संसद का बीता बजट सत्र 18 साल में सबसे कम उत्पादक | WeForNewsHindi | Latest, News Update, -Top Story
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संसद का बीता बजट सत्र 18 साल में सबसे कम उत्पादक

पीआरएस के अनुसार, बजट सत्र साल 2000 के बाद सबसे कम उत्पादक रहा है। पीआरएस संसद के कामकाज को ट्रैक करता है।

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नई दिल्ली, 6 अप्रैल | संसद के बजट सत्र का शुक्रवार को समापन हो गया। सत्र का दूसरा चरण पूरी तरह हंगामे की भेंट चढ़ गया। सरकार व विपक्ष के बीच गतिरोध लगातार कायम रहा। सत्तापक्ष को अच्छा बहाना मिला, विपक्ष एक पखवाड़े बाद भी अविश्वास प्रस्ताव ला न सका। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने विभिन्न विपक्षी पार्टियों द्वारा पटल पर रखे गए अविश्वास प्रस्ताव को नहीं लिया। उन्होंने सदन में ‘व्यवधान’ का हवाला दिया और कहा कि वह व्यवधान की वजह से प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सदस्यों की गणना करने में सक्षम नहीं हैं।

अविश्वास प्रस्ताव के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन जरूरी होता है। नियम में यह भी कहा गया है एक बार अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देने के बाद अध्यक्ष को सभी दूसरे कामकाज निलंबित करने होते हैं और प्रस्ताव को सदन पटल पर लाना होता है।

संसद में गतिरोध को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का खेल जारी रहा। इस दौरान बजट, अनुदान मांगों व वित्त विधेयक को कुछ मिनटों में बिना किसी चर्चा के पारित कर दिया गया।

बजट सत्र का पहला चरण (29 जनवरी से 9 फरवरी तक) उत्पादक रहा, जबकि 5 मार्च से दूसरे चरण में अन्नाद्रमुक (एआईएडीएमके), तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) व वाईएसआर कांग्रेस के सदस्यों के सदन में नारेबाजी, तख्तियां दिखाने व हंगामे के बीच लोकसभा व राज्यसभा को बार-बार स्थगित करना पड़ा।

शुरुआत में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस व वाम पार्टियों के बैंक धोखाधड़ी, एससी/एसटी अधिनियम के प्रावधानों को ‘हल्का’ करने, कृषि संकट जैसे मुद्दों को लेकर उनकी मांगों के बीच समानता रही, जबकि टीडीपी व वाईएसआर कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश के लिए विशेष दर्जा की मांग को लेकर दबाव बनाया व अन्नाद्रमुक सदस्यों ने कावेरी प्रबंधन बोर्ड बनाने की मांग की।

करोड़ों रुपये के बैंकिंग धोखाधड़ी की चर्चा संसद में जिस नियम के तहत होनी थी, वही सरकार व विपक्ष के बीच गतिरोध का कारण था।

पीआरएस के अनुसार, बजट सत्र साल 2000 के बाद सबसे कम उत्पादक रहा है। पीआरएस संसद के कामकाज को ट्रैक करता है।

संसद के दोनों सदनों ने 2000 के बाद से सबसे कम समय चर्चा पर खर्च किया।

इस सत्र में साल 2014 के बाद से सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर सबसे कम संख्या में चर्चा हुई और यह लोकसभा के प्रश्नकाल का सबसे खराब प्रदर्शन रहा। लोकसभा में विधायी कामकाज पर सिर्फ एक फीसदी व राज्यसभा में छह फीसदी उत्पादक समय खर्च किया गया।

पीआरएस विधायी शोध के कार्यक्रम अधिकारी तृणा राय ने आईएएनएस से कहा, “बार-बार व्यवधान के कारण लोकसभा ने अपने तय समय का सिर्फ 22 फीसदी कार्य किया और राज्यसभा ने 27 फीसदी कार्य किया। संसद अपने संवैधानिक दायित्व का पालन करने में सक्षम नहीं रही जो चिंता का विषय है।”

जैसा कि हमेशा से होता आया है, गतिरोध के लिए विपक्ष व सरकार ने एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराया।

लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन व राज्यसभा के सभापति एम. वेकैंया नायडू ने व्यवधान को लेकर अपनी गंभीर चिंता जताई।

सत्र के समापन पर अपनी टिप्पणी में सभापति नायडू ने अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि राज्यसभा में जो कामकाज हुआ, उसके बारे में उनके पास बताने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन राज्यसभा में जो नहीं हो पाया, उसके बारे में बताने को बहुत कुछ है।

इस सत्र में भारतीय जनता पार्टी राज्यसभा में भी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी और कई नए सदस्यों ने शपथ ली।

राज्यसभा के उप सभापति पी.जे. कुरियन जुलाई में सेवानिवृत्त हो रहे हैं, अगले सत्र में इस पद के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन व विपक्ष के बीच प्रतिस्पर्धा हो सकती है।

–आईएएनएस

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वित्तमंत्री का क़बूलनामा: बैंकों को भी डराती हैं CBI, CVC और CAG जैसी संस्थाएँ

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Nirmala Sitharam

भारत के संवैधानिक, क़ानूनी और सरकारी ढाँचे को जानने-समझने वाले लोग वैसे तो इतना जानते ही हैं कि CBI, CVC और CAG जैसी शीर्ष संस्थाएँ केन्द्र सरकार के इशारे पर ही काम करती हैं। इनकी निष्पक्षता और स्वायत्तता ‘हाथी के दिखाने वाले दाँतों’ की तरह ही रही हैं। इसलिए भी इन्हें केन्द्र सरकार के ‘दबंग सरकारी लठैतों’ की तरह देखा जाता रहा है। सरकारी दबंगों की इस बिरादरी में ही पुलिस के अलावा आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय (IT & ED) का नाम भी शुमार रहा है। लेकिन अब कोरोना पैकेज़ के बहाने ख़ुद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने CBI, CVC और CAG को लेकर लगाये जाने वाले तमाम आरोप और तथ्यों की परोक्ष रूप से पुष्टि कर दी है।

दरअसल, बीजेपी के प्रवक्ता नलिन कोहली को 23 मई को दिये एक ऑनलाइन वीडियो इंटरव्यू में वित्त मंत्री ने बताया कि बैंकों को ये निर्देश दिया गया है कि ‘वो तीनों Cs यानी CBI, CVC और CAG से बेख़ौफ़ होकर ‘योग्य ग्राहकों’ को स्वचालित ढंग से कर्ज़ बाँटते जाएँ।’ सीतारमन ने बताया कि उन्होंने 22 मई को सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों के CEOsऔर MDs को स्पष्ट निर्देश दिये हैं कि कोरोना पैकेज़ में जिस सेक्टरों के लिए सरकार ने 100 फ़ीसदी की गारंटी दी है, उसे लेकर बैंकों को किसी से डरने की ज़रूरत नहीं है। बीजेपी ने इस इंटरव्यू को पार्टी के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर किया है।

वित्तमंत्री ने बैंकों में बैठे डर को ख़त्म करने के बाबत साफ़ किया कि ‘यदि लोन देने का फ़ैसला आगे चलकर ग़लत साबित हुआ और इससे बैंकों को नुकसान हुआ, तो इस नुक़सान की भरपाई सरकार करेगी। किसी भी बैंक अधिकारी को दोषी नहीं ठहराया जाएगा। इसीलिए वो निडर होकर योग्य ग्राहकों को ‘अतिरिक्त टर्म लोन या अतिरिक्त वर्किंग कैपिटल लोन’ जिसके लिए भी वो सुपात्र हों, उन्हें लोन देते जाएँ।’

दरअसल, प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री ने जैसे उत्साह से ‘आओ क़र्ज़ा लो’ की ‘थीम’ पर आधारित कोरोना पैकेज़ का ऐलान किया था, वैसा उत्साह जब ग्राहकों में ही नहीं उमड़ रहा है तो बैंकों में कहाँ से नज़र आएगा? 21 लाख करोड़ रुपये के पैकेज़ में लघु, छोटे और मझोले उद्यमियों (MSME) के लिए 3 लाख करोड़ रुपये की इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम (ECLGS) शामिल है।

वित्तमंत्री जानती हैं कि बैंक अधिकारी ‘तेज़ी से सही फ़ैसले’ इसलिए नहीं ले पाते क्योंकि उन्हें केन्द्रीय जाँच ब्यूरो (CBI), केन्द्रीय सतर्कता आयोग (CVC) और भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) का ख़ौफ़ सताता रहता है कि ज़रा सी चूक हुई नहीं कि ये तीनों संस्थाएँ उन्हें धर दबोचेंगी। यहाँ सोचने वाली बात तो ये भी है कि बैंकों के अफ़सरों का डर नाहक तो नहीं हो सकता। आख़िर, वो भी तो दिन-रात इन तीनों संस्थाओं का रवैया और तेवर देखते ही रहे होंगे।

बैंक के अफ़सरों की भी कुछ आपबीती होगी, कुछ निजी तज़ुर्बा ज़रूर रहा होगा। वर्ना, ‘पक्की’ नौकरी कर रहे बैंकों के अफ़सर लोन बाँटने से भला क्यों डरते? वो इतने नादान भी नहीं हो सकते कि रस्सी को साँप समझ लें। लोन बाँटना उनका पेशेवर काम है। कर्तव्य है। इसे वो सालों-साल से करते आये हैं। इसके बावजूद यदि उनमें कोई डर समा गया है तो फिर इसकी कोई न कोई ठोस वजह ज़रूर होगी।

साफ़ है कि निर्मला सीतारमन बैंकिंग सेक्टर की अन्दर की बातों से वाफ़िक थीं। तभी तो उन्होंने सफ़ाई दी कि वित्त मंत्रालय ने अपनी कई ऐसी अधिसूचनाओं को वापस ले लिया है जिसकी वजह से बैंक अधिकारियों में CBI, CVC और CAG का डर बैठ गया था। साफ़ है कि बैंक के अफ़सरों का डर पूरी तरह से वाजिब था। वर्ना, सरकार अपनी ही अधिसूचनाओं को वापस क्यों लेती? अपने क़दम पीछे क्यों खींचती? मज़े की बात ये है कि बीते 7-8 महीने के दौरान भयभीत बैंक अफ़सरों को ख़ुद वितमंत्री तीन बार कह चुकी हैं कि उन्हें ‘3-Cs’ से नहीं डरना चाहिए।

अब ज़रा सोचिए कि यदि वस्तुस्थिति वाक़ई डरने लायक़ नहीं होती तो क्या बैंक अफ़सरों के मन से CBI, CVC और CAG का डर निकल नहीं गया होता! यदि वित्तमंत्री ही अपने बैंक अफ़सरों के मन से डरावने ख़्याल नहीं निकाल पा रहीं तो समस्या कितनी गम्भीर होगी। दरअसल, ECLGS पैकेज़ का सीधा सा नज़रिया है कि ‘यदि किसी कम्पनी ने बैंक से एक निश्चित सीमा तक लोन लिया है, या उसमें एक निश्चित सीमा तक निवेश हुआ है, या उसका एक निश्चित टर्नओवर है, तो यदि वो लॉकडाउन से बने हालात के बाद अपने कारोबार को फिर से चालू करने के लिए अतिरिक्त टर्म लोन या वर्किंग कैपिटल ले सकते हैं।’

वित्त मंत्रालय की इस नीति और इससे जुड़े ऐलान का एक स्याह पक्ष ये भी बैंकों के कर्ज़ो पर वसूला जाने वाला ब्याज़ दर क़तई रियायती नहीं है। चरामरा चुकी अर्थव्यवस्था में जब आमदनी औंधे मुँह गिरी पड़ी हो तब ऊँची ब्याज़ दरों पर बैंकों से पैसा उठाना और फिर इसकी किस्तें भरना आसान नहीं है। फिर भी वित्तमंत्री को उम्मीद है कि ‘पहली जून से बिना किसी कोलैटरल (यानी गिरवी या गारंटी) वाली नगदी का बैंकों से प्रवाह शुरू हो जाएगा।’ कर्ज़ के प्रवाह की रफ़्तार से जल्द ही पता चल जाएगा कि वास्तव में ज़मीनी स्तर पर बैंकों के अफ़सर कितना निडर हो पाये!

दरअसल, CBI, CVC और CAG से भी बढ़कर बैंकों को अपने नये NPA (डूबा कर्ज़) की चिन्ता खाये जा रही है। सरकार सिर्फ़ मौजूदा पैकेज़ वाले फंड को लेकर ही तो गारंटी दे रही है। जबकि बैंक तो अपने ही पुराने कर्ज़ों को लेकर मातम मना रहे हैं। इसकी सीधी सी वजह है कि NPA के बढ़ने से बैंकों की साख गिरती है। बैंकों के सरकारी होने के नाते सरकारें आम जनता के टैक्स के पैसों से बैंकों के नुक़सान की भरपाई देर-सबेर भले ही कर दे। लेकिन बैंकों को अपनी साख सुधारने में बहुत वक़्त लगता है।

इसी प्रसंग में ये समझना ज़रूरी है कि 21 लाख करोड़ रुपये के कोरोना पैकेज़ में 19 लाख करोड़ रुपये की ऐसी पेशकश हैं जिन्हें कर्ज़ की योजनाएँ ही कहा जाएगा। अभी सरकार ने सिर्फ़ कर्ज़ के लिए फंड बनाये हैं। इन्हें आकर्षक बनाने के लिए ब्याज़ दरों में कोई रियायत नहीं दी गयी है। इसीलिए, उद्यमियों की ओर से कर्ज़ लेकर अर्थव्यवस्था में नयी जान फूँकने की कोशिशों में ढीलापन नज़र आ रहा है। लॉकडाउन अब भी जारी है। मज़दूर पलायन कर रहे हैं। माँग-पक्ष बेहद कमज़ोर है। हरेक तबके की आमदनी में भारी गिरावट आयी है। नौकरियों में हुई छँटनी और बेहिसाब बेरोज़गारी ‘कोढ़ में खाज़ का काम’ कर रही है।

इन सभी परिस्थितियों के बीच बहुत गहरा आन्तरिक सम्बन्ध है। इसीलिए कर्ज़ लेकर अपनी गाड़ी को पटरी पर लाने वाली मनोदशा कमज़ोर पड़ी हुई है। इसीलिए भले ही बैंक निडर होकर कर्ज़ बाँटने की तैयारी करने लगें लेकिन मन्दी के दौर में कर्ज़दार भी कहाँ मिलते हैं? कोरोना से पहले भी बैंकों को कर्ज़दारों की तलाश कोई कम नहीं थी। दरअसल, कर्ज़ लेकर उसे चुकाने वाली कमाई भी तभी हो पाती है जबकि अर्थव्यवस्था की विकास दर ऊँची हो। माँग में तेज़ी हो। लेकिन अभी ऊँची और तेज़ी तो बहुत दूर की कौड़ी है। अभी तो ये सफ़ाचट है। अर्थव्यवस्था डूब रही है। इसीलिए, निर्मला सीतारमन के सपनों के साकार होने में भारी सन्देह है।

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केरल के मुख्यमंत्री का गृहनगर कोरोनावायरस हॉटस्पॉट घोषित

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तिरुवनंतपुरम। कोरोनावायरस के आंकड़ों की गई समीक्षा के बाद मुख्यमंत्री पिनरई विजयन के गृहनगर कन्नूर को कोरोनावायरस हॉटस्पॉट घोषित कर दिया गया है।

विजयन के गृह जनपद कन्नूर में 10 नए मामले सामने आए, जिससे यहां पॉजिटिव मामलों की संख्या बढ़कर 77 हो गई है।

मुख्यमंत्री ने सोमवार को तीन अन्य स्थानों को कोरोनावायरस हॉटस्पॉट घोषित किया, और इस समय राज्य में 59 हॉटस्पॉट हैं। हालांकि विजयन कुछ समय से अपने गृहनगर नहीं गए हैं, क्योंकि वह राज्य की राजधानी में ठहरे हुए हैं।

केरल में सोमवार को 49 नए मामले सामने आए हैं। राज्य में सक्रिय मामलों की संख्या कुल 359 है, जबकि 532 लोगों को इस वायरस से ठीक कर अस्पतालों से छुट्टी दे दी गई है।

राज्य के कृषि मंत्री वी.एस. सुनीलकुमार ने मामलों में वृद्धि पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य में मामले उम्मीद से ज्यादा हैं, लेकिन हम चुनौती का सामना करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।

इस बीच, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के शीर्ष अधिकारी राजीव जयदेवन ने कहा, “केरल के जो हालात हैं वह अभी भी काबू में हैं, राज्य के बाहर से आने वालों के लिए चौदह दिनों का क्वारंटीन अवधि पूरा करना अनिवार्य है। सभी को सावधान रहने की जरुरत है।”

–आईएएनएस

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राष्ट्रीय

मप्र में स्नातक व स्नातकोत्तर अंतिम वर्ष की परीक्षाएं 29 जून से

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भोपाल। मध्यप्रदेश में स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं और पाठ्यक्रमों के अंतिम वर्ष और सेमेस्टर की परीक्षाएं 29 जून से 31 जुलाई के बीच ली जाएगी। यह फैसला राज्यपाल लालजी टंडन की अध्यक्षता में राजभवन में हुई बैठक में लिया गया, जिसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी मौजूद थे। आधिकारिक तौर पर बताया गया कि स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं और पाठ्यक्रमों के अंतिम वर्ष व सेमेस्टर की परीक्षाएं 29 जून से 31 जुलाई के बीच ली जाएगी। यह व्यवस्था सभी निजी विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों पर भी लागू होगी।

बैठक में तय हुआ है कि उच्च शिक्षा की प्रथम, द्वितीय वर्ष की कक्षाओं, पाठ्यक्रमों की नियमित परीक्षाएं स्थिति सामान्य होने पर ली जाएंगी। स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं और पाठ्यक्रमों के अंतिम वर्ष और सेमेस्टर की परीक्षाएं ऑफ लाइन मोड में परीक्षा केंद्रों पर होगी।

परीक्षा केंद्रों पर सामाजिक दूरी की सावधानियों का पूरा पालन किया जाएगा।

स्नातकोत्तर कक्षाओं के पूर्वाद्ध और स्नातक कक्षाओं और पाठ्यक्रमों के प्रथम एवं द्वितीय वर्ष व सेमेस्टर के छात्र-छात्राओं को अगली कक्षा में एक सितंबर, 2020 से नए सत्र में प्रवेश दिया जाएगा। वहीं इस वर्ष स्नातकोत्तर पूर्वार्ध और स्नातक कक्षाओं व पाठ्यक्रमों के प्रथम वर्ष व सेमेस्टर में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों का नया सत्र एक अक्टूबर से शुरू होगा।

राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं के अंतिम वर्ष व सेमेस्टर की परीक्षाएं 16 से 30 जून के बीच ली जाएंगी। अंतिम वर्ष की कक्षाओं और पाठ्यक्रमों की परीक्षा पारंपरिक प्रणाली से होगी। इनके परिणाम 15 जुलाई तक घोषित हो जाएंगे।

इन परीक्षाओं को कोरोनावायरस के संक्रमण को रोकने के मकसद से को टाला गया था। बैठक में तय किया गया है कि परिस्थितियां सामान्य न होने की स्थिति में परीक्षाएं ऑनलाइन मोड में ली जाएंगी। ऑनलाइन परीक्षा दो घंटे की होगी। प्रश्नपत्र बहुविकल्पीय रहेंगे। सभी परीक्षाएं प्रतिदिन तीन पालियों में होंगी।

बैठक में निर्णय लिया गया है कि विश्वविद्यालय द्वारा प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय वर्ष की कक्षाओं व सेमेस्टर के छात्रों की परीक्षाएं ऑफ लाइन पेन-पेपर मोड के माध्यम से 2 जुलाई से 31 जुलाई के बीच ली जाएंगी। परीक्षा परिणाम 25 अगस्त तक घोषित किए जाएंगे। यदि कोई परीक्षार्थी अपरिहार्य कारणों से परीक्षा में उपस्थित नहीं हो पाता है तो उसके लिए अलग से विशेष परीक्षा होगी।

–आईएएनएस

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