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स्वास्थ्य

टीबी से महिलाओं और पुरुषों में बांझपन का खतरा

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तपेदिक, क्षय रोग के नाम से जाने जानी वाली बीमारी ट्यूबरकुल बेसिलाइ (टीबी) को दुनिया भर में बीमारी से होने वाली मौतों के 10 प्रमुख कारणों में से एक माना जाता है।

यह घातक बीमारी लोगों के शरीरों के दूसरे भागों में फैलकर उन्हें संक्रमित कर सकती है, जिससे महिलाओं और पुरुषों दोनों में बांझपन का खतरा हो सकता है। इंदिरा आईवीएफ हॉस्पिटल कि आईवीएफ एक्सपर्ट डॉ. निताशा गुप्ता ने इस घातक बीमारी के बारे में कहा, माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस, जिसके कारण टीबी होती है, प्रतिवर्ष 20 लाख से अधिक लोगों को प्रभावित करता है।

यह बीमारी प्रमुख रूप से फेफड़ों को प्रभावित करती है लेकिन अगर इसका समय रहते उपचार न कराया जाए तो यह रक्त के द्वारा शरीर में फैलकर उन्हें संक्रमित करती है।”उन्होंने कहा, “यह संक्रमण किडनी, पेल्विक, डिम्ब वाही नलियों या फैलोपियन ट्यूब्स, गर्भाशय और मस्तिष्क को प्रभावित कर सकता है।

टीबी एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है क्यों कि जब बैक्टीरियम प्रजनन मार्ग में पहुंच जाते हैं, तब जेनाइटल टीबी या पेल्विक टीबी हो जाती है जो महिलाओं और पुरुषों दोनों में बांझपन का कारण बन सकता है।”

विशेषज्ञ डॉ. निताशा गुप्ता ने कहा, “महिलाओं में टीबी के कारण जब गर्भाशय का संक्रमण हो जाता है तब गर्भाशय की सबसे अंदरूनी परत पतली हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप गर्भ या भ्रूण के ठीक तरीके से विकसित होने में बाधा आती है।

जबकि पुरुषों में इसके कारण एपिडिडायमो-टिस हो जाता है, जिससे शुक्राणु वीर्य में नहीं पहुंच पाते और पुरुष ‘एजुस्पर्मिक’ हो जाते हैं।”आईवीएफ एक्सपर्ट डॉ. निताशा गुप्ता का कहना है कि टीबी से पीड़ित हर दस महिलाओं में से दो गर्भधारण नहीं कर पाती हैं, जननांगों की टीबी के 40.80 प्रतिशत मामले महिलाओं में देखे जाते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2017 में टीबी पर एक रिपोर्ट जारी थी, जिसके मुताबिक 2016 में टीबी से प्रभावित सूची में भारत 27.9 लाख मरीजों के साथ नंबर एक स्थान पर था और इसी वर्ष टीबी से करीब 4.23 लाख मरीजों की मौत हुई थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 में सबसे ज्यादा टीबी के मामले भारत, इंडोनेशिया, चीन, फिलीपींस और पाकिस्तान में दर्ज किए गए थे। इसके लक्षणों की पहचान कैसे करें, इस पर डॉ. निताशा गुप्ता ने कहा, “टीबी के कारण महिलाओं में प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर रहे कुछ लक्षणों को पहचानना बहुत मुश्किल है इसमें अनियमित मासिक चक्र, यौन सबंधों के पश्चात दर्द होना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं लेकिन कई मामलों में यह लक्षण संक्रमण के काफी बढ़ जाने के बाद में दिखाई देते हैं।

पुरुषों में शुक्राणुओं की गतिशीलता कम हो जाना और पिट्यूटरी ग्रंथि द्वारा पर्याप्त मात्रा में हार्मोनो का निर्माण न करना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। क्या इसका इलाज संभव है? इसके जवाब में डॉ. निताशा गुप्ता ने कहा, “जी हां, अब इस समस्या का उपचार संभव है। टीबी की पहचान के बाद एंटी टीबी दवाईयों से तुरंत उपचार प्रारंभ कर देना चाहिए।

एंटीबॉयोटिक्स का जो छह से आठ महीनों का कोर्स है वह ठीक तरह से पूरा करना चाहिए। अंत में संतानोत्पत्ति के लिए इन-व्रिटो फर्टिलाइजेशन या इंट्रासाइटोप्लाोज्मिक स्पार्म इंजेक्शन की सहायता भी ली जाती है।

लेकिन ऐसी महिलाओं को मां बनने के बाद एक नई चिंता सताने लगती है कि क्या स्तनपान कराने से उनका बच्चा संक्रमण की चपेट में तो नहीं आ जाएगा। ऐसी माताओं को चाहिए कि जब वे अपने बच्चों को स्तनपान कराएं तो चेहरे पर मास्क लगा लें।”

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर में 2014 में इस बीमारी से 15 लाख लोगों की मौत हुई थी। दुनिया में जानलेवा बीमारियों में एचआईवी के साथ इस रोग का भी नंबर आता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की वैश्विक तदेपिक रिपोर्ट 2015 के मुताबिक, 2014 में टीबी के 96 लाख मामले दर्ज किए गए थे, जिनमें से 58 फीसदी मामले दक्षिण-पूर्वी एशिया और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र से थे।

डॉ. निताशा ने कहा, “टीबी की चपेट में आने से बचने के लिए भीड़-भाड़ वाले स्थानों से दूर रहें, जहां आप नियमित रूप से संक्रमित लोगों के संपर्क में आ सकते हैं। अपनी सेहत का ख्याल रखें और नियमित रूप से अपनी शारीरिक जांचे कराते रहें। अगर संभव हो तो इस स्थिति से बचने के लिए टीका लगवा लें।”

भारत की 2025 तक टीबी मुक्त होने की महात्वाकांक्षी योजना है लेकिन इस रिपोर्ट में भारत की स्थिति चिंताजनक है। फिलहाल भारत में टीबी के प्रति 1,00,000 पर 211 मामले दर्ज किए जाते हैं।

–आईएएनएस

स्वास्थ्य

मधुमेह के इलाज में स्टेम सेल के प्रयोग से जागी उम्मीद

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इंसुलिन को छिपाने वाली बीटा कोशिकाओं में ह्यूमन स्टेम सेल्स को समाहित करने के तरीके की खोज के बाद अब शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि इस तरीके को अपनाकर रक्त में ग्लूकोज के स्तर को काबू में रखने में आसानी होगी।

सेंट लुइस की वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं का कहना है कि जब उन्होंने बीटा सेल्स को ऐसे चूहे में डाला जो इंसुलिन नहीं बना सकता, तब नई कोशिकाओं ने कुछ ही दिनों में इंसुलिन छिपाना शुरू कर दिया और फिर उन्होंने महीनों तक जानवरों में ब्लड शुगर कंट्रोल करना जारी रखा।

असिस्टेंट प्रोफेसर जेफ्री आर मिलमैन ने कहा, “हमने इन सेल्स की पहले की डेवलपमेंट के दौरान की एक बड़ी खामी से उबरने में सफलता हासिल कर ली है। नई इंसुलिन बनाने वाली सेल्स ग्लूकोज का सामना होने पर और तेजी से तथा और बेहतर तरीके से रिएक्ट करती हैं। ये कोशिकाएं कुछ इस तरह व्यवहार करती हैं, जैसे किसी ऐसे व्यक्ति में बीटा सेल्स डाली गई हों जिसे शुगर की बीमारी नहीं है।

पत्रिका ‘स्टेम सेल रिपोर्ट्स’ में छपे शोध के निष्कर्ष के मुताबिक, टीम ने मनुष्य की स्टेम सेल से बीटा सेल्स का निर्माण किया है, लेकिन उन्होंने इंसुलिन बनाने वाली बीटा सेल्स को बनाने से पहले इसमें काफी बदलाव किए हैं। इस पूरी प्रोसेस के बाद उन्होंने बीटा सेल्स को एक विशेष क्षमता वाले शुगर रोगी चूहे में डाला और इसके बाद आए नतीजों से वैज्ञानिक काफी उत्साहित हैं।

इन कोशिकाओं ने चूहे में इंसुलिन का निर्माण इस स्तर पर किया, जिससे चूहों की शुगर कुछ महीनों के लिए खत्म हो गई जो कि इस शोध में शामिल ज्यादातर चूहों का पूरा जीवनकाल था। हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि वह इस बात का अनुमान नहीं लगा सकते कि ये कोशिकाएं कब तक मनुष्यों पर प्रयोग करने लायक हो जाएंगी, लेकिन उन्हें भरोसा है कि कम से कम दो ऐसे तरीके हैं, जिनके जरिए मनुष्यों पर इन कोशिकाओं का परीक्षण किया जा सकता है।

–आईएएनएस

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स्वास्थ्य

स्वस्थ जीवनशैली के लिए ‘डीटॉक्सीफिकेशन’ कारगार

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स्वस्थ जीवनशैली प्राप्त करने के लिए डीटॉक्सीफिकेशन एक अच्छा विकल्प है। यह शरीर का वजन घटाने में, उपवास के दौरान अंगों को आराम पहुंचाने, रक्त संचार सुधारने में और पसीना व मूत्र के माध्यम से शरीर से दूषित पदार्थो को बाहर करने में मदद करता है तथा शरीर को स्वस्थ पोषण प्रदान करता है।

डीटॉक्सीफिकेशन के दौरान कुछ बातों को ध्यान में रखना अत्यधिक जरूरी है। केवल विशेषज्ञ की मदद से डीटॉक्सीफिकेशन करें। अपने आहार में केवल हर्बल (प्राकृतिक) पदार्थो को ही शामिल करें, क्योंकि इसका साइड इफेक्ट नहीं होता।

आयुर्वेदिक परामर्श लें और प्राकृतिक उपचार अपनाएं। व्यायाम सबसे जरूरी चीज है। केवल पोषण विशेषज्ञ द्वारा आपके शरीर के हिसाब से बताए गए आहार का ही सेवन करें। 

इन अच्छी आदतों को अपनाने से आपके शरीर को हमेशा ऊर्जावान रहने में मदद मिलेगी, ताकि आप उत्साह के साथ अपने काम का आनंद ले सकें। हीलयोरबॉडी एक ऐसा मंच है जो आपको अपने शरीर की मांग को समझने और ऊर्जा प्राप्त करने और स्वस्थ जीवन जीने के लिए प्राकृतिक उपचार प्रदान करने में मदद करेगा।

अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि करीब 43 फीसदी कार्यबल सप्ताह के ज्यादातर दिनों में थकान महसूस करते हैं। इन आंकड़ों को देखकर पता लगता है कि लोगों की कितनी बड़ी संख्या है जिन्हें अपनी जीवनशैली का मूल्यांकन करने की जरूरत है। 

कई लोगों के मन में यह धारणा होती है कि रोजाना एक निश्चित व्यवस्था का अनुसरण करने से शरीर डीटॉक्सीफाई होता है और ऊर्जा वापस आती है। लेकिन यह गलत भी हो सकता है। इसलिए आपको समझने की जरूरत है कि आपके शरीर पर कौन सा तरीका सबसे अच्छी तरह कारगर होगा। 

ज्यादातर मामलों में एक स्वस्थ जीवनशैली प्राप्त करने के लिए डीटॉक्सीफिकेशन एक अच्छा विकल्प है। यह शरीर का वजन घटाने में, उपवास के दौरान अंगों को आराम पहुंचाने, रक्त संचार सुधारने में और पसीना व मूत्र के माध्यम से शरीर से दूषित पदार्थो को बाहर करने में मदद करता है तथा शरीर को स्वस्थ पोषण प्रदान करता है। 

ब्रिटिश डायटिक एसोसिएशन लि. की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि डीटॉक्सीफिकेशन हमेशा सफल नहीं होगा। इस अध्ययन के निष्कर्षो से पता चलता है कि ज्यादा डीटोक्स केवल गुर्दे का होता है और उसका केवल अल्पकालिक लाभ होता है।

इसमें बताया गया है कि डीटोक्स के दौरान लिए जाने वाले आहार को बाजार में केवल जानवरों पर परीक्षण कर बेचा जा रहा है और उसका किसी प्रकार का रैंडमाइज कंट्रोल्ड परीक्षण नहीं किया जाता। इसलिए किसी भी डीटॉक्स कार्यक्रम को अपनाने से पहले इसकी प्रभावकारिता को जांच लेनी चाहिए। 

हालांकि लोग स्वस्थ जीवनशैली के साथ डीटोक्सीफिकेशन के लिए अगर किसी डाइट को अपनाते हैं तो हमेशा विशेषज्ञ की सिफारिश के बाद ही किसी डाइट को अपनाना चाहिए। किसी प्रकार के ड्रग या अल्कोहल के माध्यम से डीटॉक्सीफिकेशन करना कुछ मामलों में खतरनाक भी हो सकता है। इससे लोगों को खूब पसीना आना, उल्टी आना, दस्त लगना, मतली, कंपकंपी और व्यग्रता जैसे दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। 

–आईएएनएस

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स्वास्थ्य

पेट की अतिरिक्त चर्बी मस्तिष्क को पहुंचा सकती है नुकसान

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चिकित्सकों का कहना है कि पेट की अतिरिक्त चर्बी आपके मस्तिष्क में ग्रे मैटर की मात्रा को कम कर सकती है और अतिरिक्त वजन मस्तिष्क के विशिष्ट क्षेत्रों में सिकुड़न से जुड़ा होता है।

इसके साथ ही मोटापे के रोगियों में हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और डिस्लिपिडेमिया का भी खतरा बढ़ जाता है। हार्टकेयर फाउंडेशन (एचसीएफआई) के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा, “सामान्य वजन का मोटापा हमारे देश में एक नई महामारी है।

इसका एक प्रमुख कारण आज की जीवनशैली है। ऑन-द-गो और तेज-रफ्तार जीवन का मतलब है कि लोग नाश्ते को छोड़ देते हैं और बाकी पूरा दिन अस्वास्थ्यकर, क्विक फिक्स रिफाइंड कार्ब्स वाला भोजन खाते हैं। पेट के चारों ओर एक इंच अतिरिक्त वसा हृदय रोग की संभावना को 1.5 गुना बढ़ा सकती है।”

उन्होंने कहा, “पुरुषों में 90 सेमी और महिलाओं में 80 सेंटीमीटर से अधिक का उदर रोग एक संकेत है कि व्यक्ति भविष्य में दिल के दौरे की चपेट में आ सकता है। पुरुषों में 20 वर्ष की आयु के बाद और महिलाओं में 18 वर्ष की आयु के बाद पांच किलोग्राम से अधिक वजन नहीं बढ़ना चाहिए।

50 साल की आयु के बाद किसी के वजन की निगरानी करना और उसे उचित रूप से कम करना भी अनिवार्य है।”डॉ. अग्रवाल ने कहा, “एक बार जब किसी व्यक्ति का कद बढ़ना बंद हो जाता है, तो उसके अंगों का बढ़ना बंद हो जाता है और केवल मांसपेशियां ही एक हद तक निर्माण कर पाती हैं।

वसा का जमाव एकमात्र कारण है जो उस चरण के बाद शरीर के वजन को बढ़ाता है।”उन्होंने कहा, “जो लोग मोटे हैं, उन्हें परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट के सेवन को सीमित करने का लक्ष्य रखना चाहिए क्योंकि वे रक्त शर्करा के स्तर और इंसुलिन के उत्पादन को बढ़ाते हैं।

इंसुलिन प्रतिरोध वाले लोगों में, इस वृद्धि से आगे वजन बढ़ सकता है। इसके अलावा, हर दिन लगभग 30 से 45 मिनट शारीरिक गतिविधि करने का लक्ष्य रखें, सप्ताह में पांच बार।”

डॉ. अग्रवाल ने कुछ सुझाव देते हुए कहा, “हर दिन व्यायाम करें और स्वस्थ आहार का सेवन करें, सभी सात रंगों और छह स्वादों का मिश्रण भोजन में शामिल करें।

किसी भी रूप में रिफाइंड चीनी का सेवन न करें, क्योंकि यह रक्त प्रवाह में अधिक आसानी से अवशोषित हो सकती है और आगे की जटिलताओं का कारण बन सकती है। ध्यान और योग जैसी गतिविधियों के माध्यम से तनाव को कम करें।”

उन्होंने कहा, “प्रतिदिन एक खाद्य पदार्थ छोड़ें ताकि खाद्य प्रतिजन या फूड एंटीजेनिसिटी का ध्यान रखा जा सके। अगर आप गेहूं के प्रति संवेदनशील हैं तो आपको गेहूं पेट यानी व्हीट बैली की समस्या हो सकती है और आपको अपने भोजन की थाली से गेहूं को हटाना पड़ सकता है।”

— आईएएनएस

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