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स्कूली छात्रों में क्यों पनप रही हिंसक प्रवृत्ति?

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School Compound

नई दिल्ली, 22 जुलाई | दिल्ली, हरियाणा, गुजरात, चेन्नई समेत देश के कई हिस्सों में स्कूलों के अंदर कुछ छात्रों द्वारा किसी छात्र या शिक्षक की हत्या किए जाने की घटनाओं ने ये संकेत दिए हैं कि स्कूली छात्रों में हिंसक प्रवृत्ति बढ़ रही है। अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी के इस देश में हिंसा को बढ़ावा देकर जैसा माहौल बनाया जा रहा है, उसकी छाप बच्चों के कोमल मन पर पड़ना स्वाभाविक है और यह गंभीर चिंता का विषय है।

मनोवैज्ञानिकों और शिक्षाविदों की मानें तो स्कूली छात्रों के मन में भरी कुंठा, ईष्र्या और असहिष्णुता (बर्दाश्त करने की क्षमता न होना) के कारण स्कूली बच्चे इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे समाज के लिए खतरा बनती जा रही है।

हाल ही में दिल्ली के ज्योति नगर इलाके के एक सरकारी स्कूल में कुछ छात्रों ने 10वीं के छात्र की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। दिल्ली से सटे गुरुग्राम के एक बड़े निजी स्कूल में हुई बहुचर्चित प्रद्युम्न हत्याकांड समाज को झकझोर कर रख देने वाली घटना है। उधर, गुजरात के वड़ोदरा में एक छात्र की चाकू से 31 बार वार कर हत्या कर दी गई थी। दक्षिणी राज्य तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के सेंट मैरी एग्लो इंडियन स्कूल में 12वीं कक्षा के एक छात्र ने प्रधानाचार्य की हत्या कर दी। देशभर में इस तरह की कई घटनाएं हैं, जो स्कूली छात्रों में पनप रही हिंसा की प्रवृत्ति की ओर इशारा करती हैं। ये घटनाएं समाज के लिए खतरे की घंटी हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के प्रोफेसर डॉ. नवीन कुमार ने स्कूली छात्रों की प्रवृत्ति में आए बदलाव के बारे में आईएएनएस से कहा, “स्कूली बच्चों द्वारा हिंसा कुंठा और दबाव का नतीजा है। स्कूली बच्चों की प्रवृत्ति में आए बदलाव के पीछे तीन कारण हैं, जिसमें पहला है कि परिवारों का बच्चों से संवाद कम हो गया है, माता पिता बच्चों को अधिक समय नहीं दे पा रहे हैं जिस कारण बच्चों में नैतिक मूल्य का निर्माण नहीं हो पा रहा है। इससे बच्चों में सहयोग व सद्भाव वाली भावना घट रही है। दूसरा कारण है शिक्षा प्रणाली। जब तक स्कूली बच्चों की शिक्षण प्रणाली सही नहीं होगी, तब तक वे मानसिक दबाव और तनाव में रहेंगे ही। वे कब क्या कर बैठेंगे, कोई नहीं जानता।”

उन्होंने कहा, “तीसरी बात कि स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली बातें सैद्धांतिक होती हैं, जो बच्चों की रुचि को संतुष्ट नहीं कर पाती हैं। बच्चों को स्कूलों में नियंत्रित वातारण में एक स्थान पर बैठा दिया जाता है, जिस कारण उन्हें शिक्षकों से वन टू वन बातचीत करने में दिक्कत होती है। महानगरीय संस्कृति में तो और भी बुरा हाल है। बच्चे के घर पर आने के बाद उसके मनोभाव व समस्याओं को जानने वाला कोई नहीं रहता। ऐसे में बच्चों को जो ठीक लगता है, वे करते हैं।”

क्या इसके लिए समाज भी जिम्मेदार है? इस सवाल पर डॉ. कुमार ने कहा, “अगर किसी बच्चे ने सफलता पा ली तो ठीक है, लेकिन अगर वह सफल नहीं हुआ तो परिवार से लेकर समाज तक में उसे कोसा जाता है। ऐसे में उसमें कुंठा बढ़ेगी ही। बचपन आनंद काल होता है, जहां उसके गुणों और आत्मविश्वास का निर्माण होता है, लेकिन स्कूलों में 70 से 80 फीसदी बच्चों को पता ही नहीं होता कि उसे आगे करना क्या है। दरअसल, वर्तमान में समाज भी आत्मकेंद्रित होने की ओर बढ़ रहा है।”

उन्होंने कहा, “समाज में सफलता का पैमाना आईएएस, आईपीएस और बड़ा व्यापारी मान लिया गया है, लेकिन अच्छा मनुष्य बनने की भावना में कमी आई है। समाज में आम और विशेष की खाई बढ़ी है। समाज में सफलता की परिभाषा हो गई है ‘शक्तिशाली’, जो शक्तिशाली है वह अपना प्रभुत्व कायम कर लेगा। समाज आपको तभी मानेगा जब आप आईपीएस, बड़े व्यापारी या राजनेता होंगे। यह बहुत ही खतरनाक चलन बन गया है। देश में कोई व्यक्ति अपने बेटे को किसान नहीं बनाता, इसी तरह से मौलिक चीजों को नजरअंदाज किया जा रहा है।”

इन घटनाओं पर स्कूलों द्वारा लगाम लगाने पर जोर देते हुए डॉ. नवीन ने कहा, “स्कूल बच्चों का ध्यान रचनात्मक गतिविधियों में लगाएं, सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान न दें, सिर्फ पाठ्यक्रम पढ़ाने से बच्चों का भला नहीं होगा। उन्हें तैराकी सिखाएं, कहीं घूमने ले जाएं या खेल की गतिविधियों में शामिल होने को कहें। साथ ही बच्चों में एक-दूसरे से संवाद की तकनीक पैदा करना भी जरूरी है, ताकि उनमें संवेदना जागे। उन्हें बाहर ले जाकर उन गरीब बच्चों से मिलाएं, जिन्हें ये सब सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। इन उपायों से बच्चों की प्रवृत्ति में बदलाव आएगा।”

क्या अभिभावकों की तरफ से बच्चों के परवरिश में कोताही हो रही है? इस सवाल पर उन्होंने कहा, “अभिभावकों को बच्चों से लगातार संवाद करना चाहिए। उनके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ना चाहिए। अभिभावकों को बातचीत करके समझना चाहिए कि बच्चा क्या चाहता है और यही वह वक्त होता है, जब उसमें कुंठा का भाव उत्पन्न होता है। अगर हम उसे सीधे मना करेंगे तो वह हताश होगा, लेकिन जब हम उसे प्यार से समझाएंगे तो उसमें जारूकता आएगी, जो काफी महत्वपूर्ण है।”

पिछले साल हरियाणा के एक निजी स्कूल में सात वर्षीय प्रद्युम्न की हत्या ने देश को झकझोर कर रख दिया था। प्रद्युम्न की मां सुषमा ठाकुर आज भी रोते हुए लगातार एक ही सवाल पूछती हैं, “मेरे बच्चे का क्या गुनाह था? मैंने अपने बच्चे को पढ़ने के लिए स्कूल भेजा था, जहां उसकी गला रेतकर हत्या कर दी गई।” वह रोते हुए कहती हैं, “मेरी तो दुनिया ही उजड़ गई।”

स्कूली बच्चों में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति के बारे में शिक्षाविद् और समाजसेवी डॉ. बीरबल झा कहते हैं, “यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। कहीं न कहीं शिक्षा व्यवस्था इसके लिए जिम्मेदार है, बच्चों पर हमने शिक्षा का इतना अधिक दबाव तो डाल दिया, लेकिन उनमें नैतिक मूल्यों का विकास नहीं किया। इन्हीं मूल्यों के कारण बच्चे बच्चे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझ नहीं पाते।”

उन्होंने कहा, “बच्चे इस देश का भविष्य हैं और अगर बच्चे हिसात्मक हो जाते हैं तो हमारा भविष्य अधर में लटक जाएगा। इसके लिए सभी समाजसेवियों, शिक्षाविदों और चिंतकों को आगे आना चाहिए, ताकि स्कूली बच्चों में नैतिक मूल्यों के विकास को बढ़ाया जाए, न कि हिंसक प्रवत्ति को।”

—आईएएनएस

ओपिनियन

संशय भरे आधुनिक युग में हिंदू आदर्श धर्म : थरूर

वह धर्म जो सर्वज्ञानी सृजनकर्ता पर सवाल करता हो वह मेरे विचार से आधुनिक और उत्तर आधुनिक चैतन्य के लिए अनोखा धर्म है।

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Shashi-Tharoor

न्यूयॉर्क, 21 सितंबर | कांग्रेस सांसद व लेखक शशि थरूर के अनुसार, हिंदू एक अनोखा धर्म है और यह संशय के मौजूदा दौर के लिए अनुकूल है। थरूर ने धर्म के राजनीतिकरण की बखिया भी उधेड़ी।

न्यूयॉर्क में जयपुर साहित्य महोत्सव के एक संस्करण में के बातचीत सत्र के दौरान गुरुवार को थरूर ने कहा, “हिंदूधर्म इस तथ्य पर निर्भर करता है कि कई सारी बातें ऐसी हैं जिनके बारे में हम नहीं जानते हैं।”

मौजूदा दौर में इसके अनुकूल होने को लेकर उन्होंने कहा, “पहली बात यह अनोखा तथ्य है कि अनिश्चितता व संशय के युग में आपके पास एक विलक्षण प्रकार का धर्म है जिसमें संशय का विशेष लाभ है।”

सृजन के संबंध में उन्होंने कहा, “ऋग्वेद वस्तुत: बताता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति कहां से हुई, किसने आकाश और धरती सबको बनाया, शायद स्वर्ग में वह जानता हो या नहीं भी जानता हो।”

उन्होंने कहा, “वह धर्म जो सर्वज्ञानी सृजनकर्ता पर सवाल करता हो वह मेरे विचार से आधुनिक और उत्तर आधुनिक चैतन्य के लिए अनोखा धर्म है।”

उन्होंने कहा, “उससे भी बढ़कर आपके पास असाधारण दर्शनग्रहण है और चूंकि कोई नहीं जानता कि भगवान किस तरह दिखते हैं इसलिए हिंदूधर्म में हर कोई भगवान की कल्पना करने को लेकर स्वतंत्र है।”

कांग्रस सांसद और ‘व्हाइ आई एम हिंदू’ के लेखक ने उन लोगों का मसला उठाया जो स्त्री-द्वेष और भेदभाव आधारित धर्म की निंदा करते हैं।

मनु की आचार संहिता के बारे में उन्होंने कहा, “इस बात के बहुत कम साक्ष्य हैं। क्या उसका पालन किया गया और इसके अनेक सूत्र विद्यमान हैं।”

उन्होंने उपहास करते हुए कहा, “इन सूत्रों में मुझे नहीं लगता कि हर हिंदू कामसूत्र की भी सलाह मानते हैं।”

थरूर ने कहा, “प्रत्येक स्त्री विरोधी या जातीयता कथन (हिंदू धर्मग्रंथ में) के लिए मैं आपको समान रूप से पवित्र ग्रंथ दे सकता हूं, जिसमें जातीयता के विरुद्ध उपदेश दिया गया है।”

–आईएएनएस

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ओपिनियन

जानिये क्यों गिर रहा है रुपया

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Rupee Fall

नई दिल्ली, 13 सितम्बर | केंद्र सरकार ने रुपये की गिरावट को थामने की हरसंभव कोशिश करने का भरोसा दिलाया है। इसका असर पिछले सत्र में तत्काल देखने को मिला कि डॉलर के मुकाबले रुपये में जबरदस्त रिकवरी देखने को मिली। हालांकि रुपये में और रिकवरी की अभी दरकार है।

डॉलर के मुकाबले रुपया बुधवार को रिकॉर्ड 72.91 के स्तर तक लुढ़कने के बाद संभला और 72.19 रुपये प्रति डॉलर के मूल्य पर बंद हुआ। इससे पहले मंगलवार को 72.69 पर बंद हुआ था।

रुपये की गिरावट से अभिप्राय डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी आना है। सरल भाषा में कहें तो इस साल जनवरी में जहां एक डॉलर के लिए 63.64 रुपये देने होते थे वहां अब 72 रुपये देने होते हैं। इस तरह रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है।

शेष दुनिया के देशों से लेन-देन के लिए प्राय: डॉलर की जरूरत होती है ऐसे में डॉलर की मांग बढ़ने और आपूर्ति कम होने पर देशी मुद्रा कमजोर होती है।

एंजेल ब्रोकिंग के करेंसी एनालिस्ट अनुज गुप्ता ने रुपये में आई हालिया गिरावट पर कहा, “भारत को कच्चे तेल का आयात करने के लिए काफी डॉलर की जरूरत होती है और हाल में तेल की कीमतों में जोरदार तेजी आई है जिससे डॉलर की मांग बढ़ गई है। वहीं, विदेशी निवेशकों द्वारा निवेश में कटौती करने से देश से डॉलर का आउट फ्लो यानी बहिगार्मी प्रवाह बढ़ गया है। इससे डॉलर की आपूर्ति घट गई है।”

उन्होंने बताया कि आयात ज्यादा होने और निर्यात कम होने से चालू खाते का घाटा बढ़ गया है, जोकि रुपये की कमजोरी की बड़ी वजह है।

ताजा आंकड़ों के अनुसार, चालू खाते का घाटा तकरीबन 18 अरब डॉलर हो गया है। जुलाई में भारत का आयात बिल 43.79 अरब डॉलर और निर्यात 25.77 अरब डॉलर रहा।

वहीं, विदेशी मुद्रा का भंडार लगातार घटता जा रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार 31 अगस्त को समाप्त हुए सप्ताह को 1.19 अरब डॉलर घटकर 400.10 अरब डॉलर रह गया।

गुप्ता बताते हैं, “राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनने से भी रुपये में कमजोरी आई है। आर्थिक विकास के आंकड़े कमजोर रहने की आशंकाओं का भी असर है कि देशी मुद्रा डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रही है। जबकि विश्व व्यापार जंग के तनाव में दुनिया की कई उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई हैं।”

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगातार मजबूती के संकेत मिल रहे हैं जिससे डॉलर दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले मजबूत हुआ है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मजबूती आने से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल कर ले जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षणवादी नीतियों और व्यापारिक हितों के टकराव के कारण अमेरिका और चीन के बीच पैदा हुई व्यापारिक जंग से वैश्विक व्यापार पर असर पड़ा है।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

OPINION: झूठ के नशेड़ी, जन्मपत्री और ईवीएम

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‘बीजेपी 50 साल तक सत्ता में रहेगी!’ अमित शाह ने ये शिगूफ़ा छोड़ते ही नरेन्द्र मोदी के कान में फुसफुसाया कि ‘साहब, आपकी हिदायत के मुताबिक मैंने 50 साल का जुमला फेंक तो दिया, लेकिन बेहद दुःख के साथ आपको बता रहा हूँ कि 2019 में आपका पतन तय है। लोकसभा चुनाव आप हारने वाले हो!’

ये सुनकर मोदी ऐसे मुस्कुराने लगे जैसे वो अमित भाई से कहना चाहते हों कि ‘बचपना छोड़ो! अच्छा बताओ, तुम्हें कैसे लगा रहा है कि 2019 में हमलोग हारने वाले हैं?’

रुआँसा होकर अमित शाह ने बताया कि ‘मुझे दुनिया के दर्जनों जाने-माने ज्योतिषियों ने आपकी जन्मपत्री देखकर बताया है!’

इतना सुनते ही मोदी ठहाका लगा बैठे तो अमित शाह ने हैरानी से पूछा कि ‘इसमें हँसने की क्या बात है?’

मोदी बोले, ‘अरे अमित भाई, भक्तों को मूर्ख बनाते-बनाते, उनमें झूठ पर झूठ फैलाते-फैलाते अब तुम भी मूर्ख हो चुके हो!’

फिर मोदी ने बताया कि अरे, जिसका…

  • जन्मदिन झूठा
  • चाय बेचने की कहानी झूठी
  • अविवाहित होने का दावा झूठा
  • सारी डिग्रियाँ झूठी
  • कालाधन लाने का दावा झूठा
  • गंगा सफ़ाई का वादा झूठा
  • गोरक्षा का नारा झूठा
  • राम मन्दिर बनाने का वादा झूठा
  • पाकिस्तान को उसकी भाषा में जवाब देने की बात झूठी
  • सालाना दो करोड़ रोज़गार का वादा झूठा
  • महिलाओं को सुरक्षा देने की बात झूठी
  • महँगाई कम करने की बातें झूठीं
  • अच्छे_दिन का नारा झूठा
  • हरेक चुनावी नारा झूठा…

उसके बारे में तुमने ये कैसे मान लिया कि पूरे ब्रह्मांड में कोई ऐसा माई का लाल हो सकता है जो मेरी सही जन्मपत्री बना ले! अरे अमित भाई, मुझे एक सिद्ध ज्योतिषी ने बताया था कि जब तक मैं जनता को झूठे सपने बेचता रहूँगा, जुमलेबाज़ी करता रहूँगा, लम्बी-चौड़ी फेंकता रहूँगा, अपनी ब्रॉन्डिंग पर सारी ताक़त झोंकता रहूँगा, तब तक मेरी सत्ता बनी रहेगी, क्योंकि मैंने भारत के लोगों को झूठ का नशेड़ी बना दिया है! जनता को जब तक अपने झूठ से मूर्ख बनाते रहोगे, तब तक तुम्हारी सत्ता पर कोई संकट नहीं है। इसके अलावा, याद है ना कि हमारे पास ईवीएम है! ये वैसा ही है जैसे फ़िल्म ‘दीवार’ का वो डॉयलॉग कि ‘मेरे पास माँ है!’

Modi Degree

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का निजी और राजनीतिक जीवन भी तरह-तरह के झूठ से ओतप्रोत है। पत्रकार राजीव शुक्ला को सालों पहले दिये गये एक इंटरव्यू के वीडियो में मोदी कहते हैं कि ‘मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ। मैंने तो दसवीं पास करने के बाद ही घर से भाग गया था।’ तब मोदी ने नहीं बताया कि उन्होंने घर से भागने से पहले चाय भी बेची थी। बाद में प्रधानमंत्री बनने के बाद दुनिया को बताया गया कि मोदी न सिर्फ़ स्नातक हैं वो भी दिल्ली विश्वविद्यालय से, बल्कि उन्होंने गुजरात यूनिवर्सिटी से ‘Entire Political Science’ में एमए भी कर रखा है। इन डिग्रियों के फ़र्ज़ी होने का विवाद गहराया तो अरूण जेटली जैसे शूरमाओं को प्रेस में सफ़ाई देने के लिए आगे आना पड़ा।

इसके बाद, गुजरात के नेता शक्ति सिंह गोहिल ने डंके की चोट पर ख़ुलासा किया था कि नरेन्द्र मोदी के 12 वीं पढ़ाई के लिए एमएन कॉलेज़ में दाख़िला लिया था। तब कॉलेज़ के रज़िस्टर में मोदी की जन्मतिथि 29 अगस्त 1949 लिखी हुई है। जबकि राजनेता के रूप में मोदी का जन्मतिथि 17 सितम्बर 1950 के रूप में पेश किया जाता है।

Modi Degree

गोहिल ने सबूत के रूप में कॉलेज़ के रज़िस्टर की कॉपी भी दिखायी। उन्होंने बताया कि 29 अगस्त 1949 का ही ब्यौरा ही गुजरात विश्वविद्यालय में भी है। तो फिर राजनेता से जुड़े रिकॉर्ड में ये 17 सितम्बर 1950 कैसे हो गया? मोदी की उम्र 13 महीना कैसे सिकुड़ गयी! ये यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है।

Modi Degree Controversy

पूरे प्रसंग में मज़े की बात ये भी रही कि मोदी को एमए की डिग्री देने वाले गुजरात विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड में ये जानकारी नहीं है कि मोदी ने स्नातक यानी ग्रेज़ुएशन कब, कहाँ से और किन-किन विषयों में किया था? गोहिल का कहना है कि विश्वविद्यालय से दर्जनों बार सूचना के अधिकार के तहत मोदी का ब्यौरा माँगा गया, लेकिन हमेशा विश्वविद्यालय ने गोपनीयता के आधार पर जानकारी देने से मना कर दिया। इसीलिए गोहिल ने मोदी पर हमला किया कि वो अपने ऐसे दस सहपाठियों का नाम ही बता दें, जिन्होंने उनके साथ स्नातक किया हो।

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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