Triple Talaq
ब्लॉग

तीन तलाक़ पर बीजेपी कहे चाहे जो लेकिन सुप्रीम कोर्ट से उसे मायूसी ही मिली

तीन तवाक़ पर दिये गये सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की सबसे अहम बात ये रही कि वो पर्सनल लॉ के सिद्धान्त को नहीं बदल सकता क्योंकि इसका ताल्लुक अलग-अलग धार्मिक समुदायों की मान्यताओं और पीढ़ियों से चले आ रहे रीति-रिवाज़ से है। यही तथ्य बीजेपी के लिए सबसे मायूसी भरा है।

तीन तलाक़ पर आये सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर बीजेपी चाहे जितनी खुशी जता रही हो, लेकिन सच्चाई तो ये है कि इससे उसका राजनीतिक मंसूबा पूरा नहीं हो सकता। दरअसल, तीन तलाक़ के माध्यम से बीजेपी जिस पर्सनल लॉ के सिद्धान्त को बदलना चाहती है वो इस फ़ैसले के बाद नामुमकिन हो गया है।

सुप्रीम कोर्ट का कहना कि वो पर्सनल लॉ के सिद्धान्त को नहीं बदल सकता क्योंकि इसका ताल्लुक अलग-अलग धार्मिक समुदायों की मान्यताओं और पीढ़ियों से चले आ रहे रीति-रिवाज़ से है। लेकिन यदि इन रीति-रिवाज़ों में बदलते दौर के साथ कोई ऐसी विकृति पैदा हो गयी जो तर्क-सम्मत या नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों के प्रतिकूल है तो उसे अवश्य बदला जाना चाहिए। मिसाल के तौर पर एक ही बार में तलाक़, तलाक़, तलाक़ कहकर निकाह को ख़त्म कर देना हर तरह से ग़ैरमुनासिब है। लेकिन उस पर्सनल लॉ को भी नहीं छेड़ा जा सकता जिसका ताल्लुक निकाह, उत्तराधिकार और सम्पत्ति के बँटवारे से जुड़ी व्यवस्थाओं से है। हिन्दुओं के अलावा ऐसी व्यवस्था इस्लाम, ईसाई, पारसी, यहूदी जैसे तमाम धार्मिक समुदायों के लिए मौजूद है।

बीजेपी जिस तरह से समान नागरिक संहिता यानी कॉमन सिविल कोड की वकालत करती रही है, उसमें हरेक धार्मिक समुदाय के लिए, हर तरह से एक ही जैसे क़ानून की कल्पना की गयी है। हालाँकि, भारतीय संविधान की भावना कतई ऐसी नहीं रही। हमारा संविधान हमें जिस तरह के मूल अधिकार देता है उसमें निजी मामलों में कोई दख़लअन्दाजी नहीं किये जाने का तथ्य सर्वोपरि है।

तीन तलाक पर दिये गये सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का दिलचस्प पहलू ये है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एक ही बार में तलाक़, तलाक़, तलाक़ कहने की प्रथा को ‘पाप’ करार दिया था। लेकिन उसकी ये भी दलील थी कि तलाक़ देने की जो प्रक्रिया शरीयत में दी गयी है, वही कायम रहनी चाहिए। यानी कोई ऐसा क़ानून नहीं होना चाहिए जो मुसलमानों से जुड़े निजी मामलों का निपटारा वैसे किये जाने के ख़िलाफ़ हो जैसा शरीयत में प्रावधान है। सच तो ये भी है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की इस दलील को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया कि अदालत या संसद, किसी को भी शरीयत क़ानूनों में फ़ेरबदल नहीं करना चाहिए क्योंकि ये हदीस (धार्मिक ग्रन्थ) की हिदायतों के मुताबिक है।

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में जो बात सबसे ज्यादा सकारात्मक है वो ये कि संविधान की नज़र में सभी नागरिक बराबर हैं, किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। यहाँ तक कि औरत और मर्द के अधिकारों में भी समानता होनी चाहिए। संविधान में इसे ही समानता का अधिकार कहा गया है। इस लिहाज़ से एक ही बार में तलाक़, तलाक़, तलाक़ बोलकर निकाह तोड़ने का जो अधिकार शौहर के पास था, वही अधिकार बीवी के पास नहीं था। इसके अलावा, तीन तलाक़ की विकृत प्रथा में बीवी के पास नैसर्गिक न्याय का अधिकार भी नहीं रहता था। यानी बीवी का पक्ष सुने अथवा जाने बगैर तलाक़ की एकतरफा कार्रवाई को न सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट ने ग़ैरमुनासिब पाया बल्कि खुद मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी इसकी मुख़ालफ़त की थी। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने से पहले मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपने समाज की इस कुरीति पर कारगर नकेल नहीं कस पाया था। उम्मीद की जा सकती है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से अब मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की उलझने भी कम होगी।

इस बीच, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर बेहद सधी हुई प्रतिक्रिया दी है। उसने कहा है कि बोर्ड की लीगल कमेटी फ़ैसले का गहरायी से अध्ययन करेगी। फिर लीगल कमेटी की रिपोर्ट पर 10 सितम्बर को भोपाल में होने वाली बोर्ड की बैठक में चर्चा की जाएगी। उस चर्चा के बाद सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर औपचारिक और विस्तृत प्रतिक्रिया दी जाएगी।

लेकिन दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने ऐसे ख़ुशियाँ जाहिर की मानो तीन तलाक के मुद्दे पर उन्होंने कोई सियासी जंग जीत ली हो। शाह तो यहाँ तक कह बैठे कि इस फ़ैसले से बीजेपी के ‘न्यू इंडिया’ के शिग़ूफ़े को बहुत लाभ होगा। जबकि सच तो ये है कि तीन तलाक़ का मुद्दा बीजेपी नहीं, बल्कि पीड़ित मुस्लिम महिलाएँ ही अदालत तक लेकर गयी थीं। बीजेपी का तो महज ये नज़रिया था कि वो तीन तलाक के ख़िलाफ़ है। लेकिन मज़े की बात ये भी रही कि अदालत में कोई भी ऐसा पक्षकार नहीं था जिसने एक ही बार में तलाक़, तलाक़, तलाक़ कहने की प्रथा को सही ठहराया हो।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में ये दलील दी थी कि जिस तरह से हिन्दुओं के लिए भगवान राम आस्था के प्रतीक हैं उसी तरह से मुस्लिम पर्सनल लॉ भी तरह-तरह की आस्थाओं और मान्यताओं पर आधारित है। लिहाज़ा, पर्सनल लॉ के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। सिब्बल की इस दलील को फ़ैसला देने वाली संविधान पीठ के सभी जजों ने स्वीकार किया। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को हिदायत दी कि वो संसद के माध्यम से क़ानून बनाकर तीन तलाक़ की कुरीति को दूर करे। इस संविधान पीठ की ये बहुत बड़ी खासियत थी कि इसमें मौजूद पाँचों जज अलग-अलग धार्मिक समुदायों से हैं। इसीलिए इस पीठ को धर्मनिरपेक्ष पीठ भी कहा गया।

कुलमिलाकर, बीजेपी के लिए सन्तोष की बात तब होती जब सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी तरह से ये कहा होता कि देश में पर्सनल लॉ का कोई वज़ूद नहीं हो सकता क्योंकि क़ानून और संविधान की नज़र में हरेक नागरिक एक समान है और सभी पर हर मामले में एक ही तरह के क़ानून लागू होंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा पर्सनल लॉ की अहमियत और ख़ासियत को बहाल रखा। क्योंकि इसका नाता संविधान में दिये गये ‘धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार’ से है। लेकिन वहीं दूसरी ओर तीन तलाक़ की आड़ में मुस्लिम महिलाओं के साथ जो ज़्यादती हो रही थी, उसे ख़त्म करने का रास्ता भी बना दिया गया। इस तरह से अपने बहुमत के फ़ैसले के बावजूद संविधान पीठ ने बेहद कुशलता से ‘साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’ का जुगत को क़ानूनी जामा पहना दिया। बीजेपी की मायूसी इसी लाठी के नहीं टूटने की है!

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Most Popular

To Top