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सुप्रीम कोर्ट ने आधार लिंक करने की समय-सीमा फैसला आने तक बढ़ाई

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सुप्रीम कोर्ट ने मोबाइल नंबर और बैंक खातों को आधार से लिंक करने को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब तक इस मामले में कोई फैसला नहीं आता, तब तक आधार लिंक करने की विंडो खुली रहेगी। कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि केंद्र सरकार आधार को अनिवार्य बनाने को लेकर दबाव नहीं डाल सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि आधार कार्ड की अनिवार्यता सिर्फ सब्सिडी, बेनेफिट्स और सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं के लिए ही रहेगी।
बता दें कि फिलहाल मोबाइल नंबर और आधार कार्ड को मोबाइल नंबर से लिंक करने की आखिरी तारीख 31 मार्च थी। हालांकि इस आदेश के बाद यह डेडलाइन आगे बढ़ना तय माना जा रहा है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल दिसंबर में आधार को मोबाइल नंबर और बैंक खातों समेत अन्य सुविधाओं से लिंक करने की तारीख 31 मार्च तक बढ़ा दी थी।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में आधार कार्ड के खिलाफ कई याचिकाएं दाखिल हैं। जिन पर सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच सुनवाई कर रही है। मोबाइल और बैंक खातों के अलावा पासपोर्ट को आधार से लिंक करने की डेडलाइन भी बढ़ा दी गई है।

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राष्ट्रीय

तीन तलाक को ‘राजनीतिक फुटबाल’ बना रही है मोदी सरकार: सुरजेवाला

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नई दिल्ली: कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि छल, विध्वंस, सत्य पर आवरण डालना और उसे विकृत करना मोदी सरकार तथा भाजपा के डीएनए में है। निरंतर गुमराह करने वाले कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद प्रत्येक मुद्दे पर अप्रासंगिक और असंगत तरीके से कांग्रेस पार्टी पर झूठे आरोप लगाने के मामले में धोखे और दुरुपयोग में माहिर हो गए हैं। निरंतर हो रही भयावह बलात्कार की घटनाओं तथा महिला सुरक्षा से जुड़े मुद्दों के कारण चारों तरफ से फंसी हुई तथा घबराई हुई भारतीय जनता पार्टी लोगों का ध्यान भटकाने तथा अपने राजनीतिक ऐजेंडे को पुन: निर्धारित करने के लिए अफरा-तफरी में इंस्टैंट ट्रिपल तलाक संबंधी अध्यादेश लाने के प्रयास में है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा आदतन अपराधी की तरह ‘इंस्टैंट ट्रिपल तलाक’ का उपयोग ‘राजनीतिक फुटबाल’ के रुप में करके वोट बटोरना चाहती है तथा मुस्लिम महिलाओं का कल्याण और गुजारा भत्ता इसका कोई ध्येय नहीं है। आज भी मोदी सरकार और कानून मंत्री ने प्रस्तावित अध्यादेश जारी किए बिना तथा मुस्लिम महिलाओं द्वारा गुजारा भत्ता तथा विवाह से उत्पन संतान से संबंधित उनकी चिंताओं के समाधान की अवहेलना करते हुए मात्र दोषारोपण और कीचड़ उछालने का कार्य किया है।

झूठा श्रेय लेने, बहादुरी दिखाने तथा अपनी पीठ थपथपाने की बजाए प्रधानमंत्री मोदी और कानून मंत्री को इस प्रश्न का उत्तर देना चाहिए कि वे 26 मई, 2014 से 22 अगस्त, 2017 तक जबतक कि ‘शायरा बानो बनाम भारत सरकार’ मामले में उच्चतम न्यायालय का निर्णय नहीं आया था, तो इन्होंने इंस्टैंट ट्रिपल तलाक को गैर-कानूनी और असंवैधानिक घोषित करने के लिए विधान अथवा अध्यादेश लेकर क्यों नहीं आए? शायरा बानो मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद ही प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी राजनीतिक लाभ उठाने के लिए इस कानून का प्रस्ताव लेकर आए, जो कि मुस्लिम महिलाओं के कल्याण के पूरी तरह विपरीत है।

भारत के लोगों को ये स्मरण होगा कि श्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा ने इसी प्रकार अनुच्छेद- 370, समान नागरिक संहिता, सशस्त्र बल विशेष शक्तियाँ अधिनियम इत्यादि जैसे मुद्दों पर लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयास किया है।

कांग्रेस पार्टी का दृष्टिकोण

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का शुरु से ये मानना है कि इंसटैंट ट्रिपल तलाक अर्थात् तलाक ए बिद्दत का मुद्दा ‘लैंगिक न्याय’ तथा लैंगिक समानता का मुद्दा है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का सदा से ये दृष्टिकोण रहा है कि इंसटैंट ट्रिपल तलाक जैसे मुद्दे जो मुस्लिम महिलाओं के हितों के प्रतिकूल हैं, वे अंतरनिहित रुप से अरक्षणीय है। हमारा राजनीतिक दल पहला ऐसा दल था जिसने ये कहा कि आज के बदलते हुए समय में इंसटैंट ट्रिपल तलाक एक ऐसी परंपरा है जिसे मान्य नहीं ठहराया जा सकता। हम केवल उच्चतम न्यायालय द्वारा इंसटैंट ट्रिपल तलाक को अमान्य घोषित करने के निर्णय का स्वागत ही नहीं करते बल्कि इसे मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की जीत के रुप में देखते हैं, परंतु यहाँ यह उल्लेख करना उचित होगा कि ये कांग्रेस के नेतागण ही थे, जिन्होंने महिला याचिकाकर्ता का मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया।

हमारी सर्वोच्च चिंता मुस्लिम महिलाओं का सम्मान और कल्याण तथा उनके बच्चों के लिए गुजारा-भत्ता सुनिश्चत करना होना चाहिए न कि मोदी की सरकार की तरह नकली श्रेय हासिल करना।

सामाजिक समूहों, स्वयंसेवी संगठनों तथा मुस्लिम महिलाओं ने गुजारा-भत्ता, महिलाओं के सम्मान तथा उनके और बच्चों के कल्याण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर जोर दिया, जिनकी भाजपा ने जानबूझकर अवहेलना की ताकि इंसटैंट ट्रिपल तलाक जैसे मुद्दों को वोटों का ध्रुवीकरण करने के लिए राजनीतिक फुटबॉल के रुप में उपयोग किया जा सके। कांग्रेस पार्टी और इसके नेताओं ने अतीत में इन मुद्दों पर जोर दिया और हमें ऐसा प्रतीत होता है कि इन निम्नलिखित मुद्दों को यहाँ उल्लिखित करना आवश्यक है।

1. प्रस्तावित कानून अथवा अध्यादेश में भी गुजारा-भत्ते को न ही परिभाषित किया गया है और न ही इसकी राशि को मात्राबद्ध किया गया है।

ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री तथा कानून मंत्री ये बताएं किः

(i) मुस्लिम महिलाओं और बच्चों के लिए गुजारा-भत्ता (Subsistence Allowance) की परिभाषा क्या है?

(ii) गुजारा-भत्ता (Subsistence Allowance) की गणना करने कि विधि क्या है?

(iii) गुजारा-भत्ते (Subsistence Allowance) की राशि कैसे निर्धारित की जाएगी?

(iv) मुस्लिम महिला (तलाक और अधिकारों के संरक्षण) अधिनियम 1986 की धारा 3 और धारा 4 के अनुसार एक मुस्लिम महिला को मेंटेनेंस (Maintenance) के अतिरिक्त गुजारा-भत्ता (Subsistence Allowance) भी दिया जाएगा अथवा गुजारा-भत्ता से मेंटेनेंस की राशि काट ली जाएगी अथवा क्या एक मुस्लिम महिला इन दोनों में से केवल एक भत्ते की ही हकदार होगी अर्थात मेंटेनेंस या गुजारा भत्ता?

नोटः- 1986 अधिनियम की धारा 3 और 4 के अंतर्गत, एक मुस्लिम महिला तलाक के बाद भी अपने पति से मेंटेनेंस की हकदार है। दानियल तलीफि बनाम भारत सरकार (2001) 7 एससीसी 740 में सर्वोच्च न्यायालय के पांच न्यायधीशों के संवैधानिक खंडपीठ द्वारा इसकी व्याख्या की गई है।

2. प्रस्तावित कानून या प्रस्तावित अध्यादेश के अनुसार इंसटैंट ट्रिपल तलाक के मामले में सबूत देने का उत्तरदायित्व महिलाओं पर ही क्यों होना चाहिए?

शायरा बानो केस (22 अगस्त, 2017) में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के पश्चात इंसटैंट ट्रिपल तलाक को गैर कानूनी और अमान्य घोषित किया गया। अब मोदी सरकार का ये प्रस्ताव है कि इंसटैंट ट्रिपल तलाक के मामले में सबूत पीड़िता को देना होगा। सामाजिक असमानता का दंश झेल रही असहाय महिला के लिए ये लम्बी कानूनी लड़ाई का विषय बन जाएगा क्योंकि आरोपी पति हमेशा ये इंकार करेगा कि उसने इंसटैंट ट्रिपल तलाक दिया है। मोदी सरकार द्वारा मुस्लिम महिलाओं और उनके बच्चों के उत्पीड़न का ये एक और तरीका है।

3. मेंटेनेंस तथा (या) गुजारा-भत्ता (Maintenance Allowance) की महिलाओं और बच्चों को अदाएगी कौन सुनिश्चित करेगा?

प्रस्तावित कानून तथा अध्यादेश में इंसटैंट ट्रिपल तलाक देने पर पति के लिए जेल का प्रावधान है। पति को दंड देने के मामले में सभी महिला समूहों ने एक स्पष्ट प्रश्न पूछा है- जब पति जेल चला जाएगा तो मेंटेनेंस तथा (या) गुजारा-भत्ता (Maintenance Allowance) महिला और बच्चों को कौन देगा?

जो प्रश्न कांग्रेस पार्टी तथा विभिन्न समूहों ने उठाया है कि महिला तथा बच्चों को उसकी चल तथा अचल संपत्ति पर अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए? मोदी सरकार ने जानबूझकर ऐसा प्रावधान नहीं किया है।

एक बार फिर मोदी सरकार के झूठ, ढोंग और साजिश का भंडाफोड़ हुआ है जो कि वे मुस्लिम महिलाओं और बच्चों के कल्याण का दिखावा करने के लिए कर रहे थे।

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चुनाव

इवीएम मामले में चुनाव आयोग, सरकार को नोटिस

अदालत में यह जनहित याचिका एक आरटीआई (सूचना का अधिकार) कार्यकर्ता द्वारा दाखिल की गई है।

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Election Commissioner

मुंबई, 19 सितम्बर | इलेक्ट्रॉकनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को लेकर दाखिल एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए बंबई उच्च न्यायालय ने बुधवार को भारतीय निर्वाचन आयोग, महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग और ईवीएम बनाने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के दो उपक्रमों व अन्य को नोटिस जारी किया है।

अदालत में यह जनहित याचिका एक आरटीआई (सूचना का अधिकार) कार्यकर्ता द्वारा दाखिल की गई है।

आरटीआई कार्यकर्ता मनोरंजन एस. रॉय द्वारा दाखिल जनहित याचिका पर न्यायमूर्ति एस. एस. केमकर और न्यायमूर्ति एस. वी. कोटवल ने निर्वाचन आयोग के अलावा, केंद्रीय गृह मंत्रालय, सूचना प्रौद्योगिकी विभाग और महाराष्ट्र सरकार को भी नोटिस भेजा है। अदालत ने ईवीएम विनिर्माता कंपनी इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) को भी नोटिस भेजपा गया है।

रॉय के वकील पी. पवार के अनुसार, मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद हो सकती है।

याचिकाकर्ता ने निर्वाचन आयोग और विभिन्न राज्यों के निर्वाचन आयोगों द्वारा दिए गए ईवीएम और वोटर वेरीफायड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपैट) के ऑर्डर और दोनों कंपनियों द्वारा की गई आपूर्ति के आंकड़ों में भारी गड़बड़ी को उजागर किया है।

रॉय द्वारा हाल ही में सूचना का अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में यह प्रकाश में आया है कि बेंगलुरु स्थित बीईएल ने भारी तादाद में ईवीएम हाथोंहाथ डिलीवरी और डाक के माध्यम से अज्ञात लोगों को भेजा है।

आरटीआई के जरिए मांगी गई जानकारी के बदले राय को जो जवाब मिला है उसके अनुसार बीईएल ने मशीनों की 820 मतदान इकाइयां (बीयू) भेजी थीं। इसके अलावा अप्रैल 2017 में दो बार इसने 245 वीवीपैट कुछ प्राप्तकर्ताओं को सौंपा।

रॉय ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि बीईएल ने यह नहीं बताया कि दोनों अवसरों पर इसने बीयू किसको भेजा या कहां से वीवीपैट भेजा गया और क्या प्राप्तकर्ता ने उसे सुरक्षित प्राप्त किया।

रॉय ने कहा कि 820 बीयू की पूरी खेप डाक के माध्यम से भेजा गया और कुल प्रेषित माल के लिए सिर्फ नौ नाम पत्र की संख्या दर्ज की गई। प्रेषित माल 50 बीयू के दो बक्से और 60, 70, 80, 90, 100, 110 और 210 बीयू के एक-एक बक्से में भेजे गए।

रॉय ने कहा, “यह भ्रामक सूचना है क्योंकि हरेक बक्से का एक विशेष आकार होता है जो बीयू की माप पर निर्भर करता है। बीईएल के जवाब से जाहिर होता है कि पूरा प्रेषित माल नौ बक्से में भेजा गया, जबकि भारतीय डाक न तो इतना बड़ा पार्सल स्वीकार करता है और न ही इसके संचालन के लिए सक्षम है।”

–आईएएनएस

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राष्ट्रीय

हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष विष्णु खरे का निधन

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हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष विष्णु खरे (फाइल फोटो)

हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष विष्णु खरे का बुधवार को निधन हो गया। बुधवार को ब्रेन हेमरेज के बाद उनको दिल्ली के जीबी पंत सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में भर्ती कराया था जहां आज उन्होंने अंतिम सास ली। डॉक्टरों की मानें तो उनकी हालत नाजुक बनी हुई थी।

अस्पताल प्रबंधन के मुताबिक, विष्णु खरे के उपचार में कई वरिष्ठ डॉक्टरों की टीमें तैनात की गई थी। वे आईसीयू में थे। न्यूरो सर्जरी विभाग के दो वरिष्ठ अधिकारी उनकी मॉनिटरिंग कर रही थी।

हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनने के बाद कुछ दिन से दिल्ली में रह रहे सुप्रसिद्ध कवि एवं पत्रकार विष्णु खरे को नाइट ऑफ द व्हाइट रोज सम्मान, हिंदी अकादमी साहित्य सम्मान, शिखर सम्मान, रघुवीर सहाय सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान से नवाजा जा चुका है।

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