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लाइफस्टाइल

…तो इस वजह से होता है आपके पैरों में तेज दर्द

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प्रतीकात्मक तस्वीर

रात को सोते समय कुछ लोगों के पैरों में तेज दर्द और ऐंठन रहती है। जिस वजह उनका ठीक से सोना मुश्किल हो जाता हैं।

पैरों में होने वाला दर्द आपको रातभर सोने नहीं देता है। साथ ही इससे मांसपेशियों पर भी बुरा असर पड़ता है। हेल्थ एक्सपर्ट का मानना है कि पैरों में होने वाली ये ऐंठन सर्दियों से ज्यादा गर्मी के मौसम में होती है। दरअसल, मांसपेशियों में होने वाली ये ऐंठन नसों की वजह से होती है।

क्या आपके पैरों में भी होता है तेज दर्द, ये हैं वजहें

इसके अलावा सर्दी के मुकाबले गर्मी के मौसम में शरीर को ज्यादा विटामिन डी मिलता है, जिस वजह से गर्मी के मौसम में नसों की वृद्धि और मरम्मत की प्रक्रिया अधिक होती है। यही पैरों के दर्द का कारण बनता है। बता दें, जब शरीर में विटामिन डी का स्तर सबसे अधिक होता है तो शरीर में खुद से ही रिपेयर की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जिस वजह से भी गर्मी के मौसम में पैरों में ज्यादा ऐंठन होती है।

डिहाइड्रेशन-

डिहाइड्रेशन पैरों में दर्द होने की एक बड़ी वजह हो सकता है। इसके करण पैरों में ऐंठन होने लगती है। एक्सपर्ट के मुताबिक, डिहाइड्रेशन की वजह से ब्लड में इलेक्ट्रोलाइट का संतुलन बिगड़ जाता है, जिस वजह पैरों में ऐंठन होने लगती है। अगर अब कभी भी रात के समय आपको पैरों में ऐंठन महसूस होने लगे तो पानी पिएं।

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न्यूट्रिएंट्स-

ज्यादातर लोगों को शरीर में न्यूट्रिएंट्स की कमी की वजह से भी पैरों में ऐंठन और दर्द होने लगता है। इसलिए अपनी डाइट में ऐसी चीजों को शामिल करें जिसमें भरपूर मात्रा में कैल्शियम, मैग्नीशियम और पोटेशियम मौजूद होता है। स्टडी के मुताबिक, मांसपेशियों पर ज्यादा प्रेशर डालने और थकान महसूस होने की वजह से भी पैरों में ऐंठन होने लगती है।

अगर आप दिन में अधिकतर समय खड़े रहते हैं, तो रात के समय आपके पैरों में दर्द होने की संभावना बेहद ज्यादा होती है।  अगर आपकी उम्र 50 या इससे ज्यादा है और आपको अक्सर पैरों में दर्द का एहसास होता है, तो इसका मुख्य कारण आपकी बढ़ती उम्र हो सकती है।

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दरअसल, बढ़ती उम्र के साथ शरीर में कमजोरी बढ़ जाती है जिस कारण लोगों को पैरों में दर्द की शिकायत रहती है। इसके अलावा डायबिटीज, आर्थराइटिस, अधिक तनाव भी ऐंठन का कारण हो सकता है। स्टडी के मुताबिक, इन बीमारियों के कारण नसों में बदलाव होने लगता है, जो पैरों में दर्द और ऐंठन का कारण बनता है।

क्या आपके पैरों में भी होता है तेज दर्द, ये हैं वजहें

प्रेग्नेंसी-

प्रेग्नेंसी के दौरान भी महिलाओं को पैरों में दर्द की शिकायत रहती है। दरअसल, प्रेग्नेंसी के दौरान ज्यादा वजन और असंतुलित ब्लड सर्कुलेशन इसका एक बड़ा कारण है। इसका मुख्य कारण ये है कि जब आप ज्यादा समय तक खड़े रहते हैं, तो शरीर में मौजूद ब्लड और पानी शरीर के निचले हिस्से में जमा हो जाता है।

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जिस कारण शरीर में मौजूद तरल पदार्थ का संतुलन बिगड़ जाता है और पैरों में दर्द और ऐंठन होने लगती है। अमेरिकन प्रेग्नेंसी एसोसिएशन के मुताबिक, गर्भ में पल रहे बच्चे की वजह से नसों पर प्रेशर पड़ता है। ये भी पैरों में दर्द और ऐंठन का अहम वजह हो सकता है।

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लाइफस्टाइल

दिल दुरुस्त रखने को आया ‘स्टेअर स्नैकिंग’

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दिनभर की भागदौड़ के बाद आज के जमाने में लोग कसरत या किसी भी शारीरिक गतिविधि के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं, ऐसे में व्यस्त दिनचर्या में से इस तरह की चीजों को वक्त न देने में ही भलाई समझते हैं। अब ऐसे लोगों के लिए भी एक खुशखबरी है, क्योंकि अब ये भी एक बहुत ही आसान तरीके से खुद को स्वस्थ रख सकते हैं। 

कनाडा के मैकमास्टर यूनिवर्सिटी के अध्यापक मार्टिन गिबाला का कहना है कि अब लोग कहीं भी और कभी भी ‘स्टेअर स्नैकिं ग’ की मदद से स्वयं को स्वस्थ रख सकते हैं और अपनी फिटनेस को बरकरार रख सकते हैं।

प्रोफेसर गिबाला ने कहा कि ऑफिस टावर्स में काम करने वाले या फिर ऊंची इमारतों में रहने वाले लोग सुबह, दोपहर और शाम को सीढ़ियों पर चढ़-उतर कर वर्कआउट कर सकते हैं और शरीर को बेहतर बनाए रखने में यह वाकई में प्रभावशाली है।

इस अध्ययन में शामिल शोधकर्ताओं का ऐसा मानना है कि अगर कोई दिन भर में दो से तीन बार सीढ़ियों से चढ़ता या उतरता है तो इससे दिल को स्वस्थ रखा जा सकता है।

एक शोध में नौजवानों के एक ऐसे समूह को शामिल किया गया, जिन्हें व्यायाम जैसी चीजों के लिए वक्त नहीं मिल पाता या किसी वजह से इनकी दिनचर्या में इस तरह की कोई भी चीजें शामिल नहीं है, इस ग्रुप के लोगों को दिन में तीन बार तेज गति से सीढ़ियों से चढ़ने और उतरने को कहा गया और ऐसा इन्होंने छह सप्ताह में तीन बार हर रोज किया।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, इन समूह के व्यक्तियों में वाकई में दूसरे ग्रुप के सदस्य जिन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया, की अपेक्षा अंतर पाया गया।

‘स्टेअर स्नैकिं ग’ की इस प्रभावशाली उपयोगिता के बारे में शोधकर्ताओं का निष्कर्ष कई पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुई है।

कनाडा में स्थित एक और यूनिवर्सिटी के सहायक प्राध्यापक जोनेथन लिटिल ने कहा कि आप ऑफिस में कॉफी ब्रेक या बाथरूम ब्रेक के दौरान इस तरह की गतिविधि को करके खुद को फिट रख सकते हैं।

भविष्य में ब्लड प्रेशर या ग्लाइसेमिक जैसी बीमारियों को दूर रखने के लिए इस तरह की कुछ और गतिविधियों के बारे में खोज की जा रही है।

–आईएएनएस

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लाइफस्टाइल

चेहरे पर मुंहासे और बाल से महिलाओं में तनाव का खतरा

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महिलाओं के चेहरे पर मुंहासे और बाल वर्तमान में एक आम समस्या बन गए हैं इससे उनमें समाज में शर्म की स्थिति झेलने के साथ-साथ भावनात्मक तनाव और अवसाद की चपेट में आने का खतरा रहता है।

इस समस्या को पॉलीसिस्टिक ओवरियन सिन्ड्रोम (पीसीओएस) कहा जाता है, जिसका जल्दी ही उचित उपचार मिलने से भावनात्मक तनाव कम हो सकता है। पॉलीसिस्टिक ओवरी सिन्ड्रोम वास्तव में एक मेटाबोलिक, हार्मोनल और साइकोसोशल बीमारी है, जिसका प्रबंधन किया जा सकता है, लेकिन ध्यान नहीं दिये जाने से रोगी के जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। एक अध्यनन के मुताबिक, भारत में पांच में से एक वयस्क महिला और पांच में से दो किशोरी पीसीओएस से पीड़ित है। मुंहासे और हिरसुटिज्म पीसीओएस के सबसे बुरे लक्षण हैं।

पीसीओएस का प्रमुख लक्षण है हाइपरएंड्रोजेनिज्म, जिसका मतलब है महिला शरीर में एंड्रोजन्स (पुरुष सेक्स हॉर्मोन, जैसे टेस्टोस्टेरोन) की उच्च मात्रा। इस स्थिति में महिला के चेहरे पर बाल आ जाते हैं।

दिल्ली में ऑब्स्टेट्रिक्स एवं गायनेकोलॉजी की निदेशक व दिल्ली गायनेकोलॉजिस्ट फोरम (दक्षिण) की अध्यक्ष डॉ. मीनाक्षी आहूजा ने कहा, “त्वचा की स्थितियों, जैसे मुंहासे और चेहरे पर बाल को आम तौर पर कॉस्मेटिक समस्या समझा जाता है। महिलाओं को पता होना चाहिए कि यह पीसीओएस के लक्षण है और हॉर्मोनल असंतुलन तथा इंसुलिन प्रतिरोधकता जैसे कारणों के उपचार हेतु चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।”

मुंहासे और हिरसुटिज्म के उपचार के बारे में डॉ. मीनाक्षी आहूजा ने कहा, “पीसीओएस एक चुनौतीपूर्ण सिन्ड्रोम है, लेकिन जोखिमों का प्रबंधन करने के पर्याप्त अवसर हैं। पीसीओएस के बारे में बेहतर जागरूकता की आवश्यकता है, ताकि महिलाएं लक्षणों को पहचानें और सही समय पर सही मेडिकल सहायता लें।” 

उन्होंने कहा, “स्वस्थ जीवनशैली, पोषक आहार, पर्याप्त व्यायाम और उपयुक्त उपचार अपनाने से पीसीओएस के लक्षण नियंत्रित हो सकते हैं। पीसीओएस के कारण होने वाला हॉर्मोनल असंतुलन उपचार योग्य होता है, ताकि मुंहासे और हिरसुटिज्म को रोका जा सके। गायनेकोलॉजिस्ट से उपयुक्त मेडिकल मार्गदर्शन प्रभावी उपचार के लिए महत्वपूर्ण है।” 

देश में पांच से आठ प्रतिशत महिलाएं हिरसुटिज्म से पीड़ित हैं। हार्मोन के असंतुलन के कारण मुंहासे भी होते हैं और यह पीसीओएस का लक्षण है। यह दोनों लक्षण महिला की शारीरिक दिखावट को प्रभावित करते हैं और इनका उपचार न होने से महिला का आत्मविश्वास टूट जाता है और उनका अपने प्रति आदर कम होता है। मुंहासे से पीड़ित 18 प्रतिशत रोगियों में गंभीर डिप्रेशन और 44 प्रतिशत में एन्ग्जाइटी देखी गई है।

डॉ. आहूजा ने कहा, “पीसीओएस से पीड़ित महिलाओं की भलाई सुनिश्चित करने के लिए समाज और परिवारों को साइकोलॉजिकल तनाव को समझने और साथ ही पूरे आत्मविश्वास के साथ दुनिया का सामना करने के लिए उन्हें सहयोग देने के लिए प्रयास करने की जरूरत है।”

उन्होंने कहा, “अधिकांश महिलाओं को इन स्थितियों का बोध नहीं है और वे चिकित्सकीय मार्गदर्शन के बिना सामयिक उपचार लेती हैं, जिससे त्वचा खराब हो सकती है। यह जानना महत्वपूर्ण है कि अगर आप लक्षणों का उपचार नहीं करेंगे, तो मुंहासे और चेहरे पर बाल दोबारा आ जाएंगे।” 

–आईएएनएस

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लाइफस्टाइल

देश में 60 फीसदी लोगों को पसंद है शाकाहार : रिपोर्ट

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food

देश में मधुमेह जैसे रोगों से पीड़ित लोगों की तादाद बढ़ने के बीच एक अच्छी खबर है कि ज्यादातर लोग अब स्वास्थ्यवर्धक भोजन पसंद करने लगे हैं।

एक सर्वेक्षण के अनुसार, 63 फीसदी भारतीय गोश्त की जगह वनस्पति से प्राप्त भोजन पसंद करते हैं। मतलब मांसाहारी के बजाए शाकाहारी लोगों की तादाद ज्यादा हो गई है।

ग्लोबल रिसर्च कंपनी इप्सोस की रिपोर्ट ‘फूड हैबिट्स ऑफ इंडियंस : इप्सोस अध्ययन’ में पाया गया कि भारतीय जानकारी के आधार पर पसंद करने लगे हैं। अब वे एक परंपरागत आदत में नहीं, बल्कि प्रयोग में विश्वास करने लगे हैं।

सर्वेक्षणकर्ताओं ने कहा, “हमें मालूम है कि भारत के लोगों को भोजन से लगाव होता है और तंदूरी चिकन, मटन, फिश और विविध प्रकार के मासांहारों को देखकर उनके लार टपकने लगता है। लेकिन रायशुमारी में 63 फीसदी भारतीयों का कहना है कि वे गोश्त के बदले वनस्पति से प्राप्त भोजन खाना पसंद करते हैं।”

रिपोर्ट के अनुसार, 57 फीसदी लोगों ने बताया कि वे जैविक खाद्य पदार्थ ग्रहण् करते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में 57 फीसदी लोगों का दावा है कि वे जैविक खाद्य पदार्थ ग्रहण करते हैं, जबकि विकसित देशों में जैविक खाद्य पदार्थ खाने वाले लोग कम हैं, जिनमें जापान में 13 फीसदी और 12 फीसदी ब्रिटिश हैं।

सर्वेक्षण पिछले साल 24 अगस्त से लेकर सात सितंबर तक 29 देशों में करवाया गया था। सर्वेक्षण में भारत में 1,000 नमूने लिए गए थे। 

–आईएएनएस

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