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स्वास्थ्य

सफेद मोतियाबिंद का नवीनतम इलाज ‘फेमटोसेकेंड’

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आज भी मोतियाबिंद ही दुनियाभर में दृष्टिहीनता का सबसे बड़ा कारण है, लेकिन नेत्र चिकित्सा के क्षेत्र में जो प्रगति हुई है, उसने इसका इलाज आसान कर दिया है।

सफेद मोतियाबिंद का नवीनतम इलाज लेजर तकनीक ‘फेमटोसेकेंड’ के रूप में सामने आया है। इस तकनीक के अंतर्गत आंखों में एक उच्च विभेदन (रिजॉल्यूशन) वाली छवि निर्मित होती है जो लेजर के लिए मार्गदर्शन देने का काम करती है। इस तकनीक के आ जाने से पूर्व नियोजित कॉर्निया छेदन आसान हो गया है।

लेजर सर्जरी के दौरान अग्रवर्ती लेंस कैप्सूल यानी कैप्सूलोरेक्सिस में एक सुकेंद्रित, अनुकूलतम आकार का मामूली सा छिद्र किया जाता है और फिर लेंस को लेजर किरणों का इस्तेमाल करते हुए नरम और द्रवित कर दिया जाता है। इसके बाद लेंस को छोटे कणों में तोड़ा जाता है।

सेंटर फॉर साइट के निदेशक डॉ. महिपाल एस. सचदेव का कहना है कि शल्य चिकित्सक को इस नई प्रक्रिया का सबसे बड़ा फायदा यह मिलता है कि उसे लेंस को तराशने और काटने जैसे तकनीकी रूप से कठिन काम नहीं करने पड़ते हैं।

उन्होंने कहा कि इस तकनीक में फेको-एमलसिफिकेशन ऊर्जा को 43 प्रतिशत कम कर दिया जाता है और फेको-समय को 51 प्रतिशत घटाया जाता है। इससे ज्वलनशीलता में कमी आती है और आंखों के पहले वाली स्थिति में लौटने की प्रक्रिया में तेजी आ जाती है। साथ ही जख्म की स्थिर संरचना संक्रमण दर को भी न्यूनतम कर देती है।

देखने में भी यह अधिक बेहतर परिणाम देता हुआ प्रतीत होता है, क्योंकि सर्जरी की प्रक्रिया स्पष्ट और सटीक होती है। सफेद मोतिया के इलाज की इस नवीनतम प्रौद्योगिकी के माध्यम से हासिल होने वाला एक अन्य महवपूर्ण लाभ यह है कि यह प्रीमियम आईओएल जैसे अनुकूलित (क्रिस्टैलेंस) एवं बहुकेद्रीय लेंसों के साथ और भी बेहतर परिणाम देता है।

स्पष्ट लेजर तकनीक के साथ इन लेंसों से मिलने वाली कुल दृष्टि का स्तर बेहतर हो जाता है। इसके अलावा दृष्टि वैषम्य जैसी पहले से ही मौजूद आंखों की समस्याओं का सामना एलआरआई या लिंबल रिलैक्सिंग इंसिजंस के सुनियोजन के सहारे किया जा सकता है।

इससे यह संपूर्ण सर्जरी मरीज की जरूरतों को पूरा करने की दृष्टि से अनुकूल हो जाती है और उसे सर्वोत्तम ²ष्टि प्रदान करती है। डॉ. सचदेव के अनुसार, लेजर प्रक्रिया के इस्तेमाल से जख्म तेजी से भरते हैं, बेहतर ²ष्टि क्षमता हासिल होती है, संक्रमण एवं अन्य जटिलताओं के पैदा होने का खतरा नहीं के बराबर होता है तथा जख्म की संरचना स्थिर रहा करती है। इसके अलावा इससे आईओएल को स्पष्ट रूप से प्रवेश कराए जाने, दृष्टि वैषम्य जैसी समस्या में सुधार और प्रत्येक मरीज के सुगमता से स्वस्थ होने के फायदे हैं।

ज्यादातर नेत्र सर्जन इस नई तकनीक को अधिक सुरक्षित और सटीक मानते हैं। दुनियाभर के विशेषज्ञ इस बात को लेकर सहमत हैं कि इससे पहले के मुकाबले बेहतर परिणाम हासिल है और मरीजों की दृष्टि से भी ‘फेम्टो सेकेंड’ लेजर अधिक आकर्षक एवं सुविधाजनक साबित हुआ है।

–आईएएनएस

स्वास्थ्य

धूम्रपान करने वालों के बच्चों में इन जानलेवा बीमारियों का खतरा…

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प्रतीकात्मक तस्वीर

क्या आप लगातार धूम्रपान करते हैं? अगर हां, तो आप अपनी जिंदगी को खतरे में डालने के साथ-साथ अपने बच्चों के लिए भी खतरा पैदा कर रहे हैं।

शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि इससे वयस्कों में क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज के कारण मृत्यु का जोखिम बढ़ सकता है। अध्ययन में पाया गया कि जो लोग अपने बचपन से एक नियमित धूम्रपान करने वाले शख्स के साथ रह रहे, उनमें 31 फीसदी को क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज से मरने का खतरा अधिक होता है।

जबकि धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के धुएं के संपर्क में आने वाले नौ फीसदी वयस्कों को मरने का खतरा होता है। इसमें गंभीर हृदय रोग से 27 प्रतिशत अधिक मौत का जोखिम, 23 प्रतिशत को दौरा पड़ने से मौत का खतरा, और सीओपीडी से सबसे अधिक 42 प्रतिशत मौत का खतरा रहता है।

अमेरिका की अमेरिकन कैंसर सोसायटी के एपीडेमायोलॉजिस्ट डब्लू. रयान डायवर ने कहा, “यह पहला अध्ययन है जिसमें मध्य आयु व उससे कम उम्र में क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पुलमोनेरी डिसिज से धूम्रपान नहीं करने वाले व्यक्ति और बचपन के बीच संबंध के बारे में बताया गया है।”

उन्होंने कहा, निष्कर्षो से यह भी पता चला है कि दूसरे व्यक्ति द्वारा धूम्रपान के संपर्क में आने वाले वयस्कों में क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज से मरने का खतरा अधिक होता है। अध्ययन के लिए टीम में 50 से 74 वर्ष की उम्र के धूम्रपान नहीं करने वाले 70,900 पुरुष और महिलाएं शामिल थीं। अध्ययन के लिए उन पर 22 वर्षो तक नजर रखी गई।

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स्वास्थ्य

गोभी और ब्रोकली खाने से नहीं होगा आंतों का कैंसर…

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File Photo

गोभी या ब्रोकली जैसी हरी पत्तेदार सब्जियां खाने से आंत स्वस्थ रहते हैं और आंतों के कैंसर से बचाव होता है। एक नए अध्ययन में यह जानकारी दी गई है।

चूहों पर किए गए अध्ययन से पता चला कि जिन्हें इन्डोल 3 कार्बिनोल (आई3सी) युक्त आहार दिया गया, उनमें आंत में सूजन या आंतों के कैंसर से बचाव हुआ। गोभी और ब्रोकली में भी आई3सी पाया जाता है, जो एक एक्रियल हाइडोकार्बन रिसेप्टर (एएचआर) नाम के प्रोटीन को सक्रिय करता है, जिससे आंतों के कैंसर से बचाव होता है।

एएचआर एक पर्यावरणीय सेंसर के रूप में काम करता है तथा प्रतिरक्षा थंत्र और आंतों की एपिथिलिएल कोशिकाओं को संकेत देता है कि सूजन से बचाव करने की कोशिश करें और आंत में पाए जाने वाले खरबों बैक्टीरिया से प्रतिरक्षा प्रदान करता है।

शोध प्रमुख ब्रिटेन के फ्रांसिस क्रिक इंस्टीट्यूट की अमीना मेतीजी का कहना है, “जब कैंसर ग्रस्त चूहों को आई3सी से भरपूर डायट खिलाया गया, तो उनमें ट्यूमर की संख्या में कमी देखी गई। यह शोध इम्युनिटी नाम के जर्नल में प्रकाशित किया गया है।

–आईएएनएस

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स्वास्थ्य

डिजिटल डिवाइसों की नीली रोशनी से अंधेपन का खतरा

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प्रतीकात्मक फोटो

वाशिंगटन| डिजिटल डिवाइसों से निकलनेवाली नीली रोशनी अंधेपन का कारण बन सकती है। शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष दिया है।

समाचार एजेंसी सिन्हुआ की सोमवार की रिपोर्ट में बताया गया कि अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ टोलेडो में किए गए एक शोध के मुताबिक, लगातार नीला प्रकाश देखने से आंखों की प्रकाश के लिए संवेदनशील कोशिकाएं में जहरीले अणु उत्पन्न हो सकते हैं, जो धब्बेदार अपघटन का कारण बन सकता है। यह अमेरिका में अंधापन के प्रमुख कारणों में से एक है।

यूनिवर्सिटी के रसायन और जैवरसायन विभाग के सहायक प्रोफेसर अजित करुणाथने ने बताया, “यह कोई रहस्य नहीं है कि नीला प्रकाश हमारे देखने की क्षमता को हानि पहुंचाता है और आंख की रेटिना को नुकसान पहुंचाता है। हमारे शोध से यह पता चलता है कि ऐसा कैसे होगा। हमें उम्मीद है कि इससे इसे रोकने के लिए दवाइयां बनाने में मदद मिलेगी और नए प्रकार का आई ड्रॉप बनाया जा सकेगा।”

धब्बेदार अपघटन का मुख्य कारण फोटोरिसेप्टर कोशिकाओं का मरना है, जो प्रकाश के प्रति संवेदनशील कोशिकाएं होती हैं।

–आईएएनएस

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