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ओपिनियन

‘यदि सवाल पूछना राष्ट्रद्रोह है तो मैं राष्ट्रद्रोही हूँ’

नोटबन्दी से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई सवाल ऐसे हैं, जिन्हें मोदी सरकार से पूछना बेहद ज़रूरी है

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kapil sibal

भक्तों को लगता है कि सिर्फ़ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही भारत के उस भविष्य का प्रतिनिधित्व करते हैं जो दमदार, बेबाक़ और सख़्त है। भक्तों को लगता है कि जो मोदी की वाहवाही नहीं करता वो राष्ट्रद्रोही है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भक्तों ने नोटबन्दी का ऐसे गुणगान किया मानो वो काले धन के ख़िलाफ़ राम-बाण साबित हुआ है। ऐसा दिखाया गया कि नोटबन्दी से रईसों पर गाज़ गिरी जबकि ग़रीब उससे बेहद ख़ुश थे। कहा गया कि नोटबन्दी से दीर्घकाल में बहुत फ़ायदा होगा। भक्तों ने फ़ैलाया कि सीमा पर ऐसा धावा बोला गया, जैसा पहले कभी नहीं हुआ। इसे सर्ज़िकल हमले का नाम दिया गया। रणनीति बनी कि समाज के मौजूदा चुनौतियों के लिए भारत के अतीत, उसके नायकों और उनकी नीतियों को कोसते रहो।

देश के भीतर हिन्दुत्व और इसकी मानसिकता होनी ही चाहिए। किसी भी क़ीमत पर गौ-माता का संरक्षण होना ही चाहिए। जो लोग पशुओं के व्यापार से जुड़े हैं उन्हें शक़ की नज़रों से देखा ही जाना चाहिए। मौक़ा पाते ही किसी सबूत के बग़ैर उनके साथ मार-पीट की जाएगी या उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाएगा। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तो ये है कि पीड़ित को अपराध का आरोपी तथा हमलावर को प्रताड़ित बनाकर पेश किया जाएगा। गौरक्षकों के उन्मादी हमलों के वक़्त यदि पुलिस मौजूद भी रहेगी तो उसे हालात से नज़रें फेरना पड़ेगा।

देश के बाहर से जुड़े मोर्चों पर फ़ैलाया जाएगा कि पुरानी विदेश नीति पाषाणकालीन थी। चीन को उसकी औक़ात दिखाने की बातें होंगी। मोदी की पाकिस्तान नीति की स्तुति की जाएगी। मोदी के गले मिलने की सराहना होगी। यदि वो बातचीत से इनकार करें तो इसकी प्रशंसा होगी। हर तरह से मोदी को सटीक ठहराया जाएगा। पठानकोट, गुरुदासपुर और उरी के लिए पाकिस्तान की बदमाशियों को ज़िम्मेदार बताया जाएगा। लेकिन यदि आप इसे लेकर कोई सवाल खड़े करें तो आपको पाकिस्तान-समर्थक बताया जाएगा। सोशल मीडिया पर आपका चरित्र-हनन किया जाएगा। यही मेरा भारत है। इसमें मुझ पर दूसरे ग्रह के प्राणी यानी एलियन होने का ठप्पा लगाया जाएगा, वो भी सिर्फ़ इसलिए कि मैं भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थकों की नीतियों से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता।

नोटबन्दी का हादसा

कदाचित, नोटबन्दी तो आज़ाद हिन्दुस्तान का सबसे शर्मनाक घोटाला बन गया। इस जन-विरोधी क़दम को बग़ैर पर्याप्त तैयारियों के लागू किया गया। नोटबन्दी के वक़्त अमीरों को कोई थाम नहीं सका, जबकि ग़रीब क़तारों में खड़े रहे। रातों-रात 86 फ़ीसदी रुपये बेकार होने से अर्थतंत्र ठप पड़ गया। लोगों को रोज़मर्रा की ज़रूरतों से लिए रुपये नहीं मिले। क़रीब सौ लोग बेमौत मारे गये। ज़्यादातर एटीएम महीनों तक अपडेट नहीं हो सके। इसमें कोई शक़ नहीं कि नोटबन्दी जैसा फ़ैसला बग़ैर अपेक्षित तैयारियों के लिया गया। भारतीय रिज़र्व बैंक को भी रोज़ाना बदले जा रहे नियमों की ख़बर नहीं थी। खेतीबाड़ी, रोज़गार, व्यापार और कारोबार के लिए सभी का दम निकलने लगा। नकदी की किल्लत की वजह से करोड़ों लोगों को रोज़गार से हाथ धोना पड़ा।

नोटबन्दी उन तीनों मोर्चों पर बुरी तरह विफल साबित हुई, जिसका ज़िक्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया था। आतंकवाद का पतन नहीं हुआ। जाली नोट प्रचलन में आ गये। यहाँ तक कि धीमी रफ़्तार से ही सही, काला धन फिर से अपने पैर पसार रहा है। लेकिन इन तमाम तथ्यों को लेकर जो नोटबन्दी की आलोचना करे, उसे राष्ट्रद्रोही बताया जाता है। मैं इसका आलोचक हूँ। यदि ये राष्ट्रद्रोह है तो हुआ करे!

सैनिक कार्रवाई आक्रामक होती है। यदि ये सफल है तो इससे रोग का उपचार होना ही चाहिए। लेकिन यदि बीमारी बरकरार रहती है तो फिर कोई वजह नहीं हो सकती कि उसके लिए अपनी वाहवाही की जाए। सैनिक कार्रवाई की तारीफ़ तो होनी ही चाहिए, लेकिन इस बात की समीक्षा भी होनी चाहिए कि उससे हासिल क्या हुआ? सैन्य कार्रवाई के महानिदेशक लेफ़्टिनेंट जनरल रणबीर सिंह के मुताबिक़, नियंत्रण रेखा के उस पार बड़ी संख्या में आतंकवादी मौजूद हैं। वो जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ के लिए तैयार हैं। इससे साबित होता है कि सितम्बर 2016 में हुए सर्ज़िकल हमले से क्या हासिल हुआ?

नवम्बर में 16 कोर के नगरोटा स्थित मुख्यालय पर भारी हथियारों से लैस आतंकवादियों के हमले में एक मेज़र समेत सात सैनिकों का शहीद होना, ये बताने के लिए काफ़ी था कि आतंकवाद का ख़तरा किस शिद्दत से क़ायम है! सर्ज़िकल हमले के बाद के घटनाक्रम में नियंत्रण रेखा पर तनाव इतना ज़्यादा बढ़ता चला गया कि हमारे सैनिकों और नागरिकों को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया गया। काफ़ी सैनिक और नागरिकों की मौत भी हुई। इससे साफ़ है कि सर्ज़िकल हमले ने घुसपैठियों के लिए कोई ख़ौफ़ नहीं पैदा किया। लेकिन यदि कोई इनकी कामयाबी पर सवाल खड़े करे तो भगवा भक्त-मंडली उस पर पाकिस्तान का समर्थक और राष्ट्रद्रोही होने के ठप्पा लगा देते हैं। इसीलिए यदि ये राष्ट्रद्रोह है तो हुआ करे!

दलितों और मुसलमानों की हत्या

कथित गोरक्षा के नाम पर दलितों और मुसलमानों को पीट-पीटकर मार डालने की घटनाएँ पूरे देश के लिए शर्मनाक हैं। ये गोरक्षक ऐसे स्वयंसेवक हैं जो हिन्दू अधिकारों के स्व-नियुक्त राजदूत बन गये हैं। इन्हें सरकार और प्रशासन का मौन समर्थन हासिल है। पिछले साल अगस्त में प्रधानमंत्री मोदी ने इन्हें धिक्कारा था। उससे भी कुछ नहीं बदला। इन गौरक्षकों के ख़िलाफ़ जब प्रदर्शन होने लगे तो प्रधानमंथी मोदी फिर से जुबान खोलने के लिए मज़बूर हुए। हालाँकि, उनके शब्द खोखले ही साबित हुए। ये मोदी ही थे जिन्होंने अपनी चुनावी रैलियों में गोरक्षा और ‘पिंक रिवोल्युशन’ यानी माँस आधारित अर्थव्यवस्था पर ख़ूब भाषणबाज़ी की थी। लेकिन उनके धिक्कारने के बावजूद झारखंड के रामगढ़ में अलीमुद्दीन अंसारी का इसलिए पीट-पीटकर मार डाला गया कि उसके वाहन में कथित तौर पर गौमाँस था। वाहन को भी आग लगा दी गयी। मोदी को अच्छी तरह से मालूम है कि नफ़रत की ऐसी सियासत की बदौलत ही उन्होंने उत्तर प्रदेश का चुनाव जीता है। उन्मादी गौरक्षकों की जड़ों में भी यही नफ़रत है। इसे रोकने के लिए सिर्फ़ कथनी से बात नहीं बनेगी, ज़रूरत करनी की है। लेकिन यदि कोई इसे लेकर सरकार की आलोचना करता है तो उसे गौहत्या का समर्थक, हिन्दू-विरोधी और राष्ट्रद्रोही बनाकर पेश किया जाता है। अब यदि यही सही है, तो हुआ करे!

दिशाहीन विदेश नीति

मोदी की पाकिस्तान नीति में कोई निरन्तरता नहीं है। कभी बहुत गर्मजोशी से हाथ मिलाया जाता है। कभी अचानक लाहौर में क़दम ठिठक पड़ते हैं, तो कभी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की शक़्ल भी नहीं देखते। इसीलिए विदेश नीति से जुड़े हमारे अधिकारियों को ऐसी दोहरी सोच वाली सरकार के इरादों को लेकर संघर्ष करना पड़ता है। पाकिस्तान को लेकर भारत में गहरी नफ़रत है। ऐसी धारणा सैनिक तैयारियों के लिहाज़ से तो ज़रूरी हो सकती है, लेकिन मोदी की पाकिस्तान नीति की आलोचना भक्तों को कतई गवारा नहीं। यही आलम तब भी रहता है जब कोई सीमापार से हो रहे घुसपैठ, पठानकोट और उरी में हुई शहादत और सुरक्षा में सेंध का सवाल उठाता है। गुरुदासपुर में क्या हुआ था, उससे अभी तक पर्दा क्यों नहीं उठा? अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर मौजूद पठानकोट वायु सेना स्टेशन को उड़ा देने की कोशिश कैसे सफ़ल हो गयी?

पठानकोट हमले को लेकर संसदीय समिति ने कहा है कि “…आतंकवादियों को तस्करों के गिरोह से मिली मदद की आशंकाओं का ख़ारिज़ नहीं जा सकता।” राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने अदालत में आरोप-पत्र अवश्य दाख़िल किया है, लेकिन अब भी कई सवालों के जवाब अपेक्षित हैं। हमारी आतंकवाद विरोधी संस्थाएँ क्यों सोती हुई पायी गयीं? क्यों हमारे सुरक्षा बलों को अपने वायुसैनिक अड्डे को सुरक्षित बनाने में तीन दिन लग गये? पाकिस्तान की ओर से जवाबी कार्रवाई को सुनिश्चित किये बग़ैर पाकिस्तानी अफ़सरों को पठानकोट वायुसेना स्टेशन का दौरा क्यों करने दिया गया? क्यों संयुक्त जाँच दल की आड़ में पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी, इंटर सर्विसेज़ इंटेलिजेंस (आईएसएस) के अफ़सर को भी पठानकोट आने दिया गया? उरी में भी लश्कर-ए-तोएबा के आतंकियों ने 19 सैनिकों की हत्या कर दी थी।

तो क्या जनता को पठानकोट और उरी में सुरक्षा तंत्र की ख़ामियों के बारे में सवाल करने का हक़ नहीं होना चाहिए? क्या ऐसा करना राष्ट्रद्रोह है, जिसके लिए भक्तों की ओर से पाकिस्तान समर्थक होने का ठप्पा लगाया जाए? भारत का नागरिक होने के नाते मैं तो अपनी सरकार से उसकी नीतियों और उसके क्रियान्वयन को लेकर सवाल पूछता रहूँगा। अब यदि कोई इसके लिए मुझ पर राष्ट्रद्रोही होने का आरोप लगाये, तो लगाता रहे!

 

(The writer, a senior Congress leader, is former Union Law Minister and a lawyer)

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(अख़बार ‘द हिन्दू’ से साभार।)

ओपिनियन

विपक्षी दलों को साझा उम्मीदवार उतारना चाहिए : सलमान खुर्शीद

राहुल गांधी पार्टी में बदलाव लाएंगे और वह कांग्रेस को नया स्वरूप देंगे।

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Salman Khurshid

वरिष्ठ कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद का कहना है कि विपक्षी दलों को अगले लोकसभा चुनाव में साथ मिलकर सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के खिलाफ प्रत्येक चुनाव क्षेत्र में अपना साझा उम्मीदवार उतारना चाहिए। इसके लिए उनके बीच गठबंधन पर बातचीत पहले शुरू होनी चाहिए, जिससे सभी दलों के कार्यकर्ता आपस में तालमेल बैठा सकें।

सलमान खुर्शीद ने आईएएनएस को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि जाहिर है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी की पसंद हैं, लेकिन किसी प्रकार की घोषणा के लिए विपक्षी दलों के साथ गठबंधन की बातचीत के नतीजों का इंतजार करना होगा।

खुर्शीद का मानना है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले राजग के खिलाफ समान विचार वाले विपक्षी दलों को एक साथ लाने के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की अध्यक्ष सोनिया गांधी सबसे उत्तम व्यक्ति हैं।

खुर्शीद ने कहा, “जहां तक मेरा और हमारी पार्टी की बात है, तो पसंद जाहिर है। लेकिन वृहत सहयोग व गठबंधन की स्थिति में तो यह होना चाहिए कि गठबंधन बनने तक हम प्रतीक्षा करें। लेकिन हमारे लिए बिल्कुल स्पष्ट है कि राहुल गांधी ही वह शख्सियत हैं, जो इस कार्य के लिए उपयुक्त हैं और वह हमारा नेतृत्व करेंगे।”

पूर्व केंद्रीय मंत्री से जब पूछा गया कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ 2019 के आम चुनाव में विपक्ष की ओर से किसी प्रधानमंत्री उम्मीदवार की घोषणा होनी चाहिए, तो उन्होंने कहा कि मोदी की विश्वसनीयता काफी घट गई है।

सलमान खुर्शीद की हाल ही में आई किताब ‘ट्रिपल तलाक : एग्जामिनिंग फेथ’ में उन्होंने तीन तलाक के मसले पर सवाल उठाया है।

उन्होंने कहा, “जहां तक मोदीजी का सवाल है, तो उनकी विश्वसनीयता में काफी कमी आई है, लेकिन मैं यह नहीं कहता कि यह गिरावट अभी पर्याप्त है। गिरावट लगातार जारी है।

राजग के खिलाफ विपक्षी एकता की संभावना के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “इस समय यह कहना कठिन है, लेकिन अगर गठबंधन नहीं बनता है तो मौका गंवाने का हमें खेद रहेगा।” उन्होंने कहा कि भिन्न-भिन्न स्तरों पर बातचीत चल रही है।

खुर्शीद ने कहा, “सभी दल मान रहे हैं कि भारत के इतिहास के लिए यह बेहद अहम व क्रांतिकारी परिवर्तन का दौर है। मेरा मानना है कि बीती बातों को भुला देना चाहिए। लेकिन इसके लिए अभी कदम उठाने होंगे। कुछ लोगों को धीरे-धीरे ऐसी पहल शुरू कर देनी चाहिए। मैं नहीं बता सकता कि वह शख्सियत कौन होंगे और कौन इस काम को अंजाम देंगे। लेकिन धीरे-धीरे बातचीत चल रही है।”

विपक्षी दलों को एकजुट करने में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अहम भूमिका होने की संभावना के बावत पूछे जाने पर खुर्शीद ने कहा कि वही नहीं, कोई और भी यह काम कर सकता है।

उन्होंने कहा कि राहुल गांधी पार्टी में बदलाव लाएंगे और वह कांग्रेस को नया स्वरूप देंगे।

पूर्व विदेश मंत्री ने माना कि पूर्वोत्तर के प्रांत त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है, लेकिन उन्होंने अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों में पार्टी की बेहतर स्थिति रहने की संभावना जताई।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

हिंदू चरमपंथियों को परोक्ष रूप से बढ़ावा दे रही है सरकार : रामानुन्नी

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Ramanunney

साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखक के. पी. रामानुन्नी का कहना है कि भाजपानीत केंद्रीय सरकार अप्रत्यक्ष रूप से हिंदू सांप्रदायिक चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई करने से बच रही है और उन्हें बढ़ावा दे रही है। इस वजह से देश में अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना बढ़ी है।

रामानुन्नी ने आईएएनएस के साथ एक साक्षात्कार में कहा, “(केंद्रीय) सरकार हिंदू सांप्रदायिक चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही है। वह इस मुद्दे से बच रही है। यह अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देने जैसा है।”

उन्होंने कहा, “जब बात अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार की आती है तो वे (सरकार) कानून के तहत सख्त कदम नहीं उठाते हैं। अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं।”

मलयालम भाषा के लेखक रामानुन्नी पिछले सप्ताह सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने अपनी साहित्य अकदामी पुरस्कार की इनामी राशि लेने के कुछ ही मिनटों बाद उसे जुनैद खान की मां को दे दिया था। 16 वर्षीय जुनैद की जून 2017 में एक ट्रेन के अंदर लोगों के एक समूह ने हत्या कर दी थी।

उन्होंने इनाम राशि में से केवल तीन रुपये अपने पास रखे और बाकी के एक लाख रुपये जुनैद की मां सायरा बेगम को दे दिए थे।

रामानुन्नी ने आईएएनएस से कहा, “सांप्रदायिक घृणा कैंसर की तरह है और जब यह हो जाता है तो इसे रोक पाना बहुत मुश्किल होता है।”

यह पूछने पर कि क्या आपको लगता है कि सांप्रदायिक घटनाएं वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद बढ़ गई हैं, उन्होंने कहा, ‘हां।’

उन्होंने कहा, “वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद कई सांप्रदायिक मुद्दे उठे हैं। जब मैं सांप्रदायिक कहता हूं तो मेरा दोनों पक्षों से मतलब नहीं होता, यह अधिकतर हिंदू समुदाय के लिए है जो मुस्लिमों के साथ असहिष्णुता बरत रहे हैं।”

उन्होंने कहा कि सरकार इन सांप्रदायिक झगड़ों को समाप्त करने का प्रयास नहीं कर रही और एक दर्शक की तरह बर्ताव कर रही है। उन्होंने कहा कि वर्तमान हालात राष्ट्र के हित के लिए खराब हैं।

रामानुन्नी के साहित्यिक काम सांप्रदायिक सद्धभाव के उनके संदेश के लिए जानें जाते हैं। उनकी किताब ‘दैवाथिंते पुस्तकम’ (ईश्वर की अपनी पुस्तक) के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार 2017 मिला है।

जब उनसे यह पूछा गया कि उन्होंने अपनी इनाम की राशि जुनैद की मां को क्यों दी, तो उन्होंने कहा, “यह दान नहीं है। अगर ऐसा होता तो मैं जुनैद की मां को उनके घर जाकर यह देता। जब आप यह साहित्य अकादमी के मंच पर दे रहे हैं तो इसके कई मायने हैं। यह अन्य लेखकों को अत्याचारों के बारे में लिखने के लिए प्रोत्साहित करेगा और दूसरे हिंदुओं को बताएगा कि असली और सच्चे हिंदू सिद्धांतों के मुताबिक आपको सांप्रदायिक नहीं होना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि जुनैद की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि वह मुस्लिम था और यह सच्ची और असली हिंदू संस्कृति के लिए शर्मनाक है।

रामानुन्नी को जुलाई 2017 में उनका दाहिना हाथ काटने की धमकी मिली थी। उन्होंने कहा कि इस तरह की बातें लेखक के दिमाग को जकड़ देती हैं।

उन्होंने कहा, “बहुत से लोगों ने मुझसे पूछा कि क्या मैं सांप्रदायिक एकता पर लिखना बंद कर दूंगा। मैंने उनसे कहा कि नहीं। यह आत्महत्या करने जैसा होगा। एक लेखक के लिए अपना पक्ष नहीं जाहिर करना आत्महत्या के समान है।”

लेखक ने कहा, “हालांकि यह भी सही है कि आप यह सब कहते तो हैं, लेकिन जब आपको धमकियां मिलती हैं तो कई लोगों का अवचेतन मन उन्हें सब कुछ कहने से रोकता है। यह एक तरह से किसी को परोक्ष रूप से नियंत्रित करना है। धमकियां लोगों में यह डर पैदा करती हैं। यह तथ्य है।”

इंटरनेट के आज के दौर में किताबों के बारे में पूछने पर रामानुन्नी ने कहा कि पढ़ने की गुणवत्ता पिछले कुछ सालों में कम हुई है। उन्होंने कहा कि पढ़ने में लोग अब उस तरह का आनंद नहीं लेते जैसे पहले लिया जाता था। पढ़ने की आदत मरी तो नहीं है लेकिन इसकी गुणवत्ता घटी है।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

बात महात्मा गांधी की, काम उसके ठीक उलट : राजगोपाल

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Gandhi Ji

भोपाल, 26 जनवरी | एकता परिषद के संस्थापक पी.वी. राजगोपाल का कहना है कि देश के 69वें गणतंत्र दिवस पर सभी राजनेता महात्मा गांधी के आदर्शो को अपनाने और उस पर चलने की बात तो कर रहे हैं, मगर उस पर अमल नहीं होगा।

यही कारण है कि राष्ट्रीय पर्व के बावजूद गरीब को गड्ढ़ा खोदकर, पसीना बहाकर रोटी का इंतजाम करना पड़ रहा होगा।

Image result for एकता परिषद के संस्थापक पी.वी. राजगोपाल

एकता परिषद के संस्थापक और गांधीवादी नेता डॉ. पी.वी. राजगोपाल

राजगोपाल को अभी हाल ही में पुणे में आयोजित ‘छात्र संसद’ में कृषि योद्धा पुरस्कार दिया गया। उन्होंने गणतंत्र दिवस के मौके पर आईएएनएस से दूरभाष पर बातचीत करते हुए कहा, “संविधान में आम आदमी को मतदान का अधिकार दिया गया तब भी बात उठी थी कि आर्थिक अधिकार भी मिलना चाहिए। तब ऐसा नहीं हो पाया। उसी का नतीजा है कि तमाम अध्ययन बता रहे हैं कि इस देश की 73 फीसदी संपत्ति पर सिर्फ एक फीसदी लोगों का अधिकार है और शेष लोग रोज कमाने खाने में अपनी जिंदगी निकाल देते हैं।

राजगोपाल ने कहा, “गणतंत्र दिवस हो या स्वाधीनता दिवस या अन्य राष्ट्रीय पर्व हर मौके पर राजनेता और सरकारें महात्मा गांधी को याद करते हैं। आज भी ऐसा हुआ मगर यह सिर्फ बातें ही हैं, इन बातों पर आजादी के बाद आज तक अमल नहीं हुआ, अगर अमल हुआ होता तो देश में इतनी आर्थिक विषमता नहीं होती।”

महात्मा गांधी की भावना और संदेशों का जिक्र करते हुए राजगोपाल ने कहा, “गांधी ने कहा था कि आप जो भी योजनाएं बनाएं, अंतिम व्यक्ति को अपनी नजर में रखें, अंतिम व्यक्ति को ताकतवर बनाएंगे तभी आपको यह कहने का अधिकार है कि हमने विकास किया। एक बार फिर गांधी को याद करने और उनके बताए मार्ग पर चलने का समय आ गया है।”

एक सवाल के जवाब में राजगोपाल ने कहा, “वास्तव में अंतिम व्यक्ति को सक्षम और ताकतवर बनाना है तो योजनाएं गांव के स्तर पर बनानी होगी, दिल्ली या भोपाल से बनी योजनाएं गांव की हालत नहीं बदल सकती। अभी हाल ही में ‘सस्टेनेवल गोल’ में भारत सरकार ने वर्ष 2030 तक देश में गरीबी खत्म करने का वादा किया है मगर जब तक लोगों को जमीन नहीं मिलेगी, काम नहीं मिलेगा, जीने के संसाधन नहीं मिलेंगे, सम्मान को बढ़ाएंगे नहीं, तो गरीबी मिटाएंगे कैसे। गरीबी मिटाने का काम पलभर में तो नहीं होगा।”

उन्होंने कहा, “गांव के सारे संसाधन जमीन, खदान, जंगल जब सरकारें पूंजीपतियों को देगी और गांव वालों को धक्का मारकर झुग्गी-झोपड़ी में रहने को मजबूर करेंगी तो सवाल उठता है कि आखिर गरीबी दूर होगी कैसे।”

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सहरिया आदिवासियों को एक हजार रुपये प्रतिमाह दिए जाने की घोषणा पर राजगोपाल ने कहा कि हजार दो हजार रुपयों से इन परिवारों का क्या होगा। जब तक गांव स्तर पर योजना नहीं बनेगी उनकी जरूरतों को ध्यान नहीं रखा जाएगा तब तक गांव की स्थिति और गरीबी खत्म नहीं हो सकती। उन गांव के पंच और सरपंचों को प्रोत्साहित करना होगा जो गरीबी मिटाने और गांव को संपन्न बनाने की कोशिश करें। इसके लिए प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित करना होगी, जैसी रेलवे प्लेटफॉर्म की सफाई को लेकर प्रतिस्पर्धा का दौर चल रहा है और अच्छे स्टेशन पुरस्कृत किए जा रहे हैं।

राजगोपाल का मानना है कि गांव के विकास की जिम्मेदारी पंचायतों को सौंपनी चाहिए। सरकार अपने स्तर पर हालात नहीं बदल सकती है। वर्तमान में जो चल रहा है उससे न तो गरीबी खत्म होगी और न ही भ्रष्टाचार। लिहाजा सरकारों को अपना तरीका बदलना हेागा। गांव को अपनी जिम्मेदारी उठाने के लिए छोड़ना होगा। बच्चा भी जब पांच साल का हो जाता है तो मां-बाप उंगली पकड़कर चलाना छोड़ देते हैं, ताकि वह गिरे और खुद चलना सीखे, मगर सरकारें आजादी के 70 साल बाद भी गांव की उंगली छोड़ने को तैयार नहीं है।

(आईएएनएस)

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