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ट्रम्प को अपना सिंहासन डोलता दिख रहा है, भारत भी अछूता नहीं रहने वाला

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Modi Trump

वैसे तो सारी दुनिया में जनता की नब्ज़ को भाँपने के लिए अनेक सर्वेक्षण होते हैं, लेकिन अमेरिकी सर्वेक्षणों की प्रतिष्ठा ख़ासी बेहतर समझी जाती है। क्योंकि इनसे सच का आभास होता है। जबकि भारत में सर्वेक्षणों की आड़ में तरह-तरह के ‘खेल’ खेले जाते हैं। तभी तो भारत में कोरोना से निपटने को लेकर हुई तमाम लापरवाही के बावजूद नरेन्द्र मोदी को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री होते हैं, जबकि इन्हीं लापरवाहियों के आधार पर ट्रम्प को अमेरिकी जनता कोरोना आपदा से निपटने में नाकाम करार देती है।

चुनावी साल में ट्रम्प को अमेरिकी जनता की नाराज़गी का आभास काफ़ी वक़्त से हो रहा था। तभी वो लगातार अपनी नाकामियों का ठीकरा चीन और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) फोड़ते रहे हैं। दूसरी ओर, मोदी को भी प्रवासी मज़दूरों और दिहाड़ी कामगारों की नाराज़गी का आभास तो काफ़ी पहले हो चुका था, उन्होंने माफ़ी माँगने का ढोंग भी किया, लेकिन हालात से निपटने के लिए अब जाकर अपने क़दम आगे बढ़ाये हैं, जब पानी सिर से ऊपर बहने लगा। यहाँ मोदी की तुलना ट्रम्प से इसीलिए हो रही है क्योंकि ‘झूठ का क़िला’ बनाने और ‘अफ़वाहों के ज़रिये सियासत चमकाने’ के लिहाज़ से ट्रम्प और मोदी, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

ट्रम्प को लगा तगड़ा झटका

अमेरिकी अख़बार ‘डेली मेल’ में प्रकाशित एक सर्वे के मुताबिक़, क़रीब 55 फ़ीसदी अमेरिकी जनता ने ट्रम्प को कोरोना वायरस से निपटने में नाकाम करार दिया है। इतना ही नहीं, अमेरिका में दोबारा स्कूलों को खोले जाने के ट्रम्प के फ़ैसले को भी लोगों ने सिरे से नकार दिया है। ट्रम्प ने 27 अप्रैल को कई राज्यों के गवर्नरों से स्कूलों को खोलने के बारे में चर्चा की थी। इस सवाल पर सर्वे में शामिल क़रीब 85 फ़ीसदी लोगों ने कहा कि अभी स्कूल खोलना सरासर ग़लत आइडिया होगा। सिर्फ़ 14 फ़ीसदी लोगों ने ट्रम्प को ग़लत नहीं माना। ज़ाहिर है, ट्रम्प की लोकप्रियता औंधे मुँह गिर चुकी है। इसीलिए सर्वे को उनके लिए बहुत तगड़ा झटका माना जा रहा है।

बौखलाये ट्रम्प, ‘चीन मुझे चुनाव हरवा देगा’

जैसे भारत में चुनाव के वक़्त पाकिस्तान का राग अलापा जाता है, बिल्कुल वैसे ही अमेरिकी जनता के सामने ट्रम्प बार-बार चीन को अमेरिका का दुश्मन नम्बर वन बनाकर पेश कर रहे हैं। चीन को लगातार घेर रहे हैं। इस खेल में ट्रम्प का गोदी मीडिया भी उनका भरपूर साथ दे रहा है। कभी कोरोना को कृत्रिम बताया जाता है तो कभी जैविक हथियार, कभी प्रयोगशाला से लीक की थ्योरी चलती है, कभी WHO की लापरवाही और चीन से उसकी मिलीभगत की बातें होती हैं तो कभी चीन पर वक़्त रहते पूरा ब्यौरा नहीं देने की बातों को उछाला जाता है।

लेकिन अब अमेरिका ख़ुफ़िया एजेंसियों ने ऐसे तमाम दावों की हवा निकाल दी है। ट्रम्प-युग के बावजूद अमेरिका की लोकतांत्रिक संस्थाओं का भारत की तरह पूर्ण पतन अभी नहीं हुआ है। इसीलिए, अमेरिका के ‘ऑफ़िस ऑफ द डायरेक्टर ऑफ़ नेशनल इंटेलिजेंस’ ने ट्रम्प और उनके पीछे खड़े अमेरिकी गोदी मीडिया के इन दावों को सिरे से ख़ारिज़ कर दिया है कि कोविड-19 वायरस कृत्रिम या मानव-निर्मित है और ये वुहान की वायरोलॉजी लैब से लीक हुआ है। ख़ुफ़िया एजेंसी ने ये कहकर जैविक हथियार वाली थ्योरी को भी नकार दिया है कि कोविड-19 किसी जेनेटिक बदलाव का नतीज़ा है।

लेकिन अपनी सियासी खाल को बचाने के लिए डोनॉल्ड ट्रम्प का चीन पर हमला जारी है। न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स को दिये इंटरव्यू में ट्रम्प ने चीन को लेकर काफ़ी सख़्त शब्दों में कहा कि “मैं बहुत कुछ कर सकता हूँ”। यानी, वायरस को लेकर चीन को सबक सिखाने के लिए विकल्पों पर काम चल रहा है। उनसे पूछा गया कि क्या वह चीन पर हाई टैरिफ का इस्तेमाल करेंगे या क़र्ज़ों को बट्टे खाते में डालेंगे? तो ट्रम्प सीधा जवाब टाल गये और बोले, “कई चीज़ें हैं जो मैं कर सकता हूँ”। अपनी गिरती लोकप्रियता से बौखलाए ट्रम्प ने कहा, “मैं हार जाऊँ, इसके लिए चीन जो कुछ भी कर सकता है, करेगा”।

‘बाइडेन जीते तो अमेरिका पर चीन का क़ब्ज़ा’

ट्रम्प ने कहा कि वह मानते हैं कि चीन उनके प्रतिपक्षी और डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार पूर्व उपराष्ट्रपति जोए बाइडेन को जितवाना चाहता है। ताकि उन्होंने चीन पर व्यापार और अन्य मुद्दों को लेकर जो दबाव बना है, वह कम हो जाए। इससे पहले भी ट्रम्प कह चुके हैं कि ‘बाइडेन जीते तो अमेरिका पर चीन का क़ब्ज़ा हो जाएगा’। ये बात बिल्कुल वैसी ही है जैसे 2015 में बिहार चुनाव में कहा गया था कि बीजेपी नहीं जीती तो पाकिस्तान में दिवाली मनायी जाएगी।

हाल ही में अख़बार ‘वाशिंगटन टाइम्स’ ने अमेरिकी सरकार के हवाले से लिखा था कि कोरोना वायरस के वुहान लैब से फैलने की सम्भावना सबसे ज़्यादा है। इससे पहले ट्रम्प कह चुके हैं कि कोरोना वायरस वुहान की लैब से एक इंटर्न की ग़लती की वजह से लीक हुआ। लेकिन अब ख़ुफ़िया एजेंसियों की रिपोर्ट से साफ़ हो चुका है कि ट्रम्प हवा में तलवार भाँज रहे थे। उनके प्रभाव में आकर फ्रांस के एक नोबल विजेता वायरस विशेषज्ञ ने भी आव देखा न ताव और बग़ैर किसी शोध के दावा कर दिया कि ये वायरस प्राकृतिक रूप से पैदा नहीं हुआ, बल्कि किसी औद्योगिक हादसे का नतीज़ा हो सकता है।

साफ़ है कि वैज्ञानिक भी राजनीतिक बयान दे रहे थे। भारत में भी कई वैज्ञानिक मोदी-चालीसा का गायन-वादन कर चुके हैं। राष्ट्रपति के सुर मे सुर मिलाते हुए दो सप्ताह पहले अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो कह चुके हैं कि चीन को वुहान लैब में अमेरिकी जाँच की इजाज़त देनी चाहिए क्योंकि वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी से कुछ ही दूर वो सी-फूड मार्केट है, जहाँ की मछली बेचने वाली वेई नामक महिला को कोविड-19 का पहला मरीज़ माना गया है।

ट्रम्प के जाल में नहीं फँसी भारत सरकार

हाल के दिनों में कोरोना को लेकर ट्रम्प ने चीन पर तीखे हमले करके दुनिया को ये समझाने की कोशिश की कि दो लाख से ज़्यादा जानें लेने वाला और 30 लाख से ज़्यादा ज्यादा लोगों को संक्रमित करने वाला कोरोना वायरस चीन की वुहान लैब से ही बाहर निकला है। मज़े की बात ये भी रही कि ट्रम्प ने भारत से भी उसके सुर में सुर मिलाने को कहा था। लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय ने साफ़ मना कर दिया। अलबत्ता, ट्रम्प जैसी दुर्दशा कल को नरेन्द्र मोदी की ना हो जाए, इसे देखते हुए भारतीय गोदी मीडिया और बीजेपी के आईटी सेल ने चीन का चरित्रहनन करने में अपनी ताक़त वैसे ही झोंक दी है, जैसे राहुल गाँधी और नेहरू का किया जाता है।

हालाँकि, चीन भी कोई दूध का धुला नहीं है। लेकिन चीन ने जैसी भी हरकतें की हैं, वैसा कमोबेश हर देश में हमेशा होता रहा है। दुनिया के हरेक देश के मीडिया को अपनी सरकारों की ओर से तय होने वाले राष्ट्रीय हितों के अनुसार ही चलना पड़ता है। अमेरिका, इटली, स्पेन, फ़्राँस, जर्मनी और कनाडा जैसे देशों से कोरोना से निपटने में कोताही दिखाने की कोई मामूली ख़बरें नहीं आयी हैं। इसीलिए सभी को चीन को खलनायक के रूप में पेश करने में मज़ा आ रहा है। भारत में भी चीन से आयातित ख़राब PPE और टेस्टिंग किट जैसी घटनाएँ चीन के ख़िलाफ़ माहौल बनाने में बड़ा योगदान देती हैं।

बहरहाल, ट्रम्प की हवा अब बहुत बिगड़ चुकी है, क्योंकि अमेरिकी और वैश्विक इंटेलिजेंस कम्युनिटी अब उस व्यापक वैज्ञानिक सहमति के साथ खड़ी है जो मानती है कि COVID-19 मानव निर्मित या आनुवंशिक रूप से परिष्कृत नहीं है। इसी तरह अभी तक वायरस के चमगादड़ या किसी अन्य जीव से इसके इंसान में आने के दावों की भी कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है। ज़ाहिर है, कोरोना संक्रमण के कई रहस्य अभी क़ायम हैं।

उधर, चीन की सफाई पर दुनिया को यक़ीन नहीं हो रहा। वो बार-बार वुहान की लैब से वायरस लीक होने के दावे को मनगढ़न्त और झूठा बताता रहा है। लैब में 1500 से ज़्यादा वायरस मौजूद हैं जिन पर रिसर्च होते हैं। ये लैब फ़्राँस के ज़ोरदार सहयोग से बनी थी और इसमें अमेरिका भी फंडिंग कर चुका है। लेकिन अभी चुनाव और हार को सिर पर मंडराता देख ट्रम्प ने चीन को अपना मुख्य प्रतिद्वन्द्वी बना लिया है। भारत में लोकसभा चुनाव ज़रूर काफ़ी दूर हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल और बिहार के चुनाव की आहट तो अब मिलने लगी है। बीजेपी को पूरे देश के कोरोना के प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पीड़ितों की वैसे परवाह नहीं है, जैसे बंगालियों को लेकर उनका मन मचलने लगा है।

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बेशक़, प्रधानमंत्री की सहमति से ही हो रही है श्रम क़ानूनों की ‘हत्या’!

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Migrant Worker labour laws

ऐसे वक़्त में जब कोरोना संक्रमण से पैदा हुई चुनौतियाँ बेक़ाबू ही बनी हुई हैं, तभी हमारी राज्य सरकारों में एक नया संक्रमण बेहद तेज़ी से अपने पैर पसार रहा है। बीते पाँच दिनों में छह राज्यों ने 40 से ज़्यादा केन्द्रीय श्रम क़ानूनों को अपने प्रदेशों में तीन साल के लिए निलम्बित करने का असंवैधानिक और मज़दूर विरोधी फ़ैसला ले लिया।

पहले से ही तक़रीबन बेजान पड़े इन श्रम क़ानूनों को ताक़ पर रखने के संक्रमण की शुरुआत 5 मई को मध्य प्रदेश से हुई। दो दिन बाद इस संक्रमण ने उत्तर प्रदेश और गुजरात को अपनी चपेट में ले लिया। फिर 10 मई को ओडिशा, महाराष्ट्र और गोवा की सरकारों ने भी पूँजीपतियों की मदद के नाम पर मज़दूरों के शोषण के लिए सारे रास्ते खोलने का ऐलान कर दिया। यही रफ़्तार रही तो इस मज़दूर विरोधी संक्रमण को राष्ट्रव्यापी बनने में देर नहीं लगेगी।

कोरोना संकट के दौरान मोदी सरकार ने एक से बढ़कर एक ग़रीब विरोधी और अदूरदर्शी फ़ैसले लिये। लॉकडाउन की आड़ में ग़रीबों पर ऐसे सितम हुए जो भारत में पहले कभी देखे या सुने नहीं गये। दिल दहलाने वाला सबसे बड़ा सितम तो ये रहा कि ग़रीबों की न सिर्फ़ रोज़ी-रोटी छिनी बल्कि जब वो सिर पर कफ़न बाँधकर बड़े-बड़े शहरों से अपने गाँवों को लौटने के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल ही सड़क नापने लगे तब उन पर पुलिसिया डंडे बरसाये गये। अब मुट्ठी भर ग़रीबों के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाने की रस्म अदायगी भी इसीलिए हुई है, ताकि इनकी देखा-देखी विदेश में फँसे सम्पन्न लोगों को विमानों और जहाज़ों से देश में वापस लाया जा सके।

ट्रेनों के अनिश्चितकालीन इन्तज़ार से जिन ग़रीबों का ऐतबार उठ चुका था, उन्हें सड़कों-हज़ारों किलोमीटर लम्बी सड़कों को पैदल भी नहीं नापने दिया जा रहा। जबकि सम्पन्न वर्ग के बच्चों के लिए कोटा बसें भेजीं गयी, स्पेशल ट्रेन चली, हरिद्वार में फँसे गुजरातियों को बसों में भरकर उनके घर पहुँचाया गया तो नांदेड़ में फँसे सिख श्रद्धालुओं को कोरोना के साथ पंजाब पहुँचाया गया। दूसरी ओर, चिलचिलाती धूप में भूखे-प्यासे सड़क नाप रहे ग़रीबों ने तो अपने मुँह पर मॉस्क या रुमाल या गमछा भी बाँध रखा है और वो सोशल डिस्टेंसिंग भी बरत रहे हैं।

जो प्रधानमंत्री ग़रीबों को रोना रोता रहा हो, जो ग़रीबों की सरकार होने और उनका मसीहा होने का जुमला बेचता रहा हो, उसकी नाक के नीचे बदनसीब ग़रीबों को सड़कों तो क्या रेल की पटरियों पर बिछे कंक्रीट पर भी नहीं चलने दिया जा रहा। ऐसा लग रहा है जैसे मोदी सरकार, ग़रीबों और मज़दूरों को जीते-जी मार डालने की किसी ख़ुफ़िया नीति पर काम कर रही है। एक हज़ार दिनों के लिए श्रम क़ानूनों का ख़ात्मा भी इसी साज़िश का हिस्सा है। वैसे भी भारत में ‘मज़दूरों के अधिकार’ सिर्फ़ क़ानून की किताबों तक ही सीमित थे, लेकिन अब कोरोना की आड़ में इन्हें किताबों से भी हटाया जा रहा है।

लॉकडाउन से पहले 130 करोड़ की भारतीय आबादी में क़रीब 31 करोड़ कामग़ार थे। इसमें से 92 फ़ीसदी असंगठित क्षेत्र से जुड़े थे। ये असंगठित सिर्फ़ इसीलिए कहलाये, क्योंकि इन्हें किताबी श्रम क़ानूनों ने कभी संरक्षण नहीं दिया। कुल कामगारों में से अब तक क़रीब 12 करोड़ लोग बेरोज़गार हो चुके हैं। दिहाड़ी मज़दूरों की तो कभी कोई पूछ रही ही नहीं, वेतन भोगी मज़दूरों को भी अप्रैल की तनख़्वाह नहीं मिली। बंगलुरू की अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के मुताबिक, 90 फ़ीसदी मज़दूरों को उनके नियोक्ता यानी इम्पलायरों ने बक़ाया मज़दूरी नहीं दी।

हमारी सामन्ती संस्कृति और इसी पर खड़े पूँजीवादी तंत्र ने देखते ही देखते ‘मज़दूरों के अधिकारों’ और ‘ट्रेड यूनियन’ का ऐसा चरित्र-हनन किया जैसा अभी राहुल गाँधी और नेहरू का हो रहा है। पूँजीवादी मीडिया और समाज में सामाजिक सुरक्षाओं से सबसे ज़्यादा लाभान्वित सरकारी कर्मचारियों के तबक़े ने ‘ट्रेड यूनियन्स’ के प्रति ऐसी नफ़रत फैलायी कि आज सरकारों ने चुटकी बजाकर ‘मज़दूरों के अधिकारों’ को ख़त्म करने की हिम्मत दिखा दी। यही वजह है कि देश में ‘न्यूनतम मज़दूरी’ अब भी एक ख़्वाब ही है। बीते दशकों में ठेका प्रथा का ऐसे विस्तार हुआ, जैसा अभी तक कोरोना का भी नहीं हुआ।

ये आलम किसी से छिपा नहीं है कि मज़दूरों को उनके अधिकार सरकारी श्रम विभाग तो छोड़िए, अदालतें में नहीं दिला रही हैं। मज़दूरों के हक़ों के मामले हमारी अदालतों में दशकों तक इंसाफ़ का मुँह ही देखते रहते हैं। इसीलिए व्यवहारिक तौर पर देश के श्रम क़ानूनों दिखावटी या शो-पीस बने हुए मुद्दत हो गयी, हालाँकि ये मज़दूरों के सैकड़ों बरस के संघर्ष के बाद अस्तित्व में आये थे। अभी जिन क़ानूनों को ख़त्म किया गया है उनमें से कई तो आज़ादी से भी कहीं ज़्यादा पुराने हैं। जैसे 1883 का Factories Act, जिसने काम के लिए आठ घंटे की सीमा बनायी, बाल श्रम को निषेध बनाया, महिलाओं को रात की ड्यूटी पर नहीं लगाने का नियम बनाया। इसी तरह 1926 में बने Trade Union Act को संविधान में अनुच्छेद 19(1)(c) के रूप में मौलिक अधिकार की ताक़त से जोड़ा गया।

1936 के Payment of Wages Act से मज़दूरों को हर महीने वेतन पाने का हक़ मिला। कुछ श्रम क़ानून तो ऐसे हैं जो संविधान से भी पहले के हैं। जैसे 1947 का Industrial Dispute Act, 1948 का Minimum Wage Act. दिलचस्प बात ये भी है कि जिन उद्यमियों को ख़ुश करने के लिए अभी श्रम क़ानूनों की हत्या की गयी है, उनके बारे में कभी कोई ऐसा प्रमाणिक अध्ययन या शोध सामने नहीं आया कि इनकी वजह से ही भारतीय उद्योग पिछड़ा हुआ है। अलबत्ता, ये सही है कि इन क़ानूनों से जो इंस्पेक्टर राज पैदा होता था, उससे सरकारी भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता था। लिहाज़ा, ज़रूरत भ्रष्टाचारी तंत्र को सुधारने की थी, लेकिन इसकी जगह सरकारों ने उन क़ानूनों को सफ़ाया कर दिया जो मज़दूरों को झूठी दिलासा दिलाते रहते थे।

ये किससे छिपा है कि देश में सरकारें पूँजीपतियों की मुट्ठी में ही रही हैं। इसीलिए धन्ना सेठों को कर्ज़ के ज़रिये बैंकों को लूटने की छूट हर दौर में मिलती रही है। ये बात अलग है कि मोदी राज में ये काम बेहद बड़े और व्यापक पैमाने पर हो रहा है। इसीलिए सिर्फ़ इसी तबके ने ‘अच्छे दिन’ का पूरा मज़ा लूटा है। आगे भी इसी की लूट को आसान बनाया जा रहा है। दिलचस्प बात ये भी है कि राज्यों ने चुटकी बजाकर जिस ढंग से अध्यादेश जारी करके केन्द्रीय श्रम क़ानूनों को निलम्बित करने का रास्ता थामा है, उसे संसद ने बरसों-बरस की मशक्कत और अनुभव से तैयार किया था। इसीलिए, राज्यों का फ़ैसला एकतरफ़ा नहीं हो सकता। उनके अध्यादेश को केन्द्र सरकार की रज़ामन्दी की बदौलत राष्ट्रपति की मंज़ूरी भी चाहिए।

इतना तो साफ़ दिख रहा है कि बग़ैर सोचे-समझे, बिना पर्याप्त तैयारी के नोटबन्दी और लॉकडाउन जैसे कड़े फ़ैसले लेने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘मज़दूरों के अधिकारों’ और ‘ट्रेड यूनियन’ को ख़त्म करने के लिए बाक़ायदा अपनी सहमति दी होगी, वर्ना शिवराज सिंह चौहान, योगी आदित्य नाथ, विजय रूपाणी और प्रमोद सावंत जैसों की हिम्मत नहीं हो सकती थी कि वो अपनी मर्ज़ी से इतना बड़ा फ़ैसला ले लें। नवीन पटनायक भी बीजेपी की बी-टीम वाले नेता ही हैं। लेकिन ये बात समझ से परे है कि काँग्रेस और एनसीपी की बैसाखियों पर सवार उद्धव ठाकरे को बीजेपी जैसी मूर्खता करने की क्या पड़ी थी? इन्हें तो बहुत जल्द ही पछताना पड़ेगा।

मौजूदा राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द में इतनी हिम्मत नहीं हो सकती कि वो छह राज्य सरकारों के असंवैधानिक अध्यादेश पर दस्तख़त करने से मना कर दें। क्योंकि देश ने उनकी स्वामि-भक्ति की शानदार लीला को 22 और 23 नवम्बर 2019 की उस ऐतिहासिक रात को देख लिया था, जब उन्होंने रातों-रात महाराष्ट्र से राष्ट्रपति शासन हटाने की अनुमति दे दी थी, ताकि सुबह 7 बजे राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी चटपट देवेन्द्र फड़नवीस की ताजपोशी करवा सकें। पेशे से वकील रह चुके राष्ट्रपति कोविन्द की संवैधानिक समझ को जनता ने उस वक़्त भी देखा था जब उन्होंने विवादास्पद नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) पर दस्तख़त किये थे।

वैसे जिन कोविन्द साहब से अभी श्रम क़ानूनों की परोक्ष रूप से हत्या करवायी जाएगी, उन्होंने ही 8 अगस्त 2019 को उस Code on Wages, 2019 पर दस्तख़त किये थे, जिसे मोदी सरकार ने अपने उद्यमी दोस्तों को ख़ुश करने के लिए श्रम सुधारों का नाम देकर संसद से पारित करवाया था। इस नये क़ानून की नौटंकी से भी कभी किसी का भला नहीं हुआ क्योंकि इसे लागू करने के लिए नियम (Rules) बनाने की सरकार को फ़ुर्सत ही नहीं थी। लिहाज़ा, कोविन्द के अब तक के अनुभव को देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि वो 2013 वाले एपीजे अब्दुल कलाम की तरह मनमोहन सिंह सरकार को Office of Profit Bill को या 1987 वाले ज्ञानी जैल सिंह की तरह राजीव गाँधी सरकार को Indian Post Office Bill पुनर्विचार के लिए लौटा भी सकते हैं।

फ़िलहाल, ‘मोदी है तो मुमकिन है’ वाला दौर है। इसमें सरकार हर उस काम को अवश्य करती है, जिसकी ज़बरदस्त आलोचना हो रही हो। मोदी जी किसी की नहीं सुनते। तानाशाह की तरह जो जी में आता है, वही करते हैं। उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े भारतीय मज़दूर संघ (BMS) ने श्रम क़ानूनों की हत्या को अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के उन सिद्धान्तों या conventions का सरासर उल्लंघन बताया है, जिन पर भारत ने भी दस्तख़त किये हैं। BMS अध्यक्ष शाजी नारायण का कहना है कि ‘श्रम क़ानूनों को ख़त्म किये जाने से ऐसी परिस्थितियाँ पैदा होंगी, जहाँ क़ानून के राज का नामोनिशान ही नहीं रहेगा।’

भारत ने अब तक ILO के 39 conventions पर दस्तख़त किये हैं। इसके आठ बुनियादी conventions को ही श्रम क़ानूनों में अपनाया गया है। मज़दूरों के हक़ का क़त्ल करने से दुनिया भर में भारत की ऐसी बेइज़्ज़ती होगी कि इसका प्रतिकूल असर उस काल्पनिक विदेशी निवेश पर भी पड़ेगा जिसकी उम्मीद में तमाम ऐतिहासिक मूर्खताएँ की जा रही हैं। इसीलिए ये साक्षात अन्धेर है। शर्मनाक है। पाग़लपन है। इससे सिर्फ़ इतना साबित हो रहा है कि कोरोना संकट के आगे हमारी सरकारें बदहवास हो चुकी हैं, अपनी सुध-बुध गवाँ चुकी हैं। इनकी मति मारी गयी है। इन पर सत्ता का ऐसा नशा सवार है कि इन्हें उचित-अनुचित का भी होश नहीं। ज़ाहिर है कि मोदीजी के सामने क़ानून के राज और संविधान की औक़ात ही क्या है!

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क्या काँग्रेस के लिए टर्निंग प्वाइंट बनेगी ग़रीबों का रेल-भाड़ा भरने की पेशकश?

राजनीति में हवा का रुख़ पलटने में ज़्यादा देर नहीं लगती। इसीलिए सभी राजनेता हर बात का राजनीतिकरण करने का मौक़ा ढूँढते रहते हैं। यह हवा जिसके ख़िलाफ़ होती है, वो हमेशा ‘इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए’ की दुहाई देता रहता है। पहले से ही अर्थव्यवस्था ख़राब हालत में थी। लॉकडाउन ने बचे-खुचे को भी ध्वस्त कर दिया। ग़रीबों पर ऐसी मार पहले कभी नहीं पड़ी। इसीलिए रेल-भाड़े की पेशकश कांग्रेस के लिए टर्निंग प्वाइंट बन सकती है।

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Sonia Gandhi Congress Prez

कोरोना संकट के दौरान परदेस में फँसे और पाई-पाई को मोहताज़ ग़रीब और प्रवासी मज़दूरों के लिए कांग्रेस की ओर से मदद का हाथ बढ़ाने की पेशकश से बीजेपी ख़ेमा सकपका गया। बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने तो अपनी ही सरकार की नीति पर ज़ोरदार हमला किया है। बीजेपी की लद्दाख इकाई के अध्यक्ष ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया तो इसके कई अन्य विधायक भी तमाम अव्यवस्था को लेकर अपनी ही सरकारों और उसके ज़िला प्रशासन को आड़े हाथ लेते रहे। उधर, सैकड़ों किलोमीटर सड़क को पैदल नापते हुए परदेस से अपने गाँवों की ओर बढ़ रहे ग़रीब प्रवासी मज़दूरों की ख़बरें आने और तसवीरों के वायरल होने का सिलसिला जारी है। ऐसे माहौल में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने ज़बरदस्त मास्टर स्ट्रोक लगाया है।

सोनिया का हमला

सोनिया गाँधी ने एलान किया कि परदेस में फँसे प्रवासियों को उनके गृह राज्यों तक भेजने का रेल भाड़ा यदि केन्द्र सरकार और रेलवे नहीं भर सकते तो कांग्रेस उनका ख़र्च उठाएगी। उनका बयान है कि श्रमिक और कामगार राष्ट्र-निर्माण के दूत हैं। जब हम विदेश में फँसे भारतीयों को हवाई जहाज से निशुल्क वापस लाने को अपना कर्तव्य समझते हैं तो ग़रीबों पर यही नियम लागू क्यों नहीं हो रहा? जब हम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के लिए अहमदाबाद के हुए आयोजन पर सरकारी खजाने से 100 करोड़ रुपये ख़र्च कर सकते हैं, जब प्रधानमंत्री के कोरोना फंड में रेल मंत्रालय 151 करोड़ रुपये दान दे सकता है, तो फिर तरक्की के ग़रीब ध्वज-वाहकों को आपदा की इस घड़ी में निशुल्क रेल यात्रा की सुविधा क्यों नहीं मिल सकती?

रेल-भाड़े की पेशकश

सोनिया गाँधी सिर्फ़ बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने कहा कि 24 मार्च को सिर्फ़ चार घंटे के नोटिस पर लगाये गये लॉकडाउन के कारण करोड़ों कामगार अपने घरों तक वापस लौटने से वंचित हो गये। 1947 के बँटवारे के बाद देश ने पहली बार ऐसे दिल दहलाने वाले मंजर देखे। हज़ारों प्रवासी कामगार सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर जाने के लिए मजबूर हो गये।

इन मज़दूरों के पास न राशन, न पैसा, न दवाई, न साधन, लेकिन जान पर खेलकर अपने गाँव पहुँचने की इनकी अद्भुत लगन देखकर भी केन्द्र सरकार को तरस नहीं आया। कांग्रेस पार्टी ने तय किया कि उसकी हरेक प्रदेश इकाई प्रवासी मज़दूरों के रेल-भाड़े का ख़र्च उठाएगी।

क्या है बेलछी नरसंहार?

इसे आज़ाद भारत में बिहार का पहला जातीय नरसंहार माना जाता है। मौजूदा नालन्दा ज़िले के बेलछी गाँव में 27 मई 1977 को 11 दलित खेतिहर मज़दूर ज़िन्दा जला दिये गये। गाँव का दबंग महावीर महतो और उसके गुर्गे बंदूक की नोंक पर मृतकों को उनके घरों से घसीटकर खुले मैदान में ले गये वहाँ उन्हें बाँधकर, आसपास से लकड़ियाँ और घास-फूस जमा करके ज़िन्दा जला दिया गया। महावीर महतो के सिर पर स्थानीय निर्दलीय विधायक इन्द्रदेव चौधरी का हाथ रहता था। उसने गाँव की सार्वजनिक सम्पत्ति और तालाब पर अवैध क़ब्ज़ा कर रखा था तथा अक्सर अन्य जातियों के लोगों को सताता था। उन्हीं दिनों दुसाध जाति का एक खेतीहर सिंघवा अपनी ससुराल बेलछी आया। उसने महावीर के ज़ुल्म के विरुद्ध गाँववालों को संगठित किया। यही विरोध बर्बर नरसंहार में बदल गया।

बेलछी से इंदिरा की वापसी

बेलछी काँड से दो महीने पहले, 24 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने थे। आपातकाल के बाद हुए चुनाव में इंदिरा गाँधी को जनता पार्टी से क़रारी हार मिली थी। वह सियासी सदमे में थीं। तभी बेलछी नरसंहार की ख़बर आयी। मौक़े की नज़ाकत भाँप इंदिरा गाँधी, विमान से दिल्ली से पटना, फिर कार से बिहार शरीफ पहुँच गयीं। अब उन्हें कच्ची सड़क से 25 किलोमीटर दूर बेलछी गाँव पहुँचना था। स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो ने सोनिया गाँधी की जीवनी ‘द रेड साड़ी’ में इस प्रसंग के बारे में इन्दिरा गाँधी के हवाले से लिखा:

“उस दिन तेज़ बारिश हो रही थी। बेलछी के रास्ते पर कीचड़-पानी की वजह से जीप का चलना मुश्किल था। सबने कहा कि ट्रैक्टर ही आगे जा सकता है। मैं सहयोगियों के साथ ट्रैक्टर पर चढ़ी। ट्रैक्टर भी कुछ दूर जाकर कीचड़ में फँस गया। मौसम और रास्ते को देख सहयोगियों ने वापस लौटने की राय भी दी। लेकिन मुझे तो धुन सवार थी कि हर हाल में बेलछी पहुँचना है। पीड़ित दलित परिवार से मिलना है। इसीलिए मैंने साथियों से कहा, जो लौटना चाहते हैं, लौट जाएँ। मैं तो बेलछी जाऊँगी ही। हालाँकि, मैं जानती थी कि कोई नहीं लौटेगा।”

इंदिरा गाँधी ने आगे बताया कि “कीचड़-पानी के बीच हम आगे बढ़ते रहे। शाम हो चली थी। आगे एक बरसाती नदी थी। इसे पार करने का उपाय नहीं था। तभी गाँव के मंदिर के हाथी ‘मोती’ का पता चला। लेकिन उस पर बैठने का हौदा नहीं था। मैंने कहा, चलेगा। हाथी पर कंबल-चादर बिछाकर बैठने की जगह बनायी गयी। आगे महावत बैठा। उसके बाद मैं और मेरे पीछे प्रतिभा पाटिल बैठीं। प्रतिभा डर से काँप रही थीं। उन्होंने मेरी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ रखा था। हाथी जब नदी के बीच पहुँचा तो पानी उसके पेट तक पहुँच गया। नदी पार होने तक अंधेरा घिर आया। बिजली कड़क रही थी। ये सब देख थोड़ी घबराहट भी हुई। लेकिन फिर मैं बेलछी के पीड़ित परिवारों के बारे में सोचने लगी। ख़ैर, जब बेलछी पहुँची तो रात हो चुकी थी। पीड़ित परिवारों से मिली। मेरे पहुँचने पर गाँववालों को लगा जैसे कोई देवदूत आ गया हो। मेरे कपड़े भीग चुके थे। उन्होंने मुझे पहनने के लिए सूखी साड़ी दी। खाने के लिए मिठाइयाँ दीं। फिर कहने लगे, आपके ख़िलाफ़ वोट किया, इसके लिए क्षमा कर दीजिए।”

बेलछी के बाद

पाँच दिन बाद इंदिरा गाँधी बेलछी से दिल्ली लौटीं। अब तक उनका बेलछी दौरा अन्तरराष्ट्रीय सुर्ख़ियाँ बटोर चुका था। ढाई महीने पहले जनता की ज़बरदस्त नाराज़गी झेल चुकी इंदिरा गाँधी के जज़्बे की अब ख़ूब तारीफ़ हो रही थी।

तब हाथी पर सवार होकर बेलछी जा रही इंदिरा गाँधी की तसवीर और इससे जुड़ी कहानी कहाँ नहीं छपी! इसी यादगार मोड़ पर राजनीति और लोकप्रियता में इंदिरा गाँधी की ऐसी वापसी हुई कि 1980 में हुए मध्यावधि चुनाव से वो बहुमत के साथ सत्ता में वापस लौटीं और मृत्यु तक प्रधानमंत्री रहीं।

ज़ाहिर है, राजनीति में हवा का रुख़ पलटने में ज़्यादा देर नहीं लगती। इसीलिए सभी राजनेता हर बात का राजनीतिकरण करने का मौक़ा ढूँढते रहते हैं। यह हवा जिसके ख़िलाफ़ होती है, वो हमेशा ‘इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए’ की दुहाई देता रहता है। यही वजह है कि ग़रीब प्रवासियों का रेल-भाड़ा भरने की कांग्रेस की पेशकश सोनिया गाँधी का मास्टर स्ट्रोक है। कोरोना संकट से पहले भी देश की आर्थिक दशा बहुत ख़राब थी। लॉकडाउन ने बचे-खुचे को भी ध्वस्त कर दिया। ग़रीबों पर ऐसी मार पहले कभी नहीं पड़ी। इसीलिए रेल-भाड़े की पेशकश कांग्रेस के लिए टर्निंग प्वाइंट बन सकती है। हालाँकि, चुनाव अभी बहुत दूर हैं और जनता की याददाश्त अच्छी नहीं होती।

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ओपिनियन

धन्य है गोदी मीडिया जिसने प्रधानमंत्री के बयान को भी ‘अंडरप्ले’ कर दिया!

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pm modi cm meeting

मुख्यमंत्रियों के साथ 27 अप्रैल को हुई वीडियो कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो सबसे बड़ी बात कही, उसे उनके चहेते मेनस्ट्रीम (गोदी) मीडिया ने ऐसा ‘अंडरप्ले’ किया कि वो सुर्ख़ियों से ग़ायब हो गया। प्रधानमंत्री ने कहा कि “आर्थिक स्थिति की चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है। हमारी अर्थव्यवस्था अच्छी है।” कोरोना की आफ़त के बीच प्रधानमंत्री ने इतनी बड़ी बात कही है। लेकिन इसे तव्वज़ो नहीं मिली। शायद, ऐसी वजहों से ही प्रधानमंत्री को भारतीय पत्रकारिता नापसन्द है। अरे! भले ही अपूर्व संकट की मौजूदा घड़ी में प्रधानमंत्री की मंशा देश को ढाँढ़स बँधवाने की ही रही हो, लेकिन इतने बड़े, गहरे और दूरगामी बयान को नज़रअंदाज़ करके गोदी मीडिया ने माननीय प्रधानमंत्री को उनके नारे “दो गज़ दूरी, है ज़रूरी” तक सीमित कर दिया।

ये मोदीजी के प्रति घोर अन्याय है। निन्दनीय है। गोदी मीडिया को ये हक़ किसने दिया कि वो मोदीजी को उस डोनॉल्ड ट्रम्प जैसा मसख़रा समझे जो ‘मज़ाक’ भी इतना मूर्खतापूर्ण करते हैं कि सारी दुनिया उन पर हँसती नहीं बल्कि उनकी बुद्धि पर तरस खाती है। ज्ञात हो कि ट्रम्म ने सेनेटाइज़र पीने और फेफड़ों में इंजेक्शन लगाकर कोरोना को ख़त्म करने के मशविरा दिया था। बहरहाल, लौटते हैं मोदीजी की ओर। देश का हर अर्थशास्त्री, रिज़र्व बैंक, उद्योग जगत सभी लॉकडाउन की वजह से अर्थव्यवस्था को लेकर बेहद चिन्तित हैं। चिन्तित लोगों की इस जमात में विपक्षी नेता और टुकड़े-टुकड़े गैंग वाले बुद्धिजीवी शामिल नहीं हैं। क्योंकि इनका तो मोदीजी के चमत्कारों में कभी यक़ीन रहा ही नहीं। लेकिन गोदी मीडिया ने भी इतनी बड़ी ‘ख़बर’ को नहीं समझा, इसे लेकर आश्चर्य है!

सचमुच, ब्रॉन्डिंग के शहंशाह मोदीजी के लिए इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ नहीं हो सकता! मुमकिन है गोदी मीडिया से अंजाने में ऐसा ग़ुनाह इसलिए हो गया हो कि उसे प्रधानमंत्री कार्यालय से अर्थव्यवस्था वाली बात को उछालने की हिदायत नहीं मिली हो। वैसे भी गोदी मीडिया को हिन्दू-मुस्लिम के सिवाय और कुछ दिखता भी तो नहीं। जो आँखें कभी ऐसे घोटाले भी देख लेती थीं, जो अदालतों में साबित नहीं हो सके, जो आँखें नोटबन्दी और जीएसटी का गुणगान किये नहीं थकती थीं, जिन्होंने सीएए और एनआरसी की शान में आकाश-पाताल एक कर दिया था, उन्हीं आँखों को अब कोरोना की टेस्टिंग किट के आयात में छिपा गोल-माल नहीं दिखता है। जैसे इसे राफ़ेल घोटाला भी नहीं दिखा, वैसे ही अब प्रवासी कामकारों की भुखमरी और दिहाड़ी मज़दूरों की बेरोज़गारी भी नहीं दिख रही।

कहना मुश्किल है कि गोदी मीडिया रतौंधी से पीड़ित है या मोतियाबिन्द से। वर्ना, ऐसे वक़्त में जब नवजात ‘पीएम केयर फंड’ को छोड़कर अर्थव्यवस्था का हरेक क्षेत्र या तो कराह रहा है या फिर अन्तिम साँसें गिन रहा है, तब प्रधानमंत्री के इस बयान की अहमियत कितनी बड़ी है कि ‘अर्थव्यवस्था की चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है, वो ठीक है।’ अरे! ये ब्रेक्रिंग नहीं, बल्कि Earth Shaking ख़बर है! इस बयान के बाद तो भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में बसे हुए भारतवंशियों को अपने-अपने घरों में रहते हुए ताली-थाली वादन करके, शंखनाद करके और दीये जलाकर जश्न मनाना चाहिए।

दरअसल, हमें मानकर चलना चाहिए कि प्रधानमंत्री ने जनता को खुश करने के लिए रिज़र्व बैंक से सरप्लस फंड को हासिल करने की सीमा को 75,000 करोड़ रुपये से बढ़वाकर 2 लाख करोड़ रुपये करवा दिया है, बार-बार बैंकों के रेपो-रेट कम किये जा रहे हैं, जीडीपी के शून्य तक गिरने की बातें हो रही हैं, ग़रीबों की संख्या में 10 करोड़ लोगों के इज़ाफ़े की बातें भी हुई हैं, बेरोज़गारों की तादाद में भी 10 करोड़ की वृद्धि का अनुमान लगाया गया है, सरकारी कर्मचारियों की तनख़्वाह में भी डेढ़ साल तक कटौती लागू हो गयी है, पेंशनरों से भी कहा गया है कि उन्हें डेढ़ साल तक तो कष्ट बर्दाश्त करना ही होगा, संगठित क्षेत्र तबाह है, असंगठित क्षेत्र बर्बाद है, जिन किसानों की आमदनी ‘दोगुनी’ हो चुकी थी उन्हें अब अपनी उपज का आधा दाम भी मिलना मुहाल है, कल-कारखानें, ऑफ़िस-रेस्टोरेंट बन्द हैं, मॉल-बाज़ार बन्द हैं, कुटीर उद्योग ख़त्म हैं, रेल-विमान, ट्रक-बस सब बन्द हैं, फिर भी यदि मोदीजी कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था ठीक है, तो ठीक ही होगी!

वर्ना, कौन नहीं जानता कि उन्हें अपने दोस्त ट्रम्प की तरह न तो मज़ाक करना पसन्द है और ना ही बेवकूफ़ी भरी बातें करना। वो तो जैसे इंसान को कपड़ों से पहचानने की क़ाबलियत रखते हैं, वैसे ही अर्थव्यवस्था की नब्ज़ पकड़ना भी जानते हैं। मज़े की बात तो ये भी है कि मोदीजी के इस अनुपम रहस्य का पता दुनिया को कोरोना की दस्तक देने से पहले भारत में छायी मन्दी के वक़्त भी नहीं चला। शुक्र है कि अब पर्दा उठ गया। भेद खुल गया।

किसकी हिम्मत है जो प्रधानमंत्री से पूछ भी ले कि अरे हुज़ूर, माई-बाप, बड़ी मेहरबानी होगी, यदि आप ज़रा ये समझा दें कि अर्थव्यवस्था कैसे ठीक है, क्या-क्या ठीक है, कितना-कितना ठीक है? नहीं तो बस, इतना ही बता दीजिए कि जो कुछ लेस-मात्र भी ठीक नहीं है, वो कब तक ठीक हो जाएगा, कैसे ठीक होगा? टुकड़े-टुकड़े गैंग का भी आपके मार्गदर्शन से उद्धार हो जाएगा, देश द्रोहियों का कौतूहल भी शान्त हो सकेगा। साफ़ है कि यदि प्रधानमंत्री ये कह रहे हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है, तो फिर अर्थव्यवस्था, रोज़ी-रोटी और घर-गृहस्थी के बारे में वो कुछ नहीं जानते। इन विषयों में वो अज्ञानी हैं।

प्रधानमंत्री ये भी नहीं जानते कि लोगों को चिन्ता कब होती है, क्यों होती है और उसका निराकरण कैसे हो सकता है! उन्हें कौन बताये कि मामला सिर्फ़ देह से दो गज़ की दूरी का ही नहीं है, बल्कि भोजन की थाली से पेट की दूरी का सवाल इससे भी बड़ा है। सबसे बड़ा है। कोरोना का मुक़ाबला करने के लिए भी तो सबसे पहले पेट को रोटी पहले चाहिए। रोटी के लिए पैसा चाहिए। पैसे के लिए धन्धा-रोज़गार चाहिए। धन्धा-रोज़गार है, तभी अर्थव्यवस्था ठीक है। वर्ना, सब कूड़ा है। सफ़ाचट है।

Mukesh Kumar Singh मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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