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ज्योतिरादित्य सिंधिया बढ़े दादी-पिता की राह पर

ज्योतिरादित्य की दो बुआ यशोधरा राजे सिंधिया और वसुंधरा राजे सिंधिया भाजपा की कद्दावर नेता हैं। अब ज्योतिरादित्य के कांग्रेस छोड़ने से दोनों बुआ खुश हैं। यशोधरा राजे ने इसे ज्योतिरादित्य की घरवापसी करार दिया है।

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कांग्रेस के बागी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मंगलवार को पार्टी को अलविदा कहकर अपनी दादी विजयाराजे सिंधिया और पिता माधवराव सिंधिया के आक्रामक तेवरों की याद दिला दी। ज्योतिरादित्य दो बुआ यशोधरा राजे और वसुंधरा राजे भाजपा में पहले से हैं।

ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्यप्रदेश के गठन के बाद की सिंधिया राजघराने की तीसरी पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं। उनसे पहले की दो पीढ़ियों, जिसमें विजयाराजे सिंधिया हैं और पिता माधवराव सिंधिया, जिन्होंने अपने राजनीतिक सफर में कांग्रेस को न केवल मुसीबत में डाला, बल्कि उसके लिए सत्ता की राह भी कठिन कर दी, अब ज्योतिरादित्य भी उसी राह पर चलते नजर आ रहे हैं।

सिंधिया राजघराने के सियासी सफर और उनके बगावती तेवरों का जिक्र करें तो एक बात साफ हो जाती है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी विजयराजे सिंधिया ने 1957 में कांग्रेस से अपनी राजनीति की शुरुआत की थी। वह गुना लोकसभा सीट से सांसद चुनी गईं, मगर उनका कांग्रेस से नाता महज 10 साल ही रह पाया।

सन् 1967 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत हासिल हुआ था, और डी.पी. मिश्रा मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन बाद में कांग्रेस के 36 विधायकों ने विजयाराजे के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर की और विपक्ष से जा मिले। डी.पी. मिश्रा को इस्तीफा देना पड़ा था। अब एक बार फिर वही पटकथा लिखी गई है। ज्योतिरादित्य खेमे के 20 कांग्रेसी विधायकों ने इस्तीफा दे दिया है। इस्तीफा स्वीकार होते ही कमल नाथ सरकार विधानसभा में अल्पमत में आ जाएगी। ऐसे में भाजपा कमल नाथ सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाएगी और कमल नाथ सरकार गिर सकती है।

विजयाराजे के साल 1967 में जनसंघ का दामन थामने के बाद जनसंघ का जनाधार बढ़ा। ग्वालियर क्षेत्र में सिंधिया राजघराने के प्रभाव को इसी बात से समझा जा सकता है कि वर्ष 1971 में इंदिरा गांधी की लहर के बावजूद जनसंघ इस क्षेत्र से तीन सीटें जीतने में कामयाब रहा। खुद विजयराजे सिंधिया भिंड से, अटल बिहारी वाजपेयी ग्वालियर से और विजयराजे सिंधिया के बेटे और ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया गुना से सांसद बने।

विजयाराजे सिंधिया और उनके पुत्र माधवराव सिंधिया लगभग छह साल तक एक साथ रहे, मगर वर्ष 1977 में देानों के रास्ते अलग हो गए। माधवराव ने 1980 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीतकर केंद्रीय मंत्री भी बने। माधवराव कांग्रेस के एक ताकतवर नेता बन चुके थे, मगर इसी दौरान कांग्रेस से हुए मतभेद के बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़कर विकास कांग्रेस बनाई थी। उनका विमान हादसे में 2001 में निधन हो गया।

माधवराव सिंधिया के निधन के बाद वर्ष 2001 मे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने पिता की विरासत संभाली। गुना सीट पर उपचुनाव हुआ तो ज्योतिरादित्य सिंधिया सांसद चुने गए। साल 2002 में पहली जीत के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया कभी चुनाव नहीं हारे थे, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें करारा झटका लगा। इस चुनाव में सिंधिया को हार का सामना करना पड़ा था।

राज्य में कांग्रेस को डेढ़ दशक बाद सत्ता में लाने में ज्योतिरादित्य सिंधिया की अहम भूमिका रही, भाजपा ने सिंधिया पर ही निशाना साधा था। उसके बाद मुख्यमंत्री कमल नाथ को बना दिया गया। सिंधिया यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि पार्टी उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपेगी, मगर ऐसा हुआ नहीं।

पिछले कुछ माह से सिंधिया पार्टी से नाराज चल रहे थे और राज्यसभा के चुनाव में भी उनकी उपेक्षा की आशंका लगातार बनी हुई थी। नाराज सिंधिया ने आखिरकार नया रास्ता चुना, जिससे मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार ही खतरे में पड़ गई।

ज्योतिरादित्य की दो बुआ यशोधरा राजे सिंधिया और वसुंधरा राजे सिंधिया भाजपा की कद्दावर नेता हैं। अब ज्योतिरादित्य के कांग्रेस छोड़ने से दोनों बुआ खुश हैं। यशोधरा राजे ने इसे ज्योतिरादित्य की घरवापसी करार दिया है। उन्होंने कहा है, “राजमाता के रक्त ने लिया राष्ट्रहित में फैसला। साथ चलेंगे, नया देश गढ़ेंगे, अब मिट गया हर फासला। ज्योतिरादित्य सिंधिया के द्वारा कांग्रेस छोड़ने के साहसिक कदम का मैं आत्मीय स्वागत करती हूं। उधर, वसुंधरा राजे भी टीवी चैनलों के स्क्रीन पर भतीजे के इस कदम की सराहना करती बार-बार देखी जा रही हैं।”

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‘5 अप्रैल, 9 बजे, 9 मिनट’ – मूर्खता के अथाह कुंड में गोताख़ोरी

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modi deep 9 Baje

प्रवचन और उपदेशों से समाज की विकृतियाँ दूर हुई होती तो चप्पे-चप्पे पर धर्मात्मा ही नज़र आते। दरअसल, समझाने से सिर्फ़ वही समझते हैं, जो समझना चाहते हैं। जो समझना चाहते हैं, उनमें समझने की क्षमता भी विकसित हो जाती है। लेकिन इतिहास ग़वाह है कि मूर्खों को समझा पाना नामुमकिन है। इस ब्रह्म सत्य को मौजूदा निज़ाम से बेहतर और कोई नहीं जानता। इसीलिए पहले ये रही-सही अक्ल वालों को मूर्खों में तब्दील करता है, फिर उनसे लगातार मूर्खता के अथाह कुंड में गोते लगवाता रहता है। ऐसा ही राष्ट्रीय गोताख़ोरी अभियान थी – ‘5 अप्रैल, 9 बजे, 9 मिनट’

देश भर में बड़े पैमाने पर मूर्खों इस मुबारक़ घड़ी का इन्तज़ार कर रहें। लेकिन हुक़ूमत के तमाम प्रलाप के बावजूद कुछ लोग हैं जिन्होंने काजल की कोठरी में होने के बावजूद ख़ुद को कालिख़ से बचा रखा है। जो वास्तव में ‘असतो मा ज्योतिर्गमय’ का मतलब समझते हैं। मैंने क़लम ऐसे ही मुट्ठी भर लोगों के लिए उठायी है। मुझे लगा कि अब भी वक़्त है कि बत्तियाँ बुझाकर, अन्धेरा करके और उस बनावटी अन्धेरे को दूर करने के लिए दीया, मोमबत्ती या मोबाइल के फ़्लैश को टॉर्च बनाकर जलाने वाले ‘इवेंट’ के प्रति आपत्ति या दुविधा रखने वालों को बताया जाए कि कैसे मौजूदा दौर के पागल बादशाह की सनक देश के पॉवर ग्रिड के लिए घातक साबित हो सकती है?

देश में पैदा होने वाली हरेक तरह की बिजली को उस नैशनल पॉवर ग्रिड में डाला जाता है, जिससे वितरित होते हुए असंख्य रूपों में बिजली हम तक पहुँचती है। नैशनल पॉवर ग्रिड को देश की भौगोलिक आकार के हिसाब से पाँच क्षेत्रीय पावर ग्रिडों (RLDCs) और फिर राज्य स्तरीय पॉवर ग्रिडों (SLDCs) में बाँटा गया है। ये हमारे शरीर की शिराओं और धमनियों जैसा बहुत बड़ा और जटिल ढाँचा है। पूरी तरह से सरकारी अनुशासन के मुताबिक़ चलता है। इसका सबसे बड़ा नियम है बिजली की फ्रिक्वेंसी को 50 हर्ट्ज पर बनाये रखना, क्योंकि फ्रिक्वेंसी के कम होने पर जहाँ लो-वोल्टेज की समस्या पैदा होती है, वहीं ज़्यादा होने पर बिजली के उपकरणों के बर्बाद होने का ख़तरा होता है।

देश का पूरा बिजली तंत्र केन्द्रीय बिजली नियामक (CERA) के नियमों से चलता है। यही संगठन देश में बिजली का सुप्रीम कोर्ट है। इसी ने भारतीय बिजली ग्रिड कोड (IEGC) के ज़रिये तय कर रखा है कि पॉवर ग्रिड और उससे जुड़े पूरे तंत्र को हर हालत में बिजली की फ्रिक्वेंसी को 49.95 से लेकर 50.05 हर्ट्ज (Hz) के दायरे में ही रहना है। यानी, नॉर्मल की रेंज में सिर्फ़ 0.1 हर्ट्ज अर्थात महज 2% के उतार-चढ़ाव की गुंज़ाइश रखी गयी है। ये दायरा इतना संवेदनशील है कि जुलाई 2012 में ज़रा सी असावधानी की वजह से उत्तरी और पूर्वी ग्रिड चरमराकर बैठ गया था। मिनटों में हुए इस हादसे के बाद ग्रिड को बहाल होने में 12 घंटे लग गये थे।

दरअसल, ग्रिड में जितनी बिजली डाली जाती है, ख़पत का उतना ही होना ज़रूरी है। यदि माँग ज़्यादा है लेकिन उत्पादन कम है तो हम ग्रिड से ज़्यादा बिजली नहीं ले सकते। इसी तरह, यदि बिजली की खपत कम है लेकिन उत्पादन अधिक, तो हमें फ़ौरन उत्पादन घटाया जाता है। बिजली घरों को इस हिसाब से संचालित किया जाता है कि बहुत कम वक़्त में उनका उत्पादन घटाया या बढ़ाया जा सके। बिजली की माँग के बढ़ने या ख़पत के घटने का सिलसिला इतनी धीमी रफ़्तार में होना चाहिए जो ग्रिड फ्रिक्वेंसी की रेंज में ही रहे।

इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए 5 अप्रैल 2020 को पॉवर ग्रिड ने सारे आपातकालीन उपाय किये हैं। सारे ट्रांसमिशन सिस्टम को घड़ी को एकरूप (synchronize) किया है। हरेक महत्वपूर्ण कर्मचारी को शाम छह बजे से रात दस बजे तक ड्यूटी पर रहने का हुक़्म है। हाइड्रो यूनिट्स को शाम 6:10 बजे से 8 बजे तक अपने न्यूनतम उत्पादन करते हुए रात 9 बजे वाले तमाशे के लिए तैयार रहना होगा। इस दौरान थर्मल और गैस आधारित बिजली घरों को शाम के पीक ऑवर वाले लोड के हिसाब से ख़ुद को ढालना होगा। रात 8:57 बजे तक हाइड्रो पॉवर फुल अलर्ट पर आकर ग्रिड की सिस्टम फ्रिक्वेंसी पर नज़र रखते हुए तब तक बिजली का उत्पादन गिराते चलेंगे, जब तक सारी नौटकीं को ख़त्म करके लोग फिर से बिजली की उस माँग को बहाल नहीं कर देते जो बत्तियाँ बन्द किये जाने से पहले थी।

इसके बाद राज्य सरकारों के कोयला या गैस आधारित थर्मल पॉवर स्टेशन्स को पीक ऑवर के समापन के तहत रात 9:55 बजे से अपने उत्पादन को 60 फ़ीसदी या अपनी न्यूनतम तकनीकी सीमा तक घटाना होगा। बिजलीघरों के लिए तकनीकी सीमा का दायरा वो लक्ष्मण रेखा जिसे यदि क़ायम नहीं रखा गया तो अचानक ठप हो जाएँगे। ठप होने के बाद इन्हें फिर से चालू होने में अच्छा ख़ासा वक़्त लगता है। इसीलिए ग्रिड फेल होने की दशा में हालात को सामान्य बनने में घंटों लग जाते हैं। वैसे प्रधानमंत्री के तमाशे के आह्वान को देखते हुए रात 8:30 बजे के बाद से ही सिस्टम फ्रिक्वेंसी न्यूनतम करते हुए 49.90 Hz पर ले जाने की आपातकालीन रणनीति भी अपनायी गयी है, ताकि 9 बजे होने वाली अनहोनी से ज़्यादा से ज़्यादा सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

चलते-चलते आपको ये बताता चलूँ कि कोरोना लॉकडाउन की वजह से बिजली की माँग में भारी गिरावट आयी है। मसलन, ऊर्जा मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, बीते 2 अप्रैल को देश में 125.81 गीगा वॉट बिजली की ख़पत थी, जबकि पिछले साल इसी दिन 168.32 गीगा वॉट बिजली की ख़पत हुई थी। ये अन्तर 25 फ़ीसदी का है। ज़ाहिर है, बिजली की माँग का अचानक धड़ाम से गिरना और फिर उठना, हमारे पॉवर ग्रिड और बिजलीघरों के लिए एक नयी आफ़त पैदा कर सकता है। क्योंकि इन दिनों ट्रेनें नहीं चल रहीं, फैक्ट्रियाँ बन्द पड़ी हैं, कृषि क्षेत्र में बिजली की माँग बेहद कम है, इसीलिए विशेषज्ञों ने अचानक देश भर में बत्तियाँ बन्द करने के प्रयोग को ख़तरनाक बताया है।

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ओपिनियन

80 फीसदी लोग मास्क पहनें तो महामारी पर लगाम संभव : डॉ. शैलजा

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नई दिल्ली, 2 अप्रैल | देश की अगर 50 प्रतिशत आबादी मास्क पहनती है, तो सिर्फ 50 प्रतिशत आबादी को ही कोरोना वायरस से संक्रमित होने का खतरा हो सकता है। यदि 80 प्रतिशत आबादी मास्क पहनती है, तो इस महामारी पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जा सकती है।-यह कहना है, सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के कार्यालय में वरिष्ठ सलाहकार डॉ. शैलजा वैद्य गुप्ता का। उन्होंने यह बात भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय द्वारा सार्स-सीओवी-2 कोरोना वायरस से जुड़ी एक नियमावली में पेश तथ्य के आधार पर कही।

डॉ. शैलजा ने कहा, “मास्क की कमी को देखते हुए इस नियमावली में घर पर मास्क बनाने पर जोर दिया गया है। यह पहल मुख्य रूप से उन लोगों के लिए है, जो मास्क पहनना चाहते हैं, लेकिन उनकी इन मास्कों तक पहुंच नहीं है। ऐसे में घर पर बनाए हुए मास्क उपयोगी हो सकते हैं। इनकी खूबी यह है कि इन्हें धोकर आप दोबारा उपयोग कर सकते हैं।”

कोरोना वायरस के खतरे को देखते हुए प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय ने घर में बने मास्क पर केंद्रित एक विस्तृत नियमावली ‘सार्स-सीओवी-2 कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए मास्क’ जारी की है।

नियमावली में विश्व स्वास्थ्य संगठन का हवाला देते हुए लिखा गया है, “मास्क उन्हीं लोगों पर प्रभावी हैं जो अल्कोहल युक्त हैंडवॉश या साबुन और पानी से हाथ साफ करते हैं। यदि आप मास्क पहनते हैं, तो आपको इसके इस्तेमाल और इसके उचित निस्तारण के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए।”

मास्क को क्यों पहना जाए? इस सवाल पर नियमावली कहती है कि एक व्यक्ति के दूसरे व्यक्ति के संपर्क में आने पर कोविड-19 वायरस आसानी से फैलता है। वायरस को ले जाने वाली बूंदें इसे तेजी से फैलाती हैं और हवा में जीवित रहते हुए यह आखिरकार विभिन्न सतहों के संपर्क में आ जाता है। कोविड-19 को फैलाने वाला वायरस सार्स-कोव-2 किसी ठोस या तरल सतह (एयरोसोल) पर तीन घंटे तक और प्लास्टिक व स्टेनलेस स्टील पर तीन दिन तक जीवित रहता है।

नियमावली में कहा गया है कि मास्क के उपयोग से संक्रमित व्यक्ति से निकले द्रवकणों में मौजूद वायरस के किसी दूसरे व्यक्ति के श्वसन तंत्र में प्रवेश की आशंका कम हो जाती है। सुरक्षित मास्क पहनकर वायरस के सांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश की संभावनाएं कम हो जाती हैं, जो इसके प्रसार को रोकने के लिहाज से अहम हो सकता है। हालांकि, मास्क को ऊष्मा, यूवी लाइट, पानी, साबुन और अल्कोहल के एक संयोजन के उपयोग से स्वच्छ किया जाना जरूरी है।

इस नियमावली को जारी करने का उद्देश्य मास्क, इनके उपयोग और मास्क के दोबारा उपयोग की सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया की सरल रूपरेखा उपलब्ध कराना है, जिससे एनजीओ और व्यक्तिगत रूप से लोग खुद ऐसे मास्क तैयार कर सकें और देशभर में तेजी से ऐसे मास्क अपनाए जा सकें। प्रस्तावित डिजाइन के मुख्य उद्देश्यों में सामग्रियों तक आसान पहुंच, घरों में निर्माण आसान करना, उपयोग और फिर से उपयोग को आसान बनाना शामिल है।

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इंदौर में सोशल डिस्टेंसिंग से बेरुखी महंगी पड़ी

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इंदौर, 2 अप्रैल | स्वच्छता का परचम लहराने वाला मध्य प्रदेश का इंदौर इन दिनों देश और दुनिया में फैली कोरोना वायरस की महामारी से जूझ रहा है। स्वच्छता के बावजूद आखिर क्या वजह रही कि इंदौर में कोरोना के मरीज बढ़ते गए। इनमें एक जो प्रमुख वजह रही वह है सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न किया जाना। इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जुड़े और आधुनिक सुविधाओं वाले शहर में शुरुआती केस आने के बाद भी समय पर प्रबंध नहीं किए गए, जिनकी जरूरत थी। शहर में जांच की सुविधा नहीं होना भी अहम वजह रही।

इंदौर की स्थिति पर गौर करें तो एक बात साफ है कि राज्य का सबसे विकसित और आधुनिक सुविधाओं वाला शहर है। यहां अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है और कई देशों की उड़ानें भी आती रही है, इतना ही नहीं रेल और बस सुविधा के मामले में अव्वल है। कई राज्यों से सीधा संपर्क है। औद्योगिक दृष्टि से भी यहां कई बड़े उद्योग हैं, जिससे देशी-विदेशी लोगों की आवाजाही कुछ ज्यादा ही रहती है। इसके अलावा यहां दूसरे स्थानों के हजारों छात्र अध्ययन करने और शिक्षित व्यक्ति रोजगार की तलाश में आते है। वहीं इंदौर के हजारों बच्चे दूसरे शहर और विदेशों में पढ़ते हैं, जो हाल ही में लौटे भी है।

लंबे अरसे से इंदौर और मालवा निमाड़ के क्षेत्र में सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर काम करने वाले जन स्वास्थ्य अभियान के राष्ट्रीय सह संयोजक अमूल्य निधि का कहना है, “इंदौर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़ा हुआ महानगर है यहां कई देशों से फ्लाइट आती हैं और पड़ोसी राज्य गुजरात और महाराष्ट्र से भी बड़ी संख्या में लोग आते हैं। कोरोना महामारी की जब बात सामने आई तब इंदौर में वह प्रबंध नहीं किए गए, जिनकी जरूरत थी। एक तो जांच की सुविधा नहीं थी, दूसरा सोशल डिस्टेंसिंग को ध्यान में नहीं रखा गया। यही कारण रहा कि इक्का-दुक्का मरीज कभी आए होंगे, जिनमें यह संक्रमण रहा होगा और वह लगातार समाज के संपर्क में रहे जिससे यह तेजी से फैल गया।”

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए अमूल्य निधि कहते हैं, “मरीजों की संख्या बढ़ने का दूसरा कारण भी है। पहले कम सैंपल लिए जा रहे थे और जांच रिपोर्ट उन सैंपलों की ही आ रही थी। अब ज्यादा नमूने लिए जा रहे है और रिपोर्ट भी ज्यादा आ रही है। इसे नकारात्मक रूप में नहीं लेना चाहिए बल्कि ज्यादा मरीज पाए जा रहे हैं तो यह सुरक्षा ज्यादा बढ़ाने की ओर हमें तैयार रहने का संदेश भी दे रहा है।”

इंदौर फार्मासिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष विनय बाकलीवाल भी मानते हैं, “इंदौर में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं किया गया और बीमारी फैलने की सबसे बड़ी वजह यही रही। जब लॉकडाउन हुआ है तो अब प्रयास हो रहे हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्दी ही मरीजों की पहचान हो जाएगी और यह शहर सुरक्षित रहेगा।

इंदौर में मरीजों की संख्या बढ़ने के सवाल पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. प्रवीण जरिया ने आईएएनएस से कहा, “यह बात सही है कि इंदौर में संक्रमित मरीजों की संख्या और स्थानों की तुलना में कहीं ज्यादा है। मगर राहत की बात यह है कि गिनती के परिवारों के लोग ज्यादा संक्रमित हैं और उन्हीं के संपर्क में आए लोग संक्रमित पाए जा रहे हैं। प्रशासन ने इसीलिए लोगों को क्वारंटाइन में रखा है और आइसोलेट किया जा रहा है ताकि यह बीमारी आगे न फैल सके।”

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी इस बात को मान चुके है कि इंदौर के कुछ खास इलाकों में ही इस वायरस का संक्रमण फैला है। साथ ही उन्होंने लोगों से लॉकडाउन का पालन करने और सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखने पर जोर दिया। ऐसा इसलिए क्योंकि घरों में रहकर ही इस बीमारी की चेन को तोड़ा जा सकता है।

यह बात भी सामने आ रही है कि इंदौर के रानीपुरा, नयापुरा, दौलतगंज, हाथीपाला आदि स्थानों पर ही सबसे ज्यादा संक्रमित मरीज पाए जा रहे है। यहां बड़ी संख्या में लोगों को क्वारंटाइन और आइसोलेशन की प्रक्रिया में रखा गया है। होटल और निजी चिकित्सा महाविद्यालयों में इन मरीजों के लिए खास इंतजाम किए जा रहे हैं।

राज्य में कोरोना वायरस का सबसे ज्यादा असर इंदौर में नजर आ रहा है। यहां मरीजों की संख्या बढ़कर 75 हो गई है, वहीं राज्य में पीड़ितों की संख्या 98 है। अब तक छह लोगों की मौत हो चुकी है। इंदौर के अलावा भोपाल में चार, जबलपुर में आठ, ग्वालियर व शिवपुरी में दो-दो, खरगोन एक और उज्जैन में छह मरीज हैं। इस तरह राज्य में अब कोरोना के पाजिटिव मरीजों की संख्या बढ़कर 98 हो गई है।

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