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ज़रा हटके

ये हैं दुनिया के सबसे शानदार थिएटर…

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फिल्मों का मजा आमतौर पर लोग अपने घर में बैठकर लेते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो थिएटर जाकर फिल्में देखने का पूरा मजा लेते हैं।

थिएटर पर बनी बड़ी स्क्रिन फिल्म का मजा और बड़ा देती है। अगर थिएटर भी कुछ खास तरह से बना हुआ हो तो बात ही कुछ और होती है। हम आपको आज ऐसे ही थिएटर के बारे में बताने जा रहे हैं। जहां आप लेटकर भी फिल्म का मजा ले सकते हैं। इसके अलावा और भी सिनेमा घर हैं जो अपनी खास सुविधा के लिए चर्चा में हैं।

1. ओलिंपिया थिएटर, ग्रीस

आपको जानकर हैरानी होगी कि इस थिएटर में आपको आलीशान बिस्तर पर लेटकर फिल्म देखने का मौका मिलेगा। इस थिएटर पर लगे बिस्तर पर दो लोग आसानी से लेट सकते है। आप अपने पार्टनर के साथ इस थिएटर में जरूरी जाएं।

2. साई-फाई डाइन-इन थिएटर, ओरलैंडो, अमेरिका

इस सिनेमा घर में आप मूवी के साथ-साथ आप पिकनिक का भी मजा ले सकते हैं। यहां क्लासिक कार के आकार के टेबल बनाए गए है। इसी के साथ ऊपर आकाश में आपको तारों के दिखने का एहसास मिलेगा।

3. हॉट ट्यूब सिनेमा, लंदन

इस थिएटर में गर्म पानी से भरे ट्यूब में बैठकर मूवी को देखने का मजा ले सकते हैं। यहां आपको मूवी देखने के साथ-साथ नाचने और गाने की पूरी आजादी मिलेगी।

4. सिनेमा सुरलियाउ थिएटर, पेरिस

इस थिएटर के अंदर आप नाव के आकार के बॉक्स में बैठकर मूवी का लुफ्त उठा सकते हैं। इस थिएटर में बैठने का अरेंजमेंट अलग-अलग मूवी के दौरान बदलता रहता है।

5. इलेक्ट्रिक सिनेमा, नॉटिंग हिल, लंदन

यह सिनेमा घर इंग्लैंड के सबसे पुराने सिनेमा में से एक है। लोगों के बीच यह सिनेमा काफी फैशनेबल रूप में मशहूर है।

 

wefornews bureau 

ज़रा हटके

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से ये पांच झूठ

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PM Modi Red Fort

नरेंद्र मोदी ने आज पांचवी बार लाल किले से भाषण दिया। भाषण में उन्होंने अपने चार साल के कामों का लेखा-जोखा भी पेश किया। 2019 के लोकसभा चुनाव में जाने से पहले मोदी का लाल किले पर ये आखिरी भाषण था। फिर भी उन्होंने कुछ Factual Mistakes मतलब तथ्यात्मक गलतियां कर ही दीं।

तथ्यात्मक गलती माफी दी जा सकती है। लेकिन तब नहीं, जब वो दावे की तरह पेश की गई हो। प्रधानमंत्री की भंगिमा भाषण देते हुए जानकारी बांटने वाली नहीं थी. दावे वाली थी। हिंदी में गलत दावे को झूठ कहा जाता है। सो प्रधानमंत्री की ‘गलतियां’ झूठ ही कहलाएंगी। प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले से कहे कुछ झूठ हमने पकड़े। ये रही लिस्ट-

दावा नंबर 1 – स्वच्छ भारत अभियान से तीन लाख बच्चों की जान बच गई.

सच्चाई – विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक अगर स्वच्छ भारत अभियान को 100% लागू कर दिया जाए तो 2019 तक डायरिया और प्रोटीन एनर्जी की कमी से होने वाली करीब 3 लाख बच्चों की मौतों को टाला जा सकता है। तो WHO ने किसी लक्ष्य के तय होने की बात नहीं की थी। उन्होंने महज़ एक अनुमान लगाया भविष्य (अक्टूबर 2019) के लिए। तो मोदी जी पूरे एक साल एडवांस चल रहे थे। फिर WHO की बात में शर्त थी कि स्वच्छ भारत अभियान के 100% टार्गेट पूरे हों। भारत कितना स्वच्छ हुआ है, मोदी जी ही जानते हैं. लेकिन हम इतना जानते हैं कि 100% नहीं हुआ है। तो बच्चों की जान बचने का दावा झूठा है।

दावा नंबर 2 – भारत का पासपोर्ट अब दुनिया के सबसे ज्यादा ‘इज्जतदार’ पासपोर्ट्स में से एक है। अब सब जगह इसका स्वागत होता है।

सच्चाई- पासपोर्ट की ‘इज्जत’ के माप के लिए दुनियाभर में एक रैंकिंग होती है। ‘ग्लोबल पासपोर्ट पावर इंडेक्स’ में किसी देश का पासपोर्ट जहां जगह पाता है, उसे ‘ग्लोबल पासपोर्ट पावर रैंक’ कहते हैं। यदि आपके पास अच्छे रैंक का पासपोर्ट हो तो आपको दुनिया के ज़्यादातर देशों (खासतौर पर यूरोप और अमरीकी महाद्वीप में) में जाने के लिए वीज़ा की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। आप फ्लाइट पकड़कर सीधा उस देश पहुंचें और आपको ‘वीज़ा ऑन अराइवल’ मिल जाएगा। पासपोर्ट का ‘स्वागत’ इसी संदर्भ में होता है। जैसे-जैसे नीचे की रैंकिंग वाले पासपोर्ट पर जाते हैं, वीज़ा ऑन अराइवल देने वाले देश कम होते जाते हैं। ज़्यादा नीचे की रैंकिंग हुई तो विकसित देश जाने के लिए वीज़ा मिलना ही मुश्किल हो जाता है।

फिलहाल ग्लोबल पासपोर्ट पावर इंडेक्स में भारत 65वें नंबर पर है. ये एक औसत रैंकिंग है। माने सबसे ‘इज्जतदार में से एक’ तो कतई नहीं. चीन इस रैंकिंग में 55वें नंबर पर है।

दावा नंबर 3 – भारत का शहद निर्यात दोगुना हो गया है.

सच्चाई – गांधी जी वाला सच (माने तथ्य) ये है कि वित्त वर्ष 2016-17 में भारत ने 55,73.903 करोड़ टन था। 2017-18 में यह बढ़कर 65,35.758 करोड़ टन हो गया। यह बढ़ोत्तरी करीब 17% है. भारत भूमि पर हुए महान गणितज्ञ आर्यभट के अनुसार दोगुना तभी कहा जा सकता है जब 100% की बढ़ोत्तरी हो जाए। हमने अभी कैलकुलेटर में हिसाब किया तो 17, 100 से 83 कम निकला। सो मोदी जी का शहद वाला दावा भी झूठा निकला. जीके के लिए बता दें कि भारत शहद निर्यात के मामले में 11वें नंबर पर है।

दावा नंबर 4 – मुद्रा योजना में बंटे 13 करोड़ लोन से देश में नौकरियां और अपना बिज़नेस (आंत्रप्रन्योरशिप) बढ़ी है।

सच्चाई – इंडिया टुडे द्वारा लगाई गई एक RTI के जवाब में सरकार ने खुद बताया है कि मुद्रा योजना में बांटे गए सभी लोन में से सिर्फ और सिर्फ 1.45% लोन ही 5 लाख से ज्यादा के हैं। 90% से ज्यादा लोन 50,000 से कम के हैं। अर्थशास्त्री अजीत रानाडे के मुताबिक इतने पैसों में लोन लेने वाला कोई बहुत छोटा धंधा (जैसे पकौड़े या चाय का ठेला) तो शुरू किर सकता है लेकिन व्यापक पैमाने पर रोज़गार पैदा नहीं हो सकता।

मुद्रा योजना के तहत 13 करोड़ लोन दिए गए हैं.

दावा नंबर 5 – 2013 में जिस रफ्तार से इलेक्ट्रिफिकेशन यानी विद्युतीकरण हो रहा था, उसी रफ्तार से काम पूरा करने में (सभी गावों तक बिजली पहुंचाने में) एक दशक लग जाता।

सच्चाई – एनडीए सरकार के चार सालों में 18,374 गांवों में बिजली पहुंचाई गई. इंडिया स्पेंड के मुताबिक साल 2005-06 से 2013-14 के बीच राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत 1,08,280 गांवों में बिजली पहुंचाई गई। इसका मतलब कि यूपीए राज में हर साल 14,528 गांवों का औसत रहा। वहीं मोदी सरकार के चार साल में 18,374 मतलब 4,594 गांव हर साल का औसत है।

मोदी सरकार इस बात पर ज़ोर कसती रही है कि साल 2016-17 में उसने यूपीए के आखिरी साल के बनिस्बत पांच गुना गावों में बिजली पहुंचाई। ये बात सरकार ने अपनी प्रेस रिलीज़ में कही भी है। लेकिन जैसा कि हमने ऊपर बताया, अगर मनमोहन सिंह के पूरे कार्यकाल की तुलना मोदी जी के पूरे कार्यकाल से की जाए तो विद्युतीकरण के मामले में यूपीए ने मोदी सरकार से तीन गुना तेज़ी से काम किया।

तो सारा खेल 2013-14 को बेस इयर लेने का है। सिर्फ एक साल के आंकड़े के आधार पर अगर प्रधानमंत्री ये दावा करते हैं कि यूपीए की बनिस्बत उनकी सरकार ने तेज़ काम किया (‘एक दशक’ से उनका संदर्भ यही था) तो वो कतई पचेगा नहीं. बेस ईयर 2004 कर दीजिए (जिस साल भाजपा चुनाव हारी थी) तो मोदी जी की बात सिर के बल पलट जाए।

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ज़रा हटके

संचार क्रांति योजना यानी पॉकेट में रॉकेट

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रायपुर, 10 अगस्त । छत्तीसगढ़ में बस्तर के दुर्गम और दूरस्थ अंचल में रहने वाली संगीता निषाद, विमला ठाकुर या बलवंत नागेश ने 26 जुलाई को कैसा महसूस किया होगा? यह सवाल सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि इन्हें राष्ट्रपति के हाथों स्मार्ट फोन मिला, बल्कि इसलिए भी अहम है कि यदि ऐसा नहीं होता, तो शायद इन्हें स्मार्ट फोन पाने के लिए वर्ष 2035 तक इंतजार करना पड़ता।

इस अंतहीन इंतजार का जवाब ट्राइ के आंकड़े देते हैं। वर्ष 2001 में देश के शहरी क्षेत्रों की टेलीडेंसिटी मात्र 10.4 प्रतिशत थी और ग्रामीण अंचलों की मात्र 1.5 प्रतिशत थी। वर्ष 2015 में शहरों की टेलीडेंसिटी में 151 प्रतिशत का इजाफा हुआ तो ग्रामीण क्षेत्रों में मात्र 51 प्रतिशत।

वर्ष 2015 से 2018 के बीच ग्रामीण अंचलों की टेलीडेंसिटी मात्र 3.5 प्रतिशत बढ़ी और यह बढ़त भी कायम रही तो पूरे भारत में 100 प्रतिशत टेलीडेंसिटी के लिए वर्ष 2035 तक इंतजार करना पड़ेगा। टेलीडेंसिटी यानी निर्धारित इकाई के क्षेत्र में मौजूद फोन की संख्या।

यह सवाल सिर्फ छत्तीसगढ़ का नहीं है, बल्कि झारखंड, ओडिशा जैसे राज्यों या दक्षिण एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के कई देशों का भी है। मानव सभ्यता को विकास की सीढ़ियां चढ़ाने में जिन आविष्कारों का मुख्य योगदान रहा है, उनमें पहिया, बिजली, सेमीकंडक्टर्स, इंटरनल कम्बशन इंजन आदि ने बड़ी भूमिका निभाई है। इसी क्रम में अब इंटरनेट और मोबाइल फोन विकास की नई क्रांति की नई-नई इबारतें लिख रहे हैं।

यह बात बहुत पुरानी नहीं है, जब टेलीफोन एक दुर्लभ वस्तु मानी जाती थी। भारत में लैंडलाइन फोन की शुरुआत सन् 1852 में हुई थी और 155 वर्षों बाद आज यहां 2 करोड़ 50 हजार कनेक्शन उपलब्ध हैं।

मोबाइल फोन भारत में 1996 में आए थे और मात्र 22 वर्षों बाद देश में 100 करोड़ मोबाइल हैं। तब मोबाइल की कीमत 10-15 हजार रुपये होती थी। मुद्रास्फीति की औसत दर 6.7 प्रतिशत भी मान लें तो 1996 के 15 हजार रुपये आज के 55 हजार रुपये हो जाएंगे। उस समय तो ‘इनकमिंग चार्ज’ भी लिया जाता था। आज 125 करोड़ की आबादी में 100 करोड़ फोन चल रहे हैं, जिसमें से 22 करोड़ लोग स्मार्टफोन का उपयोग कर रहे हैं। हर माह 90 लाख नए लोग स्मार्टफोन का उपयोग करने वालों की सूची में जुड़ते जा रहे हैं।

छत्तीसगढ़ का गठन ही पिछड़ेपन की पृष्ठभूमि में हुआ है। सामाजिक-आर्थिक-जाति जनगणना-2011 के आंकड़े कहते हैं कि भारत में औसतन 72 प्रतिशत परिवार मोबाइल फोन का उपयोग करते हैं, जबकि छत्तीसगढ़ में सिर्फ 29 प्रतिशत। उसमें भी मात्र 10 प्रतिशत लोगों के पास स्मार्टफोन है। छत्तीसगढ़ में शहरी टेलीडेंसिटी 125 प्रतिशत है, जबकि गांवों में मात्र 37 प्रतिशत। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल तो यही था कि क्या साढ़े 3 प्रतिशत की विकास दर से चलते हुए वर्ष 2035 का इंतजार किया जाए?

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने दूसरा रास्ता चुना, जिससे इंतजार शब्द मौन हो गया। जिन्होंने 2जी भी नहीं देखा था, उनके हाथ में सीधे 4जी नेटवर्क आ गया, यानी बैलगाड़ी से उठाकर रॉकेट में बैठा दिया गया।

छत्तीसगढ़ की संचार क्रांति योजना (स्काय) किसी सरकार द्वारा नि:शुल्क मोबाइल फोन बांटने की पृथ्वी की सबसे बड़ी योजना है। जहां कनेक्टिविटी नहीं थी, वहां कनेक्टिविटी और जहां क्रयक्षमता नहीं थी, वहां नि:शुल्क स्मार्ट फोन दिए जा रहे हैं।

स्मार्टफोन यूजर्स का प्रतिशत 29 से बढ़कर 100 प्रतिशत, ग्रामीण अंचलों का मोबाइल कवरेज 66 से बढ़ाकर 90 प्रतिशत करने, 16 सौ मोबाइल टॉवर की स्थापना सुनिश्चित करने के साथ ही मात्र 60 दिन में 50 लाख स्मार्टफोन का वितरण किया जा रहा है। स्काय का वितरण प्रबंधन भी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ बिजनेस स्कूल के लिए केस स्टडी है। 7 हजार 500 वितरण केंद्र, 5 हजार लोग, 1 लाख 50 मानव घंटे के हिसाब से काम करेंगे, जिससे समग्र वितरण प्रक्रिया 5 सिगमा ऑपरेशन का लक्ष्य हासिल करेगी।

आश्चर्य नहीं कि हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय में इस कार्यक्रम को लेकर उत्सुकता है। दूरसंचार राज्य का विषय नहीं होने के बावजूद मुख्यमंत्री की दूरदर्शिता और ²ढ़ इच्छाशक्ति से ही स्काय का जन्म और क्रियान्वयन संभव हुआ है।

विकास का एक बड़ा पहलू महिलाओं का सशक्तीकरण और उद्यमिता विकास भी है। ‘द इकोनॉमिस्ट’ के अनुसार, दुनिया में कामकाजी महिलाओं की संख्या 50 प्रतिशत है, जबकि भारत में कामकाजी महिलाएं 2005 में 35 प्रतिशत थी, जो घटकर 26 प्रतिशत हो गई है, जबकि इसी अवधि में बंग्लादेश में महिलाओं की भागीदारी 50 प्रतिशत बढ़ी है।

विश्व मुद्राकोष का अनुमान है कि यदि भारत में महिलाएं भी पुरुषों के बराबर काम करें तो भारत की जीडीपी 27 प्रतिशत से अधिक हो जाएगी। मतलब 33 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी। संचार क्रांति योजना में 40 लाख महिलाओं को स्मार्टफोन देने का मतलब अवसरों की दुनिया में उनकी सशक्त उपस्थिति होगी। आर्थिक विकास में कनेक्टिविटी सशक्तीकरण का सबसे उत्तम उपाय है।

आखिरी बात कि स्काय को खैरात बांटने की योजना समझने वाली सोच ऐतिहासिक भूल के रूप में ही दर्ज होगी। हमने अब तक जो विश्लेषण किया, उसी से समझ में आता है कि यह मुफ्त सुविधा से आगे बढ़कर बहुत कुछ है। टाइम मशीन में बैठकर बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं, एक छोटे से देश स्वीडन का उदाहरण लिया जा सकता है। जहां सरकार ने वर्ष 1990 में हर परिवार को कम्प्यूटर खरीदने के लिए भारी सब्सिडी दी थी। नतीजतन वहां 2020 तक 90 प्रतिशत से अधिक घरों में सुपर फास्ट फाइबर आप्टिक ब्रॉडबैंड 100 एमबीपीएस स्पीड वाले कनेक्शन हो जाएंगे।

इस नई पहल ने स्वीडन को सर्वाधिक यूनीकॉर्न वाले देशों में शामिल कर दिया है। केन्या, युगांडा, तंजानिया जैसे देश भी ऐसे ही सबक की तरह हैं। पॉकेट में रॉकेट की तर्ज पर मोबाइल कनेक्टिविटी के इनोवेशन से छत्तीसगढ़ की जनता को अपनी प्रतिभा और क्षमता के सदुपयोग के नए अवसर मिलेंगे और देश की अर्थव्यवस्था को नई उड़ान के लिए नए पंख मिलेंगे।

–आईएएनएस

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ज़रा हटके

भीख मांगना आपराधिक मामला नहीं : उच्च न्यायालय

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नई दिल्ली, 8 अगस्त (आईएएनएस)| दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को एक आदेश में भीख मांगने को आपराधिक मामला मानने से इनकार करते हुए इसके लिए दंड के कानूनों को निरस्त कर दिया। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और न्यायूर्ति सी. हरिशंकर की पीठ ने बंबई प्रिवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट के तहत भीख मांगने पर अभियोग चलाने के प्रावधानों को निरस्त कर दिया।

पीठ ने भीख मांगने को अपराध की श्रेणी से हटा दिया और कहा कि कानून के प्रावधानों के तहत अभियोग चलाना असंवैधानिक है।

हालांकि अदालत ने भीख मांगने के लिए बाध्य करने वाले गिरोह पर लगाम लगाने के लिए दिल्ली सरकार को वैकल्पिक कानून लाने का अधिकार प्रदान किया।

अदालत ने हर्ष मंदर और कर्णिका साहनी द्वारा दायर दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई की। इन याचिकाओं में अदालत से राष्ट्रीय राजधानी में भिखारियों के लिए मानवीय और मौलिक अधिकार की मांग करते हुए भीख मांगने को अपराध की श्रेणी से हटाने की गुहार लगाई गई थी।

याचिकाओं में दिल्ली में सभी भिखारी-गृहों में उचित भोजन और चिकित्सा की सुविधा समेत मूलभूत सुविधाओं की मांग की गई थी।

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