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मधुबनी पेंटिंग और इतिहास का अनूठा मेल

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Madhubani Painting

नई दिल्ली, 19 अप्रैल | घनी चित्रकारी और उसमें इंद्रधुनषी रंगों को समेटे बिहार की मधुबनी पेंटिंग कला देश ही नहीं, विदेशों में भी लोकप्रिय है। नवोदित कलाकार नेहा दासगुप्ता ने इतिहास के प्रति अपने रुझान के चलते इस प्राचीन कला में ऐतिहासिक इमारतों के चित्रों का समावेश किया है

नेहा एक सामूहिक चित्र प्रदर्शनी ‘दिल्ली तेरे इश्क में’ में शामिल होने जा रही हैं, जिसका आयोजन 20 से 22 अप्रैल के बीच होगा।

मधुबनी पेंटिंग के प्रारंभिक स्वरूप पर गौर करें तो इस प्राचीन कला में ज्यादातर राम, जानकी, लक्ष्मण, राधा-कृष्ण व दुर्गा से जुड़े प्रसंगों को उकेरा जाता था, मगर समय के साथ इसमें नए-नए प्रयोग भी किए जाते रहे हैं। नेहा भी नया प्रयोग कर पेंटिंग की इस शैली को नए स्वरूप में पेश करने का प्रयास करती हैं।

नेहा दासगुप्ता की चित्र-कृतियां विशुद्ध रूप से मधुबनी पेंटिंग नहीं हैं, उससे केवल प्रेरित हैं, इसलिए उन्होंने अपनी प्रदर्शनी को नाम दिया है ‘ए टच ऑफ मधुबनी’।

अपनी पेंटिंग्स की खासियत बताते हुए नेहा कहती हैं, “मेरी पेंटिंग्स इसलिए अलग हैं, क्योंकि उनमें मधुबनी और इतिहास का अनूठा मेल है। अपनी प्रदर्शनी में मेरा उद्देश्य मधुबनी कला से प्रेरणा लेते हुए वैश्विक स्मारकों को चित्रित करना था। इसके जरिए मैंने इतिहास और यात्रा के प्रति अपने रुझान को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया है।”

उन्होंने कहा, “अपनी इन पेंटिंग्स के जरिए मैं अपनी यात्राओं को कागज पर उतारना चाहती थी। मैं जिस भी देश में गई, वहां के एक लोकप्रिय स्मारक को या उस स्थान से प्रेरित चित्र को चित्रित किया। इसलिए इस प्रदर्शनी में लगने वाली मेरे बनाए चित्रों में कोलकाता में बिताए मेरे समय और वहां की मछलियों की प्रतिछाया भी देखने को मिलेगी।”

इतिहास की छात्रा रहीं नेहा कहती हैं कि इस विषय में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन करने के कारण ऐतिहासिक इमारतों के प्रति उनका लगाव बेहद स्वाभाविक है। उन्होंने कहा, “मैं ऐतिहासिक इमारतों की याद को किसी भी माध्यम से सहेजना चाहती थी, इसलिए यह प्रयोग किया।”

विभिन्न चित्र-शैलियों के मेल को आप कितना सही मानती हैं? इस सवाल पर नेहा ने कहा, “मेरा ख्याल है कि किसी भी पारंपरिक कला को एक नया स्वरूप देना अच्छा है। इस कला की खूबसूरती और विरासत को ध्यान में रखते हुए मैंने ऐतिहासिक इमारतों के प्रति अपने रुझान को पेश करने का प्रयास किया है, जैसे कि मैंने इनमें पेरिस के आइफिल टॉवर, रोम के कोलोसम, आगरा के ताजमहल और दिल्ली के इंडिया गेट और कुतुब मीनार को चित्रित किया है।”

कला को समाज के आईने के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। क्या आपको लगता है कि इसे समाज में मौजूद समस्याओं को दर्शाने के लिए प्रभावशाली माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, यह पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “बेशक, कला को जागरूकता फैलाने और सच्चाई को सामने लाने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। चित्रकार हों या फोटोग्राफर, वे समाज के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं को उभारते हुए लम्हों को कैद कर सकते हैं।”

वह कहती हैं, “कला मात्र सुखद पहलू से बढ़कर है, इसके माध्यम से लोगों को बेहतर जिंदगी और बेहतर समाज के लिए कोशिश करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। कला समाज और उसमें हो रहे विकास को रचनात्मक स्वरूप में पेश करने का माध्यम है।”

कला के विभिन्न माध्यमों को एक ही आर्टवर्क में पेश करने के सवाल पर नेहा कहती हैं, “मुझे लगता है कि यह सही है, लेकिन साथ ही किसी भी कलाकार को किसी कला से प्रेरणा लेते हुए उसके मौलिक स्वरूप के इतिहास और विरासत का सम्मान करना चाहिए। बदलाव गलत नहीं है, यह केवल रचनात्मक रूप से नए प्रयोग करने के हमारे कौशल को दर्शाता है।”

–आईएएनएस

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ज़रा हटके

‘मुस्लिम लड़कियों की घर व स्कूल की शिक्षा में फर्क नहीं’

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Muslim Girl

करीब एक दशक पहले लतिका गुप्ता ने जब दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन आरंभ किया था तो वह यह जानने को लेकर उत्सुक थीं कि लड़कियों के जीवन पर धर्म और लैंगिक पहचान का परस्पर क्या प्रभाव पड़ता है। इस लगभग अनजान से पहलू की तलाश में वह जिस यात्रा पर निकलीं, उसका समापन एक एक पुस्तक के रूप में हुआ, जो हाल ही में प्रकाशित हुई है।

अंग्रेजी में लिखी गई पुस्तक ‘एजुकेशन, पॉवर्टी एंड जेंडर : स्कूलिंग मुस्लिम गर्ल्स इन इंडिया’ (शिक्षा, निर्धनता, लिंग : भारत में मुस्लिम बालिकाओं की स्कूली शिक्षा) में बच्चियों की शिक्षा पर धर्म और संस्कृति के प्रभावों को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है और इसके लिए ‘घर’ और ‘विद्यालय’ के बीच के पारस्परिक प्रभावों की पड़ताल की गई है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के केंद्रीय शिक्षा संस्थान में सहायक प्रोफेसर लतिका गुप्ता उस समय जिस पाठ्यक्रम में अध्यापन कर रही थीं, उसमें लड़कियों को अपने समाजीकरण पर विचार प्रस्तुत करने के मौके दिए जाते थे। उन्होंने पाया कि उनकी एक-दो छात्राओं को छोड़कर बाकी सब एक बात में समान थी कि वे सांस्कृतिक कसौटियों के पालन पर दृढ़ हैं लेकिन व्यक्तिगत विकास के प्रति उदासीन नजर आती हैं।

गुप्ता ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “मैं अक्सर हैरान रहती थी कि मेरी छात्राएं अपने घरों में धार्मिक कार्यक्रमों या घरेलू कामकाज में शामिल होने की वजहों से कक्षाएं छूटने से क्यों नहीं शर्मिदा महसूस करती हैं। ऐसी कौन-सी बात है जिनको लेकर उनमें अपने आपको विकसित करने की समझ पैदा नहीं हो पा रही है और वे पढ़ाई में अपनी ज्यादा-से ज्यादा ऊर्जा नहीं लगा पा रही हैं? यह मेरा व्यक्तिगत एजेंडा बन गया कि उन ताकतों का पता लगाऊं जो लड़कियों की जिंदगी और उनकी अपनी पहचान को आकार देतीं हैं।”

उनकी किताब में एक समुदाय की धार्मिक व सांस्कृतिक रूपरेखा और विद्यालय जीवन के पारस्परिक संबंध को तलाशने का प्रयास किया गया है। यह अध्ययन निम्न सामाजिक-आर्थिक हालात में में पल रहीं मुस्लिम बालिकाओं के शैक्षणिक अनुभव की जटिलता को समझने का साधन भी है। यह उस परिवेश में बारे में भी बताता है, जहां धर्म और लिंग के एक साथ मिलने से विशिष्ट सामाजिक व आर्थिक संदर्भ में एक सामाजिक ताकत का निर्माण होता है।

गुप्ता ने अल्पसंख्यकों के एक विद्यालय में पढ़ने वाली लड़कियों की पहचान का अध्ययन किया। इस विद्यालय का संचालन संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के तहत उल्लिखित प्रावधानों के तहत होता है, जिनमेंधार्मिक अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान चलाने की इजाजत दी गई है।

उन्होंने स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियों से उनके जीवन व उनकी आकांक्षाओं और उनकी पहचान के विभिन्न आयामों के बारे लिखवाकर उनके जीवन के अनुभवों का संकलन किया। इस प्रकार करीब एक साल तक लगातार उनके अनुभवों और उनके माता-पिता से बातचीत का उन्होंने संकलन करके उन सारे तथ्यों का गहन अध्ययन व विश्लेषण किया।

गुप्ता ने पाया कि विद्यालय की ओर से अपनी छात्राओं में वैसी क्षमता व योग्यता नहीं पैदा की जाती है जिससे वे अपने जीवन में आर्थिक व बौद्धिक संभावनाओं का उपयोग अपने के लिए कर पाएं। घर की जिंदगी और बाहर के जीवन में इनकी लैंगिक पहचान को लेकर किसी तरह का दखल स्कूल का नहीं होता।

गुप्ता की किताब दरियागंज के एक स्कूल में किए गए अध्ययन पर आधारित है। हालांकि निजता को बनाए रखने के मकसद से पूरी किताब में स्कूल का जिक्र महज मुस्लिम गर्ल्स स्कूल (एसएसजी) के रूप में हुआ है।

अध्ययन में मुस्लिम समुदाय की लड़कियों के लिए स्कूल और घर के बीच के मूल्यों और व्यवहारों में एक निरंतरता पाई गई। दरियागंज की मुस्लिम लड़कियों के लिए कोई वैकल्पिक आचरण का रूप उपलब्ध नहीं है। लड़कियां जो घर में सीखती हैं, वही स्कूल में सीखती हैं। टीचर और मां, दोनों से उन्हें समान शिक्षा मिलती है जबकि टीचर शिक्षित होती हैं और उन्हें पेशागत तालीम भी मिली होती है।

गुप्ता ने कहा कि एमजीएस की लड़कियों के जीवन में स्कूल की भूमिका लैंगिक सामाजीकरण के सुव्यवस्थित लक्षणों और महिला जीवन के पूर्व निर्धारित व स्पष्ट मकसदों के मध्य आती है। दोनों तरफ के दबाव के कारण लड़कियों को ज्ञान के विविध क्षेत्रों की जानकारी हासिल करने व उनमें शामिल होने की इजाजत देने के लिए स्कूल के पास बहुत कम संभावना बच जाती है। साथ ही अध्ययन में पाया गया कि अधिकांश मुस्लिम छात्राएं हिंदुओं के बारे में अच्छा और सहिष्णु नजरिया रखती हैं।

गुप्ता ने कहा कि अध्ययन में उन्होंने पाया कि लड़कियों का यह मानना है कि पत्नी के लिए जरूरी है कि वह सास-ससुर, पति व बच्चों की सेवा करे। वे पति से अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए सहज आर्थिक योगदान की अपेक्षा रखती हैं। किसी भी लड़की को यह नहीं लगता कि एक महिला के लिए अच्छी पत्नी होने के लिए परिवार को अपने दम पर आर्थिक सहयोग देना आवश्यक है।

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बैद्यनाथधाम : जहां लगती है दुर्लभ बेलपत्रों की प्रदर्शनी

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Baba-Baidyanath-Dham-Deoghar

देवघर, 31 जुलाई | महादेव के प्रिय महीने सावन में लाखों लोग प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में एक झारखंड के देवघर जिले के बाबा बैद्यनाथधाम मंदिर पहुंचकर कामना लिंग पर जलाभिषेक करते हैं। मान्यता है कि सावन में गंगाजल से बाबा का जलाभिषेक करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, लेकिन गंगाजल के साथ बेलपत्र भी भगवान शिव को अतिप्रिय है।

बेलपत्र के इसी महत्व के कारण बैद्यनाथधाम के पुरोहितों द्वारा दुर्लभ बेलपत्रों की प्रदर्शनी लगाई जाती है। ये पुरोहित दूर-दराज के जंगलों से दुर्लभ प्रजाति के बेलपत्र चुन कर लाते हैं और मंदिर परिसर में दुर्लभ बेलपत्रों की अनोखी प्रदर्शनी लगाई जाती है। इस प्रदर्शनी को देखने के लिए हजारों श्रद्धालु इकठ्ठे रहते हैं।

पुरोहितों व बांग्ला पंचांग के मुताबिक, सावन संक्रांति के बाद प्रत्येक सोमवार को यहां बेलपत्र की प्रदर्शनी लगाई जाती है। बेलपत्र प्रदर्शनी में पुरोहित समाज के ही लोग हिस्सा लेते हैं, जिनमें ‘जनरैल’, ‘बरनैल’, ‘बमबम बाबा’ ‘राजाराम समाज’, ‘शांति अखाड़ा’ सहित विभिन्न पुरोहित समाज के लोग शामिल होते हैं।

बैद्यनाथ धाम के मुख्य पुजारी दुर्लभ मिश्रा बताते हैं कि यह प्रदर्शनी बांग्ला पंचांग के मुताबिक, सावन माह में संक्रांति के बाद प्रत्येक सोमवार की शाम मंदिर परिसर में लगती है। दुर्लभ बेलपत्रों को इकट्ठा कर चांदी के थाल में चिपकाया जाता है और मंदिर में चढ़ाने के बाद इसे प्रदर्शनी में शामिल किया जाता है।

एक अन्य पुजारी श्रीनाथ पंडा का कहना है कि ऐसा नहीं कि किसी भी बेलपत्र को प्रदर्शनी में लाया जा सकता है। इस प्रदर्शनी में उन्हीं बेलपत्रों को शामिल किया जाता है, जिनकी खोज पुजारी समाज के लोग खुद जंगलों से करते हैं।

उन्होंने बताया कि स्थानीय त्रिकूट पर्वत पर आज भी ऐसे कई बेल के वृक्ष हैं जो दुर्लभ हैं। इन्हीं वृक्षों के बेलपत्रों को इकट्ठा किया जाता है। उन्होंने बताया कि प्रदर्शनी में शामिल बेलपत्रों में दुर्लभ बेलपत्रों की पहचान बुजुर्ग पुरोहित करते हैं।

अंतिम सोमवार को सबसे दुर्लभ तथा अद्भुत बेलपत्र लाने वाले पुजारी समाज को पुरस्कृत किया जाता है।

यह प्राचीन परंपरा और प्रदर्शनी श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बनी रहती है।

राजाराम विल्वपत्र समाज के अध्यक्ष प्रेमशंकर मिश्र बताते हैं कि इस दुर्लभ प्रदर्शनी किसी अन्य ज्योतिर्लिगों में देखने को नहीं मिलती है। उन्होंने कहा कि यह परंपरा काफी प्राचीन है। सावन महीने के अंतिम सोमवार को अत्यंत दुर्लभ बेलपत्र को इकठ्ठा करने वाले पुरोहित समाज को पुरस्कृत किया जाता है।

देवघर स्थित प्रसिद्ध तीर्थस्थल बैद्यनाथ धाम में भगवान शंकर के द्वादश ज्योतिर्लिगों में नौवां ज्योतिर्लिग है। यह ज्योतिर्लिग ऐसे तो सभी ज्योतिर्लिगों में सर्वाधिक महिमामंडित माना ही जाता है।

बैद्यनाथधाम में कांवड़ चढ़ाने का बहुत महत्व है। शिव भक्त सुल्तानगंज से उत्तर वाहिनी गंगा से जलभर कर 105 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर यहां पहुंचते हैं और भगवान का जलाभिषक करते हैं।

यहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु आते हैं, परंतु सावन महीने में यहां शिवभक्तों का हुजूम उमड़ पड़ता है। प्रतिदिन यहां करीब एक लाख भक्त यहां आकर ज्योतिर्लिग पर जलाभिषेक करते हैं। इनकी संख्या सोमवार के दिन और बढ़ जाती है।

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