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स्वास्थ्य

जानिये, उस युवती की किस चाहत ने बदली उसकी ख्वाहिश…

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मोनिका चाहती थी कि वह इतनी मोटी हो जाये कि बिस्तर से हिलडुल तक न पाये।

दुनिया में सबसे मोटी महिला बनने की चाहत रखने वाली मोनिका रिले अब पतला होना चाहती है। अब आप सोच रहे होंगे, चाहत मोटी महिला बनने की थी तो फिर अचानक पतला क्यों होना? तो आपको बता दें इसकी वजह है मोनिका का प्रेग्नेंट होना।

इस पर मोनिका का कहना है कि हां, “एक समय था जब मैं दुनिया की सबसे मोटी महिला बनना चाहती थी। मेरा वजन 317 किलोग्राम था। पर, अब मेरी ख्वाहिश है कि मैं पतली हो जाऊं। मैं मां बनना चाहती हूं। मैंने महसूस किया कि मेरी मां बनने की ख्वाहिश सबसे मोटी औरत का खिताब जीतने से ज्यादा सुकून देने वाली है।”

जानकारी के मुताबिक, मोनिका के ब्वायफ्रेंड सिड उन्हें मोटा करने के लिये जितनी मदद कर रहे थे। अब उतनी ही मदद उन्हें पतला करने के लिये कर रहे हैं। मोनिका को कब क्या खाना है। कब कसरत करनी है। यह सब बातें उनके ब्वायफ्रेंड ही याद दिलाते है।

बता दें पिछली गर्मियों में पहले 12 हफ्ते में मिसकैरेज हुआ था। एक बार फिर जब वह मां बनीं तो 14 हफ्ते में मिसकैरेज हुआ था। यह जानने के बाद मोनिका को बहुत अफसोस हुआ था। मोनिका के ब्वायफ्रेंड चाहते थे कि मोनिका मां बने। मोनिका ने अपने ब्वायफ्रेंड की ख्वाहिश को अपनी पहली ख्वाहिश बनाया। मोनिका और उनके ब्वायफ्रेंड ने फिर कोशिश की। लेकिन इस बार 14 हफ्तों बाद मोनिका का मिसकैरेज हो गया। लेकिन इस साल मार्च में फिर उन्हें पता चला कि वह प्रेग्नेंट हैं। पर इस बार उन्होंने सेहतमंद बच्चा पैदा करने की ठान ली है और इसके लिए उन्होंने अपनी डाइट बदल दी है।

दिलचस्प बात यह है कि जो मोनिका चाहती थीं कि वह इतनी मोटी हो जायें कि बिस्तर से हिल-डुल भी न पायें वह अब पतला होने के लिये कसरत कर रही हैं। मोनिका मां बनने के लिए इतनी सजग है कि इस बार वह कोई रिस्क नहीं लेना चाहती। वह हर 15 दिन में अपने डाक्टर के पास जाती हैं ताकि किसी खतरे की आहट भी हो तो उन्हें पहले ही पता चल जायें।

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स्वास्थ्य

बच्चों में बढ़ रहा है डायबिटीज खतरा…

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Diabetes-
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बच्चों में बढ़ता मोटापा आज चिंता का विषय बन चुका गया है। जो कई बीमारियों का कारण बनता जा रहा है।

कई कारणों से बच्चे आज मोटापे का शिकार बन रहे हैं जैसे लगातार टीवी देखना, इंटरनेट, गेमिंग डिवाइसेज पर समय बिताना, खेलकूद की कमी, जंक फूड का सेवन और निष्क्रिय जीवनशैली।  मोटापे का एक घातक परिणाम डायबिटीज के रूप में सामने आता है और डायबिटीज का बुरा असर शरीर के हर अंग पर पड़ता है।

पिछले साल किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि दिल्ली में लगभग 35 फीसदी किशोरों का वजन सामान्य से अधिक है या वे मोटापे से ग्रस्त हैं।आजकल बच्चे खेल-कूद के बजाए इन्डोर गतिविधियों में ज्यादा समय बिताते हैं। ऐसे में मोटापे का शिकार हो जाते हैं और इसका एक घातक परिणाम डायबिटीज के रूप में सामने आता है और डायबिटीज का बुरा असर शरीर के हर अंग पर पड़ता है।”

डायबिटीज नवजात शिशुओं को भी प्रभावित कर सकता है और ज्यादातर लोग इसके बारे में नहीं जानते हैं। नियोनेटल डायबिटीज बच्चों में छह माह की उम्र से पहले भी हो सकता है।”एक अनुमान के अनुसार अकेले दिल्ली में 32 लाख बच्चे डायबिटीज से पीड़ित हैं।

ज्यादातर मामलों में ये बच्चे मोटापे का शिकार होते हैं या इनका वजन सामान्य से अधिक होता है। अध्ययन के अनुसार, बच्चों में मोटापा टाईप 2 डायबिटीज का कारण बन सकता है। लेकिन समय पर निदान के द्वारा रोग के लक्षणों को नियन्त्रण में रखा जा सकता है और प्री डायबिटीज को डायबिटीज में बदलने से रोका जा सकता है।

डायबिटीज का मुख्य कारण असेहतमंद जीवनशैली है और अच्छी आदतों द्वारा इस पर नियन्त्रण पाया जा सकता है। सबसे पहले अपने वजन पर नियन्त्रण रखें। ब्लड शुगर को नियन्त्रण में रखने के लिए बीएमआई सही होना बहुत जरूरी है। इसके लिए काबोर्हाइड्रेट का सेवन सीमित मात्रा में करें।

फाईबर और प्रोटीन से युक्त आहार लें। हरी सब्जियों, फलों, फलियों और साबुत अनाज का सेवन करें।”अगर परिवार में डायबिटीज का इतिहास है तो आपको नियमित रूप से अपने ब्लड शुगर की जांच करवानी चाहिए। अपने ब्लड प्रेशर, कॉलेस्ट्रॉल, ट्राई ग्लीसराईड पर नियन्त्रण रखें। डायबिटीज दिल की बीमारियों का कारण भी बन सकता है। इसलिए ब्लड प्रेशर और कॉलेस्ट्रॉल को नियन्त्रित रखना बहुत जरूरी है।

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स्वास्थ्य

रोजाना 3-4 कप कॉफी मधुमेह में मददगार

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रोजाना तीन-चार कप काफी पीने से मधुमेह टाइप-2 का खतरा 25 फीसदी कम हो सकता है। यह सुझाव एक शोध के नतीजों के आधार पर दिया गया है।

मधुमेह टाइप-2 के मामलों में काफी पीने का असर पुरुष और महिला दोनों में पाया गया है। शोध में कैफीन रहित काफी पीने से भी उसी प्रकार का प्रतिरक्षी प्रभाव पाया गया।स्वीडन के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट के एसोसिएट प्रोफेसर मैट्टियस काल्स्ट्रोम ने कहा कि महज कैफीन नहीं, बल्कि हाइड्रॉक्सीसिनेमिक एसिड्स के कारण यह असर होता है। ‘

हाइड्रॉक्सीसिनेमिक एसिड्स में मुख्य रूप से क्लोरोजेनिक एसिड, ट्राजोनेलिन, कैफेस्टॉल, कॉवियोल और कैफिक एसिड होते हैं।शोध के नतीजे यूरोपीय एसोसिएशन फॉर स्टडी ऑफ डायबिटीज के 2018 में जर्मनी में आयोजित सालाना सम्मेलन में प्रस्तुत किए गए। शोधार्थी दल ने कुल 111,85,210 प्रतिभागियों को शामिल किया और 30 संभावित अध्ययनों की समीक्षा की।

–आईएएनएस

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स्वास्थ्य

इन्सुलिन की कमी से बच्चों में भी मधुमेह का खतरा

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मधुमेह 0-14 वर्ष के बच्चों में भी हो जाती है जब उनका शरीर किसी भी कारण से आवश्यकतानुसार इन्सुलिन नहीं बना पाता। जो शक्कर उनके शरीर को ऊर्जा प्रदान करने का काम करती, वही शक्कर उनके रक्त में जाकर एक भयंकर बीमारी का रूप ले लेती है, जिसका इलाज जल्द से जल्द होना चाहिए।

न्यूट्री एक्टीवीनिया की संस्थापक अवनी कौल ने कहा कि यह बीमारी बच्चों में क्यों होती है इसका कारण अभी पता नहीं चला है, हालांकि बीमारी से लड़ने की क्षमता जब कम हो जाती है को कई बीमारियां हमला करती हैं। ऐसे ही शरीर में मधुमेह जैसी बीमारियों का वास होता है। यदि परिवार के बड़े लोग मधुमेह से ग्रसित होते हैं, तब भी बच्चों को यह बीमारी हो सकती है क्योकि यह वंशानुगत भी होती है।

उन्होंने कहा कि जब बच्चों को जरूरत से ज्यादा भूख अथवा प्यास लगे, धुंधला दिखने लगे, वजन बिना कारण कम होने लगे अथवा थकान अधिक लगने लगे, उस समय सर्तक हा जाना चाहिए। उनकी तुरन्त जांच करवानी चाहिए ताकि अगर वे मधुमेह से ग्रसित हों तो जल्दी ही उनका इलाज शुरू किया जा सके।

अवनी ने कहा कि बीमार व्यक्ति चाहे बच्चा हो अथवा बड़ा, उसके लिए रक्त में शक्कर की मात्रा पर नियंत्रण रखना अनिवार्य है। यह वह पौष्टिक आहार खाकर एवं नियमित रूप से व्यायाम करके नियन्त्रित कर सकता है। कभी कभी इन्सुलिन की आवश्यकता भी पड़ सकती है। रक्त में शक्कर की मात्रा पर नजर रखना चाहिए ताकि उसमें उतार-चढ़ाव की जानकारी तुरन्त मिल सके।
इन्सुलिन की कमी से सांस तेज चलने लगती है, त्वचा एवं मुंह सूखने लगता है, सांस से बदबू आने लगती है, उल्टी आने का अंदेशा रहता है एवं पेट में दर्द हो सकता है। यह स्थिति जानलेवा भी हो सकती है।

–आईएएनएस

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