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अब सुप्रीम कोर्ट ही तय करेगा कि उसके मुखिया पर महाभियोग चलेगा या नहीं?

सच-झूठ को तय करने के लिए ही जाँच की जाती है। संविधान के मुताबिक़, उपराष्ट्रपति चाहकर भी जाँच समिति की जगह नहीं ले सकता। वेंकैया का ऐसा निर्णय इसीलिए असंवैधानिक है।

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मोदी राज के कर्ताधर्ताओं का व्यवहार ऐसा है, जैसे ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि!’ मोदी राज में हम देखते रहे हैं कि किस तरह से शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं का पतन हो रहा है। न्यायपालिका में जारी गिरावट हमारे सामने है, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर अँगुलियाँ उठती रही हैं, भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) का कामकाज संविधान की भावना के मुताबिक़ नहीं हो रहा है, नोटबन्दी से लेकर बैंकों की डकैती डालकर देश से फ़ुर्र हो चुके बेईमानों ने साबित कर दिया है कि भारतीय रिज़र्व बैंक की दशा कितनी दयनीय हो चुकी है! लोकतांत्रिक मूल्यों, सिद्धान्तों और परम्पराओं के पतन का ऐसा अपूर्व सिलसिला अब और आगे बढ़ते हुए देश के दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद यानी उपराष्ट्रपति की गरिमा को भी आहत कर चुका है।

भारत के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ विपक्ष की ओर से लाये गये महाभियोग प्रस्ताव को उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने जिस मनमाने ढंग से ख़ारिज़ कर दिया है, उससे अब अराजनीतिक माना जाने वाला उनका पद भी राजनीति का मोहरा बन चुका है। वेंकैया नायडू का फ़ैसला ग़ैरक़ानूनी और असंवैधानिक है। इसीलिए शर्मनाक है। काँग्रेस की ये दलील हर तर्क के आधार पर सही है कि किसी भी व्यक्ति के ख़िलाफ़ लगाये गये आरोपों की जाँच किये बग़ैर उसे निर्दोष कैसे ठहराया जा सकता है? जाँच करना उपराष्ट्रपति के क्षेत्राधिकार में ही नहीं है। महाभियोग के मामले में जजों की ही एक ख़ास समिति ही जाँच कर सकती है। लेकिन यदि आरोप उस समिति के हवाले ही नहीं किये जाएँगे तो जाँच होगी कैसे?

उच्च न्यायपालिका के किसी जज को हटाना ज़रूरी है या नहीं, ये तय करना सांसदों का काम है। देश में किसी भी जज को, किसी भी मामले में, सही या ग़लत फ़ैसला सुनाने के लिए, दंडित नहीं किया जा सकता। इसका सिर्फ़ एक अपवाद हो सकता है कि जज ने किसी वजह से दुराचरण किया हो। ज़िला अदालतों के किसी जज के दुराचरण की जाँच करने और उसे दंडित करने का अधिकार सम्बन्धित हाईकोर्ट को होता है। जबकि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के दुराचरण के मामले में संविधान के अनुच्छेद 124 के मुताबिक़, सिर्फ़ महाभियोग चलाने का प्रावधान है। कोई मामला महाभियोग के लायक है या नहीं इसे तय करने का अधिकार सिर्फ़ सांसदों को है। सांसदों को भी निजी तौर पर महाभियोग का निर्णय लेना होता है।

महाभियोग के लिए पार्टियाँ अपने सांसदों को कोई आदेश नहीं दे सकतीं। सांसद भी सीधे किसी जज को नहीं हटा सकते। उन्हें संसद के किसी भी सदन में महाभियोग के लिए प्रस्ताव देना होगा, क्योंकि महाभियोग का मतलब ही है, महा-मुक़दमा यानी बहुत बड़ा मुक़दमा! इसे बहुत बड़ा बनाने के लिए इसकी शर्तों को बेहद सख़्त बनाया गया है। इसी सख़्ती की वजह से संविधान में महाभियोग के प्रस्ताव पर ग़ौर करने के लिए भी राज्यसभा के कम से कम 50 या लोकसभा के कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर की शर्त रखी गयी है। ताकि महाभियोग को किसी भी राजनीति से बचाया जा सके। सांसदों को भी सिर्फ़ अपेक्षित हस्ताक्षर जुटा लेने से ही, किसी जज को बर्ख़ास्त करने में कामयाबी नहीं मिल सकती। हस्ताक्षर से तो सिर्फ़ जज के ख़िलाफ़ लगाये गये आरोपों की जाँच की शुरुआत हो सकती है।

जज के ख़िलाफ़ जाँच करने का ज़िम्मा भी पुलिस-सीबीआई जैसी जाँच एजेंसियों को नहीं दिया जा सकता। इस काम को तीन सदस्यों की एक समिति की कर सकती है। जिसमें एक सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा जज, एक किसी हाईकोर्ट का चीफ़ जस्टिस और एक जाने-माने क़ानून-विद् को होना चाहिए। ये समिति अपनी जाँच रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपेगी। तब राष्ट्रपति, संसद से उस रिपोर्ट पर ग़ौर करने को कहेगी। संसद के दोनों सदनों को अलग-अलग से फ़ैसला देना होगा कि जाँच समिति की रिपोर्ट के मुताबिक़, वो अमुक जज के ख़िलाफ़ लगाये गये आरोपों को सही पाते हैं। सांसद चाहें तो जज से ज़िरह करने के लिए उसे संसद में तलब भी कर सकते हैं। जहाँ जज ख़ुद या उनका वकील उनका बचाव कर सकता है। इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद दोनों सदनों को अलग-अलग ये प्रस्ताव पारित करना होगा कि वो दो-तिहाई बहुमत से जज को बर्ख़ास्त करने के पक्षधर हैं। इतनी सारी कठोर शर्तों को निभाने के बाद ही महाभियोग सफल हो सकता है। अन्त में, राष्ट्रपति ही दोषी जज को बर्ख़ास्त करने का आदेश जारी करते हैं।

अब ज़रा ये समझिए कि भारत के प्रधान न्यायाधीश के ख़िलाफ़ लगे आरोपों को लेकर पहली सीढ़ी तब चढ़ी गयी जब राज्यसभा के 64 सांसदों ने उपराष्ट्रपति को महाभियोग प्रस्ताव दिया। दूसरी सीढ़ी थी, प्रस्ताव को मंज़ूर या ख़ारिज़ करना। फ़िलहाल, मामला इसी स्तर पर अटक गया। क्योंकि वेंकैया नायडू ने इसे ख़ारिज़ कर दिया। नायडू के ऐसा जिन आधारों पर किया वो उसे तय करने के लिए अधिकृत ही नहीं है। मसलन, बग़ैर जाँच के नायडू ये नहीं कह सकते कि आरोप जाँच के लायक नहीं हैं। यहीं ये समझना ज़रूरी है कि आख़िर ये कैसे तय होगा कि कौन सा आरोप जाँच के लायक हो सकता है और कौन से नहीं?

कल्पना कीजिए कि यदि सांसद ये आरोप लगाकर महाभियोग प्रस्ताव पेश कर दें कि अमुक जज सिर्फ़ चार घंटा सोते हैं। लिहाज़ा, उन्हें हटा देना चाहिए। तो क्या इस आरोप की पड़ताल के लिए महाभियोग प्रस्ताव को जाँच समिति के भेज देना चाहिए? ऐसी दशा में लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति से ये अपेक्षित है कि वो प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ाएँ, बल्कि सीधे ख़ारिज़ कर दें। संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए विवेकाधीन निर्णय लेने का दायरा ऐसे ही काल्पनिक आरोपों तक सीमित हो सकता है, क्योंकि ये सबको मालूम है कि जज तो क्या, किसी का कम ये ज़्यादा सोना, किसी भी लिहाज़ से दुराचरण नहीं है।

वेंकैया नायडू ने अपनी विवेकाधीन शक्तियों का बेज़ा इस्तेमाल किया है। वो सिर्फ़ ये जाँचने के अधिकारी हैं कि कहीं सांसदों के आरोप महज कपोल-कल्पना पर तो आधारित नहीं हैं? क्या सांसदों के दस्तख़त सही और पूरे हैं? यदि ऐसा कोई ख़ोट नहीं है, तो उनके पास ये तय करने का अधिकार नहीं है कि सच्चे सही हैं या झूठे? सच-झूठ को तय करने के लिए ही जाँच की जाती है। संविधान के मुताबिक़, उपराष्ट्रपति चाहकर भी जाँच समिति की जगह नहीं ले सकता। वेंकैया का ऐसा निर्णय इसीलिए असंवैधानिक है। चूँकि वो बीजेपी से सम्बन्धित रहे हैं और बीजेपी, बग़ैर जाँच के लिए महाभियोग को ग़ैर-ज़रूरी ठहराना चाहती है। लिहाज़ा, वेंकैया के व्यवहार से साफ़ दिख रहा है कि उन्होंने अपनी पुरानी पार्टी को ख़ुश करने के लिए राज्यसभा के सभापति के विवेकाधीन अधिकारों और उससे जुड़ी गरिमा के साथ समझौता किया है। इस तरह से अपने फ़ैसले की वजह से वेंकैया ने भारत के संसदीय इतिहास के लिए एक कलंकित मिसाल पैदा की है।

अब सवाल है कि आगे क्या? महाभियोग प्रस्ताव लाने वाले सांसदों की ओर से वेंकैया के फ़ैसले को आड़े हाथों लेते हुए कहा गया है कि उनके पास अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने के लिए सिवाय और कोई विकल्प नहीं है। उम्मीद है कि कुछ दिनों में सुप्रीम कोर्ट में ये फ़रियाद दायर हो जाएगी कि महाभियोग प्रस्ताव पर लिये गये वेंकैया नायडू के फ़ैसले को असंवैधानिक ठहराया जाए। मज़े की बात ये है कि इस याचिका की सुनवाई ख़ुद प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा नहीं कर सकते, क्योंकि सारा प्रसंग उनसे ही जुड़ा हुआ है। वो ख़ुद से जुड़े मामले की सुनवाई ख़ुद नहीं कर सकते। भले ही, उनके पास किसी भी याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करने और उसके लिए उपयुक्त खंडपीठ (बेंच) तय का सबसे अहम विशेषाधिकार हो! लिहाज़ा, अब सुप्रीम कोर्ट ही तय करेगा कि उसके मुखिया पर महाभियोग चलेगा या नहीं? न्यायपालिका को इस मामले में इतिहास के कई पन्ने लिखने होंगे।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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‘मी टू मूवमेंट’ का एकजुट होकर समर्थन करना चाहिए : महेश भट्ट

“हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

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mahesh bhatt

नई दिल्ली, 16 अक्टूबर | फिल्मों के जरिए बेबाकी से सामाजिक मुद्दों को सुनहरे पर्दे पर उतारने वाले निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट ने देश में चल रहे ‘मी टू मूवमेंट’ पर भी बेबाकी से अपनी राय दी है। उन्होंने कहा है कि यह कुछ ऐसा है, जिससे हम अलग-अलग विचार रखकर नहीं निपट सकते हैं। हमें पूरी जिम्मेदारी व एकजुटता के साथ इसका समर्थन करना चाहिए।

महेश भट्ट 12 अक्टूबर को रिलीज हुई अपनी होम प्रोडक्शन की फिल्म ‘जलेबी’ के प्रचार के लिए दिल्ली आए थे। उन्होंने बताया कि उनकी फिल्म में दिखाया गया प्यार किस तरह हिंदी फिल्मों में दिखाए जाने वाले पारंपरिक प्यार से अलग है।

महेश से जब पूछा गया कि फिल्म की कहानी अन्य प्रेम कहानियों से कितनी अलग है तो उन्होंने आईएएनएस को बताया, “हमारी फिल्म प्यार के उतार-चढ़ावों और उसकी बारीकियों से बड़ी हिम्मत से आंख मिलाती है। यह पारंपरिक हिंदी फिल्मों से इतर है। इसके अंत में लिखा आता है ‘एंड दे लिव्ड हैपिली एवर आफ्टर’। लेकिन वास्तव में प्यार परियों की कहानी से परे है। इंसानी सोच ने प्यार को शादी की परंपरा से जोड़ दिया, लेकिन प्यार तो कुदरत की देन है।

उन्होंने कहा, “आप देखें कि इस देश में राधा-कृष्ण के प्रेम को मंदिरों में बिठाया गया है, जबकि राधा-कृष्ण का प्यार शादी के बंधन तक सीमित नहीं था। हमारी फिल्म एक तरह से इसी तरह के प्यार और दो इंसानों की भावनाओं को पेश करती है।”

महेश कहते हैं, “फिल्म की सबसे खास बात यह है कि इसने नौजवान पीढ़ी को बहुत सम्मान दिया है। फिल्म के माध्यम से बताया गया है कि यह आज के दौर के जो युवा हैं या दर्शक हैं, वे जिंदगी से जुड़ी इस गहरी बात को समझेंगे।”

‘जलेबी’ के पोस्टर ने सुर्खियां और विवाद दोनों बटोरे थे। इसमें फिल्म की हीरोइन ट्रेन की खिड़की से चेहरा निकालकर हीरो को ‘किस’ करती नजर आती है। इसका जिक्र करने पर महेश हंसते हुए कहते हैं, “यह मार्केटिंग की जरूरत थी कि हम फिल्म की पहली ऐसी तस्वीर जारी करें, जिससे हल्ला मच जाए और देखिए आज आप भी यही सवाल पूछ रही हैं।..दरअसल, जब से हमारे संचार के माध्यम बदले हैं और हम शब्दों से तस्वीरों पर आए हैं, तब से अभिव्यक्ति ज्यादा असरदार हो गई है। तस्वीरों का असर ज्यादा होता है..उसका मिजाज कुछ अलग होता है। वास्तव में यह तस्वीर महिलाओं की आजादी को प्रतिबिंबित करती है।”

फिल्म की पृष्ठभूमि पुरानी दिल्ली है। इसके पीछे की वजह पूछे जाने पर महेश ने कहा, “इसका श्रेय फिल्म के निर्देशक (पुष्पदीप भारद्वाज) को जाता है। इनकी परवरिश पुरानी दिल्ली की जिन गलियों में हुई है, उन्होंने उन्हीं गलियों को पर्दे पर उतारा है। कोई शख्स जब किसी दौर में जिन पलों को जीता है तो जब वह उन्हें पर्दे पर उतारता है तो उसकी अदा कुछ और होती है।

महेश कहते हैं, “हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

‘मी टू मूवमेंट’ के बारे में आलिया भट्ट के पापा ने कहा, “हमें इस पहल का समर्थन करना चाहिए। यहां हमें अपनी जिम्मेदारी भी निभाने की जरूरत है। हम अलग-अलग राय रखकर इस समस्या का हल नहीं निकाल सकते, हम संवेदना और समझदारी के साथ इसका समाधान तलाशना होगा।”

–आईएएनएस

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‘आयुष्मान योजना काफी नहीं, लोगों को मिले स्वास्थ्य का अधिकार’

मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।

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Picture Credit : Quartz

नई दिल्ली, 17 अक्टूबर | देश में एक तरफ जहां महिला सशक्तिकरण का बड़ा जोरो-शोरो से ढिंढोरा पीटा जाता है, वहीं एक विश्वविद्यालय की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कामकाजी 92 प्रतिशत महिलाओं को प्रति माह 10,000 रुपये से भी कम की तनख्वाह मिलती है। इस मामले में पुरुष थोड़ा बेहतर स्थिति में हैं। लेकिन हैरत की बात यह है कि 82 प्रतिशत पुरुषों को भी 10,000 रुपये प्रति माह से कम की तनख्वाह मिलती है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र ने श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधार पर स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें उन्होंने देश में कामकाजी पुरुषों और महिलाओं पर आंकड़े तैयार किए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर 67 प्रतिशत परिवारों की मासिक आमदनी 10,000 रुपये थी जबकि सातवें केंद्रीय वेतन आयोग (सीपीसी) द्वारा अनुशंसित न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये प्रति माह है। इससे साफ होता है कि भारत में एक बड़े तबके को मजदूरी के रूप में उचित भुगतान नहीं मिल रहा है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है। यह आंकड़े पूरे भारत के हैं।”

उन्होंने कहा, “मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुताबिक, चिंता की बात यह है कि विनिर्माण क्षेत्र में भी 90 प्रतिशत उद्योग मजदूरों को न्यूनतम वेतन से नीचे मजदूरी का भुगतान करते हैं। असंगठित क्षेत्र की हालत और भी ज्यादा खराब है। अध्ययन के मुताबिक, तीन दशकों में संगठित क्षेत्र की उत्पादक कंपनियों में श्रमिकों की उत्पादकता छह प्रतिशत तक बढ़ी है, जबकि उनके वेतन में मात्र 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

क्या आप मानते हैं कि शिक्षित युवाओं के लिए वर्तमान हालात काफी खराब हो चुके हैं, जिस पर सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने कहा, “आज की स्थिति निश्चित रूप से काफी खराब है, खासकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में। हमें उन कॉलेजों से बाहर आने वाले बड़ी संख्या में शिक्षित युवाओं का बेहतर उपयोग करने की आवश्यकता है।”

इस स्थिति को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है, के सवाल पर उन्होंने आईएएनएस को बताया, “स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं, जैसे अगर सरकार सीधे गांवों व छोटे शहरों में रोजगार पैदा करे, इसके साथ ही बेहतर बुनियादी ढांचे (बिजली, सड़कों) उपलब्ध कराएं और युवाओं को कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध को सुनिश्चित करें, जिससे कुछ हद तक हालात सुधर सकते हैं।”

श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) के मुताबिक, 2015-16 के दौरान, भारत की बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी जबकि 2013-14 में यह 4.9 फीसदी थी। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि बेरोजगारी दर शहरी क्षेत्रों (4.9 फीसदी) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों (5.1 फीसदी) नें मामूली रूप से अधिक है।

अध्ययन के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाओं के बीच बेरोजगारी दर अधिक है। राष्ट्रीय स्तर पर महिला बेरोजगारी दर जहां 8.7 प्रतिशत है वहीं पुरुषों के बीच यह दर चार प्रतिशत है। काम में लगे हुए व्यक्तियों में से अधिकांश व्यक्ति स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं। राष्ट्र स्तर पर 46.6 प्रतिशत श्रमिकों स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं, इसके बाद 32.8 प्रतिशत सामयिक मजदूर हैं।

अध्ययन के मुताबिक, भारत में केवल 17 प्रतिशत व्यक्ति वेतन पर कार्य करते हैं और शेष 3.7 प्रतिशत संविदा कर्मी हैं।

–आईएएनएस

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नई नौकरियां नहीं पैदा हुई, देश में बढ़ी बेरोजगारी दर

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

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unemployment in India

नई दिल्ली/बेंगलुरू, 16 अक्टूबर | अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र की एक हालिया रिपोर्ट में बेरोजगारी दर के 20 वर्षो में सबसे अधिक होने की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने भारत में बेरोजगारी दर के बढ़ने की वजह नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना और शिक्षित युवाओं के तेजी से श्रमबल में शामिल होने को बताया है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है।”

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

अमित बसोले ने कहा, “देश में बढ़ती बेरोजगारी के पीछे दो कारक हैं, पहला 2013 से 2015 के बीच नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना क्योंकि कुल कार्यबल (नौकरियों में लगे लोगों की संख्या) बढ़ने की बजाय घट गया है। दूसरा कारक यह है कि श्रम बल में प्रवेश करने वाले अधिक शिक्षित युवा, जो उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी, जो पिछले 20 वर्षो में सबसे ज्यादा देखी गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में वृद्धि नहीं हुई है। अध्ययन के मुताबिक, जीडीपी में 10 फीसदी की वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में एक प्रतिशत से भी कम की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में बढ़ती बेरोजगारी को भारत के लिए एक नई समस्या बताया गया है।

इन हालात से निपटने के लिए क्या सरकार ने पर्याप्त कदम उठाए हैं, इस पर अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने बताया, “इन हालात पर सरकार के प्रदर्शन का मूल्यांकन करना थोड़ा मुश्किल है, विशेष रूप से 2015 के बाद क्योंकि उसके बाद से सरकार ने समग्र रोजगार की स्थिति पर कोई डेटा जारी नहीं किया है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग द इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) जैसे निजी स्रोतों के उपलब्ध डेटा से पता चलता है कि नौकरियों का सृजन कमजोर ही बना रहेगा। सीएमआईई डेटा यह भी इंगित करता है कि नोटबंदी के परिणामस्वरूप नौकरियों में कमी आई है, सरकार ने इस पर भी कोई डेटा जारी नहीं किया है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2018 की रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में अंडर एंप्लॉयमेंट और कम मजदूरी की भी समस्या हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त और युवाओं में बेरोजगारी 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है। बेरोजगारी पूरे देश में हैं, लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देश के उत्तरी राज्य हैं।

अमित बसोले ने यह भी कहा कि भारत के नौकरी बाजार की प्रकृति बदल गई है क्योंकि बाजार में अब अधिक शिक्षित लोग आ चुके हैं, वह उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं। उन्होंने कहा, “पिछले दशक में श्रम बाजार बदल गया है, विभिन्न डिग्रियों के अनुरूप रोजगार पैदा नहीं हुए हैं।”

हालात को सामान्य बनाने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाने चाहिए, इस सवाल पर रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने आईएएनएस को बताया, “यह हालात को सामान्य बनाने का सवाल नहीं है। इसके बजाय, हमें एक उचित राष्ट्रीय रोजगार नीति विकसित करने की आवश्यकता है, जो केंद्र द्वारा आर्थिक नीति बनाने में नौकरियों का सृजन करेगी।”

–आईएएनएस

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