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ओपिनियन

‘यदि सवाल पूछना राष्ट्रद्रोह है तो मैं राष्ट्रद्रोही हूँ’

नोटबन्दी से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई सवाल ऐसे हैं, जिन्हें मोदी सरकार से पूछना बेहद ज़रूरी है

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kapil sibal

भक्तों को लगता है कि सिर्फ़ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही भारत के उस भविष्य का प्रतिनिधित्व करते हैं जो दमदार, बेबाक़ और सख़्त है। भक्तों को लगता है कि जो मोदी की वाहवाही नहीं करता वो राष्ट्रद्रोही है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भक्तों ने नोटबन्दी का ऐसे गुणगान किया मानो वो काले धन के ख़िलाफ़ राम-बाण साबित हुआ है। ऐसा दिखाया गया कि नोटबन्दी से रईसों पर गाज़ गिरी जबकि ग़रीब उससे बेहद ख़ुश थे। कहा गया कि नोटबन्दी से दीर्घकाल में बहुत फ़ायदा होगा। भक्तों ने फ़ैलाया कि सीमा पर ऐसा धावा बोला गया, जैसा पहले कभी नहीं हुआ। इसे सर्ज़िकल हमले का नाम दिया गया। रणनीति बनी कि समाज के मौजूदा चुनौतियों के लिए भारत के अतीत, उसके नायकों और उनकी नीतियों को कोसते रहो।

देश के भीतर हिन्दुत्व और इसकी मानसिकता होनी ही चाहिए। किसी भी क़ीमत पर गौ-माता का संरक्षण होना ही चाहिए। जो लोग पशुओं के व्यापार से जुड़े हैं उन्हें शक़ की नज़रों से देखा ही जाना चाहिए। मौक़ा पाते ही किसी सबूत के बग़ैर उनके साथ मार-पीट की जाएगी या उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाएगा। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तो ये है कि पीड़ित को अपराध का आरोपी तथा हमलावर को प्रताड़ित बनाकर पेश किया जाएगा। गौरक्षकों के उन्मादी हमलों के वक़्त यदि पुलिस मौजूद भी रहेगी तो उसे हालात से नज़रें फेरना पड़ेगा।

देश के बाहर से जुड़े मोर्चों पर फ़ैलाया जाएगा कि पुरानी विदेश नीति पाषाणकालीन थी। चीन को उसकी औक़ात दिखाने की बातें होंगी। मोदी की पाकिस्तान नीति की स्तुति की जाएगी। मोदी के गले मिलने की सराहना होगी। यदि वो बातचीत से इनकार करें तो इसकी प्रशंसा होगी। हर तरह से मोदी को सटीक ठहराया जाएगा। पठानकोट, गुरुदासपुर और उरी के लिए पाकिस्तान की बदमाशियों को ज़िम्मेदार बताया जाएगा। लेकिन यदि आप इसे लेकर कोई सवाल खड़े करें तो आपको पाकिस्तान-समर्थक बताया जाएगा। सोशल मीडिया पर आपका चरित्र-हनन किया जाएगा। यही मेरा भारत है। इसमें मुझ पर दूसरे ग्रह के प्राणी यानी एलियन होने का ठप्पा लगाया जाएगा, वो भी सिर्फ़ इसलिए कि मैं भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थकों की नीतियों से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता।

नोटबन्दी का हादसा

कदाचित, नोटबन्दी तो आज़ाद हिन्दुस्तान का सबसे शर्मनाक घोटाला बन गया। इस जन-विरोधी क़दम को बग़ैर पर्याप्त तैयारियों के लागू किया गया। नोटबन्दी के वक़्त अमीरों को कोई थाम नहीं सका, जबकि ग़रीब क़तारों में खड़े रहे। रातों-रात 86 फ़ीसदी रुपये बेकार होने से अर्थतंत्र ठप पड़ गया। लोगों को रोज़मर्रा की ज़रूरतों से लिए रुपये नहीं मिले। क़रीब सौ लोग बेमौत मारे गये। ज़्यादातर एटीएम महीनों तक अपडेट नहीं हो सके। इसमें कोई शक़ नहीं कि नोटबन्दी जैसा फ़ैसला बग़ैर अपेक्षित तैयारियों के लिया गया। भारतीय रिज़र्व बैंक को भी रोज़ाना बदले जा रहे नियमों की ख़बर नहीं थी। खेतीबाड़ी, रोज़गार, व्यापार और कारोबार के लिए सभी का दम निकलने लगा। नकदी की किल्लत की वजह से करोड़ों लोगों को रोज़गार से हाथ धोना पड़ा।

नोटबन्दी उन तीनों मोर्चों पर बुरी तरह विफल साबित हुई, जिसका ज़िक्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया था। आतंकवाद का पतन नहीं हुआ। जाली नोट प्रचलन में आ गये। यहाँ तक कि धीमी रफ़्तार से ही सही, काला धन फिर से अपने पैर पसार रहा है। लेकिन इन तमाम तथ्यों को लेकर जो नोटबन्दी की आलोचना करे, उसे राष्ट्रद्रोही बताया जाता है। मैं इसका आलोचक हूँ। यदि ये राष्ट्रद्रोह है तो हुआ करे!

सैनिक कार्रवाई आक्रामक होती है। यदि ये सफल है तो इससे रोग का उपचार होना ही चाहिए। लेकिन यदि बीमारी बरकरार रहती है तो फिर कोई वजह नहीं हो सकती कि उसके लिए अपनी वाहवाही की जाए। सैनिक कार्रवाई की तारीफ़ तो होनी ही चाहिए, लेकिन इस बात की समीक्षा भी होनी चाहिए कि उससे हासिल क्या हुआ? सैन्य कार्रवाई के महानिदेशक लेफ़्टिनेंट जनरल रणबीर सिंह के मुताबिक़, नियंत्रण रेखा के उस पार बड़ी संख्या में आतंकवादी मौजूद हैं। वो जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ के लिए तैयार हैं। इससे साबित होता है कि सितम्बर 2016 में हुए सर्ज़िकल हमले से क्या हासिल हुआ?

नवम्बर में 16 कोर के नगरोटा स्थित मुख्यालय पर भारी हथियारों से लैस आतंकवादियों के हमले में एक मेज़र समेत सात सैनिकों का शहीद होना, ये बताने के लिए काफ़ी था कि आतंकवाद का ख़तरा किस शिद्दत से क़ायम है! सर्ज़िकल हमले के बाद के घटनाक्रम में नियंत्रण रेखा पर तनाव इतना ज़्यादा बढ़ता चला गया कि हमारे सैनिकों और नागरिकों को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया गया। काफ़ी सैनिक और नागरिकों की मौत भी हुई। इससे साफ़ है कि सर्ज़िकल हमले ने घुसपैठियों के लिए कोई ख़ौफ़ नहीं पैदा किया। लेकिन यदि कोई इनकी कामयाबी पर सवाल खड़े करे तो भगवा भक्त-मंडली उस पर पाकिस्तान का समर्थक और राष्ट्रद्रोही होने के ठप्पा लगा देते हैं। इसीलिए यदि ये राष्ट्रद्रोह है तो हुआ करे!

दलितों और मुसलमानों की हत्या

कथित गोरक्षा के नाम पर दलितों और मुसलमानों को पीट-पीटकर मार डालने की घटनाएँ पूरे देश के लिए शर्मनाक हैं। ये गोरक्षक ऐसे स्वयंसेवक हैं जो हिन्दू अधिकारों के स्व-नियुक्त राजदूत बन गये हैं। इन्हें सरकार और प्रशासन का मौन समर्थन हासिल है। पिछले साल अगस्त में प्रधानमंत्री मोदी ने इन्हें धिक्कारा था। उससे भी कुछ नहीं बदला। इन गौरक्षकों के ख़िलाफ़ जब प्रदर्शन होने लगे तो प्रधानमंथी मोदी फिर से जुबान खोलने के लिए मज़बूर हुए। हालाँकि, उनके शब्द खोखले ही साबित हुए। ये मोदी ही थे जिन्होंने अपनी चुनावी रैलियों में गोरक्षा और ‘पिंक रिवोल्युशन’ यानी माँस आधारित अर्थव्यवस्था पर ख़ूब भाषणबाज़ी की थी। लेकिन उनके धिक्कारने के बावजूद झारखंड के रामगढ़ में अलीमुद्दीन अंसारी का इसलिए पीट-पीटकर मार डाला गया कि उसके वाहन में कथित तौर पर गौमाँस था। वाहन को भी आग लगा दी गयी। मोदी को अच्छी तरह से मालूम है कि नफ़रत की ऐसी सियासत की बदौलत ही उन्होंने उत्तर प्रदेश का चुनाव जीता है। उन्मादी गौरक्षकों की जड़ों में भी यही नफ़रत है। इसे रोकने के लिए सिर्फ़ कथनी से बात नहीं बनेगी, ज़रूरत करनी की है। लेकिन यदि कोई इसे लेकर सरकार की आलोचना करता है तो उसे गौहत्या का समर्थक, हिन्दू-विरोधी और राष्ट्रद्रोही बनाकर पेश किया जाता है। अब यदि यही सही है, तो हुआ करे!

दिशाहीन विदेश नीति

मोदी की पाकिस्तान नीति में कोई निरन्तरता नहीं है। कभी बहुत गर्मजोशी से हाथ मिलाया जाता है। कभी अचानक लाहौर में क़दम ठिठक पड़ते हैं, तो कभी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की शक़्ल भी नहीं देखते। इसीलिए विदेश नीति से जुड़े हमारे अधिकारियों को ऐसी दोहरी सोच वाली सरकार के इरादों को लेकर संघर्ष करना पड़ता है। पाकिस्तान को लेकर भारत में गहरी नफ़रत है। ऐसी धारणा सैनिक तैयारियों के लिहाज़ से तो ज़रूरी हो सकती है, लेकिन मोदी की पाकिस्तान नीति की आलोचना भक्तों को कतई गवारा नहीं। यही आलम तब भी रहता है जब कोई सीमापार से हो रहे घुसपैठ, पठानकोट और उरी में हुई शहादत और सुरक्षा में सेंध का सवाल उठाता है। गुरुदासपुर में क्या हुआ था, उससे अभी तक पर्दा क्यों नहीं उठा? अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर मौजूद पठानकोट वायु सेना स्टेशन को उड़ा देने की कोशिश कैसे सफ़ल हो गयी?

पठानकोट हमले को लेकर संसदीय समिति ने कहा है कि “…आतंकवादियों को तस्करों के गिरोह से मिली मदद की आशंकाओं का ख़ारिज़ नहीं जा सकता।” राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने अदालत में आरोप-पत्र अवश्य दाख़िल किया है, लेकिन अब भी कई सवालों के जवाब अपेक्षित हैं। हमारी आतंकवाद विरोधी संस्थाएँ क्यों सोती हुई पायी गयीं? क्यों हमारे सुरक्षा बलों को अपने वायुसैनिक अड्डे को सुरक्षित बनाने में तीन दिन लग गये? पाकिस्तान की ओर से जवाबी कार्रवाई को सुनिश्चित किये बग़ैर पाकिस्तानी अफ़सरों को पठानकोट वायुसेना स्टेशन का दौरा क्यों करने दिया गया? क्यों संयुक्त जाँच दल की आड़ में पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी, इंटर सर्विसेज़ इंटेलिजेंस (आईएसएस) के अफ़सर को भी पठानकोट आने दिया गया? उरी में भी लश्कर-ए-तोएबा के आतंकियों ने 19 सैनिकों की हत्या कर दी थी।

तो क्या जनता को पठानकोट और उरी में सुरक्षा तंत्र की ख़ामियों के बारे में सवाल करने का हक़ नहीं होना चाहिए? क्या ऐसा करना राष्ट्रद्रोह है, जिसके लिए भक्तों की ओर से पाकिस्तान समर्थक होने का ठप्पा लगाया जाए? भारत का नागरिक होने के नाते मैं तो अपनी सरकार से उसकी नीतियों और उसके क्रियान्वयन को लेकर सवाल पूछता रहूँगा। अब यदि कोई इसके लिए मुझ पर राष्ट्रद्रोही होने का आरोप लगाये, तो लगाता रहे!

 

(The writer, a senior Congress leader, is former Union Law Minister and a lawyer)

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(अख़बार ‘द हिन्दू’ से साभार।)

ओपिनियन

प्रणब का मिशन नागपुर लोकतंत्र के लिए कितना सही?

अपने अब तक के राजनीतिक करियर में मुखर्जी जिन मान्यताओं और मूल्यों पर कायम रहने के लिए जाने जाते रहे, क्या उन्हें ताक पर रखकर उनका नागपुर जाने का फैसला गलत था?

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Pranab Mukherjee

नागपुर से प्रणब की जो तस्वीरें देखने को मिलीं, उसे एक कांग्रेस नेता के शब्दों में हजम करना मुश्किल था। जो शख्स धर्मनिरपेक्षता के रंग में रंगे रहे, जिदंगी के कई साल कांग्रेस पार्टी को दिए और फिर संविधान कायम रखने की जिम्मेदारी के साथ राष्ट्रपति बने, वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जैसे संगठन के प्रमुख के साथ मंच साझा कर रहे थे और उनकी आवभगत का आनंद ले रहे थे। यह उन्हें उन मूल्यों व आदर्शो का समर्थन करता दिखाता है, जिनके विरोध में वे हमेशा खड़े रहे और संघर्ष करते रहे।

मुखर्जी के पहली बार हिंदूवादी संगठन के मुख्यालय में जाने के विवाद पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक वैचारिक सलाहकार ने मध्यम स्तर के एक कांग्रेस नेता से पूछा, “आप उस सरकार का हिस्सा थे, जिसने 1975 में और फिर 1992 में आरएसएस को प्रतिबंधित किया। क्या आपको नहीं लगता कि आपको हमें बताना चाहिए कि उस समय आरएसएस में क्या बुराई थी, जो अब उसका गुण बन गया है?”

प्रणब की बेटी शर्मिष्ठा सहित कांग्रेस पार्टी के कई नेताओं ने ऐसे संगठन से मिले निमंत्रण को स्वीकार करने पर सवाल उठाए, जो वामपंथी-उदारवादी- धर्मनिरपेक्षता की स्थापना को नापसंद करता आया है। न सिर्फ समर्पित, बल्कि चिंतित नागरिक भी भी देश में नफरत और पूर्वाग्रह वाले माहौल में अपनी व्यथा जाहिर कर रहे हैं और अल्पसंख्यकों पर सुनियोजित हमले और सामाजकि रूप से सताए दलितों व पिछड़ों के दमन के लिए आरएसएस और उससे संबद्ध संघ परिवार के संगठनों की विचारधारा को दोषी ठहराते रहे हैं।

कई लोगों ने आवाज उठाई है कि यदि इस तरह से नफरत का जहर फैलाने दिया जाता रहा, तो यह भारत के उस बहुपक्षीय, बहुसंख्यक और बहुसांस्कृतिक सामाजिक संरचना व तानेबाने को खत्म कर सकता है, जो देश को इतना अनोखा व अद्वितीय बनाता है।

कथित रूप से हिंदू राष्ट्रवादी समूहों से संबद्ध कमसिन लड़कियों के खिलाफ क्रूर हिंसा के बाद अप्रैल में देशभर में चलाए गए ‘हैशटैगनॉटइन माइनेम’ विरोध अभियान के दौरान ऐसे संदेश छाए रहे कि “आज हम घृणा की राजनीति का सामना कर रहे हैं जो हमारे देश के बड़े हिस्सों में फैल गया है .. मुसलमान अगले दौर के हमलों के डर के साये में रहते हैं, यहां तक कि संविधान में दलितों और आदिवासियों को जो अधिकार मिले हैं, उस पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।”

83 वर्षीय मुखर्जी ने बढ़ते ध्रुवीकरण के इस माहौल में पुराने कैबिनेट और पार्टी के कुछ सहयोगियों की अपील को अनदेखा कर दिया। राष्ट्रीय स्तर पर टेलीविजन पर सीधे प्रसारित भाषण में मुखर्जी ने कहा “भारत की आत्मा बहुलवाद और सहिष्णुता में बसती है” और “धर्मनिरपेक्षता व समावेश हमारे लिए विश्वास का विषय है।”

उन्होंने उस आरएसएस रैंक और फाइल की याद दिलाई, जिन्होंने हिंदू सर्वोच्चवादी विचारधारा का प्रचार किया और जिसके संस्थापक ने मुसलमानों और ईसाइयों को ‘आक्रमणकारी’ माना। यह (विभिन्न धर्म) वह चीज है जिससे “हमारी संस्कृति, विश्वास और भाषा की बहुतायत भारत को विशेष बनाती है” और “धर्मशास्त्र, धर्म, क्षेत्र, घृणा और असहिष्णुता के सिद्धांत व पहचान के आधार पर हमारे राष्ट्रवाद को परिभाषित करने का कोई प्रयास हमारी राष्ट्रीय पहचान को धूमिल करने का ही काम करेगा।”

अपने अब तक के राजनीतिक करियर में मुखर्जी जिन मान्यताओं और मूल्यों पर कायम रहने के लिए जाने जाते रहे, क्या उन्हें ताक पर रखकर उनका नागपुर जाने का फैसला गलत था?

उनकी सोच की एक झलक उनके भाषण में दिखाई पड़ती है, जिसमें उन्होंने इस बात पर दुख जाहिर किया कि ‘क्रोध की अभिव्यक्ति’ राष्ट्रीय संरचना को पूरी तरह से नष्ट कर रही है। उन्होंने कहा, “बातचीत न केवल प्रतिस्पर्धी हितों को संतुलित करने के लिए, बल्कि उन्हें सुलझाने के लिए भी जरूरी है .. सिर्फ संवाद के माध्यम से हम बिना हमारे राजनीति के भीतर अस्वास्थ्यकर संघर्ष के जटिल समस्याओं को हल करने की समझ विकसित कर सकते हैं।

संवाद और समायोजन लोकतांत्रिक कार्यकलापों के आधारशिला हैं और उनकी अनुपस्थिति अक्सर लोकतंत्र की मौत की घंटी बजती है।

अपनी किताब ‘हाउ डेमोक्रेसीज डाई’ में हार्वर्ड के प्रोफेसरों स्टीवन लेविट्स्की और डेनियल जिबलाट ने आज अमेरिकी लोकतंत्र में मौजूद ‘चरम कट्टरपंथी विभाजन’ के बारे में बात की है जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में सामाजिक धारणाओं व मान्यताओं के टूटने को दर्शाता है, यह न सिर्फ डेमोक्रेट और रिपब्लिकन नेताओं के बीच बढ़ते नीतिगत मतभेद में नजर आ रहा है, बल्कि नस्ली और धार्मिक मतभेदों का भी बढ़ना नजर आ रहा है और लोकतंत्र की सुरक्षा रेलिंग को भी नुकसान पहुंच रहा है।

भारत आज भी दोराहे पर खड़ा है, जो शायद 71 साल के इतिहास में अभूतपूर्व है। जैसे ही कोई राष्ट्रीय प्रवचन दिनभर में चर्चा का विषय बन जाता है, सोशल मीडिया पर अक्सर दो चरम विभाजनकारी और नफरत फैलाने वाली विचारधाराओं के बीच ठन जाती है। इससे लोकतंत्र के हिमायती आम नागरिकों, खासकर युवा, जो परिवर्तन और प्रगति के लिए उत्सुक हैं, उन्हें निराशा हाथ लगती है।

देश में हाल के चुनावों में बुरी स्थिति देखने को मिली है। न सिर्फ शपथ ग्रहण करने वाले राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच, बल्कि विचारधाराओं के बीच भी विरोध देखने को मिला है जो मूल रूप से उनके राष्ट्रीय दृष्टिकोण में भी एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत है।

और शायद यही कारण है कि मुखर्जी ने महसूस किया कि उन्हें राष्ट्रीय भाषण में विचारों में गहराती खाई को पाटने के लिए आगे आना होगा और संवाद के लिए आग्रह करना होगा।

द इकोनॉमिस्ट ने अपने हालिया स्तंभों में से एक में प्यू ग्लोबल सर्वेक्षण का जिक्र करते हुए कहा, “यह शायद अप्रियकर हो सकता है, भारत की राजनीतिक व्यवस्था को शायद बड़ी उपलब्धियों के साथ श्रेय दिया जा सके।” सर्वेक्षण में पाया गया कि किसी अन्य लोकतांत्रिक देशों के नागरिकों के मुकाबले भारतीय लोग लोकतंत्र को लेकर कम उत्साहित हैं और मजबूत नेता चाहने या सैन्य शासन की ओर ज्यादा आकर्षित हैं।

लोकतंत्र ने एक विशाल और लगभग असंभव रूप से विविधता वाले देश को एकजुट रखने में मदद की है। इसने सेना को सत्ता से बाहर रखा है और इसने नागरिक स्वतंत्रता को बरकरार रखा है। भारत अपनी लचीली व्यवस्था के कारण ही कई पड़ोसियों के लिए ईष्र्या का विषय बना हुआ है।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

मप्र : विधानसभा चुनाव में निर्णायक होंगे फर्जी मतदाता

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Fake Voter ID

भोपाल, 4 जून | मध्य प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में फर्जी मतदाता बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इसे लेकर कांग्रेस ने चुनाव आयोग के यहां शिकायत दर्ज कराई है। कांग्रेस ने 60 लाख फर्जी मतदाता होने का दावा किया है।

फर्जी मतदाताओं का सबसे पहला और बड़ा खुलासा तो इसी साल के फरवरी माह में शिवपुरी के कोलारस और अशोकनगर के मुंगावली में हुए विधानसभा उपचुनाव के दौरान हुआ था। आगामी चुनाव में राजनीतिक दल और उनके कार्यकर्ता सजग व सर्तक रहे तो चुनाव के नतीजों में बड़े बदलाव की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है।

पिछले माह की नौ मई को आईएएनएस ने सिर्फ शिवपुरी जिले में 60 हजार फर्जी मतदाताओं का खुलासा किया था। इनमें से 21,000 मतदाता ऐसे थे, जिनकी वषरें पहले मौत हो चुकी थी।

इस सूची में 28,067 मतदाता ऐसे हैं, जो दूसरी जगह चले गए, फिर भी सूची में उनके नाम हैं। जिले में अपने स्थान पर अनुपस्थित पाए गए मतदाताओं की संख्या 5,633, और एक से ज्यादा स्थानों पर 5,031 मतदाताओं के नाम पाए गए थे।

गौरतलब है कि फरवरी माह में कोलारस विधानसभा उपचुनाव के दौरान भी यह बात सामने आई थी कि 5,537 मृत मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में मौजूद थे। शिकायत के बाद शिवपुरी के तत्कालीन जिलाधिकारी तरुण राठी को इस मामले में चुनाव आयोग ने लापरवाही का दोषी पाया था।

आयोग ने जांच में पाया था कि जिलाधिकारी तरुण राठी ने सूची में गड़बड़ी पर सही मॉनिटरिंग नहीं की। इसके बाद निर्वाचन आयोग ने मुख्य सचिव बसंत प्रताप सिंह को पत्र भी लिखा था। बाद में राठी का तबादला कर दिया गया।

ऐसे में सवाल उठा कि जब शिवपुरी जिले के पांच विधानसभा क्षेत्रों में 60,000 फर्जी मतदाता अर्थात औसतन एक विधानसभा में 12,000 फर्जी मतदाता हो सकते हैं, तो प्रदेश के 230 विधानसभा क्षेत्रों का क्या हाल होगा। इसी आधार पर कांग्रेस ने विधानसभा की 100 सीटों पर मतदाताओं की स्थिति का पता लगाया, जिसमें औसत तौर पर एक बात सामने आई कि राज्य में 6000,000 फर्जी मतदाता हैं। एक मतदाता की 10 से 20 मतदान केंद्रों की सूची में नाम और तस्वीरें हैं।

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा अन्य नेताओं ने चुनाव आयोग को शिकायत की, जिस पर जांच भी शुरू हो गई है। आयोग ने एक जांच दल भोपाल भी भेजे हैं।

राज्य की मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी सलीना सिंह का कहना है, “जो हुआ है वह नहीं होना चाहिए। इसमें सुधार के लिए हमारी ओर से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। जिला स्तर पर ऐसा सिस्टम बनाने की कोशिश हो रही है, जिसके जरिए एक ही तस्वीर कई स्थानों पर पाए जाने पर उन्हें हटाया जाए। हमारी सबसे मजबूत कड़ी ब्लॉक स्तर का अधिकारी होता है, वह अच्छा काम करेगा, कलेक्टर उस पर निगरानी अच्छे से रखेंगे तो तस्वीरों का दोहराव नहीं होगा।”

राज्य सरकार के सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग ने कहा, “मतदाता सूची में गड़बड़ी है तो उसमें सुधार होना चाहिए, मगर एक सवाल यह भी उठता है कि मतदाता सूची ब्रेक कैसे हुई। ऐसा कौन सा सॉफ्टवेयर आ गया, यह भी जांच का विषय है। इतना तय है कि इससे सरकार या उससे जुड़े लोगों का कोई लेना-देना नहीं है।”

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता महेंद्र सिंह चौहान ने पिछले दिनों चुनाव आयोग से शिकायत की थी कि भोपाल जिले के नरेला विधानसभा क्षेत्र में कई मकान ऐसे हैं, जिनका आकार 1550 से 2000 वर्ग फुट है और वहां 100 से 150 तक मतदाता होना बताया गया है।

राज्य के आगामी विधानसभा चुनाव में फर्जी मतदाता का मसला काफी अहम रहने वाला है, क्योंकि 230 विधानसभा क्षेत्रों में लगभग 50 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां जीत हार का अंतर अधिकतम 5,000 रहता है। इस स्थिति में अगर फर्जी मतदाताओं के नाम काट दिए गए और उनके स्थान पर कोई वोट नहीं डाल पाया तो नतीजे चुनावी तस्वीर बदलने वाले साबित हो सकते हैं।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

राहुल गांधी कर सकते हैं मप्र में मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा : कमलनाथ

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kamal nath

नई दिल्ली, 7 मई | मध्यप्रदेश कांग्रेस के नए अध्यक्ष कमलनाथ का कहना कि पार्टी में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करने की परंपरा नहीं है। मगर, जरूरत पड़ी तो पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर सकते हैं।

कमलनाथ ने कहा कि मध्यप्रदेश के लोग शिवराज सिंह चौहान की सरकार की ‘ठगी’ से नाराज हैं और कांग्रेस ने इस साल के आखिर में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव में उन्हें हराने के लिए कमर कस ली है।

उन्होंने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “बेशक, समय कम है मगर मुझे पक्का विश्वास है कि मैं गांव स्तर पर पार्टी के संगठन को मजबूत बनाने में सक्षम साबित होऊंगा। यह मुकाबला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की संगठन-शक्ति व पैसे की ताकत के साथ है।”

कांग्रेस के 71 वर्षीय वरिष्ठ नेता और छिंदवाड़ा से सांसद कमलनाथ नौ बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। उन्होंने कहा कि आगामी चुनाव के मद्देनजर पार्टी की प्रदेश इकाई में बदलाव संबंधी फैसला बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था। लेकिन वह अब बीती बातों पर नुक्ताचीनी नहीं करना चाहते कि इस संबंध में फैसला पहले क्यों नहीं लिया गया।

पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ को 26 अप्रैल को मध्यप्रदेश कांग्रेस की प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने कहा कि उनका कोई गुट नहीं है और पार्टी के सभी नेताओं से उनके अच्छे रिश्ते हैं।

कमलनाथ की बातों से जाहिर होता है कि विधानसभा चुनाव में खुद उतरने को लेकर उन्होंने अपना विकल्प खुला रखा है। उन्होंने कहा, “मैं 40 साल से चुनाव लड़ता आ रहा हूं। बतौर सांसद मेरा सेवाकाल सबसे लंबा रहा है।”

जब पूछा गया कि क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया विधानसभा चुनाव मैदान में उतरेंगे तो उन्होंने कहा, “मुझे नहीं मालूम।”

मध्यप्रदेश में कांग्रेस द्वारा मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं किए जाने और सिंधिया को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख नियुक्त कर संतुलन कायम किए जाने के संबंध में पूछे गए सवालों पर कमलनाथ ने कहा, “मध्यप्रदेश एक बड़ा राज्य है और यहां कोई एक शख्स चुनाव नहीं जीत सकता। आपको कई चेहरों की जरूरत होती है। यही कारण है कि पार्टी ने ऐसा फैसला लिया है।”

जब पूछा गया कि क्या वह चाहेंगे कि पार्टी मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करे तो उन्होंने कहा कि हर राज्य के लिए अगल रणनीति होती है।

कमलनाथ ने कहा, “कभी-कभी यह जरूरी होता है, जबकि कभी इसकी जरूरत नहीं होती। क्या भाजपा ने उत्तर प्रदेश में किसी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया था? क्या उन्होंने उत्तराखंड में किसी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया? उनका कभी कोई मुख्यमंत्री उम्मीदवार (चुनाव से पूर्व) नहीं था। इसलिए यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है।”

कमलनाथ ने इससे पहले अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि पार्टी को हर राज्य में बताना चाहिए कि वहां उसका नेता कौन है। इसका जिक्र करने पर उन्होंने कहा, “अगर जरूरत महसूस होगी तो कांग्रेस अध्यक्ष किसी के नाम की घोषणा करेंगे।”

कमलनाथ ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख के तौर पर उनकी प्राथमिकता पार्टी को गांव स्तर पर मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा, “चुनाव बहुत मायने में स्थानीय बन गया है और हमें यह समझना होगा।”

कांग्रेस को मध्यप्रदेश में पिछले तीन विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा है। कमलनाथ का आरोप है कि भाजपा पूर्व में किए अपने वादों को पूरा करने में विफल रही है।

पार्टी के प्रदेश प्रमुख के तौर पर अपनी नियुक्ति के संबंध मे कमलनाथ ने कहा, “मेरे सभी से अच्छे रिश्ते हैं। इसलिए मेरे लिए पार्टी में एकता लाना कोई चुनौती नहीं है। मैं भाग्यशाली हूं कि इसकी कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि पार्टी में पहले से ही एकता है।” उन्होंने पार्टी में सिंधिया के साथ किसी भी प्रकार के मतभेद से इनकार किया।

कमलनाथ ने कहा कि उनका मुकाबला अभी वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज से है।

–आईएएनएस

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बदलता जलवायु, गर्माती धरती और पिघलते ग्लेशियर

Lack of Toilets
ब्लॉग3 weeks ago

बुंदेलखंड : ‘लड़कियों वाले गांव’ में शौचालय नहीं

bhadash cafe-min
ज़रा हटके2 weeks ago

भड़ास निकालनी हो तो इस कैफे में जाइए…

राष्ट्रीय3 weeks ago

किसान आंदोलन के पांचवे दिन मंडियों में सब्जियों की कमी से बढ़े दाम

bundelkhand water crisis
ब्लॉग3 weeks ago

बुंदेलखंड में पानी के लिए जान दे रहे जानवर और इंसान

SANJU-
मनोरंजन5 days ago

‘संजू’ में रहमान का गाना ‘रूबी रूबी’ रिलीज

Loveratri Teaser
मनोरंजन2 weeks ago

सलमान के बैनर की लवरात्रि का टीजर रिलीज

Salman khan and sahrukh khan
मनोरंजन2 weeks ago

‘जीरो’ का नया टीजर दर्शकों को ईदी देने को तैयार

soorma
मनोरंजन2 weeks ago

‘सूरमा’ का ट्रेलर रिलीज

Dhadak
मनोरंजन2 weeks ago

जाह्नवी की फिल्म ‘धड़क’ का ट्रेलर रिलीज

मनोरंजन3 weeks ago

सपना के बाद अब इस डांसर का हरियाणा में बज रहा है डंका

sanju-
मनोरंजन3 weeks ago

फिल्म ‘संजू’ का रिलीज हुआ पहला गाना, ‘मैं बढ़िया, तू भी बढ़िया’

race 3
मनोरंजन3 weeks ago

‘रेस 3’ का तीसरा गाना ‘अल्‍लाह दुहाई है’ रिलीज

salman khan
मनोरंजन4 weeks ago

सलमान खान की फिल्म रेस-3 का ‘सेल्फिश’ गाना हुआ रिलीज

राष्ट्रीय1 month ago

दिल्ली से विशाखापट्टनम जा रही आंध्र प्रदेश एक्‍सप्रेस के 4 कोच में लगी आग

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