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कांग्रेस के लिए वापसी का सही समय : शीला

मोदी और भाजपा की विश्वसनीयता प्रभावित हुई है। वह निचले स्तर पर है। भाजपा ने अपने चुनावी वादे पूरे नहीं किए। केवल विदेश यात्राओं (प्रधानमंत्री द्वारा की गईं) से नौकरी नहीं आती, विकास नहीं आता।

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दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित सक्रिय राजनीति में लौट सकती हैं, बशर्ते उनकी पार्टी उनसे ऐसा करने के लिए कहे। शीला मानती हैं कि यह कांग्रेस के लिए वापसी का सही समय है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अबतक सिर्फ बातें की है, और काम कुछ नहीं किया है, जिसके कारण उनकी विश्वसनीयता निचले स्तर पर पहुंच गई है।

लेकिन 80 वर्षीय कांग्रेसी नेत्री को भरोसा नहीं हैं कि उनकी पार्टी मोदी लहर पर सवार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को 2019 के आम चुनाव में पटखनी दे सकती है।

शीला ने आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की संभावनाओं पर किए एक सवाल के जवाब में आईएएनएस को बताया, “आपको इस सवाल का जवाब देने का मेरे पास आत्मविश्वास नहीं है। कांग्रेस इससे भलीभांति परिचित है, कांग्रेस नेता (अध्यक्ष राहुल गांधी) भी इससे परिचित हैं। जितना संभव हो सकता है और उनसे जितना हो सकता है, राहुल उससे ज्यादा कर रहे हैं।”

उन्होंने कहा कि हालांकि अगर कांग्रेस वास्तविक मुद्दों पर बात करती है और भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे के झांसे में नहीं आती है तो वह वापसी कर सकती है।

उन्होंने कहा, “हमें उन मुद्दों और लोगों की उम्मीदों के बारे में बात करनी चाहिए, जिसे मोदी सरकार पूरी करने में नाकाम रही है। लोग बढ़ती कीमतों से पीड़ित हैं। लोगों के लिए पेट्रोल खरीदना मुश्किल हो रहा है..कोई नौकरी नहीं है..भारत का विकास घट रहा है। इन मुद्दों के जरिए हमें सरकार को घेरना चाहिए।”

उन्होंने कहा, “हमें भाजपा के वादों को बारीकी से छानबीन करनी चाहिए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछा जाना चाहिए कि क्यों वह अपने वादों को पूरा करने में असफल हुए।”

उन्होंने कहा कि भाजपा अब अपने हिंदुत्व दर्शन को भारत के मतदाताओं को ज्यादा समय तक नहीं बेच सकती, क्योंकि अबतक उन्हें यह समझ आ गया होगा कि मोदी केवल बातें करते हैं, काम नहीं।

तीन बार लगातार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं शीला कहती हैं, “मोदी और भाजपा की विश्वसनीयता प्रभावित हुई है। वह निचले स्तर पर है। भाजपा ने अपने चुनावी वादे पूरे नहीं किए। केवल विदेश यात्राओं (प्रधानमंत्री द्वारा की गईं) से नौकरी नहीं आती, विकास नहीं आता। देश में प्रगति नहीं हुई है। वास्तव में देश का विकास उल्टी दिशा में जा रहा है। हमें इसे रोकना होगा।”

शीला ने पिछले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद से अपना नामांकन वापस ले लिया था। यह पूछने पर कि क्या वह सक्रिय राजनीति में लौटने के लिए तैयार हैं? उन्होंने कहा, “मैं तैयार हूं, लेकिन मैं कोई भूमिका नहीं मांग रही हूं। मैं मांगने के शब्द पर जोर देते हुए कह रही हूं कि अगर पार्टी मुझसे ऐसा कहती है तो मैं किसी भी भूमिका को स्वीकारने के लिए तैयार हूं।”

उन्होंने कहा कि उनकी इच्छा के खिलाफ समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ कांग्रेस द्वारा गठबंधन करने के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से अपना नाम वापस ले लिया था।

उन्होंने कहा, “वह बेमेल था। हम एक नारे ’27 साल यूपी बेहाल’ के साथ चुनाव में उतर रहे थे। यह उन 27 सालों के संदर्भ में था, जब राज्य समाजवादी पार्टी सहित गैर-कांग्रेसी सरकारों के हाथों में रहा। लेकिन गठबंधन के कारण यह नारा बेमानी हो गया, इसलिए मैंने स्वेच्छा से घोषणा की थी कि मैं अपना नाम वापस ले रही हूं।”

दिल्ली की राजनीति पर उन्होंने कहा कि उन्हें वापस लौटने से गुरेज नहीं है, क्योंकि यहां भी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल चुनाव पूर्व किए अपने वादों को पूरा करने में नाकाम रहे हैं।

वह इस बात पर अफसोस जताती हैं कि हमने यह समझा था कि केजरीवाल चुनाव लड़ने के लिए ऐसे वादे नहीं करेंगे, जिन्हें वह पूरा नहीं कर सकते हैं।

उन्होंने कहा, “केजरीवाल ने वे वादे किए, जिन्हें वह पूरा नहीं कर सकते थे। क्योंकि दिल्ली की निर्वाचित सरकार के पास सीमित शक्तियां होती हैं। उन्होंने यह वास्तविकता को समझे बगैर वादे किए और आज आप देख रहे हैं कि लोगों को यह महसूस होने लगा है। मैं इसे लेकर सुनिश्चित नहीं हूं कि जमीनी स्तर पर लोगों को यह समझ आ गया है, लेकिन मुझे पता है कि केजरीवाल अपने वादों के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर पाएंगे।”

शीला दीक्षित ने अपने जीवन का सबसे अधिक समय दिल्ली में बिताया और वह 15 साल के अपने शासन को राजधानी को बदलने का श्रेय देती है। शीला कहती हैं कि उन्हें वास्तव में दुख होता है, जब दिल्ली को महिलाओं के लिए असुरक्षित शहर और अपराध की राजधानी कहा जाता है।

शीला ने 175 पन्नों की अपनी आत्मकथा ‘सिटिजन दिल्ली : माइ टाइम्स, माइ लाइफ’ में बेपरवाह होकर शहर में साइकिल से घूमने के अपने बचपन के दिनों का जिक्र किया है।

शीला उन दिनों के वापस लौटने की उम्मीद करती हैं, जब दिल्ली के बच्चे बेपरवाह और सुरक्षित थे। उन्होंने कहा, “उस समय मेरे माता-पिता को कभी नहीं लगता था कि अगर बच्चे घर के बाहर रहेंगे तो उनके साथ कुछ गलत हो जाएगा।”

शीला के अनुसार, “कम से कम हमारे परिवार और हमारी मंडली में दुष्कर्म पर कभी बात नहीं हुई थी। हमें नहीं पता था कि यह क्या है। दरअसल मुझे मेरी शादी के कई सालों तक नहीं पता था कि यह क्या है मुझे पता चला जब मैंने इसके बारे में पढ़ा था। वह मासूमियत की उम्र थी..वह मासूमियत से भरा समय था।”

–आईएएनएस

ब्लॉग

मुकेश अंबानी ने ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ अभियान का आह्वान किया

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mukesh ambani

गांधीनगर, 18 जनवरी | औपनिवेशीकरण के खिलाफ महात्मा गांधी के अभियान को याद करते हुए रिलायंस इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक मुकेश अंबानी ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करने की गुजारिश की और कहा कि भारतीय डेटा भारतीयों के ‘स्वामित्व और नियंत्रण’ में होने चाहिए। उन्होंने यहां वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट 2019 में कहा, “हम अपने राष्ट्रपिता को उनकी 150वीं जयंती के वर्ष में श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। गांधी जी ने राजनीतिक औपनिवेशीकरण के खिलाफ आन्दोलन चलाया था.. आज हम सब मिलकर डेटा औपनिवेशीकरण के खिलाफ नया अभियान शुरू कर रहे हैं।” इस समिट का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था।

अंबानी ने कहा कि डेटा नई दुनिया में ‘नया तेल और धन’ है। उन्होंने कहा कि भारत के डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण भारतीय लोगों के हाथ में ही होना चाहिए और कॉर्पोरेट्स द्वारा नहीं किया जाना चाहिए, खासतौर से वैश्विक कॉर्पोरेशंस द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “माननीय प्रधानमंत्री, मैं आश्वस्त हूं कि आप अपने डिजिटल इंडिया मिशन के प्रमुख लक्ष्यों में इसे भी शामिल करेंगे।”

उन्होंने कहा, “भारत को इस डेटा संचालित क्रांति में सफल होने के लिए, हमें भारतीय डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण वापस भारत भेजना होगा.. दूसरे शब्दों में भारतीय संपत्ति वापस लौटानी होगी। भारतीय डेटा को भरतीयों द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए, न कि वैश्विक कॉर्पोरेट्स द्वारा। डेटा का नियंत्रण हमें अपने हाथों में लेने के लिए अभियान चलाने की आवश्यकता है।”

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अक्टूबर में कहा था कि सभी डिजिटल भुगतान कंपनियों जैसे गूगल प्ले, वाट्सएप और अन्य को अपने भारतीय कारोबार का डेटा स्थानीय तौर पर स्टोर करना चाहिए।

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ओपिनियन

बसपा-सपा गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं : शीला दीक्षित

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वरिष्ठ कांग्रेस नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कहना है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं मिल रहे हैं, लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस के परिणाम चौंकाने वाले होंगे।

शीला दीक्षित ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, “उनको एक साथ आने दीजिए। वे मिलते और जुदा होते रहे हैं और फिर साथ आ रहे हैं। मेरा अभिप्राय यह है कि उनमें स्थिरता नहीं है और वे स्थायित्व के संकेत नहीं दे रहे हैं। अब आगे देखते हैं।”

तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं दीक्षित (80) सपा और बसपा गठबंधन को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रही थीं। सपा और बसपा ने कांग्रेस को महागठबंधन से अलग रखते हुए प्रदेश में 80 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए एक गठबंधन किया है। दीक्षित को 10 जनवरी को दिल्ली कांग्रेस की कमान सौंपी गई।

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने से पहले शीला दीक्षित को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था। दीक्षित ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीद क्षीण पड़ गई है।

दीक्षित की टिप्पणी से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेता चुनाव अभियान के दौरान सपा और बसपा को निशाना बनाएंगे, जबकि उनका सीधा मुकाबला सत्ताधारी पार्टी भाजपा से होगा।

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है, लेकिन पार्टी ने भाजपा को शिकस्त देने वाले सेक्यूलर दलों के लिए दरवाजा खुला रखा है।

उत्तर प्रदेश में पार्टी नेता उम्मीदवारों को बता सकते हैं कि कांग्रेस ही नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से बाहर कर सकती है और भाजपा को शिकस्त दे सकती है।

कांग्रेस इस बात पर बल देंगे कि इस चुनाव के नतीजों से प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि देश का प्रधानमंत्री चुना जाएगा।

लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो ही सीटें बचा पाई थीं, जबकि उससे पहले 2009 में पार्टी ने 21 सीटों पर जीत हासिल की थी, जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) दूसरी बार केंद्र की सत्ता को बरकार रख पाई थी।

दीक्षित ने कहा कि उनसे कहा जाएगा तो वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी, लेकिन वह दिल्ली पर अपना अधिक ध्यान केंद्रित करेंगी क्योंकि उनको यहां काफी काम करना है।

उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी को कांग्रेस द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करने का अनुमोदन किया।

उन्होंने कहा, “पार्टी को इस पर फैसला लेने दीजिए। हम चाहते हैं और खासतौर से मैं चाहती हूंं और हमारे बीच अधिकांश लोग चाहते हैं। लेकिन इस पर पूरी पार्टी द्वारा फैसला लिया जाएगा।”

गैर-भाजपा दलों में प्रधानमंत्री का पद विवादास्पद मसला है। राहुल गांधी ने खुद भी कहा कि इसका फैसला चुनाव के बाद लिया जाएगा और पहला काम नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित करना है।

संपूर्ण भारत में महागठबंधन की संभावना पर पूछे जाने पर दीक्षित ने कहा कि लोग इस दिशा में प्रयासरत हैं, लेकिन इस पर अभी पूरी सहमति नहीं बन पाई है।

विपक्षी दलों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में गठबंधन की संभावना कम है, लेकिन भाजपा को शिकस्त देने के लिए राज्य विशेष में गठबंधन होगा।

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ओपिनियन

मोदी राज में लुप्त हुआ संसदीय संवाद

संसद में सार्थक चर्चा नहीं हो रही। प्रक्रिया और परम्परा दम तोड़ चुकी है। नौकरशाही भी दमघोटू हाल में है। लोकतंत्र की लौ फड़फड़ा रही है।

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Parliament of India
Indian Parliament Picture

देश पर विश्वास के संकट छाया है। संसद रूपी लोकतांत्रिक संस्था का तेज़ी से पतन हो रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच होने वाला सार्थक संवाद नदारद है। विपक्ष का गला घोंटकर सियासी लाभ उठाने के क़ानून बनाये जा रहे हैं। विधेयकों को उन संसदीय समितियों की समीक्षा से बचाया जा रहा है, जो प्रस्तावित क़ानून को कारगर बनाने के लिए सभी पक्षों की राय को समायोजन करती हैं। झूठी वाहवाही बटोरने के लिए मंत्रीगण ग़लत आँकड़ों को परोसते हैं, क्योंकि उन्हें विशेषाधिकार हनन की परवाह नहीं है। अभी जो मंत्री संसद में गतिरोध से आहत होने की दलीलें देते हैं, वहीं जब विपक्ष में थे तो उनकी दलील होती थी कि गतिरोध भी संसदीय रणनीति का हिस्सा है। सरकार हमारे विरोध को भले ही ढोंग बताये, हमें श्रेय नहीं दे, लेकिन हम वही कर रहे हैं, जो हमारा दायित्व है। सरकार के ऐसे रवैये की वजह से ही संसद पर जनता का भरोसा न्यूनतम स्तर पर जा पहुँचा है।

वो दिन लद गये जब जजों के पास मुक़दमों के लिए इत्मिनान भरा वक़्त होता था। मुक़दमों का अम्बार है। न्यायतंत्र चरमरा चुका है। लेकिन कसूर जजों का नहीं है। न्यायालयों की गरिमा तार-तार हो चुकी है। अदालतों को बाहरी दख़ल से सुरक्षित होना चाहिए। लेकिन पूर्व प्रधान न्यायाधीश जैसे उच्च पद पर बैठे व्यक्ति पर ही ‘मास्टर ऑफ़ रोस्टर’ के अधिकार के दुरुपयोग का आरोप लगा। लेकिन कोई सच्चाई की तह तक नहीं जाना चाहता। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार उसके चार वरिष्ठतम जजों को अपने अन्तःकरण की आवाज़ का ख़ुलासा प्रेस कॉन्फ़्रेंस में करना पड़ा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र ख़तरे में है। अदालतों के बाहर घड़ल्ले से ऐसी हरक़तें हो रही हैं, जिससे न्यायिक फ़ैसलों को प्रभावित किया जा सके। न्यायिक फ़ैसलों में समानता वाली परम्परा को अनोखे तर्कों के सहारे ध्वस्त किया जा रहा है।

अदालतें बेहद उदारता से सील-बन्द लिफ़ाफ़ों में मिली सरकारी दलीलें स्वीकार कर रही हैं, ताकि दूसरे पक्ष उसे चुनौती भी नहीं दे सकें। ऐसी बोझिल प्रक्रिया से न्यायिक आदेश का प्रभावित होना लाज़िमी है। घपलों-घोटालों से जुड़े काग़ज़ातों पर कोर्ट ग़ौर तक नहीं कर रही। जज लोया मामले की कार्यवाही, राफ़ेल सौदे में जाँच को नकारना और सीबीआई निदेशक के तबादले से जुड़े प्रसंगों से साफ़ है कि देश को झकझोरने वाले मुद्दों के प्रति न्याय-तंत्र का रवैया भी सवालों के घेरे में है। दुहाई तो क़ानून की दी जाती है, लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मोर्चे पर सारे वादे पीछे छूट जाते हैं। अलग-अलग बेंच में संवैधानिक पीठ के जजों के फ़ैसले भी बदल जाते हैं। इसीलिए जनता के बढ़ते मोहभंग के प्रति न्यायपालिका को ख़ासतौर पर सचेत रहने की ज़रूरत है।

संसद में हासिल पूर्ण बहुमत का सही इस्तेमाल जटिल जनसमस्याओं को लोकतांत्रिक ढंग से निपटाने के लिए होना चाहिए। लेकिन ये तभी मुमकिन है, जब सबको साथ लेकर चलने की भावना से काम किया जाए। सरकार को सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का ज़रिया बनना चाहिए, लेकिन वो मतभेद के स्वरों को दबाने में जुटी हुई है। इन सन्दर्भों में देखें तो हमारी संस्थाओं पर भारी संकट गहराया हुआ है, कुछेक तो बन्धक बन चुकी हैं। कई संस्थाएँ तो सिर्फ़ आपने आकाओं की जी-हुज़ूरी कर रही हैं। सीबीआई, ईडी, एनआईए और सीबीडीटी यानी केन्द्रीय जाँच ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी और केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड जैसी संस्थाओं से जुड़ा ताज़ा घटनाक्रम इन्हीं बातों का साबित करता है। ये संस्थाएँ आज क़ानून को सर्वोपरि बनाये रखने के लिए काम नहीं कर रहीं, बल्कि वो अक्सर इसे तबाह करती नज़र आती हैं। इसीलिए संस्थाओं में कलह बढ़ रहा है। वो शर्मसार हो रही हैं। जो पतन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है, उसे निकाल बाहर किया जा रहा है। जिनका काम क़ानून को सर्वोपरि बनाना है, वो बौने साबित हो रहे हैं। यदि जाँच एजेंसियाँ दाग़दार होंगी तो अदालती फ़ैसले भी वैसे ही होंगे। पक्षपात और दुर्भावनापूर्ण जाँच से अन्याय और आक्रोश पैदा होता है। तब जनता सड़कों पर उतरने के लिए मज़बूर होती है।

नौकरशाही का दम घुट रहा है। निष्कलंक निष्ठा वाले अफ़सरों का सताया जा रहा है। क्योंकि उनके पुराने बॉस मौजूदा सत्ता की आँखों में खटक रहे हैं। इसने कार्यपालिका में उदासी भरी थकान भर दी है। चहेते अफ़सर अपने आकाओं के इशारों पर नाच रहे हैं। बाक़ी उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। प्रशासन इसी का नतीज़ा भुगत रहा है, योजनाओं में देरी हो रही है और आर्थिक विकास सुस्त पड़ा हुआ है। विकास दर में शिथिलता की वजह से स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे उन दो बुनियादी क्षेत्रों के लिए संसाधन नहीं जुटा पा रही, जो सामाजिक बदलाव के सबसे अहम तत्व हैं। हमने देखा है कि भ्रष्टाचार के आरोपी अफ़सरों का गुस्सा कैसे मासूम लोगों पर फूट रहा है! ऐसे वातावरण की वजह से अफ़सरों का सारा ज़ोर सत्ता के प्रति वफ़ादार रहने का बन जाता है, जबकि उनसे भय और पक्षपात से मुक्त रहकर काम करना चाहिए।

संचार क्रान्ति ने नये तरह के दमन को बढ़ाया है। झूठ और अफ़वाह के ज़रिये लोगों के दिमाग़ में ज़हर भरा जा रहा है। ख़ासकर, इलेक्ट्रानिक मीडिया और काफ़ी हद्द तक प्रिंट मीडिया भी उन उद्योगों की मुट्ठी में है, जो अर्थव्यवस्था में भारी दबदबा रखते हैं। बड़े-बड़े मीडिया मालिक, सरकार की मदद से अपने कॉरपोरेट को चमकाने के लिए पत्रकारीय उसूलों से समझौता कर रहे हैं। मीडिया के ऐसे समझौते से लोकतंत्र का पतन निश्चित है।

चौतरफ़ा संकट वाले मौजूदा माहौल में उम्मीद की किरण सिर्फ़ यही है कि 2019 में भारत की जनता इसे पहचाने और इससे लोहा ले। सिर्फ़ जनता ही लोकतंत्र को बचा सकती है। वो चुनौतियों से कैसे निपटेगी, ये तो वक़्त ही बताएगा। लेकिन यदि वो नहीं चेती तो लोकतंत्र की फड़फड़ाती लौ को असहिष्णुता की तेज़ हवाएँ बुझा देंगी।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)

(साभार:इंडियन एक्सप्रेस)

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