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भारत के पहले रॉकेट मैन टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों पर दागे थे रॉकेट

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Illuminated Mysore Palace

बेंगलुरू, 3 नवंबर | मैसूर साम्राज्य के पूर्व शासक टीपू सुल्तान पहले भारतीय थे, जिन्होंने रॉकेट विकसित किया और 18वीं शताब्दी में अंग्रेजों के खिलाफ उसका इस्तेमाल किया। राज्य पुरातत्व विभाग के सहायक निदेशक आर.एस. नायका के अनुसार, टीपू ने गुप्त रूप से सैकड़ों युद्धक रॉकेट बनाए और उन्हें अपने राज्य की राजधानी मैसूर के पास श्रीरंगपट्टन में निर्मित एक शस्त्रागार में संग्रहीत करके रखा। यह स्थान बेंगलुरू से लगभग 120 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में मैसूर के पास स्थित है।

नायका ने बेंगलुरू के उत्तर-पश्चिम में लगभग 275 किलोमीटर दूर मलनाड से फोन पर आईएएनएस को बताया, “राज्य के शिवमोगा जिले में नागारा के पास बिदनूर किले में एक खाली पड़े कुएं में टीपू के एक हजार से अधिक जीर्ण-शीर्ण रॉकेट मिले।”

2002 में आसपास के क्षेत्रों में 160 अप्रयुक्त जंग लगे रॉकेटों के पाए जाने और 2007 में उनके टीपू युग के होने की पहचान होने के बाद विभाग इस बात को पता करने के लिए प्रेरित हुआ कि किले में कहीं इस तरह के और भी गोला-बारूद दफन न पड़े हों।

नायका ने कहा, “सूखे कुएं की खुदाई की गई। वहां से बंदूक के पाउडर से मिलती हुई बदबू आ रही थी, जिसके चलते रॉकेट की खोज हो सकी।”

रॉकेट पाउडर के साथ रॉकेटों का पता लगाया जा सके, इसके लिए पुरातत्वविदों, उत्खननकर्ताओं और मजदूरों की 15-सदस्यीय टीम ने जुलाई 2018 के मध्य में तीन दिनों का समय लिया।

शिवमोगा में विभाग के संग्रहालय में सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए रॉकेट रखे गए हैं।

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महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन का गुनहगार कौन?

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Maharashtra Crisis

महाराष्ट्र ने तो 24 अक्टूबर को खंडित जनादेश दिया नहीं, तो फिर उसे लोकप्रिय सरकार पाने के संवैधानिक हक़ से दूर रखने का गुनहगार कौन है? बीजेपी या शिवसेना या फिर दोनों! लेकिन संविधान के संरक्षकों ने क़सूरवार को सज़ा देने के बजाय बेक़सूर जनता पर ही एक और सितम का रास्ता चुना! संविधान की दुहाई देकर केन्द्र सरकार ने महाराष्ट्र को अपनी मुट्ठी में कर लिया। हालाँकि, सभी जानते हैं कि राष्ट्रपति शासन के विकल्प को हड़बड़ी और खिसियाहट में चुना गया है। इसीलिए बीजेपी के सिवाय सबकी ज़ुबाँ पर बस, एक ही सवाल है यदि नये दावेदारों को थोड़ा और वक़्त दे दिया जाता तो कौन सा आकाश टूट पड़ता?

यदि माननीय संविधान साहब, इंसानों की तरह भावनाएँ ज़ाहिर कर सकते, तो अभी दहाड़े मारकर रो रहे होते! स्पष्ट जनादेश के बावजूद महाराष्ट्र में सरकार नहीं बनने की वजह से बेचारे संविधान महोदय बीमार पड़ गये। तेज़ सियासी बुख़ार की तपिस के आगे घरेलू उपचार और फ़ैमिली डॉक्टरों के इलाज़ से कोई फ़ायदा नहीं हुआ। मर्ज़ बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की। सबसे बड़े डॉक्टर बीजेपी ने जब मरीज़ के आगे हाथ खड़े कर दिये तो रस्म-अदायगी के नाम पर गवर्नर साहब ने शिवसेना और एनसीपी जैसे अन्य राजवैद्यों को बुलाया। लेकिन इनकी दवाईयाँ असर दिखातीं, इससे पहले ही उनका सब्र टूट गया। आनन-फ़ानन में राष्ट्रपति शासन लग गया, जो एक नये संक्रमण की तरह है। अब सवाल ये है कि बीजेपी का सब्र क्यों जबाब दे गया?

आप चाहें तो बीजेपी से हमदर्दी जता सकते हैं! हालाँकि, शिवसेना ने जैसे अभी बीजेपी को गच्चा दिया है, बिल्कुल वैसा ही सलूक बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ़्ती के साथ किया था। जिस नापाक राह पर अभी शिवसेना चल रही है, उसी राह पर चलकर नीतीश कुमार ने बीजेपी से दोस्ती की थी। विधायकों की जिस ख़रीद-फ़रोख्त को अभी लोकतंत्र और संविधान के लिए पतित आचरण बताया जा रहा है, उसे ही थोड़े समय पहले कर्नाटक और गोवा में अपने शबाब पर देखा गया था। लिहाज़ा, संवैधानिक सुचिता और जनादेश से धोखाधड़ी की दुहाई या तो महज घड़ियाली आँसू हैं या फिर दिखाने के दाँत।

राजनीति आज मौकापरस्ती का दूसरा नाम है। सबको पहले किसी भी क़ीमत पर टिकट, फिर वोट और आख़िर में सत्ता चाहिए। अब ज़्यादातर नेताओं, सांसदों या विधायकों का कोई वैचारिक आधार नहीं है। विचारधारा और मूल्य-सिद्धान्त की बातें सिर्फ़ तभी होती हैं, तब माज़रा ‘अंगूर खट्टे हैं’ वाला हो। वर्ना, सबको सत्ता चाहिए। अब यही राजनीति है। एक पार्टी में ज़िन्दगी ग़ुजार देने वाले जब दलबदल करते हैं तो यदि उन्हें जनता का डर नहीं सताता तो 30 साल पुराने दोस्ती को तोड़ लेने वालों को भला क्यों डर लगेगा!

बीजेपी की दशा उस भूखे जैसी है, जिसके सामने से उसके 30 साल पुराने दोस्त शिवसेना ने ही थाली खींच ली। कोई नहीं जानता कि 50-50 फ़ॉर्मूले को लेकर कौन सच्चा है और कौन झूठा? वोट माँगने से पहले महाराष्ट्र की जनता को तो किसी ने बताया नहीं कि भीतरख़ाने क्या खिचड़ी पकी थी? अब आलम ये है कि शिवसेना अपना घर बदलकर भी सत्ता में तो रहेगी ही। एनसीपी और काँग्रेस की भी लाटरी लग गयी। जनादेश था कि विपक्ष में रहो। लेकिन वक़्त ने ऐसी करवट ली कि आज सत्ता दरवाज़े पर आ खड़ी हुई है। ये बिहार का उलट है। बिहार में बीजेपी को विपक्ष में बैठने का जनादेश मिला था। लेकिन वक़्त के करवट बदलने से वो सत्ता में है। किस्मत ने साथ दिया तो हरियाणा में विरोधी को पटाकर सत्ता बचा ली। महाराष्ट्र वाली कुंडली में अभी राजयोग नहीं है।

बीजेपी की खिसियाहट को समझना मुश्किल नहीं है। चाल-चरित्र-चेहरा तो बीते ज़माने की बातें थीं। आज आलम ये है कि शिवसेना ने उसके सामने से सजी हुई थाली खींच ली। उसका खिसियाना, छटपटाना और झुँझलाना स्वाभाविक है। ऐसी दशा में कोई और भला करेगा भी तो क्या? बेशक़, खिसियाएगा। दाँत पीसेगा। गुस्से से तमतमा उठेगा। आँखें लाल-पीली करेगा। प्रतिशोध की भावना से भर उठेगा। वश चले तो सामने से थाली खींचने वाले को कच्चा चबा जाए। ये तो मुमकिन था नहीं, लिहाज़ा आव देखा न ताव और लगा दिया राष्ट्रपति शासन। कोई चारा ही नहीं बचा था। विधानसभा भंग हो नहीं सकती। बहुमत के बावजूद फड़णवीस की कुर्सी बची नहीं। एनडीए से शिवसेना निकल गयी सो अलग। यानी, ‘चले थे हरि भजन को ओटन लगे कपास’ या ‘दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम’!

अब कुछ दिनों तक सुप्रीम कोर्ट में ज़ोर-आज़माइश होगी। फिर विधानसभा में ही शक्ति-परीक्षण का आदेश आएगा। इस दौरान शिवसेना, एनसीपी और काँग्रेस तीनों मिलकर न्यूनतम साझा कार्यक्रम यानी कॉमन मिनिमन प्रोग्राम बना लेंगे। तय होगा कि कितने-कितने वक़्त के लिए किसका-किसका नेता मुख्यमंत्री बनेगा, किसे कौन-कौन सा मंत्रालय मिलेगा और किसे विधानसभा अध्यक्ष का पद? सत्ता की मलाई के बन्दरबाँट का फ़ॉर्मूला तैयार होते ही, वही हस्तियाँ राष्ट्रपति शासन को हटाएँगी, जिन्होंने अभी इसे महाराष्ट्र पर थोपा है। बीजेपी ने यदि अपनी खिसियाहट और झुँझलाहट पर काबू पा लिया होता तो तमाम नौटंकीबाज़ी से बचा जा सकता था। उसके विवेक को तो अहंकार ने पहले ही खा लिया था।

बीजेपी के पास अब भी धोबी-पछाड़ वाला एक दाँव बचा हुआ है। वो चाहे तो शिवसेना को ऐसा लालच देकर उसकी प्रतिष्ठा को चोट पहुँचा सकती है कि ‘अरे भाई उद्धव-आदित्य, छोड़ो गिले-शिकवे। रूठना छोड़ो और आओ तुम्हीं मुख्यमंत्री बन जाओ। हम हों या तुम, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। हम दोस्ते थे और दोस्त ही रहेंगे। हमारे रिश्ते तो बाप-दादा के ज़माने के हैं। रोटी-बेटी के सम्बन्ध ऐसे थोड़े ही टूटा करते हैं। अरे, जहाँ चार बर्तन होते हैं वहाँ आपस में टकराते भी हैं। अब नाराज़गी छोड़ो और घरवापसी करो। आख़िर, जनादेश भी तो हमारी दोस्ती को ही मिला है।’

ये बातें काल्पनिक भले लगें लेकिन असम्भव नहीं हैं। राजनीति को यूँ ही ‘सम्भावनाओं का खेल’ नहीं कहा गया। खेल का एक हथकंडा ये हो सकता है कि भले ही शिवसेना-एनसीपी-काँग्रेस की तिकड़ी सरकार बना ले, लेकिन बीजेपी ख़ामोश नहीं बैठे। पूरी ताक़त ने इन पार्टियों को तोड़ने और इनके विधायकों को ख़रीदने की वैसी ही मुहिम छेड़ दे, जैसा उसने कर्नाटक, गोवा और उत्तर पूर्वी राज्यों में किया। अन्य राज्यों में भी विरोधी पार्टियों से आये तमाम नेताओं से बीजेपी अटी पड़ी है। इसीलिए, महाराष्ट्र में भी ग़ैर-बीजेपी सरकार उतने दिन ही चल पाएगी, जितने दिन बीजेपी उसे चलने देगी!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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महाराष्ट्र के राज्यपाल का दृष्टिकोण संवैधानिक : विशेषज्ञ

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Bhagat Singh Koshyari

नई दिल्ली, 12 नवंबर | महाराष्ट्र के राज्यपाल ने राज्य में सरकार गठन को लेकर खरीद-फरोख्त रोकने के लिए संवैधानिक रास्ता अख्तियार किया है। यह बात संविधान विशेषज्ञों ने कही।

राज्यपाल बी.एस. कोश्यारी ने शिवसेना को दो दिन का समय देने से इंकार कर दिया। सेना ने सरकार गठन के लिए समर्थन का पत्र सौंपने के लिए दो दिन का समय मांगा था।

शिवसेना के एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से मुलाकात की और सरकार गठन की इच्छा जाहिर की। हालांकि सेना आवश्यक समर्थन पत्र नहीं सौंप सकी और इसके बदले समय मांगा। राज्यपाल ने एक बयान के जरिए समय देने से इंकार कर दिया।

राज्यपाल ने उसके बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया है। इसके पहले राज्यपाल ने सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था। लेकिन भाजपा ने सरकार बनाने से इंकार कर दिया।

लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप ने आईएएनएस से कहा, “राज्यपाल संविधान का अनुसरण कर रहे हैं। पार्टियों को एक के बाद एक बुलाकर उन्होंने एक संवैधानिक रास्ता चुना है, जिसके जरिए खरीद-फरोख्त को रोका जा सकता है।”

संविधान के अनुसार, राज्य में सरकार बनाने के लिए समयसीमा के मामले में राज्यपाल का निर्णय अंतिम है, खासतौर से महाराष्ट्र में पैदा हुए एक राजनीतिक संकट के परिप्रेक्ष्य में।

कश्यप ने कहा कि यदि राज्यपाल को लगता है कि कोई भी दल सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है, तब वह राष्ट्रपति को इस बारे में सूचित कर सकते हैं। कश्यप ने कहा, “यदि वह चाहें तो राकांपा के बाद कांग्रेस को भी बुला सकते हैं। शिवसेना के मामले में संभवत: उन्हें नहीं लगा कि यह पार्टी सरकार बना पाने में सक्षम है।”

लोकसभा के पूर्व सचिव पी.डी.टी. आचारी ने कहा कि समयसीमा के मामले में कोई निर्णय लेने के लिए राज्यपाल के पास पूरा अधिकार है।

आचारी ने महाराष्ट्र में जारी राजनीतिक संकट पर कहा, “राज्यपाल की प्राथमिकता राज्य में सरकार बनाने की है। यदि उन्हें लगता है कि कोई संभावना है, तो वह निश्चित रूप से समयसीमा बढ़ा सकते हैं जिससे कोई पार्टी सरकार बना सके। लेकिन यदि उन्हें लगता है कि इसकी कोई संभावना नहीं है तो वह इस बारे में राष्ट्रपति को सूचित कर सकते हैं।”

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ओपिनियन

क्या शिवसेना कुर्सी के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद छोड़ देगी?

शिवसेना को अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपने दो परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों एनसीपी और कांग्रेस का समर्थन लेना पड़ेगा। ऐसे में यहां अब सवाल यह उठता है कि हिंदू हृदय सम्राट बाल ठाकरे की शिवसेना उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे की अनुवाई में सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़ देगी और सेकुलर शब्द को ‘छद्म’ कहने वाली शिवसेना सेकुलर रास्ता अख्तियार करेगी?

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uddhav thackeray Shiv Sena

मुंबई, 10 नवंबर | महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और शिवसेना के बीच 1980 के दशक के अंत से शुरू हुए रोमांस का शिवसेना की हठधर्मिता के चलते करीब-करीब अंत हो गया है। भाजपा ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को रविवार शाम बता दिया कि महागठबंधन के प्रमुख सहयोगी शिवसेना के गठबंधन धर्म निभाने से इनकार करने के कारण वह राज्य में सरकार बनाने की स्थिति में फिलहाल नहीं है। इसके साथ ही भाजपा नेताओं ने शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के संभावित गठबंधन को शुभकामनाएं दी।

भाजपा के सरकार बनाने से असमर्थता जताने के तुरंत बाद शिवसेना प्रवक्ता संजय राऊत ने कहा कि अगर उद्धव ठाकरे बोले हैं कि महाराष्ट्र का अगला मुख्यमंत्री शिवसेना का होगा तो मुख्यमंत्री शिवसेना का ही होगा। यानी भाजपा के सरकार बनाने से इनकार करने के बाद शिवसेना के लिए अपना मुख्यमंत्री बनाने का स्वर्णिम मौका है। लेकिन उसके पास केवल 56 विधायक हैं। यानी सरकार बनाने के लिए जरूरी 88 विधायक एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन के होंगे।

इसका मतलब शिवसेना को अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपने दो परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों एनसीपी और कांग्रेस का समर्थन लेना पड़ेगा। ऐसे में यहां अब सवाल यह उठता है कि हिंदू हृदय सम्राट बाल ठाकरे की शिवसेना उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे की अनुवाई में सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़ देगी और सेकुलर शब्द को ‘छद्म’ कहने वाली शिवसेना सेकुलर रास्ता अख्तियार करेगी? अगर शिवसेना सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़कर ‘सेकुलर शिवसेना’ में ट्रांसफॉर्म होगी तो यह महाराष्ट्र की राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव होगा।

राम जन्मभूमि आंदोलन शुरू होने के बाद शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने कट्टर हिदुत्व का रास्ता अपना लिया था। बाल ठाकरे तो यहां तक दावा करते रहे कि अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को शिवसेना कार्यकर्ताओं ने ही ढहाया। इसके बाद से ही शिवसेना देश में हिंदुत्व का प्रतिनिधि दल रहा है। हिंदुत्व के मुद्दे पर शिवसेना कई मामलों में भारतीय जनता पार्टी से भी ज्यादा आक्रामक रही है। इसीलिए हिंदू उनके नाम के आगे ‘हिंदू हृदय सम्राट’ का अलंकरण लगाने लगे।

ठाकरे के बाद शिवसेना की कमान संभालने वाले उद्धव भी कट्टर हिंदुत्व के रास्ते पर ही चलते रहे हैं। वह भाजपा पर राम मंदिर निर्माण की राह में आई बाधाओं को जानबूझकर दूर न करने का भी आरोप लगाते रहे हैं। इतना ही नहीं उद्धव ने अपने बेटे के साथ अयोध्या में राम मंदिर निर्माण पर जोर देने के लिए पिछले वर्ष अयोध्या का दौरा किया था। उनके उस दौरे को खूब हाइप भी मिला, क्योंकि ठाकरे परिवार का कोई सदस्य पहली बार महाराष्ट्र के बाहर निकला था।

यह संयोग ही है कि जब अयोध्या विवाद का सैद्धांतिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने हल कर दिया और रामलला के विवादित स्थल को हिंदुओं को राम मंदिर बनाने के लिए सौंप दिया, ठीक उसी समय शिवसेना उस मुकाम पर पहुंच गई जब उसे कट्टर हिंदुत्व या महाराष्ट्र में अपना मुख्यमंत्री दोनों में से एक का चयन करना है। एनसीपी-कांग्रेस के साथ सरकार बनाने पर निश्चित तौर पर शिवसेना को कट्टर हिंदुत्व का मार्ग छोड़ना पड़ेगा। शिवसेना को अब अपने उस नारे को भी छोड़ना पड़ेगा, जिसमें वह अयोध्या के बाद काशी और मथुरा की बात करती रही है।

अगर 2014 के महाराष्ट्र चुनाव प्रचार के दौरान उद्धव ठाकरे के भाषण को फिर से सुनें तो यह साफ हो जाएगा कि उनके मन में भाजपा और भाजपा नेताओं के खिलाफ बहुत अधिक विष भरा है, जिसे वह जब भी मौका मिलेगा, उगल देंगे। इसीलिए जब इस बार विधानसभा चुनाव में भाजपा पिछली बार की 23 की तुलना में 40 सीट पिछड़ गई तो उद्धव को 2014 के चुनाव और उसके बाद छोटे भाई का दर्जा स्वीकार करने के अपमान का बदला लेने का मौका मिल गया।

शिवसेना दरअसल, 2014 के बाद से ही मौका तलाश रही थी। चूंकि भाजपा बहुत मजबूत स्थिति में पहुंच गई थी, लिहाजा, वह वेट एंड वॉच के मोड में रही। मौके की तलाश में ही 2014 में छोटे भाई ‘भाजपा’ को 127 सीट से अधिक देने को तैयार न होने वाली शिवसेना 2019 में 144 के बजाय 124 सीट पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गई।

शिवसेना जानती थी कि भाजपा के साथ गठबंधन बनाकर लड़ने पर ही वह विधानसभा में सम्मानजनक सीटें हासिल कर सकती है। उसके सामने 2014 का उदाहरण था, जब चुनाव में पूरी ताकत लगाने के बावजूद शिवसेना 63 सीटों से आगे नहीं बढ़ पाई, जबकि भाजपा उसके लगभग दोगुना यानी 122 सीटें जीतने में सफल रही। शायद इसीलिए फिफ्टी-फिफ्टी फॉर्मूले की बात करने वाले उद्धव और संजय राऊत 124 सीटें मिलने पर चुप रहे।

दरअसल, शिवसेना नेता जानते थे कि कांग्रेस-एनसीपी का गठबंधन हो गया है, लिहाजा, उसके लिए भाजपा के साथ लड़ना लाभदायक होगा। अन्यथा वह बहुत ज्यादा घाटे में जा सकती है। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान, जब नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे नेता बोल रहे थे कि इस बार चुनाव देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में लड़ा जा रहा है और वही अगले पांच साल मुख्यमंत्री रहेंगे, तब भी पिता-पुत्र ने खामोश रहने में अपना हित समझा।

24 अक्टूबर का दिन उद्धव ठाकरे और संजय राऊत के लिए बदला लेने का दिन था। चुनाव परिणाम में भाजपा की 18 सीटें कम होने से दोनों नेता अचानक से फिफ्टी-फिफ्टी फॉर्मूले का राग आलापने लगे और ढाई-ढाई साल का मुख्यमंत्री और सरकार में बराबर मंत्रालय की मांग करने लगे। वह जानते थे कि भाजपा पिछली बार की तरह मजबूत पोजिशन में नहीं है, वह शिवसेना के समर्थन के बिना सरकार नहीं बना सकती। अचानक से शिवसेना की बारगेनिंग पावर बहुत बढ़ गई।

महाराष्ट्र में भगवा गठबंधन में ‘बड़ा भाई’ बनने की हसरत पाले उद्धव ठाकरे की नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थी। इसीलिए मुंबई की वरली सीट से आदित्य ठाकरे चुनाव मैदान में उतरे और विधायक चुने गए। उद्धव ठाकरे बार-बार हवाला दे रहे हैं कि उन्होंने अपने पिता और शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे को वचन दिया है कि महाराष्ट्र में एक न एक दिन शिवसैनिक को मुख्यमंत्री बनाकर ही रहेंगे।

दरअसल, 1988-89 में जब प्रमोद महाजन और बाल ठाकरे ने भाजपा और शिवसेना के बीच गठबंधन का फैसला किया, तब भाजपा का राज्य में कोई खास जनाधार नहीं था। उस समय शिवसेना बड़े भाई और भाजपा छोटे भाई के किरदार में थी। 1995 में जब भगवा गठबंधन की सरकार बनी तब शिवसेना के मनोहर जोशी मुख्यमंत्री और भाजपा के गोपीनाथ मुंडे उपमुख्यमंत्री बने थे। यह सिलसिला 2014 के लोकसभा चुनाव तक जारी रहा, लेकिन 2014 के विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा बड़े भाई के किरदार में आ गई। इस अदला-बदली को उद्धव मन से कभी स्वीकार नहीं कर सके। अब भाजपा से बदला लेने का मौका मिला तो अवसर क्यों चूकते।

यानी पहले मराठी मानुस, फिर कट्टर हिंदुत्व की राह पर चलने वाली शिवसेना अब एनसीपी और कांग्रेस के साथ धर्मनिरपेक्ष हो जाएगी!

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