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जबतक भारत का अस्तित्‍व रहेगा, तबतक नेहरू जिंदा रहेंगे

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नेहरू ने देश की प्रगति केे लिए कुछ ही मुद्दों को इर्द-गिर्द न घुमाकर एक आधुनिक देश की हर जरूरत पर विचार किया। (फोटो क्रेडिट: मिड-डे डॉट कॉम)

भारत के ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ कोई नई बात नहीं है, 19वीं शताब्दी में जब खुद को प्रगतिशील कहने वाले यूरोपीय देश उपनिवेशवाद के जरिए दूसरे देशों पर कब्जा करने के लिए जिन वजहों को गिना रहे थे, उनमें एक वजह सभी उपनिवेशों का अपने इतिहास के प्रति अज्ञात होना भी था। हालांकि एक तथ्य ये भी था कि भारत के मामले में ये बात झूठ थी। भारत में जितनी भी सभ्यताएं रहीं, जितने भी साम्राज्य रहे, उन सभी ने अपने अस्तित्व के कई प्रमाण छोड़े। अंग्रेजी हुकूमत ने भारत के इतिहास को कई तरह से तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया, जिससे उन्हें भारत पर अपनी हूकूमत बनाए रखने में खूब सहारा मिला।

यदि गौर किया जाए तो इतिहास के साथ खिलवाड़ आज भी ज्यों का त्यों है, फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय ये खिलवाड़ बाहरी हुकूमत कर रही थी औऱ अब सत्ता पाने के लिए खुद देश की राजनैतिक पार्टियां कर रही हैं। तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किए जा रहे इतिहास में सबसे ज्यादा नुकसान इतिहास के उस पल या उस पल से जुड़े व्यक्ति का नहीं होता है, बल्कि आने वाले भविष्य का होता है। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इतिहास के उन लोगों में से हैं जिनकी छवि को तरह-तरह से कलंकित किया जा रहा है, यहां इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है कि किसी से वैचारिक मतभेद होने से उसकी निंदा करना अलग बात है और किसी के विचारों को गलत तरीके से दूसरों के सामने परोसना अलग।

देश के पहले प्रधानमंत्री होने के नाते उन्होंने देश के लिए वो सब कुछ किया, जिसकी उनसे उम्मीद की गई थी, हालांकि कई मामलों में कई लोगों के साथ उनके मतभेद भी रहे, लेकिन शायद आधुनिक भारत के सपने को साकार करने के लिए दूसरों की बजाए उन्हें अपने फैसले उचित लगे। जो काफी हद तक उचित साबित भी हुए।

नेहरू ने भारत के लिए इतना कुछ किया है कि जब तक भारत का अस्तित्व रहेगा, तब तक नेहरू भी जिंदा रहेंगे। आजादी के बाद पश्चिमी देशों को लगा था कि भारत में कई और देशों की तरह तानाशाही जन्म लेगी लेकिन इसके विपरीत नेहरू के नेतृत्व में भारत ने लोकतंत्र का रास्ता चुना। लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता देश के लिए दो ऐसे वरदान हैं, जिनका नेहरू के बिना अस्तित्व शायद ही मुमकिन हो पाता।

आजादी के बाद लगभग 37 करोड़ की आबादी का जिम्मा, देश को प्रगति की राह पर ले जाना, रोजगार उत्पन्न करना, खाद्य आपूर्ति के सामान का उत्पादन और एक व्यवस्थित सेना के साथ-साथ उत्पादन करने के लिए मशीनों की जरूरत को पूरा करना, ये सब नेहरू और उनके मंत्री मंडल के सामने एक बड़ी चुनौती थी। नेहरू जिनके समाजवाद की ओर झुकाव का अंदाजा सभी को था उन्होंने देश के लिए पूंजीवाद औऱ समाजवाद के बीच का रास्ता अपनाया जो आज भी देश में बढ़ती आर्थिक असमानता में कारगर साबित हो सकता है। वहीं नेहरू में वो सब खूबियां थी जो भारत के पहले प्रधानमंत्री मे होनी चाहिए थी। कि उन्होंने देश की प्रगति केे लिए कुछ ही मुद्दों के इर्द-गिर्द न घुमाकर एक आधुनिक देश की हर जरूरत पर विचार किया। देश में वैज्ञानिक मनोवृत्तति को  बढ़ावा देने के लिए स्पेस रिसर्च प्रोग्राम, बाकी वैज्ञानिक खोजों के लिए Council for Science and Industrial Research (CSIR)  कई ऐसे क्षेत्र थे, जिनकी स्थापना में नेहरू ने बड़ी भूमिका निभाई।

परमाणु संबंधी रिसर्च में खुद पंडित नेहरू ने भौतिक वैज्ञानिक होमी भाभा से मिलकर कमिटी का गठन किया, हालांकि नेहरू परमाणु हथियारों के इस्तेमाल और उत्पादन को विश्व शांति के लिए खतरा मानते थे लेकिन भारत के परमाणु परिक्षण के जरिए उन्होंने इसके शांतिपूर्वक प्रयास पर बल दिया। देश में स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए पंडित नेहरू ने राउरकेला, दुर्गापुर और भिलाई स्टील प्लांट की नींव रखी। कई राजनैतिक पार्टियां उन पर सत्ता के लालच का आरोप लगाती हैं लेकिन ये आरोप तब धूमिल हो जाते हैं, जब आप उस समय के लोगों में नेहरू के प्रति दिवानगी को देखते हैं।

तीन मूर्ति में बने संग्रहालय में एक दस्तावेज बताता है कि चुनाव के दौरान दो अंधे लोगों ने ये मांग की थी की यदि बैलेट पेपर पर नेहरू का ही नाम लिखा होगा तो ही वो मतदान करेंगे।

वहीं जाने माने शायर साहिर लुधियानवी ने भी नेहरू की भारत पर छाप को लेकर कविता लिखी जो कुछ इस तरह है।

जिस्म की मौत, कोई मौत नहीं होती,
जिस्म मिट जाने से इंसान नहीं मिट जाते ।
धड़कने-रूकने से अरमान नहीं मर जाते ,
सांस थम जाने से ऐलान नहीं मर जाते ।
होंठ जम जाने से फरमान नहीं मर जाते,
जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती।

WeForNews Bureau

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