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लाइफस्टाइल

ऐसे बनाएं टेस्टी पालक की इडली

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आपने चावल से बनी इडली का स्वाद तो चखा होगा। ये खाने में बड़ी मज़ेदार होती है। अगर आपको भी इडली खाना पसंद है तो घर में बनाए हेल्दी और टेस्टी पालक की इडली।

इसके मज़ेदार स्वाद के आप दिवाने हो जाएंगे। आप चाहें तो पालक की इडली बच्चों को लंच में बनाकर खिला सकते है। इसे बनाने में आपका ज्यादा टाइम भी वेस्ट नहीं होगी। आइए जानें पालक इडली की रेसिपी।

सामग्री

एक कप – चावल, आधा कप – धुली उडद की दाल, 20-25 – पालक के पत्ते, एक चम्मच – राई, नमक-इच्छानुसार, एक चम्मच- तेल

विधि
पालक की इडली बनाने के लिए सबसे पहले चावल और दाल को लेकर अच्छे से साफ कर ले। अब इन दोनों को कम से कम 6-7 घंटे के लिए पानी में भिगो कर रख दें। अब इसका पानी निचोड़कर इस मिक्सी में डालकर दरदरा करके पीस लें।

जब इसका पेस्ट बन जाए तो इसे एक बाउल में निकाल लें। अब इस मिश्रण को अच्छे से फेंट ले। जब अच्छे से फिट जाए तो इसे आठ घंटे के लिए ढक्कर कर रख दें। फिर इस मिश्रण को इडली के साचे में डाल दिजीए। अब इसे कम से कम भाप पर 15 मिनट कर पका ले।

जब इडली अच्छे से बन जाए तो इसे साचे से निकाल लें। अब एक कडाही तेल गर्म करें। फिर इसमें राई डालकर चटकाए। भूनी हुई राइ को लेकर इडली में तड़का लगा दें। लीजीए तैयार हुई आपकी पालक इडली। अब इसे नारियाल की चटनी के साथ सर्व करें।

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अंतरराष्ट्रीय

इतिहास में पहली बार पॉप ने अकेले मनाया होली वीक

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वेटिकन सिटी: कोरोनोवायरस महामारी के कारण पोप फ्रांसिस ने पहली बार यहां के सेंट पीटर्स बेसिलिका में अकेले ही पाम संडे मनाया। ऐसा इतिहास में पहली बार हुआ है।

एफे न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, कैथोलिक कैलेंडर में रविवार को एक महत्वपूर्ण धार्मिक त्योहार होली वीक की शुरुआत हुई, जो कि इस बार वेटिकन स्क्वायर में हर बार की तरह आयोजित नहीं हुई। वहीं इस बार समारोह में लोगों की मंडली भी शामिल नहीं हुई।

हालांकि कोविड-19 महामारी के मद्देनजर दुनियाभर में लागू आइसोलेशन में रह रहे लाखों लोगों ने इंटरनेट, रेडियो और टेलीविजन के माध्यम से प्रार्थना सभा में भाग लिया।

इस दौरान पोप ने कहा, “हम जिस त्रासदी का सामना कर रहे हैं, वह हमें उन चीजों को गंभीरता से लेने के लिए कह रहा है जो वास्तव में गंभीर हैं और उसे कम नहीं आंकना चाहिए। यह फिर से समझने की जरूरत है कि यदि दूसरों की सेवा नहीं की जाती है तो जीवन का कोई फायदा नहीं है। जीवन को प्यार से मापा जाता है।”

इस दौरान सर्विस के लिए पादरी के साथ लोगों का एक छोटा समूह मौजूद था, जो एक दूसरे से सुरक्षित दूरी बनाए हुए थे।

दुनिया भर में 12 लाख से अधिक लोगों के संक्रमित होने और इससे 66,500 लोगों की मौत होने के बाद वेटिकन में एहतियातन सख्ती बरती गई है।

गौरतलब है कि इटली में 128,948 पुष्ट मामलें सामने आए हैं और कोविड-19 के कारण यहां 15,887 मौतें हो चुकी हैं, जो कि दुनियाभर के किसी भी देश से सबसे अधिक है।

–आईएएनएस

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अंतरराष्ट्रीय

श्रीलंका ने पहली बार चाय की ऑनलाइन नीलामी

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कोलंबो: दुनिया के सबसे बड़े और सबसे पुराने ‘कोलंबो टी ऑक्शन’ ने कोरोना महामारी के बीच चल रही चाय की नीलामी में पहली बार ऑनलाइन सत्र संचालित किया।

समाचार एजेंसी सिन्हुआ के अनुसार, श्रीलंका सरकार द्वारा देश में कोविड-19 के प्रकोप को रोकने के लिए लगाए गए कर्फ्यू के कारण कोलंबो टी ऑक्शन को दो सप्ताह के लिए निलंबित कर दिया गया था, जिससे व्यापारियों को दूर से खरीदने और बेचने देने की सुविधा देने के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर इसे लाया गया।

ऑनलाइन नीलामी सफलतापूर्वक आयोजित की गई, जिसमें 680 खेप में 720,000 किलोग्राम एक्स-एस्टेट चाय के साथ डील की गई।

एक प्रमुख स्थानीय चाय निर्यातक इम्पीरियल टी ने 1 किलो पर 2,100 श्रीलंका रुपया (11 डॉलर) में पहली सफल बोली लगाई।

ऑनलाइन नीलामी प्लेटफॉर्म पर अब तक 300 से अधिक खरीदार और आठ दलाल पंजीकरण करा चुके हैं। कोलंबो टी ऑक्शन हर साल औसतन 3000 लाख किलोग्राम चाय की नीलामी करता है।

–आईएएनएस

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ब्लॉग

‘5 अप्रैल, 9 बजे, 9 मिनट’ – मूर्खता के अथाह कुंड में गोताख़ोरी

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modi deep 9 Baje

प्रवचन और उपदेशों से समाज की विकृतियाँ दूर हुई होती तो चप्पे-चप्पे पर धर्मात्मा ही नज़र आते। दरअसल, समझाने से सिर्फ़ वही समझते हैं, जो समझना चाहते हैं। जो समझना चाहते हैं, उनमें समझने की क्षमता भी विकसित हो जाती है। लेकिन इतिहास ग़वाह है कि मूर्खों को समझा पाना नामुमकिन है। इस ब्रह्म सत्य को मौजूदा निज़ाम से बेहतर और कोई नहीं जानता। इसीलिए पहले ये रही-सही अक्ल वालों को मूर्खों में तब्दील करता है, फिर उनसे लगातार मूर्खता के अथाह कुंड में गोते लगवाता रहता है। ऐसा ही राष्ट्रीय गोताख़ोरी अभियान थी – ‘5 अप्रैल, 9 बजे, 9 मिनट’

देश भर में बड़े पैमाने पर मूर्खों इस मुबारक़ घड़ी का इन्तज़ार कर रहें। लेकिन हुक़ूमत के तमाम प्रलाप के बावजूद कुछ लोग हैं जिन्होंने काजल की कोठरी में होने के बावजूद ख़ुद को कालिख़ से बचा रखा है। जो वास्तव में ‘असतो मा ज्योतिर्गमय’ का मतलब समझते हैं। मैंने क़लम ऐसे ही मुट्ठी भर लोगों के लिए उठायी है। मुझे लगा कि अब भी वक़्त है कि बत्तियाँ बुझाकर, अन्धेरा करके और उस बनावटी अन्धेरे को दूर करने के लिए दीया, मोमबत्ती या मोबाइल के फ़्लैश को टॉर्च बनाकर जलाने वाले ‘इवेंट’ के प्रति आपत्ति या दुविधा रखने वालों को बताया जाए कि कैसे मौजूदा दौर के पागल बादशाह की सनक देश के पॉवर ग्रिड के लिए घातक साबित हो सकती है?

देश में पैदा होने वाली हरेक तरह की बिजली को उस नैशनल पॉवर ग्रिड में डाला जाता है, जिससे वितरित होते हुए असंख्य रूपों में बिजली हम तक पहुँचती है। नैशनल पॉवर ग्रिड को देश की भौगोलिक आकार के हिसाब से पाँच क्षेत्रीय पावर ग्रिडों (RLDCs) और फिर राज्य स्तरीय पॉवर ग्रिडों (SLDCs) में बाँटा गया है। ये हमारे शरीर की शिराओं और धमनियों जैसा बहुत बड़ा और जटिल ढाँचा है। पूरी तरह से सरकारी अनुशासन के मुताबिक़ चलता है। इसका सबसे बड़ा नियम है बिजली की फ्रिक्वेंसी को 50 हर्ट्ज पर बनाये रखना, क्योंकि फ्रिक्वेंसी के कम होने पर जहाँ लो-वोल्टेज की समस्या पैदा होती है, वहीं ज़्यादा होने पर बिजली के उपकरणों के बर्बाद होने का ख़तरा होता है।

देश का पूरा बिजली तंत्र केन्द्रीय बिजली नियामक (CERA) के नियमों से चलता है। यही संगठन देश में बिजली का सुप्रीम कोर्ट है। इसी ने भारतीय बिजली ग्रिड कोड (IEGC) के ज़रिये तय कर रखा है कि पॉवर ग्रिड और उससे जुड़े पूरे तंत्र को हर हालत में बिजली की फ्रिक्वेंसी को 49.95 से लेकर 50.05 हर्ट्ज (Hz) के दायरे में ही रहना है। यानी, नॉर्मल की रेंज में सिर्फ़ 0.1 हर्ट्ज अर्थात महज 2% के उतार-चढ़ाव की गुंज़ाइश रखी गयी है। ये दायरा इतना संवेदनशील है कि जुलाई 2012 में ज़रा सी असावधानी की वजह से उत्तरी और पूर्वी ग्रिड चरमराकर बैठ गया था। मिनटों में हुए इस हादसे के बाद ग्रिड को बहाल होने में 12 घंटे लग गये थे।

दरअसल, ग्रिड में जितनी बिजली डाली जाती है, ख़पत का उतना ही होना ज़रूरी है। यदि माँग ज़्यादा है लेकिन उत्पादन कम है तो हम ग्रिड से ज़्यादा बिजली नहीं ले सकते। इसी तरह, यदि बिजली की खपत कम है लेकिन उत्पादन अधिक, तो हमें फ़ौरन उत्पादन घटाया जाता है। बिजली घरों को इस हिसाब से संचालित किया जाता है कि बहुत कम वक़्त में उनका उत्पादन घटाया या बढ़ाया जा सके। बिजली की माँग के बढ़ने या ख़पत के घटने का सिलसिला इतनी धीमी रफ़्तार में होना चाहिए जो ग्रिड फ्रिक्वेंसी की रेंज में ही रहे।

इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए 5 अप्रैल 2020 को पॉवर ग्रिड ने सारे आपातकालीन उपाय किये हैं। सारे ट्रांसमिशन सिस्टम को घड़ी को एकरूप (synchronize) किया है। हरेक महत्वपूर्ण कर्मचारी को शाम छह बजे से रात दस बजे तक ड्यूटी पर रहने का हुक़्म है। हाइड्रो यूनिट्स को शाम 6:10 बजे से 8 बजे तक अपने न्यूनतम उत्पादन करते हुए रात 9 बजे वाले तमाशे के लिए तैयार रहना होगा। इस दौरान थर्मल और गैस आधारित बिजली घरों को शाम के पीक ऑवर वाले लोड के हिसाब से ख़ुद को ढालना होगा। रात 8:57 बजे तक हाइड्रो पॉवर फुल अलर्ट पर आकर ग्रिड की सिस्टम फ्रिक्वेंसी पर नज़र रखते हुए तब तक बिजली का उत्पादन गिराते चलेंगे, जब तक सारी नौटकीं को ख़त्म करके लोग फिर से बिजली की उस माँग को बहाल नहीं कर देते जो बत्तियाँ बन्द किये जाने से पहले थी।

इसके बाद राज्य सरकारों के कोयला या गैस आधारित थर्मल पॉवर स्टेशन्स को पीक ऑवर के समापन के तहत रात 9:55 बजे से अपने उत्पादन को 60 फ़ीसदी या अपनी न्यूनतम तकनीकी सीमा तक घटाना होगा। बिजलीघरों के लिए तकनीकी सीमा का दायरा वो लक्ष्मण रेखा जिसे यदि क़ायम नहीं रखा गया तो अचानक ठप हो जाएँगे। ठप होने के बाद इन्हें फिर से चालू होने में अच्छा ख़ासा वक़्त लगता है। इसीलिए ग्रिड फेल होने की दशा में हालात को सामान्य बनने में घंटों लग जाते हैं। वैसे प्रधानमंत्री के तमाशे के आह्वान को देखते हुए रात 8:30 बजे के बाद से ही सिस्टम फ्रिक्वेंसी न्यूनतम करते हुए 49.90 Hz पर ले जाने की आपातकालीन रणनीति भी अपनायी गयी है, ताकि 9 बजे होने वाली अनहोनी से ज़्यादा से ज़्यादा सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

चलते-चलते आपको ये बताता चलूँ कि कोरोना लॉकडाउन की वजह से बिजली की माँग में भारी गिरावट आयी है। मसलन, ऊर्जा मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, बीते 2 अप्रैल को देश में 125.81 गीगा वॉट बिजली की ख़पत थी, जबकि पिछले साल इसी दिन 168.32 गीगा वॉट बिजली की ख़पत हुई थी। ये अन्तर 25 फ़ीसदी का है। ज़ाहिर है, बिजली की माँग का अचानक धड़ाम से गिरना और फिर उठना, हमारे पॉवर ग्रिड और बिजलीघरों के लिए एक नयी आफ़त पैदा कर सकता है। क्योंकि इन दिनों ट्रेनें नहीं चल रहीं, फैक्ट्रियाँ बन्द पड़ी हैं, कृषि क्षेत्र में बिजली की माँग बेहद कम है, इसीलिए विशेषज्ञों ने अचानक देश भर में बत्तियाँ बन्द करने के प्रयोग को ख़तरनाक बताया है।

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