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इलाज के अभाव में बहन की मौत के बाद टैक्सी चालक ने बनाया अस्पताल

मुझे ऐसा महसूस हुआ कि कुछ करना चाहिए ताकि मेरी बहन की तरह इलाज के साधन के अभाव में गरीबों को अपनी जान न गंवाना पड़े। मेरी यही ख्वाहिश है कि मेरी तरह किसी भाई को अपनी बहन को न खोना पड़े।

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Taxi Driver Saidul

पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले में निर्माणाधीन भवन में चल रहे अस्पताल की चर्चा आज देशभर में हो रही है, जबकि इस अस्पताल में न तो अत्याधुनिक चिकित्सा का कोई उपकरण है और न ही वातानुकूलित परिवेश जैसी कोई सुविधा।

मगर, गरीबों के इलाज का एक बड़ा ठौर है जिसके साथ एक भाई के दर्द का दास्तान जुड़ा है जो गरीबी के कारण अपनी बहन का इलाज नहीं करवा पाया और वह बीमारी के कारण इस दुनिया से चल बसी।

टैक्सी ड्राइवर सैदुल लश्कर ने 2004 में अपनी बहन मारुफा के असामयिक निधन के बाद गरीबों के इलाज के लिए अस्पताल बनाने का फैसला लिया।

छाती में संक्रमण होने से महज 17 साल की उम्र में मारुफा की मौत हो गई। सैदुल के पास उस समय उतने पैसे नहीं थे कि वह दूर शहर जाकर बड़े अस्पताल में अपनी बहन का इलाज करवाते।

कोलकाता से करीब 55 किलोमीटर दूर बरुईपुर के पास पुनरी गांव में मारुफा स्मृति वेल्फेयर फाउंडेशन के नवनिर्मित मरीजों के वेटिग हॉल की दीवार के सहारे खड़े सैदुल ने कहा, “मुझे ऐसा महसूस हुआ कि कुछ करना चाहिए ताकि मेरी बहन की तरह इलाज के साधन के अभाव में गरीबों को अपनी जान न गंवाना पड़े। मेरी यही ख्वाहिश है कि मेरी तरह किसी भाई को अपनी बहन को न खोना पड़े।”

उन्होंने कहा, “अपने मन में इस सपने को संजोए 12 साल तक वह कोलकाता की सड़कों की खाक छानता रहा। कभी एक क्षण के लिए मेरे मन में अपने लक्ष्य को लेकर कोई दूसरा विचार आया। मगर, यह कोई आसान कार्य नहीं था।”

सैदुल टैक्सी चलाते समय अपनी गाड़ी में बैठे पैसेंजर को अपने कागजात व लोगों से मिले दान की पर्चियां दिखाता मगर अधिकांश लोग उनकी कोई मदद करने से इनकार कर देते थे।

हालांकि कुछ लोगों ने उनकी मदद भी की। इन्हीं लोगों में कोलकाता की युवती सृष्टि घोष भी हैं जो उनकी व्यथा कथा सुनकर द्रवित हो गई और उन्होंने अस्पताल के लिए अपने पूरे महीने का वेतन देने का निर्णय लिया।

सैदुल ने कहा, “मुझे सृष्टि के रूप में अपनी खोई बहन मिल गई। मेरी कहानी सुनने के बाद सृष्टि और उनकी मां ने मेरा नंबर (फोन नंबर) लिया और मुझे बाद में फोन किया। मुझे इस बात का कोई भरोसा नहीं था वह मुझे फोन करेंगी। मगर, जब वह अपना पहला वेतन लेकर मेरे पास आई तो मैं भावविभोर हो गया।”

अस्पताल के लिए मदद के लिए आगे आने वाले अपरिचितों के साथ-साथ सैदुल की पत्नी शमीमा ने भी उनका हौसला बढ़ाया।

उन्होंने कहा, “मुझे पत्नी का साथ नहीं मिलता तो कुछ भी संभव नहीं होता। जब मैंने अस्पताल बनाने की ठानी तो मेरे नजदीकी लोगों ने मुझे पागल समझकर मुझसे दुरियां बना लीं मगर मेरी पत्नी हमेशा मेरे साथ खड़ी रहीं। उन्होंने जमीन के वास्ते पैसे जुटाने के लिए मुझे अपने सारे गहने दे दिए।”

आखिरकार, फरवरी 2017 को अस्पताल शुरू होने पर सैदुल का सपना साकार हुआ। सैदुल ने अपनी नई बहन सृष्टि के हाथों अस्पताल का उद्घाटन करवाया। करीब 11 किलोमीटर के दायरे में सबसे नजदीकी अस्पताल होने से स्थानीय निवासियों से काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है।

अस्पताल जाते समय ई-रिक्शा चालक सोजोल दास ने बताया, “हर तरफ अब चर्चा होती है और इलाके में अस्पताल के बारे में लोग बातें करते हैं।”

अब इस अस्पताल को 50 बिस्तरों से सुसज्जित और एक्स-रे व ईसीजी की सुविधा से लैस बनाने की दिशा में काम चल रहा है।

सैदुल ने कहा, “वर्तमान में यह दोमंजिला भवन है लेकिन हमारी योजना इसे चार मंजिला बनाने की है। अस्पताल के उद्घाटन के दिन हमारे चिकित्सकों ने यहां 286 मरीजों का ईलाज किया। समय और संसाधन की कमी के चलते अनेक लोगों को वे नहीं देख पाए। मुझे पक्का भरोसा है कि जब अस्पताल पूरी तरह से चालू हो जाएगा तो इससे करीब 100 गांवों के लोगों को फायदा होगा।”

सैदुल के बड़े सपने देखने और उसे साकार करने के जुनून से काफी लोग प्रभावित हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में सैदुल के प्रयासों की सराहना की।

40 वर्षीय टैक्सी ड्राइवर ने कहा कि मोदी द्वारा अस्पताल के बारे में चर्चा करने से निस्संदेह वह काफी उत्साहित हुए हैं।

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उन्होंने कहा, “उनके द्वारा चर्चा करने के बाद से कई लोगों ने मुझसे संपर्क किया है। कुछ स्थानीय ठेकेदारों ने निर्माण कार्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए रेत, ईंट और सीमेंट मुहैया करवाकर मेरी मदद की है। चेन्नई के एक डॉक्टर ने मेरे अस्पताल में अपनी सेवा देने और मरीजों का ईलाज करने की इच्छा जताई है।”

उन्होंने बताया कि वर्तमान में आठ चिकित्सक अस्पताल से जुड़े हैं, जो यहां अभी मुफ्त में अपनी सेवा दे रहे हैं। हालांकि सैदुल ने कहा कि उनकी योजना है कि अस्पताल के रखरखाव के लिए जरूरी मात्र न्यूनतम शुल्क पर स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने की है।

हड्डीरोग विभाग के प्रभारी डॉ. धीरेश चौधरी ने सैदुल के प्रयासों की काफी सराहना की।

उन्होंने कहा, “अस्पताल बनाना बड़ा कार्य है। अत्यंत कम आमदनी वाले सैदुल के लिए यह कार्य अकल्पनीय है। हम सभी उनके साथ हैं।”

डॉक्टर का एनजीओ ‘बैंचोरी’ अस्पताल को चिकित्सा उपकरण मुहैया करवाता है।

सैदुल ने कहा, “अब हमारे साथ कई लोग हैं। मुझे लगता है कि अपने सपने को पूरा करने के लिए मैं अब आगे की बात भी सोच सकता हूं। शायद, मैं सिर्फ एक अस्पताल बनाकर नहीं रुकूंगा और नए सपने की तलाश में जाऊंगा”

By : मिलिंद घोष रॉय

(यह साप्ताहिक फीचर आईएएनएस और फ्रैंक इस्लाम की सकारात्मक पत्रकारिता परिजोजना का हिस्सा है।)

–आईएएनएस

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तूतीकोरिन में प्रदर्शनकारियों की मौत से वेदांता पर सवाल

विरोध प्रदर्शन और पुलिस फायरिंग के बाद तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (टीएनपीसीबी) ने तुतीकोरिन में कंपनी की पहली इकाई को संचालित करने की मंजूरी के नवीनीकरण (2018-2023) को यह करते हुए खारिज कर दिया कि उसने निर्धारित शर्तों को पूरा नहीं किया है।

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Tuticorin protestors

चेन्नई, 25 मई (आईएएनएस)| तमिलनाडु के तूतीकोरिन में पुलिस की गोलीबारी में स्टरलाइट कॉपर स्मेल्टिंग प्लांट के खिलाफ विरोध कर रहे 13 प्रदर्शनकारियों की मौत से हालात और बिगड़ गए हैं और इसने स्टरलाइट की मूल कंपनी वेदांता द्वारा पर्यावरण नियमों के उल्लंघनों की ओर ध्यान खींचा है।

वेदांता ने कहा है कि उसने कॉपर स्मेल्टिंग प्लांट में प्रदूषण को लेकर मौजूद नियम-कानूनों का पालन किया है, लेकिन पर्यावरणविदों और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तूतीकोरिन में बड़े अनसुलझे मुद्दों पर उंगली उठाई है। वे अतीत में कंपनी द्वारा किए गए नियमों के उल्लंघन के कई अन्य उदाहरणों की ओर भी इशारा करते हैं जहां वेदांत शामिल थी।

इस बात पर जोर देते हुए कि 13 लोगों की मौत व्यर्थ नहीं जाएगी, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता नित्यानंद जयरामन ने आईएएनएस को बताया, “पुलिस गोलीबारी में 13 लोगों के विरोध और हत्या से स्टरलाइट कॉपर स्मेल्टर प्लांट (वेदांत लिमिटेड के स्वामित्व वाले) के लिए फिर से काम करना मुश्किल हो जाएगा।”

तूतीकोरिन में व्यापार संघ युवा इकाई के एस. राजा ने आईएएनएस को फोन पर आईएएनएस को बताया, “हमने पहले भी संयंत्रों को बंद होते और फिर से खुलते देखा है। स्थायी रूप से बंद होने की घोषणा तक स्मेल्टर संयंत्र के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी रहेगा।”

वहीं, मुख्यमंत्री के. पलानीस्वामी कह रहे हैं कि सरकार कॉपर स्मेल्टिंग प्लांट के कामकाज के खिलाफ है। तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने संयंत्र को निर्देश दिया है कि वह उनकी सहमति के बिना उत्पादन या संचालन शुरू न करे। संयंत्र की बिजली आपूर्ति को रोक दिया गया है।

कार्यकर्ताओं और मीडिया रिपोर्टों का कहना है कि कई मामलों में वेदांता ने कई बार कानूनी दिशानिर्देशों को नजरअंदाज किया है। इस सप्ताह ‘द वायर’ ने भी अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि कैसे कई वर्षों तक विरोध प्रदर्शनों ने कंपनी पर दबाव बनाया है।

एक समाचार पोर्टल के अनुसार, 2000 से 2010 तक लांजीगढ़ जिले और ओडिशा की नियमगिरी पहाड़ियों में कंपनी की एल्युमिना और बॉक्साइट खनन परिचालन के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन किया और वेदांत की छवि एक बड़े प्रदूषण फैलाने वाले और आदिवासी और मानवाधिकारों के अपराधी के रूप में स्थापित हुई।

‘द वायर’ के अनुसार, इस दस साल की अवधि के दौरान वेदांता ने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक योगदान भी दिया था, जिसे दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा भारत के विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम का उल्लंघन बताया था।

कंपनी के कारनामों की तेजी से उनकी अनदेखी करना मुश्किल हो गई और न केनल स्थानीय कार्यकर्ताओं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों और संस्थानों ने भी उसकी आलोचना शुरू कर दी थी।

पोर्टल ने कहा कि 2007 में नॉर्वे के सरकारी पेंशन फंड ने ‘पर्यावरण और मानवाधिकार उल्लंघन’ का हवाला देते हुए कंपनी में अपनी हिस्सेदारी को खत्म कर दिया था। इसके तीन साल बाद प्रमुख निवेशकों जैसे चर्च ऑफ इंग्लिैंड जोसेफ रोउनट्री चैरिटेबल ट्रस्ट ने इसी तरह के कारणों से अपने शेयरों को बेच दिया था।

रिपोर्ट के अनुसार, इसी साल भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने ओडिशा में वन संबंधिक कानूनों का उल्लंघन करने के लिए इससे ग्रीन क्लीयरेंस छीन लिया था।

समाज में अपनी छवि सुधारने के लिए वेदांता ने अपनी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी पर काफी पैसा खर्च किया और उसके मालिक अनिल अग्रवाल जो नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार का बड़े समर्थक हैं, उन्होंने सरकार द्वारा शुरू की गई अधिकांश परियोजनाओं से खुद को शामिल कर लिया, जिसमें ‘स्वच्छ भारत’ अभियान भी शामिल है।

इसके साथ ही उन्होंने 30,000 शौचालय बनाने में मदद करने वाली समूह कंपनी के साथ खुद को शामिल किया।

मीडिया के बीच अपनी छवि को अच्छा करने के लिए कंपनी द्वारा चलाए गए अभियान पर व्यापक रूप से ध्यान दिया और इसकी आलोचना भी की गई।

‘द वायर’ के अनुसार, 2016 में लंदन में जयपुर साहित्य महोत्सव के संस्करण को कंपनी द्वारा प्रायोजित किए जाने पर इसके बहिष्कार की मांग उठी थी। सौ से अधिक शिक्षाविदों और लेखकों ने एक अभियान और ‘बायकॉट वेदांता जेएलएफ’ कार्यक्रम शुरू किया। इस अभियान में वेदांता कंपनी के कारण होने वाले प्रदूषण, बीमारी, उत्पीड़न, विस्थापन और गरीबी से पीड़ित कई समुदायों के साथ एकजुटता व्यक्त की गई थी।

तूतीकोरिन में प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनकी आवाज को पूरी तरह से दबाने के प्रयास किए जा रहे हैं। राजा कहते हैं, “ऐसा लगता है कि पुलिस की गोलीबारी संयंत्र के खिलाफ हो रहे विरोध को दबाने के साथ-साथ तमिलनाडु में अन्य विरोधों प्रदर्शन को रोकने का तरीका है।”

तूतीकोरिन में विरोध प्रदर्शन के 100वें दिन मंगलवार को उस समय उग्र हो गया था, जब पत्थरबाजी और वाहनों में आगजनी के बाद वेदांता समूह के स्टरलाइट तांबा संयंत्र को बंद करने की मांग कर रहे सैकड़ों लोगों के समूह पर पुलिस ने गोलियां चलाई थीं।

पुलिस की गोलीबारी में 11 लोगों की मौत हो गई थी। बुधवार को ताजा गोलीबारी में एक और व्यक्ति की मौत हो गई और एक घायल हुए शख्स ने दम तोड़ दिया, जिससे मृतकों की संख्या बढ़कर 13 हो गई।

राजा से जब आगजनी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, “इसकी जांच की जानी चाहिए। आगजनी में शामिल लोग संयंत्र के समर्थक भी हो सकते हैं।”

विरोध प्रदर्शन और पुलिस फायरिंग के बाद तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (टीएनपीसीबी) ने तुतीकोरिन में कंपनी की पहली इकाई को संचालित करने की मंजूरी के नवीनीकरण (2018-2023) को यह करते हुए खारिज कर दिया कि उसने निर्धारित शर्तों को पूरा नहीं किया है।

प्रदूषण नियंत्रण मानदंडों के उल्लंघन और अन्य मुद्दों को लेकर कंपनी के संयंत्र विवादों में रहा। 1990 के दशक में जब अन्य भारतीय राज्यों ने संभावित पर्यावरणीय क्षति के आधार पर कंपनी को इनकार कर दिया था, तब ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) सरकार ने इसके निर्माण की अनुमति दी थी।

वर्ष 2013 में सर्वोच्च अदालत ने स्टरलाइट पर तूतीकोरिन में पर्यावरण प्रदूषण के लिए 100 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था।

सामाजिक कार्यकर्ता जयरमन के अनुसार, टीएनपीसीबी और तूतीकोरिन जिला प्रशासन के मार्च 2018 में 15 भूजल के नमूनों के विश्लेषण से पता चला कि सभी जल स्रोत प्रदूषित हो गए और पीने के पानी के लिए मानदंडों का उल्लंघन किया गया था।

इस पर तैयार रिपोर्ट सूचना के अधिकार के तहत सामने आई थीं जबकि तूतीकोरिन जिला प्रशासन ने ग्रामीणों को भूजल के खिलाफ चेतावनी देने के बजाए उसे छुपा लिया था।

उन्होंने यह भी कहा कि, 2008 में तिरुनेलवेली गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज द्वारा किए गए एक अध्ययन में कॉपर स्पेलटर प्लांट के पास रहने वाले ग्रामीणों में मस्कुलोस्केलेटल विकारों के उच्च स्तर पाए गए।

एंटी-स्टरलाइट कॉपर कार्यकर्ता तमिल मंथन ने आईएएनएस को बताया कि लोगों ने इस संयंत्र के पास निवासियों ने कैंसर की घटनाओं के बढ़ने का दावा किया है। राजा के मुताबिक, तूतीकोरिन में सरकारी अस्पताल ने 550 से ज्यादा नए कैंसर के मामलों की सूचना दी थी।

–आईएएनएस

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‘Modi Govt के 1,460 दिन पूरे, अच्छे दिन अभी तक नहीं आए’

देश के लोगों के लिए अच्छे दिन जिसका मोदी ने अपने भाषणों में वादा किया था, वे चार सालों में पूरे नहीं हुए, बल्कि भाजपा के बेस्ट सेल्समैन ने लोगों को जरूरत से ज्यादा ही उम्मीदें बेच दीं।

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भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के पास 2019 की परीक्षा से पहले सिर्फ एक साल बचा है। क्या देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के के वादे के थोड़ा-बहुत भी करीब पहुंच पाया है? अर्थशास्त्रियों और अन्य विशेषज्ञों के मुताबिक, चार साल पहले देश के नागरिकों ने सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक सभी क्षेत्रों में बेहतर दिन आने की उम्मीदों के साथ भाजपा को अपना वोट दिया था, लेकिन जीएसटी और नोटबंदी जैसे कुछ मजबूत संरचनात्मक सुधारों के दावों के बावजूद जनता को यह पता नहीं चल पाया है कि ये सुधार उनके लिए किस तरह अच्छे रहे हैं।

वर्ष 2017-18 की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) में भारत की सकल घरेलू उत्पाद में 7.2 प्रतिशत की वृद्धि के बावजूद कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि कालेधन को खत्म करने के दावे वाले नोटबंदी के कदम ने अंत में देश की अर्थव्यवस्था को ही नुकसान पहुंचाया। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर जयति घोष ने कहा, नोटबंदी सरकार की एक भयानक गलती थी, जिसकी भरपाई आम इंसान ने की। इसने बैंकिंग प्रणाली में लोगों के विश्वास को कम कर दिया, क्योंकि नकदी संकट के समय उन्हें अपने पैसों से ही दूर कर दिया गया था। संस्थानों और नीतियों के निर्माण में समय और मेहनत लगती है, लेकिन उन्हें बर्बाद आसानी से किया जा सकता है।

उन्होंने कहा, लेकिन फिर सरकार द्वारा लागू नोटबंदी से अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा। असंगठित क्षेत्र पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ा, जो देश में 45 प्रतिशत उत्पादन और 93 प्रतिशत रोजगार पैदा करता है। कुछ अनुमानों के मुताबिक, यह 50-80 प्रतिशत क्षतिग्रस्त हो गया।

कुमार, जो अब इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के चेयर-प्रोफेसर हैं, ने बताया, उस समय सरकार ने कोई सर्वेक्षण नहीं करवाया था और इसलिए कोई डेटा उपलब्ध नहीं है। सरकारी आंकड़ों पर भरोसा करने वाले अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक ने भी इसके प्रभाव पर कोई अनुमान पेश नहीं किया। उन्होंने कहा, नोटबंदी के बाद लोगों द्वारा बैंक से लोन लेना भी कम हो गया। नवंबर-दिसंबर 2016 के बीच, यह गिरावट 60 साल के ऐतिहासिक स्तर पर थी। देश में निवेश को भी झटका लगा।

वहीं, प्रोफेशनल सर्विसेज के लिए दुनिया की अग्रणी कंपनियों में शुमार प्राइसवाटरहाउस कूपर्स (पीडब्ल्यूसी) में पार्टनर एंड लीडर, पब्लिक फाइनेंस एंड इकोनॉमिक्स, रैनन बनर्जी की हालांकि अलग राय है। वह कहते हैं, डिजिटल भुगतान के संबंध में नोटबंदी का सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। यह उस अवधि के दौरान तेजी से फलीफूली, लेकिन बाद में उसने अपनी तेजी खो दी। लेकिन डिजिटल लेनदेन का स्तर अभी भी पहले से बढ़ा है। नोटबंदी ने हालांकि वैसे परिणाम नहीं दिए, जिसकी उससे उम्मीद की गई थी। बनर्जी ने कहा कि सरकार का दूसरा धमाका वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) था, जिसे पिछले साल एक जुलाई से लागू किया गया। अर्थशास्त्री उम्मीद कर रहे हैं कि एक बार इसकी जटिलताएं खत्म हो गईं तो यह फायदेमंद बदलाव लाएगा। जीएसटी एक गुणात्मक प्रभाव बनाकर देश की कर प्रणाली के पूरे परि²श्य को बदल देगा। उन्होंने कहा, जीएसटी एक साहसिक कदम था जो सकारात्मक परिणाम दिखा रहा है।

जयति घोष हालांकि मानती हैं कि संघीय संरचना में एक एकीकृत प्रणाली इतनी जरूरी नहीं है, उदाहरण के लिए अमेरिका में यह नहीं है, लेकिन बावजूद इसके वह एक बहुत ही आधुनिक अर्थव्यवस्था है। लेकिन जीएसटी का कार्यान्वयन वास्तव में बुरा रहा है। वहीं कुमार ने कहा, जीएसटी ने असंगठित क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया है। मलेशिया में भी जहां जीएसटी 2015-16 में 26 प्रतिशत पर पेश किया गया था, सरकार ने इसे रद्द करने का फैसला किया। संगठित क्षेत्र के बढ़ने की कीमत असंगठित क्षेत्र भर रहा है और असमानता बढ़ रही है। वहीं, उद्योगों ने सरकारी पहल खासकर जीएसटी का स्वागत किया है।

भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने बताया, समग्र अर्थव्यवस्था जीएसटी के साथ मजबूत हो गई है और सही रास्ते पर मजबूती से सुधार कर रही है। चंद्रजीत बनर्जी के अनुसार, सरकार ने व्यवस्थित रूप से अर्थव्यवस्था के लिए प्रमुख बिंदुओं, जैसे व्यापार में आसानी, बैंकों की गैर-निष्पादित संपत्तियां, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश नियम, आधारभूत संरचना निर्माण और असफल उद्यमों को बंद करने पर काम किया था। उन्होंने कहा, सरकार के विकास अभियानों ने समग्र विकास गुणकों को जोड़कर उल्लेखनीय परिणाम दिए हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि अगले वर्ष ऑर्डर की संख्या और कंपनियां की क्षमता का उपयोग बेहतर होगा।

भारतीय सांख्यिकी संस्थान के पूर्व अर्थशास्त्र के प्रोफेसर दीपांकर दासगुप्ता मानते हैं कि अर्थव्यवस्था ने नोटबंदी से हुए नुकसान की भरपाई को अभी तक हासिल नहीं किया है। जीएसटी से उम्मीद है कि वह समय के साथ स्थिर हो जाएगी। उन्होंने कहा, अन्य देशों, जहां इसे पेश किया गया था, वहां भी शुरुआत में समस्याएं आई थीं। सरकार ने बैंकों की ऋण प्रणाली को दुरुस्त करने का भी काम किया है। लेकिन नोटबंदी के सदमे के बाद कई बैंकिंग घोटालों और बढ़ती गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) के कारण लोगों का बैंकों पर भरोसा कम हो गया है। उन्होंने कहा, सावधानी के साथ पुनर्पूंजीकरण पर काम किया जाना चाहिए, ताकि राजकोषीय घाटा बढ़ न पाए।

देश के लोगों के लिए अच्छे दिन जिसका मोदी ने अपने भाषणों में वादा किया था, वे चार सालों में पूरे नहीं हुए, बल्कि भाजपा के बेस्ट सेल्समैन ने लोगों को जरूरत से ज्यादा ही उम्मीदें बेच दीं। दासगुप्ता ने एक अलग अंदाज में कहा, मैं इस सरकार को दोष नहीं देता कि वह अच्छे दिन लाने में सक्षम नहीं है, क्योंकि आजादी के बाद कोई सरकार अच्छे दिन नहीं लाई है।

By : अपराजिता गुप्ता

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मोदी सरकार के 4 साल में भारत हुआ पड़ोसियों से दूर

हमारा पड़ोसी श्रीलंका पाला बदलकर अब चीन के ज्यादा नजदीक हो गया है। चीन और श्रीलंका के बीच हम्बनटोटा को लेकर हुए समझौते ने भारत को श्रीलंका से दूर कर दिया। चीन ने अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना ‘वन बेल्ट, वन रोड’ के जरिए भारत को उसके पड़ोसी देशों से दूर करने की कूटनीतिक चाल चली, जिससे बेपरवाह मोदी ब्रिटेन और अमेरिका सहित यूरोपीय देशों का दौरा करने में मशगूल रहे।

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Narendra Modi

नई दिल्ली, 24 मई | आज से लगभग चार साल पहले जब भाजपा सत्ता में आई थी, तो सरकार ने ‘पड़ोसी प्रथम’ का नारा दिया था। सरकार की मंशा पड़ोसियों को अधिक तवज्जो देकर रिश्ते बेहतर करने की थी, लेकिन अब जब सरकार अपने कार्यकाल के चार साल पूरे करने जा रही है तो पलटकर देखने की जरूरत है कि हमारे पड़ोसियों ने हमसे दूरी क्यों बना ली?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के प्रमुखों को न्योता दिया था, जिसमें बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को छोड़कर बाकी देशों के प्रमुखों ने शिरकत भी की थी। मोदी की ‘नेबर डिप्लोमेसी’ शुरुआती साल में चर्चा का विषय भी रही, लेकिन आज की तारीख में पाकिस्तान के साथ नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार, बांग्लादेश और भूटान के साथ भी भारत के संबंधों में तल्खी आ गई है।

हमारा पड़ोसी श्रीलंका पाला बदलकर अब चीन के ज्यादा नजदीक हो गया है। चीन और श्रीलंका के बीच हम्बनटोटा को लेकर हुए समझौते ने भारत को श्रीलंका से दूर कर दिया। चीन ने अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना ‘वन बेल्ट, वन रोड’ के जरिए भारत को उसके पड़ोसी देशों से दूर करने की कूटनीतिक चाल चली, जिससे बेपरवाह मोदी ब्रिटेन और अमेरिका सहित यूरोपीय देशों का दौरा करने में मशगूल रहे।

राजनीतिक मामलों के जानकार पुष्पेश पंत कहते हैं, “चीन एक सोची-समझी राजनीति के जरिए भारत के पड़ोसी देशों में अपना प्रभुत्व बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के दौरे अपनी छवि चमकाने के मकसद से अधिक हो रहे हैं। किसी देश का दौरा करने मात्र से संबंध नहीं सुधरते। आप पड़ोसी देशों की किस तरह से मदद करते हैं, यह अधिक मायने रखता है।”

हालांकि, श्रीलंका में चीन की चाल को नाकाम करने के लिए सेना प्रमुख ने कोलंबो का दौरा किया था, लेकिन श्रीलंका में चीन के लगातार निवेश के कारण यह दूरी कम नहीं हो पाई।

मोदी ने हमेशा से अपनी ‘पड़ोसी प्रथम’ की नीति में नेपाल को प्राथमिकता देने की बात कही। नेपाल में 2015 में भीषण भूकंप के बाद भारत ने बढ़-चढ़कर मदद भी की थी, जिससे नेपाल में मोदी की छवि को जबरदस्त लाभ पहुंचा लेकिन नेपाल में नए संविधान निर्माण के बाद मधेशियों की उपेक्षा से दोनों देशों के संबंधों में तल्खी बढ़ा दी।

इस दौरान नेपाल ने भारत पर आर्थिक नाकेबंदी का आरोप लगाया। इस आर्थिक नाकेबंदी के बीच नेपाल ने चीन से उम्मीदें लगाईं। इस आर्थिक नाकेबंदी के बाद ही नेपाल ने विचार किया कि यदि भविष्य में इस तरह की स्थिति उत्पन्न हो जाए तो भारत का विकल्प तो होना ही चाहिए और वह विकल्प नेपाल को चीन में नजर आया। भारत और नेपाल के बीच 2016 में संबंध उस समय निचले स्तरों तक पहुंच गए थे, जब नेपाली की राष्ट्रपति बिद्यादेवी भंडारी ने भारत दौरा रद्द कर अपने राजदूत को वापस बुला लिया था।

अब एक अन्य पड़ोसी म्यांमार की बात करें, तो म्यांमार में लगभग चार लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं। हाल के दिनों में म्यांमार और बांग्लादेश के बीच रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर विवाद रहा, लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने इस विवाद को धार्मिक चोला पहनाकर खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली और चीन तीन सूत्रीय सुलह का फॉर्मूला सुझाकर म्यांमार के करीब पहुंच गया।

बांग्लादेश और भारत के बीच संबंध 2014 में हुए कुछ समझौतों के साथ सही दिशा में आगे चल रहे थे, लेकिन तीस्ता जल समझौते को लेकर दोनों देशों के बीच कुछ खटास देखने को मिली। बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर भी भारत और पड़ोसी देश बांग्लादेश के बीच संबंधों में तल्खी बढ़ी।

मालदीव की संसद में आधीरात के समय चीन का विवादित ‘फ्री ट्रेड समझौता’ पारित होने से मालदीव चीन के करीब पहुंच गया। मालदीव ने भारत के राजदूत से मिलने वाले अपने तीन स्थानीय काउंसिलर को बर्खास्त करने से मामला और पेचीदा हो गया। यह भी सोचने की बात है कि नेपाल का चार बार दौरा कर चुके मोदी ने पद संभालने के बाद से एक बार भी मालदीव का दौरा नहीं किया है।

पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध किसी से छिपे नहीं है तो ऐसे में सरकार अपने पड़ोसियों को लेकर कहां चूक कर रहा है?

चीन और पाकिस्तान की दोस्ती भारत के लिए सिरदर्द से कम नहीं है। इन चार वर्षों में सरकार पाकिस्तान के साथ टकराव की स्थिति को कम नहीं कर सकी। सर्जिकल स्ट्राइक से जरूर सरकार ने दुश्मन के घर में घुसकर उसे सबक सिखाने का ढोल पीटा हो, लेकिन उसके बाद सीमा पर किस तरह का माहौल रहा, वह किसी से छिपा नहीं है।

चीन के साथ रिश्ते खट्टे हुए, उसी का नतीजा रहा कि चीन ने एनएसजी में भारत की स्थायी सदस्यता में रोड़े अटकाए तो मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित होने से बचाने के लिए अपने वीटो का इस्तेमाल किया। डोकलाम विवाद इसका ज्वलंत उदाहरण है। डोकलाम विवाद के समय भारत-चीन युद्ध का अंदेशा तक जताए जाने लगा था।

By : रीतू तोमर

–आईएएनएस

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ब्लॉग8 hours ago

तूतीकोरिन में प्रदर्शनकारियों की मौत से वेदांता पर सवाल

Sunrissers Hyderabad
खेल10 hours ago

आईपीएल-11 : राशिद का हरफनमौला प्रदर्शन, हैदराबाद फाइनल में

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राष्ट्रीय15 hours ago

पिछले 12 दिनों में पेट्रोल 3 रुपये हुआ महंगा

yashwant sinha
राष्ट्रीय1 week ago

कर्नाटक के नाटक से आहत यशवन्त सिन्हा, राष्ट्रपति भवन के बाहर धरने पर बैठे

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राजनीति2 weeks ago

देवगौड़ा के गठबंधन वाले बयान से कांग्रेस को फायदा

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मप्र कांग्रेस में अनुभवी और युवा का समन्वय

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खेल3 weeks ago

पुलिस-वकील के साथ शमी के घर पहुंचीं हसीन जहां

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चुनाव2 weeks ago

कांग्रेस कर्नाटक में 115-120 सीटें जीतेगी : अहमद पटेल

Supreme_Court_of_India
ब्लॉग4 weeks ago

ज़रा देखिए तो कि न्यायपालिका के पतन की दुहाई कौन दे रहा है!

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लाइफस्टाइल4 weeks ago

झड़ते बालों के लिए इस्‍तेमाल कीजिए ये घरेलू नुस्‍खा…

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ब्लॉग2 weeks ago

मोदी-लहर का कच्चा चिट्ठा

Deputy CM Kavinder Gupta
ओपिनियन4 weeks ago

मोदी राज की सबसे ग़ैर-मामूली घटना है ‘रेपिस्ट समर्थक मंत्री बनो’ योजना…!

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राजनीति1 week ago

तेजस्वी बोले, ‘राज्यपाल मुझे भी दें सरकार बनाने का मौका’

राष्ट्रीय5 days ago

दिल्ली से विशाखापट्टनम जा रही आंध्र प्रदेश एक्‍सप्रेस के 4 कोच में लगी आग

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मनोरंजन5 days ago

‘ठग रांझा’ दुनियाभर में सबसे अधिक देखा गया भारतीय वीडियो

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राष्ट्रीय1 week ago

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कर्नाटक चुनाव: बीजेपी प्रत्‍याशी श्रीमुलु की उम्‍मीदवारी रद्द करने की कांग्रेस ने EC से की मांग

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जिन्ना और श्यामा प्रसाद के ज़रिये संजय सिंह का बीजेपी पर करारा हमला

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एयर इंडिया के प्लेन में उड़ान के दौरान गिरी खिड़की

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