है, जैसे आपकी और अन्य पार्टियों में अध्यक्ष चुने जाते हैं।

याद रखिए, देश की किसी भी पार्टी में उसके सदस्य अपने अध्यक्ष का प्रत्यक्ष-निर्वाचन (Direct Election) नहीं करते। बीजेपी में भी मुट्ठीभर लोगों ने तय किया कि उनका अध्यक्ष कौन होगा? अमित शाह हों, या नीतिन गडकरी, या राजनाथ सिंह, या लाल कृष्ण आडवाणी, या कुशाभाऊ ठाकरे, या जना कृष्णमूर्ति, या मुरली मनोहर जोशी, या बंगारू लक्ष्मण, या वेंकैया नायडू, या अटल बिहारी वाजपेयी, किसी को भी बीजेपी के सदस्यों ने वोट देकर नहीं चुना। इसी तरह, काँग्रेस ने भी राहुल गाँधी को जन्म लेते ही अपना अध्यक्ष नहीं बना लिया। न ही सोनिया, ना राजीव और ना ही इन्दिरा गाँधी ने पार्टी का क़मान वैसे पायी जैसे राजवाड़ों की रीत थी।

मैसेज़ की सबसे शानदार बात तो ये है कि इसके लेखक को ही ये नहीं पता कि वो ‘मोदी को क्यों पसंद करता’ है! उसके पास मोदी की उपलब्धियों को बताने के लिए कुछ नहीं है, लेकिन उसका मनगढ़न्त झूठ देखिए कि उसे ‘मोदी जी के अतिरिक्त और कोई राजनेता दूर दूर तक दिखाई नहीं देता!’ अरे, ये निपट धूर्त तो मोतियाबिन्द से पीड़ित निकला! और, इसे जनता का मार्गदर्शन करने का काम दिया गया है! अलबत्ता, मैसेज़ के लेखक को ये ज़रूर पता है कि मोदी जी अच्छे दिनों की बात करके देश का सत्यानाश करने का ‘प्रयत्न’ करने में कोई क़सर नहीं छोड़ रहे! जिस दिन मोदी अपने लक्ष्य का पा लेंगे, उस दिन भारत ‘हिन्दू राष्ट्र’ और ‘विश्व-गुरु’ बन जाएगा, क्योंकि उसके आराध्य मोदी जी के पास ‘इतिहास की जानकारी’ हो या ना हो, लेकिन ‘भविष्य की पूरी तैयारी’ है!

कुलमिलाकर, उपरोक्त WhatsApp मैसेज़ के लेखक के लिए ये लिखना मुफ़ीद होगा कि ‘हे मूर्खज्ञ, इतना तो मोदी भी अपने बारे में नहीं जानते, जितना आपका दावा है!’

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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लड़कियों की तुलना में लड़कों का यौन उत्पीड़न ज्यादा!

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Child Sexual Abuse in India

नई दिल्ली, 6 अगस्त | देश में अक्सर जब बात बच्चों से यौन उत्पीड़न के मामलों की आती है तो दिमाग में लड़कियों के साथ होने वाली यौन उत्पीड़न की घटनाएं आंखों के सामने उमड़ने लगती हैं, लेकिन इसका एक पहलू कहीं अंधकार में छिप सा गया है। महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की 2007 की रिपोर्ट दर्शाती है कि देश में 53.22 फीसदी बच्चों को यौन शोषण के एक या अधिक रूपों का सामना करना पड़ा, जिसमें से 52.94 फीसदी लड़के इन यौन उत्पीड़न की घटनाओं का शिकार हुए।

चेंज डॉट ओआरजी के माध्यम से बाल यौन उत्पीड़न के मामले को उठाने वाली याचिकाकर्ता, फिल्म निर्माता और लेखक इंसिया दरीवाला ने मुंबई से फोन पर आईएएनएस को बताया, “सबसे बड़ी समस्या है कि इस तरह के मामले कभी सामने आती ही नहीं क्योंकि हमारे समाज में बाल यौन उत्पीड़न को लेकर जो मानसिकता है उसके कारण बहुत से मामले दर्ज ही नहीं होते और होते भी हैं तो मेरी नजर में बहुत ही कम ऐसा होता है। इस तरह के मामले सामने आने पर समाज की पहली प्रतिक्रिया होती है कि लड़कों के साथ तो कभी यौन शोषण हो नहीं सकता, क्योंकि वे पुरुष हैं और पुरुषों के साथ कभी यौन उत्पीड़न नहीं होता।”

उन्होंने कहा, “समाज का जो यह नजरिया है लड़कों को देखने का ठीक नहीं है क्योंकि पुरुष बनने से पहले वह लड़के और बच्चे ही होते हैं। बच्चों की यह जो श्रेणी है काफी दोषपूर्ण है इसमें कोई लड़का-लड़की का भेद नहीं होता। लड़कों का जो शोषण हो रहा है अधिकतर पुरुषों द्वारा ही हो रहा है। मेरे हिसाब से यह काफी नजरअंदाज कर दी जाने वाली सच्चाई है और मैं पहले भी कई बार बोल चुकी हूं हम जो बच्चों व महिलाओं पर यह यौन हिंसा हमारे समाज में देख रहे हैं, कहीं न कहीं हम उसकी जड़ को नहीं पकड़ पा रहे हैं।”

लड़कों के साथ यौन उत्पीड़न होने पर बताने में कतराने की वजह के सवाल पर फिल्मनिर्माता ने कहा, “दरअसल जब समाज में किसी लड़की के साथ यौन उत्पीड़न की घटना होती है तो समाज की पहली प्रतिक्रिया हमदर्दी की होती है, उन्हें बचाने के लिए सपोर्ट सिस्टम होता है लेकिन अगर कोई लड़का अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामले को लेकर बोलता भी है तो पहले लोग उसपर हंसेंगे, उसका मजाक उड़ाएंगे व मानेंगे भी नहीं और उसकी बातों का विश्वास नहीं करेंगे, कहेंगे तुम झूठ बोल रहे हो यह तो हो नहीं सकता। हंसी और मजाक बनाए जाने के कारण लड़कों को आगे आने से डर लगता है इसलिए समाज बाल यौन उत्पीड़न में एक अहम भूमिका निभा रहा है।”

उन्होंने बताया, “पिछले एक साल में जब से मैंने अपना अभियान और लोगों से बात करना शुरू किया है तब से काफी चीजें हुई हैं। इसलिए मैं सरकार की शुक्रगुजार हूं कि कम से कम वह इस ओर ध्यान दे रहे हैं। आज सामान्य कानूनों को निष्पक्ष बनाने की प्रक्रिया चल रही है, इसकी शुरुआत पॉस्को कानून से हुई और अब धारा 377, पुरुषों के दुष्कर्म कानून को भी देखा जा रहा है। अब अखिरकार हम लोग लिंग समानता की बात कर सकते हैं, जिससे वास्तव में समानता आएगी। लिंग समानता का मतलब यह नहीं है कि वह एक लिंग को ध्यान में रखकर सारे कानून बनाए, यह सिर्फ महिलाओं की बात नहीं है। पुरुष और महिलाओं को समान रूप से सुरक्षा मिलनी चाहिए।”

लेखक इंसिया दरीवाल ने कहा, “देखिए पॉस्को कानून निष्पक्ष है लेकिन जब आप लड़कों के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में दंड के प्रावधान को देखते हैं तो वह धारा 377 के तहत दिया जाता था। जैसे पहले अगर दो पुरुषों के बीच सहमति से हुआ तो भी धारा 377 के तहत दोनों लोगों को सजा मिलती थी और नहीं हुआ तो भी दोनों को इसी धारा के तहत सजा दी जाती थी। इसमें पीड़ित को भी सजा मिलने का खतरा था, हालांकि अब चीजों में सुधार हुआ है और इसपर अब काफी चर्चा हो रही है और समाज में भी बदलाव आ रहा है।”

महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी से मिले समर्थन पर उन्होंने कहा, “उन्होंने मेरे काम की सराहना की है और कहा कि यह काम काफी जरूरी है। मैंने उनसे एक स्टडी की मांग की थी, जिसमें यह देखना था कि बाल यौन उत्पीड़न की हमारे समाज में कितनी प्रबलता है और इसके जो प्रभाव हैं वह बच्चों और पुरुषों पर क्या हैं, इसमें यौन प्रभाव, उनके संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ता है, उनके मानसिकता और शारिरिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता यह सब शामिल है। इस स्टडी के निष्कर्षो से मुझे मापदंड तैयार करने हैं और उन मापदंड़ों को मैं इसलिए तैयार करना चाहती हूं क्योंकि जब तक हम जड़ की जांच नहीं करेंगे तब तक नहीं पता चलेगा कि यह क्यों हो रहा है।”

बाल यौन उत्पीड़न मामलों में समाज की गलती के सवाल पर इंसिया ने कहा, “समाज कौन है हम लोग, इसलिए मानसिकता बदलना बहुत जरूरी है क्योंकि अगर हम लोग मानसिकता नहीं बदल पाए तो कानून कितने भी सख्त हो जाए तो उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। जब भी कोई घटना होती है तो हम सरकार, कानून और वकीलों को दोषी ठहराते हैं लेकिन हमें कहीं न कहीं खुद को भी देखना चाहिए क्योंकि हमारे समाज में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग भूमिका तैयार कर दी गई है, जिसे उन्हें निभाना पड़ता है, इसे बदलने की जरूरत है।”

भारत सरकार ने लिंग निष्पक्ष कानून बनाने के मद्दनेजर लड़कों के साथ होने वाले यौन शोषण को मौजूदा यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा (पॉस्को) अधिनियम में संशोधनों को मंजूरी दे दी है जिसे कैबिनेट के पास मंजूरी के लिए भेजा जाना बाकी है।

–आईएएनएस

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अपहरण के आरोपी सबसे अधिक सांसद-विधायक भाजपा से

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bjp corporate donations

नई दिल्ली, 30 जुलाई | भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कम से कम 16 सांसदों और विधायकों के खिलाफ अपहरण से संबंधित आपराधिक मामले दर्ज हैं। यह भारत में किसी भी राजनीतिक दल से सबसे ज्यादा है। मौजूदा 4,867 सांसदों और विधायकों द्वारा दाखिल हलफनामों के एक विश्लेषण से यह खुलासा हुआ है। चुनाव एवं राजनीतिक सुधारों के लिए काम करने वाली एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स द्वारा सोमवार को यह निष्कर्ष जारी किया गया।

निष्कर्ष में कहा गया है कि 770 सांसदों और 4,086 विधायकों के हलफनामों से यह खुलासा हुआ कि 1,024 या कुछ 21 फीसदी देश के सांसदों-विधायकों ने यह घोषित किया है कि उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

इसमें से 64 ने अपने खिलाफ अपहरण से संबंधित मामलों की घोषणा की है। इसमें से 17 विभिन्न राजनीतक दलों से ताल्लुक रखते हैं, जबकि चार निर्दलीय हैं।

भाजपा इस सूची में शीर्ष पर है। जबकि कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) दोनों दूसरे स्थान पर हैं। दोनों के छह-छह सदस्य इस सूची में शामिल हैं।

एडीआर के मुताबिक, सूची में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के पांच, बीजू जनता दल (बीजद) और द्रमुक के चार-चार, समाजवादी पार्टी (सपा), तेदेपा के तीन-तीन, तृणमूल कांग्रेस, माकपा, और शिवसेना के दो-दो सदस्य शामिल हैं।

साथ ही इस सूची में लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा), जद (यू), टीआरएस और उत्तर प्रदेश की निषाद पार्टी के एक-एक सदस्य का नाम भी शामिल है।

अपहरण से संबंधित आरोपों की घोषणा करने वाले विधायकों में बिहार व उत्तर प्रदेश से नौ-नौ, महाराष्ट्र के आठ, पश्चिम बंगाल के छह, ओडिशा व तमिलनाडु से चार-चार, आंध्र प्रदेश, गुजरात व राजस्थान से तीन-तीन, और छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, पंजाब व तेलंगाना से एक-एक सदस्य शामिल हैं।

–आईएएनएस

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ये सरासर झूठ है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने फ़्राँस को पछाड़ दिया है!

यदि भारत की जीडीपी एक दशक में दोगुनी हो गयी और वो कौन-कौन से देश हैं, जिनकी जीडीपी इसी दौरान भारत की जीडीपी से पहले दोगुनी हुई है?

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Indian economy

भारत का भक्त-मीडिया आपको ये तो बताता है कि हम अब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में छठे स्थान पर आ चुके हैं और अब फ़्राँस से आगे हैं। लेकिन वो आपको ये नहीं बताता कि भारतीयों के मुक़ाबले फ़्राँसिसियों की प्रति व्यक्ति आय 20 गुना ज़्यादा है। आपको ये भी नहीं बताया जाता कि फ़्राँस की आबादी से ज़्यादा लोग भारत में आज भी ग़रीबी रेखा से नीचे हैं। राजा का बाजा बन चुका भारतीय मीडिया आपको ये भी नहीं समझता कि कैसे मोदी सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास-दर का हिसाब रखने वाले फ़ार्मूले को ही बदल दिया, जिसकी वजह से मनमोहन सरकार के मुक़ाबले अभी दर्ज होने वाली विकास-दर में दो फ़ीसदी का इज़ाफ़ा अपने आप आ जाता है।

भारतीय मीडिया अपने आप बेईमान नहीं हो गया। मोदी राज में एक बड़ी साज़िश के तहत मीडिया संस्थानों को हिदायत दी गयी कि वो ख़बरों को ऐसे तोड़-मरोड़कर पेश करें, जिससे जनता के सामने हमेशा सरकार की उपलब्धियों की झूठी तस्वीरें ही पहुँचती रहें। वर्ना, हरेक पेशेवर पत्रकार और उसके मीडिया संस्थान को अच्छी तरह पता है कि भारत का फ़्राँस से आगे निकलना सिर्फ़ एक आँकड़ा है। आँकड़ों की तुलनात्मक व्याख्या के बग़ैर वो सिर्फ़ अंक हैं और कुछ नहीं! किसी देश की अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का मतलब है कि उसकी आबादी की ख़ुशहाली का बढ़ना। ख़ुशहाली को नापने के कई पैमाने हैं। लेकिन सबसे आसान है प्रति व्यक्ति आय। दूसरा पैमाना है कि शिक्षा-स्वास्थ्य-सड़क-पानी-बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं का स्तर और इस पर होने वाला ख़र्च।

अब ज़रा ये सोचिए कि क्या आप उस व्यक्ति को ज़्यादा धनवान मानेंगे जिसके पास ज़्यादा ज़मीन हो या फिर उसे जिसके पास ज़्यादा उपजाऊ ज़मीन हो? हो सकता है कि किसी के पास सौ बीघा ज़मीन हो, लेकिन वो बंजर हो। जबकि किसी के पास दस बीघा ही हो और वो खेतीहर हो। अब यदि आप अंक के आधार पर सोचेंगे तो ज़ाहिर है कि आप सौ को दस के मुक़ाबले दस गुना बड़ा ही मानेंगे। ऐसा ही बड़क्पन विश्व बैंक की ओर से जारी सालाना, सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का है। ये आँकड़ा कहता है कि साल 2017 में भारत की जीडीपी 2597 अरब डॉलर हो गयी, जबकि फ़्राँस की जीडीपी 2582 अरब डॉलर दर्ज की गयी। ये आँकड़ा ऊपर दिये गये उदाहरण के मुताबिक़, सकल या कुल ज़मीन जैसा है।

विश्व बैंक के आँकड़े के आधार पर ये हर्ग़िज़ नहीं कहा जा सकता कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। क्योंकि फ़्राँस के 6.04 करोड़ लोगों की उत्पादकता की तुलना यदि भारत 134 करोड़ की आबादी की उत्पादकता से की जाएगी तो हम उसके मुक़ाबले बेहद बौने साबित होंगे। इसीलिए, लोगों की ख़ुशहाली जानने के लिए प्रति व्यक्ति आय को आधार माना जाता है। फ़्राँसिसियों की सालाना प्रति व्यक्ति आय जहाँ 38,477 डॉलर है, वहीं भारत के मामले में ये सिर्फ़ 1,940 डॉलर ही बैठती है। इसका मतलब ये हुआ कि एक आम फ़्राँसिसी नागरिक के मुक़ाबले एक आम भारतीय 20 गुना ग़रीब है।

लगे हाथ ग़रीबी को भी समझते चलें। वर्ल्ड पावर्टी क्लॉक और ब्रूकिंग्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अब भी भारत में 7 करोड़ लोग बेहद ग़रीबी में जी रहे हैं। भारत अब दुनिया में सबसे ज़्यादा ग़रीबों की आबादी वाला देश नहीं रहा। क्योंकि नाइजीरिया में बेहद ग़रीब लोगों की आबादी 8.7 करोड़ है। ग़रीबों की संख्या की तुलना करने वक़्त भी ये ग़ौर करना ज़रूरी होगा कि बीते दशकों में देश की कुल आबादी में बेहद ग़रीबों की संख्या और उनका अनुपात क्या रहा है? क्या मोदी राज में ग़रीब घटे हैं? कुल आबादी में ग़रीबों का अनुपात कम हुआ है? क्या ये संख्या और अनुपात मोदी राज से पहले की सरकारों के मुक़ाबले बेहतर हुआ है या बदतर? याद रखिये कि संख्या का महत्व बेहद मामूली है। असली आँकड़ा तो अनुपात का है। यदि अनुपात सुधर रहा है, तभी हम बेहतर हो रहे हैं। वर्ना, नहीं।

इसी तरह, विश्व बैंक की रिपोर्ट की आड़ में भक्त-मीडिया हमें बता रहा है कि नोटबन्दी और जीएसटी से भारतीय अर्थव्यवस्था में तेज़ी आयी है। और, बीते दशक में भारत की जीडीपी दोगुनी हो गयी है। जबकि सच्चाई ये है कि मोदी सरकार यही झूठ तो फैलाना चाहती है। सवाल है कि ये तेज़ी क्या होती है? तेज़ एक तुलनात्मक दशा है। सजातीय की तो तुलना हो सकती है, लेकिन विजातीय की नहीं। मिसाल के तौर पर, साइकिल और बाइक की रफ़्तार की तुलना नहीं हो सकती, हाथी और घोड़े की ताक़त की तुलना नहीं हो सकती, स्त्री और पुरुष की तुलना नहीं हो सकती। लिहाज़ा, जब हम विकास-दर की तेज़ी पर ग़ौर करें, तब ये देखना ज़रूरी होगा कि सम्बन्धित अर्थव्यवस्था का आकार कितना बड़ा है। चीन की अर्थव्यवस्था भारत से छह गुना बड़ी है। वास्तविक मात्रा के लिहाज़ से उनका आकार का 6 फ़ीसदी हमारे आकार के 36 फ़ीसदी के बराबर होगा।

हम देख चुके हैं कि नोटबन्दी अपने हरेक मक़सद में विफल साबित हुई है। इससे काले धन की कोई रोकथाम नहीं हो सकी। उल्टा, सारा काला धन सरकार की मिली-भगत से सफ़ेद होकर बैंकों में जा पहुँचा। आतंकवाद और नक्सलवाद पर भी नोटबन्दी ने कोई प्रभाव नहीं डाला। कैश-लेस यानी डिज़ीटाइज़ेशन के मोर्चे पर भी कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ। दूसरी ओर, नोटबन्दी का भारी-भरकम ख़र्च अर्थव्यवस्था पर पड़ा। करोड़ों लोगों का काम-धन्धा चौपट हो गया। रोज़गार-व्यापार पर ऐसा असर पड़ा कि अभी तक हालात सामान्य नहीं हो पाया है। इसी तरह, जीएसटी को भी जिस तरह से लागू किया गया, उसने महँगाई तथा जनता की मुश्किलों को बढ़ाया ही।

इस तरह, बीते एक दशक में भारत की जीडीपी के दोगुना होने की बातों को भी गहराई से समझना बेहद ज़रूरी है। दस साल की उपलब्धि में से मोदी राज के चार साल की औसत विकास-दर की तुलना मनमोहन सिंह सरकार के छह सालों की औसत विकास-दर से करने पर पता चलेगा कि मौजूदा चार साल के मुक़ाबले उससे पहले के छह साल बेहद उम्दा थे। मनमोहन सरकार में औसत विकास-दर 8.5 फ़ीसदी रही, जबकि मोदी राज में यही औसत 6.5 फ़ीसदी का रहा है। इससे दशक का औसत 7.7 फ़ीसदी बैठेगा। अब ज़रा सोचिए कि जो ख़ुद को तेज़ बता रहे हैं क्या वो अपने से पहले वालों के मुक़ाबले 1.2 अंक या 18 फ़ीसदी धीमे नहीं है!

इसी धीमेपन का दूसरे पहलू को भी हमें समझना होगा कि यदि भारत की जीडीपी एक दशक में दोगुनी हो गयी और वो कौन-कौन से देश हैं, जिनकी जीडीपी इसी दौरान भारत की जीडीपी से पहले दोगुनी हुई है? ऐसी तुलना के बग़ैर कोई कैसे कह सकता है कि हमारी उपलब्धि औरों से बेहतर है। विकास-दर की तुलना करते समय ये देखना भी ज़रूरी है कि अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं में महँगाई और मुद्रास्फीति का दशा क्या रही है? क्योंकि जिन देशों में महँगाई नियंत्रण में है, वहाँ ब्याज़-दरें बहुत कम हैं। उनकी मुद्रा की क्रय-शक्ति जहाँ दस साल पहले जितनी ही है, वहीं हमारे रुपये की औक़ात कहीं ज़्यादा कम हो चुकी है। लिहाज़ा, मुमकिन है कि हम रुपये ज़्यादा कमाने लगें, लेकिन ज़रूरी नहीं कि ज़्यादा रुपयों से हमारी ख़ुशहाली भी बढ़ी ही होगी। इसीलिए, हमें आँकड़ों की बाज़ीगरी को समझना आना चाहिए।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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