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तकनीक के इस्तेमाल से कहीं मुश्किल है इसका दुरुपयोग रोकना

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तकनीकों की वजह से हमारी ज़िन्दगी बहुत आरामदायक बन पायी है। लेकिन तकनीक में ही हमारी तबाही के बीज भी मौजूद हैं। इतिहास गवाह है कि हरेक तकनीकी क्रान्ति ने हमारी ज़िन्दगी को ख़ुशगवार बनाया है। लेकिन जब कभी इसका बेज़ा इस्तेमाल हुआ तो इसने करोड़ ज़िन्दगियों को तबाह कर दिया। इसकी वजह ये है कि तकनीकें अपने स्वभाव से ही नैतिकता के प्रति उदासीन होती हैं। इनका सही प्रयोग जीवन सँवार देता है तो बेज़ा इस्तेमाल इसे उजाड़ देता है। परमाणु ऊर्जा से करोड़ों घरों में रौशनी पहुँचायी जा सकती है, तो इसी से लाखों लोगों को पल भर में ही मौत के घाट पहुँचाया जा सकता है।

तकनीक का नैतिकता से कोई वास्ता नहीं, लेकिन ये दोधारी तलवार जैसी होती है। तकनीक का सही इस्तेमाल जहाँ वरदान साबित हो सकता है वहीं ग़लत हाथों में पड़कर ये अभिश्राप साबित होगी। इसीलिए, सरकारी संस्थाओं को आधार का बेहद होशियारी से और बेहद ज़रूरी होने पर ही इस्तेमाल करना चाहिए।

तकनीक की दुनिया ने हमारी दूरियों को मिटा दिया है। हमारी निजता भी ख़ासी सिकुड़ चुकी है। इसे टाला नहीं जा सकता। जब हम डिज़ीटल प्लेटफॉर्म का सहारा लेते हैं, तभी हम स्वेच्छा से अपनी निजी सूचनाओं को साझा करने के लिए अपनी रज़ामन्दी दे देते हैं। डिज़ीटल दुनिया में भौतिक स्थान की अहमियत बेमानी हो जाती है। ‘स्थान’ की समूची कल्पना परिवर्तित हो चुकी है। डिज़ीटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते वक़्त हमें अपना जो ब्यौरा साझा करना पड़ता है, उसी की बदौलत ‘उबर’ जैसी सर्विस को हमारे ‘लोकेशन’ के अलावा ये भी पता चल जाता है कि हम कहाँ जाना चाहते हैं। एयरलाइंस भी लगातार हमसे संवाद करके हमारी यात्रा-योजना को समायोजित करती रहती हैं। हमारी छुट्टियों को भी डिज़ीटल तरीके से नियोजित किया जा सकता है। और, इसके लिए हम अपने परिवार का ब्यौरा भी साझा करते हैं। सच तो ये है कि ऐसी तकनीकों ने हमारी ज़िन्दगी को बहुत आसान बना दिया है।

व्यावसायिक डिज़ीटल प्लेटफॉर्म अपने ‘सर्वर’ के ज़रिये हमें ऐसी सूचनाएँ और डाटा सुलभ करवाते हैं, जिसमें हमारी दिलचस्पी होती है। इस तरह डिज़ीटल दुनिया हमें भौतिक दुनिया से दूर ले जाती है। सरकारें भी हमें व्यावसायिक लाभ के बग़ैर कई सुविधाएँ सुलभ करवाती हैं। हालाँकि, इसके बदले उन्हें 130 करोड़ भारतीय का ब्यौरा जुटाना पड़ता है। इस डाटा का कई तरह से इस्तेमाल होता है। जैसे आधार कार्ड के बदौलत सरकारी सस्ते राशन को सिर्फ़ उन्हीं लोगों तक पहुँचाना सम्भव हो पाया है, जो उसके हक़दार हैं। इससे चोरी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगता है। सरकार चाहती है कि हमारे आधार का ब्यौरा अन्य महकमों के लिए भी सुलभ रहे। जैसे, बैंकिंग लेन-देन को आधार से जोड़ा जाए। इसकी वजह से हमारी बायोमैट्रिक पहचान बैंकों समेत ढेर सारी सरकारी और ग़ैरसरकारी संस्थाओं से साझा हो जाती है।

सारे पूरे प्रसंग में सुप्रीम कोर्ट का एक ताज़ा फ़ैसला बहुत महत्वपूर्ण बनकर उभरा है। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने हमारी निजता के अधिकार और दायरे को परिभाषित किया है। फ़ैसले ने निजता के अधिकार को मूल अधिकार का हिस्सा माना है और कहा है कि इसकी पवित्रता की हिफ़ाज़त होनी ही चाहिए, क्योंकि इसका सम्बन्ध हमारी गरिमा और आज़ादी से है। इसीलिए निजी क़िस्म की जानकारियों की गोपनीयता न सिर्फ़ देश में बल्कि दुनिया भर में क़ायम रहनी ही चाहिए।

तकनीकों की वजह से हमारी ज़िन्दगी बहुत आरामदायक बन पायी है। लेकिन तकनीक में ही हमारी तबाही के बीज भी मौजूद हैं। इतिहास गवाह है कि हरेक तकनीकी क्रान्ति ने हमारी ज़िन्दगी को ख़ुशगवार बनाया है। लेकिन जब कभी इसका बेज़ा इस्तेमाल हुआ तो इसने करोड़ ज़िन्दगियों को तबाह कर दिया। इसकी वजह ये है कि तकनीकें अपने स्वभाव से ही नैतिकता के प्रति उदासीन होती हैं। इनका सही प्रयोग जीवन सँवार देता है तो बेज़ा इस्तेमाल इसे उजाड़ देता है। परमाणु ऊर्जा से करोड़ों घरों में रौशनी पहुँचायी जा सकती है, तो इसी से लाखों लोगों को पल भर में ही मौत के घाट पहुँचाया जा सकता है।

संचार के हरेक माध्यम की हक़ीक़त भी कुछ ऐसी ही है। जो सुविधा हमें औरों से जोड़ती है, वही हमारी ज़िन्दगी को ख़ौफ़ज़दा भी बना सकती है। हम जिन लोगों की सेवाएँ अपने दरवाज़े पर पाने के लिए उन्हें अपना निजी ब्यौरा देते हैं, यदि वही जानकारियों ग़लत हाथों में पहुँच जाएँ तो हमारा जीना मुहाल हो सकता है। इसीलिए डाटा की सुरक्षा की अहमियत बहुत ज़्यादा है।

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वो श्रीकृष्णा समिति की सिफ़ारिशों को ध्यान में रखते हुए नागरिकों से जुड़े डाटा की हिफ़ाज़त के लिए ज़रूरी क़ानून उपाय सुनिश्चित करे। डाटा की सुरक्षा का पुख़्ता इन्तज़ाम करा मौजूदा दौर की सबसे बड़ी चुनौती है। क्योंकि डाटा के क़िले में किसी युद्ध के बग़ैर भी घुसा जा सकता है और तबाही लायी जा सकती है। दुनिया भर में आज सरकारें भी हैकिंग से जुड़ गयी हैं। इरान के परमाणु कार्यक्रम में ‘स्टक्सनेट’ चुपके से जा घुसा। इसने अलग-अलग मोटरों का रफ़्तार में ऐसी तेज़ी पैदा कर दी कि वो फट पड़ीं। इसका असर इतना तगड़ा था कि इरान को 2015 में न सिर्फ़ बातचीत के लिए बल्कि अपने परमाणु कार्यक्रम को ख़त्म करने के लिए भी राज़ी होना पड़ा। रियाद में ‘शामून’ वायरस (मालवेयर) ने सउदी तेल कम्पनी ‘अरामको’ का चक्का जाम कर दिया था। चीनी में बसे हैकर्स ने फेसबुक, लिंक्डइन और ट्वीटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को जाम कर दिया था।

तकनीक हमें साधन सम्पन्न बनाती है तो ये हमें कंगाल भी बना सकती है। ये जोड़ती है तो तोड़ भी सकती है। यदि डाटा की सुरक्षा बेहद पुख़्ता नहीं हुई तो देश में बैठा कोई हैकर हमारे बैंकिंग गतिविधियों को अपनी मुट्ठी में कर लेगा, हमारी पूरी बिजली वितरण व्यवस्था को ध्वस्त कर देगा, हमारे विमानों का उड़ानें ठप हो सकती हैं। कुलमिलाकर, ऐसे हालात पैदा किये जा सकते हैं, जिसे किसी देश या संस्था ने पहले कभी नहीं झेला होगा। इसलिए, पूरी चुनौती में क़ानूनी उपाय तो सिर्फ़ एक पहलू है। असली मक़सद तो लगातार अपने डाटा और निजता की सुरक्षा को सुनिश्चित करना है। क्योंकि डिज़ीटल दुनिया, अब कहीं नहीं जाने वाली, ये तो यही रहेगी!

(साभार: डीएनएइंडिया डॉट कॉम। लेखक पूर्व केन्द्रीय मंत्री, राज्यसभा सदस्य और काँग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं।)

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