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योगी सरकार के नाक के नीचे नकल माफियाओं की पौ बारह!

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यूपी में दसवीं बोर्ड की परीक्षाएं चल रही हैं, वहीं नकल माफिया भी अपने नकल कराने के गोरखधंधे को धड़ल्ले से चला रहे हैं। परीक्षा में शामिल छात्र-छात्राओं को नकल करवाने में माफियाओं का कोई सानी नहीं है लेकिन सबसे बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश में अभी बहाल हुई नई-नवेली सरकार के लिए है, क्योंकि यूपी के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश को विकास के पथ पर ले जाने और कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने का जो दावा किया है, उस पर यह नकल का मालला मुंह चिढ़ाने को काफी है। नकल की तरह-तरह की तस्वीरें और वीडियो फुटेज मीडिया में एक के बाद एक सामने आ रहे हैं, जो हैरान करने वाले हैं।

नकल कराने का काम माफियाओं ने सोमवार को पहली पारी में गणित की परीक्षा से शुरु कर दी लेकिन मथुरा के राधा गोपाल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में मानो नकल करने और करवाने की होड़ लगी थी। आलम ये था कि नकल माफिया स्कूल की दीवार और खिड़कियों के जरिए पर्चे परीक्षा हॉल में पहुंचाते कैमरे में कैद हो गए।

वहीं बलिया में भी नकल कराने का काम जोरों पर दिखा, जिसकी तस्वीरें कैमरे में कैद हुई हैं। यहां भी 10वीं की गणित परीक्षा के दौरान नकल की तस्वीरें दिखी हैं। छात्र हो या फिर छात्राए दर्जनों की संख्या में एक साथ बैठकर कार्बन कॉपी से नकल करते दिखाई दे रहे हैं।

इन नकल माफियाओं ने नकल कराने का ताना बाना ऐसा बुन रखा है कि उनके सामने प्रशासन भी नतमस्तक है। सैकड़ों की तादात में माफिया के लोग नकल कराने के लिए काफी सक्रिय हैं। स्कूल की दीवारें हो या खिड़कियां माफियाओं ने अपने सुविधानुसार उसे भी तोड़ दिया है। कुछ स्थानों पर पुलिसकर्मियों के तैनात होने के बावजूद उसका कोई खास असर नहीं दिखाई दे रहा है।

चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रदेश में सक्रिय नक़ल-माफ़िया को बड़ा मुद्दा बनाया था। परीक्षाओं में होने वाली नक़ल को राजनीतिक मुद्दा बनाने की वजह बहुत वाज़िब थी। क्योंकि उत्तर प्रदेश में जारी नक़ल का गोरखधन्धा करोड़ों में जा पहुंचा है! खबर तो ये भी है कि नक़ल के ज़रिये परीक्षा पास कराने का ठेका प्रति छात्र 10 हज़ार से 1 लाख रुपये तक होता है। मनचाहे परीक्षा केन्द्र पर परीक्षा देने के लिए 50 हज़ार रुपये तक लगते हैं। परीक्षा केन्द्र बनवाने का रेट प्रति सौ छात्रों पर कम से कम एक लाख रुपये होता है।

परीक्षाओं में नक़लख़ोरी की समस्या और चुनौती सिर्फ़ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि इस राजरोग ने उत्तर भारत के तक़रीबन सभी हिन्दी भाषी राज्यों को अपने बाहुपाश में जकड़ रखा है। मज़े की बात ये है कि अभी ज़्यादातर हिन्दी भाषी राज्यों में बीजेपी की हुक़ूमत है।

इसीलिए यदि नये मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दशकों से जारी इस महामारी पर क़ाबू पा लेते हैं तो वो न सिर्फ़ उनके लिए निजी तौर पर बहुत बड़ी उपलब्धि होगी, बल्कि इससे बीजेपी की शान में भी बेहद इज़ाफ़ा होगा। साथ ही योगी अन्य बीजेपी शासित राज्यों के लिए भी शानदार नज़ीर पेश करेंगे लेकिन यदि नक़ल की रोकथाम के मोर्चे पर योगी फिस्सडी साबित हुए तो बीजेपी की साख पर ज़बरदस्त बट्टा भी लग सकता है।

wefornews bureau

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