ओपिनियन

‘यदि सवाल पूछना राष्ट्रद्रोह है तो मैं राष्ट्रद्रोही हूँ’

kapil sibal

नोटबन्दी से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई सवाल ऐसे हैं, जिन्हें मोदी सरकार से पूछना बेहद ज़रूरी है

भक्तों को लगता है कि सिर्फ़ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही भारत के उस भविष्य का प्रतिनिधित्व करते हैं जो दमदार, बेबाक़ और सख़्त है। भक्तों को लगता है कि जो मोदी की वाहवाही नहीं करता वो राष्ट्रद्रोही है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भक्तों ने नोटबन्दी का ऐसे गुणगान किया मानो वो काले धन के ख़िलाफ़ राम-बाण साबित हुआ है। ऐसा दिखाया गया कि नोटबन्दी से रईसों पर गाज़ गिरी जबकि ग़रीब उससे बेहद ख़ुश थे। कहा गया कि नोटबन्दी से दीर्घकाल में बहुत फ़ायदा होगा। भक्तों ने फ़ैलाया कि सीमा पर ऐसा धावा बोला गया, जैसा पहले कभी नहीं हुआ। इसे सर्ज़िकल हमले का नाम दिया गया। रणनीति बनी कि समाज के मौजूदा चुनौतियों के लिए भारत के अतीत, उसके नायकों और उनकी नीतियों को कोसते रहो।

देश के भीतर हिन्दुत्व और इसकी मानसिकता होनी ही चाहिए। किसी भी क़ीमत पर गौ-माता का संरक्षण होना ही चाहिए। जो लोग पशुओं के व्यापार से जुड़े हैं उन्हें शक़ की नज़रों से देखा ही जाना चाहिए। मौक़ा पाते ही किसी सबूत के बग़ैर उनके साथ मार-पीट की जाएगी या उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाएगा। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तो ये है कि पीड़ित को अपराध का आरोपी तथा हमलावर को प्रताड़ित बनाकर पेश किया जाएगा। गौरक्षकों के उन्मादी हमलों के वक़्त यदि पुलिस मौजूद भी रहेगी तो उसे हालात से नज़रें फेरना पड़ेगा।

देश के बाहर से जुड़े मोर्चों पर फ़ैलाया जाएगा कि पुरानी विदेश नीति पाषाणकालीन थी। चीन को उसकी औक़ात दिखाने की बातें होंगी। मोदी की पाकिस्तान नीति की स्तुति की जाएगी। मोदी के गले मिलने की सराहना होगी। यदि वो बातचीत से इनकार करें तो इसकी प्रशंसा होगी। हर तरह से मोदी को सटीक ठहराया जाएगा। पठानकोट, गुरुदासपुर और उरी के लिए पाकिस्तान की बदमाशियों को ज़िम्मेदार बताया जाएगा। लेकिन यदि आप इसे लेकर कोई सवाल खड़े करें तो आपको पाकिस्तान-समर्थक बताया जाएगा। सोशल मीडिया पर आपका चरित्र-हनन किया जाएगा। यही मेरा भारत है। इसमें मुझ पर दूसरे ग्रह के प्राणी यानी एलियन होने का ठप्पा लगाया जाएगा, वो भी सिर्फ़ इसलिए कि मैं भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थकों की नीतियों से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता।

नोटबन्दी का हादसा

कदाचित, नोटबन्दी तो आज़ाद हिन्दुस्तान का सबसे शर्मनाक घोटाला बन गया। इस जन-विरोधी क़दम को बग़ैर पर्याप्त तैयारियों के लागू किया गया। नोटबन्दी के वक़्त अमीरों को कोई थाम नहीं सका, जबकि ग़रीब क़तारों में खड़े रहे। रातों-रात 86 फ़ीसदी रुपये बेकार होने से अर्थतंत्र ठप पड़ गया। लोगों को रोज़मर्रा की ज़रूरतों से लिए रुपये नहीं मिले। क़रीब सौ लोग बेमौत मारे गये। ज़्यादातर एटीएम महीनों तक अपडेट नहीं हो सके। इसमें कोई शक़ नहीं कि नोटबन्दी जैसा फ़ैसला बग़ैर अपेक्षित तैयारियों के लिया गया। भारतीय रिज़र्व बैंक को भी रोज़ाना बदले जा रहे नियमों की ख़बर नहीं थी। खेतीबाड़ी, रोज़गार, व्यापार और कारोबार के लिए सभी का दम निकलने लगा। नकदी की किल्लत की वजह से करोड़ों लोगों को रोज़गार से हाथ धोना पड़ा।

नोटबन्दी उन तीनों मोर्चों पर बुरी तरह विफल साबित हुई, जिसका ज़िक्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया था। आतंकवाद का पतन नहीं हुआ। जाली नोट प्रचलन में आ गये। यहाँ तक कि धीमी रफ़्तार से ही सही, काला धन फिर से अपने पैर पसार रहा है। लेकिन इन तमाम तथ्यों को लेकर जो नोटबन्दी की आलोचना करे, उसे राष्ट्रद्रोही बताया जाता है। मैं इसका आलोचक हूँ। यदि ये राष्ट्रद्रोह है तो हुआ करे!

सैनिक कार्रवाई आक्रामक होती है। यदि ये सफल है तो इससे रोग का उपचार होना ही चाहिए। लेकिन यदि बीमारी बरकरार रहती है तो फिर कोई वजह नहीं हो सकती कि उसके लिए अपनी वाहवाही की जाए। सैनिक कार्रवाई की तारीफ़ तो होनी ही चाहिए, लेकिन इस बात की समीक्षा भी होनी चाहिए कि उससे हासिल क्या हुआ? सैन्य कार्रवाई के महानिदेशक लेफ़्टिनेंट जनरल रणबीर सिंह के मुताबिक़, नियंत्रण रेखा के उस पार बड़ी संख्या में आतंकवादी मौजूद हैं। वो जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ के लिए तैयार हैं। इससे साबित होता है कि सितम्बर 2016 में हुए सर्ज़िकल हमले से क्या हासिल हुआ?

नवम्बर में 16 कोर के नगरोटा स्थित मुख्यालय पर भारी हथियारों से लैस आतंकवादियों के हमले में एक मेज़र समेत सात सैनिकों का शहीद होना, ये बताने के लिए काफ़ी था कि आतंकवाद का ख़तरा किस शिद्दत से क़ायम है! सर्ज़िकल हमले के बाद के घटनाक्रम में नियंत्रण रेखा पर तनाव इतना ज़्यादा बढ़ता चला गया कि हमारे सैनिकों और नागरिकों को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया गया। काफ़ी सैनिक और नागरिकों की मौत भी हुई। इससे साफ़ है कि सर्ज़िकल हमले ने घुसपैठियों के लिए कोई ख़ौफ़ नहीं पैदा किया। लेकिन यदि कोई इनकी कामयाबी पर सवाल खड़े करे तो भगवा भक्त-मंडली उस पर पाकिस्तान का समर्थक और राष्ट्रद्रोही होने के ठप्पा लगा देते हैं। इसीलिए यदि ये राष्ट्रद्रोह है तो हुआ करे!

दलितों और मुसलमानों की हत्या

कथित गोरक्षा के नाम पर दलितों और मुसलमानों को पीट-पीटकर मार डालने की घटनाएँ पूरे देश के लिए शर्मनाक हैं। ये गोरक्षक ऐसे स्वयंसेवक हैं जो हिन्दू अधिकारों के स्व-नियुक्त राजदूत बन गये हैं। इन्हें सरकार और प्रशासन का मौन समर्थन हासिल है। पिछले साल अगस्त में प्रधानमंत्री मोदी ने इन्हें धिक्कारा था। उससे भी कुछ नहीं बदला। इन गौरक्षकों के ख़िलाफ़ जब प्रदर्शन होने लगे तो प्रधानमंथी मोदी फिर से जुबान खोलने के लिए मज़बूर हुए। हालाँकि, उनके शब्द खोखले ही साबित हुए। ये मोदी ही थे जिन्होंने अपनी चुनावी रैलियों में गोरक्षा और ‘पिंक रिवोल्युशन’ यानी माँस आधारित अर्थव्यवस्था पर ख़ूब भाषणबाज़ी की थी। लेकिन उनके धिक्कारने के बावजूद झारखंड के रामगढ़ में अलीमुद्दीन अंसारी का इसलिए पीट-पीटकर मार डाला गया कि उसके वाहन में कथित तौर पर गौमाँस था। वाहन को भी आग लगा दी गयी। मोदी को अच्छी तरह से मालूम है कि नफ़रत की ऐसी सियासत की बदौलत ही उन्होंने उत्तर प्रदेश का चुनाव जीता है। उन्मादी गौरक्षकों की जड़ों में भी यही नफ़रत है। इसे रोकने के लिए सिर्फ़ कथनी से बात नहीं बनेगी, ज़रूरत करनी की है। लेकिन यदि कोई इसे लेकर सरकार की आलोचना करता है तो उसे गौहत्या का समर्थक, हिन्दू-विरोधी और राष्ट्रद्रोही बनाकर पेश किया जाता है। अब यदि यही सही है, तो हुआ करे!

दिशाहीन विदेश नीति

मोदी की पाकिस्तान नीति में कोई निरन्तरता नहीं है। कभी बहुत गर्मजोशी से हाथ मिलाया जाता है। कभी अचानक लाहौर में क़दम ठिठक पड़ते हैं, तो कभी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की शक़्ल भी नहीं देखते। इसीलिए विदेश नीति से जुड़े हमारे अधिकारियों को ऐसी दोहरी सोच वाली सरकार के इरादों को लेकर संघर्ष करना पड़ता है। पाकिस्तान को लेकर भारत में गहरी नफ़रत है। ऐसी धारणा सैनिक तैयारियों के लिहाज़ से तो ज़रूरी हो सकती है, लेकिन मोदी की पाकिस्तान नीति की आलोचना भक्तों को कतई गवारा नहीं। यही आलम तब भी रहता है जब कोई सीमापार से हो रहे घुसपैठ, पठानकोट और उरी में हुई शहादत और सुरक्षा में सेंध का सवाल उठाता है। गुरुदासपुर में क्या हुआ था, उससे अभी तक पर्दा क्यों नहीं उठा? अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर मौजूद पठानकोट वायु सेना स्टेशन को उड़ा देने की कोशिश कैसे सफ़ल हो गयी?

पठानकोट हमले को लेकर संसदीय समिति ने कहा है कि “…आतंकवादियों को तस्करों के गिरोह से मिली मदद की आशंकाओं का ख़ारिज़ नहीं जा सकता।” राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने अदालत में आरोप-पत्र अवश्य दाख़िल किया है, लेकिन अब भी कई सवालों के जवाब अपेक्षित हैं। हमारी आतंकवाद विरोधी संस्थाएँ क्यों सोती हुई पायी गयीं? क्यों हमारे सुरक्षा बलों को अपने वायुसैनिक अड्डे को सुरक्षित बनाने में तीन दिन लग गये? पाकिस्तान की ओर से जवाबी कार्रवाई को सुनिश्चित किये बग़ैर पाकिस्तानी अफ़सरों को पठानकोट वायुसेना स्टेशन का दौरा क्यों करने दिया गया? क्यों संयुक्त जाँच दल की आड़ में पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी, इंटर सर्विसेज़ इंटेलिजेंस (आईएसएस) के अफ़सर को भी पठानकोट आने दिया गया? उरी में भी लश्कर-ए-तोएबा के आतंकियों ने 19 सैनिकों की हत्या कर दी थी।

तो क्या जनता को पठानकोट और उरी में सुरक्षा तंत्र की ख़ामियों के बारे में सवाल करने का हक़ नहीं होना चाहिए? क्या ऐसा करना राष्ट्रद्रोह है, जिसके लिए भक्तों की ओर से पाकिस्तान समर्थक होने का ठप्पा लगाया जाए? भारत का नागरिक होने के नाते मैं तो अपनी सरकार से उसकी नीतियों और उसके क्रियान्वयन को लेकर सवाल पूछता रहूँगा। अब यदि कोई इसके लिए मुझ पर राष्ट्रद्रोही होने का आरोप लगाये, तो लगाता रहे!

 

(The writer, a senior Congress leader, is former Union Law Minister and a lawyer)

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(अख़बार ‘द हिन्दू’ से साभार।)

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