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टाइम पत्रिका ने मोदी पर बहुत लिहाज किया : कमलनाथ

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भोपाल, 13 मई (आईएएनएस)| टाइम पत्रिका द्वारा अपने मुख पृष्ठ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘डिवाइडर इन चीफ’ करार दिए जाने को लेकर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने तंज कसा है और कहा है कि ‘टाइम’ पत्रिका ने जो टाइटल दिया है, वह बिल्कुल सही है, फिर भी पत्रिका ने उन पर बहुत लिहाज किया है।

मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सोमवार को आईएएनएस के साथ खास बातचीत में ‘टाइम’ पत्रिका में प्रधानमंत्री मोदी पर छापे गए आलेख को लेकर पूछे गए सवाल पर कहा, “उन्होंने (मोदी) किस चीज को डिवाइड नहीं किया। आरबीआई को डिवाइड किया, सीबीआई को डिवाइड किया, सीएजी को डिवाइड किया, न्याय पालिका को डिवाइड किया, चुनाव आयोग को डिवाइड किया। हर चीज को डिवाइड करो और झगड़ा कराओ।”

उन्होंने आगे कहा, “टाइम पत्रिका ने जो टाइटिल दिया, वह बिल्कुल सही है। मैं तो कहता हूं कि फिर भी बहुत लिहाज किया, उन्होंने बहुत मेहरबानी की है मोदी पर।”

देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख विरोधी दंगों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नाम लिए बगैर मुख्यमंत्री कमलनाथ पर हमला किया है। इसपर उन्होंने कहा, “बीते 34 सालों में किसी ने मेरे ऊपर आरोप नहीं लगाया। किसी ने एफआईआर दर्ज नहीं की। इन्होंने कितने जांच आयोग बनाए, उनमें से किसी आयोग ने मुझे दोषी नहीं ठहराया। अब प्रधानमंत्री यह आरोप लगा रहे। यह तो हद हो गई।”

बीते चार दशक से ज्यादा समय से राजनीति में सक्रिय कमलनाथ को प्रधानमंत्री की भाषा पर सख्त ऐतराज है। उन्होंने मोदी द्वारा विपक्षी दलों पर लगाए जा रहे आरोपों और उनके लिए उपयोग में लाई जा रही भाषा पर कहा, “देश तो छोड़िए विश्व में भी कभी ऐसा नहीं हुआ। इस तरह की भाषा का आज तक कहीं इस्तेमाल नहीं किया गया है। जिस स्तर पर वह (नरेंद्र मोदी) भाषा और प्रचार को लेकर आए हैं, विश्व में प्रजातंत्र में ऐसा कभी और कहीं नहीं हुआ।”

देश में आमचुनाव के छह चरण और राज्य में तीन चरण संपन्न हो चुके हैं। अब चुनाव पाकिस्तान, राजीव गांधी सहित अन्य निजी मुद्दों पर आ गया है। जब कमलनाथ से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, “यह बड़े दुख की बात है, क्योंकि चुनाव होना चाहिए विकास के मुद्दे पर। जो पार्टी सरकार चला रही थी, उसने जो वादे किए थे, उनका जवाब व हिसाब नहीं दे पा रही है। इसलिए कभी राजीव गांधी तो कभी देश की सुरक्षा, कभी राष्ट्रवाद को वे ले आएंगे। कभी राहुल गांधी को विदेशी बताने लगेंगे। यह ध्यान मोड़ने की कलाकारी की राजनीति है।”

कांग्रेस ने अपने घोषणा-पत्र में ‘न्याय’ योजना के तहत गरीब परिवारों को 72 हजार रुपये साल, छह हजार रुपये माह और पांच साल में तीन लाख 60 हजार रुपये देने का वादा किया है। इस बारे में कमलनाथ ने कहा, “न्याय योजना देश के लिए बहुत फायदेमंद साबित होगी। हर गरीब परिवार को आर्थिक लाभ होने से आर्थिक गतिविधि की नई शुरुआत होगी। इस योजना से यह नहीं है कि गरीब परिवारों को पैसा मिल जाएगा, वास्तव में अर्थव्यवस्था में यह एक इंजेक्शन होगा।”

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर कमलनाथ ने लगभग एक साल पहले जब जिम्मेदारी संभाली थी, तब राज्य में कांग्रेस पूरी तरह बिखरी हुई थी। पार्टी की पहचान गुट हुआ करते थे। पार्टी को आखिर एकजुट कैसे किया? मुख्यमंत्री ने कहा, “असल बात यह है कि मेरे राजनीतिक जीवन में मेरा अपना कोई गुट नहीं रहा, न कोई गुट बनाया, सब गुट मेरे हैं और मैं सब गुट का हूं। इसलिए कोई दिक्कत नहीं है।”

कमलनाथ के बारे में राज्य की सियासत में एक बात कही जाती है कि जब अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री बनाया जाना था, तब उन्होंने बड़ी मदद की थी और उसके बाद दिग्विजय सिंह को मुख्यमंत्री बनाने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। वर्तमान किसी भी गुट से नाता रखने वाला नेता खुलकर उनसे टकराने का साहस नहीं जुटा पाता। राज्य का हर बड़ा नेता किसी न किसी रूप में उनका कर्जदार है।

सत्ता संभालने के दिनों के हालात के बारे में कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ ने कहा, “लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने तक 75 दिन ही मिले। जब सत्ता मिली थी, तब किसान आत्महत्या, दुष्कर्म, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अपराध के मामले में राज्य देश में पहले पायदान पर था। ऐसा प्रदेश भाजपा ने हमें सौंपा था। इस स्थिति में सबसे पहले हमें किसानों का कर्ज माफ करना था। लगभग 50 लाख किसानों का कर्ज कैसे माफ किया जाए, किस तरह का सिस्टम बनाया जाए, इसकी कार्रवाई शुरू की। 21 लाख किसानों का कर्ज अबतक माफ हो चुका है।”

भाजपा और खासकर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा कर्जमाफी पर उठाए गए सवाल का कांग्रेस व राज्य सरकार की ओर से आक्रामक तरीके से जवाब दिया गया है। कभी सुरक्षात्मक तरीके से काम करने वाली कांग्रेस अचानक आक्रामक हो गई? प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, “झूठ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, भाजपा की जो झूठ की लहर है, झूठ की शक्ति है, वे झूठ बोलकर कुछ भी करते हैं। हम उसका डट कर विरोध करेंगे और आक्रामक रूप से विरोध करेंगे। झूठ की पोल खोलेंगे।”

पिछले दिनों मध्य प्रदेश में आयकर विभाग के छापों में कई स्थानों पर करोड़ों रुपये की संपत्ति का खुलासा हुआ था। जिन लोगों के यहां छापे पड़े थे, उन्हें प्रधानमंत्री मोदी से लेकर भाजपा तक ने कमलनाथ का करीबी बताया और उनपर हमले किए। छिंदवाड़ा से लोकसभा के लिए नौ बार निर्वाचित हो चुके कमलनाथ ने कहा, “वे बताएं कौन-से लोग मुझसे जुड़े थे, जिनके यहां ये पैसे और कागज मिले। मैं तो उन्हें जानता भी नहीं, उनकी शकल तक नहीं देखी। जिनके यहां ये सारी चीजें पकड़ी गई, उसने तो मीडिया में बयान भी दिया कि वे भाजपा के हैं।”

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क्या शिवसेना कुर्सी के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद छोड़ देगी?

शिवसेना को अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपने दो परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों एनसीपी और कांग्रेस का समर्थन लेना पड़ेगा। ऐसे में यहां अब सवाल यह उठता है कि हिंदू हृदय सम्राट बाल ठाकरे की शिवसेना उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे की अनुवाई में सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़ देगी और सेकुलर शब्द को ‘छद्म’ कहने वाली शिवसेना सेकुलर रास्ता अख्तियार करेगी?

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मुंबई, 10 नवंबर | महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और शिवसेना के बीच 1980 के दशक के अंत से शुरू हुए रोमांस का शिवसेना की हठधर्मिता के चलते करीब-करीब अंत हो गया है। भाजपा ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को रविवार शाम बता दिया कि महागठबंधन के प्रमुख सहयोगी शिवसेना के गठबंधन धर्म निभाने से इनकार करने के कारण वह राज्य में सरकार बनाने की स्थिति में फिलहाल नहीं है। इसके साथ ही भाजपा नेताओं ने शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के संभावित गठबंधन को शुभकामनाएं दी।

भाजपा के सरकार बनाने से असमर्थता जताने के तुरंत बाद शिवसेना प्रवक्ता संजय राऊत ने कहा कि अगर उद्धव ठाकरे बोले हैं कि महाराष्ट्र का अगला मुख्यमंत्री शिवसेना का होगा तो मुख्यमंत्री शिवसेना का ही होगा। यानी भाजपा के सरकार बनाने से इनकार करने के बाद शिवसेना के लिए अपना मुख्यमंत्री बनाने का स्वर्णिम मौका है। लेकिन उसके पास केवल 56 विधायक हैं। यानी सरकार बनाने के लिए जरूरी 88 विधायक एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन के होंगे।

इसका मतलब शिवसेना को अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपने दो परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों एनसीपी और कांग्रेस का समर्थन लेना पड़ेगा। ऐसे में यहां अब सवाल यह उठता है कि हिंदू हृदय सम्राट बाल ठाकरे की शिवसेना उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे की अनुवाई में सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़ देगी और सेकुलर शब्द को ‘छद्म’ कहने वाली शिवसेना सेकुलर रास्ता अख्तियार करेगी? अगर शिवसेना सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़कर ‘सेकुलर शिवसेना’ में ट्रांसफॉर्म होगी तो यह महाराष्ट्र की राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव होगा।

राम जन्मभूमि आंदोलन शुरू होने के बाद शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने कट्टर हिदुत्व का रास्ता अपना लिया था। बाल ठाकरे तो यहां तक दावा करते रहे कि अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को शिवसेना कार्यकर्ताओं ने ही ढहाया। इसके बाद से ही शिवसेना देश में हिंदुत्व का प्रतिनिधि दल रहा है। हिंदुत्व के मुद्दे पर शिवसेना कई मामलों में भारतीय जनता पार्टी से भी ज्यादा आक्रामक रही है। इसीलिए हिंदू उनके नाम के आगे ‘हिंदू हृदय सम्राट’ का अलंकरण लगाने लगे।

ठाकरे के बाद शिवसेना की कमान संभालने वाले उद्धव भी कट्टर हिंदुत्व के रास्ते पर ही चलते रहे हैं। वह भाजपा पर राम मंदिर निर्माण की राह में आई बाधाओं को जानबूझकर दूर न करने का भी आरोप लगाते रहे हैं। इतना ही नहीं उद्धव ने अपने बेटे के साथ अयोध्या में राम मंदिर निर्माण पर जोर देने के लिए पिछले वर्ष अयोध्या का दौरा किया था। उनके उस दौरे को खूब हाइप भी मिला, क्योंकि ठाकरे परिवार का कोई सदस्य पहली बार महाराष्ट्र के बाहर निकला था।

यह संयोग ही है कि जब अयोध्या विवाद का सैद्धांतिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने हल कर दिया और रामलला के विवादित स्थल को हिंदुओं को राम मंदिर बनाने के लिए सौंप दिया, ठीक उसी समय शिवसेना उस मुकाम पर पहुंच गई जब उसे कट्टर हिंदुत्व या महाराष्ट्र में अपना मुख्यमंत्री दोनों में से एक का चयन करना है। एनसीपी-कांग्रेस के साथ सरकार बनाने पर निश्चित तौर पर शिवसेना को कट्टर हिंदुत्व का मार्ग छोड़ना पड़ेगा। शिवसेना को अब अपने उस नारे को भी छोड़ना पड़ेगा, जिसमें वह अयोध्या के बाद काशी और मथुरा की बात करती रही है।

अगर 2014 के महाराष्ट्र चुनाव प्रचार के दौरान उद्धव ठाकरे के भाषण को फिर से सुनें तो यह साफ हो जाएगा कि उनके मन में भाजपा और भाजपा नेताओं के खिलाफ बहुत अधिक विष भरा है, जिसे वह जब भी मौका मिलेगा, उगल देंगे। इसीलिए जब इस बार विधानसभा चुनाव में भाजपा पिछली बार की 23 की तुलना में 40 सीट पिछड़ गई तो उद्धव को 2014 के चुनाव और उसके बाद छोटे भाई का दर्जा स्वीकार करने के अपमान का बदला लेने का मौका मिल गया।

शिवसेना दरअसल, 2014 के बाद से ही मौका तलाश रही थी। चूंकि भाजपा बहुत मजबूत स्थिति में पहुंच गई थी, लिहाजा, वह वेट एंड वॉच के मोड में रही। मौके की तलाश में ही 2014 में छोटे भाई ‘भाजपा’ को 127 सीट से अधिक देने को तैयार न होने वाली शिवसेना 2019 में 144 के बजाय 124 सीट पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गई।

शिवसेना जानती थी कि भाजपा के साथ गठबंधन बनाकर लड़ने पर ही वह विधानसभा में सम्मानजनक सीटें हासिल कर सकती है। उसके सामने 2014 का उदाहरण था, जब चुनाव में पूरी ताकत लगाने के बावजूद शिवसेना 63 सीटों से आगे नहीं बढ़ पाई, जबकि भाजपा उसके लगभग दोगुना यानी 122 सीटें जीतने में सफल रही। शायद इसीलिए फिफ्टी-फिफ्टी फॉर्मूले की बात करने वाले उद्धव और संजय राऊत 124 सीटें मिलने पर चुप रहे।

दरअसल, शिवसेना नेता जानते थे कि कांग्रेस-एनसीपी का गठबंधन हो गया है, लिहाजा, उसके लिए भाजपा के साथ लड़ना लाभदायक होगा। अन्यथा वह बहुत ज्यादा घाटे में जा सकती है। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान, जब नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे नेता बोल रहे थे कि इस बार चुनाव देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में लड़ा जा रहा है और वही अगले पांच साल मुख्यमंत्री रहेंगे, तब भी पिता-पुत्र ने खामोश रहने में अपना हित समझा।

24 अक्टूबर का दिन उद्धव ठाकरे और संजय राऊत के लिए बदला लेने का दिन था। चुनाव परिणाम में भाजपा की 18 सीटें कम होने से दोनों नेता अचानक से फिफ्टी-फिफ्टी फॉर्मूले का राग आलापने लगे और ढाई-ढाई साल का मुख्यमंत्री और सरकार में बराबर मंत्रालय की मांग करने लगे। वह जानते थे कि भाजपा पिछली बार की तरह मजबूत पोजिशन में नहीं है, वह शिवसेना के समर्थन के बिना सरकार नहीं बना सकती। अचानक से शिवसेना की बारगेनिंग पावर बहुत बढ़ गई।

महाराष्ट्र में भगवा गठबंधन में ‘बड़ा भाई’ बनने की हसरत पाले उद्धव ठाकरे की नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थी। इसीलिए मुंबई की वरली सीट से आदित्य ठाकरे चुनाव मैदान में उतरे और विधायक चुने गए। उद्धव ठाकरे बार-बार हवाला दे रहे हैं कि उन्होंने अपने पिता और शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे को वचन दिया है कि महाराष्ट्र में एक न एक दिन शिवसैनिक को मुख्यमंत्री बनाकर ही रहेंगे।

दरअसल, 1988-89 में जब प्रमोद महाजन और बाल ठाकरे ने भाजपा और शिवसेना के बीच गठबंधन का फैसला किया, तब भाजपा का राज्य में कोई खास जनाधार नहीं था। उस समय शिवसेना बड़े भाई और भाजपा छोटे भाई के किरदार में थी। 1995 में जब भगवा गठबंधन की सरकार बनी तब शिवसेना के मनोहर जोशी मुख्यमंत्री और भाजपा के गोपीनाथ मुंडे उपमुख्यमंत्री बने थे। यह सिलसिला 2014 के लोकसभा चुनाव तक जारी रहा, लेकिन 2014 के विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा बड़े भाई के किरदार में आ गई। इस अदला-बदली को उद्धव मन से कभी स्वीकार नहीं कर सके। अब भाजपा से बदला लेने का मौका मिला तो अवसर क्यों चूकते।

यानी पहले मराठी मानुस, फिर कट्टर हिंदुत्व की राह पर चलने वाली शिवसेना अब एनसीपी और कांग्रेस के साथ धर्मनिरपेक्ष हो जाएगी!

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ओपिनियन

मेरठ में ‘ध्रुवीकरण’ पर टिकी है सियासी दलों की आस

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मेरठ, 5 अप्रैल | क्रांतिधरा कही जाने वाली मेरठ की धरती पर इस बार का लोकसभा चुनाव का मुकबला बहुत दिलचस्प रहने वाला है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को जीत की हैट्रिक बचाए रखने की चुनौती है तो सपा-बसपा गठबंधन को भी अपनी साख बचानी है। इसलिए पार्टियों ने जातिगत हिसाब से छांटकर प्रत्याशी उतारे हैं।

भाजपा ने अपने पुराने उम्मीदवार पर दांव खेला है। कांग्रेस ने भी अग्रवाल समाज के व्यक्ति पर भरोसा जताया है, लेकिन असली मुद्दे गायब हैं और पार्टियां ध्रुवीकरण के प्रयास में जुटी हैं।

भाजपा ने सांसद राजेंद्र अग्रवाल को प्रत्याशी बनाया गया है, जबकि सपा-बसपा गठबंधन के उम्मीदवार हाजी याकूब कुरैशी हैं। कांग्रेस ने बाबू बनारसी दास के बेटे हरेंद्र अग्रवाल, शिवपाल की पार्टी प्रसपा ने नासिर अली और शिवसेना ने आर.पी. अग्रवाल पर भरोसा जताया है।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अवनीश त्यागी के मुताबिक, इस बार सभी राजनीतिक दल ध्रुवीकरण के प्रयास में हैं। पिछली बार के सांसद से स्थानीय लोग नाराज जरूर हैं, लेकिन एक धड़ा मोदी के नाम पर वोट करने को तैयार है। चुनाव इस बार यहां मोदी विरोध और मोदी के समर्थन पर है।

उन्होंने कहा कि राजेंद्र अग्रवाल वैश्य, ब्राह्मण, त्यागी ठाकुर, गुर्जर, अतिपिछड़ों आदि के सहारे चुनावी मैदान में हैं, तो हाजी याकूब कुरैशी मुस्लिम तथा अनुसूचित जाति के साहरे मैदान मारने की फिराक में हैं। उधर, हरेंद्र अग्रवाल की भी वैश्य, अति पिछड़ों, मुस्लिमों आदि पर नजर है। सभी जातियों पर प्रत्याशियों के अपने-अपने दावे हैं।

उन्होंने बताया कि गन्ना बकाया विषय पर सिर्फ बयानबाजी हो रही है। आवारा पशुओं की समस्या के बजाय यहां पशु चोरी की समस्या हैं। हलांकि योगी सरकार आने के बाद इसमें कुछ कमी आई है, फिर भी किसानों को अपने पशुओं को बचाने के लिए चौकन्ना रहना पड़ता है। महिला छेड़छाड़ का बड़ा मुद्दा है, जिसमें कुछ प्रतिशत की कमी आई है, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

त्यागी और गुर्जर बिरादरी पूरी तरह से मोदी के नाम पर एकजुट है तो मुस्लिम और दलित वर्ग गठबंधन के साथ है और उन्हें यह दर्शाने में भी कोई संकोच नहीं।

मेरठ में कुल पांच विधानसभा क्षेत्र हैं। मेरठ शहर सपा के पास है। इसके अलावा बाकी चारो विधानसभाओं में भाजपा के विधायक हैं।

2014 में सभी पांच विधानसभाओं से भाजपा के राजेंद्र अग्रवाल को लगभग एक लाख वोट मिला था, जिसमें मुस्लिम को छोड़कर सारी जातियों ने इन पर भरोसा किया था। दलित वर्ग में जाटव को छोड़कर बाकी अन्य लोगों ने भी इन्हें वोट दिया था। इस बार यह थोड़ा कठिन है। मेरठ की कैंट विधानसभा में तो भाजपा को अच्छे मर्जिन से वोट मिलता आ रहा है। अन्य विधानसभा क्षेत्रों का रुख इस बार कुछ अलग है।

मेरठ कैंट के सामाजिक कार्यकर्ता रामकुमार ने बताया कि इस बार यहां हाईकोर्ट बेंच, स्मार्ट सिटी, जाम, कूड़ा प्रबंधन, कानून-व्यवस्था, अपराध नियंत्रण, गन्ना बकाया भुगतान जैसे अहम मुद्दे चुनावी हैं।

किठौर गांव के किसान धनीराम की मानें तो डेढ़ गुना लागत बढ़ाने की सिर्फ बातें हो रही हैं। अभी तक इसमें कुछ हासिल नहीं हुआ है। असौड़ा के मोहम्मद हनीफ कहते हैं कि पिछले चुनाव को ध्रुवीकरण की चटनी चटाई गई थी। लेकिन इस बार खेल कुछ अलग ही रहने वाला है। रमेश जाटव कहते हैं कि किसी के लिए यहां राह आसान नहीं है।

मुंडाली के सलीम कहते हैं कि चुनाव इस बात पर टिका है कि दलित और मुस्लिम समाज में कितना गठजोड़ होता है, लेकिन बेवजह का तीन तलाक मुद्दा छेड़ दिया गया है।

अमिता शर्मा कहती हैं कि कानून व्यवस्था हर चुनाव में मुद्दा रहता है, जो सीधा महिलाओं से जुड़ा है। इसमें ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है।

मेरठ के मोहम्मद अतहर कहते हैं की भाजपा हर बार की तरह यहां पर सम्प्रदायिकता का जहर घोल रही है। लेकिन इस बार उसका ध्रुवीकरण का कार्ड चलने वाला नहीं है।

भाजपा की ओर लोकसभा क्षेत्र में केंद्र और प्रदेश सरकार द्वारा हजारों करोड़ रुपये के विकास कार्य कराने का दावा किया जा रहा है। दिल्ली- मेरठ एक्सप्रेस-वे, दिल्ली से हापुड़, मेरठ से बुलंदशहर तक का राष्ट्रीय राजमार्ग, हाईस्पीड ट्रेन शुरुआत कराना, क्षेत्रीय हवाई सेवा, अकाशवाणी केंद्र निर्माण जैसे कई कार्य भाजपा सरकार में हुए हैं। पात्रों को सरकार की योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ दिलाया गया।

सांसद जिला कार्यालय पर लोगों की समस्याएं सुन रहे थे। उन्होंने कहा कि दिल्ली- मेरठ एक्सप्रेस-वे, दिल्ली से हापुड़, मेरठ से बुलंदशहर तक का राष्ट्रीय राजमार्ग क्षेत्र के लिए वरदान साबित होगा। उन्होंने कहा कि जनता की समस्याओं का गंभीरतापूर्वक समाधान किया जाएगा।

मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट पर 2़ 25 लाख वैश्य वोटर हैं। ठाकुर 60 हजार, ब्राह्मण डेढ़ लाख, जाट एक लाख, गुर्जर 90 हजार, मुस्लिम साढ़े पांच लाख, दलित तीन लाख, पंजाबी 50 हजार, पिछड़े व अन्य करीब चार लाख वोटर हैं।

यहां पर कुल मतदाताओं की संख्या 18 लाख 94 हजार 144 है। पुरुषों की संख्या 10 लाख 21 हजार 485 हैं। महिला मतदाता 8 लाख 50 हजार 525 हैं।

By : विवेक त्रिपाठी

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लोग सरकार के काम से संतुष्ट नहीं : सर्वेक्षण

“इससे स्पष्ट संकेत मिल रहा है कि मतदाता सरकार के कामकाज से संतुष्ट नहीं हैं। सरकार को प्राथमिकताएं तय करनी होंगी और इन क्षेत्रों में अधिक निवेश करना होगा।”

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नई दिल्ली, 25 मार्च | चुनावों पर नजर रखने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के एक सर्वेक्षण का नतीजा बता रहा है कि लोग सरकार के कामकाज से संतुष्ट नहीं हैं। इसके मुताबिक, भारतीय मतदाताओं के लिए ‘रोजगार का अच्छा अवसर’ शीर्ष प्राथमिकता है। सर्वेक्षण के नतीजे सोमवार को जारी किए गए। इसमें बताया गया है कि मतदाताओं की 10 प्राथमिकताओं के आधार पर सरकार के कामकाज का स्कोर औसत से भी कम आया है।

मतदाताओं की प्राथमिकता के दो अन्य मुद्दों ‘बेहतर स्वास्थ्य सेवा’ और ‘पेयजल’ के मामले में भी प्रदर्शन औसत से कम रहा है।

सर्वेक्षण के नतीजे में कहा गया है, “इससे स्पष्ट संकेत मिल रहा है कि मतदाता सरकार के कामकाज से संतुष्ट नहीं हैं। सरकार को प्राथमिकताएं तय करनी होंगी और इन क्षेत्रों में अधिक निवेश करना होगा।”

सर्वे के मुताबिक, मतदाताओं की शीर्ष प्राथमिकता बेहतर रोजगार अवसर को लेकर रही और इस क्षेत्र में सरकार का प्रदर्शन बदतर में से एक माना गया। पांच के स्केल पर कुल 2.15 की रेटिंग इसे मिली।

एडीआर ने यह सर्वेक्षण अक्टूबर 2018 से दिसंबर 2018 के बीच 534 लोकसभा क्षेत्रों में 2,73,487 मतदाताओं के बीच किया।

इसमें कहा गया है, “मतदाताओं की शीर्ष 10 प्राथमिकता को देखने से साफ है कि भारतीय मतदाता आतंकवाद एवं मजबूत सुरक्षा व सैन्य शक्ति जैसे शासन के मुद्दों की तुलना में रोजगार और स्वास्थ सेवा, पेयजल, बेहतर सड़कों जैसी मूलभूत सुविधाओं को अधिक महत्व देते हैं।”

एडीआर ने कहा कि यह गंभीर चिंता की बात है कि मतदाताओं की 31 प्राथमिकताओं में से किसी के भी मामले में सरकार का प्रदर्शन औसत या औसत से ऊपर नहीं रहा।

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