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ये शख्स 100 बलून को कुर्सी पर बांधकर घूम आया 16 मील

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ballon

अक्‍सर लोग कुछ अलग और अनोखा करने की कोशिश में लगे रहते हैं। अपने इसी शौक के चलते हाल ही में साउथ अफ्रीका में टॉम मॉर्गन ने एक कुर्सी के साथ उड़कर सबको हैरान कर दि‍या है।

38 साल के टॉम ने करीब 100 बलून यानी कि गुब्‍बारों में हीलि‍यम गैस भरी है। इसके बाद उन सारे बलून को एक कुर्सी में बांधने के बाद आसमान में उड़े। इस दौरान वह आराम से करीब 16 मील तक हवा में घूमे, उन्हें इसमें काफी मजा भी आया। हालांकि ऐसा कारनामा उन्‍होंने पहली बार नहीं कि‍या है। इसके पहले वह करीब 3 बार बोट्सवाना में यह कारनामा कर चुके हैं। वहीं इस संबंध में टॉम मॉर्गन का कहना है कि यह काम थोड़ा रिस्‍की जरूर था लेकि‍न उन्‍होंने हि‍म्‍मत नहीं हारी क्‍योंकि वह हमेशा कुछ अलग करने की कोशि‍श में रहते हैं।

वह ज्यादा घूमना चाहते हैं। इसके लि‍ए वह कुछ न कुछ नया तलाशते रहते हैं। ऐसे में जब एक आर्ट‍िकल में पढ़ा कि 1905 में बलून में गैस भरी गई थी तो उन्‍हें लगा कि एक बार उन्‍हें भी इसे ट्राई करना चाहि‍ए। बस इसके बाद ही उन्‍होंने इसकी प्रैक्‍ट‍िस करनी शुरू कर दी।

wefornews bureau 

ज़रा हटके

‘हास्य चिकित्सक’ की उदास कश्मीरियों के चेहरों पर मुस्कान लाने की कोशिश

टकराव के माहौल में पले बढ़े आज के युवा रोज हिंसा-प्रतिहिंसा देख रहे हैं, वहां कश्मीर के 67 वर्षीय कॉमेडी किग का कहना है कि कश्मीरियों के बुझे चेहरों पर मुस्कान व हंसी लाने का एकमात्र जरिया हास्य-विनोद है।

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Hazaar Dastaan

कश्मीर में हिंसा शुरू होने बाद जिन गलियों में आज नारों व गोलियों की गूंज सुनाई देती है, कभी वहां हंसी के हसगुल्ले छुटते थे। और, इसकी वजह थे कश्मीर के चार्ली चैपलिन नाम से मशहूर नजीर जोश जिनके दूरदर्शन पर आते ही कश्मीरी घरों में हंसी की फुलझड़ियां छूटती थीं। चेहरे के हाव-भाव में घबराहट, गली के जोकर जैसे और चाल-ढाल में चैपलिन जैसे जोश घाटी को गुदगुदाते थे।

टकराव के माहौल में पले बढ़े आज के युवा रोज हिंसा-प्रतिहिंसा देख रहे हैं, वहां कश्मीर के 67 वर्षीय कॉमेडी किग का कहना है कि कश्मीरियों के बुझे चेहरों पर मुस्कान व हंसी लाने का एकमात्र जरिया हास्य-विनोद है।

कवि, लेखक, निर्देशक और अभिनेता जोश यहां हर घर में ‘जूम जर्मन’, ‘अहेड रजा’ और कई अन्य नामों से चर्चित हैं जो कई टीवी धारावाहिकों में उनके किरदारों के नाम रहे हैं।

वह नियमित रूप से स्थानीय दूरदर्शन पर हास्य धारावाहिक लेकर आते थे जिसे कश्मीरी बहुत पसंद करते थे। लेकिन, 1990 में जब अलगाववादी हिंसा कश्मीर में भड़क उठी तो उनका कार्यक्रम बंद हो गया। हालांकि, उन्हें सीधे-सीधे कोई धमकी नहीं मिली लेकिन घाटी में हिंसा में हास्य विनोद व व्यंग्य के लिए जगह नहीं बची और उनके पास प्रायोजक नहीं रहे।

जोश का मानना है कि कश्मीरी अवाम कई सामाजिक व मनोवैज्ञानिक समस्याओं के दौर से गुजर रहे हैं जिसका इलाज सिर्फ दवाइयों से नहीं हो सकता है।

जोश ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “यहां लोग तनावमुक्त होना चाहते हैं और हास्य-विनोद और व्यंग्य इसके लिए बेहतर जरिया है।”

उन्होंने एक घटना के बारे में बताया जिसमें एक परिवार ने अपनी अवसादग्रस्त मां को तनाव मुक्त करने के लिए उनको धन्यवाद दिया था।

उन्होंने बताया, “महिला के बेटे ने मुझे बताया कि कॉमेडी धारावाहिक ‘हजार दास्तान’ की एक कड़ी को देखकर उनकी मां के चेहरे पर काफी समय के बाद मुस्कान आई।”

उन्होंने कहा, “लड़के ने बताया कि महीनों अवसादग्रस्त रहने के बाद उसकी मां के हंसने के बारे में जब मनोचिकित्सक को मालूम हुआ तो उन्होंने कॉमेडी धारावाहिक की और कड़ियां दिखाने की सलाह दी। इससे वह पूरी तरह ठीक हो गईं।”

जोश को लगता है कि जहां कर्फ्यू, बंद और गलियों में हिंसा कोई असाधारण घटना नहीं बल्कि आम बात हो वहां लोगों का मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए उनके जीवने में थोड़े हास्य-विनोद की जरूरत होती है।

लेकिन, घाटी में हिंसा बढ़ जाने के बाद नजीर जोश के सामाजिक और राजीतिक व्यंग्य पर आधारित टीवी धारावाहिकों के लिए कोई जगह नहीं बची।

जोश मध्य कश्मीर के बडगाम जिला स्थित अपने घर के बाहर बादलों को टकटकी निगाहों से निहारते हुए जोश ने बताया कि सामाजिक व्यंग्य पर आधारित उनका अंतिम धारावाहिक जूम जर्मन 1989 में बना था लेकिन कश्मीर में हिंसा के हालात पैदा होने के बाद यह 25 कड़ियां से ज्यादा नहीं चल पाया।

जाड़े के सूर्य की क्षीण किरणें घने बादलों के बीच राह बनाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन बादल उन्हें धरती तक पहुंचने के उनके मार्ग में बाधक बनकर खड़े हैं।

इसे देखते हुए उन्होंने कहा, “ऐसे ही वर्तमान हालात हैं। आप जहां भी जाएंगे आपको अवसाद के घने व काले बादल मिलेंगे। विभिन्न अस्पतालों में आने वाले सत्तर फीसदी मरीज अवसाद व तनाव से ग्रस्त हैं। कश्मीर में मनोरंजन का कोई जरिया नहीं है। सिनेमा हाल बंद हो चुके हैं। यहां अन्य राज्यों की तरह कोई स्थानीय फिल्म उद्योग नही है।”

जोश ने बताया, “कश्मीर में सिर्फ एक टीवी स्टेशन है और वहां भी मनोरंजन के कार्यक्रम शुरू करने के लिए कुछ नहीं हो रहा है जिससे लोगों को अपनी जिंदगी के तनाव को भुलाकर हंसने का बहाना मिले।”

उन्होंने उन दिनों को याद किया जब कश्मीरी उत्सुकता से साप्ताहिक टीवी नाटक का इंततार करते रहते थे।

जोश ने बताया, “मैं कुछ स्थानीय परिवारों को जानता हूं जहां महिलाओं ने अपने जेवरात बेचकर टीवी खरीदा था ताकि वे मेरी धारावाहिक हजार दास्तान देख पाएं। इस धारवाहिक की 52 कड़ियां 1985 से लेकर 1987 के बीच स्थानीय दूरदर्शन चैनल पर चली थीं।”

यह धारावाहिक प्रदेश की सत्ता पर काबिज लोगों के ऊपर राजनीतिक व्यंग्य पर आधारित था, जिसमें लोगों की समस्याओं के प्रति उनकी बेरुखी व लापरवाही का चित्रण किया गया था।

उन्होंने बताया, “कुछ स्थानीय नेता धारावाहिक की लोकप्रियता को लेकर क्षुब्ध थे। उन्होंने दिल्ली जाकर केंद्रीय नेतृत्व से शिकायत की कि इस धारावाहिक को लेकर उनकी स्थिति असहज बन गई है।”

जोश ने अपने बीते दिनों को याद करते हुए बताया, “शिकायत होने के बाद हर कड़ी को पहले पूर्वावलोकन के लिए दिल्ली भेजा जाता था, उसके साथ कश्मीरी अनुवादक भी होते थे। समीक्षा समिति ने राजनीतिक व सामाजिक व्यंग्य को सही ठहराया और उसे प्रोत्साहन देने की बात कही।”

जोश के पेशेवर जीवन की शुरुआत स्थानीय रंगकर्म से हुई। उन्होंने बताया, “आरंभ में हम गांव और जिला स्तर पर नाटक खेलते थे। मैंने 1968 में श्रीनगर के टैगोर हॉल में एक नाटक खेला था जहां प्रदेश संस्कृति अकादमी की ओर से नाट्य महोत्सव का आयोजन किया गया था।”

उन्होंने 1973 में टेलीविजन के लिए ‘हाऐर केकर’ नाटक लिखा। इसकी सफलता से वह उत्साहित हुए और कश्मीर में 1989 में मनोरंजन व हास्य कार्यक्रमों पर रोक लगाने तक लगातार हास्य धारवाहिक लिखते रहे।

हालांकि, वह हालात के आगे पूरी तरह से हतोत्साहित नहीं हुए हैं। वह कहते हैं कि प्रदेश और केंद्र सरकार की ओर से उनके कार्य को समर्थन मिले तो कश्मीर में अब भी हास्य व्यंग्य के कार्यक्रम दोबारा शुरू किए जा सकते हैं।

जोश ने कहा, “हमें कम से कम निर्माण लागत की जरूरत है ताकि अतीत की गरिमा फिर से हासिल हो। मुझे आशा है कि निकट भविष्य में बेहतर समझ बनेगी और मैं फिर कश्मीरियों को टीवी धारावाहिकों के जरिये हंसाकर उनको रोज-रोज के तनाव से मुक्त कर सकूंगा।”

वह मानते हैं कि स्थानीय युवाओं में काफी प्रतिभा है। उन्होंने कहा, “नई पीढ़ी के इन लड़के व लड़कियों को अभिनय व निर्देशन में कठिन प्रशिक्षण की जरूरत है ताकि यहां रंगकर्म और टीवी धारावाहिक का लोप न हो।”

(यह साप्ताहिक फीचर श्रंखला आईएएनएस और फ्रैंक इस्लाम फाउंडेशन की सकारात्मक पत्रकारिता परियोजना का हिस्सा है।)

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ज़रा हटके

यहां लगता है नोटों का बाजार…देखें

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आपने नोट तो देखे होंगे पर क्या कभी नोटों का बाजार भी देखा है जहां किलो के हिसाब से नोट बेचे जाते हों। यदि नहीं तो चलिए आज हम आपको बताते है एक ऐसे बाजार के बारे में।

एक अफ्रीकी देश सोमालीलैंड में सड़कों पर नोटों के बंडल बिकते हैं। 1991 में गृह युद्ध के बाद सोमालिया से अलग होकर एक नया देश बना सोमालीलैंड। इस देश को अब तक किसी भी राष्‍ट्र ने अंतरराष्‍ट्रीय रूप से मान्‍यता नहीं दी थी। जाहिर है यह देश बेहद गरीबी से जूझ रहा है। यहां न कोई सरकारी व्‍यवस्‍था लागू हो पाई है और न ही कोई रोजगार है।

सोमालीलैंड की मुद्रा शिलिंग हैं, जिसका किसी देश में कोई मूल्य नहीं है। इसके यहां मुद्रास्फीति इतनी बढ़ गई है कि लोगों को ब्रेड भी खरीदनी हो तो बोरे में भरकर नोट देने पड़ते हैं। यही कारण है कि यहां सिर्फ 500 और 1000 जैसे बड़े नोट चलन में हैं।

Image result for सोमालीलैंड में सड़कों पर नोटों के बंडल

सोमालीलैंड के बाजार में 1 अमेरिकी डॉलर के बदले में 9000 शिलिंग मिलते हैं। खबर है कि यहां करीब 650 रुपए में 50 किलो से ज्यादा शीलिंग खरीदे जा सकते हैं। वैसे इससे कोई फायदा नहीं है क्‍योंकि एक तो इसको लाना- लेजाना काफी मुश्किल है ऊपर से इतनी रकम देने के बाद भी आपको सामान बहुत कम ही मिलेगा। यहां सोने का छोटा नेकलैस खरीदने के लिए भी 10 से 20 लाख रुपए देने पड़ते हैं। इस देश में एक भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त बैंक नहीं है, ऐसे में स्‍वाभाविक है कि यहां कोई बैंकिंग सिस्टम या एटीएम भी नहीं है।

जहां भारत में कैशलैस के व्‍यवस्‍था के लिए अब भी जद्दोजहद चल रही है वहीं इस देश सोमालीलैंड में दो प्राइवेट कंपनीज ने मोबाइल बैंकिंग इकोनॉमी की व्‍यवस्‍था शुरू की थी। इन कंपनियों ने इस परेशानी को देखते हुए ही ये व्‍यवस्‍था की है। यहां पैसे कंपनी के जरिए फोन में जमा होते हैं और फोन के जरिये ही सामान बेचा या खरीदा जाता है। पैसों को कैरी करना बेहद मुश्किल है, लिहाजा लोग कैशलेस सिस्टम अपनाने लगे हैं। यहां से ऊंटों का सबसे ज्यादा निर्यात होता है और यहां के निवासी कमाई के लिए काफी हद तक पर्यटन पर निर्भर हैं।

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ज़रा हटके

दिल्ली रिंग रेलवे पर दौड़ेगी भाप इंजन वाली रेलगाड़ी

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Locomotive Train

भाप इंजन देश के सभी पहाड़ी रास्तों पर चलने के साथ ही दिल्ली रिंग रेलवे पर चलती नजर आएगी, क्योंकि रेलवे भाप इंजन की विरासत को पुर्नजीवित करने के लिए काम कर रही है।

कांगड़ा वैली रेलवे के पालनपुर-जोगिंदरनगर खंड पर भाप इंजन के सफल परिचालन के बाद सभी पांच पहाड़ी रेलवे अब पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए भाप इंजन का परिचलान कर रहे हैं।

Ring Rail Delhi

कांगड़ा वैली रेलवे यूनेस्को की विश्व विरासत स्थल की संभावित सूची में शामिल है। यहां करीब 20 साल पर भाप इंजन का परिचालन दोबारा शुरू किया गया, जिससे हिमाचल प्रदेश में पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे और नीलगिरी माउंटेन रेलवे नियमित रूप से भाप इंजन वाली ट्रेन का परिचालन करती है। वहीं कालका-शिमला रेलवे और माथेरान हिल रेवले पर्यटकों की मांग पर भाप इंजनवाली रेलगाड़ी का परिचालन करती है।

अब राजधानी में लंबे समय से उपेक्षित, लेकिन एक समय में काफी लोकप्रिय रहे रिंग रेलवे को दोबारा पुर्नजीवन प्रदान करने की तैयारी चल रही है।

रेल विरासत से जुड़े रेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “यह भारतीय रेलवे में भाप इंजनों का बड़ा पुनरुद्धार है। हमारा लक्ष्य सभी पहाड़ी रेल के साथ ही दिल्ली रिंग रेलवे मार्ग पर नियमित रूप से भाप इंजन चालित रेलगाड़ी का परिचालन करना है।”

डीजल और इलेक्ट्रिक इंजन के आ जाने से साल 1995 में रेलवे ने धीरे-धीरे भाप इंजनों को परिचालन से बाहर कर दिया था।

हालांकि इससे पहले भी साल 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान दिल्ली रिंग रेलवे पर भाप इंजनवाली ट्रेन चलाने की तैयारियां की गई थीं, लेकिन विभिन्न कारणों से यह परवान नहीं चढ़ सकी।

लेकिन, अब भारतीय रेल की सक्रियता से दिल्ली रिंग रेलवे सेवा के शुरू होने की उम्मीद जगी है। यह काम उत्तर रेलवे को दिया गया है।

Delhi Ring Rail

रिंग रेलवे का मार्ग 34 किलोमीटर है, जो रिंग रोड के समानांतर है और दिल्ली के कई महत्वपूर्ण इलाकों से गुजरता है, जिसमें चाणक्यपुरी, सफदरगंज और सरोजिनीनगर शामिल हैं।

योजना के मुताबिक, चार डिब्बों के साथ भाप इंजन वाली विरासत ट्रेन सफदरजंग स्टेशन से आनंद विहार तक चलेगी, जिसमें पुराना यमुना पुल, पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली और निजामुद्दीन स्टेशन होंगे।

फिलहाल दुनिया भर में केवल गिने-चुने भाप इंजन ही बचे हैं, जो अभी भी चालू हालत में हैं।

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